रविवार, अप्रैल 06, 2008

खुरदरी आवाज़ का जादू

बेटे ने इंटरनेट से खोज कर राहुलदेव बर्मन के संगीत वाली बहुत से फ़िल्मों का संगीत डाउनलोड कर के दिया, उनमें कुछ बँगाली संगीत भी था. कुछ अलग सुनने को मिलेगा सोच कर उनमें से कुछ बँगला गाने मैंने अपने आईपोड में डाले. साईकल पर जा रहा था संगीत सुनते हुए कि अचानक बहुत सालों के बाद वह खुरदरी, मस्त आवाज़ सुनी जिसका कभी दीवाना था, यानि कि उषा उत्थप की आवाज़.

मुझे जहाँ तक याद था वह दक्षिण भारत की रहने वाली थीं और अँग्रेज़ी में गाने गाती थीं. फ़िर उन्होंने कुछ हिंदी फ़िल्मों में हिंदी गाने भी गाये थे, पर वह बँगाली में भी गाती हैं, यह नहीं सोचा था. उनका बँगला गाना "मानो, मानो ना.." बहुत बढ़िया लगा. फ़िर सुना "शुखो नाईं गो गो गोपाले" तो और भी अचरज हुआ, बँगाली शब्द और दक्षिण का कर्नाटक संगीत एवं धुन, मज़ा आ गया.

साठ-सत्तर के दशकों में उनकी बड़ी गोल बिंदी, भारी आवाज़, खुल कर पटाखे फटने जैसी हँसी, साड़ी पहने हुए अँग्रेजी गाना गाती वे, अज़ीब सी भी लगतीं और आकार्षित भी करतीं. तभी अंग्रेजी के उपन्यास पढ़ने शुरु किये थे और दिल्ली बी रेडियो स्टेशन पर "ए डेट विद यू" और "फोर्सिस रिक्वेस्ट" जैसे कार्यक्रमों में अंग्रेज़ी के गाने सुनते थे. जेएस यानि जूनियर स्टेटसमेन की अँग्रेज़ी पत्रिका निकलती, तो आधुनिकता और प्रगति उसमें दिये गये अँग्रेज़ी गायकों, फ़िल्मों, फैशनों में ही दिखती थी. उस समय लगता था कि अँग्रेज़ी तो अँग्रेज़ो की भाषा है. तब उषा उत्थप का कुछ भारतीय आवाज़ और अंदाज़ में साड़ी पहन कर अँग्रेज़ी में गाना अनौखा लगता, मानो वह किसी अदृष्य सीमा को तोड़ कर उससे बाहर निकल गयीं थीं, जहाँ अँग्रेज़ी संगीत भी भारतीय हो सकता था.

शाम को इंटरनेट पर उषा उत्थप के बारे में खोजा तो उनका वेबपृष्ठ मिला. उनकी कुछ ताज़ी तस्वीरें भी देखीं जैसे कि नीचे वाली तस्वीर (from Mallupride dot com) जिसमें वे अभिनेत्री मालायका अरोड़ा खान के साथ हैं. तस्वीर देख कर लगता है कि मानो वह बिल्कुल बदली नहीं. उनके वेबपृष्ठ पर उनके बारे में पढ़ा उन्हें परिवार के लोग और काम करने वाले दीदी बुलाते हैं, कि वह बम्बई में बड़ी हुईं और 1969 से गा रहीं हैं, तेरह भारतीय भाषाओं में और आठ विदेशी भाषाओं में गा सकती है. उन्होंने कुछ फ़िल्मों में काम भी किया है, गीत लिखे हैं, फ़िल्मों में सगींत भी दिया है. यानि बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं. पर यह पढ़ कर कुछ आश्वर्य हुआ कि उन्होंने एक फ़िल्म में मिथुन चर्कवर्ती यानि हीरो के लिए भी गाना गाया है.



गूगल पर उनके बारे में खोजा. सत्तर के दशक में ही कलकत्ता आ कर रहने लगीं. कलकत्ता क्यों आईं इस बारे में कुछ नहीं लिखा पर अवश्य इसमें प्रेम या विवाह की बात ही होगी. उनका पहला नाम उषा अईय्यर होता था. एक अन्य साक्षत्कार में लिखा है कि वे चार बहनें थीं, उषा, उमा, इंदिरा और माया, चारों का गाने का शौक था पर केवल उषा ओर इंदिरा ने गाने को गम्भीरता से लिया. पर इस साक्षात्कार में उनका नाम "सामी" बहने और उनके पिता का नाम बम्बई के पुलिस कमिश्नर वी. एस. सामी था. शायद इसका मतलब है कि उषा जी का पहला विवाह किसी अय्यर से हुआ था और बाद में उन्होंने किसी उत्थप से विवाह किया? एक अन्य साक्षात्कार में लिखा है कि वह बाह्मण परिवार में पैदा हुई और शाकाहारी हैं पर कलकत्ता में उनके पति का परिवार माँसाहारी है इस लिए उन्होंने माँसाहारी भोजन बनाना भी सीखा और उनकी एक बेटी भी है.

इंटरनेट पर यह सब खोजते हुए सोच रहा था कि जीवन कितना बदल गया. तीस पैंतीस साल पहले के प्रिय कलाकार के गाने सुनना, उसके जीवन के बारे में समाचार खोज कर पढ़ना, सब कुछ दूर विदेश में अपने घर में बैठे बैठे, शायद यह सब बातें एक ज़माने में कोई कहता कि इस तरह होगा तो विश्वास नहीं होता. यही आज के जीवन का आम चमत्कार है, फर्क केवल इतना है कि इसकी भी आदत हो गयी है ओर इसमें कुछ विषेश नहीं लगता, न ही इस बारे में कोई सोचता है!

4 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा उषा उत्‍थुप पहले उषा अय्यर थीं । और राहुल देव बर्मन की अभिन्‍न मित्र । आपको अगर याद हो तो मशहूर पॉप सॉंग when it tuesday it must be rome पर उन्‍होंने पंचम से 'शहर की गलियों में जब अंधेरा होता है' जैसा गाना बनवाया था । पंचम के कई कई गानों की प्रेरणा ऊषा उत्‍थुप रही हैं । पिछले साल या दो साल पहले उनके कुछ अलबम आए थे । वो अभी भी वैसे ही गाती हैं । लता जी के जन्‍मदिन पर आयोजित एक कार्यक्रम में उषा उत्‍थुप ने बिंदिया चमकेगी जैसा गीत अपने ही अंदाज में गाया था ।

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  2. मुझे तो यह शीर्षक बहुत पसन्द आया - खुरदरी आवाज का जादू। पेयर्स ऑफ अपोजिट्स का अपना अन्दाज है और अपना आकर्षण। मधुर आवाजें तो नॉर्म हैं। खुरदरी आवाज - वण्डरफुल!
    कभी सुनूंगा इन उत्थप जी को, इत्मीनान से!

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  3. ये तो चीनी भाषा में भी गा लेती है. बहुत कम गायक इतनी भाषाओं में गाते है.

    खुरदुरी अवाज का जादू...बहुत सही.

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  4. शीर्षक आपने वाकई शानदार दिया है!!
    बचपन में जब सिर्फ़ दूरदर्शन था, कभी कभी उषा उत्थुप जी गाते दिख जाती थी, देखने सुनने मे में अलग ही आकर्षण जैसा कि आपने लिखा है बड़ी सी बिंदी के साथ साड़ी पहन कर अंग्रेजी गाना। एक अलग ही आकर्षण , और उपर से इनकी आवाज़!!

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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