सोमवार, अगस्त 08, 2005

गिरते तारों की रात

कई दिनों से अखबारें और टेलीविजन याद दिला रहे थे कि 6 और 7 अगस्त को रात को आसमान पर गिरते तारों को देखना न भूलिये. पर दोनों ही दिन, रात को बादलों ने आसमान को ढ़क दिया था, तो तारे क्या देखते!

आप को "कुछ कुछ होता है" का वह दृश्य याद है जिसमें शाहरुख और काजोल गिरते तारों को देख कर पूछते हैं कि तुमने क्या मांगा ?

क्या आप ने कभी गिरते तारों को देखा है ?

सच पूछिये तो मैंने पहले कभी गिरते तारों को नहीं देखा था. कभी देखा भी हो तो ख़ास ध्यान नहीं दिया था. पर पिछले साल इन्हीं दिनों में एक शाम अपने दो मित्रों को घर पर खाने पर बुलाया था, ज्योवानी जो मेरे साथ काम करता है और उसकी साथी, मारिया लूसिया, जो बाज़ील की हैं. पत्नी और बेटा छुट्टियों में बाहर गये थे और मैं घर में अकेला था. खाना खा कर गप्प मार रहे थे कि मारिया लूसिया ने कहा कि चलो गिरते तारों को देखें. मैं भी उनके साथ बाहर बालकनी पर गया हालाँकि मन में सोच रहा था कि क्या तारे दिखेंगे.

"वो देखो, एक वहाँ...वो देखो एक वहाँ.." दो, तीन बार सुना तो मैंने भी आसमान को ध्यान से देखना शुरु किया. तब देखा अपना पहला गिरता सितारा, फिर एक और, एक और.. पहली बार महसूस हुआ कि गिरते तारों को देखने में एक जादू सा है. इसीलिए इस बार जब गिरते तारों के बारे में सुना था तो सोचा था कि इस बार उन्हें जरुर देखूँगा.

तारों की बात से याद आती है श्रीरुप की, जो दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मेरे साथ काम करता था. रात की ड्यूटी पर कभी बाहर निकलते तो आसमान में तारों को देख कर उनके नाम बताता. "वो वाले तीन तारे जो एक लाईन में हैं, वे ओरियोन की पेटी है, उनमें से एक तारा बूढ़ा है मर रहा है, बीच वाला नया तारा है, बादल जैसा, अभी पूरा बना नहीं है और वह दूसरे कोने वाला लाल सितारा ...". तब लगता कि तारे सिर्फ तारे नहीं, जीवन दर्शन की किताब हों.

अब रात को कभी बाग में घूमते समय कभी ओरियोन की पेटी पर नजर पड़ती है तो श्रीरुप और अन्य बिछुड़े साथियों की याद आ जाती है. कुछ वो जो अब नहीं रहे और कुछ वो जिन्हें जीवन न जाने कहाँ ले गया.

जलन होती है उन लोगों से जो जहाँ पैदा होते हैं, वहीं बड़े होते है, वहीं रहते हैं, जाने पहचाने लोगों और मित्रों के बीच. जिनका कभी कोई नहीं खोता.

***
बिछुड़े हुए लोगों की बात निकली है इसलिए आज की तस्वीरें हैं मिस्र (इजिप्ट) की एक यात्रा से, कैरो शहर की. इस यात्रा में मेरे साथ था मेरा इतालवी मित्र फ्रांको, जो अब इस दुनिया में नहीं है.

1 टिप्पणी:

  1. मिलने-बिछुड़ने के लिये स्व.रमानाथ अवस्थी ने
    लिखा है:-

    आज आप हैं ,हम हैं लेकिन
    कल कहां होंगे ,कह नहीं सकते
    जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
    देर तक साथ बह नहीं सकते।

    तस्वीरें खूबसूरत हैं।

    उत्तर देंहटाएं

"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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