रविवार, अक्तूबर 23, 2005

रामायण के पात्र

रामायण में कई पात्र हैं जिनके नामों के बारे में अगर सोच कर देखें तो कुछ अजीब सा लगता है. जैसे मुनि विश्वामित्र जी, जो बहुत गुस्से वाले हैं और छोटी छोटी बात पर श्राप दे देते हैं, पर नाम पाया है विश्वामित्र. एक अन्य नाम जो मुझे समझ नहीं आता वह है रावण की पत्नी मंदोदरी का, मेंदोदरी यानि मंद उदर वाली ? क्या बेचारी को हाजमे की तकलीफ थी या फिर बच्चे पैदा करने में कोई कठिनाई थी ? कैसे माँ बाप थे उसके, जिन्होंने अपनी बेटी को यह नाम दिया ?

पर रामायण का वह पात्र जिस पर मुझे सबसे अधिक दया आती है, वह है बेचारा कुम्भकरण. कुम्भ जैसे कानो वाला, अपने बच्चों के नाम रखता है कुम्भ और निकुम्भ, छः महीने सोता है और शायद जोर से खुर्राटे भी लेता है. उसे जगाना आसान नहीं. लगता है उसका काम ही विदूषक और खलनायक का मिला जुला रुप निभाना है. उसका व्यक्तित्व रामायण में अजीब सा है और उसके व्यावहार में तुक नहीं है. लंका काँड में जब उसके बेटे युद्ध में मर रहे हैं, वह सो रहा है. जब रावण के सभी संबंधी और प्रमुख योद्धा युद्ध में मर जाते हैं, तब जाता है रावण आपने भाई कुम्भू को जगाने. उठ कर, भाई की बात सुन कर कुम्भकरण जी बिलख कर रो पड़ते हैं और कहते हैं तुम सीता मैया को क्यों चुरा लायेः

सुनी दसकन्धर वचन तब, कुम्भकरन बिलखान ‌
जगदम्बा हरि आनि अब, सठ चाहत कल्यान ॥
फिर वे रामचंद्र जी के बहुत गुण गाते हैं, और अचानक ही सुर बदल कर भाई से मदिरा और भैंसे भेजेने के लिए कहते हैं, जिन्हें खा पी कर, अकेले ही युद्ध के लिए निकल पड़ते हैं. यानि के कथाकार ने उनके व्यक्तित्व का विकास ठीक से नहीं किया. जैसे आधुनिक बोलीवुड वाले, फिल्म के बीच में अचानक हीरो हीरोइन को झुमरीतलैया से स्काटलैंड में गाना गाने भेज देते हैं कुछ वैसा ही अटपटा सा लगता है. कथाकार ने यह भी नहीं बताया कि भैंसे क्या कुम्भू ने कच्ची खायीं या फिर उन्हें काटा और पकाया गया ?

आज मुझे फिर काम से विदेश जाना है, २९ तारिख को घर वापस आने पर ही आप से फिर मुलाकात होगी. आज की तस्वीरें हैं दशहरे पर रावण दहन की.


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