मंगलवार, नवंबर 22, 2005

इस मोड़ से जाती थीं

खेत तिलक नगर से उत्तम नगर के रास्ते पर शुरु हो जाते थे. उसके बाद आता नवादा. अम्मा और बापू नवादा में रहते थे. अम्मा के मिट्टी के घर पर मोर रहते थे. तीन मोर और बहुत सारी मोरनियाँ. अम्मा के यहाँ खाने में मिलती मोटी सी रोटी जिसके साथ वह मक्खन का बड़ा सा टुकड़ा रख देती. और पीने के लिए ठंडी छाछ जिसमें से उपलों की खुशबू आती थी. अम्मा का घर गाँव के बाहर किनारे पर था. उस बार होली देखने के लिए हम लोग गाँव के बीच में जो पानी की टँकी थी उसके पास एक घर में छत पर गये थे. रँगों और गुब्बारों से होली खेलने वाले हम, गाँव की मिट्टी और कीचड़ की होली को अचरज और हल्की सी झुरझुरी से देख रहे थे. पानी की टँकी के पास लड़के और पुरुष पानी की बाल्टियाँ ले कर औरतों के पीछे भाग रहे थे, जो कपड़ों को घुमा और लपेट कर उनके डँडे बना कर उनसे उन लड़कों और पुरुषों को मार रही थीं.

जितनी बार नवादा के सामने से गुजरता होली का यह दृष्य मुझे याद आ जाता. नवादा से दो किलोमीटर आगे सड़क के किनारे नाना का फार्म था. हम लोग, मैं और मौसी, अक्सर फार्म से नवादा की दुकान तक कुछ भी खरीदना हो तो पैदल ही आते थे. अम्मा और बापू कहने को हमारे कोई नहीं थे पर माँ को जब स्कूल में पढ़ाने की नौकरी मिली थी तो सबसे पहले वो नवादा के प्राईमरी स्कूल में थी और माँ तब अम्मा के साथ रहती थी. बापू दिल्ली परिवहन की बस चलाते थे और अम्मा बापू का कोई अपना बच्चा नहीं था.

नाना के फार्म के साथ एक पुरानी पत्थर की हवेली के खँडहर थे. सामने ककरौला को सड़क जाती थी इसलिए उस जगह को सब ककरौला मौड़ कहते थे. आगे चल कर नजफगड़ था पर हम लोग न कभी ककरौला गये न नजफगड़. दोपहर को गर्मियों में खँडहर की ठँडक में बैठ कर हम लोग खेतों से ले कर ककड़ियाँ और तरबूज खाते. गोबर इक्टठा करने और कभी कभी नवादे से दूध लाने के अलावा हमारा अन्य कोई काम नहीं था. लक्की, नाना का कुत्ता हमारा रक्षक और साथी था. दूर दूर तक असीमित खेत और सूनापन.

अब तिलक नगर से नजफगड़ तक घर और दुकानों की लगातार कतारें हैं. मामी जी का स्कूल है वहाँ, जहाँ नाना का फार्म था, ग्रीन मीडोस स्कूल. जहाँ खँडहर थे, बड़े बड़े घर हैं. उन सड़कों पर गाड़ियाँ, स्कूटरों की भीड़ है. नवादा दिल्ली मेट्रों का स्टाप बनेगा और जहाँ ककरौला मोड़ था वहाँ मेट्रो का "द्वारका मोड़" का स्टोप बन रहा है. पिछली बार दिल्ली गया तो मौसी बोली, "तुम्हें विश्वास नहीं होगा कितना बदल गया है. जब मेट्रो पूरा बन जायेगा तब तो और भी बढ़िया हो जायेगा."

जी उदास हो गया. और वो खेत, वो पेड़, वो कूँए उनका क्या हुआ ? कहाँ खो गये वे, सीमेंट के जँगल में. गुलजार का गीत याद आ गया, "इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम राहें, कुछ तेज कदम रस्ते". बचपन की सुस्त कदम राहें, सब तेज कदम रास्तों में बदल गयीं. शायद यह उदासी खोये गाँव के लिए नहीं, खोये बचपन के लिए है ?

++++++

नितिन जी ने लिखा है कि कृष्ण की बहन थी, सुभद्रा जिसे उन्होंने खुद भगाया था. शायद धर्म ग्रँथ नहीं सिखाते जीवन और सामाजिक आचरण के नियम, समाज चुनता है वही धर्म ग्रँथ जो उसके प्रचलित सामाजिक आचरण पर स्वीकृति और नैतिकता की मोहर लगा सके ? वरना राम ही क्यूँ बनते परिवार के आदर्श, कृष्ण भी तो हो सकते थे ?


2 टिप्‍पणियां:

  1. कई बार पुराने दिनों की याद बहुत शिद्द्त से आती है. बीता हुआ कल हमेशा गुलाबी याद के साये में लिपटा रहता है.
    आपको पढ कर बहुत अच्छा लगा.

    प्रत्यक्षा

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  2. शायद इसीलिये भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं....उनका जीवन एकदम आदर्श रहा है जिसे जीने की सिर्फ कोशिश की जा सकती है, किन्तु असल जीवन में ढालना बडा मुश्किल होता है, वहीं कृष्ण-चरित एकदम Practical लगता है(आप बचपन में चोरी कर सकते हैं,कई सखियाँ रख सकते हैं, दोस्तो से हंसी-मजाक,और जरूरत पडने पर साम-दाम-दंड-भेद, किसी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं)

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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