रविवार, फ़रवरी 06, 2011

प्रेम निवेदन

हिन्दी फ़िल्मों के गानों में हमारे जीवन के सभी सुखों दुखों का हाल छिपा है. चाहे कोई भी मौका हो, मुंडन से ले कर मैंहदी तक, करवाचौथ से ले कर क्रियाकर्म तक, खाना बनाते समय सब्ज़ी जल गयी हो या काम पर जाते समय बस छूट गयी हो, प्रेयसी मिलने आये या दगा दे जाये, पापा गुस्सा हों या माँ ने मन पसंद खीर बनायी हो, कुछ भी मौका हो, बस उसका गीत मन में अपने आप आ जाता है. और चाहे उसे गायें या न गायें, मन में अपने आप ही गूँज जाता है. क्या आप को भी लगता है कि बिना इन गानों के जीवन का रस कुछ कम हो जायेगा?

और क्या आप के साथ कभी ऐसा हुआ है कि अचानक कोई गीत सुनते सुनते, अपने जीवन की वह बात समझ में आ जाती है जिस पर कभी ठीक से नहीं सोचा था? मेरे साथ यह अक्सर होता है.

अगले वर्ष मेरे विवाह को तीस साल हो जायेंगे. काम के लिए अक्सर देश विदेश घूमता भटकता रहता हूँ. इन्हीं यात्राओं से जुड़ी एक बात थी, जो अचानक "तनु वेड्स मनु" का एक गाना सुनते समय समझ आ गयी.

गाना के बोल लिखे हैं राजशेखर ने और गाया है मोहित चौहान ने . गाने के बोल हैं -
कितने दफ़े मुझको लगा
तेरे साथ उड़ते हुए
आसमानी दुकानो से ढूँढ़ के
पिघला दूँ यह चाँद मैं
तुम्हारे इन कानों में पहना ही दूँ
बूँदे बना
फ़िर यह मैं सोच लूँ समझेगी तू
जो मैं न कह सका
पर डरता हूँ कहीं
न यह तू पूछे कहीं
क्यों लाये हो ये यूँ ही
गाना सुना तो लगा कि वाह गीतकार ने सचमुच मेरे मन की बात को कैसे पकड़ लिया.

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देश विदेश में घूमते समय कई बार कुछ दिख जाता है जो लगता है कि बहुत सुन्दर लगेगा मेरी पत्नि पर. पर साथ में मन में यह भी भाव होता है कि शायद वह बिना कहे ही समझ जायेगी वह बात जो कह नहीं पाता हूँ. पर अक्सर होता है कि वह मेरी भेंट देख कर नाक सिकोड़ लेती है, "यह क्या ले आये? बिल्कुल ऐसा ही तो पहले भी था." या फ़िर, "क्यों बेकार में पैसे खर्च करते हो, तुम्हे मालूम है कि मैं इस तरह की चीज़ें नहीं पहनती."

और मन छोटा सा हो जाता है. सोचता हूँ, यूँ ही बेकार खरीद लिया. आगे से नहीं खरीदूँगा. पर अगली यात्रा में फ़िर भूल जाता हूँ. प्रेम निवेदन कैसे हो? यह नहीं होता, शायद उम्र का दोष है. आजकल के जोड़े तो आपस में "लव" या "माई लव" करके बोलते हैं, पर मुझसे इस तरह नहीं बोला जाता.

हर बार आशा रहती है कि वह मेरे मन की बात को बिना कहे ही समझ जाये. कभी लगता है कि वह मेरे मन की बात को समझती ही है, उसमें भेंट लाने या न लाने से कुछ नहीं होता?

***

7 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम प्रदर्शित न कर पाने वालों का प्रेम क्या कम होता है?

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  2. आदरणीय सुनील दीपक जी
    नमस्कार !

    प्रेम निवेदन प्रविष्टि प्रशंसनीय है !
    उम्र के साथ साथ आपसी समझ विकसित होती ही है , इसलिए यह भी सच है कि भेंट लाने या न लाने से कुछ नहीं होता ।

    मेरी एक ग़ज़ल के दो शे'र आपके लिए … आपकी ही भावाभिव्यक्ति के लिए सादर पेशे-ख़िदमत है -
    यूं मैंने लिख दिया है दिल तुम्हारे नाम पहले ही
    कहो तो धड़कनें भी… और सांसें , और जां लिखदूं

    दुआओं से तुम्हें राजेन्द्र ज़्यादा दे नहीं सकता
    यूं कहने को तुम्हारे नाम मैं सारा जहां लिखदूं


    हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. उम्मीद करता हूँ आपकी भावनाएं आपकी पत्नी तक पहुँच गयी होंगी

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  4. राजेन्द्र इस खूबसूरते शेरों के लिए तहेदिल से धन्यवाद
    मुकुल, मेरी पत्नी को हिन्दी पढ़नी नहीं आती, इसीलिए तो हिन्दी चिट्ठे में अपनी बात लिखना आसान है! :-)

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  5. अब सभी ब्लागों का लेखा जोखा BLOG WORLD.COM पर आरम्भ हो
    चुका है । यदि आपका ब्लाग अभी तक नही जुङा । तो कृपया ब्लाग एड्रेस
    या URL और ब्लाग का नाम कमेट में पोस्ट करें ।
    http://blogworld-rajeev.blogspot.com
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  6. मेरी मां में कुछ था कि वे बिना मेरे पिता के बोले, उनके मन की बात समझ जाती थीं। मेरी शादी को तीस से कहीं अधिक साल बीत चुके हैं फिर भी वह मेरे मन को नहीं समझ नहीं पाती। बस कहती कि तुम उसे क्यों नहीं बताते:-)

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  7. बहुत शुक्रिया सुनील जी..
    राज शेखर
    rajshekhar.in

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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