शनिवार, दिसंबर 24, 2005

प्रार्थना ध्वज

कल सुबह की उड़ान से भारत जाना है और इस चिट्ठे की तीन सप्ताह के लिए छुट्टी. हो सकता है कि भारत से चिट्ठे पर तस्वीरें चढ़ाने का मौका मिल जाये पर शादी के शोर शराबे में बैठ कर लिखना तो असंभव ही होगा. इसलिए आज का संदेश इस वर्ष का अंतिम संदेश है.

पुराने वर्ष का अंत, कहने को तो वह भी क्मप्यूटर और अंतरजाल की तरह काल्पनिक सच्चाई (virtual reality) है, यानि सब माया है, सब कुछ हमारी अपनी सोच में है. दिन तो वैसे ही हमेशा की तरह सूरज के उगने और डूबने से बनता है, पर हम लोग उसे केलेण्डर में दिनों, महीनों, वर्षों का नाम दे देते हैं. कुछ भी हो, वर्ष का अंत कहने से, जी करता है कि पीछे मुड़ कर देखें, क्या हुआ, क्या किया, क्या नया हुआ. अंतरजाल पर बहुत सी जगह यही हो रहा है, २००५ के प्रमुख समाचारों को याद करने के लिए.

मैंने अपने चिट्ठे पर एक ट्रेकिंग का प्रोग्राम लगा दिया था, जिससे पता चलता है कि कौन, कहाँ से मेरे लिखे चिट्ठे को पढ़ने आता है. उससे देखा कि पिछले महीने करीब २५० लोग इस चिट्ठे को पढ़ने आये. यह देख कर लगा कि वाह, कितने पाठक हैं जो मेरे लिखे को पढ़ने आये. फिर और गहराई में देखा तो पाया कि बहुत से लोग गूगल के माध्यम से कोई तस्वीर ढ़ूँढ़ते हुए आते हैं और चिट्ठे पर कुछ क्षण ही रुकते हैं, यानि उन्हें यह पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है कि मैंने क्या लिखा. इस प्रोग्राम से यह भी मालूम चलता है कि किस दिन, कितने बजे, कौन से शहर और देश से पाठक यहाँ आये, कहाँ से आये, इत्यादि.

कुछ दिन तो इन सब बातों को ध्यान से देखा, किसी बात को पढ़ कर मन गर्व से फ़ूलता फिर दूसरी किसी बात से वापस आसमान से धरती पर आ जाता. फिर सोचा कि मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरे लिखे को पंद्रह लोग पढ़े या पचास ? क्यों मानव मन ऐसा है कि उसके पास जो है, उससे संतोष नहीं होता, उससे अधिक ही अधिक चाहता है ?

२००५ का वर्ष मेरे लिए हमेशा विशेष अर्थ रखेगा. इस साल मैंने अपनी खोयी भाषा को पाया है. कुछ महीने पहले अपना लिखा हुआ, फिर से पढ़ कर देख सकता हूँ कि प्रतिदिन खोये शब्द वापस आ रहे हैं, लिखने का तरीका बदल रहा है. मन में यह भी आता है कि चिट्ठे से बढ़ कर कुछ और लिखूँ.

बौद्ध विहारों में त्रिकोणाकार प्रार्थना ध्वज होते हैं, जिन पर प्रार्थना लिखी होती है, जिसे हवा की तरंगे आसपास फैलाती हैं. जितनी बार ध्वजा हवा में लहराये, उतनी बार आप की प्रार्थना सफल होगी. वैसे ही बौद्ध प्रार्थना चक्र भी होते हैं. मंदिर जाईये तो हाथ से छू कर उन्हें घुमा दीजिये और जितना घूमेंगे, उन पर लिखी प्रार्थनाँए भगवान की ओर जायेंगी. सोचता हूँ कि ब्लाग वैसे ही एक नये धर्म के प्रार्थना ध्वज हैं. उन पर लिखे शब्द किसी के आने की हवा का इंतजार करते हैं. चाहे कोई गलती से आये या कुछ पढ़ने के लिए, क्या फर्क पड़ता है उससे!

कहते हैं कि कोई मरता नहीं तब तक, जब तक उसे कोई याद रखता है. मैंने अपने बहुत से प्रियजनों को इस चिट्ठे के माध्यम से याद किया है. कभी उनके बारे में बहुत कुछ बता कर, क्योंकि मुझे लगा कि वह बात मैं बता सकता था. कभी किसी का नाम तो लिखा है पर उसके साथ की सारी बात छुपा गया क्योंकि वह बात कहना मुझे ठीक नहीं लगा. वे सब हैं इन मेरे प्रार्थना ध्वजों पर, जब तक कोई उनके बारे में पढ़ सकता है, वे जीवित रहेंगे.


आप सब को क्रिसमस और नववर्ष की शुभकामनाँए, गुरु बिरजू के कत्थक नृत्य कार्यक्रम की तस्वीरों के साथ. अगले वर्ष, कुछ सप्ताह के बाद मिलेंगे.



2 टिप्‍पणियां:

  1. सुनील जी, शुभ यात्रा! नए साल की असीम मंगलकामनाएँ!

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  2. कहते हैं कि कोई मरता नहीं तब तक, जब तक उसे कोई याद रखता है.
    सच्ची बात!

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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