शुक्रवार, दिसंबर 23, 2005

इंडियाना जोनस् बोलिविया में

मेरी न भूल पाने वाली यात्राओं में एक बोलिविया यात्रा भी है. बोलिविया की राजधानी "ला पाज़" साढ़े तीन हज़ार मीटर की ऊँचाई पर है. हवाई अड्डे पर उतरते ही आप को डाक्टर और नर्सें दिखती हैं, यह देखने के लिए कि कोई बेहोश तो नहीं हो गया और कई बोर्ड दिखते हैं जिन पर लिखा है कि अगर आप को चक्कर आ रहे हैं या सिर घूम रहा है तो तुरंत बैठ जाईये और सिर को घुटनों के बीच में रख लीजिये. तस्वीर में ला पाज़ में एक जलूस.

वहाँ शहरों से बहुत दूर त्रिनीदाद राज्य में एक गाँव में गये. वहाँ होटल नहीं थे, हमें सोने की जगह मिली एक अधूरे घर में जहाँ खिड़की दरवाज़े नहीं थे. घर में बत्ती भी नहीं थी. मोमबत्ती बुझाई तो बिल्कुल अँधेरे में डूब गये. पाखाना घर से बहुत दूर पीछे खेतों में था. रात को घर में बिस्तर के पास मुर्गियाँ, सूअर, बिल्ली आदि घूमते थे. असली मज़ा तो तब आया जब वहाँ से वापस जाने का समय आया. हमारा छोटा सा जहाज़ था, दो सीटों वाला. एक सीट पर पाइलेट जी बैठे और दूसरी पर मेरे साथी. मैं पीछे स्टूल पर बैठा. तेज़ बारिश हो रही थी और जहाज़ एक खेत में रुका था, जहाँ बच्चे, गधे, कुत्ते आदि थे. पहले तो खेत से सबको हटाने में देर लगी. फिर जब जहाज़ चला तो उठ नहीं पाया और खेत के किनारे पेड़ों के पास धक्के से रुक गया. मेरा स्टूल मेरे नीचे से निकल गया और मैं नीचे जा गिरा. खैर पाइलट जी ने हिम्मत नहीं खपयी और दोबारा उड़ाने के लिए जहाज़ को घुमाया. डर के मारे मुझे मतली आ रही थी. इस बार जहाज़ उठा और पेड़ों के पत्तों को छूते हुए ऊपर आ गया.

इसी यात्रा के दौरान एक और रोमांचक अनुभव हुआ. हम लोग ब्राजील की सीमा के पास, नाव में बैठ कर मदेइरा नदी पर एक द्वीप में बने कुष्ठ रोगियों के अस्पताल को देखने गये. जब वहाँ से वापस आने लगे तो कुछ अँधेरा होने लगा था, तो हमारे नाव की बत्ती खराब हो गयी, या फिर उसमें बैटरी नहीं थी. साथ ही नाव में थोड़ा पानी आ रहा था. हम सबको कहा गया कि गिलास या मग ले कर पानी नाव से बाहर फैंकें. पानी में जौंक थीं जो मेरे भी टाँगों पर चिपक कर खून चूस कर मोटी हो गयीं.
मदेइरा नदी का प्रवाह बहुत तेज़ है. इस नदी पर कई जगह लोग सोना ढ़ूँढ़ते हैं पर नदी का असली प्रयोग लकड़ी भेजने के लिए है. बोलिविया और ब्राजील में जँगलों से लकड़ी काट कर नदी के द्वारा दूर दूर भेजी जाती है. मदेइरा शब्द का अर्थ ही पोर्तुगीस भाषा में लकड़ी है. हलके अँधेरे में हमारी नाव जा रही थी, जिसमें बड़े कटे हुए पेड़ तैर रहे थे. पानी में मगरमच्छ भी थे और माँसभक्क्षी पेरानिया मच्छियाँ भी. अगर किसी पेड़ से टकरा कर नाव उलट जाये तो क्या होगा, यह सोच सोच कर मेरी जान सूखी जा रही थी. जब रात को सांताक्रूस पँहुचे तो नाव वाले ने जलती सिगरेट से जौंकों को छू कर हटाया.
तस्वीर में मदेइरा नदी के किनारे बोलिविया के डा. अलवारेज़ और नाव में हमारे गाईड फादर फिलिप्पो.


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अनूप जी, कुणाल सिंह की कहानी के बारे में बताने के लिए धन्यवाद, मुझे बहुत अच्छी लगी. इस दिनों में बहुत भागमभाग है, मुश्किल से लिख पाता हूँ. पढ़ने, टिप्पणी लिखना और टिप्पणियों का जबाव देना सब बहुत सीमित कर पाता हूँ, पर आप सब को धन्यवाद.

2 टिप्‍पणियां:

  1. Wow, kya adventurous trips hain. Apni to boss gili boat main daar ke maare sukh leti aur stool per hi nikal leti. Awsome photos too !

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  2. बंधु आपके अनुभव बहुत ही रोचक हैं तथा कई मायने में ह्रिदी के पाठकों के लिए अभूतपूर्व भी हैं कृपया जारी रहें।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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