बुधवार, मार्च 22, 2006

कोयले की दलाली

अमरीकी लेखक अलेक्ज़ांडर स्टिल की नयी पुस्तक निकली है, "नागरिक बरलुस्कोनीः जीवन और कार्य", जिसके कुछ हिस्से इटली की एक पत्रिका में लेख के रुप में प्रकाशित हुए हैं.

पढ़ कर बहुत अचरज हुआ क्योंकि उसमें देश के नियम और कानून को तोड़ मरोड़ कर अपने फायदे के लिए इटली की प्रधानमंत्री श्री बरलुस्कोनी द्वारा किये बहुत से कामों के कच्चे चिट्ठे विस्तार से बतलाये गये हैं. लेख में इन सब कामों को करने के लिए किस पत्रकार, किस उद्योगपति, किस व्यक्ति ने कैसे प्रधानमंत्री का साथ दिया ताकि वह कानून का खेल बना सकें, उनके भी नाम खुले आम लिखें हैं.

अचरज इसलिए हुआ कि अगर इन बातों के सबूत नहीं हों श्री स्टिल के पास तो उन पर करोड़ों की मानहानि का दावा किया जा सकता है. और अगर यह सब बातें सच हों तो बहुत से लोगों को जेल में होना चाहिये था.

उदाहरण के तौर पर उसमें एक जाने माने टेलीविज़न पत्रकार का नाम है और उनकी एक उद्योगपति से टेलीफोन पर की हुई बात का पूरा विवरण है जिसमें वह बताते हैं कि कैसे वह अपने टेलीविज़न के समाचारों द्वारा एक अच्छे मजिस्ट्रेट के बारे में झूठ फैला रहे हैं क्योंकि उसने बरलुस्कोनी के एक मित्र की जाँच का आदेश दिया था.

राजनीति गंदा खेल है जिसमें आदर्श नहीं पैसे और ताकत के लालच की बात होती है, या फ़िर कोयले की दलाली जैसी है, आप जितनी भी कोशिश कीजिये हाथ काले ही जायेंगे, मैं यह सोचता हूँ और शायद बहुत से लोग यही सोचते हैं. पर यह सोच कर की यह कोयले के दलाल हमारे जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं, क्षोभ भी होता है.
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भारतीय पत्रकारों द्वारा "स्ट्रिंग आप्रेशन" में भी कुछ ऐसी ही बात होती है जिसमें छुप कर घूस लेते हुए या फ़िर गैरकानूनी काम करते हुए लोगों के वीडियो खींच कर टेलीविज़न में दिखा दिये जाते हैं.

खुले आम जनता में किसी को इस तरह नंगा करने का विचार मुझे अच्छा नहीं लगता, जंगलीपन लगता है. मेरे विचार से ऐसे सबूत कानून को सौंपने चाहिये ताकि कानून ऐसे लोगों को सजा दे सके. पर मैं लोगों की अधीरता समझ सकझ सकता हूँ क्योंकि कानून इतना वक्त लगा देता है कि बात का मतलब ही नहीं रहता या फ़िर कानून को घुमा कर उल्लू बनाना शायद अधिक आसान है जबकि टेलीविज़न में दिखा कर "तुरंत न्याय" हो जाता है.

पर एक बार टेलीविज़न में दिखाने के बाद, कुछ दिनों के हल्ले के बाद क्या होता है ? क्या कुछ सचमुच बदलता है ?
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कुछ समय पहले पढ़ा था कि राजनीति के पेशेवर लोगों के भ्रष्टाचार को देख कर आई आई टी के कुछ इंजीनियरों ने अपनी एक पार्टी बनाने का फैसला किया था. यह सुन कर अच्छा लगा क्योंकि राजनीति केवल भ्रष्टाचारियों का अखाड़ा न हो, इसके लिए आम नागरिकों को भी राजनीतिक जीवन में घुसने से पीछे नहीं हटना चाहिये.

एक राजनीतिक दल या कुछ पढ़े लिखे लोगों के आने से व्यवस्था नहीं बदलती, वे भी भ्रष्टाचार से प्रभावित हो जाते हैं. उससे लड़ने के लिए सारी जनता का बहुमत और साथ चाहिये.

1 टिप्पणी:

  1. सुनील जी,
    बरलुस्कोनी के बारे मे मैने भी अपने आस पास के इटालियन्स से ऐसी ही बाते सुनी हैं। पिछले साल उन्होने कुछ ऐसे नियम लागू किये जिससे यहां के विश्विद्यालयों के कर्मचारियों और शोध्कर्ताओं पर काफ़ी विपरीत प्रभाव पडा। अभी तक मैने जितने भी लोगों से इस बारे मे बात की है, किसी ने भी बरलुस्कोनी की नीतियों का समर्थन नही किया।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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