रविवार, अप्रैल 02, 2006

मेरा कुछ सामान

गुलज़ार का गीत है "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है", जिसे आजकल अक्सर गुनगुनाने का दिल करता है. ऐसा पहले भी कई बार होता है, विषेशकर जिन दिनों में बहुत सी यात्राएँ करनी पड़ें.

आजकल मेरा यात्रा का मौसम है, एक सूटकेस से निकाल कर गन्दे कपड़े निकालो और दूसरा सूटकेस उठाओ और फ़िर से निकल पड़ो. जब लोग मेरी यात्राओं का सुन कर कहते हैं कि "वाह, कितने मज़े हैं आप के!", तो मुझे झूठी हँसी के साथ, हाँ कह कर सिर हिलाने का अच्छा अभ्यास है.

जीवन के हर हिस्से में जैसे अलग अलग "मैं" रहते हैं, काम पर एक मैं, इतालवी मित्रों के साथ एक और मैं और भारतीय मित्रों के साथ एक अन्य मैं. आप तौर पर यह सब भिन्न मैं, भिन्न हो कर भी एक दूसरे से बिल्कुल कटे हुए नहीं, कहीं न कहीं कोई सिरा मिलता है उनका.

पर शहर से बाहर अनजान लोगों के बीच में यात्रा हो तो वहाँ जाने वाला मैं, बाकी सभी मैं से बिल्कुल कटा हुआ होता है. शायद इसीलिए वहाँ छोड़ी हुई यादें ज्यादा भारी लगती हैं ? जीवन जीने के हिस्से, मैं के टुकड़े जो यहाँ वहाँ छूट जाते हैं. शायद जो बचपन में कुछ कुछ सालों के बाद घर और शहर बदलने के लिए मज़बूर होते हैं उन्हें भी ऐसा ही लगता है कि जीवन का सामान कहीं छूट गया हो ?

कल लंदन से वापस आया. आज अफ्रीका में मोज़ाम्बीक जाना है. दो सप्ताह के बाद जब वापस आऊँगा तो पहले दक्षिण इटली जाना है फ़िर इजिप्ट और फ़िर जेनेवा.
*****

लंदन में इस बार वहाँ के चिड़ियाघर गया. करीब पंद्रह पाऊँड का टिकट है जितने में आप डिस्नेलैंड में जा सकते हैं, और दिल्ली के चिड़ियाघर में तो प्रतिदिन तक कई सालों तक जा सकते हैं.

अंदर जा कर देखा तो बहुत से हिस्से बंद थे, उन पर काम चल रहा था. बस पेलीकेन और फ्लेमेंगो पक्षियों वाला हिस्सा अच्छा लगा और ब्राज़ील के छोटे बंदर भी बहुत सुंदर लगा पर मन में कुछ संतुष्टी नहीं हुई! खैर आज की तस्वीरें इसी चिड़ियाघर से हैं.


4 टिप्‍पणियां:

  1. पता नही क्यो पर आपसे ईर्ष्या होती है. आप इतनी जहग घूम रहे है. मुझे भी भ्रमण का बहुत शौख है. शायद इंसान जो नही कर पाता उसीका क्रेज रहता है.

    वैसे आपने ब्लोग की कलर थीम इतनी भंयकर क्यों बना रखी है? ;-)

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  2. काश मैं भी विश्व भ्रमण कर पता|
    पंकज जी, मुझे तो सुनील जी दार्शनिक लगते हैं|

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  3. सुनील जी,

    मुझे आपसे ईर्ष्या होती है, काश मै भी आपकी तरह यायावर होता.

    आशीष

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  4. बिलकुल गुलजार की ईसटाईल मे ‍लिखा है आपने।
    अच्छा लगा।
    कभी कभी मैं सोचता हुँ, कि क्यौं लम्बे समय से विदेश में रहने/घुमने के बाद भी अकसर "मैं" देसी गाने गुनगुनाता है।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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