रविवार, अप्रैल 22, 2007

टेलीविजन की सीमाएँ

टेलीविज़न समाचारों में दिखाये गये दृष्य रौंगटे खड़े देने वाले थे. देख कर बहुत गुस्सा आया. क्या जरुरत थी वह दृष्य दिखाने की? सोचा कि उठ कर टीवी बंद कर दूँ पर इतनी भयानक लग रही वह बात कि न नज़र हटा पाया या सोफे़ से उठ पाया. बाद में यह सोच रहा था कि यह समाचार न भी बताते तो क्या हो जाता और अगर बताना ही था बिना दिखाये भी तो बताया जा सकता था?

समाचार था 12 साल के अफ़गानी लड़के का जिसके हाथ में चाकू था, फ़िर दिखाया जीप में आ रहे व्यक्ति को जिस पर अमरीकी जासूस होने का आरोप था और जिसकी आँखें डरे हिरन की तरह इधर उधर झाँक रहीं थीं. कुछ व्यस्क लोगों ने जासूस को कस कर पकड़ लिया और फ़िर बारह वर्ष के लड़के ने जासूस को मृत्यदँड सुनाया और आगे बढ़ कर चाकू से उसकी गर्दन काट दी. बस अंत के कुछ क्षण टीवी वालों ने नहीं दिखाये.

इतना धक्का लगा कि अब भी इस बात को सोच कर गुस्सा आ जाता है. बच्चे मासूम नहीं होते, सिखाया पढ़ाया जाये तो हत्यारे भी हो सकते हैं, यह नई बात नहीं है, मालूम है.

दुनिया में अत्याचार करने वाले, क्रूरता दिखाने वाले, पत्थर दिल जल्लादों की कमी नहीं. अपने गुस्से की वजह के बारे में सोच रहा था कि क्यों मुझे यह बात इतनी बुरी लगी?

यह मालूम तो है कि क्रूरता किस हद तक हो सकती है पर शायद मैं इस बारे में जानना सोचना नहीं चाहता? जब तक अपनी ही जान पर न बन आयी हो या अपने सामने ही न हो रहा हो, तो हो सके तो आँखें बंद कर लेना चाहता हूँ, भूल जाना चाहते हूँ. क्यों कि ऐसे क्रूर सच का सामना करने की मुझमें ताकत नहीं.

शायद इसे शतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छुपाना ही कहिये, पर नहीं देखना चाहूँगा ऐसे दृष्य और सोचता हूँ कि टीवी वालों को नहीं दिखाना चाहिये था.

करीब दस साल पहले संयुक्त राष्ट्र संघ के शरणारार्थी कमीशन के साथ युगाँडा में ऐसे सुडान के बच्चों का कैंम्प देखा था जो लड़ाई में सिपाही रह चुके थे. जब वहाँ पहुँचे तो बारह चौदह साल की उम्र के वे बच्चे जो फुटबाल खेल रहे थे.

तब हाथ देखने का शौक था मुझे, सबने एक एक कर के हाथ सामने खोल दिये थे. उनमें से अधिकतर हाथों में जीवन रेखा कितनी छोटी थी, यह बात नहीं भूल पाया.

और उनकी आँखों में एक खालीपन सा दिखा था जिससे बहुत डर लगा था. हाथ देखते हुए एक दो बार नज़र उठा कर कुछ बच्चों के चेहरे की ओर देखा तो वह खालीपन दिखा था, फ़िर अन्य बच्चों से नजर बचाता रहा था. शायद बात उनकी आँखों की नहीं, मेरे अपने सोचने की थी, वह खालीपन उनकी आँखों में नहीं, मेरी कल्पना में था? कैंम्प की मनोविज्ञान चिकित्सक का कहना था कि बंदूक के साथ साथ, मौत भी बच्चों के बच्चों के लिए खेल सा बन जाती है और क्रूरता में बच्चों का सामना करना कठिन है.

दूर से गोली मारना तो अलग बात है पर उस बारह साल के बच्चे ने जब छटपटाते हुए आदमी की गरदन काटी होगी तो वह भी खेल की तरह ही देखा होगा? रात को उसके सपनों में क्या आया होगा? और बच्चों को इस तरह वहशीपन सिखाने वाले, उनके सपनों में कौन आता होगा?

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हिंदुस्तान टाईमस पर सुश्री बरखा दत्त का लेख छपा है ब्रेक इन न्यूज़ ( "Hindustan Times Breakin News) यानी ताजा या नयी खबर. जिसमें वह बात करती हैं एक अन्य अजीब और खतरनाक खाई की जो हिंदी और अँग्रेजी इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बन रही है.

बरखा जी का कहना है कि हिंदी की समाचार चैनल अधिक घटिया और निम्न स्तर की पत्रकारिता की ओर जा रहीं है. वह पूछती हैं कि क्या हिंदी टीवी पत्रकार यह दिखाना चाहते हें कि हिंदी में सोचने समझने वाली जनता केवल इस तरह की घटिया और बेवकूफ़ बातें ही समझ सकती है?

कितना सच है उनकी बातों में यह तो नहीं कह सकता, भारत के हिंदी अग्रेजी टीवी जगत से बहुत दूर हूँ. कभी इंटरनेट के माध्यम से कुछ समाचार देखने की कोशिश करो तो कभी कभी खीझ आती है कि समाचार चैनल भुतवा मकानों और अँधविश्वास को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं और हर समाचार को खींच तान कर लम्बा करके दिखाते हें. जब सारी बात टीआरपी और बाज़ारी मूल्य पर टिकी हो तो यह होना आसान है.

और अगर आज समाचार पत्र और चैनल बाजार के हाथों कमजोर हो रहे हैं तो शायद जनता का विश्वास एक दिन अपने आप इनसे उठ जायेगा और वही प्तरकार, अखबार और चैनल चलेंगें जो सच और इमानदारी से अपनी बात कहते हैं. शायद आप कहें कि यह केवल आशावादी सपना है और सच्चाई से दूर है!

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी आशा और सपना हक़ीकत में एक दिन बदले।

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  2. बहुत पहले एक ऐसा ही फुटेज दिखाया गया था जिसमें एक तालिबानी सरेआम एक निरीह, बुरके में लिपटी औरत के सिर पर रायफल दाग देता है. वह दृश्य मेरे जेहन से कभी भी नहीं निकलता.

    समाचार चैनल इतनी फ़ूहड़ता दिखाने लगे हैं कि मैंने तो टीवी पर न्यूज चैनल देखना ही छोड़ दिया है. मि. बीन और फ्रेंड्स ज्यादा अच्छे हैं.

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  3. "ब्रेकिंग न्यूज" और "एक्स्क्लूसिव" के नाम पर आजकल जो फ़ूहडता परोसी जा रही है उससे उबकाई आने लगी है, समूचे इलेक्ट्रानिक मीडिया में होड लगी है कि कौन कितना नीचे गिर सकता है...

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  4. इन समाचार चैनलो की उछलकूद से तो बन्दरो की उछलकूद ज्यादा अच्छी है

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  5. मैं सहमत हूं । हिंदी पत्रकारिता ने पेशे की विश्वसनीयता कम की है । कभी अंग्रेजी के लोग हिंदी पत्रकारों के बारे में अच्छी राय रखते थे । उनसे सलाह लेते थे । अब नहीं ।
    रही बात ऐसे फुटेज की तो संपादक नाम की चीज नहीं । और है भी तो उसे पता नहीं कि दिखाये या न दिखायें । इसी शनिवार को सारे टीवी चैनलों पर तालिबान का एक फुटेज चला जिसमें एक लड़के ने चाकू से गर्दन काट दी । आखिरी शाट को फ्रीज कर लिखा था..और..लड़के ने छुरी से गर्दन काट दी । मैंने इस फुटेज को एनडीटीवी में चलने नहीं दिया मगर कह नहीं सकता कि हम भी ऐसा नहीं कर रहे हैं । पत्रकारिता अब देखा देखी हो रही है ।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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