मंगलवार, अक्तूबर 16, 2007

महीनों के नाम कहाँ से आये?

प्राचीन काल में रोमन केलैंडर मार्च के महीने से प्रारम्भ होता था और वर्ष में केवल दस महीने होते थे, जिनमें सर्दियों के दो महीनो को नहीं गिना जाता था क्योंकि उन दो महीनो में कोई खेती बाड़ी का काम नहीं होता था. पहले महीने मार्च का नाम युद्ध के देवता मार्स यानि मँगलदेवता के नाम पर था. इसी महीने में अक्सर युद्ध छेड़े जाते थे.

अप्रैल के महीने का नाम बना था लेटिन भाषा के शब्द आपेरीरे से जिसका अर्थ है "खुलना", क्योंकि इस माह में धरती अपना वक्ष खोल कर प्रकृति को नया जन्म देती थी.

मई के महीने का नाम देवी माया से बना था जो फ़लने फ़ूलने की तथा नवजन्म की देवी मानी जाती थी. इसी खुशी में पहली मई को लोग बाहर बागों में, खेतों में जाते थे सारा दिन प्रकृति के साथ बिताते थे. जून का नाम बना जूनोन से जो समृद्धी और धरती की उपजाऊता की देवी थी.

इसके बाद के छह महीने के नाम नहीं बल्कि उन्हें लेटिन भाषा में पाँचवा, छठा, साँतवा आदि कहा जाता था. जैसे कि जून के बाद आता था क्विनतीलिउस यानी पाँचवा महीना जिसका नाम बाद में सम्राट जूलियस सीज़र के नाम पर जुलाई रखा गया. इसी तरह सेक्तीलियस यानि छठे महीने का नाम बाद में सम्राट अगुस्तस के नाम पर अगस्त रखा गया.

सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर महीनों के नाम वही पुराने लेटिन शब्दों से बने हैं जिनका अर्थ है सातवाँ, आठवाँ, नवाँ और दशक. चूँकि लेटिन और संस्कृत दोनो इण्डोयूरोपीय भाषाएँ हैं यह शब्द संस्कृत के शब्दों से भी मिलते हैं इस तरह आप को इन महीनों के नाम में सात, आठ, नव और दस शब्दों की झलक भी दिखती है.

अंतिम दो महीनो को कलैंडर में जोड़ा राजा नूमा पोमपिलियो ने ईसा से सात शताब्दियाँ पहले और इन्हें नाम दिये जनवारियुस जोकि ज्यानो देवता के नाम पर था फैबरुआरियुस जो फाब्रुस शब्द से बना है जिसका अर्थ है पवित्र, निष्कलंक.

ईसा से दो शताब्दियाँ पहले यह निर्णय लिया गया कि वर्ष जनवरी से प्रारम्भ होगा न कि मार्च से, पर दुनिया के अन्य केलैंडर अब भी मार्च के आसपास बसंत के साथ ही नववर्ष को मनाते हैं.

महीनों और मौसमों की बात हुई है तो मध्य इटली के केसर्ता शहर के राजभवन से यह कुछ मौसम के प्राचीन देवी देवताओं की तस्वीरें.







5 टिप्‍पणियां:

  1. और सप्ताह के दिनों के नाम ? रविवार को ही सनडे क्यों पड़ता है? क्या साथ बैठ कर सोचा गया ? भारतीय पद्धति में तिथि और पक्ष तो हैं दिन हमने पश्चिम से लिए हैं।भले ही मंगल,शनि को हनुमान ,सोम को शिव और शुक्र को सन्तोषी माता से जोड़ दिया गया।

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  2. अच्छी जानकारी व सुन्दर चित्र ।
    घुघूती बासूती

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  3. संजय बेंगाणी16 अक्तूबर 2007 को 9:41 am

    अफ्लातुनजी के अनुसार भारतीय दिन गणना में वार नहीं होते थे!! सचमुच? कोई रोशनी डाले.

    अच्छी जानकारी.

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  4. प्रिय संजय , भरोसा नहीं है ! हम ने एक टुकड़ा अन्धकार दिया है,अन्य जानकार रोशनी डालेंगे !

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  5. सुनीलजी,
    बहोतही रोचक जानकारी है और चित्र भी खूबसूरत.
    जेनोव्हा से सलाम!

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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