शुक्रवार, अक्तूबर 01, 2010

अयोध्या के राम

आज आखिरकार अयोध्या के मुकदमें का फैसला हो ही गया. पिछले कई दिनों से चिन्ता हो रही थी कि क्या होगा, फ़िर से दंगे, मार पीट तो नहीं शुरु हो जायेंगे!

जब बबरी मस्जिद को ढाया गया था तब 1992 में इंटरनेट आदि कुछ नहीं था, इटली में उसका समाचार तक मुझे बहुत दिन के बाद मिला था, लेकिन उसके कुछ वर्ष बाद मैंने उसके कुछ परिणाम बम्बई में देखे थे, जब भिवँडी की झोपड़पट्टी में दंगों में हिंसा के शिकार परिवारों से मिला था. धर्म के नाम पर मासूमों की जान लेना, इससे बड़ा धर्म का अपमान क्या हो सकता है?

अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के विवाद का क्या निवारण हो, इसमें मुझे उन सुझावों से कभी सहमति नहीं हुई जो वहाँ अस्पताल या विद्यालय बनाने की बात करते थे. इसलिए नहीं कि मुझे अस्पतालों या विद्यालयों की उपयोगिता की समझ नहीं. बात मेरे धार्मिक विचारों की भी नहीं है.

भारत के अन्य करोड़ों हिंदूओं की तरह, मेरे लिए भगवान का स्वरूप वो है जो गायत्री मंत्र में व्याख्यित किया जाता है, यानि भगवान जिसका न कोई आदि है न अंत, जो सर्वव्यापा, सर्वज्ञानी है, जिसका कोई रूप या आकार नहीं. इसलिए मेरी समझ उस भगवान को राम, कृष्ण या शिव के रूप में चिन्ह की तरह स्वीकार करती है, पर उसकी प्रार्थना के लिए मुझे किसी मंदिर या मूर्ति की आवश्यकता नहीं. हर धर्म में, चाहे वह ईसाई हो या मुसलमान, सिख या पारसी या बहायी, अंत में मुझे यही आध्यात्मिक सच दिखता है.

लेकिन मेरे विचार में भारत में मुझ जैसे आध्यात्मिक हिंदूओं से कहीं गुणा अधिक वह लोग हैं जिनके लिए राम ही भगवान का रूप हैं, उन्हीं में उनकी आस्था और विश्वास हैं. इस आस्था में सच क्या या झूठ क्या, इतिहास क्या कहता है या पुरातत्व क्या कहता है, उस सबका कुछ अर्थ नहीं. सभी धर्मों को मानने वाले अधिकतर ऐसे ही होते हैं. लोगों को इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं चाहिये कि जीसस ने सचमुच समुद्र को चीरा था या नहीं, या फ़िर पैगम्बर मुहम्मद ने सचमुच अल्ला की आवाज़ सुनी थी या नहीं, यह विज्ञान या तर्क का सवाल नहीं, आस्था का है, उनके लिए तो उनका पैगम्बर ही ईश्वर का दूत और पुत्र है.

करोड़ों लोगों के इसी विश्वास के बारे में सोच कर मेरे विचार में अयोध्या में उस जगह पर राम का मन्दिर बनाने देना चाहिये, क्योंकि अगर सोचूँ कि ईसाई जिस जगह पर मानते हैं कि येसू का जन्म हुआ था, या मसलमान मक्का और मदीना में जिन जगहों को अपने पैगम्बर से जुड़ा मानते हैं, उनसे उनके विश्वास को छीन कर, उस पर कुछ बनाने की बात कभी कोई नहीं कर सकता. तो राम को मानने वालों के साथ ही तर्क या विज्ञान और सबूत की बात क्यों की जाये?

बचपन में अपनी दादी से रामायण की बहुत कहानियाँ सुनता था. उन कहानियों के नायक राम न शबरी से भेदभाव करते थे न सरयू पार कराने वाले केवट से, उनके सबसे बड़े भक्त और स्वयं पूजे जाने वाले हनुमान तो वानर जाति के थे. उन कथाओं के राम क्या धर्मी, विधर्मी का भेद करेंगे? मेरे विचार में नहीं, वह तो सबको अपनायेंगे. इसलिए मेरा बस चलेगा तो उस राम के मन्दिर को सब धर्मों को लोग मिल कर बनवायेंगे और विश्व हिंदू परिषद, हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आदि सब राम मन्दिर बनवाना चाहने वाले दल मिल कर उस मन्दिर में बाबरी मस्जिद का कमरा भी बनायेगे, यूसू का गिरजा भी, नानक का गुरुद्वारा भी, यहूदियों का सिनागोग भी. घृणा और भेद भाव के बदले अगर अयोध्या के राम सब धर्मों को मान देंगे तभी सचमुच अयोध्या में वापस आयेंगे.

8 टिप्‍पणियां:

  1. राम का चरित्र पढ़ने वाले राम से प्रेम ही कर पायेंगे।

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  2. आशा है सर्वोच्च न्यायालय आप जैसी सतही समझ से काम नहीं लेगा।

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  3. यह तो सच है न्यायालय को तो कानून देखना होता है, उसे भावना से मतलब नहीं. मैंने सुबह से कई आलेख पढ़े. रामनाथ गुहा का, सिद्धार्थ वर्धराजन का, स्वप्न दासगुप्ता का, सब लोग तर्क और कानून की बात ही बात कर रहे हैं, सोचने समझने वाला सारा वर्ग इसी तरह की बात लिख रहा है कि सरकार उस जगह को ले ले, वहाँ बाग बने, या अस्पताल. मुझे लगा भावों की, मानव इच्छाओं की बात कोई नहीं कर रहा जबकि 1992 में जब बाबरी मस्जिद को ढाया गया तो मेरी नज़र में वह कानूनी मसला नहीं, मुस्लिम समाज की भावनाओं पर प्रहार की बात थी. इसीलिए मेरी कोशिश मन्दिर को आम आदमी की दृष्टि से देखने की थी, कि उसकी आस्था और भावनाओं की दृष्टि से देखूँ, अपने धार्मिक या सामाजिक विचारों की दृष्टि से नहीं.

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  4. समुद्र चीरने का काम मोसेस का था

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  5. आपकी भावनायें सच्ची और निष्पक्ष हैं। यही तो हम कहते हैं कि जब मुसलमानों से हजरत मुहम्मद के अस्तित्व बारे, इसाइयों से जीसस के अस्तित्व बारे प्रमाण नहीं माँगा जाता तो श्रीराम के बारे हमसे क्यों प्रमाण माँगा जाता है? और रही बात तथ्यों और सबूतों की तो वो भी अदालत में साबित हो चुका है कि वह स्थान श्रीराम की जन्मभूमि ही था।

    माना यह हुआ होता कि मक्का-मदीना पर किसी अन्य धर्मावलम्बी ने कब्जा कर लिया होता और जबरन अन्य धर्म का पूजास्थल बना दिया होता तो भी क्या मुस्लिम कट्टरपंथी और ये कथित बुद्धिजीवी कहते कि उस स्थान पर अस्पताल बना दो या फिर उस कब्जा करने वाले समुदाय को ही दे दो।

    इतना क्या कम है कि वक्फ बोर्ड का दावा खारिज होने पर भी न्यायालय ने एक तिहाई हिस्सा मुस्लिमों को दे दिया है। तब भी मुस्लिम कट्टरपंथी और "धर्मनिरपेक्ष" हिन्दू खुश नहीं।

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  6. आलोक मेरी गलती सुधारने के लिए धन्यवाद.:-)

    जीसस की कहानी में रोटीयाँ बन जाती है, मछुआरों को मछलियाँ मिल जाती हैं, कुछ रोग वाला लाज़ारस मृत्यु से वापस लौट आता है और उसका रोग मिट जाता है.

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  7. दिल से लिखी बात दिल तक पहुंची.....

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  8. बेतरीन लगा ये लेख ....

    साधुवाद.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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