रविवार, अक्तूबर 07, 2012

शरीर की प्यास


रानी मुखर्जी की नयी फ़िल्म "अईय्या" का एक गाना देखा तो एक पुरानी बात याद आ गयी.

करीब 35 वर्ष पहले की बात है, मेरे क्लिनिक में एक महिला आयीं. पचास या बावन की उम्र थी उनकी. उनकी समस्या थी कि उनके पति में आध्यात्म योग का वैराग्य जागा था. वह अपने शरीर पर और इच्छाओं पर संयम रखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न रखने का फैसला किया था. उन महिला का कहना था कि वह इस बात से बहुत दुखी थीं और पति का समीप न होना उन्हें बहुत कष्ट देता था. वह बोली, "मेरे शरीर की भी तो प्यास है, मुझे अपने पति से सम्बन्ध चाहिये, उनका सामिप्य चाहिये, मैं क्या करूँ?"

उन महिला के पति मुझे बहुत मानते थे इसलिए वह चाहती थीं कि मैं उनके पति से कहूँ कि वह इस तरह से पत्नी से सब सम्बन्ध न तोड़ें. मैंने उस समय तो उनसे कहा कि हाँ मैं आप के पति से इस विषय में बात करूँगा. लेकिन मन ही मन में कुछ हड़बड़ा गया था.

रात को मैंने अपनी पत्नि से इसके बारे में सलाह माँगी. मेरी पत्नि का कहना था कि नारी जब पति का सामिप्य चाहती है तो बात केवल शारीरिक सम्बन्धों की नहीं है, बल्कि नारी के लिए वह तो इसका केवल एक हिस्सा है. नारी के सामिप्य की चाह में एक अन्य भाग होता है मानसिक सामिप्य का, एक दूसरे को छूने का, यह जताने का और कहने का कि तुम मेरे लिए प्रिय हो. इसलिए मेरी पत्नी के अनुसार मुझे उन महाशय से कहना चाहिये था कि अगर वे अपने आध्यात्मिक व्रत के कारण अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न भी रखना चाहें, तो कम से कम मानसिक रूप से उन्हें अपनी पत्नि के करीब होना चाहिये. मेरी पत्नी ने यह भी कहा कि पति पत्नि के रिश्ते के बारे में इस तरह का एकतरफ़ा निर्णय लेना ठीक नहीं, जो भी बात हो दोनो को मिल कर निर्धारित करनी चाहिये, नहीं तो पत्नि विवाह के बाहर भी उस कमी को भर सकती है.

अगर हमारे समाज में सेक्स और आँतरिकता के बारे में बात करना बहुत कठिन है तो यह बात हमारे मेडिकल कालिजों पर भी उतनी ही लागू होती है. जब मेरे मेडिकल कालिज में एनाटमी यानि शरीर विज्ञान की पढ़ायी के दौरान नर और नारी गुप्त अँगों की बारी आयी तो हमारे प्रोफेसर साहब ने मुस्करा कर टाल दिया. कक्षा में बोले कि यह हिस्सा अपने आप पढ़ लेना. न ही फिज़ीयोलोजी में सामान्य सेक्स सम्बन्ध क्या होते हैं के बारे में कुछ पढ़ाया या बताया गया. जब कुछ सालों के बाद बीमारियों के बारे में पढ़ाया गया तो गोनोरिया या सिफलिस जैसे गुप्त अंगो के रोगों का इलाज किन दवाओं से किया जाना चाहिये, यह तो पढ़ाया गया लेकिन नर नारी के बीच सेक्स सम्बन्ध में क्या कठिनाईयाँ हो सकती हैं और उनका इलाज कैसे किया जाये, इसकी कभी कोई बात नहीं हुई. फैमिली प्लेनिँग यानि परिवार नियोजन क्या होता है यह अवश्य कुछ पढ़ाया गया लेकिन हस्त मैथुन के क्या प्रभाव होते हैं, या कण्डोम का सही प्रयोग कैसे करना चाहिये जैसी बातों के बारे में कुछ नहीं बताया गया था.

कहने का अर्थ यह है कि मेडिकल कालेज से मेरी तरह के निकले आम डाक्टरों को यह सब कुछ पता नहीं होता कि सेक्स क्या होता है और पति पत्नि की सेक्स इच्छाओं में क्या भेद होते हैं, उन्हें किस तरह की सलाह देनी चाहिये! बस उतना ही मालूम होता है, जो अन्य लोगों को होता हैं, या जितना किसी किताब या पत्रिका में लिखा मिल जाये, वह भी तब जब वह इस विषय पर स्वयं कुछ खोज करें. यह तो आज को नवयुवक डाक्टर ही बता सकते हैं कि क्या इस विषय में आज के हमारे मेडिकल कालेज बदले हैं या नहीं? आज सेक्स के बारे में इंटरनेट पर इतना कुछ भरा है कि सारा जीवन देखते पढ़ते रह सकते हैं, लेकिन यह सब सेक्स को खरीदने बेचने के कारोबार जैसा है, इससे लोगों को सेक्स के बारे में क्या सही सलाह दी जाये, यह समझना उतना आसान नहीं.

हमारे समाज में आम सोच भी है कि लड़कों और पुरुषों को सेक्स की भूख होती है, जबकि लड़कियाँ और नारियाँ इसे केवल सहती हैं. यानि इस सोच में नारी की यौनिकता को नकार दिया जाता है या पुरुष यौनिकता से कमज़ोर माना जाता है. यह सोच भी है कि विवाह के बाहर सेक्स से लड़की की इज़्ज़त लुट जाती है या, कोमार्य उनका सर्वोच्च धन है जिसे उन्हें सम्भाल के रखना चाहिये. पुरुषों को इस तरह की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि उनके लिए सलाह होती हैं कि अगर किसी से सम्बन्ध करने हैं तो कण्डोम का प्रयोग करो जिससे अनचाहे बच्चे या गुप्त रोग न हों.

इसी तरह के विचारों की बुनियाद पर ही भारत, पाकिस्तान, बँगलादेश जैसे देशों के पाराम्परिक समाज में लोग, "नारी को अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिये", "लज्जा करनी चाहिये", "घूँघट करना चाहिये", "बुर्का पहनना चाहिये", जैसी बातें करते है. इन्हीं विचारों की बुनियाद पर ही मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के कुछ देशों में बच्चियों तथा नवयुवतियों के गुप्त अँगों को बचपन में काटा जाता है और कभी कभी सिला भी जाता है, ताकि उनकी यौनिकता को मुक्त पनपने का मौका न मिले. इसी तरह की कुछ बात कैथोलिक धर्म में होती है जब सेक्स को केवल प्रजनन का माध्यम माना जाता है और केवल प्रेम के लिए या वैवाहिक आनन्द के लिए सेक्स को, और परिवार नियोजन के उपायों के प्रयोग को, जीवन के विरुद्ध मान कर अस्वीकार किया जाता है.

लेकिन आर्थिक विकास के साथ पिछले दशकों में एक अन्य बदलाव आया है. आधुनिक लड़कियाँ और युवतियाँ जानती हैं कि कैसे परिवार नियोजन के उपायों के सहारे गर्भ को रोका जा सकता है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर युवतियों को समाज की स्वीकृति की उतनी परवाह नहीं. इससे नारी यौनिकता को अभिव्यक्ति का मौका पुरुषों के बराबर मिलता है.

बम्बईया फ़िल्मों में भी स्त्री पुरुष सम्बन्धों को अधिकतर पुरुष की दृष्टि से तरह से दिखाया जाता रहा है जिसमें पुरुष यौन सम्बन्ध चाहता है और "रूप तेरा मस्ताना" गा कर अपनी इच्छा को स्पष्ट कहता है जबकि नारी शरमाती हिचकिचाती है. लेकिन बदलते समाज के साथ नारी यौनिकता को भी मुम्बई फ़िल्मों में कुछ स्वीकृति मिलने लगी है.

मेरे विचार में भारत की आधुनिक अभिनेत्रियों में रानी मुखर्जी ने नारी यौनिकता को सबसे मुखर तरीके से व्यक्त किया है. हाल में ही आयी "द डर्टी पिक्चर" और "इश्किया" फ़िल्मों में विद्या बालन ने भी नारी यौनिकता को मुँहफट तरीके से व्यक्त किया था, लेकिन वह अभिव्यक्ति सामान्य जीवन के बाहर के नारी चरित्रों से जुड़ी थी. प्रियँका चोपड़ा ने भी अपनी फ़िल्म "एतराज़" में नारी यौन प्यास को अभिव्यक्त किया लेकिन उसमें उनका चरित्र पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित था. दूसरी ओर रानी मुखर्जी ने "साथिया", "पहेली", "युवा" एवँ "बँटी और बबली" जैसी फ़िल्मों में भारतीय समाज की सामान्य शहरी और गाँवों की नारियों की यौनिकता के विभिन्न रूपों को सुन्दरता से व्यक्त किया है.

Rani Mukherjee - expressing female sexuality

"अईय्या" के गाने में रानी मुखर्जी का पात्र अपने मनभाये पुरुष के पेट पर उभरे सिक्स पैक पर हलके से उँगली फ़िरा कर जताता है कि उसे अपने प्रेमी का शरीर सेक्सी लगता है.

इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "वाट टू डू" भी नारी पात्र की यौन इच्छा और पुरुष पात्र के हिचकिचाने, घबराने को रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है. अक्सर लोग इस तरह के गीत को मज़ाक के रूप में देखते हैं कि सचमुच के जीवन में पुरुष नहीं घबराते हिचकिचाते, बल्कि युवतियाँ हिचकिचाती घबराती हैं. लेकिन मेरे अनुभव में जब कोई स्त्री अपनी यौनिकता को सहजता से स्वीकार कर लेती है और आत्मविश्वास के साथ कहती है कि उसे भी सेक्स और आँतरिकता चाहिये, तो अधिकतर पुरुष घबरा और बौखला जाते हैं, उनका आत्म विश्वास आसानी से चरमरा जाता है.

खुल कर अपने मूल्यों पर अपना जीवन जीने वाली युवती को वही पुरुष स्वीकार कर पाता है जिसमें पूरा आत्मविश्वास हो. जिनमें यह आत्मविश्वास कम हो या न हो, वह पाराम्परिक पति परमेश्वर बने रहना चाहते हैं और पाराम्परिक पत्नी चाहते हैं. उन्हें स्वच्छन्द जीवन जीने वाली युवती में समाज और परिवार का विनाश दिखता है और वह उन युवतियों को चरित्रहीन कहते हैं, उन्हें संस्कृति की याद दिलाते हैं, उन्हें शरीर ढकने, लज्जा करने और शालीनता के सबक देते हैं.

***

17 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक विचार प्रस्तुत किये है आपने. अपने शरीर का स्वीकार करना हम सीखेंगे ( न कि उसके पीछे दौडना!) तो हमारी बहुत सारी उलझने हट जायेगी! काफी सारी चीजे डॉक्टरोंको भी नही सीखायी जाती (या जाती थी) यह पढकर बहुत आश्चर्य हुआ.

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    1. धन्यवाद सविता.

      शायद मेडीकल कोलिज में सोचते हैं कि यौनिकता केवल इस विषय में स्पेशालाईज़ेशन करने वाले डाक्टरों की बात है और स्नातक स्तर पर डाक्टरी पढ़ने वालों की इसकी आवश्यकता नहीं.

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  2. प्रकृति की रची आकर्षणमयी पहेली।

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  3. तब हम दसवीं कक्षा में थे और बॉयोलोजी के कुछ चैप्टर्स को लेकर बहुत उत्सुकता थी कि मैम कैसे उन्हें पढ़ायेंगी, क्रम में चलते चलते जब वो चैप्टर आये तो मैम ने बताया कि ये चैप्टर लास्ट सिमेस्टर में हैं। और इंतज़ार करते रहे, जब लास्ट सिमेस्टर के लास्ट दिन चल रहे थे तो मैम ने कहा कि ये चैप्टर खुद ही पढ़ने होंगे। वो समय ही ऐसा था, सत्तर-अस्सी के दशक। लेकिन मैडिकल कोर्स में भी इतने परहेज के बारे में जानकर अजीब ही लगा।

    आखिरी दो पैरों के सन्दर्भ में ये सच है कि इस ख्याल से ही अपना आत्मविश्वास चरमरा जाता है, उतना ही सच ये भी है कि स्वच्छंदता\उच्छृंखलता लिंगनिरपेक्ष लगती है। ऐसा नहीं कि सलमान खान या अक्षय कुमार कमीज उतारकर भी सभ्य लगता है और बिपाशा या मल्लिका ही असभ्य लगें। एक सच ये भी है कि स्वच्छंदता और उच्छृंखलता एक नहीं है लेकिन इनके बीच की LOC बहुत महीन है और हममें से बहुमत के लिये इनमें फ़र्क करना बहुत मुश्किल है।

    हर बार आपकी पोस्ट पर कमेंट बेशक नहीं कर पाता लेकिन पढ़ता जरूर हूं। टैबू समझे जाने वाले विषयों पर आपकी कलम बहुत सहजता से लिखती है, इसे काम्पलिमेंट के तौर पर ही समझियेगा।

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    1. सँजय तुम्हारी टिप्पणी बहुत अच्छी लगी.

      मैं भी किसी युवा डाक्टर की टिप्पणी की प्रतीक्षा में हूँ, यह जानने के लिए कि क्या आज के मेडिकल कोलिज बदले हैं या नहीं!

      शायद यह सच है कि स्वच्छंदता और उच्छृंखलता का अंतर आसान नहीं है, और इसे लिंगनिरपेक्ष होना चाहिये, पर मेरे विचार में पुरुष उच्छृंखलता को अधिक आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है जबकि नारी स्वच्छंदता को भी दीवारें लाँघनी पड़ती है.

      छोटे से आलेख में हर बात, हर पहलू की सोच नहीं होती, मैं यह मानता हूँ. इस बात के भी कई अन्य पहलू होंगे, जिनके बारे में शायद ठीक से नहीं सोचा और लिखा! :)

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  4. Loved this article. It takes guts to write something like this, specially when it comes to giving a voice to womens feelings and sexuality. Wish more and more men realize this and stop expecting women to just be a puppet.it will make people stop forcing girls into loveless marriages and maybe someday women be treated as human where they won't be raped or humiliated because per men women don't care fore sex, so it doesn't matter who touches them and how.

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    1. Thanks Benami :)

      We have centuries of conditioning behind us, our social costumes mould our thinking from early childhood, so I am sure that change won't be easy or painless. However I believe that the younger generation of women can force the change one day!

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  5. संजय जी की तरह हम भी अपने बॉयोलॉजी के उस चैप्टर पर नजरें गड़ाये थे कि फ्रॉग्स के कॉपुलेशन इटीसी इटीसी को कैसे पढ़ाया जायगा.....अंत में जब पढ़ाया जाने लगा तो जैसे म्यूचुअल फंड के चेतावनी विज्ञापन पढ़े जाते हैं - Mutual funds are subject to market risk...conditions apply. कुछ उसी तेज रफ्तार से पूरा चैप्टर पढा गया :)

    इस तरह "झेंपा" देने वाले चैप्टर्स शायद अब उतनी स्पीड से न पढ़ाये जाते हों लेकिन एक असुविधाजनक स्थिति का निर्माण तो करते ही हैं.

    जहां तक कंठी माला पहन कर आध्यात्मिक होने की बात है तो एक चंदन की गोल मोतियों सी माला मैंने खादी भण्डार से खरीदी थी, घर लाते ही परिवार की भृकुटि तन गई ये क्या लाये हो उठाकर, हटाओ फेंको ....फालतू का भरमजाल लेकर चले आये :)

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  6. एक ऐसे विषय पर जिसे हमारे देश में टेबू माना गया है आपने बहुत स्पष्ट और ज्ञान वर्धक लेख लिखा है...आप की बात अक्षर शः सत्य है...बदलते समय में नारी की यौन इच्छाओं को भी लोग समझने लगे हैं...

    नीरज

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  7. "पुरुषों को इस तरह की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि उनके लिए सलाह होती हैं कि अगर किसी से सम्बन्ध करने हैं तो कण्डोम का प्रयोग करो जिससे अनचाहे बच्चे या गुप्त रोग न हों."

    --- यह सलाह या तथ्य मेडीकल कालेज में सीखा था या बाद में...!

    --- मानसिक रोग चिकित्सा के साथ इस विषय पर काफी कुछ कवर हो जाता है| सभी चिकित्सकों( महिला-पुरुष दोनों ) को इस प्रकार के रोगियों--महिला-पुरुष दोनों, से परामर्श हेतु सामना होता है और परामर्श दिया जाता है |

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    1. नवयुवकों को गुप्त रोगों आदि से बचने के लिए कण्डोम का प्रयोग करना चाहिये, यह सलाह तो किताबों, पत्रिकाओं से समझ आयी थी, मेडिकल कालेज में कण्डोम क्या होता है, इसे बताने में भी हिचकिचाते थे. :)

      आप की बात बिल्कुल सही है कि मानसिक रोग या यूरोलोजी या गायनोकोलोजी या एन्ड्रोलोजी आदि के विषेश कोर्स करें तो इन बातों की पढ़ायी होती है लेकिन स्नातक स्तर पर मेरे मेडिकल कोलिज में इस बारे में कुछ नहीं पढ़ाया जाता था.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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