शुक्रवार, जुलाई 01, 2005

ब्लौग शिष्टाचार नियम

जैसे ईमेल के शिष्टाचार नियम हैं, वैसे ही चिट्ठे के भी शिष्टाचार नियम होंगे ? जब कोई आप के एक चिटठे पर कोई टिप्पड़ीं लिखे तो क्या करना चाहिये ? क्या सभी टिप्पड़ीं लिखने वालों को अलग अलग उत्तर देना चाहिये ? और अगर ऐसा न किया जाये तो क्या इसका अर्थ है कि आप में शिष्टा की कमी है ?

और कैसी बातें लिख सकते हैं चिट्ठे में ? क्या उसके भी शिष्टाचार नियम हो सकते हैं ? और अगर आप किसी के बारे में ऊल जलूल कुछ भी लिख दें, तो क्या वह व्यक्ति आप पर मान हानि का दावा कर सकता है ? और अगर ऐसे नियम हैं भी तो किसने बनाये हैं ?

कौन पढता है चिट्ठों को और क्यों ? समय गुज़राने के लिये यूँ ही ? कितने सारे सवाल. पर वह सवाल जिसका उत्तर जानने के मुझे शायद सबसे अधिक इच्छा है, क्यों लिखते हैं हम ये चिट्ठे ?

इस अंतिम सवाल के बारे में सोचता हूँ कि शायद हर किसी के मन में आत्म अभिव्यक्ति की इच्छा होती है, पर यह डर भी होता है कि जो हम कहना चाहते हैं, वह किसी को अच्छा लगे या न लगे, और अगर हम उसे किसी पत्रिका या अखबार में भेजने का साहस कर भी लें तो कोई उसे छापेगा नहीं और इससे हमारे आत्म सम्मान को ठेस लगेगी. इंटरनेट तथा चिट्ठे के बहाने यह भय दूर हो जाता है और प्रजातांत्रिक तरीके से हम सब को अपनी अभिव्यक्ति का अवसर मिल जाता है. तो क्या इसका अर्थ है कि धीरे धीरे, आत्मविश्वास बढने के साथ हममे से कुछ लोगों की रचनात्मक शक्ति बढेगी और नये लेखक सामने आयेंगे ?

और कुछ भी हो, एक बात तो है कि पहले जो बै सर पैर की बातें आप अपनी पत्नी या एक दो मित्रों के साथ करते थे, अब चिटठों के माध्यम से सारे विश्व से कर सकते हैं. कोई सुने या न सुने, वह अन्य बात है.

आज एक कविता रायपुर के संजय शाम की, दिसंबर २००३ के हँस से, समाचार बच्चा और झूठ

पापा आँटी क्यों रो रही है
पापा, बच्चे सड़क पर क्यों सो रहे हैं
क्यों ढक रहे हैं उन्हें एक सफ़ेद चादर से
पापा वो भैया जो चाय की केतली पकड़े है
स्कूल नहीं जाता क्या ?
पापा साधु बाबा को पुलीस क्यों पकड़ कर ले जा रही है?

उसने सौ सवाल पूछे
हमने सौ झूठ बोए
उसने छुपायी एक बात
हम भयभीत हुए
और विंतित भी
अभी से झूठ
ईश्वर जाने
इस बच्चे का
भविष्य क्या होगा

यह तस्वीर है लंदन में सोहो में चाईना टाऊन की



लंदन के रिक्शे और उन्हें चलाने वाले श्वेत युवकों को देख कर बड़ा अज़ीब सा लगता है. मन में एक छवि सी है, दो बीघा ज़मीन में रिक्शा खींचने वाले बलराज सहानी जैसी कि रिक्शा खींचने वाले, गरीब, शोषित लोग हैं. उस छवि का लंदन के इन रिक्शे वालों से कुछ दूर का भी नाता नहीं है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. टिप्पणी वगैरह के नियम तो मेरे ख्याल में टिप्पणी करने वाले तथा ब्लागर के संबंध कैसे हैं यह बात निर्धारित करती है। जवाब आप तौर पर वहीं देते हैं लोग। यह भी खुद पर निर्भर है। आपकी पोस्ट सुरुचिपूर्ण तथा सुंदर फोटो से युक्त होती है। मजा आ जाता है पढ़कर।

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  2. अनूप जी, प्रशंसा और प्रोत्साहना के लिये धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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