शुक्रवार, अगस्त 12, 2005

तुम मुझे खून दो...

कल रात को श्याम बेनेगल के नयी फिल्म जो उन्होंने सुभाष चंद्र बोस पर बनायी है, देखी. श्याम बेनेगल का मैं अंकुर, जुनून के दिनों से प्रशंसक रहा हूँ हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में उनकी बनायी कोई फिल्म नहीं देखी सिवाय जुबैदा के. नेता जी पर बनी यह फिल्म बहुत दिलचस्प लगी और यह भी लगा कि शायद भारत ने सुभाष बाबू के अनौखे व्यक्तित्व पर ठीक से विचरण नहीं किया और न ही उसे समाजशास्त्रियों और राजनीतिकशास्त्रों से भारत के इतिहास में सही स्थान मिला.

एक व्यक्ति का राजनितिक नेता से लड़ाई का जनरल बन जाना आम बात नहीं है. लड़ाई के समय में नेताओं को अपना मानसिक संतुलन बनाये रखना होता है, पर बिना जनरलों और कर्नलों के नेता यह लड़ाई अपने आप नहीं संचालित कर सकते. चर्चिल, हिटलर इत्यादि रणनीति जानने वाले जनरलों के सहारे से लड़ाईयां लड़ते थे, स्वयं रणनीति नहीं बनाते थे, पर सुभाष बाबू राजनीति के साथ साथ खुद ही रणक्षेत्र में रणनीति भी बना रहे थे. फिर भी उनके सिपाही साथी फिल्म में उन्हें कमांडर साहब या जनरल नहीं बुलाते, नेता जी ही बुलाते हैं, क्यों ? क्योंकि शायद वे उन्हें लड़ाई का कमाडंर नहीं राजनीतिज्ञ रुप में ही देखते थे ?

फिल्म में उनका काबुल निवास और बरलिन निवास लम्बे तौर से दिखाया गया है. और बरलिन में उनका एमिली शैंकर से सम्बंध और बच्चे (अनीता बोस) का होना भी लम्बे तौर से दिखाया गया है जो मुझे अच्छा लगा क्योंकि इससे उनकी साधारण मानवता स्पष्ट होती है, कि उनमें मन में देश प्रेम के साथ साथ सामान्य मानव भावनांए भी थीं.

जब आज़ाद हिंद फौज द्वारा भारत के उत्तरी भाग से आक्रमण होने की तैयारी हो रही होती है तो वह कहते हैं कि उन्हें ७०,००० सिपाहियों की फौज चाहिये और उनका विचार था कि जब उनके सैनिक भारत में घुसेंगे तो अंग्रेज सैना के भारतीय सिपाही बगावत कर के उनके साथ हो जायेंगे. पर जब उनकी सैना ने आक्रमण प्राम्भ किया तो वे केवल ८,००० ही थे पर भारतीय सिपाहियों ने बगावत नहीं की और न ही अंग्रेजी फौज छोड़ कर वे आजाद हिंद फौज के साथी बने. आदेश मानने वाले अंग्रेजों के वफादार भारतीय सिपाही अपने देश की आजादी चाहने वाले अपने भाईयों से कैसे लड़ते रहे, इस बारे में मेरे मन में बहुत से प्रश्न हैं जिनका कोई उत्तर नहीं मिला.

जापान पर एटम बम्ब गिरने के साथ ही नेता जी का भारत को लड़ाई से स्वतंत्र कराने का सपना अधूरा ही रह गया इसलिए भी क्योंकि उन्होंने इस लड़ाई में अपने साथी देश वो चुने थे (इटली, जरमनी और जापान) जिन्हें द्वितीय महायुद्ध में हार मिली थी. लेकिन उनका सपना इसलिए भी अधूरा रह गया क्योंकि भारतीय सिपाहियों ने स्वतंत्रा से पहले अपनी रोजीरोटी का सोचा था. क्या कारण थे इसके ? भारत की स्वतंत्रा के बाद, जहाँ तक मुझे मालूम है वही अंग्रेजों के साथ काम करने वाली सैना, स्वतंत्र भारत की सैना बन गयी. कितने कैपटेन, सारजैंट होंगे जिन्होंने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों पर गोली चलायी होगी, जिन्हें आजादी के बाद अपने आचरण पर कोई उत्तर नहीं देना पड़ा और शायद जिन्होंने स्वतंत्र भारत में तरक्की पायी.

बात केवल आजाद हिंद फौज की नहीं. क्या भारतीय सेना ने कभी उन सिपाहियों की जांच की जिन्होंने जलियावाला बाग में डायर के आदेश को मान कर अपने देश की औरतों, बच्चों पर गोली चलायी थी ? शायद हम लोग बहुत प्रक्टिकल हैं, सोचते हें जिस बात से कोई फायदा नहीं होना हो उसके बारे में क्या सोंचे, जो होना था तो वो तो हो ही गया है, चलो अब आगे की सोचें ? या फिर गलती सिर्फ गलत आदेश देने वाले अंग्रेजों की थी, गलत आदेश मानने वालों की नहीं ? क्या कहते हैं आप ?


फिल्म से यह भी पता चला कि काबुल से जरमनी जाने के लिए जब कोई रास्ता नहीं बन रहा था और नेताजी करीब एक साल तक वहां कोई रास्ता ढ़ूंढ़ रहे थे, तब इटली ने उन्हें एक झूठा इतालवी पासपोर्ट दिया था, काऊंट ओरलांदो मात्जेता के नाम से. जरमनी में भी, नेता जी इसी नाम से इतालवी नागरिक बन कर रहते थे. चाहे यह मुसोलीनी की फासिस्ट सरकार ने अपने ही फायदे के लिए किया हो पर यह जान कर मुझे प्रसन्नता हुई कि जिस देश में रह रहा हूँ उसने कभी नेता जी की सहायता की थी.

आज की तस्वीरें फिर से पिछले जून में हुए बोलोनिया के "पेर तोत" जलूस से हैं.

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