शनिवार, अगस्त 13, 2005

कोई वहाँ है, ऊपर

कल दोपहर को काम से छुट्टी ले कर जल्दी घर आ गया, क्योंकि अपने डेंटिस्ट से बात करना चाहता था. उसके क्लीनिक कई जगह हैं, जिनमें से एक घर के पास ही है, पर मुझे कभी याद नहीं रहता कि किस दिन कितने बजे हमारे घर के पास वाले क्लीनिक में रहता है. उसके कार्ड पर देखा, "शुक्रवार को शाम को ५ से ७ बजे", तो पौंने पाँच बजे घर से निकला. क्लीनिक पहुँचा तो मालूम चला कि मैंने कार्ड देखने में गलती कर थी, शुक्रवार को हमारे वाले क्लीनिक में वह शाम को साढ़े चार बजे तक ही रहता है. अब तीन दिन की छुट्टी है (१५ अगस्त इटली में राष्ट्रीय छुट्टी होती है), तो मंगलवार तक उससे मिलने के लिए इंतजार करना पड़ेगा. खुद को कोसा, की कार्ड को ठीक से क्यों नहीं देखा और मायूस हो कर घर लौटा.

सोचा अब घर जल्दी आ ही गया हूँ तो पुस्ताकालय की किताबें ही लौटा आँऊ. किताबें उठायीं और बस स्टाप पर आ खड़ा हुआ. जहाँ पुस्तकालय है वह जगह सिर्फ पैदल चलने वालों के लिए है और वहाँ कार से जाना संभव नहीं है. जाने क्या सोच रहा था, गलत बस में चढ़ गया जो बहुत लम्बा चक्कर लगाती है. खुद को और कोसा, और करता भी क्या. इन गरमियों की छुट्टियों की वजह से बसें भी कम ही हैं, और उस बस से उतर कर वापस बस स्टाप पर आने की कोशिश करता तो और भी समय बरबाद होता.

एक घंटा बस में बिता कर पुस्तकालय पहुँचा तो पाया कि पुस्तकालय बंद है और २५ अगस्त को खुलेगा. समझ में आ गया कि आज मेरा दिन नहीं है, वापस घर ही जाना चाहिये! और बस स्टाप पर इंतजार कर के आखिरकार बस आयी. घर के पास ही थे, जब बारिश शुरु हो गयी. जब घर से चला था, सूरज चमक रहा था, इसलिए छतरी साथ लेने का विचार ही नहीं आया था. घर का बस स्टाप आया तो लगा बारिश और भी तेज हो गयी है. बस स्टाप से घर तक के पाँच मिनट के रास्ते में पूरी तरह से भीग गया. सिर उठा कर ऊपर आसमान की ओर देखा. आसमान में, दायें और बायें तरफ साफ नीला आसमान था सिर्फ बीच में थे कुछ काले बादल, वही बरस रहे थे.

घर में कपड़े बदल रहा था तो धूप फिर से निकल आयी थी. सोचा कि लोग कैसे कहते हैं कि भगवान नहीं है. मुझे तो लगा कि है, वहाँ ऊपर कहीं कोई है जो मेरा उल्लु बना कर जोर जोर से हँस रहा था.

आज की तस्वीरे मैसूर के पास के शहर मँडया से हैं.

1 टिप्पणी:

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