रविवार, मई 28, 2006

फुरसत के दिन

पिछले साल की कुछ छुट्टियाँ बचीं हुई थीं, उन्हें जून के अंत से पहले खत्म करना होता है वरना वह बेकार हो जाती हैं. इसलिए यह सप्ताह छुट्टी का है. कितने महीने हो गये, यहाँ से आओ, वहाँ जाओ, करते करते. इन फुरसत के दिनों का बेचैनी से इंतज़ार हो रहा था, और कल इस फुरसत का पहला दिन था. सुबह कुछ काम था और दोपहर को कुछ भारतीय मित्रों के साथ पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम.

बोलोनिया से कुछ दूर, इदिचे नदी के पास, दो छोटी सी झीलों के किनारे एक बाग है वहाँ पिकनिक का विचार था. उस जगह पर किसी समय बालू खोदने की खानें होतीं थीं, वही खुदे हुए खड्डे ही पानी से भर कर झीलें बन गये हैं जहाँ मछलियाँ पाली जाती हैं और मछलियाँ पकड़ने के शौकीन सारा दिन झील के किनारे बैठे रहते हैं. उनका नियम है कि आप कोई भी मछली पकड़िये उसे वापस पानी में छोड़ना होगा, मार नहीं सकते, यानि खेल केवल पकड़ने का है, मछली खाने का नहीं.

पिकनिक में आग पर बारबेक्यू बनाने का विचार किया था साथियों ने पर उसमें कितना समय लगता है यह नहीं सोचा था किसी ने. खाना पकते पकते शाम के चार बज गये और भूख से सब बेहाल हो रहे थे. खैर दिन अच्छा बीता.









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शाम को घर आ कर सोचा "मैंने गाँधी को नहीं मारा" देखी जाये. फिल्म कहानी है हिंदी के रिटायर्ड प्रोफेसर उत्तम चौधरी की, जिनकी यादाश्त कम हो रही है और उनकी बेटी और बेटे की. प्रोफेसर साहब की मानसिक हालत अचानक बिगड़ने लगती है जब वह कहने लगते हैं कि उन्होने गाँधी को जानबूझ कर नहीं मारा, गलती से हो गया क्योंकि किसी ने उनके अनजाने, उनकी खेल की पिस्तौल में असली गोली भर दी थी. एक तरफ कहानी जहाँ मानसिक रोगी के परिवार पर पड़ने वाले तनाव और कठिनाईयों की बात करती है, वहाँ दूसरी और कहानी है बचपन के एक घाव की, जिसमें बच्चे के खेल को आदर्शवादी पिता से इतनी कड़ी सजा मिलती है कि वह घाव कभी भर नहीं पाता.



फिल्म सुंदर है और सोचने पर मजबूर करती है. प्रोफेसर के रुप में अनुपम खेर का अभिनय बहुत बढ़िया है. बाकी अभिनेता भी, विषेशकर पुत्री के रुप में उर्मिला मातोंडकर, भी अच्छे हैं. बस फिल्म के अंत में प्रोफेसर द्वारा दिया गया भाषण कि गाँधी जी को सिक्कों और नोटों में कैद कर उन्हें भुला दिया गया है, देखने में अच्छा दृष्य है और साथ ही थोड़ा अविश्वासनीय भी. प्रोफेसर जो एक क्षण पहले तक सत्य और कल्पना के बीच खो गये थे, अचानक तर्कयुक्त भाषण देने लगे फिल्मों में ही हो सकता है.
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आज इटली के हिंदी चिट्ठाकारों की सभा है यानि कि आर.सी मिश्र बोलोनिया आ रहे हैं. इस सभा के पूरे समाचार के लिए कल तक इंतज़ार कीजिये.

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुनील जी,
    एक बात बताईये, इस बात से क्या फ़र्क पड़ता है कि मछलियों को खाने के लिये ना सही सिर्फ़ खेलने के लिये पकड़ा.
    मछली पकड़ने का काँटा जो होता है, जिसमें चारा लगा कर पानी में डाला जाता है, वो तो कोई रियायत नहीं करेगा कि भई मछली को सिर्फ़ खेलने के लिये पकडा जा रहा है..वह तो उसी शिद्दत से मछली के तालू में घुसेगा और मछली को घायल करेगा.

    अब एक घायल मछली को वापस पानी में डाल देना कुछ समझ नही आता...वो तो शायद वैसे ही थोडे समय बाद मर जायेगी..

    नहीं क्या??

    याने बकरा भी कट गया और खाने वाले को मज़ा भी नही आया.
    (वैसे मुझे तो चिकन से ज्यादा मछली ही अच्छी लगती है :) )

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  2. Ek lamha aata hai, ek lamha jaata,
    Ek yaad aati hai, ek yaad jaati.

    Waqt yeh muaah, aaraam kyun nahin karta!

    Zindagi ki is bhag daud mein fursat ke kuch kshanon pa hil liye aapne.

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  3. आपकी छुटटियाँ शेर करने के लिए शुक्रिया तस्वीरें भी खूबसूरत हैं। यहां भी अकसेर लोगों को मछलियाँ पकडने का शौक है, अब मैं भी इस शौक को पूरा करने की सूच रहा हूं।

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  4. विजय जी आप के प्रश्न का ठीक से उत्तर देने की जानकारी मुझे नहीं है. मैंने जो देखा सुना, वह लिख दिया. वहाँ देखा कि लोग बड़ी बड़ी मछलियाँ पकड़ रहे थे, पर कुछ ही देर में वे उन्हें वापस पानी में छोड़ देते थे, उस समय तो मछलियाँ बड़ी फुर्ती से वापस पानी में जाती थीं. वे घायल होती थीं या बाद में मर जाती हों, यह नहीं मालूम.
    सुनील

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  5. विवरण अच्छा है और तस्वीरें सुंदर।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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