मंगलवार, जून 20, 2006

लाल सलाम

कलकत्ता, सन १९७०. रात को टेलीफोन की घँटी बजती है. सुजाता चैटर्जी उठ कर टेलीफोन उठाती है तो कोई उससे काँतीपोखर आ कर अपने बेटे ब्रती चैट्रजी की पहचान करने के लिए कहता है. सुजाता समझ नहीं पाती कि क्यों उसके पति, उसका बड़ा बेटा, इस समाचार से चिंतित हो जाते हैं और पुलीस में जान पहचान ढूँढते हैं कि मामला दबा दिया जाये. दिव्यानाथ चैटर्जी, ब्रती के पिता काँतीपोखर अपनी कार में नहीं जाना चाहते, क्योंकि कोई उनकी कार को न पहचान ले. अंत में सुजाता ही जाती है बेटे की पहचान करने. एक कमरे में फर्श पर कपड़े से ढकी पाँच लाशे पड़ीं हैं, कोने में दो तीन लोग स्तब्ध से बैठे हैं. उनमें से एक लाश है उसके बेटे की, पाँव के अँगूठे पर लाश का नम्बर बँधा है, १०८४. पुलीस उसे लाश देने से इंकार कर देती है और सुजाता बेटे के साथ अन्य चार लाशों का दहन देखती है.

इस तरह शुरु होती है गोविंद निहलानी की फिल्म "हजार चौरासी की माँ".

कहानी है मध्यवर्गी, प्रौढ़ सुजाता चैटर्जी की. उसके अपराध बोध की कि अपने पेट के जने बेटे की चीत्कार नहीं सुन पायी, घर में साथ रहने वाले बेटे की केवल हँसी देख सकी, वह क्या कर रहा है, कहाँ जाता है, किसके साथ रहता है, क्या सोचता है, कुछ नहीं देख पायी. अपने आसपास देखती है तो पाती है कि उसके समाज में ब्रती खूँखार अपराधी की तरह देखा जाता है, जिसको जल्दी से जल्दी भूल जाना ही बेहतर है, मानो वह कभी उस घर में रहा ही नहीं. पर सुजाता स्वयं को रोक नहीं पाती, एक एक करके वह ब्रती के साथियों को खोजती है, उनके परिवारों से मिलती है, यह जाने की कोशिश करती है कि क्यों उसका बेटा नक्सलबाड़ी के आंदोलन का सपना देखता था. इस खोज में वह समाज में व्याप्त सामाजिक विषमताओं को भी समझती है और स्वयं अपने मध्यमवर्गीय जीवन के अंतरनिहित झूठ को जो बाह्य समाज के सामने ढकोसला है, जिसमें वह केवल अपने पति की पायदान है, उसका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं है.

महाश्वेता देवी द्वारा लिखित इसी नाम के उपन्यास पर लिखी फिल्म का कथानक राजनीतिक है, सुजाता की कहानी के द्वारा लेखिका ने नक्सलबाड़ी और नक्सल आंदोलन की जड़ों के कारणों का विवेचन किया है. फिल्म के निर्माता, निर्देशक और फोटोग्राफर हें गोविंद निहलानी.



फिल्म में जया भादुड़ी, सीमा विश्वास, नंदिता दास जैसी जानी मानी अभिनेत्रियाँ हैं. ब्रती का भाग निभाया है नये अभिनेता जोय सेनगुप्ता ने और नंदिता दास बनी हैं बर्ती की सखी और आंदोलन में सहयोगी, नंदनी मित्रा. सीमा विश्वास हैं ब्रटी के साथ मरने वाले बिहारी सोमू की माँ. मिलिंद गुणाजी हें पुलीस अफसर.

फिल्म का वह हिस्सा जिसमें सीमा विश्वास मरने वाले पाँचों युवकों की कहानी सुनाती हैं और उनकी आखिरी रात के बारे में बताती हैं, बहुत सशक्त है और इस भाग में सीमा विश्वास से दृष्टि हटाना कठिन है. निश्चय ही वह भारत की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रियों में से हैं.

नंदिता दास वाला हिस्सा मुझे कुछ कमज़ोर लगा. नक्सलवाद के कारण बताना और आंदोलन करने वालों का माओ, मार्क्स आदि से प्रेरणा पाना, पार्टी का संचलन, आदि समझाना, कुछ किताबी सा लगता है, शब्दों पर निर्भर और फिल्मी माध्यम की असली नींव, चित्रों की दृष्टि से कमज़ोर. नंदिता का अभिनय ठीक है और उनके व्यक्तित्व में वह लौह तत्व जो आंदोलन करने वाली लड़की में होना चाहिये, कुछ बनावटी सा लगा.



ब्रती के पिता के रुप में अनुपम खेर शुरु के हिस्सों मे तो ठीक लगे पर आखिरी हिस्से में जब उनका हृदयपरिवर्तन दिखाया गया है, कुछ कमजोर लगे.

पर यह फिल्म तो जया भादुड़ी की है. ब्रती की माँ के रुप में उनका अभिनय शायद इतना प्रभावशाली किसी फिल्म में नहीं रहा. मध्यमवर्गी प्रौढ़ा, जिसे कुछ समझ नहीं आ रहा, जिसकी आँखों में पीड़ा के साथ धीरे धीरे बेटे की समझ चमकती है, जिसमें आत्मसम्मान से जन्में विद्रोह का दीप जलता है, उनके अभिनय से जीवित हो जाती है.

5 टिप्‍पणियां:

  1. I guess you inspired me to watch the movie. I recently watched "Hazaaron Khwahishein Aisi", and it is also a pretty good representation of India during late sixties and early senties. It is really imperative for us to understand the mechanics behind these regional movements to actually bring all of India into mainstream rather than proposing reservations and lip service to the cause of underprivileged.

    Good Job.

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  2. Mahashweta Devi jameen se judin ek aisi sahityakaar hain jinhone bengal ke naksali aandolan ko kaphi kareeb se samjha hai.Ye chalchitra to abhi tak dekh nahin paya hoon par aapke is review ka baad ise dekhne ki iksha jaagi hai.

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  3. आपकी इस समीक्षा ने मुझे इस फ़िल्म को देखने का उत्सुक बना दिया. सुनील जी आप गोविंद निहलानी की द्रोहकाल भी ज़रूर देखिएगा.

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  4. अब तो यह फिल्म देखनी ही पडेगी।

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  5. इस फिल्म के बारे मे सुना था. देखी नही थी. अब इच्छा है

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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