मंगलवार, फ़रवरी 06, 2007

मानव का सफ़र

करीब दो वर्ष पहले इंडोनेसिया के फ्लोरेस द्वीप पर एक प्राचीन मानव शरीर मिला था. 12,000 साल पुराना यह शरीर अब तक मिले सभी आदि मानव शरीरों से भिन्न था. कद में करीब एक मीटर और छोटे से खरबूजे के बराबर सिर वाले इस स्त्री शरीर के बारे में कहा गया था कि वह अभी तक अनजाने, एक नये आदिम मानव गुट की थी जिसे होमो फ्लोरेसियंसिस (Homo floresiensis) का नाम दिया गया था. इस आदि मानव गुट के सभी सदस्य छोटे कद के छोटे दिमाग वाले थे.

चूँकि 12,000 साल पहले, आधुनिक मानव गुट, होमो सेपियंस (Homo sapiens), भी धरती पर रह रहा था, इसका अर्थ हुआ कि कुछ समय तक होमो सेपियंस तथा होमो फ्लोरेसियंसिस के मानव दल समाज साथ साथ रहे.

पर कुछ वैज्ञानिकों ने संदेह किया है कि होमो फ्लोरेसियंसिस का कोई अलग मानव गुट था. उनका विचार है कि जो शरीर फ्लोरेस में पाया गया वह एक बीमार आधुनिक मानव होमो सेपियंस स्त्री का है जिसे माईक्रोसिफेलिया यानि छोटे दिमाग की बीमारी थी.

इस तरह की बहसें वैज्ञानिकों में आम हैं क्योंकि प्राचीन आदि मानवों के शरीर बहुत थोड़े से मिले हैं और उनके आधार पर सारी बातें जानना और समझना कठिन है. कुछ माह पहले अँग्रेजी विज्ञान पत्रिका वेलकम साईंस में इस विषय पर एक लेख निकला था जिसमें मानव शरीर के सूक्षम कोषों (cells) के अंदर छुपे डीएनए (DNA) तथा जेनोम (genome) के अध्ययन से आदि मानव के विकास को बेहतर समझने के बारे में बताया गया था.

जेनोम शोध से यह पता चलता है कि आज से 70 लाख साल पहले अफ्रीका में मानव तथा चिमपैंज़ी के गुट एक दूसरे से अलग हो कर विकसित होने लगे. आज तक का पाया हुआ सबसे प्राचीन मानव शरीर अफ्रीका में चाद (Tchad) देश में सन २००२ में पाया गया था, करीब 65 लाख पुराने इस शरीर को साहेलआथ्रोपस चादेंसिस का नाम दिया गया और यह मानव जाति के विकास का प्रथम पग था, जो सीधा खड़ा हो कर भी चल सकता था और गोरिल्ला जैसा था. फ़िर कारीब 44 से ले कर 17 लाख साल पहले, सारे अफ्रीका में एक नयी मानव जाति फैली, दुबले पतले छोटे मानवों की जिन्हें आउस्ट्रालोपिथेसीन (Australopithecines) के नाम से जाना जाता है. 1974 में ईथिओपिया में पाये गये एक आदिम मानव शरीर जिसे लूसी के नाम से पुकारा गया था, इसी समय का प्रतीक था और बाद में इसी मानव जाति के पैरों के निशान भी मिले थे.

पहला आधुनिक मानव जिसे होमो नाम दिया गया, करीब 24 लाख साल पहले विकसित हुआ और वैज्ञानिक उसे होमो एबिलिस का नाम देते हैं जो कि हाथ का उपयोग करने लगा था. फ़िर 19 लाख पहले आया होमो इरेक्टस, जो केवल सीधा दो पैरों पर ही चलता था. इसी मानव विकास यात्रा में करीब 6 लाख से 2 लाख साल पहले यूरोप में निअंडरथाल मानव आया और फ़िर अफ्रीका में होमो सेपियंस जो दोनो बहुत लम्बे अर्से तक अर्से तक साथ साथ रहे. करीब 80 से 50 हज़ार साल पहले होमो सेपियंस अफ्रीका से बाहर निकला और यह सोचा जाता है कि अंत में आधुनिक मानव से हार कर निअंडरथाल मानव जाति करीब 30 हजार वर्ष पहले समाप्त हो गयी. यही वह समय है जब आधुनिक मानव में वाणी का विकास हुआ.

जिस विकास और परिवर्तन में लाखों साल लग जाते थे, वह आधुनिक मानव के आने के बाद तीव्र होने लगा और अब तो और भी तीव्र हो रहा है. 30 हजार साल पहले मानव को शब्द मिले, 4 हज़ार साल पहले मिस्र में पिरामिड बनने लगे और आज से करीब ढाई हजार साल पहले वेद लिखे गये. आज तो परिवर्तन को दशकों में गिना जाता है, कल सालों में फ़िर महीनो में गिना जायेगा. पर इस तीव्र परिवर्तन का यह अर्थ नहीं कि प्रकृति के विकास के नियम बदल गये हैं. वैज्ञनिकों के अनुसार आज से 70,000 हजार वर्ष पहले जब सुमात्रा द्वीप में माऊँट टोबा नाम के ज्वालामुखी का विस्फोट हुआ था तो एक हज़ार सालों तक पृथ्वी के आसपास धूल छाई रही थी और पृथ्वी बर्फ से ढक गयी थी, जिसमें अधिकतर मनाव और पशु मर गये थे. आज जब मानव के पर्यावरण पर पड़ते असर का सुनता हूँ कि सागरों के स्तर बढ़ रहे हें, प्रदूषण बढ़ रहा है, ऊँचे पर्वतों पर बर्फ पिघल रही है, तो यह सोचता हूँ कि जब प्रकृति करवट लेगी तो कौन बचेगा और कब तक!

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एनडीटीवी पर इस चिट्ठे की बात होने की बधाई के लिए आप सबको धन्यवाद. इतना प्रतिष्ठित चैनल हिंदी चिट्ठों की बात करे, यह तो अच्छा है, शायद चिट्ठा लिखने वालों की संख्या बढ़े.

4 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बेंगाणी6 फ़रवरी 2007 को 12:46 pm

    मुझे भी लगता है की मानव अपनी भूल सुधार सके उससे काफी आगे निकल चुका है.
    जल्दी ही पृथ्वी पर प्रकृति तो रहेगी, मगर प्रकृति के नियमो का अतिक्रमण करने की क्षमता वाला एक मात्र प्राणी 'मानव' नहीं.

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  2. इस धरती पर जीवन के साथ-साथ विनाश भी निश्चित है चाहे वह मानव का हो या सभ्यता के विकास का…यह भी एक नियम के अनुसार ही है…कि विनास का मार्ग हम स्वयं प्रशस्थ करेगें इसे कोई भी रोक नहीं सकता…प्रकृति व धरती का विनाश तो होना ही है…
    अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई धन्यवाद!

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  3. नृतत्वशास्त्र और जीनोम-शास्त्र पर हिन्दी में लिखने के लिए आभार।कल ही सच्चिदाजी को हिन्दी चिट्ठाजगत के बारे में लिखा था।उनकी भी रुचि का विषय है ।

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  4. सुनील जी ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये धन्यवाद।
    Cell के लिये 'कोशिका' शब्द प्रचलन मे है।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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