मंगलवार, फ़रवरी 20, 2007

भारत में बनी दवाईयाँ

पिछले दशक में भारत में केंद्रित कई दवा बनाने वालों ने विश्व में सस्ती और अच्छी दवाएँ बनाने के लिए ख्याति पाई है. आज भारत की यह क्षमता खतरे में है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय दवा बनाने वाली कम्पनी नोवार्टिस (Novartis) ने भारत सरकार पर दावा किया है.

एडस की दवाएँ जो पहले केवल पश्चिमी देशों की दवा कम्पनियाँ बनाती थीं, उनके एक साल के इलाज की कीमत 20,000 डालर तक पड़ती थी, भारतीय सिपला जैसी कम्पनियों ने पर इन्हीं दवाओं को 2,000 डालर तक की कीमत में दिया. कुछ वर्ष पहले, जब दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने पश्चिमी देशों के बजाय जब भारत से बनी इन सस्ती दवाओं को खरीदना चाहा तो 39 बड़ी दवा कम्पनियों ने मिल कर दक्षिण अफ्रीका की सरकार पर दावा कर दिया. इस पर सारी दुनिया में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाओं ने जनचेतना अभियान प्रारम्भ किया और दुनिया के विभिन्न देशों से लाखों लोगों ने इस अपील पर अपने दस्तखत किये. अपनी जनछवि को बिगड़ता देख कर घबरा कर अंतर्राष्ट्रीय दवा कम्पनियों ने दक्षिण अफ्रीका सरकार पर किया दावा वापस ले लिया.

इस तरह की सस्ती दवा बना पाने के लिए भारत के बुद्धिजन्य सम्पति अधिकारों (intellectual property rights) से सम्बंधित कानूनो ने बहुत अहम भाग निभाया था. यह कानून दवा बनाने के तरीको को सम्पति अधिकार (patents) देते थे जिसका अर्थ था कि वही पदार्थ अगर कोई किसी नये तरीके से बनाये तो उस पर यह अधिकार लागू नहीं होगा. इसका यह फायदा था कि कहीं पर कोई भी नयी दवा निकले, हमारे दवा बनाने वाले उसे बनाने के लिए नये और सस्ते तरीके खोज सकते थे. इस कानून का फायदा उठा कर भारतीय दवा बनाने वालों ने बहुत सी जान रक्षक दवाओं के नये और सस्ते संस्करण बनये और उन्हें कम कीमत पर बाज़ार में बेचा.

इन कानूनों से अंतर्राष्ट्रीय दवा बनाने वाली कम्पनियाँ बहुत परेशान थीं क्योंकि इससे उनके लाभ में कमी आती थी और उन्होंने भी भारत सरकार पर जोर डाला कि भारत विश्व व्यापार संस्थान (World Trade Organisation, WTO) का हिस्सा बन जाये और अंतर्राष्ट्रीय बुद्धिजन्य सम्पत्ति अधिकारों के कानूनों को मानने को बाध्य हो. सन 2005 में भारत डब्ल्यूटीओ का सदस्य बन गया.

पर जब भारत की सरकार ने WTO के हिसाब से अपने कानून बदला तो इस नये कानून के हिसाब से कोई पदार्थ बनाने के तरीका वाले कोपीराईट के साथ साथ पदार्थ पर भी कोपीराईट हो गया है ताकि कोपीराईट की अविधि तक कोई उस पदार्थ को किसी भी तरीके से न बना सके. अब भारतीय दवा बनाने वाले नयी दवाओं को बनाने के नये और सस्ते तरीके नहीं खोज सकते जब तक उस दवा की कोपीराइट अविधि न समाप्त हो जाये.

पर भारत सरकार इस नये कानून में अपनी दवा बनाने वाली कम्पनियों के पक्ष में कुछ कानून भी रखे हैं जैसे कि उसने यह कानून भी रखा कि कापीराईट करने के लिए बिल्कुल नया आविष्कार होना चाहिये. बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय कम्पनिया अपनी दवाओं का कापीराईट बनावाती हैं पर कापीराईट की अविधि समाप्त होने से पहले उसी दवा में थोड़ा सा फेरबदल करके उसका नया कापीराईट बनवा लेती हैं (evergreeing of patents) ताकि वह दवा और बीस सालों तक केवल उनकी सम्पत्ति रहे. भारतीय कानून इसकी रोकथाम करने में सहायता देता है.

पिछले वर्ष स्विटज़रलैंड की नोवार्टिस कम्पनी ने कैसर के इलाज में प्रयोग की जाने वाली दवा ग्लीवेक (Glivec) के फारमूले में कुछ बदलाव करके उसके नये कोपीराईट के लिए अर्जी दी, जो भारत सरकार ने यह कह कर नामंजूर करदी कि यह नया आविष्कार नहीं बल्कि पुराने फारमूले में थोड़ी सी बदली करके किया गया है. इसी पर नोवार्टिस ने़ भारत सरकार पर दावा कर दिया है कि भारत का यह कानून डब्ल्यूटीओ के नियमों के विरुद्ध है और इस कानून को रद्द कर दिया जाना चाहिये.

अगर नोवार्टिस यह मुकदमा जीत जायेगा तो भारत सरकार का यह कानून कि केवल बिल्कुल नये आविष्कार की ही रजिस्ट्री होनी चाहिये, अपने आप ही रद्द हो जायेगा और भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय दवा बनाने वाली कम्पनियों की बहुत सी पुरानी दवाओं के पेटेंट को मानना पड़ेगा. इससे कम कीमत पर भारतीय दवा बनाने वालों को रोक लग जायेगी जिसका असर केवल भारत पर ही नहीं, बहुत से देशों में रहने वाले गरीबों पर पड़ेगा.

भारत सरकार ने इस बात की जाँच के लिए अपनी एक अंदरूनी कमेटी बिठायी थी जिसके अध्यक्ष थे श्री मशालकर. गत दिसम्बर में मशालकर कमेटी ने नोवर्टिस की माँग को जायज बताया है और इस कानून को बदलने की सलाह दी है.

अंतर्राष्ट्रीय गैरसरकारी संस्थाओं तथा स्वास्थ्य क्षेत्र के बुद्धिजीवियों ने तुरंत श्री मशालकर कमेटी के निर्णय की आलोचना की. उन्होने बताया कि मशालकर कमेटी ने इंग्लैंड की एक कम्पनी की एक रिपोर्ट को ले कर वैसे ही नकल कर के अपनी रिपोर्ट में लिख दिया है. अँग्रेजी क्मपनी की वह रिपोर्ट अंतर्राष्ट्रीय दवा बनाने वाली कम्पनियों ने पैसा दे कर बनवायी थी. उनका आरोप है कि श्री मशालकर खुद वैसी ही कम्पनियों के सलाहकार के रुप में सारा जीवन बिता चुके हैं और उनसे इस विषय पर निक्षपक्ष राय की आशा नहीं की जा सकती.

इसी के विरुद्ध विभिन्न देशों में जनचेतना अभियान शुरु किये जा रहे हैं. लोगों से कहा जा रहा है कि नोवार्टिस पर दबाव डाला जाये कि वह यह मुकदमा वापस ले ले. अब तक करीब 3 लाख लोगों ने उस अपील पर दस्तखत किये हैं जिनमें स्विटज़रलैंड की पूर्व राष्ट्रपति श्रीमति रुथ ड्रैयफुस, नोबल पुरस्कार विजेता आर्चबिशप डेसमैंड टूटू, संयुक्त राष्ट्र संघ के अफ्रीका अधिकारी स्टीफेन लुईस जैसे लोग भी शामिल हैं. प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों के लिए उनकी जनछवि बहुत महत्वपूर्ण होती है जिसके बलबूते पर उनकी बिक्री टिकी होती है. आशा है कि अपनी जनछवि बिगड़ती देख कर नोवार्टिस यह मुकदमा वापस ले लेगी.

आप भी इस अपील पर दस्तखत कीजिये और नोवार्टिस पर दबाव डालने में सहायता कीजिये. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे कि "सीमाविहीन चिकित्सक" (Doctors without Borders) तथा "ओक्सफाम" (Oxfam) के अंतरजाल पृष्ठों पर इस अपील पर दस्तखत किये जा सकते हैं.

7 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद, बहुत ही उपयोगी जानकारी प्रदान की है। मैंने इस पर हस्ताक्षर कर दिये हैं और अपने मित्रों को भी इसका लिंक भेज दिया है।
    - आशीष

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  2. संजय बेंगाणी20 फ़रवरी 2007 को 5:01 pm

    अपील की कड़ी देने के लिए आभार.

    दवाईयों का मामला थोड़ा पेचीदा है.
    एक तरफ वर्षो का श्रम व सम्पत्ति लगा कर जो दवाई खोजी जाती है, उसे कोई मुफ्त में न उड़ा ले यह देखना है, वहीं दुसरी तरफ सस्ती व गुणवत्ता वाली दवाईयाँ सर्व-सुलभ हो यह सुनिश्चित करना है.
    दोनो बाते एकसाथ कैसे सम्भव होगी? सोचें...

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  3. मैं उनमे से हूँ जिनका उद्देश्य नयी दवायें खोजने के साथ, उनके बनाने के वैकल्पिक मार्ग पर भी शोध करना है, इसलिये मैं नोवार्टिस के इस Case का विरोध करता हूँ।

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  4. संजय जी, आपकी बात तो ठीक है परंतु जो कम्पनियां अपने श्रम का मूल्य समाज के अति या अनुचित दोहन से करना चाहें और विशेष रूप से ऐसे प्रयासों के जो जन-साधारण के लिये हितकर हैं, विरुद्ध हों तब तो इन प्रयासों का विरोध उचित है। शोधकर्त्ता कम्पनी के भी सामाजिक दायित्व है, और यह नहीं भूलना चहिये कि ऐसे मूल शोध कार्यों में भी, अन्यान्य अनेक पूर्व-संचित ज्ञान और पूर्व-शोधों का भी प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग रहा होगा। हाँ, एक सीमा तक कम्पनियों को लाभार्जन का अधिकार उचित है, अधिक नहीँ। अब क्या सीमा उचित है, यह तो कम्पनी और विधि-वेत्ता जानें।

    बौद्धिक सम्पदा अधिकार ने तो कम्पनियों को यह सुरक्षा प्रदान करी ही हुई है परंतु यहाँ तो मामला चतुरता से निरंतर लाभार्जन (evergreening of patents) का है - जब मूल पेटेंट की अवधि में समुचित लाभार्जन कर ही लिया तो पुन: समाज का दोहन क्यों?

    मैंने तो हस्ताक्षर कर दिये हैं।

    सुनील जी का धन्यवाद!

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  5. संजय बेंगाणी21 फ़रवरी 2007 को 9:58 am

    शायद मैं अपनी बात सही सही रख नहीं पाया. दवाईयाँ पाने का अधिकार मानव अधिकार के अंतर्गत लाया जाना चाहिए. हर व्यक्ति को ईलाज सुलभ होना चाहिए. यह मेरा निजी मत है.

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  6. भाई दीपक जी!
    आर०ए० माशेलकर जिनका आपने जिक्र किया वे हाल तक हमारे यानी सीएसआईआर के महानिदेशक और देश के विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव थे और केन्द्र सरकार के प्रिय वैज्ञानिकों में गिने जाते थे . उनकी इस रिपोर्ट के बारे में पढ कर अवाक रह गया .

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  7. प्रियंकर जी, मेरे आलेख में श्री मशालकर के बारे में लिखा गया भाग १२ फरवरी के टाईमस् आफ इंडिया (Times of India) अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ पर छपे एक लेख पर आधारित है जिसके लेखक हैं छन पार्क (Chan Park)और अचल प्रभाला (Achel Prabhala).

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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