गुरुवार, जुलाई 19, 2007

रँग दे, मोहे रँग दे - स्वयं की तलाश

"आप ने तो मेरा दिल ही तोड़ दिया", वह बोली.

मैंने उससे कहा था कि उसे ठीक से जानने से पहले मुझे उससे कुछ डर सा लगता था.

उसका सिर गँजा है, केवल सिर के बीचों बीच बालों की लाल रँग की मुर्गे जैसी झालर है, कानों में, नाक में, होठों के नीचे, जीभ पर रँग बिरँगे पिन हैं, बाहों पर डिज़ाईन गुदे हैं. जब भी कोई भारतीय साँस्कृतिक कार्यक्रम हो, वह अवश्य आती है, साथ में अपना कुत्ता लिये, अपने जैसे साथियों के साथ. जहाँ वे लोग बैठते हैं, आसपास कोई नहीं बैठना चाहता, सब लोग दूसरी ओर हट जाते हैं.

उन्हें देख कर मन में ईण्लैंड और जर्मनी के गँजे सिर वाले स्किन हैडस (skin heads) की छवि बनती थी, जो अक्सर प्रवासियों पर हमले करते थे, उन्हें मार कर अपने देशों में वापस लौट जाने को कहते थे. यहाँ बोलोनिया में उन्हें पँका-आ-बेस्तिया (Punk-a-bestia) कहते हैं, यह शब्द अँग्रेजी के पँक और इतालवी का बेस्तिया यानि जानवर को मिला कर बना है.

उसे भारतीय संस्कृति से बहुत लगाव है. "देखो मेरी पीठ पर मैंने ॐ लिखवाया है", उसने मुझे दिखाया. उसे शिकायत थी कि मैं भी अन्य इतालवी लोगों की तरह उसके बाहरी रूप पर ही रुक गया था, "तुम्हारे यहाँ लोग हाथों पर, पैरों पर, मैंहदी नहीं लगाते क्या? बाहों पर नाम नहीं गुदवाते क्या? यह सब मैंने भारत में ही देखा था और वहाँ से ही मुझे यह प्रेरणा मिली है."

पँका-आ-बेस्तिया अपने आप को समाज के दायरे से बाहर कर लेते हैं, पुराने खाली घरों में या फुटपाथ पर रहते हैं, सँगीत और स्वतँत्रता से प्यार करते हैं, समाज का कोई नियम नहीं मानते.उनके लिए जीवन का ध्येय पैसा कमाना, विवाह करना, घर बसाना आदि नहीं, बल्कि वह करना है जिसको करने को उनका दिल चाहे.

बोडी आर्ट यानि शरीर कला में मानव शरीर ही कलाकार का चित्रपट बन जाता है. शरीर को गुदवाना या शरीर को बोडी आर्ट (body art) के रँगों से सजाना तरीके हैं ध्यान खींचने का, यह दर्शाने का कि हम सबसे भिन्न हैं. इनकी प्रेरणा शायद इन्हें भारत से मिलती हो पर भारत में यह हमारे जीवन के, सँस्कृति के हिस्से हैं, विभिन्नता का माध्यम नहीं.

सब लोग केवल समाज के नियम तोड़ने के लिए ही अजीब गरीब भेस बनाते हों, ऐसा नहीं. आजकल मीडिया और संचार की दुनिया है, आप जितना अजीबोगरीब होंगे, उतना ही लोग आप की तस्वीर खींचेगे, छापेंगे या टीवी पर दिखायेगें. जैसे अमरीकी बास्किटबाल लीग एनबीसी के खिलाड़ी डेनिस रोडमैन जिनके रँग बिरँगे सिर की वजह से उनके लिए टीवी और पत्रिकाओं में जगह की कमी नहीं रहती, चाहे वे जैसा भी खैंले!

इन्हीं विचारों से जुड़ी कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं जिनमें दायरों से बाहर निकल कर अपने स्वयं की तलाश का चित्रण है.



बोडी आर्ट (Body art) का एक भारतीय नमूना हुसैन की फ़िल्म मीनाक्षी से


रोडमैन का रँग बिरँगा सिर


बोलोनिया का एक पँका-आ-बेस्तिया




रँग बिरँगी बोडी आर्ट

आस्ट्रेलिया की कलाकार एम्मा हेक द्वारा भारतीय कला से प्रभावित सजाई गयी मोडल निकोल जेम्स

3 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बेंगाणी19 जुलाई 2007 को 1:32 pm

    आपने सही कहा यह सब भारत में जीवन के, सँस्कृति के हिस्से हैं, वही वहाँ विभिन्नता का माध्यम है.

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  2. ऐसा ही बाडी आर्ट पूजा भट्ट ने अपने पूरे शरीर पर करवाया था। उसकी तस्वीर जब पत्रििकायों में छपी तो काफी हंगामा हुया था। बाद में पूूजा को कहना पड़ा कि वह तो एक किस्म की ड्रेस थी। क्योकि शायद इतना खुलापन हमारी संसकृति का हिस्सा नहीं।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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