बुधवार, दिसंबर 07, 2011

छोटी सी याद

1973-74. हम लोग दिल्ली से मध्य प्रदेश में नरसिंहपुर जा रहे थे. मेरे साथ मेरी एक मौसी और नानी थे. रेलगाड़ी रात को इटारसी स्टेशन पर पहुँची थी, जहाँ हम लोगों ने कुछ घँटे बिताये थे, अगली रेलगाड़ी के आने के इन्तज़ार में.

उस रात मुझे मिली थी ज़रीना वहाब और पहली मुलाकात में ही प्यार हो गया था. ज़रीना वहाब की तस्वीरें "नयी आने वाली अभिनेत्री" के शीर्षक से फ़िल्मफेयर पत्रिका में छपी थीं और उन तस्वीरों को देख कर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी थी.

उन दिनों में मुझे ज़रीना वहाब की तस्वीरें खोजने का भूत सवार हुआ था. किसी पत्रिका में उनकी तस्वीर दिखती तो उसे खरीदने में ही जेबखर्च के सब पैसे चले जाते. तस्वीर को पत्रिका से काट कर संभाल कर रखता. उन तस्वीरों से बातें करता और सपने देखता उनसे मिलने के.

जब सुना था कि वह देवआनन्द साहब की फ़िल्म "इश्क इश्क इश्क" में आ रही हैं तो उस दिन मेडिकल कॉलिज की क्लास छोड़ कर उस फ़िल्म का पहले दिन का पहला शो देखने गया था. फ़िल्म में छोटा सा भाग था उनका लेकिन आज भी अगर उस फ़िल्म के बारे में सोचूँ, तो बस केवल उनका वही भाग याद हैं मुझे.

उनकी उस पहली फ़िल्म के बाद, बहुत समय तक उनकी कोई अन्य फ़िल्म नहीं आयी थी. फ़िर एक-दो सालों के बाद आयी थी बासू चैटर्जी की "चितचोर". जिस दिन वह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, उस दिन मेरा जन्मदिन था और अपने सब मित्रों के साथ दिल्ली के शीला सिनेमा हाल में पहले दिन का पहला शो देखने गया था.

Zarina Wahab Amol Palekar in Chitchor


फ़िर समय बीता और धीरे धीरे पर्दे पर या तस्वीरों में देखी ज़रीना वहाब का जादू अपने आप ही कम होता गया. उनकी जगह दूसरी छवियाँ बसीं मन में, दूसरे सपने आने लगे. फ़िर भी उनकी वे तस्वीरें मेरी डायरी में जाने कितने बरसों तक जमा रहीं थीं.

देवानन्द साहब की मृत्यु पर पिछले दिनों में बहुत आलेख निकले. उन्हीं में कहीं "इश्क इश्क इश्क" के बारे में पढ़ा तो अपने उस पहले नशे की यह बात याद आ गयी.

कैसा होता है मानव मन! भूली बिसरी बातें मन के कोनों में कहाँ छुपी बैठी रहती हैं और जैसे किसी ने बटन दबाया हो, तुरंत उठ कर यूँ सामने आती हैं मानो कल की ही बात हो.

इस बात के बारे में लिखते हुए पाया कि मैं गुनगुना रहा हूँ "तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले"!

***

17 टिप्‍पणियां:

  1. यह कोई बात हुई ना। जीवन में अनेक चित्र, छवियाँ आती हैं जिन्हें देखते ही सीधे दिल में उतर जाती हैं और बहुत दिनों तक बसी रहती हैं। पर वास्तव में वह सब कुछ आभासी होता है। फिर वास्तविक जीवन की छवियाँ ही प्रिय लगने लगती हैं।

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  2. बिल्कुल सही कहा आपने दिनेश जी, हालाँकि उस समय यह समझ नहीं थी :)

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  3. ज़रीना वहाब नही ख्वाब . उस ज़माने की वो क्या कहते है अंग्रेज़ी में - 'गर्ल नेक्स्ट डोर '

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  4. स्मृति की छापें उस उम्र में बड़ी गाढ़ी होती हैं।

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  5. lakin sir aapne to Dev sahab ke bahane apane nasamjhe pahalu ( maf kariyega lakin es tarah ki bhavana rakhana ek galat prachalan hai yuva logo ke liye) ko ujgar kiya...

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  6. आप सब को धन्यवाद.

    जेपी जी, चिट्ठा लिखने का मेरा केवल एक ही नियम है, जो मेरे मन में आये उसे इमानदारी से लिखूँ :)

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  7. स्मृतियों के खजाने का भी भंडार होता है मन ..... कहाँ साथ छूटता है....?

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  8. आरजू मेरी भी प्रिय फिल्म रही है.इसके गीत तो आज भी सुनता हूं.

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  9. आप सब को धन्यवाद.
    @मोनिका जी, सच है कि स्मृतियों में ही हमारा जीवन छिपा होता है!

    @नवीन जी, उन दिनों की फ़िल्मों को देख कर लगता है कि उनमें भोलापन था जो अब कठिनाई से मिलता है.

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  10. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-722:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  11. अभी अभी एक मलयालम फ़िल्म देखी, अच्छी लगी जिसमें ज़रीना वहाब एक प्रौढ़ भूमिका में हैं.. सोचा आपको बताता चलूँ. शायद यह फिल्म ऑस्कर के लिए भी भारत कि ओर से आधिकारिक प्रविष्टि है. नाम है Adaminte Makan Abu यानि आदम का बेटा अबू

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  12. धन्यवाद अभिमन्यु, पिछले वर्ष ज़रीना वहाब की माई नाम इज़ ख़ान भी थी जिसमें वह प्रोढ़ थीं! :)

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  13. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 10-12-11. को । कृपया अवश्य पधारें और अपने अमूल्य विचार ज़रूर दें ..!!आभार.

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  14. यादें हमारे जीवन की अमूल्य थाती हैं. इन्हें सहेज कर रखना ही चाहिए.युवा मन अनेक छविओं को मन में बसा लेता है.ये छवियाँ ताउम्र साथ रहती हैं.सच में मानव मन होता ही ऐसा है.

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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