अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। त्रिनेत्र को बताये बिना बाबा अपने वृद्धाश्रम के मंदिर के सामने समाधी ले लेते हैं। जब त्रिनेत्र को पता चलता है तो वह बहुत दुखी होता है। आगे पढ़िये ...
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अध्याय 10
नारायणपुर, असम, 3 मार्च 2026
सुबह जापान से रिकू का फोन आया, उसने इधर-उधर की बात नहीं की, सीधा पूछा, “ओरी, क्या हुआ? अभी तक जून-मिन का पता नहीं चला?”
“यामागुचि सान, हमें उसका पता चल गया है। वह बूढ़ा हो गया है, लेकिन अभी भी चालाक है। कल वह हमसे बच कर भागने में सफल हुआ लेकिन अब हमें पता चल गया है कि वह किस क्षेत्र में रहता है, आप कुछ दिन और धैर्य रखिये, मैं उसे अवश्य खोज निकालूँगा", ताकानोरी ने कहा।
“तुम्हें वहाँ गये हुए तीन महीने हो गये हैं, इतने समय में तुम उसे खोज क्यों नहीं पाये?”“आप चिंता नहीं करें, मुझे पक्का विश्वास है कि कुछ समय में मैं उसे खोज निकालूँगा", उसने उसे आश्वासन दिया।
सोमचाई ने कम्प्यूटर के प्रोग्राम की सहायता से जून-मिन की पुरानी तस्वीर को ले कर, एक कृत्रिम-बुद्धि प्रोग्राम से उनकी नयी तस्वीरें बनायी थीं और उन्हें अपने आदमियों को दिया था ताकि वह उनको दिखा कर शहर में पूछताछ करें। कुछ घंटे बाद, बटेर खबर ले कर आया, बोला, “एक दुकानदार ने इस तस्वीर को पहचान लिया, कहा कि यह तो जामुन बाबा हैं और उसके यहाँ कभी-कभी सामान खरीदने आते हैं। लेकिन वह कहाँ रहते हैं, उसे पता नहीं था। बोला कि वह हर महीने-दो महीने में नारायणपुर आते हैं और वहाँ से तेल, साबुन वगैरा खरीद कर ले जाते हैं।"
सोमचाई ने इंटरनैट पर "जामुन बाबा" को खोजा तो उसे इंस्टाग्राम पर उसी दिन सुबह के कुछ वीडियो मिल गये। वह तुरंत मोबाइल को ले कर ताकानोरी के पास गया, बोला, “कुछ वीडियो मिले हैं। इनके अनुसार, कल शाम को जामुन बाबा यानि जून-मिन ने समाधी ले कर प्राण त्यागे हैं।"
ओरी ने वीडियो देखे। एक वीडियो में वह हिस्सा था जब बाबा एकत्रित लोगों के सामने कुछ बोल रहे थे और उनकी सफेद चद्दर उसके पीछे हवा में ऊपर उठ गयी थी। एक दूसरे वीडियो में उनके बक्से में बैठने और बक्से को ज़मीन में गाड़ने के दृश्य थे। वीडियो में लोग "जामुन बाबा" का नाम बार-बार ले रहे थे।
“यह समाधी लेना, इसका क्या मतलब है?” ओरी ने पूछा।
“वीडियो देख कर लगता है कि कल उन्होंने अपने आप को एक गड्ढ़े में जीवित दफन करवा लिया, अब तक वह मर गये होंगे।"
“यह वीडियो झूठा भी हो सकता है? शायद उसने यह वीडियो आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से बनवा कर हमें गुमराह करने के लिए लगवाये हों?”
“मेरी जाँच में यह आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से नहीं बने हैं। इन्हें किसी स्कूल के लड़कों ने इंस्टाग्राम पर डाले हैं। यह झूठे नहीं लगते, लेकिन इस बात की पुष्ठी करना आसान है। यहाँ से कुछ दूर ब्रह्मपुत्र नदी के मजूली द्वीप पर उनका एक वृद्धाश्रम है, हम वहाँ जा कर उसकी जाँच कर सकते हैं", सोमचाई बोला।
ओरी ने तुरंत जीप तैयार करवायी और वे लोग चापोड़ी घाट आये। वहाँ से उन्होंने वृद्धाश्रम जाने के लिए एक नाव को किराये पर लिया।
जामुन बाबा के जीवित समाधी लेने की खबर धीरे-धीरे फ़ैल रही थी, बहुत से लोग यह बात सुन कर उनकी समाधी को देखने आ रहे थे, इसलिए वृद्धाश्रम में समाधी-स्थल को देखने वालों की भीड़ लगी थी। ओरी और उसके आदमियों ने उनके बीच से जल्दी आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन वह भीड़ इतनी अधिक थी कि वह कुछ नहीं कर पाये। भीड़ के साथ-साथ वह भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।
आगे आये तो देखा कि वृद्धाश्रम के द्वार से बाहर दूर तक कतार लगी है, जो बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। ताकानोरी के आदमियों ने कतार से आगे जा कर घुसने की कोशिश की, तो कतार में खड़े हुए लोग गुस्सा हो गये। आखिर में उन्हें भी पीछे कतार में ही आना पड़ा।
ओरी को इस देरी पर बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका बस चलता तो वह अपनी तलवार निकाल कर, लोगों को मारता-काटता आगे बढ़ जाता लेकिन सोमचाई ने उसे रोका, कहा कि अगर वह सौ लोगों को भी मार देगा तब भी बाकी के हज़ारों लोग पत्थरों से उसका सिर फोड़ देंगे।
दो घंटे के बाद जब वह समाधी-स्थल पर पहुँचे तो उसकी दृष्टि साथ में बने मन्दिर की ओर गयी। उसकी बाहरी दीवार पर बहुत सी मूर्तियाँ बनी थीं, उनके बीच मूर्तियों की एक पंक्ति ने उसका ध्यान खींचा। उस पंक्ति में श्वेत तारा और हरित तारा की मूर्तियाँ साथ-साथ लगी थी। उसने वहाँ खड़े हो कर तुरंत आँखें बंद कीं और अन्वेषण-किरण से उन मूर्तियों को जाँचा, उसे लगा कि उनमें हलकी सी शक्ति-लहर का आभास हो रहा है। यह देख कर उसके मन को चैन मिला, कि अगर जून-मिन की हरिताश्म तारा की मूर्ति नहीं भी मिलेगी, तो वह इन मूर्तियों को यामागुचि सान के लिए जापान ले जा सकता है।
उसे समाधी-स्थल पर आगे न बढ़ता देख कर, कतार में उसके पीछे वाले लोगों ने शोर मचाया तो उसके आदमियों ने उन्हें समझाया कि वह विदेश से आया बौद्ध भिक्षुक है और समाधी लेने वाले जामुन बाबा का पुराना शिष्य है, तो सब लोग चुप हो गये।
वह सोमचाई के साथ मन्दिर के प्रांगण में पीछे की ओर जा कर खड़ा हो गया, बोला, “कल सुबह मैंने उसकी शक्ति-लहर को नारायणपुर में पकड़ा था और कल शाम को ही उसने समाधी ले कर प्राण त्याग दिये, क्यों? मुझे इस बात पर शक हो रहा है। यह उस बूढ़े की हमसे बचने की कोई चाल लगती है। मान लो कि उसका समाधी लेना केवल एक ड्रामा है? हो सकता है कि जब लकड़ी का बक्सा नीचे गड्ढे में उतारा गया तो वह भीतर नहीं था, पीछे से निकल कर कहीं पर छिप गया था, तो? या उस बक्से में साँस लेने की नलकी लगी थी, रात को जब लोग चले गये तो उन्होंने गड्ढ़े को खोल कर उसे बाहर निकाल लिया हो? या फ़िर, यहाँ समाधी स्थल के नीचे कोई सुरंग बनी हुई हो, लोगों के सामने उसने समाधी ली पर नीचे जा कर, वह बक्से से निकल कर, सुरंग से कहीं भाग गया हो?”
सोमचाई बोला, “पहाड़ी के भीतर रास्ता या सुरंग बनाने आदि में बहुत समय लगेगा। अगर ऐसा हुआ तो इसका मतलब होगा कि इसकी योजना उसने बहुत पहले बनायी थी और कल जैसे ही उसे लगा कि हमने उसे तलाश कर लिया है तो उसने समाधी ले ली? लेकिन उसे यह करने की क्या आवश्यकता थी? आप ने कहा था कि वह पिछले छयालिस सालों से भाग रहा है, जब कोई उसे खोज लेता था तो वह भाग कर कहीं और चला जाता था। तो इस बार वह कहीं और क्यों नहीं गया, उसने मरने के लिए समाधी क्यों ली?”
ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “सचमुच वह बूढ़ा बहुत चालाक है और हमसे कोई खेल खेल रहा है। मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होगा कि वह आसपास में कहीं पर छिप कर, हमें यहाँ बातें करता हुआ देख रहा है और हँस कर मज़े ले रहा है।" फ़िर, आसपास देखते हुए बोला, “यहाँ एक वृद्धाश्रम है, पहले यहाँ के बूढ़ों से पूछताछ करनी चाहिये। अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं इस समाधी को खुदवा कर उसके मृत शरीर को अपनी आँखों से देखूँगा।"
सोमचाई ने समाधी को देखने आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ की ओर देखा, बोला, “इन लोगों के सामने हम कुछ नहीं कर सकते। इनके सामने अगर हम इस समाधी को हाथ भी लगायेंगे तो यह लोग हमारी धज्जियाँ उड़ा देंगे। यही नहीं, हमारे तीनों आदमी भी इस बाबा के भक्त बन गये लगते हैं, देखो कैसे हाथ जोड़ कर खड़े हैं।"
सचमुच बटेर, लक्की और मटरू भी, अन्य श्रद्धालुओं की तरह जून-मिन की समाधी के पास हाथ जोड़ कर खड़े थे।
“एक मिनट रुको, मैं अभी आता हूँ", कह कर ओरी मन्दिर के भीतर गया।
जब उसने मन्दिर के बीच में बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति देखी तो उसकी दृष्टि उनकी हथेलियों पर रखी हरित तारा और श्वेत तारा की प्रतिमाँओ की ओर गयी। उसने आँखें बन्द करके उनकी जाँच की, उसे लगा कि उनमें भी शक्ति का स्पंदन है।
उसने मन्दिरकक्ष की अन्य दोनों मूर्तियों, ताँडव करते शिव और ध्यानलीन बुद्ध को भी ध्यान से देखा तो उनमें भी शक्ति का कंपन महसूस किया। वह समझ गया कि यह मन्दिर, यह प्रतिमाएँ, यह कोई सामान्य जगह नहीं हैं, इनमें ईश्वर की ऊर्जा का विशेष वास है।
उसने सोचा कि उन बड़ी मूर्तियों को जापान ले जाना कठिन होगा, लेकिन वह तारा की छोटी प्रतिमाओं को यहाँ से ले जा सकता है। यामागुचि तो शक्ति वाली मूर्तियाँ चाहिये, और यहाँ पर वैसी मूर्तियों की कमी नहीं है।
जब वह मंदिर से बाहर निकला तो उसे देखते ही सोमचाई समझ गया कि मन्दिर में कुछ हुआ है। वह जब भीतर गया था तो चिड़चिड़ा लग रहा था, जबकि अब वह मुस्कराता हुआ बाहर आया है।
“उन आदमियों को बुलाओ, हम वृद्धाश्रम में बात करने जायेंगे", ओरी ने उसे कहा।

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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.