सुनील दीपक के उपन्यास
1. देवी-प्रतिमा के रक्षक (2026)
यह एक एक्शन-रोमाँच-फैंतासी किस्म का लघु उपन्यास है जो बाल, किशोर और नवजवान पाठकों को ध्यान में रख कर लिखा गया है। आप इस लघु उपन्यास को इस ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ, मोबी व इपब फॉरमैट में डाउनलोड कर सकते हैं।
उपन्यास पढ़ने या डाउनलोड करने के लिए लिंक पर बटन दबायें।
अगर आप किसी अखबार या पत्रिका में इसे छापना चाहें तो मुझे आपत्ति नहीं है, आप को साथ में लिखना होगा - "डॉ. सुनील दीपक के ब्लॉग से साभार" और मुझे ईमेल से सूचित कीजिये (sunil.deepak@gmail.com)
जासूसी उपन्यास, या जेम्स बॉन्ड किस्म का कथानक लिखने की बहुत सालों से मेरी इच्छा थी। वह सपना मैंने इस उपन्यास में पूरा किया है। इसके दो नायक है - एक नायक-खलनायक हैं, ताकानोरी नाम के जापानी याकूज़ा (खूनी), और दूसरे, त्रिनेत्र, जिन्हें एक बौद्ध भिक्षुक ने बेटे की तरह पाला है और जो गँगटोक के पास एक अनाथालय चलाते हैं। यह उपन्यास उत्तर-पूर्वी भारत, विशेषकर असम में केन्द्रित है।
2. मेरे अन्य उपन्यास
मेरे दो अन्य सामाजिक-पारिवारिक उपन्यास तैयार हैं। मेरे पहले सामाजिक उपन्यास के छापने के बारे में एक प्रकाशक से बात हुई थी, अब तीन साल बाद लगता है कि शायद वह जल्दी ही छपेगा, मैं इसके लिए बहुत आशावान हूँ कि मेरा यह सपना भी जल्दी पूरा होगा। एक बार उसका छपना पक्का हो जाये तो दूसरे को छपवाने की कोशिश शुरु होगी।
उन पहले दो उपन्यासों के अतिरिक्त, दो अन्य सामाजिक उपन्यासों के ड्राफ्ट भी तैयार हैं, इस वर्ष के अंत तक कम से कम, उनमें से एक को पूरा करना चाहूँगा।
इनके अतिरिक्त, मैं आजकल एक साईन्स-फिक्शन यानि वैज्ञानिक-कल्पना का एक उपन्यास भी लिख रहा हूँ, जिसका कथानक 2180 के भारत में है। इस उपन्यास के ड्राफ्ट के बारे में मेरे दस पाठकों ने इसे पढ़ा है, उनमें से पाँच ने गलतियाँ, सुधार, सुझाव आदि के बारे में अपनी राय भेजी है। उन सबको मेरा दिल से धन्यवाद।
मुझे खुद पर आश्चर्य होता है कि चिकित्सा और शोध के क्षेत्रों में जीवन बिताने के बाद, अचानक बुढ़ापे में मुझे यह क्या हो गया कि एक उपन्यास समाप्त नहीं होता और दूसरा लिखने की इच्छा मन में जाग जाती है। शायद मुझे लिखने की जल्दी इसलिए हो रही क्योंकि मैं डरता हूँ कि यह जीवन अब कभी भी समाप्त हो सकता है, और उस दिन से पहले मैं मन में छिपी सभी कहानियाँ लिखना चाहता हूँ।
पाठकों से निवेदन
मेरा अधिकतर लेखन कमरे में अकेले कम्प्यूटर के सामने बैठ कर ही होता है। लेखन का मतलब ही अकेलापन है। इस अकेलेपन में कोई पाठक जब लेखन के बारे में कुछ कहता है, चाहे वह प्रशंसा करे या आलोचना, बहुत अच्छा लगता है। इसलिए आप से एक निवेदन है - मेरे लेखन के बारे में छोटी सी ही सही, कुछ टिप्पणी अवश्य लिखिये। इसके लिए आप को पहले से ही दिल से धन्यवाद।
आप अपनी राय व आलोचना को, अपने ब्लॉग या फेसबुक आदि पर भी लिख सकते हैं, उनके बारे में मुझे अवश्य बताईये। 🙏
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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.