सुनील दीपक के उपन्यास
1. देवी-प्रतिमा के रक्षक (2026)
यह एक एक्शन-रोमाँच-फैंतासी किस्म का लघु उपन्यास है जो किशोर और नवजवान पाठकों को ध्यान में रख कर लिखा गया है।
जासूसी उपन्यास, या जेम्स बॉन्ड किस्म का कथानक लिखने की बहुत सालों से मेरी इच्छा थी। वह सपना मैंने इस उपन्यास में पूरा किया है। इसके दो नायक है - एक नायक-खलनायक हैं, ताकानोरी नाम के जापानी याकूज़ा (खूनी), और दूसरे, त्रिनेत्र, जिन्हें एक बौद्ध भिक्षुक ने बेटे की तरह पाला है और जो गँगटोक के पास एक अनाथालय चलाते हैं। यह उपन्यास उत्तर-पूर्वी भारत, विशेषकर असम में केन्द्रित है।
यह उपन्यास "तिरंगा यौद्धा" नाम की मेरी फैंतासी-सीरीज़ की पहली किताब है। मैं इसकी दूसरी किताब के कथानक के बारे में सोच रहा हूँ।
एक जून 2026 (01/06/2026) से यह उपन्यास इस ब्लॉग पर धारावाहिक की तरह प्रकाशित होगा, हर सोमवार और बृहस्पतिवार को आप "देवी प्रतिमा के रक्षक" का एक नया अध्याय पढ़ सकते हैं। इस उपन्यास के कुल 32 अध्याय हैं।
"देवी प्रतिमा के रक्षक" पढ़िये (अध्याय पर क्लिक कीजिये)
अध्याय 01 - विष्णुपुर में जामुन बाबा त्रिनेत्र को उसके बचपन की बात बताते हैं और उसे घर छोड़ कर जाने के लिए कहते हैं
अध्याय 02 - रिकू यामागुचि अपने याकूज़ा-खूनी ताकानोरी को मूर्ति लाने हिन्दुस्तान जाने के लिए कहता है
अध्याय 03 - जामुन बाबा भेस बदल कर नारायणपुर जाते हैं जहाँ उन्हें ताकानोरी की अन्वेषण किरण शक्ति का आभास मिलता है
अध्याय 04 - बाबा को खोजने ताकानोरी अपने आदमियों को ले कर जाता है लेकिन बाबा उसे नहीं मिलते
अध्याय 05 - नारायणपुर से लौट कर बाबा त्रिनेत्र को ताकानोरी के बारे में बताते हैं और समाधी लेने का निर्णय लेते हैं
अध्याय 06 - गँगटोक में अनाथाश्रम में पाँच बच्चों को गुप्त-शक्ति साधने की शिक्षा दे रहा है, वहाँ आभा मेहमान है
अध्याय 07 - त्रिनेत्र बाबा की सहायता करने असम जायेगा, बच्चे भी उसके साथ जाना चाहते हैं। पता चलता है कि आभा के पास एक विचित्र गुप्त शक्ति है
अध्याय 08 - त्री और बच्चे आभा को समझाते हैं कि गुप्त-शक्तियाँ क्या होती हैं और उन्हें कैसे साधते हैं
अध्याय 09 - मजूली के वृद्धाश्रम में जामुन बाबा जीवित समाधी ले रहे हैं, उन्हें देखने आसपास के लोग जमा होते हैं
अध्याय 10 - ताकानोरी को बाबा के वृद्धाश्रम का पता चल जाता है, वह अपने साथियों के साथ वहाँ मूर्ति खोजने आता है
अध्याय 11 - त्रिनेत्र और नन्हे यौद्धा जामुन बाबा के आश्रम के लिए चलते हैं तो आभा भी उनके साथ जाना चाहती है
अध्याय 12 - ताकानोरी के गुँडे जामुन बाबा के बारे में वृद्धाश्रम में बूढ़ों से पूछताछ करते हैं और उन्हें धमकाते हैं
अध्याय 13 - गँगटोक से मजूली यात्रा में आभा मणिपुर के अपने जीवन के बारे में बताती है
अध्याय 14 - ताकानोरी के आदमी रात को बाबा की समाधी को खोद रहे हैं, लेकिन यह काम थोड़ा कठिन है
अध्याय 15 - त्री, बच्चे और आभा रात को मजूली पहुँच कर एक घर के तहखाने में छिप जाते हैं
अध्याय 16 - मजूली वाले घर में नीचे एक गुप्त सुरंग है जो जँगल में एक वृक्ष में खुलती है, वहाँ से त्री, रंगनाथ और गार्गी ...
अध्याय 17 - त्री, रंगनाथ और गार्गी भेस बदल कर वृद्धाश्रम में जा कर बाबा की समाधी की जाँच करने जाते हैं
अध्याय 18 - त्री जगदीश बाबु से बात कर रहा है, इधर ताकानोरी उसके साथियों को उठा कर ले जा रहा है
अध्याय 19 - अपने बंदियों को नारायणपुर ले जाते हुए ताकानोरी को आभा की गुप्त-शक्ति का अहसास होता है
इस उपन्यास के बारे में आप मेरे यह आलेख भी पढ़ सकते हैं:
धारावाहिक उपन्यास इस ब्लॉग पर (28 मई 2026)
एक नया फैंतासी उपन्यास (20 मार्च 2026)
2. मेरे अन्य उपन्यास
मेरे दो अन्य सामाजिक-पारिवारिक उपन्यास तैयार हैं। मेरे पहले सामाजिक उपन्यास के छापने के बारे में एक प्रकाशक से बात हुई थी, अब तीन साल बाद लगता है कि शायद वह जल्दी ही छपेगा, मैं इसके लिए बहुत आशावान हूँ कि मेरा यह सपना भी जल्दी पूरा होगा। एक बार उसका छपना पक्का हो जाये तो दूसरे को छपवाने की कोशिश शुरु होगी।
उन पहले दो उपन्यासों के अतिरिक्त, दो अन्य सामाजिक उपन्यासों के ड्राफ्ट भी तैयार हैं, इस वर्ष के अंत तक कम से कम, उनमें से एक को पूरा करना चाहूँगा। उनके अतिरिक्त, मैं आजकल एक साईन्स-फिक्शन यानि वैज्ञानिक-कल्पना का एक उपन्यास भी लिख रहा हूँ, जिसका कथानक 2180 के भारत में है और जिसे आप इस ब्लॉग पर पढ़ सकेंगे। वह पूरा होगा तो मेरे मन में "देवी प्रतिमा के रक्षक" के तिरंगा योद्धाओं की अगली कहानी के दो प्लॉट भी घूम रहे हैं। इनके अतिरिक्त, एक अंग्रेज़ी नॉन-फिक्शन पर भी काम चल रहा है, और एक दूसरा नॉन-फिक्शन भी दिमाग में है।
आने वाले दिनों-महीनों में आप को उन सबकी सूचना मिलती रहेगी।
मुझे खुद पर आश्चर्य होता है कि चिकित्सा और शोध के क्षेत्रों में जीवन बिताने के बाद, अचानक बुढ़ापे में मुझे यह क्या हो गया कि एक उपन्यास समाप्त नहीं होता और दूसरा लिखने की इच्छा मन में जाग जाती है। शायद मुझे लिखने की जल्दी इसलिए हो रही क्योंकि मैं डरता हूँ कि यह जीवन अब कभी भी समाप्त हो सकता है, और उस दिन से पहले मैं मन में छिपी सभी कहानियाँ लिखना चाहता हूँ।
पाठकों से निवेदन
मेरा अधिकतर लेखन कमरे में अकेले कम्प्यूटर के सामने बैठ कर ही होता है। लिखते समय मेरी खिड़की से कुछ पेड़-पौधे और उनके पीछे एक चर्च का गुम्बज, और उनके भी पीछे सुम्मानो पहाड़ दिखते हैं। इस अकेलेपन में कोई मेरे लेखन के बारे में कुछ कहता है, चाहे वह प्रशंसा करे या आलोचना, बहुत अच्छा लगता है। इसलिए पाठकों से एक निवेदन है - मेरे लेखन के बारे में टिप्पणी लिख कर, मुझे अपनी राय अवश्य दीजिये कि उनकी कौन सी बात आप को अच्छी लगी या बोरिन्ग लगी, या गलत लगी! इसके लिए आप को पहले से ही दिल से धन्यवाद।
अपनी राय व आलोचना आप अपने ब्लॉग या फेसबुक आदि पर भी लिख सकते हैं, उनके बारे में मुझे अवश्य बताईये। 🙏
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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.