उपन्यास

 सुनील दीपक के उपन्यास

प्रकाशक गण:  अगर आप मेरे किसी भी उपन्यास को अपनी पत्रिका में या पुस्तक-रूप में प्रकाशित करने चाहते हैं तो मुझे इस पते पर ईमेल भेजिये - sunil.deepak@gmail.com 

 1. देवी-प्रतिमा के रक्षक (2026)

यह एक एक्शन-रोमाँच-फैंतासी किस्म का लघु उपन्यास है जो किशोर और नवजवान पाठकों को ध्यान में रख कर लिखा गया है। 

जासूसी उपन्यास, जेम्स बॉन्ड किस्म का कथानक लिखने की बहुत सालों से मेरी इच्छा थी। वह सपना मैंने इस उपन्यास में पूरा किया है। इसके दो नायक है - एक नायक-खलनायक हैं, ताकानोरी नाम के जापानी याकूज़ा (खूनी), और दूसरे, त्रिनेत्र, जिन्हें एक बौद्ध भिक्षुक ने बेटे की तरह पाला है और जो गँगटोक के पास एक अनाथालय चलाते हैं। यह उपन्यास उत्तर-पूर्वी भारत, विशेषकर असम में केन्द्रित है।

यह उपन्यास "तिरंगा यौद्धा" नाम की मेरी फैंतासी-सीरीज़ की पहली किताब है। मैं इसकी दूसरी किताब के कथानक के बारे में सोच रहा हूँ।  

एक जून 2026 (01/06/2026) से यह उपन्यास इस ब्लॉग पर धारावाहिक की तरह प्रकाशित होगा, हर सोमवार और बृहस्पतिवार को आप "देवी प्रतिमा के रक्षक" का एक नया अध्याय पढ़ सकते हैं। 

"देवी प्रतिमा के रक्षक" पढ़िये

अध्याय 01  - अध्याय 02 - अध्याय 03 - अध्याय 04 - अध्याय 05 - अध्याय 06

 

इस उपन्यास के बारे में इस ब्लाग पर आप मेरे यह आलेख भी पढ़ सकते हैं:

धारावाहिक उपन्यास इस ब्लॉग पर (28 मई 2026) 

एक नया फैंतासी उपन्यास  (20 मार्च 2026)

 

2. मेरे अन्य उपन्यास

मेरे दो अन्य सामाजिक-पारिवारिक उपन्यास तैयार हैं, मैं उनके लिए प्रकाशक खोज रहा हूँ। अगर कोई प्रकाशक नहीं मिलेगा तॊ शायद, एक-एक करके, यह दोनों उपन्यास भी इस ब्लॉग पर प्रकाशित होंगे।

दो अन्य सामाजिक उपन्यासों के ड्राफ्ट भी तैयार हैं, इस वर्ष कम से कम, उनमें से एक को पूरा करना चाहूँगा। उनके अतिरिक्त, मैं आजकल एक साईन्स-फिक्शन यानि वैज्ञानिक-कल्पना का एक उपन्यास लिख रहा हूँ, जिसका कथानक 2180 के भारत में है। वह पूरा होगा तो मेरे मन में "देवी प्रतिमा के रक्षक" के तिरंगा योद्धाओं की अगली कहानी के दो प्लॉट भी घूम रहे हैं।

आने वाले दिनों-महीनों में आप को उन सबकी सूचना मिलती रहेगी।

मुझे खुद पर आश्चर्य होता है कि चिकित्सा और शोध के क्षेत्रों में जीवन बिताने के बाद, अचानक बुढ़ापे में मुझे यह क्या हो गया कि एक उपन्यास समाप्त नहीं होता और दूसरा लिखने की इच्छा मन में जाग जाती है। शायद मुझे लिखने की जल्दी इसलिए हो रही क्योंकि मैं डरता हूँ कि यह जीवन अब कभी भी समाप्त हो सकता है, और उस दिन से पहले मैं मन में छिपी सभी कहानियाँ लिखना चाहता हूँ।

मेरे पहले उपन्यास के छापने के बारे में एक प्रकाशक से बात हुई थी, लेकिन तीन साल बाद भी उनकी कुछ खबर नहीं है, पता नहीं कि वह कभी छपेगा भी या नहीं। आखिर में मैंने सोचा कि मुझे किताबों से कुछ कमाने की आवश्यकता नहीं है, पर लिखने में आनंद मिलता है, तो क्यों न उन्हें अपने ब्लॉग पर ही पाठकों को पढ़ने का मौका दूँ।

पाठकों से निवेदन 

पाठकों से एक निवेदन है - मेरे लेखन के बारे में मुझे अपनी राय अवश्य दीजिये कि उनकी कौन सी बात आप को अच्छी लगी या बोरिन्ग लगी, या गलत लगी! इसके लिए आप को पहले से ही दिल से धन्यवाद। अपनी आलोचना आप अपने ब्लॉग या फेसबुक पर भी लिख सकते हैं, उनके बारे में मुझे अवश्य बताईये। 🙏

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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.

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