बिष्णुपुर, बांकुरा, पश्चिम बंगाल, 2014
उस मंदिर की दीवारों पर राधा और कृष्ण की कहानियाँ लाल पक्की मिट्टी की शिल्पकला से सजी हुईं थीं। मंदिर के सामने, सड़क के पार, दो बड़े तालाब थे, जिनके किनारों पर ऊँचे-घने पेड़ों की कतारें थीं। उनके पीछे तीन गोलाकार छोटे तालाब और थे, जिनमें काई की वजह से उनके जल का रंग हरे पन्ने जैसा चमकता था। उन तालाबों के पीछे घरों की कतारें थीं, लेकिन उनके बीच में भी बहुत से छोटे-बड़े ताल-तलैया थे।
ऐसे ही एक छोटे से तालाब के किनारे वह झोपड़ी थी, जहाँ पर त्री अपने पिता समान गुरु जी के साथ बड़ा हुआ था।
विष्णुपुर के पक्की मिट्टी की शिल्प कला से सजे वैष्णव मंदिर, बंगाल ही में नहीं, सारे भारत में प्रसिद्ध हैं। शायद उन्हीं से प्रेरणा पा कर त्री शिल्पकार बना है। उसकी लाल रंग की पक्की मिट्टी की घोड़ों की मूर्तियाँ, मंदिर में आने वाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों में खूब बिकती हैं और उनसे उसकी अच्छी कमाई होती है।
वह गुरु जी से कहता है, “अब मैं अच्छा कमा लेता हूँ, फ़िर जब आप के घटनों में दर्द हो रहा है, तो आप हर रोज़ भिक्षा माँगने के लिए यहाँ-वहाँ क्यों भटकते हैं? आप को आराम करना चाहिये।”
लोग उसके गुरु जी को जामुन बाबा बुलाते हैं, हालाँकि उनका असली नाम जून-मिन है। वह कोरिया देश से आये हैं। वह कहते हैं, "बेटा तुम कमाते हो तो अपने पैसे जोड कर रखना सीखो, एक दिन तुम्हारे काम आयेंगे। मैं तो भिक्षुक हूँ, भिक्षा माँगना मेरा धर्म है।"
सुबह उठ कर गुरु जी अपना कटोरा ले कर भिक्षा माँगने निकल जाते हैं और शाम को घर लौटते हैं। त्री सुबह शिल्प बनाता है और फ़िर सारा दिन मंदिर के बाहर ग्राहक ढूँढ़ता है। सालों से उनका जीवन ऐसे ही चल रहा था, लेकिन एक दिन उनकी यह दिनचर्या बदल गयी।
उस दिन वह सुबह मुँह-अँधेरे, ईंट वाली भट्टी पर अपनी मूर्तियों को पकाने गया था। पक्की मिट्टी के शिल्प को पकाने के लिए बड़ा कौशल चाहिये। पहली बात है कि मूर्तियाँ पूरी तरह से सूखी होनी चाहिये। दूसरी बात, भट्टी का तापमान सही होना चाहिये। और तीसरी, पकने के बाद उन्हें धीरे-धीरे ठंडा करना चाहिये। अगर इन बातों का ध्यान न रखो, तो मूर्तियाँ टूट जाती हैं और सारी मेहनत बेकार हो जाती है।
वह ठेले से मूर्तियाँ उतार कर झोपड़ी में रख रहा था जब गुरु जी ने उसे बुलाया।
“क्या हुआ गुरु जी, आज आप की तबियत ठीक नहीं है?” इस समय तक वह अपनी भिक्षा का कटोरा ले कर निकल गये होते हैं, लेकिन उस दिन वह घर पर थे।
“भीतर से माँ की प्रतिमा उठा लो और मेरे साथ चलो", गुरु जी ने कहा, वह गम्भीर लग रहे थे।
उनके यहाँ एक हरे रंग की माँ तारा की देवी मूर्ति है। गुरु जी कहते हैं कि बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की करुणामयी आँखों से जब आँसू निकले तो दाहिनी आँख के आँसू से हरित तारा बनी। वह मूर्ति करीब बारह इँच की है, लेकिन भारी नहीं है।
त्री ने अपने ठेले को प्लास्टिक की तिरपाल से ढका और उस मूर्ति को ले आया। तालाबों के बीच से होते हुए, वह मंदिर की ओर आये और उसके प्रांगण के दक्षिण में बनी कीर्तनशाला के चबूतरे पर बैठ गये।
उस समय वहाँ मंदिर देखने वाले इक्का-दुक्का पर्यटक थे, और कीर्तनशाला वाला हिस्सा खाली था। त्री ने माँ तारा की मूर्ति को ध्यान से पास में रख दिया। वह समझ गया था कि आज गुरु जी को कोई विशेष बात करनी है, क्योंकि उससे पहले वह कभी उस मूर्ति को उसके पूजा-स्थान से उठा कर बाहर नहीं लाये थे।
“बताओ गुरु जी, क्या हो गया?” उसने चिंता के साथ पूछा।
गुरु जी कुछ देर तक उसकी ओर देखते रहे, उनकी करुणामय आँखों में नमी चमक रही थी। फ़िर धीरे से बोले, “तुम्हारे यहाँ से जाने का समय आ गया है।"
त्री स्तब्ध रह गया, कुछ बोल नहीं पाया। बचपन से गुरु जी ने उसे कई बार कहा था कि एक दिन उनके जीवन की राहें अलग हो जायेंगी और तब उसे उन्हें छोड कर कहीं दूर जाना पड़ेगा, लेकिन उसे विश्वास नहीं होता था कि ऐसा कभी होगा।
वह बोले, “भिक्षुक सब कुछ त्याग देता है, घर, परिवार, रिश्ते, नाते, उसके लिए कुछ नहीं होते। मैंने भी बहुत कोशिश की, कि तुमसे स्नेह और लगाव न बने, लेकिन मैं उसमें असफल रहा। तुम्हें अपने से दूर भेजना, मेरे लिए आसान नहीं है, लेकिन करना ही होगा।"
“क्यों?”
“क्योंकि अब तुम्हें अपने जीवन की नयी राह बनानी है। मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपने से दूर नहीं भेज रहा, हम लोग मिलते रहेंगे। लेकिन मैं चाहता हूँ कि जितना मैंने तुम्हें सिखाया है, तुम उसके लिए एक नया भविष्य बनाओ ताकि वह हमारे साथ समाप्त नहीं हो, आगे चलता रहे।"
त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी।
"तुमने अपने माता-पिता के बारे में मुझसे कई बार पूछा है, आज मैं तुम्हें वह सारी बात बताऊँगा। तुम मुझे गुवाहाटी में मिले थे। जहाँ गुवाहाटी का हवाई अड्डा है, उसके पास एक झील है, दीपोर बील। झील के बीच में एक पुल है जहाँ से रेल गुज़रती है। पुल के दूसरी ओर झील का एक छोटा सा कटा हुआ हिस्सा है, जहाँ मैं रहता था। झील के पास, एक कूड़े की पहाड़ी थी। दिन भर शहर से ट्रक आते थे और उस पहाड़ी पर कूड़ा गिराते थे। वहाँ पास में कुछ गरीब लोग रहते थे, जो उस कूड़े में काम की चीज़ें खोजते और बेचते थे। एक दिन शाम को मैं वहाँ से गुज़र रहा था, अँधेरा होने लगा था और कूड़े में खोजने वाले सब लोग चले गये थे। वहाँ मैंने तुम्हें देखा, तुम सड़क के किनारे बैठे थे, तीन-चार साल के थे।"
“वहाँ पास में रशीद नाम का कबाड़ी वाला रहता था, जिसे मैं जानता था। मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा और रशीद के पास गया, पता चला कि तुम्हारी माँ की मृत्यु हो गयी थी और तुम्हारा और कोई नहीं था। वह बोला कि पुलिस थाने में खबर दे दी है, तुम्हें अनाथाश्रम ले जाने के लिए वह किसी को भेजेंगे। मैं तुम्हें वहाँ अकेला नहीं छोड़ना चाहता था, तुम्हारे पास बैठ गया, सोचा कि जब पुलिसवाला तुम्हें लेने आयेगा, तब मैं अपनी कुटिया में लौट जाऊँगा। लेकिन रात हो गयी, कोई नहीं आया। तब मैंने सोचा कि उस रात को तुम मेरी कुटिया में रह सकते हो, तुम्हें अपने साथ ले आया। मैं चकित था कि तुम एक बार भी नहीं रोये, न ही कुछ कहा। चुपचाप उठ कर मेरे साथ कुटिया में आ गये। मेरे पास एक ही दरी थी जिस पर मैं सोता था, तुम मेरे साथ ही सोये।"
त्री मूक गुरु जी को देख रहा था, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“उस रात मेरे सपने में माँ तारा आयीं, वैसा सपना मैंने पहले कभी नहीं देखा था। माँ मेरे सिरहाने खड़ी थीं, चारों ओर उनका प्रकाश फ़ैला था। माँ ने मेरे माथे पर हाथ रखा और मुस्करायीं, तब मैंने देखा कि सपने में तुम भी हो। उस सपने में और क्या हुआ, मुझे याद नहीं, लेकिन जब सुबह हुई तो माँ की वह स्मृति मेरे मन में जीवित थी। उसी दिन मैंने अपनी दरी, भिक्षा की कटोरी और माँ की प्रतिमा समेट लीं, तुम्हें साथ लिया और यात्रा पर निकल पड़ा। घूमते-घूमते, डेढ़-दो साल के बाद हम यहाँ विष्णुपुर आये और रुक गये। जिस दिन तुम मुझे मिले थे, वह आज का ही दिन था, अठारह फरवरी, और इस बात को आज चौदह साल हो गये हैं।"
कुछ देर तक त्री रोता रहा, फ़िर आँसू पोंछ कर बोला, “मेरा नाम, त्रिनेत्र, मुझे आप ने ही दिया?”
गुरु जी ने एक थैली से एक काला धागा निकाला जिस पर एक छोटा सा त्रिशूल लटक रहा था, उसकी ओर बढ़ाते हुए बोले, “जब तुम मिले तब यह धागा तुम्हारे गले में था, शायद तुम्हारी माँ शिव-भक्त थीं? त्रिनेत्र माने शिव जी का तीसरा नेत्र, उसे आत्म-ज्ञान और दिव्य दृष्टि का प्रतीक मानते हैं। तुम्हारी गुप्त शक्ति की वजह से मैंने तुम्हारे लिए यह नाम चुना।"
“मेरी गुप्त शक्ति के बारे में आप को कब पता चला?”
गुरु जी मुस्कराये, बोले, “जब मैंने कूड़े की पहाड़ी के पास तुम्हें बैठे देखा था, तभी मुझे तुम्हारे भीतर छिपी शक्ति की अनुभूति हो गयी थी।"
त्री की गुप्त शक्ति है कि वह जब चाहे तब गुम हो सकता है। एक क्षण पहले वह सामने बैठा है और दूसरे क्षण, वह चाहे तो दिखाई नहीं देता। लगता है जैसे उसकी शक्ति से उसके शरीर के अणु-परमाणु बेरंग या पारदर्शी हो जाते हैं। बचपन से उसने गुरु जी से ध्यान लगाना, मन को एकाग्र करना और उस शक्ति पर नियंत्रण करना सीखा है। अब वह उस शक्ति के संचालन में इतना दक्ष है कि उसे न दिखाई देने के लिए सोचना नहीं पड़ता।
गुरु जी फ़िर मुस्कराये, बोले, “लेकिन मैंने तुम्हें कभी अपनी गुप्त शक्ति के बारे में नहीं बताया।"
त्री भौचक्का हो गया, बोला, “आप भी लुप्त हो सकते हैं?”
“नहीं", गुरु जी ने सिर हिला कर मना किया, बोले, “मेरी गुप्त शक्ति तुमसे भिन्न है। दुनिया में दस हज़ार में से एक बच्चे में गुप्त शक्ति की छिपी हुई सम्भावना होती है। अगर उसे बचपन में जागृत और विकसित न किया जाये तो वह शक्ति मुरझा कर मर जाती है। किसी की श्रवण शक्ति होती है, किसी की दृष्टि शक्ति और किसी की मानस-शक्ति। हमारी यह माँ तारा की प्रतिमा", उन्होंने पास रखी मूर्ति की ओर इशारा किया, “यह सामान्य मूर्ति नहीं है, जब यह पास हो तो इससे बच्चों की गुप्त शक्ति जागृत, विकसित और प्रबल हो जाती है।"
“माँ की इस मूर्ति से शक्ति जागृत होती है?”
“हाँ, और इस प्रतिमा की रक्षा के लिए सालों से मैं अपना देश त्याग कर भटक रहा हूँ। कुछ बुरे लोग हैं जो इसे छीनना चाहते हैं। वह शक्ति का प्रयोग गलत कामों के लिए करना चाहते हैं, बच्चों को चोर, डाकू और खूनी बनाना चाहते हैं। उन्होंने इसके लिए मेरे गुरु जी को मार दिया। मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रतिमा को ले कर कहीं दूर चले जाओ, वहाँ एक अनाथाश्रम खोलो और गुप्त-शक्ति वाले बच्चे खोज कर, उनकी शक्तियाँ विकसित करके, उन्हें अच्छे कामों के लिए तैयार करो।"
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उपन्यास का अगला अध्याय बृहस्पतिवार 4 जून 2026 को प्रकाशित होगा।