सोमवार, जून 29, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 09

अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। बाबा अपने वृद्धाश्रम में सूचित करते हैं कि वह समाधी लेंगे। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 09

मजूली द्वीप, असम, 2 मार्च 2026

बाबा दोपहर के साढ़े चार बजे अपने घर से निकले।

आज उन्होंने केसरिया वस्त्र की जगह पर एक सफेद चद्दर को अपने तन पर लपेटा था। उनकी भिक्षा के कटोरे में  हरिताश्म तारा की एक मूर्ति थी जिसके बिना वह कहीं नहीं जाते। आज उन्होंने अपनी खड़ाऊँ भी नहीं पहनी,  नंगे पाँव ही घर से निकले।

वह आज समाधी ले रहे हैं, यह खबर सारे क्षेत्र में फ़ैल चुकी है। आसपास के गाँवों के लोग और पास के हाई स्कूल के बहुत से छात्र, आश्रम में जमा हो गये हैं और अन्य लोग आते जा आ रहे हैं। वृद्धाश्रम का मैदान उनसे भरा है।

इस मैदान के उत्तरी कोने पर, नदी के पास, एक छोटी सी पहाड़ी पर काले पत्थर का मन्दिर बना है। इसके प्रमुख कक्ष में एक ओर नटराज हैं और दूसरी ओर ध्यानमुद्रा में महात्मा बुद्ध। कक्ष के बीच में खड़े हुए बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की बड़ी मूर्ति है, जिसके दोनों हाथ छाती के सामने हैं और हथेलियाँ ऊपर उठी हुईं हैं। उनकी दायीं हथेली पर हरिताश्म तारा की मूर्ति है और बायीं ओर श्वेत तारा की। इसी मंदिर के प्रांगण में बाबा समाधी लेंगे।

मन्दिर के सामने, मजदूरों ने दोपहर को ही खोदना शुरु कर दिया था और अब उनकी समाधी के लिए दो मीटर गहरा गड्ढ़ा तैयार है।
जैसे ही वह आश्रम के गेट से भीतर घुसे तो वहाँ एकत्रित लोग उन्हें देखने के लिए उठ खड़े हुए। किसी ने पुकारा, “जामुन बाबा की जय", तो सारी भीड़ उस नारे को बार-बार दोहराने लगी। बाबा वहीं बीच में रुक गये, भिक्षा के कटोरे को हाथ में लिए, नतमस्तक हो कर चुपचाप वहाँ आँखें बंद करके खड़े हो गये। धीरे-धीरे जब भीड़ चुप हुई तब वह आगे बढ़े।

पहाड़ी के ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास आश्रम में रहने वाले वृद्ध कतार बना कर खड़े थे, कई लोगों की आँखों से आँसू बह रहे थे। बाबा ने सिर उठा कर किसी की ओर नहीं देखा, नतमस्तक ही चुपचाप उनके बीच से निकले। जब वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगे तो पीछे से

एक वृद्धा ने पुकार कर कहा, “जामुन बाबा, हमें एक अंतिम प्रवचन का दान दे दो।"

बाबा वहीं ठिठक कर सीढ़ियों पर रुक गये। एक-दो क्षण वहाँ चुपचाप खड़े रहे, फ़िर लोगों की ओर मुड़े। बहुत देर तक कुछ नहीं बोले। उनके शरीर पर लिपटी चादर का पिछला हिस्सा हवा से ऊपर उठा और कुछ क्षणों के लिए उनके ऊपर झुक कर एक शेषनाग की तरह लहराता रहा। लोग स्तब्ध हो कर इस दृष्य को देख रहे थे।

वह बोले, “मैं बहुत भाग्यवान हूँ, कि मुझे आप के साथ रहने और आप की सेवा करने का अवसर मिला। आज मेरी आत्मा, अंतहीन आकाश में ब्रह्माँड से जुड़ कर एक हो जायेगी और मुझे करुणामयी तारा माँ की गोद में चिरनिन्द्रा मिलेगी। मेरी यह आकाँक्षा सफल हो, इसके लिए आप की प्रार्थना की मुझे अपेक्षा है। आप लोगों से मेरी एक प्रार्थना भी है कि जैसे आप मेरे साथ प्रेम और शाँति के साथ रहे, मेरे बाद भी यह आश्रम वैसे ही चलायेंगे।"

उन्होंने अपने हाथों को जोड़ कर, उन्हें सिर के ऊपर उठा कर, सभी को प्रणाम किया और धीरे-धीरे बाकी सीढ़ियाँ चढ़ कर अपने समाधी-स्थान की ओर गये।

उस समय जगदीश बाबू की आँखों से भी आँसू झरने लगे और उन्होंने महामृत्यंजय मंत्र का पाठ शुरु कर दिया, "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्"।

हालाँकि उन्होंने बार-बार वहाँ इकट्ठे लोगों से बाबा की तस्वीरें खींचने या वीडियो रिकॉर्ड करने से मना किया था, फ़िर भी कुछ लोग मोबाइल निकाल कर उनकी तस्वीरें खींच रहे थे।

ऊपर जा कर बाबा पहले मन्दिर में गये और वहाँ कुछ देर तक प्रार्थना की, फ़िर बाहर आ कर, मन्दिर की तीन बार प्रदक्षिणा की। अंत में वह खुदे हुए गड्ढ़े के पास रखे चकोराकार लकड़ी के बक्से के पास आये और हाथ में भिक्षा का कटोरा पकड़े हुए उसके भीतर आँखें बंद करके पद्मासन में बैठ गये।

मैदान में सन्नाटा छा गया। कुछ देर के बाद आश्रम की एक वृद्धा आगे आयी और लाठी के सहारे चलते हुए मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गयी। उसने बाबा के सामने हाथ जोड़े और उस बक्से के पाटों को बंद कर दिया। पीछे कुछ मजदूर तैयार खड़े थे, वह रस्सियाँ ले कर आये और उनसे उस बक्से को लपेट दिया, फ़िर रस्सियों के सहारे उठा कर उस बक्से को गड्ढ़े के भीतर रख दिया।

बक्से के ऊपर पहली मिट्टी की मुट्ठी डालने वही वृद्धा आयी। मुट्ठी में मिट्टी ले कर वह कुछ देर तक गड्ढ़े के पास खड़ी रही। उसकी आँखों से आँसू बह रह थे और उसकी सफेद साड़ी का पल्लू भी ध्वज की तरह कुछ क्षणों के लिए हवा में उड़ा। फ़िर एक लम्बी साँस ले कर उसने वह मिट्टी गड्ढ़े में फैंकी और साड़ी के कोने से आँसू पोंछते हुए सीढ़ियाँ उतर कर नीचे लौट आयी।

उसके बाद मजदूरों ने भी मिट्टी गड्ढ़े में डाली।

तब तक आश्रम के वृद्धों ने वहाँ एकत्रित लोगों को एक कतार बनाने के लिए कहा। उनमें सबसे आगे जगदीश बाबू थे। एक-एक करके सब लोग मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ते, गड्ढे के पास पड़ी हुई मिट्टी को हाथ में लेते और गड्ढ़े में डाल देते।

इस काम को पूरा करने में करीब आधा घंटा लगा। जब सबने स्माधी-कुण्ड में मिट्टी डाल दी तो बची हुई मिट्टी से मजदूरों ने उस गड्ढ़े को भर दिया। समाधी-स्थल के लिए, प्रांगण के फर्श जैसा, एक चकोर कटा हुआ काला पत्थर पहले से तैयार रखा था, उसे लगा कर मजदूरों ने फर्श को पूरा कर दिया। अब वहाँ बाहर से बाबा के समाधी-स्थल का कोई निशान नहीं बचा था।

बाबा के निर्देशों के अनुसार, वहाँ एकत्रित सब लोगों को प्रसाद बाँटा गया, और फ़िर धीरे-धीरे लोग वहाँ से जाने लगे। सब यही बात कर रहे थे कि जीवित समाधी लेने वाले जामुन बाबा अब बड़े संत माने जायेंगे और वह जगह दूर-दूर तक तीर्थ-स्थान की तरह प्रसिद्ध हो जायेगी।

जब जगदीश बाबू ने त्रिनेत्र को अगले दिन सुबह टेलीफोन पर यह बात बतायी तो वह स्तब्ध रह गया, बोला, “कल शाम को? तो आप ने मुझे पहले खबर क्यों नहीं की? हम आज सुबह उनके पास आने के लिए तैयार हुए हैं।”

“बेटा, मैंने तो उन्हें बहुत कहा था कि पहले तुम्हें बुला लेना चाहिये। तुम उनके उत्तराधिकारी हो, तुम्हारा यहाँ होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन वह नहीं माने।"

त्री रोने लगा। जगदीश बाबू कुछ देर तक उसके रोने की आवाज़ सुनते रहे, फ़िर बोले, “वह तुम्हारे लिए एक पत्र छोड़ कर गये हैं।"

“उसमें क्या लिखा है?”

“मुझे पता नहीं, लिफाफा बंद है। उन्होंने कहा कि जब तुम यहाँ आओगे, उसे तभी तुम्हें देना है।"

त्री ने अपने आँसू पोंछे, बोला, “हम लोग आज सुबह गँगटोक से चल रहे हैं, कल शाम तक वहाँ पहुँच जायेंगे।"

“तुम्हारे साथ और कौन आ रहा है?”, जगदीश बाबू ने पूछा।

“हमारे अनाथाश्रम के कुछ बच्चे हैं, उन्हें गुरु जी से मिलवाना चाहता था। अब वह उनकी समाधी को देखेंगे।"

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अगला अध्याय बृहस्पतिवार 02 जुलाई 2026 को पढ़ सकते हैं। 

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