सोमवार, अगस्त 24, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 25

अब तक की कहानी:  त्रिनेत्र ने ताकानोरी से कहा है वह उसे शक्तिवाहिनी मूर्ति तक ले कर जायेगा, और ओरी ने उसे वचन दिया है कि मूर्ति मिलने के बाद वह उनका और पीछा नहीं करेंगे। गुरु जी त्री के नाम एक कविता-पहेली छोड़ी थी, उसे पढ़ कर त्री, ओरी और आभा काजीरंगा के पास देवपानी के एक होटल में ठहरे थे। आज सुबह, त्री और ओरी लखमीपारा गाँव से हो कर शंखासुर की पहाड़ी को खोजने जा रहे हैं। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 25

लखमीपारा, काज़ीरंगा, असम, 7 मार्च 2026 

अगले दिन सुबह आभा ने त्री से पूछा, “तुम आज लखमीपारा और शंखासुर पहाड़ी की ओर जाने की कह रहे थे। तुम्हारे ख्याल में वहाँ तुम्हें वह मूर्ति मिल जायेगी? आज मेरी तबियत ठीक नहीं है, मेरा कहीं बाहर जाने का मन नहीं है।"

त्री बोला, “मैं गुरु जी को जानता हूँ, वह कोई चीज़ किसी आसान जगह पर नहीं छुपाते, इसलिए मैं जानता हूँ कि आज उस जगह पर पहुँचना बहुत कठिन होगा। अगर तुम अभी नहीं आना चाहती तो कमरे में आराम करो। लेकिन जाने से पहले मुझे कविता की बाकी पंक्तियाँ बता दो।"

आभा ने अपने पर्स से कविता वाला कागज़ निकाल कर पढ़ा:

“कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"

त्री बोला, “कंदरा माने गुफा और पिनाक माने शिव जी का डमरू, शायद चौदह ध्वनियों का अर्थ है कि वहाँ चौदह स्थान या गुफाएँ हैं। शंखासुर पहाड़ी पर पहुँच कर, वहाँ गुफाओं के बारे में पता करेंगे। अब हम जाते हैं, दोपहर से पहले लौट आयेंगे।"

तबियत खराब होने का केवल बहाना था। जब वह दोनों होटल से निकले तो आभा भी फटाफट तैयार हो गयी और देवपानी घाट की ओर गयी। वहाँ उसने एक नाव किराये पर ली और उसे पूर्व दिशा में ले जाने के लिए कहा।

जब वह नाव घाट से कुछ दूर आयी तो सामने से एक मोटरबोट उसकी नाव के पास आ गयी, उसमें रंगनाथ, गार्गी और वसंत थे। करीब के एक द्वीप पर अपनी पहली नाव को छोड़ कर, वह बच्चों के साथ उनकी मोटरबोट पर चली गयी। उसने उन्हें त्री और ओरी के शंखासुर पहाड़ी की खोज में जाने के बारे में बताया, और गार्गी से बोली, “मैं उन दोनों पर नज़र रखना चाहती हूँ, तुम त्री से सम्पर्क बना कर रखो और देखो कि वे दोनों कहाँ जाते हैं और क्या करते हैं।"

उधर त्री और ओरी लखमीपारा गाँव की ओर पैदल जा रहे थे। होटल से निकलने के दस मिनट बाद वह दोयांग नदी के किनारे पहुँच गये, जिसके दोनों ओर पेड़ उगे थे। वहाँ नदी पर कोई पुल नहीं दिखा और आसपास, कोई नाव वाला भी नहीं था, लेकिन लखमीपारा जाने के लिए उन्हें वह नदी पार करनी थी। ओरी ने नदी के साथ-साथ चल कर उत्तर दिशा में जाने के लिए कहा, तो त्री मान गया, सोचा कि शायद आगे जा कर नदी पार करने का कोई रास्ता मिल जायेगा।

वहाँ पर केवल पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। त्री ने जमीन पर गिरी हुई पेड़ों दो लम्बी-सीधी डालियों को खोजा, और उनकी छोटी डालियों और पत्तों को तोड़ कर उनकी छड़ियाँ बनायीं। एक छड़ी ताकानोरी को दी, और बोला, “काज़ीरंगा का सफारी पार्क नदी के उस ओर है, इसलिए मेरे विचार में खतरनाक जानवर इस ओर कम आयेंगे, लेकिन यहाँ की ऊँची घास में साँप हो सकते हैं, इस छड़ी से आगे ठक-ठक करके चलो, तो साँप और छोटे-मोटे जानवर भाग जायेंगे।"

ओरी ने पूछा, “उसके टूटने से पहले, तुमने जून-मिन की विशेष शक्ति वाली मर्ति को अवश्य देखा होगा? मैंने उसकी तस्वीरें देखी हैं और यामागुचि सान ने कहा कि वह केवल बारह इंच की है, क्या यह सच है?”

त्री ने हाथों से इशारा करके दिखाया, “जहाँ तक मुझे याद है, वह करीब इतनी बड़ी थी, हो सकता है कि बारह इंच की ही हो। लेकिन वह बहुत हलकी थी, जैसे पत्थर की मूर्तियाँ होती हैं, वैसी नहीं थी।"

"वह टूटी कैसे?”

त्री ने मुँह बनाया, बोला, “मेरी गलती से ही टूटी थी। गुरु जी मेरे लिए पिता जैसे हैं, उन्होंने मुझे बचपन से पाला है, शायद इसलिए मुझे उनके साथ खेलना और मज़ाक करना अच्छा लगता है। मेरे एक मज़ाक की वजह से वह मूर्ति टूटी थी।"

ओरी ने उसकी ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा तो उसने पूरी बात बतायी, बोला, “मैं शिल्पकार हूँ, शिल्प बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। गुरु जी ने मुझे अपनी मूर्ति जैसी, सफेद और हरे पत्थरों की बारह अन्य मूर्तियाँ बनाने के लिए कहा था। जहाँ उनका समाधी-स्थल है, वह उस मन्दिर की दीवार में उन मूर्तियों को स्थापित करना चाहते थे, शायद तुमने वहाँ मेरी उन मूर्तियों को देखा होगा? उस मन्दिर के भीतर वाले कक्ष में एक अवलोकितेश्वर बौद्धिसत्व की बड़ी मूर्ति भी है, जिनकी दायीं हथेली में हरी तारा और बायीं हथेली में श्वेत तारा खड़ी हैं, वह दोनों छोटी मूर्तियाँ भी मैंने ही बनायी हैं।"

"फिर?”

“एक दिन मैं मन्दिर के प्रांगण में बैठ कर उन मूर्तियों को तराश रहा था, जब गुरु जी वहाँ आये। उस समय मैंने यह ध्यान नहीं दिया कि उनके हाथों में वह शक्तिवाहिनी प्रतिमा थी। तुम तो जानते हो कि मेरी अदृश्य होने की शक्ति है, उनके साथ खेलने के लिए कई बार मैं अदृश्य हो कर छिप जाता था और उनके पीछे से आ कर, उन्हें डराने के लिए अचानक 'हाउ-हाउ' चिल्लाते हुए प्रकट हो जाता था। मेरे उस खेल से वह डरते नहीं थे, क्योंकि शायद वह मुझे देखे बिना भी मेरी उपस्थिति को भाँप लेते थे। पता नहीं उस दिन क्या हुआ, मैं 'हाउ-हाउ' कहता हुआ उनके सामने प्रकट हुआ तो उनके हाथ से वह प्रतिमा गिर गयी", उस दिन को याद करके त्री की आँखों में आँसू आ गये, “मूर्ति के टुकड़ों को देख कर वह इतने दुखी थे कि अपनी हरकत पर मुझे बहुत पछतावा हुआ, लेकिन तब पछताने से क्या होता, वह मूर्ति तो ठीक नहीं हो सकती थी।"

नदी के साथ चलते-चलते वे दोनों, उत्तर दिशा में काफ़ी आगे आ गये थे, वहाँ उन्हें नदी पर बाँस का बना एक कच्चा पुल दिखा। देखने में वह कमज़ोर लगता था इसलिए उन्होंने उसे एक-एक कर के पार किया। नदी पार करके वह वापस दक्षिण दिशा में लखमीपारा गाँव की ओर लौटे।

ओरी बोला, “यामागुचि दादा जी कहते थे कि अगर उस मूर्ति के पास रहो तो तुम्हारी भीतर की शक्ति अपने आप सशक्त हो जाती है। मैं सोचता था कि अगर उनके पास वह मूर्ति होती तो मेरी शक्तियाँ भी पूरी तरह से विकसित हो सकती थीं। लेकिन मूर्ति टूटने के बाद, जून-मिन ने उसके टुकड़ों को नयी मूर्ति में लगवा कर, यहाँ अपने आश्रम से इतनी दूर क्यों रखवा दिया? यहाँ रखने से उसका लाभ किसे मिलेगा? क्या तुम लोगों को उसकी शक्ति की आवश्यकता नहीं है?”

“क्योंकि कई वर्ष पहले ही हमने समझ लिया था कि हमारी शक्ति को प्रबल करने के लिए, प्रतिमा के अतिरिक्त कुछ अन्य रास्ते भी हैं। जब कुछ शक्तिवान लोग साथ में रहते हैं, साथ में शक्ति-साधन का अभ्यास करते हैं तो उससे भी आपस में उनकी शक्तियाँ सशक्त और विकसित होती है। प्रतिमा से बच्चों की शक्ति बढ़ती है और शक्तिवान लोगों के पास रहने से प्रतिमा की शक्ति भी बढ़ती है। गुरु जी कहते हैं कि शक्ति एक चुम्बक है, जिसके साथ रखो, वह भी चुम्बक बन जाता है, लेकिन हर पत्थर पर उसका असर नहीं होता, उसके लिए तो विशेष हरिताष्म पत्थर ही चाहिये। जब गुरु जी की वह प्रतिमा टूटी तो उसकी कुछ धूल मैं अपने साथ ले गया और उसे मिला कर मैंने नटराज की एक मूर्ति बनायी। पहले उसकी शक्ति हलकी थी लेकिन आज, क्योंकि मेरे साथ अन्य नौ शक्तिवान बच्चे रहते हैं, हमारे सामिप्य से हमारे नटराज की शक्ति भी बढ़ गयी है", त्री ने उसे समझाया।

"यानि, यामागुचि दादा जी, अगर उस मूर्ति के बदले में कुछ शक्तिवान लोगों को खोज कर अपने साथ रखते तो भी हमारी शक्ति बढ़ कर विकसित हो जाती?”

त्री ने सिर हिला कर हामी भरी। तब तक वह लोग लखमीपारा गाँव पहुँच गये थे। वहाँ त्री ने लोगों से शंखासुर पहाड़ी के बारे में पूछा लेकिन किसी को उस पहाड़ी के बारे में नहीं पता था। किसी ने सुझाव दिया कि वह मन्दिर के पुजारी जी से पूछे तो वह उस मन्दिर की ओर गये।

वह मन्दिर एक विशालकाय पीपल के वृक्ष के नीचे बना था, जिसके आसपास लाल मौली के धागे बँधे थे और पास में एक चबूतरे पर राधा-कृष्ण की मूर्ति रखी थी। बूढ़े पंडित जी बोले, “बहुत दिनों के बाद आज शंखासुर पहाड़ी का नाम सुना। पिछले दस-पंद्रह सालों में यहाँ बहुत से नये लोग, बाहर से आ कर बस गये हैं, उन्हें यह पुराने नाम नहीं मालूम, उन्होंने जगहों को अपने नये नाम दिये हैं।" फिर, उस पहाड़ी का रास्ता बताते हुए वह बोले, “उस तरफ ध्यान से जाना। वहाँ गैंडों के सींग काटने वाले तस्कर, हाथों में हथियार लिये घूमते हैं। अगर वैसा कोई व्यक्ति दिखे तो खतरा मत लेना, क्योंकि वह लोग तुम्हें जान से मार कर तुम्हारी लाशों को जंगल में फ़ैंक देंगे तो महीनों उसे खोजते रहेंगे। उधर एक दूसरा खतरा दलदल का भी है, जहाँ कोई बड़ा कीचड़ जैसा कुछ दिखे तो उसके किनारे से चलना, जल्दबाजी करके उसके बीच में मत जाना। दलदल में फँस गये तो मृत्यु निश्चित है।"

त्री ने पूछा, “पंडित जी, शंखासुर पहाड़ी के आसपास कोई गुफाएँ भी हैं?”

वह बोले, “मैंने गुफाओं की बात तो कभी नहीं सुनी, लेकिन पिछले पचास सालों से यह संरक्षित क्षेत्र है, भीतर अगर तुम्हें काज़ीरंगा के गार्ड पकड़ लें और उन्हें पता चले कि तुम यहाँ के गाँव के नहीं हो, तो जुर्माना लगता है, इसलिए बाहर वाले लोग इधर घूमने नहीं जाते। लेकिन यहाँ अगर गुफाएँ होंगी तो शायद उन तस्करों को या पार्क में काम करने वाले गार्डों को उसका पता होगा।"

वहाँ से चले तो त्री ने ओरी से कहा, “डर तो नहीं गये? तुम चाहो तो होटल लौट सकते हो, आज मैं आगे जा कर पता लगा कर आता हूँ और अगर पता चल गया तो कल हम दोनों साथ में वहाँ जा सकते हैं।"

ओरी ठहाका मार कर हँसा, बोला, “क्या मेरे चेहरे से लगता है कि मैं डर गया हूँ? मैं हर रोज़ केन-दो, क्यू-दो और नागीनाताजुत्सु की लड़ाई का अभ्यास करता हूँ। मेरे पूर्वज एक समुराई यौद्धा थे, शायद तुमने भी उन सैंतालिस समुराइयों की कहानी सुनी होगी? उस पर हॉलीवुड वालों ने एक फ़िल्म भी बनायी थी। क्या तुम उस कहानी को जानते हो?”

त्री ने सिर हिला कर मना किया तो वह बोला, “हमारे शहर का नाम है अक्को, करीब तीन सौ साल पहले हमारे एक राजा थे, लॉर्ड असानो, जिनका धोखे से खून हुआ था। मेरे पूर्वज ओकानो उनके समुराई थे। नियम के अनुसार, जब स्वामी मरता है तो उसके समुराई आत्महत्या कर लेते हैं, इसलिए उन्हें भी आत्महत्या करनी चाहिये थी। लेकिन उन्होंने आत्महत्या करने के बजाय, पहले अपने स्वामी की हत्या का बदला लिया और फिर आत्महत्या की थी। उनकी यह कहानी पूरे जापान में प्रसिद्ध हो गयी और आज भी अक्को में राजा के किले के पास, उन सैंतालिस समुराईयों का मन्दिर बना है।"

त्री बोला, “इसका मतलब है कि अगर समुराई काम में असफल हो जाये, तो उसे आत्महत्या करनी पड़ती है? मान लो कि अगर तुम्हें वह मूर्ति न मिले तो क्या तुम्हें भी आत्महत्या करनी पड़ेगी?”

ताकानोरी ने लम्बी साँस ली, बोला, “आजकल समुराई नहीं हैं, और अब पहले जैसी पेट में तलवार घुसा कर आत्महत्या करने की परम्परा भी नहीं है। वैसे तो मैं याकूज़ा हूँ, एक अपराधी गैंग के लिए काम करने वाला खूनी। लेकिन यामागुचि दादा जी ने मुझे पाला-पोसा है, मैं उनके साथ गद्दारी नहीं कर सकता। मैं उस मूर्ति को खोजने में अपनी जान भी लगा दूँगा और जब तक वह नहीं मिलेगी, मैं उसे खोजना नहीं छोड़ूँगा। यही मेरा धर्म है।"

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उपन्यास का अगला भाग बृहस्पतिवार 27 अगस्त को पढ़ सकते हैं

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