गुरुवार, अगस्त 20, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 24

अब तक की कहानी:  ताकानोरी से बचने के लिए जामुन बाबा ने समाधी ले ली। ओरी उनकी एक मूर्ति चाहता है। बाबा की मदद करने, त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली आया है। ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति कर अपहरण कर लेता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है। ओरी को जब यह समझ आती है तो वह आभा और बच्चों से पूछताछ करता है लेकिन उसके पैर में बिच्छु काट लेता है। त्री ओरी से बात करने आता है, वह कहता है कि बच्चों को छोड़ दो और उससे एक वचन लेता है ... इसके आगे पढ़िये ... 

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अध्याय 24

मोरनाइगुड़ी से काज़ीरंगा, असम, 6 मार्च 2026 

ताकानोरी ने जून-मिन की चिट्ठी वाला लिफाफा, जो उसे जगदीश बाबू ने दिया था, बाहर निकाला और उसे त्री को दिया। त्री ने उसमें से गुरु जी की कविता वाला कागज़ बाहर निकाला और उसे पढ़ा -

"चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे 
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।”

उसने कविता को धीरे-धीरे पढ़ा और मुस्कराया, बोला, “जब मैं छोटा सा था, तबसे गुरु जी मुझसे यह खेल खेलते थे। वह मेरी गेंद या खिलौना छिपा देते थे, फिर मुझे एक कविता सुनाते थे और कहते थे कि इसके शब्दों में संकेत हैं कि वह कहाँ छुपा है। कई बार मुझे अपने खिलौने खोजने में दो-तीन दिन भी लग जाते थे। उस खेल की वजह से मुझे उनकी कविताओं के संकेत समझना आता है।"

त्री, आभा और ओरी मोरनाइगुड़ी में होटल में बैठे हैं। वह लोग सुबह नारायणपुर से वहाँ आये हैं। त्री ने सभी बच्चों को मजूली भेज दिया है। वह चाहता था कि आभा भी बच्चों के साथ मजूली चली जाये, लेकिन ताकानोरी नहीं माना, बोला, “तुम मेरे सामने हो कर भी अदृष्य हो सकते हो, मैंने तुम्हारी शक्ति का वह रूप देखा है। अगर तुम मुझे रास्ते में कहीं पर अकेला छोड कर गुम हो गये तो मैं क्या करूँगा? गारँटी के लिए आभा भी हमारे साथ चलेगी।"

जब त्री ने गुरु जी की कविता पढ़ी तो ओरी बोला, “तो बताओ कि हमें वह देवी मूर्ति लेने कहाँ जाना है?”

त्री बोला, “मैंने उस मूर्ति के बारे में एक बात तुमसे छिपायी है, पहले तुम्हें वह बात बतानी है। तुम तो जानते हो कि वह मूर्ति हरे जेड पत्थर की बनी थी? पाँच साल पहले जब गुरु जी यहाँ मजूली आये तो एक दिन वह मूर्ति गिर कर टूट गयी।"

ओरी गुस्सा हो गया, बोला, “इसका मतलब है कि तुमने मुझसे झूठ बोल कर वचन लिया है? तुमने तो कहा था कि तुम मुझे उस देवी मूर्ति तक ले कर जाओगे?”

“पहले मेरी पूरी बात सुनो, फिर गुस्सा होना। जब वह मूर्ति टूटी तो उसका एक बड़ा हिस्सा था, और कुछ छोटे टुकड़े थे। उसके हर टुकड़े में वही शक्ति थी। मैंने उसके छोटे से कण में भी उसकी शक्ति को महसूस किया है और वह उतनी ही प्रबल है जितनी कि मूल मूर्ति में थी। तब गुरु जी ने फैसला किया कि हर टुकड़े को एक नयी प्रतिमा में जोड़ देंगे। उन्होंने जो कविता लिखी है, वह उस नयी प्रतिमा तक पहुँचने का संकेत है जिसमें देवी मूर्ति का सबसे बड़ा टुकड़ा जुड़ा हुआ है, इसलिए वह भी शक्तिवाहिनी मूर्ति है।"

उसकी बात सुन कर ओरी ने कुछ देर सोचा, फिर बोला, “मुझे यह बात यामागुचि सान को बतानी पड़ेगी।"

उसने जापान में फोन किया और किसी से बात की, फिर थोड़ी तक फोन हाथ में लिए किसी और से बात करने की प्रतीक्षा की, लम्बे समय तक बात करने के बाद, आखिर में फोन बंद करके बोला, “यामागुचि सान कहते हैं कि अगर उस मूर्ति में शक्ति नहीं होगी तो वह तुम सबसे बदला लेंगे, तुम्हें छोड़ेंगे नहीं।"

त्री बोला, “तुम्हारे पास अन्वेषण-किरण की शक्ति है, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं होगी, तुम खुद ही जाँच कर लेना कि उस नयी प्रतिमा में कितनी शक्ति है।"

“ठीक है, अब देर लगाने की आवश्यकता नहीं, बताओ हमें कहाँ जाना है?”

“पहले हमें गुरु जी की कविता के संकेत समझने होंगे और उसके लिए हमें इस क्षेत्र के नक्शे की आवश्यकता है। शायद मोबाइल पर जो नक्शा होता है, उससे काम हो जाये", त्री बोला।

“मेरे पास हिन्दुस्तान का बड़ा नक्शा है, जिसमें हर राज्य के सारे जिले और गाँवों को देख सकते हैं", ताकानोरी ने अपने बैग से एक टैबलेट निकाली, चालू की और उसमें आसाम का नक्शा निकाला, और उसे त्री की ओर बढ़ाते हुए बोला, “यहाँ पर मजूली के दक्षिण भाग का, जहाँ पर जून-मिन का वृद्धाश्रम है, उसका नक्शा है।"

आभा अभी तक चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी। त्री ने उसे कहा, “गुरु जी की कविता की पहली पंक्ति दोबारा पढ़ो।"

“चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे", आभा ने पढ़ा।

त्री सोचने लगा, फिर बोला, “शायद गुरु जी इसमें उस जगह की दूरी और दिशा की बात बता रहे हैं। दशानन यानि दस सिर वाला, यानि रावण, और तीन दशानन यानि तीस सिर वाला, और कोसे का मतलब कोस, तो शायद यह जगह गुरु जी के आश्रम से तीस कोस दूर है।"

आभा बोली, “यह कोस क्या होता है?”

त्री बोला, “पुराने ज़माने में दूरियाँ कोसों में मापी जाती थीं, तीस कोस का मतलब हुआ करीब साठ किलोमीटर। यानि यह जगह आश्रम से साठ किलोमीटर दूर है। पहला वाक्य है, चन्द्र-वधु के चरण-कमल, चन्द्र-वधु यानि चन्द्रमा की बहू, शायद वह चंद्रकाँति यानि माँ सरस्वती की बात कर रहे हैं? तारा माँ की मूर्ति के सबसे बड़े टुकड़े को माँ सरस्वती की मूर्ति में ही लगाया गया है। इसलिए मेरा ख्याल है कि गुरु जी, माँ सरस्वति के चरण-कमलों की बात कर रहे हैं। चरण-कमल किस दिशा में होते हैं?”

ओरी बोला, “सरस्वती? जापानी भाषा में उन्हें बेन्ज़ाइतेन कहते हैं, हम भी उन्हें ज्ञान और संगीत की देवी मानते हैं।"

“अगर देवी का मस्तक उत्तर में मानते है, तो चरण-कमल दक्षिण में हुए", आभा बोली।

“मजूली के दक्षिण में साठ किलोमीटर दूर क्या है?”, त्री ने नक्शे में देखा और बोला, “वहाँ पर काज़ीरंगा का आरक्षित सफारी-पार्क है। शायद हमने उस जगह को ठीक खोजा है, क्योंकि कविता की अंतिम पंक्ति में लाल बकरियों की बात है और काज़ीरंगा का मतलब भी लाल बकरी ही होता है।"

ओरी बोला, “तो क्या हमें पता चल गया कि वह कौन सी जगह है?”

त्री ने सिर हिला कर मना किया,  बोला, "अभी तो हमें केवल दिशा और क्षेत्र पता चले हैं, लेकिन काज़ीरंगा बहुत बड़ा है, और वह मूर्ति वहाँ पर किस जगह पर छिपी रखी है, अभी हम यह नहीं समझे। कविता की दूसरी पंक्ति पढ़ो।"

आभा बोली, “पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल।”

त्री बोला, "पद्मा और कमल-अँजुरी तो लक्ष्मी की ओर संकेत लगते हैं। शायद वहाँ पर लखिमपुर या लखमीपुर जैसा कोई गाँव होगा?"

आभा बोली, “वह तो जँगली पशु-पक्षियों का संरक्षित क्षेत्र है, क्या वहाँ पर गाँव भी हैं?” 

त्री ने बताया, “पिछले कुछ दशकों में वहाँ पर बहुत सारे नये गाँव बस गये हैं, जिनकी वजह से जँगली जानवरों के लिए जगह कम हो गयी है। वहाँ कुछ जानवरों के चोर भी घूमते हैं जो उनकी तस्करी करते हैं। जैसे कि गैंडे के सींगों से चीन में पारम्परिक दवाईयाँ बनाते हैं, इसलिए उनकी बहुत माँग है और वहाँ के कुछ लोग गैंडों को मार कर उनके सींग काट कर उसकी तस्करी करते हैं।"

वह कुछ देर तक टैबलेट पर काज़ीरंगा के आसपास के क्षेत्र को ध्यान से देखता रहा, फिर बोला, “काज़ीरंगा के पश्चिम में लखमीपारा नाम का गाँव है, शायद गुरु जी की कविता उसकी बात कर रही है? हमें वहाँ जा कर पता करना चाहिये क्योंकि कविता की अगली पंक्तियों में विष्णु के शंख की और गुफाओं में शिव जी के डमरू की बातें हैं। शायद वहाँ के गाँव वाले इस बारे में कुछ बता सकते हैं।"

ओरी बोला, “फिर देर करने से क्या फायदा, हमें तुरंत उस जगह के लिए रवाना होना चाहिये।"

त्री ने कहा, “ज़रूरी नहीं कि हमें वह जगह आसानी से मिल जायेगी, छुपी जगहें खोजने में गुरु जी बहुत होशियार हैं, हो सकता है कि हमें वहाँ तीन-चार दिन लग जायें और किसी होटल में रहना पड़े।"

ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “तुम जून-मिन के बारे में ऐसे बात करते हो मानो वह अभी जीवित हो, क्या उसने समाधी नहीं ली?”

त्री मुस्कराया, “मैं सालों तक गुरु जी से बहुत दूर रहा हूँ, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा अपने साथ महसूस किया है। उनके समाधी लेने से भी इस बात में कुछ अंतर नहीं पड़ा, जब तक मैं हूँ, तब तक वह मेरे साथ हैं।"

उन्होंने दोपहर में बनपुराई घाट से काज़ीरंगा के पास देवपानी के लिए मोटरबोट ली और करीब चार बजे वहाँ पहुँचे। वहाँ एक लॉज में उनके लिए तीन कमरे बुक थे।

लॉज वाले सज्जन ने उन्हें बताया कि वहाँ से लखमीपारा जाने के लिए पगडँडी के रास्ते से पैदल जाना आसान है, बीस-पच्चीस मिनट में वहाँ पहुँच सकते हैं। उन्होंने कहा, "यह क्षेत्र काज़ीरंगा की परिधि के साथ लगा हुआ है, इसलिए यहाँ अक्सर जँगली जानवर भी आ जाते हैं, आप उस रास्ते पर ज़रा ध्यान से रहियेगा।"

त्री ने उनसे पूछा, “लखमीपारा के आसपास क्या विष्णु या कृष्ण या शंख से जुड़ा किसी जगह का नाम है?”

वह सज्जन कुछ देर तक सोचते रहे, फिर बोले, “लखमीपारा से काज़ीरंगा की ओर जायें तो वहाँ पर शंखासुर की पहाड़ी है। पुराणों में एक कहानी है कि एक दानव के पास एक महाशंख था, जिसकी वजह से सब उसे शंखासुर बुलाते थे। विष्णु ने उसे हरा कर वह महाशंख ले लिया और उस शंख को पंचजन्य का नाम दिया।"

ओरी पास में खड़ा उन्हें बातचीत करते हुए देख रहा था, उसने त्री से पूछा, “क्या पता चला?”

“लगता है कि हमारी किस्मत अच्छी है और हम सही जगह पर आये हैं। अभी कुछ देर में अँधेरा हो जायेगा इसलिए अभी शंखासुर पहाड़ी की ओर जाने का समय नहीं है, कल सुबह चलेंगे", त्री बोला, फिर उसने आभा से कहा, “कविता की वह शंख वाली पंक्ति फिर से पढ़ो।"

“विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि।"

त्री सोचते हुए बोला, “इसमें आसमान पर सप्तऋषि मँडल की बात है, क्यों? उसका क्या अर्थ हुआ?"

ओरी को नहीं मालूम था कि सप्तऋषि क्या है, तो त्री ने उसे बताया, “यह एक कोन्स्टेलेशन यानि तारा-समूह है, पश्चिमी देशों में उसे कानिस मेजर या बिग बैरो कहते हैं।"

आभा बोली, "सप्तऋषि ध्रुव तारे की राह भी तो दिखाते हैं?"

ओरी ने पूछा, "कौन से तारे की?”

“ध्रव तारा, नोर्थ स्टार।"

“इस कविता में इस जगह पर ध्रुव तारे का क्या अर्थ बना?”

त्री ने सोचते हुए कहा, “शायद इसका अर्थ है कि जैसे सप्तऋषि आकाश में ध्रुव तारे की दिशा दिखाते हैं, वैसे ही शंखासुर की पहाड़ी हमें प्रतिमा की दिशा दिखायेगी।"

“नक्शे में देखते हैं", ओरी को अब इस खोज में आनन्द आने लगा था, उसने टेबलेट पर उस क्षेत्र के नक्शे को बड़ा किया और कुछ देर तक देखता रहा, फिर बोला, “यहाँ कहीं पर शंखासुर की पहाड़ी का नाम नहीं है।"

त्री बोला, “तुम चिंता नहीं करो, यह पारम्परिक नाम हैं, यह नाम अक्सर नक्शों पर नहीं दिखते क्योंकि हमारे आधुनिक नक्शे अंग्रेज़ों के समय बने थे और कई बार वह लोग हमारे पाराम्परिक नामों को महत्व नहीं देते थे। लेकिन यह जानकारी हमें गाँव वालों से मिल जायेगी।" 

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अगला अध्याय सोमवार 24 अगस्त को पढ़ सकते हैं

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