रविवार, अक्टूबर 04, 2026

कुँवर नारायण - तीन कविताएँ

"कल्पना" पत्रिका हैदराबाद से निकलती थी। इसका कार्यालय 516 सुल्तान बाज़ार में था और इसके प्रकाशक मधुसूदन चतुर्वेदी थे। जुलाई 1960 में इसके सम्पादक मँडल के सदस्य थे - डा. आयेन्द्र शर्मा (प्रधान), मधुसूदन चतुर्वेदी, बद्रीविशाल पित्ती, मुनीन्द्र, जगदीश मित्तल (कला), गौतम राव।

उन दिनों में मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक हैदराबाद में रहते थे और "मैनकाईन्ड" नाम की अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए काम करते थे जिसका दफ्तर "कल्पना" के साथ जुड़ा था, और दोनों पत्रिकाएँ एक ही प्रकाशक द्वारा, एक ही प्रिटिन्ग प्रैस से छपती थीं।

साथ की हमारी पारिवारिक तस्वीर उन्हीं दिनों की है। यह जून 1960 में ही ली गयी थी जब हम गर्मियों की छुट्टियों में हैदराबाद गये थे, और राजा दुबे के घर पर ठहरे थे। इस तस्वीर में जाने माने उद्योगपति और डॉ. लोहिया की समाजवादी पार्टी के सहयोगी बद्रीविशाल पित्ती भी हैं। यह मेरे छठे जन्मदिन पर खींची गयी थी। उन्हीं दिनों में पित्ती जी के घर पर प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन साहब से भी मुलाकात याद है। 

खैर "कल्पना" के जुलाई 1960 अंक में मेरे पिता की एक कहानी छपी थी, जिसे इस ब्लॉग पर छापने की बहुत दिनों से सोच रहा था। आज जब वह पत्रिका निकाली तो उसमें कुँवर नारायण की तीन कविताएँ देखीं जो मेरे विचार में इंटरनैट पर उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें साझा कर रहा हूँ। अगले दिनों में "कल्पना" के इस अंक से कुछ अन्य सामग्री भी साझा करने का विचार है।

***

कुँवर नारायण की तीन कविताएँ

बन्धु यह तो ...

डूब कर जो कुछ उबारा
ज़िन्दगी है;
टूट कर जो कुछ सँवारा
ज़िन्दगी है;
आँख के नम आईने में चकमकाती सूरतें
सूरज नहीं हैं
जो छलक कर दूसरा सूरज बना लें !
दीखती हैं क्यों कि कोई देखता है,
देखती हैं क्योंकि कोई दीखता है;
और वह स्रष्टा
वही स्रष्टा नहीं है
आस्था जिसके सृजन में
कभी रक्खी कभी चकनाचूर की ।
 
ज़िन्दगी आखिर रहे क्यों
याचना जैसे किसी मजबूर की ?
बन्धु, यह तो
देन है अच्युत लबालब आत्मा की,
सृष्टी छलकन है किसी भरपूर की ।
 

सवेरे-सवेरे

 
कार्तिक की एक हँसमुख सुबह ।
नदी-तट से लौटती गंगा नहा कर
सुवासित भीगी हवाएँ
सदा पावन
माँ सरीखी
अभी जैसे मन्दिर में चढ़ा कर खुशरंग फूल
ठंड से सीत्कारती घर में घुसी हों,
और सोते देख मुझको जगाती हों ----
सिरहाने रख एक अँजुलि फूल हरसिंगार के,
नर्म ठंडी उँगलियों से गाल छू कर प्यार से,
बाल बिखरे हुए तनिक सँवार के ...
 

कार्निस पर

 
कार्निस पर
एक नटखट किरण बच्चे-सी
खड़ी जंगला पकड़ कर,
किलकती है, "मुझे देखो !"
 
साँस रोके ---
बाँह फैलाए खड़ा गुलमुहर ...
कब वह कूद कर आ जाये उसकी गोद में !
 
*** 

इस वर्ष के लोकप्रिय आलेख