बुधवार, सितंबर 26, 2007

अत्याचार की नींव

इन दिनों टेलीविज़न पर मयनमार (बर्मा) में हो रहे आंदोलन के दृष्यों को देख कर खुशी भी होती है और मन में दहशत भी. तानाशाहों के दमन से दब कर रहने वालों में जब अपनी आवाज़ उठाने का साहस आता है तो उन्हें स्वयं भी विश्वास नहीं होता. सड़क पर निकलने वाली भीड़ में खुद को पा कर कैसा लगता होगा, इसकी कल्पना मैं कर सकता हूँ.

और तानाशाह क्या करेगा? गोली चला कर आंदोलन को दबायेगा या समझ जायेगा कि हर अत्याचार की तरह, उसके अत्याचार की नींव बहुत कच्ची है, हल्के से धक्के से गिर जायेगी?

1968 के चेकोस्लोवाकिया के वसंत की याद आती है, जब अगस्त में रूसी टैंक प्राग में घुस आये थे और उस वसंत को बँदूक की ताकत से दबा दिया था.

चेकोस्लोवाकिया के वसंत के बारे में केवल पढ़ा था, जबकि 1989 में चीन में हो रहे विद्यार्थी आंदोलन को करीब से देखने का मौका मिला था. पहले सियान में पुराने जनरल सेक्रेटेरी हू याओबेंग के मृत्यु के बाद हो रहे धरनो और जलूसों को देखा फ़िर, बेजिंग में तियानामेन स्क्वायर में विद्यार्थियों का आंदोलन देखा था. कुछ आंदोलनकारी छात्रों से बात की थी. बेजिंग छोड़ने के दो दिन बाद जब टेलीविज़न पर टैंकों को उसी तियानामेन स्क्वायर पर देखा था तो बहुत दहशत हुई थी.

यँगून में जब बुद्ध भिक्षुक जलूस के आगे चलते देखा तो मन में थोड़ी सी आशा जागी, शायद बुद्ध भिक्षुकों पर गोली चलाने का साहस तो उन बहादुर जनरलों में भी नहीं होगा जिन्होंने उँग सान सू क्यी जैसे नेता को पिछले सत्रह साल से कैद में रखा है. अभी सुबह के समाचार में बता रहे हैं कि रात भर रँगून में कर्फ्यू था और सुबह बहुत जगह पुलिस तैनात है. बुद्ध विहारों के बाहर भी पुलिस खड़ी है ताकि भिक्षुकों को बाहर निकलने से रोका जाये.

क्पयूटर, इंटरनेट और टेलीफोन की नयी तकनीकों ने जनरलों द्वारा लगाये बड़े प्रतिबँधों को पार कर के बाहर दुनिया में तस्वीरें, वीडियो और विचार भेजे हैं, ताकि सबको मालूम चल सके कि बर्मा में क्या हो रहा है.

धकधक करते दिल में आशा भी है कि इस बार जन आंदोलन सफल होगा. सवाल यह है कितने लोगों का खून सींचेगा इस सफलता को?

सोमवार, सितंबर 24, 2007

भारतीय पत्नि के सपने

मेरे बेटे ने पिछले वर्ष भारत में विवाह किया. इटली में पला और बड़ा हुआ बेटा मारको तुषार, मारको अधिक और तुषार कम है, और वह किसी भारतीय लड़की से विवाह करना चाहेगा, इसका हम लोगों ने कोई सपना तक नहीं देखा था. यह बात सोचना भी अविश्वासनीय सा लगता था. यहाँ इटली में तो आज के नवयुवक विवाह बहुत देर से करते हैं, कभी कभी दस दस साल तक बिना विवाह के साथ रहने के बाद विवाह होता है और अधिकतर वह भी नहीं होता. पर हमारी होनी में यह सुख लिखा था और उसका दिल भारत यात्रा में छुट्टियों में खोया. बहू इटली आयी और हमारा परिवार पूरा हो गया. बेटे बहू का प्यार देख कर मन को बहुत सुख मिलता है.

कुछ दिन पहले बेटे का एक मित्र पियेरो हमारे यहाँ खाने पर आया था. अचानक मुझसे बोला, "मैं भी भारतीय लड़की से विवाह करना चाहता हूँ, आप का इस बारे में क्या विचार है?"

पहले मुझे लगा कि वह मज़ाक कर रहा है बोला, हाँ क्यों नहीं, कहो तो तुम्हारे लिए लड़की देखें.

पर फ़िर जब उसका गम्भीर चेहरा देखा तो अपनी हँसी को दबा कर बोला, "इस तरह के सोचने से केवल बात नहीं बनेगी, सचमुच की लड़की से शादी करनी है तो सचमुच का प्यार चाहिये. अगर तुम मारको और आत्मप्रभा, इन दोनों को देख कर अगर मन में एक छवि सी बना लोगे तो सच्चाई से नहीं, कल्पना से विवाह करोगे और जब सचमुच की लड़की का सोचना, रहना, इच्छाएँ, विचार समझ में आँयेंगे तो उनसे मेल कैसे बैठेगा?"

भारत में माता पिता द्वारा पक्के किये गये विवाह या फ़िर स्वयं अखबार या किसी एजेंसी के माध्यम से खोजे जीवन साथी से विवाह करना और साथ निभाना आसान है क्योंकि यह बात हमारी सभ्यता, हमारी सोच में बसी है. यहाँ के केवल "मैं" और "मेरा" को सबसे ऊँचा सोचने वाले व्यक्तिगत भावना वाले पश्चिमी संसार में इस तरह की सोच नहीं. यहाँ प्रेम और विचारों के मिलने के बिना विवाह करने की कोई नहीं सोचता. डर सा लगा कि अगर भावुकता में पियेरो कुछ इस तरह का कदम उठायेगा तो खुद तो दुख पायेगा ही, किसी मासूम लड़की को भी दुख उठाना पड़ेगा. यह सब समझाया उसे, पर वह अपनी बात पर ही अड़ा है कि भारतीय लड़की से ही विवाह करना है.

"अच्छा, अगले साल जब मारको और आत्मप्रभा दोनो भारत में छुट्टियों में जायेंगे, तो तुम भी साथ चले जाना. क्या मालूम तुम्हें सचमुच कोई लड़की सच में भा जाये", मैंने सुझाव दिया, "और तब तक तुम कुछ मिर्च मसाले वाला खाना खाने का अभ्यास करो, इस तरह से सूखा सादा खाना खाओगे तो कौन भारतीय लड़की तुमसे विवाह करना चाहेगी?"

तब से अगले साल की छुट्टियों की तैयारी शुरु और कहाँ जायेंगे, क्या करेंगे इसके प्लेन बनने लगे हैं. पियेरो अँग्रेजी का अभ्यास कर रहा है. वह आज कल हिंदी फ़िल्मों और हिंदी फ़िल्म संगीत से जान पहचान बढ़ा रहा है. कहता है कि रानी मुखर्जी और एश्वर्या राय सुंदर हैं. नीचे वाली तस्वीरों में जिसमें पियेरो अपने आप को मारको और आत्मप्रभा के साथ साथ अलग अलग हिरोईनों के साथ देखता है, उसने ही बनायी है.









शनिवार, सितंबर 22, 2007

फणीश्वरनाथ रेणु की "कलंक मुक्ति"

यात्रा की तैयारी कर रहा था, तो सोचा कौन कौन सी किताबें साथ पढ़ने के लिए ले जायी जायें? नज़र पड़ी फणीश्वरनाथ रेणु की "कलंक मुक्ति" पर. जनवरी में भारत यात्रा में खरीद कर लाया था, अभी तक पढ़ने का मौका नहीं मिला था. सोचा कि रेणू जी को पढ़ा जाये.



पढ़ कर कल्पना पर भारतीय लेखकों के बारे में अँग्रेजी और इतालवी भाषाओं में परिचय देने का जो काम करने का सोचा था, उसमें भी रेणु जी का बारे में लिख सकता हूँ, यह विचार भी मन में था. यह काम भी बहुत समय से अधूरा सा पड़ा है. मुझे लगता है कि अच्छा लेखक केवल अपनी भाषा के लोगों के बोलने वालों में जाना जाये और वृहद जगत में उसके बारे में कुछ भी न मालूम हो यह ठीक नहीं.

रेणु जी का नाम मेरे मानस में तीसरी कसम फ़िल्म और उसके हीरामन से जुड़ा है. उनकी कुछ किताबें, जैसा मैला आँचल और परती परिकथा पढ़े तीस पैंतीस साल हो गये थे. लड़कपन के अधकच्चे मन को कहानियाँ अच्छी अवश्य लगी थीं पर क्या कहानी थी उस सब की यादें धुँधलाई सी थीं.




"कलंक मुक्ति" की कहानी की नायिका है सुश्री बेला गुप्त, भारतीय स्वत्रंता संग्राम के जोश में गाँव छोड़ने वाली बेला गुप्त को अपने क्राँतीकारी साथी से धोखा और बलात्कार मिलता है. बेला गुप्त को शरण मिलती है अनपढ़ और साहसी मुनिया और उसकी बेटी रामरति से, और सहारा मिलता है रमला बैनर्जी से जो उसे कामकारी स्त्रियों के होस्टल में काम दिलवाती हैं. बेला गुप्त को अपने बीते जीवन का पश्चाताप करना है, वह जन साधरण की सेवा में जुट जाती हैं और निर्बल कमज़ोर युवतियों को सहारा देना ताकि वे शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बन सकें, में जुट जाती हैं और इसके लिए किसी रिश्वतखोर या भ्रष्ट अफसर से जूझने से नहीं डरती. आँख की किरकिरी बेला गुप्त और उसकी निडर सहायिका रामरति को जेल मिलती है होस्टल में वेश्याघर चलाने और दवा के पैसे खाने के जुर्म में, और दलाली और अत्याचार करने वाले सरकारी अफसरों को कुछ नहीं होता. बेला गुप्त चुपचाप न्याय के इस अन्याय को स्वीकार रकती हैं, अपने बीते कल के पश्चाताप के लिए.

सारी कहानी को फ्लैशबैक में लिखा गया जब लेखक "अजीत भाई" की मुलाकात रात को रामरति से होती है जो बताती है कि वह और बेला गुप्त जेल से मुक्त हो गयीं हैं. अजीत भाई कौन हैं, बेला गुप्त से उनका क्या सम्बंध था यह बात उपन्यास में स्पष्ट नहीं होती. जेल से छूट कर बेला गुप्त और रामरति वेश्या बन गयीं है, प्रारम्भ के रामरति के बोलने से कुछ कुछ ऐसा लगता है पर यह बात भी स्पष्ट नहीं होती. जेल से निकल कर बेला गुप्त के पास जीवन यापन का कुछ और रास्ता नहीं था, यह बात पूरी किताब में बेला गुप्त के बनाये व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती.

किताब छोटी सी है, कुल ११२ पन्ने (राजकमल पेपरबैक्स, मूल संस्करण का असंक्षिप्त रूप, पहला संस्करण १९८६) और कापीराइट है पद्मपराग राय रेणु का जो शायद रेणु जी के पुत्र थे. रेणु जी का देहांत १९७७ में हुआ था, यानि यह पैपरबैक्स संस्करण उनकी मृत्यु के ९ साल बाद प्रकाशित किया गया. एक बार पढ़नी शुरु की तो पूरी पढ़ कर ही दम लिया.

पुस्तक की सबसे सुंदर बात है उसकी भाषा जो शायद बिहार के उस भाग की भाषा है जहाँ रेणू जी रहते थे? भोजपुरी, मैथिली, अवधी, आदि भाषाओं में क्या अंतर है और इन सब भाषाओं को पहचानना मेरे बस की बात नहीं, पर उन्हें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है, शायद क्योंकि इन भाषाओं में बचपन के कई रिश्तों की यादें छुपी हैं!

कई जगह शब्दों के ठीक अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आते पर उन्हें ऊँची आवाज में पढ़ना बहुत अच्छा लगता है. जैसे उपन्यास से लिया यह हिस्साः

जानकी देवी के उत्साहित करते ही वह गाने लगी, गुनगुनाकर. बेला गुप्त चुप खड़ी सुनती रही. ... गीत सुनते समय, एक ग्रामीण बालिका वधु की छवि उतर आयी आँखों के सामने. चंगेरी भर गेहूँ लेकर पीसने बैठी है चक्की पर. हमदर्द पड़ोसन पूछती है, "औ सुकुमारी! किस पत्थरदिल सास ने तुझे चंगेरी भर गेहूँ दिया है तौल कर, किस ननद ने तुझे अकेली नौ मन की चक्की चलाने को भेजा है. हाय हाय, चक्की का हत्था पकड़ कर, झुमाई हुई निहुरी सी, घूँघट के अंदर ही रोती है, छोटी गुड़िया जैसी दुलहिन...

के तोरा देलकउ सुन्दरि दस सेर गेहूँआ
के तोरा भेजलकउ एकसरि जँतसारे ना कि.
कौन रे निदरदो के तेहुँ रे पुतौहिया
कौन रे मुरुखवा पुरुखवा तोर भतार न कि
"हथड़ा" पकड़ि सुन्दरि झमरि...

चंगेरी, झुमाई, निहुरी जैसे शब्द समझ नहीं आते है पर पढ़ने अच्छे लगते हैं. इसी तरह की भाषा का एक अन्य नमूना हैः

गौरी बोली, "तो, सुरती सहुआइन ने तेरा क्या बिगाड़ा है, कुन्ती मौसी? ...हरिजन तो वह मुझे समझती है.
"मुझे मौसी पीसी मत कहे कोई."
"क्यों री गौरी. छोटी मेम के घर कोंहड़े के लत्तर की भाजी कैसी बनती है, सूखा या रसदार? छोटी मेम खुद बनाती है."
"उँहु! खुद नहीं बनाती है, बनाता है उनका वह डिब्बावाला ... क्या नाम है भला - कूकड़! सभी चीजें डाल देती है, एक साथ. और जब उतारती है तो भात अलग, दाल अलग, तरकारी अलग."
यही बात मुझे रेणू जी की अच्छी लगती है, सुघड़ कथान्यास की संवेदना और भाषा का सौँधापन.

गुरुवार, सितंबर 20, 2007

जननेता का मनमोहक व्यक्तित्व

करीब 25 साल पहले दिल्ली में एक पोलैंड के नवयुवक से मुलाकात हुई थी जो फ़िल्म अभिनेता से नेता बने व्यक्तियों पर शौध कर रहा था और उस पर अपनी थीसिस लिख रहा था. अमरीका में रियेगन से भी मुलाकात कर चुका था. कहता था कि यह बात केवल भारत में नहीं अन्य बहुत से देशों में है कि प्रसिद्ध अभिनेता एक दिन राजनेता बन जाते हैं. बोला, "एनटीआर जैसा जादुवी व्यक्तित्व वाला पुरुष मैंने कोई अन्य नहीं देखा. उनसे बात करके मुग्ध सा हो गया, मन में लगा कि अगर मुझे वोट करना हो तो अपना वोट अवश्य एनटीआर को ही देता."

कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे हुआ जब उभरते इतालवी राजनेता निकी वेनदोला से मिलने का मौका मिला. एक दो बार उन्हें पहले टीवी पर देख चुका था. शुरु में उनके छोटे बाल और बायें कान में लटकती बाली देख कर कुछ अजीब सा लगा था. सोचा कि अवश्य हिप्पी किस्म के व्यक्ति होंगे. पर पिछले सप्ताह जब मिलने का मौका मिला तो राय बदल गयी.

दक्षिण इटली के बारी नामक शहर में हो रही सभा का विषय था संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बनाया विकलाँग व्यक्तियों के मानव अधिकारों से सम्बंधित नया अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन. वेनदोला जी उस राज्य के गवर्नर हैं और सभा के उद्घाटन के लिए आये थे. सोचा था कि राजनीतिक नेता जिस तरह के भाषण देते हैं वैसी ही बात सुनने को मिलेगी, यानि बेकार की बातें और कुछ झूठमूठ के वादे. पर जब उन्होंने बोलना शुरु किया तो आश्चर्य हुआ. कोई लिखा हुआ भाषण नहीं था और अपनी बात कहते हुए उन्होंने अपने जीवन अनुभवों से, अपने विकलाँग मित्रों के जीवन अनुभवों से कई बातें बतायीं. बहुत अच्छा लगा. सुना है कि वह केवल अच्छे भाषण ही नहीं देते, काम के लिए भी उनकी सरकार लोकप्रिय है. (नीचे तस्वीर में निकी वेनदोला)



पर क्या लोगों को मंत्रमुग्ध करना ही सब कुछ होता है? क्या सचमुच मंत्रमुग्ध करने वाले नेता जनहित के लिए काम करने में सफल होते हैं?

इण्लैंड के नये प्रधानमंत्री गोर्डन ब्राउन का समाजसेवी संस्थाओं के साथ निशुल्क काम करने वाले स्वयंसेवको के बारे में भाषण पढ़ा वह बहुत अच्छा लगा. उनसे पहले के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर में लोगों को मंत्रमुग्ध करने की शक्ति थी, पर जिस तरह के काम उन्होंने किये उससे उनका सारा जादू गायब हो गया. उनके मुकाबले में गोर्डन ब्राउन के व्यक्तित्व में कोई जादू नहीं लगता.

यूरोप में इस तरह सामाजिक कार्यों के लिए काम करने वाले स्वयंसेवकों की संस्थाएँ हर देश में मिल जायेंगी. इटली में तो हर छोटे छोटे शहर में कई कई इस तरह की संस्थाएँ होती हैं. ब्राउन जी ने कहा कि औरों के लिए निस्वार्थ काम करने वाले लोग ही ब्रिटेन को बड़ा बनायेगें और उन्होंने सरकार की ओर से इस तरह की संस्थाओं को मजबूत करने तथा सहारा देने के लिए कई कदमों की घोषणा की. उनके इस भाषण को पढ़ कर मन में उनकी जो छवि थी वह बदल गयी.

लोगों को अपने व्यक्तित्व से मंत्रमुग्ध करना तो आसान है. आसान न होता तो बुश जैसे लोग बार बार कैसे चुने जाते? पर अपनी सरकार के काम से मुग्ध करना यह शायद थोड़ा कठिन है. और भारत में आज कौन से नेता हैं जो देश की जनता को मंत्रमुग्ध कर पाने की क्षमता रखते हैं?
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