सोमवार, जून 08, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 03

अब तक: त्रिनेत्र को उसके गुरु जी जामुन बाबा (कोरिया से आये बौद्ध भिक्षुक जून मिन) ने पाला था। जब वह अठारह वर्ष का हुआ तो गुरु जी ने उसे एक अनाथाश्रम खोल कर उसमें शक्ति वाले बच्चों को तैयार करने के लिए कहा था। दूसरी ओर, जापान में यामागुची गैंग ने अपने याकूज़ा खूनी ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लाने भारत भेजा है। इससे आगे पढ़िये इस तीसरे भाग में।

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अध्याय 03

मजूली, असम, 2 मार्च 2026

सुबह मुँह-अँधेरे जब बाबा अपने आश्रम से निकले, तो उन्हें पहचानना कठिन था। उन्होंने भिक्षुक के केसरी वस्त्र को उतार कर, गंदे मटमैले सा कुर्ता-पजामा पहने थे, उनका सिर और चेहरा गमछे से ढका था और कँधों पर एक पुराना कम्बल लिपटा था। वह कोई गरीब गाँववाला लगते थे। अँधेरे में वह वृक्षों और झाड़ियों के बीच में से छाया की तरह जा रहे थे।

उनकी छोटी सी नाव, नदी के तट के पास पुराने चिथड़ों और सूखे पत्तों से ढ़की थी, जो आसानी से नहीं दिखती थी। वह उसे धकेल कर नदी में ले गये और उसमें बैठे। उनका चप्पू इस कोण से नदी के जल में घुसता है, जैसे मक्खन में गर्म चाकू, ज़रा सी भी आवाज़ नहीं होती। उस दिन भी उनकी नाव पानी को तीर की तरह चीरती हुई जा रही थी।

जब त्री उनसे पूछता है, "गुरु जी, आप का कभी अपने कोरिया देश लौटने का मन नहीं करता?"

तो वह कहते हैं, "मेरे लिए तो तुम ही मेरा परिवार हो, वहाँ लौट कर मैं क्या करूँगा? वहाँ मुझे जानने वाला अब कोई नहीं है।"  

नदी पार करके, चंगेली-सूती द्वीप पर उन्होंने नाव को झाड़ियों के बीच में छुपा दिया। इस द्वीप के चप्पे-चप्पे को वह अच्छी तरह पहचानते हैं। तब तक क्षितिज पर अँधेरा कम गहरा होने लगा था। यहाँ भी वह पेड़ों और झाड़ियों के बीच से छाया की तरह निकले। द्वीप पर इक्का-दुक्का घर ही हैं, लेकिन वहाँ कुत्ते हैं, इसलिए वह उन घरों से दूर से, लम्बा चक्कर लगा कर गये।

द्वीप के दूसरे किनारे पर, उन्होंने एक झोपड़ी के बाहर चारपाई पर सोये एक आदमी के कँधे पर हाथ रख कर जगाया, फुसफुसा कर बोले,  “जागो शिबेन, सुबह हो गयी, अभी तक सो रहे हो?”

शिबेन उन्हें कई सालों से जानता है। हर बार वह ऐसे ही आते हैं, सुबह मुँह-अँधेरे, और उसे इसी तरह जगाते हैं। वह आँखे मलते हुए, उबासी लेते हुए उठा। पहले उनके पैर छूए, बोला, “कैसे हो बाबा? इस बार इधर बहुत दिनों के बाद आये?”

उसे पता है कि अक्सर वह भिक्षुक-वस्त्र उतार कर, भेस बदल कर आते हैं। कभी वह गँजे सिर वाला बूढ़ा बनते हैं, तो कभी लम्बी मूछों वाला पहलवान। बाबा ने उसे बताया था, “कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं, वह मुझे मारने की धमकी देते हैं, इसलिए आश्रम से बाहर निकलूँ तो मुझे भेस बदलना पड़ता है। कोई तुमसे मेरे बारे में पूछे तो कहना कि मुझे नहीं जानते, कि मैं तुम्हारे यहाँ कभी नहीं आया।"

आज शिबेन ने जब उनका भेस देखा तो हँसने लगा, “आज क्या बने हैं? गाँव वाले या मछुआरा? जो भी है, आप ने अच्छा भेस बनाया है, बिल्कुल पहचान में नहीं आते। कहिये, आज किधर जाना है?”

“जल्दी चलो, मुझे चापोड़ी में किसी से मिलने जाना है।"

“एक चाय भी नहीं पीयेंगे?”, शिबेन ने पूछा। सुबह-सुबह बिना चाय पीये उसका काम करने का मन नहीं करता।

बाबा बोले, "आज नहीं, मुझे जल्दी है।"

तब उसने एक बाल्टी से पानी ले कर अपना मुँह धोया। उसकी नाव नदी के तट पर एक खूँटे से बँधी थी। उन्हें नाव में बिठाया और तेज़ी से उसे मिस्सामोरा-चापोड़ी के घाट की ओर ले गया। वहाँ पहुँचने में उन्हें करीब बीस मिनट लगे।

जब वह नाव से उतरे तब तक पूर्व में पेड़ों के पीछे से आकाश में हलकी सी लालिमा झलकने लगी थी। उसे पैसे दे कर वह आगे बढ़े।

चापोड़ी से उन्हें नारायणपुर जाना है, लेकिन वहाँ जाने वाले आटो इतनी सुबह नहीं मिलते। घाट के पास दो-तीन ढाबे हैं, बाबा उनमें से एक ढाबे पर गये और चाय के लिए कहा। वहाँ उन्हें किसी ने नहीं पहचाना। चाय का कुल्हड़ ले कर, वह वहाँ चुपचाप अलग हो कर बैठे, कम्बल सिर पर लपेट लिया, किसी से बात नहीं की। 

जब सूरज आकाश में ऊपर चढ़ा और सड़क पर लोग आने-जाने लगे तो आटो वाले भी आ गये। तब वह भी उठे और नारायणपुर के लिए आटो खोजने निकले।

इस यात्रा का निर्णय उन्होंने आज सुबह-सुबह ही किया था। पता नहीं क्यों उनकी नींद समय से पहले खुल गयी थी और उनके भीतर से विचार उठा था कि आज उन्हें नारायणपुर जाना चाहिये। वह अपने अंतरमन को जानते हैं, इसलिए जब उन्हें ऐसे संकेत मिलते हैं तो वह सोचते नहीं हैं, उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे संकेतों ने पहले कई बार उनकी जान बचायी है।

वह डकरोंग पोस्ट आफिस वाली सड़क के कोने पर आटो से उतरे और सीधा ब्राइट बुक स्टोर की ओर बढ़े। दुकान अभी बंद थी, लेकिन उसके साथ जो सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं, उनका दरवाज़ा खुला था। वह सीढ़ियाँ चढ़े और ऊपर जा कर घर का दरवाज़ा खटखटाया।

एक लड़के ने दरवाज़ा खोला, वह उन्हें पहचान नहीं पाया, पूछा, “कौन हो तुम? क्या चाहिये?”

बाबा ने धीरे से कहा, “बेटा, अपने दादू से कहो कि जामुन बाबा आये हैं।"

उनका नाम सुन कर वह लड़का उन्हें पहचान गया, बोला, “बाबा, आज आप ने यह कैसा भेस बनाया हैं? आईये, भीतर आ जाईये।”

उन्हें बिठा कर वह भीतर अपने दादा जी को जगाने गया और दो मिनट बाद लौटा, बोला, “दादू अभी आते हैं।"

थोड़ी देर के बाद ब्राइट बुक स्टोर के मालिक बोरा साहब, हाथ-मुँह धो कर बाहर आये, हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया और बोले, “बाबा, नीचे चलते हैं, आप की एक चिट्ठी आयी थी, वह वहीं रखी है।" फ़िर उन्होंने अपने पोते को आवाज़ लगायी, “छोटू, माँ से कहो कि चाय बना दे और उसे नीचे ले आओ।"

बोरा साहब भी उनकी भेस बदलने की आदत को जानते हैं, बोले, "आज भेस बदलने के लिए आप को साफ़ कपड़े नहीं मिले थे क्या?”

नीचे सीढ़ियों के पीछे से दुकान में जाने का भीतरी दरवाज़ा है, उन्होंने उसका ताला खोला, बत्ती जलायी और बाबा को भीतर बिठाया। फ़िर दराज़ से एक चिट्ठी निकाल कर उन्हें दी, कहा, “यह आप की यह चिट्ठी है, पिछले हफ्ते आई थी।"

बाबा ने चिट्ठी ली, देखा कि त्री की है और उसे अपने झोले में रख लिया। फ़िर उस झोले से एक प्लास्टिक का डिब्बा निकाला, बोले, “आप की दीदी ने आप के लिए यह गोंद के लड्डू बना कर भेजे हैं।"

बोरा साहब की बड़ी बहन विधवा हैं। वह मुश्किल में थीं, क्योंकि उनके बेटे की बहू उनसे बुरा व्यवहार करती थी। बोरा साहब बहन के लिए बहुत चिंतित थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उसकी कैसे मदद करें। तब बाबा ने उनकी बहन को अपने वृद्धाश्रम में जगह दी थी। इस तरह से उनकी जान-पहचान बनी थी।

डिब्बे को ले कर बोरा साहब की बाछें खिल गयीं, बोले, “ऐसे लड्डू मेरी माँ बनाती थी, इन्हें खाता हूँ तो बचपन के दिन याद आ जाते हैं। माँ कहती थीं कि इनसे जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है, इसलिए सर्दियों में इन्हें बनाती थी। वही परम्परा अब दीदी चला रही हैं।"

तब तक ऊपर से उनका पोता चाय ले कर आ गया। उसे पीते हुए उन्होंने कुछ देर तक वृद्धाश्रम की बातें कीं। 

बोरा साहब बोले, “पहले घरों के बड़े-बूढ़े, हमारे परिवारों का हिस्सा होते थे, यहाँ पूरे क्षेत्र में कोई वृद्धाश्रम नहीं था क्योंकि उसकी आवश्यकता ही नहीं थी। लेकिन आजकल हमारे बच्चे शहरों में रहने चले जाते हैं, और उनके बूढ़े माता-पिता घर में अकेले रह जाते हैं। कई बार, पैसे न होने से, बेचारे सड़कों पर रहने और भीख माँग कर जीने के लिए बाध्य होते हैं। गुवाहाटी में मैंने देखा, कि बहुत से बूढ़े लोग पुलों के नीचे रहते हैं।"

बाबा बोले, "इसीलिए हर महीने हमारे यहाँ एक-दो नये लोग आ रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि हमारा वृद्धाश्रम आत्मनिर्भर होना चाहिये, ताकि मेरे बाद भी वह चलता रहे।"

बोरा साहब बोले, “लेकिन आप का स्वास्थ्य तो ठीक चल रहा है न?”

बाबा हँसे, बोले, “स्वास्थ्य तो ठीक है लेकिन उम्र हो रही है। पतझड़ का पत्ता, पता नहीं कब वृक्ष से गिर जाये? इसलिए वृद्धाश्रम की सारी ज़िम्मेदारी उनके सहकारी संघ को सौंपी है।"

थोड़ी देर तक बातें करने के बाद बाबा उठ खड़े हुए, "अच्छा बोरा साहब, अब मैं चलता हूँ, मुझे आश्रम के लिए बाज़ार से कुछ सामान खरीदना है। ईश्वर चाहेंगे तो अगली बार मुलाकात होगी।" यह कह कर वह उन्हें हाथ जोड़ कर दुकान से बाहर निकल आये।

बोरा साहब भी उनके साथ बाहर आये, बोले, “दीदी को मेरा प्रणाम कहियेगा, मुझे जैसे ही मौका मिलेगा, मैं उनसे मिलने आऊँगा।"

अचानक बाबा को करंट सा लगा। ऐसा लगा मानो किसी ने उनके दिमाग के भीतर उन्हें बिजली से छुआ हो। जैसे ही वह अनुभूति महसूस हुई, उनका आत्म-संयम और प्रशिक्षण ऐसे थे कि उन्हें सोचना नहीं पड़ा, उन्होंने तुरंत अपने मस्तिष्क की शक्ति-लहर को ढक लिया। वह समझ गये कि किसी ने अन्वेषण-किरण की शक्ति से उनके मस्तिष्क को छुआ है।

बोरा साहब ने बाबा के चेहरे पर पीड़ा का भाव देखा, बोले, “क्या हुआ बाबा? तबियत ठीक नहीं है?”

जामुन बाबा समझ गये थे कि कोई उन्हें खोजते हुए नारायणपुर आया है। कुछ ही देर में वह यहाँ भी आयेगा और बोरा साहब से उनके बारे में पूछताछ करेगा। इसलिए उन्हें और उनके परिवार को इस खतरे से बचाने के लिए यहाँ से कहीं दूर भेजना चाहिये।

वह बोले, “देव-कृपा से मुझे आने वाले खतरों के संकेत मिल जाते हैं। मुझे लगता है कि एक जानलेवा खतरा आप के परिवार की ओर आ रहा है। आप घर लौटिये और जल्दी से अपना सामान तैयार कीजिये, मैं तुरंत आप के लिए गाड़ी का प्रबंध करता हूँ। आप सब लोग आज सुबह ही एक सप्ताह के लिए गुवाहाटी चले जाईये, मैं आप के लिए वहाँ रहने का प्रबंध भी कर दूँगा। जाने से पहले अड़ोस-पड़ोस में सबसे झूठमूठ कह दीजिये कि आप लोग एक महीने के लिए दिल्ली जा रहे हैं। मेरी बात समझ गये? जैसा मैंने कहा है, वैसा करिये। मैं आप सब के लिए प्रार्थना करूँगा कि आप का अमँगल न हो।"

“कैसा खतरा?”, बोरा साहब घबरा गये, “क्या होने वाला है?”

“अभी बात करने का समय नहीं है, जब विपदा टल जायेगी तब आप को बताऊँगा। अभी आप तुरंत घर जाईये और एक सप्ताह के लिए सामान तैयार कर लीजिये।"

बोरा साहब सीढ़ियों की ओर भागे और बाबा ने अपनी जान-पहचान वाले ट्रैवल-एजैंट को फोन करके बोरा साहब के लिए कार और गुवाहाटी में रहने का प्रबंध करने के लिए कहा, फ़िर तेज़ चल कर उसी सड़क पर थोड़ा आगे गये।

सड़क की बायीं ओर एक झोपड़ी थी, जिसके बाहर एक महिला एक चबूतरे पर कपड़े प्रेस कर रही थी, पास में एक चारपाई बिछी थी। बाबा ने स्वर को कातर बना कर उसे कहा, “बेटी, मुझे चक्कर आ रहे हैं, मेरी तबियत ठीक नहीं है। मैं उधर नाली के पास थोड़ी देर बैठ कर आराम कर लूँ?"

“उधर गन्दगी में मत बैठो, यहाँ चारपाई पर लेट जाओ", वह महिला बोली और झोपड़ी से उनके लिए एक लोटे में पानी ले आयी।

बाबा चारपाई पर लेट गये, शरीर को कँबल से ढक लिया, बोले, "बस थोड़ी देर आराम कर लूँ, फ़िर चला जाऊँगा।" उनकी दृष्टि गली के दूसरे सिरे पर, बोरा साहब की दुकान पर लगी थी। वह महिला वापस अपने कपड़े प्रैस करने के काम में लग गयी।

अभी तक बाबा को यामागुचि के भेजे आदमियों से बच कर भागने में दिक्कत नहीं हुई थी। लेकिन वह समझ गये कि इस बार उनका पीछा करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। इस बार यामागुचि ने जिस आदमी को उन्हें खोजने भेजा है, उसके पास अन्वेषण-किरण की गुप्त-शक्ति है, इस बार उन्हें बहुत सावधान रहना पड़ेगा।

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अगला भाग बृहस्पतिवार 11 जून 2026 को प्रकाशित होगा। 

2 टिप्‍पणियां:

"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.

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