गुरुवार, जून 04, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 02

अध्याय 02 

टोकियो, जापान, 1 जनवरी 2026

नये वर्ष के पहले दिन, रिकू यामागुची ने ताकानोरी को टेलीफोन करके अपने घर बुलाया, “ओरी सान, तुम्हारे लिए एक काम है।"

ओरी ने रात को देर तक जश्न मनाया था और सुबह तीन बजे थक कर, दो युवतियों के साथ सोने गया था। फ़िर भी, हर रोज़ की तरह वह सुबह सात बजे उठ कर तैयार हो कर दोजो में व्यायाम करने गया था। 'दोजो' एक पाराम्परिक व्यायामशाला है, जहाँ वह प्रतिदिन सशस्त्र और शस्त्रहीन लड़ाई के अभ्यास करता है।

वहाँ जाते हुए वह सोच रहा था कि वह तीस साल का हो चुका है, अब यह मारा-मारी और लड़ाई के काम वह अधिक दिनों तक नहीं कर पायेगा। लेकिन अगर वह यह नहीं करेगा तो क्या करेगा? उसने बचपन से केवल यही सीखा है। सब जानते हैं कि उसके जैसा काबिल खूनी पूरे टोकियो में, या शायद पूरे जापान में और कोई नहीं है।

जिस काम को कोई और नहीं कर पाता, वह कर लेता है। उसके शिकार कितनी भी कोशिश कर लें, वह उनकी छिपी हुई कमज़ोरियों में से, उन्हें मारने का कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। जापानी भाषा में उसके जैसे लोगों को याकूज़ा कहते हैं लेकिन वह अपने आप को समुराई-योद्धा मानता है। किसी में हिम्मत नहीं है कि उसके मुँह पर उसे याकूज़ा कह सके।

दोजो में उसके गुरु जी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, उसने झुक कर उनका अभिवादन किया। उसके गुरु जी उसे बचपन से जानते हैं, उन्हें वह पिता समान मानता है। उस दिन जब उसने अभ्यास पूरा किया और वहाँ से जाने लगा तो गुरु जी ने उसे रुकने का इशारा किया, झुक कर बोले, “ओरी सान, आज मेरा यहाँ आखिरी दिन है, मैं तुमसे विदा लेता हँ।"

ओरी को उनकी बात समझ में नहीं आयी, पूछा, “आखिरी दिन? इसका क्या मतलब?”

“यामागुचि सान का आदेश है। वह कहते हैं कि मेरे रिटायर होने का समय आ गया है।"

यामागुचि सान, यानि रिकू यामागुचि। रिकू जानता है कि गुरु जी उसके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, उसने यह जानबूझ कर किया है। ताकानोरी के मन में आग सी लग गयी, एक क्षण के लिए उसने सोचा कि वह जा कर उसे मार डाले।

गुरु जी उसके मन की बात बिना कहे ही समझ गये, उसकी बाजू पर हाथ रखा, धीरे से बोले, “क्रोध में दिमाग काम नहीं करता, कुछ करने से पहले ठँडे दिमाग से सोचो। यह सच है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ और इस दोजो को नये और जवान शिक्षकों की आवश्यकता है। आज नहीं तो कल मुझे रिटायर होना ही है। लेकिन तुम इतने सालों से उनके लिए वफ़ादारी से काम करते हो, यामागुचि सान को मुझे यह बात कहने से पहले तुमसे बात करनी चाहिये थी।"

“मैं अब उसके लिए काम नहीं करूँगा।"

गुरु जी ने सिर हिला कर मना किया, बोले, “समझदार व्यक्ति जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लेता। शायद वह चाहते हैं कि तुम गुस्से में ऐसा कोई निर्णय लो? तुम उसका उल्टा करो, उन्हें ऐसे दिखाओ कि तुम्हें मेरी कुछ परवाह नहीं है, और यह समझने की कोशिश करो कि वह तुम्हें रास्ते से क्यों हटाना चाहते हैं?”

चौबिस सालों से वह गुरु जी का शिष्य रहा है। उनके बिना उसे यह दोजो ही नहीं, अपना जीवन भी अधूरा सा लगेगा। वह सोच में पड़ गया।

गुरु जी बोले, “ओरी सान, मुझे वचन दो कि तुम जल्दबाजी में कुछ नहीं करोगे।"

ताकानोरी ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी।

अंत में जाते हुए वह बोले, "मैं आज-कल में अपने गाँव लौट जाऊँगा। जब तुम्हें समय मिले, तब मुझसे मिलने घर आना। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।"

कुछ घंटे बाद, ताकानोरी घर में बैठा था जब रिकू का टेलीफोन आया। तब तक उसका गुस्सा ठँडा हो गया था। उसने फैसला किया कि जैसी सलाह गुरु जी ने दी है, वह रिकू से गुरु जी के बारे में कुछ नहीं कहेगा।

उसने जल्दी से कपड़े पहने और यामागुचि सान के घर आया। उनका घर ऊँची चारदीवारी से घिरा है, और चारों ओर पहरेदार हैं। भीतर अलग-अलग घर बने हैं। यामागुचि दादा जी करीब नब्बे साल के हैं, और कोने वाले छोटे से घर में रहते हैं। उनकी यादाश्त कमज़ोर हो गयी है, इसलिए उनके साथ हमेशा एक नर्स रहती है। वह पहले उनसे मिलने गया।

दादा जी की सभी नर्सें उसे पहचानती हैं। रिकू की तरह वह भी उन्हें ओजीसान यानि दादा जी बुलाता है। जब वह वहाँ पहुँचा तो वह नाश्ता कर रहे थे। उसे देख कर मुस्कराये तो वह बोला, “ओजीसान, कैसे हैं आप?”

दादा जी, सब को देख कर मुस्कराते हैं लेकिन किसी को पहचानते नहीं हैं। वह कुछ नहीं बोले, चुपचाप नाश्ता करते रहे।

ताकानोरी अपने पिता की मृत्यु के बाद पैदा हुआ था और अक्को शहर में अपनी माँ के साथ रहता था। उसके पिता भी यामागुचि परिवार के लिए काम करते थे। उस समय यामागुचि दादा जी सारा काम देखते थे। उनके कई धँधे थे - जूएघर चलाना, वैश्याघर और एस्कोर्ट का धँधा, नशीले पदार्थों की तस्करी और बेचना, और लोगों के खून करवाना। दादा जी उसकी माँ को घर चलाने के लिए पैसे देते थे। उनका पोता रिकू जिस स्कूल में पढ़ता था, उन्होंने ताकानोरी को उसी स्कूल में पढ़ने भेजा था।

जब वह सात साल का था, जब दादा जी ने उसकी गुप्त-शक्ति को पहचान लिया था और कहा था कि वह उनके लिए काम करेगा। उसे मार्शियल आर्ट और विभिन्न शस्त्रों की ट्रेनिन्ग दी गयी थी। लेकिन गुप्त-शक्ति के बारे में दादा जी की जानकारी सीमित थी और उनकी अपनी शक्ति विशेष प्रबल नहीं थी, इसलिए वह उसकी शक्ति को पूरा विकसित नहीं करा पाये थे।

ताकानोरी की दो गुप्त-शक्तियाँ हैं, लोगों के मन की बात को पढ़ना और दूर से गुप्त-शक्ति वाले व्यक्तियों की शक्ति-लहरों को खोजना। लेकिन उसकी इन शक्तियों के बारे में दादा जी भी पूरी तरह से नहीं जानते थे।

जब उसकी स्कूल की पढ़ाई पूरी हुई थी, तब तक दादा जी रिटायर हो गये थे और उनका बेटा बिज़नेस चलाता था। एक साल पहले, एक दर्घटना में उनके बेटे के सिर में चोट आयी थी। उसके बाद से बिज़नेस की ज़िम्मेदारी रिकू ने सम्भाल ली है। वह ओरी से करीब दस साल बड़ा है।

ओरी को लगता है कि रिकू उससे जलता है। उनके धँधे में उसका बहुत नाम है, जिसे कोई नहीं मार पाता, उसे वह मार सकता है। शायद रिकू को यह बात अच्छी नहीं लगती?

दादा जी के पास कुछ देर बैठ कर, वह रिकू से मिलने आया। वह भीतर घुसा तो देखा कि रिकू चटाई पर पालथी मार कर बैठा चाय पी रहा है।

“कोन्नीछिवा बॉस", कह कर उसने हलका सा झुक कर, मुस्कराते हुए उसका अभिवादन किया।

शायद रिकू सोच रहा था कि वह गुस्से में होगा और उसे मुस्कराता देख कर उसे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ। वह बोला, “ओजीसान से मिल आये? आओ, यहाँ बैठो", और उसके लिए चाय लाने का इशारा किया, “तुम्हारे लिए एक विषेश काम है, तुम्हें तुरंत इंडिया जाना है और वहाँ से हमारे लिए एक प्रतिमा खोज कर लानी है।"

एक प्रतिमा? उसने सोचा कि वह याकूज़ा है, इस तरह के छोटे-मोटे काम के लिए क्या उनके पास अन्य व्यक्ति नहीं हैं? लेकिन गुरु जी की बात को याद करके, वह कुछ नहीं बोला, चुपचाप रिकू की ओर देखता रहा।

“पिता जी कहते हैं कि यह काम तुम्हें सौंपना चाहिये, वह सोचते हैं कि तुम उस मूर्ति को पहचान लोगे क्योंकि उसमें कुछ विशेष शक्ति है। हम उसे बहुत सालों से खोजने की कोशिश कर रहे हैं। कई बार हमें उसकी खबर मिली, लेकिन हर बार वह भिक्षुक हमसे बच कर भाग गया। अब यह काम तुम्हें करना है।"

"इतने सालों के बाद, हमें उस भिक्षुक का पता कैसे चला?” ओरी ने पूछा।

“तुम हरूकी को जानते हो? उसने उस भिक्षुक को एक वीडियो में देख कर पहचान लिया और हमें खबर की। बहुत साल पहले, एक बार हरूकी उस भिक्षुक को पकड़ने थाईलैंड गया था, पर वह उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही भाग गया था। यह वीडियो हिन्दुस्तान के उत्तर-पूर्व में जोरहाट नाम के शहर से है। तुम्हें वहाँ जा कर उस भिक्षुक को खोजना है और उस प्रतिमा को लाना है। किसी भी कीमत पर हमें वह मूर्ति चाहिये। कहते हैं कि उस भिक्षुक के पास कोई गुप्त शक्ति है, इसीलिए वह किसी की पकड़ में नहीं आता।"

“गुप्त शक्ति?”

“इस बात में कितना सच है, मैं नहीं जानता।"

ओरी ने अपना चेहरा निर्विकार रखा लेकिन यह बात सुन कर उसके मन में खलबली सी मच गयी। उसने अपनी शक्तियों को सबसे छुपाया है। अगर भिक्षुक में उसके जैसी कोई शक्ति है, तो उससे इस बारे में बात करना बहुत दिलचस्प हो सकता है।

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उपन्यास का अगला भाग सोमवार 08 जून 2026 को प्रकाशित होगा।  

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