करीब तेरह साल पहले मुझे पैरिस से पृथ्वीन्द्र मुखर्जी की ईमेल मिली, कि उनके दादा बाघा जतिन पर फ़िल्म निर्देशक हरिसाधन दासगुप्ता ने एक फ़िल्म बनायी थी और वह हरिसाधन जी के पुत्र फ़िल्म निर्देशक राजा दासगुप्ता का सम्पर्क खोज रहे थे। मैंने बचपन में बाघा जतिन का नाम सुना था लेकिन उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, बस इतना जानता था कि वह अंग्रेज़ी सरकार से लड़ने वाले एक क्राँतिकारी थे। मैंने सोचा कि बाघा जतिन के पौत्र से सम्पर्क हुआ है तो इसका फायदा उठाना चाहिये और उनसे उनके दादा के बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिये।
इस तरह से पृथ्वीन्द्र जी से कुछ संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। तब मैं एक शोध रिपोर्ट पर काम कर रहा था, सोचा कि उसे पूरा करके पृथ्वीन्द्र जी से बातचीत करूँगा लेकिन जैसा अक्सर होता है, कुछ दिनों में मैं इस बात को भूल गया। दो साल पहले जब उनके देहांत की खबर पढ़ी तो अपनी वह पुरानी बातचीत याद आयी, बहुत दुख हुआ कि मैंने उस समय उनसे बात क्यों नहीं की।कुछ ऐसा ही मेरे साथ पहले भी एक बार हुआ था जब मैंने दिल्ली में मित्र कर्बान अली से कहा था कि जब दिल्ली आऊँगा तो उनके पिता जी कप्तान अब्बास अली से बातचीत करने आऊँगा। कप्तान अब्बास अली जी ने 1940 के दशक में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद हिंद फौज में भाग लिया था, वहीं पर वह कप्तान बने थे। जब 2014 में उनकी मृत्यु की खबर मिली थी तब भी यही दुख हुआ था कि समय रहते उनसे क्यों नहीं मिला था।
खैर इस बार मैंने सोचा कि बाघा जतिन के बारे में इंटरनैट पर खोज करके लिखूँ। यही सोचते-सोचते दो साल बीत गये हैं, पर आखिर में वह आलेख लिखने का समय मुझे मिल ही गया।
बाघा जतिन - जतिन्द्रनाथ मुखर्जी
जतिन्द्रनाथ का जन्म सन् 1879 में उनकी ननिहाल कुष्टिया जिले के केया गाँव में हुआ था। उनका पैतृिक घर वहाँ से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में साधुहाटी में था, जहाँ वह बड़े हुए। यह दोनों जगहें अब बँगलादेश के खुलना डिविज़न का हिस्सा हैं। हाई स्कूल के बाद 1895 में वह कलकत्ता सैंट्रल कॉलेज में पढ़ने गये।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में वह स्वामी विवेकानन्द और बहन निवेदिता से मिले। स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त उनकी मुलाकात अरविंदो घोष, रासबिहारी बोस आदि व्यक्तियों के सम्पर्क में आये। इस तरह से वह भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले युगांतर अभियान तथा अनुशीलन समिति से जुड़े और भारत के स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बन गये। अनुशीलन समिति में बंकिमचन्द्र चैटर्जी और स्वामी विवेकानन्द के हिन्दू-शक्ता आध्यात्मिक विचारधारा की सोच वाले लोग थे जो स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्राँति का रास्ता खोज रहे थे।1906 में अपने गाँव से लौटते समय जतिन्द्रनाथ का जँगल में एक बाघ से सामना हुआ और वह अपनी छुरी से उसे मारने में सफल हुए जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ सरकार की ओर से बाघ का खिताब मिला और लोग उन्हें बाघा जतिन बुलाने लगे।
1908-09 में मुज़्ज़फरपुर के मजिस्ट्रेट की हत्या की साजिश का मुकदमा चला जिसमें अरविंद घोष के साथ अन्य आरोपियों में जतिन्द्रनाथ भी थे। इस मुकदमें में अनुशीलन समिति को बैन कर दिया गया, बहुत लोगों को सजा मिली लेकिन जतिन्द्रनाथ को सबूत न मिलने पर बरी किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें "हावड़ा-शिवपुर साजिश" के मुकदमें में दोबारा गिरफ्तार किया गया और वह ग्यारह महीनों तक हावड़ा जेल में रहे।
उन्होंने जर्मनी में हथियारों के लिए सम्पर्क किया लेकिन अंग्रेज़ों को उनके हथियारों के आने की खबर मिल गयी, और उनकी फौज से संघर्ष करते हुए 10 सितम्बर 1915 को जतिन्द्रनाथ का देहांत हो गया, उस समय वह छत्तीस साल के थे।
बाघा जतिन के पौत्र पृथ्वीन्द्र मुखर्जी
सन् 1900 में जतिन्द्रनाथ का विवाह इन्दुबाला बैनर्जी से हुआ, उनके चार बच्चे हुए, एक बेटी आशालता और तीन बेटे, अतीन्द्र, तेजेन्द्र और बिरेन्द्र। जिस समय जतिन्द्रनाथ की मृत्यु हुई, तेजेन्द्रनाथ उस समय केवल छह साल के थे। उनके पहले पुत्र अतीन्द्र की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी, इसलिए तेजेन्द्र को उनका बड़ा बेटा मानते हैं।
तेजेन्द्रनाथ के तीन बेटे थे, रथीन्द्रनाथ, पृथ्वीन्द्रनाथ और ध्रितीन्द्रनाथ।
पृथ्वीन्द्र का जन्म 20 अक्टूबर 1936 में हुआ। जब वह पाँच साल के थे उन्हें पोलियो हो गया जिससे उनकी टाँग कमज़ोर हो गयी और वह चल या खड़े नहीं हो पाते थे। उनके मामा प्रबोधकुमार चैटर्जी ने उन्हें विज्ञान पढ़ाया और उनके फूफा ललितकुमार रायचौधरी ने उन्हें संस्कृत पढ़ायी। जब वह बारह वर्ष के थे जब वह परिवार के साथ पाँडेचैरी में अरविंद आश्रम में रहने आये और वहाँ पढ़ाई पूरी करके 1956 से श्री ओरोबिन्दो आश्रम के अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र में तीन भाषाएँ (अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी) पढ़ाने लगे।पृथ्वीन्द्र को बचपन से कविता लिखने का शौक था, वह बंगाली और अंग्रेज़ी में कविता लिखते थे। 1955 में उन्होंने भारत में गाँधी जी से पहले, विषेशकर स्वामी अरविंद और अपने दादा जतिन्द्रनाथ के समय में भारत की स्वतंत्रता की कोशिशों के बारे में शोध करना शुरु किया। यह शोध पहले एक बंगाली पत्रिका बासुमति और फ़िर पुस्तक रूप में छपा। साथ ही उनका कविता लेखन चलता रहा और बंगाली व अंग्रेज़ी कविताओं के संकलन भी छपे। साथ ही वह फ्राँसिसी के कुछ प्रसिद्ध लेखकों की किताबों का बंगाली में अनुवाद कर रहे थे। इस तरह से पच्चीस वर्ष के होते-होते वह कवि, लेखक और अनुवादक के रूप में जाने जाने लगे।
पृथ्वीन्द्र को बचपन से संगीत में भी रुचि थी। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन और पश्चिमी संगीत दोनों सीखे। वह भारतीय रागों और पश्चिमी संगीत के सिद्धातों को मिला कर संगीत रचना चाहते थे। इस तरह से वह भारतीय-पश्चिमी मिला-जुला आरकेस्ट्रा बना कर उनकी कन्सर्ट आयोजित करने लगे और उन्होंने श्री ओरोबिन्दु आश्रम का बैंड-दल बनाया।
तीस वर्ष की आयु में 1966 में फ्राँसिसी सरकार की छात्रवित्ति ले कर वह पैरिस पहुँचे। फ्राँस में उनकी टाँग के आपरेशन भी हुए जिससे उनके लिए बैसाखी से चलना कुछ आसान हो गया। वहाँ उन्होंने 1970 में श्री ओरोबिन्दो के दर्शन पर पीएचडी की, और उसके बाद पैरिस के विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे, साथ ही रेडियो के कार्यक्रम तथा पत्रकारिता में लग गये। 1981 में उन्हें फुलब्राईट छात्रवित्ति मिली जिससे वह अमरीका गये। फ्राँस लौटने के बाद वह पैरिस में बँगाली पढ़ाने लगे। उन्होंने अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी भाषाओं में करीब सत्तर पुस्तकें लिखीं। उन्हें श्री ओरोबिन्दो पुरस्कार, फ्राँस सरकार से शिवालिएर और भारतीय सरकार से पद्मश्री सम्मान मिले।
पृथ्वीन्द्र ने दो विवाह किये और उनके तीन बच्चे हुए, दो बेटियाँ अद्या और अमृता, और एक पुत्र, अर्जव।
अंत में - बाहरी क्राँति से आंतरिक क्राँति
जतिन बाघा की कहानी स्वामी अरविंद या ओरोबिन्दो से जुड़ी हुई है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में दोनों सशस्त्र क्राँति की बात कर रहे थे। स्वामी ओरोबिन्दो को 1908 में अलीपुर बम्ब विस्फोट केस में जेल हुई। जतिन को 1910 में हावड़ा-शिबपुर केस में। स्वामी ओरोबिन्दो को जेल में आध्यात्मिक ज्योति मिली, जब वह बाहर आये तो वह बदल चुके थे। वह भारत की स्वतंत्रता की बात करते थे, पर वह आत्मा के विकास और स्वाधीनता के प्रति अधिक सजग थे। जतिन बाघा ने शस्त्र क्राँति का सपना नहीं छोड़ा और 1915 में पुलिस की गोलियों से घायल हो कर उनका देहांत हुआ। उनके पोत्र पृथ्वीन्द्र, अपनी माँ तथा भाईयों के साथ पाँडेचैरी के स्वामी ओरोबिन्दो के आश्रम में बड़े हुए और उनका परिवार आजीवन "माँ" (मिर्रा अलफस्सा, स्वामी ओरोबिन्दो की संगनी) के आध्यात्मिक सानिध्य में रहा।
यानि सोचिये कि शस्त्र क्राँति या देश की स्वाधीनता की कामना, कहीं पर आत्मा की क्राँती के साथ कब, क्यों और कैसे जुड़ जाती है?
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नोट: इस आलेख में उपयोग की गयी तीनों तस्वीरें इंटरनेट से साभार ली गयी हैं
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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.