रविवार, जुलाई 03, 2005

खोये हुए शब्द

हंगरी की सुप्रसिद्ध लेखिका अगोटा क्रिसटोफ स्विटज़रलैंड में रहती हैं. कम्यूनिस्ट शासन के दिनों में, १९५६ मे उन्हें अपना देश छोड़ कर परदेस मे शरण लेनी पड़ी थी और उनका सारा लेखन फ्रांसिसी भाषा मे है. उनकी प्रसिद्ध तीन किताबों की श्रिंखला है, "के का शहर" जिसे मैने कुछ वर्ष पहले पढा था. लिखने का अनोखा अंदाज़ है उनका. गिने चुने शब्द, छोटी पतली किताबें, छोटे छोटे, एक पन्ने या आधे पन्ने के अध्यायों में विभाजित. पर हर एक शब्द चुना हुआ, पैने चाकू की तरह जो दिल की गहराईयों मे घुस जाते हैं.
उनकी आत्मकथा आयी है, "अनपढ". इसमे अपने फ्रांसिसी भाषा मे लिखने के बारे मे अगोटा कहती हैं "सबसे बड़ा क्षय तब हुआ जब मुझसे मेरी मात्तृ भाषा खो गयी, चीज़ों की पहली भाषा, भावनाओं की, रंगों की, शब्दों की, पुस्तकों की, साहित्य की भाषा. जिस जैसी अन्य कोई भाषा नहीं. जो जब खो गयी तो साहित्य और लेखन भी खो जाते हैं, और हम फ़िर से अनपढ बन जाते हैं ..."
ऐसा ही कुछ लगता है मुझे. यह तो नहीं लगता कि मैं अनपढ हो गया हूँ पर एक एहसास अवश्य है कि अंग्रेज़ी या इतालवी भाषा में महसूस की गयी, सोची और लिखी गयी दुनिया हिंदी में महसूस की गयी दुनिया से भिन्न है. और अपनी भाषा के खोने का दुख भी था, जैसे शरीर का कोई अंग कहीं खो गया हो. धीरे धीरे शब्द खोने लगे थे. भारत से आया कभी कोई मिलता भी तो हिन्दी में कहने के शब्द खोजने से भी नहीं मिलते. कई बार मन मे कोई शब्द आता तो उसका हिन्दी का अर्थ घंटों सोचता रहता. एक बार "नटक्रेकर" को हिन्दी में क्या कहते हैं, यह कई दिनों तक सोचता रह गया था.
हिन्दी मे ब्लौग लिखना शुरु किया है तो धीरे धीरे खोये हुए शब्द वापस आने लगे हैं. अभी भावों की अभिव्यक्ति ठीक तरह से नहीं होती है, कई बार रुक कर सोचना पड़ता है कि इसे हिन्दी मे कैसे कहते हैं. कभी लगता है कि वाक्य संरचना मन में इतालवी मे या अंग्रेज़ी में होती है जिसका अनुवाद हिन्दी मे हो जाता है और इसलिये वाक्य संरचना प्राकृतिक नहीं है. पर धीरे धीरे खोये हुए शब्द वापस आ रहे हैं. कल मन मे आया कि हिन्दी मे कहानी लिखूँ. बस सारा दिन छुट्टी का उसी कहानी के चक्कर मे निकल गया. रात को एक बजे जा कर सोया.
***
आज एक कविता दिल्ली की रुपाली सिन्हा की "मुक्ति", जो जून 2004 के हँस में छपी थीः
"तुमने कहा, विश्वास
मैंने सिर्फ तुम पर विश्वास किया
तुमने कहा,
वफ़ा
मैंने ताउम्र वफ़ादारी निभायी
तुमने कहा, प्यार
मैंने टूट कर तुमसे प्यार किया

मैंने कहा, हक
तुमने कहा सबकुछ तुम्हारा ही है
मैंने कहा, मान
तुमने कहा अपनों मे मान अपमान कहाँ ?
मैंने कहा, बराबरी
तुमने कहा,
मुझसे बराबरी ?
मैंने कहा, आज़ादी
तुमने कहा, जाओ मैंने तुम्हें सदा के लिए मुक्त किया."
***
और आज की तस्वीर है उत्तरी इटली की कोमों झील की

4 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दी मे ब्लौग लिखना शुरु किया है तो धीरे धीरे खोये हुए शब्द वापस आने लगे हैं.

    मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा था, कुछ महीने विदेश में था तो वहाँ हिन्दी में बात करते समय भी सीमित शब्दों का ही इस्तेमाल होता था, वहाँ के वातावरण के अनुसार। वापस भारत आ के इतने सारे हिन्दी बोलने वालों से बातचीत करके, वही पुराने, पर अलग अलग शब्द सुन के और फिर बोल के बहुत अच्छा लगा।

    आपने सही कहा कि भाषा सोचने का तरीका व दायरा बदल देती है।

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. भाषा और शब्द खोने लगते हैं, सच लग रहा है। अपने शब्दों को खो देना एक त्रासदी है। शब्द मानव की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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  4. एहसास अपनी भाषा में ही व्यक्त होते हैं!
    सुंदर पोस्ट!

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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