शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

भाषाओं के चक्रव्यूह

लूका का ईमेल आया कि वह भाषाओं पर शौध कर रहा है और मुझ से हिन्दी के बारे में बात करना चाहेगा, और साथ में कहा कि मेरा नाम उसे बोलोनिया विश्वविद्यालय में काम करने वाली मेरी एक पुरानी मित्र से मिला था, तो मैंने अधिक सोचा नहीं, हाँ कर दी.

आज सुबह उसके साथ चार घँटे गुज़ारे तो समझ में आया कि हम जिस भाषा को अपनी सोचते और कहते हैं, उसके कई पक्षों को ठीक से नहीं समझते और जानते. लूका हालैंड के उट्रेख्ट विश्वविद्यालय में शौध कर रहा है जहाँ दुनिया भर की भाषाओं को परखा जा रहा है. इस शौध में लूका को कुछ भारतीय भाषाओं के बारे में जानकारी जमा करने की ज़िम्मेदारी मिली है, जिनमें हिन्दी, पँजाबी, बँगला, तमिल, तेलगू और मलयालम भी हैं.

Luca Ducceschi, Italian researcher on Indian languages

पहले ही वाक्य का हिन्दी अनुवाद करते हुए मैं रुक गया. "I wash" का क्या अनुवाद करता? मैंने पूछा कि यह तो बताना पड़ेगा कि क्या धोना है, हाथ, मुँह या कपड़े, इसको जाने बिना इस वाक्य का हिन्दी अनुवाद नहीं हो सकता. लूका बोला, धोना नहीं, अंग्रेज़ी में तो इसका अर्थ हुआ कि मैंने नहाया. मैंने कहा कि शायद लंदन में पानी की कमी नहीं, उनके लिए नहाने और धोने में फ़र्क न हो, पर भारत में तो हम इसका अर्थ हाथ मुँह धोने के लिए करेंगे, या फ़िर कपड़े या प्लेट धोने के लिए करेंगे, जबकि अगर नहाना हो तो उसे "I take bath" कहना चाहिये!

"उसे" और "उससे" में क्या अंतर है, क्या आप ने कभी सोचा है? "मैंने उसे कहा" और "मैंने उससे कहा" में कौन सा वाक्य सही है? मेरा कहना था कि "उससे" अधिक ठीक है, पर लूका की हिन्दी व्याकरण की किताब में "उसे" और "उससे" का अंतर नहीं समझाया गया था. मैं यह तो माना कि इस वाक्य में उसे या उससे कुछ भी प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन उसके बाद, एक और प्रश्न पर मैं फ़िर अटक गया.

मैं बोला कि "मैंने उसे किताब दी" में तो केवल "उसे" का ही प्रयोग हो सकता है, और "मैंने उससे प्रश्न पूछा" में केवल "उससे" का ही प्रयोग होना चाहिये. तो लूका ने पूछा कि इसका नियम समझाओ, किस स्थिति में उसे का प्रयोग होना चाहिये, और किस स्थिति में उससे का? जितना अलग अलग वाक्यों के बारे में सोचता, उतना ही नियम स्पष्ट समझ नहीं आते. थोड़ी देर में लगने लगा कि उसके शौध में सहायता के लिए हाँ कह कर मैंने बेमतलब ही परेशानी अपने सिर पर ले ली थी.

अगले हिस्से के अनुवाद में तो और भी झँझट हुई. जिस वाक्य का अनुवाद करना था, वह था, "This woman (Mary) told that she (Mary) will win the race". मैंने अनुवाद किया, "इस औरत ने बताया कि वह दौड़ जीतेगी." लूका का कहना था कि जब "इस" की बात हो रही है तो इस वाक्य के दूसरे हिस्से में, "वह" की जगह "यह" का प्रयोग होना चाहिये. इस तरह के कितने ही वाक्यों पर बार बार अटकते रहे. मैं कुछ कहता और वह कहता कि यह बात अन्य भाषाओं से मेल नहीं खाती, अवश्य कुछ गलती होगी.

"This woman is in danger. She needs help." इसका मेरा अनुवाद था, "यह औरत खतरे में है. इसे मदद चाहिये." तो लूका बोला कि जब तुम पहले वाक्य में "वह" का प्रयोग करते हो, तो इस वाक्य में, "इसे" की जगह, "उसे" होना चाहिये. आखिर तंग आ कर मैं बोला कि मुझे बोलना आता है, हर बात के नियम और ऐसा क्यों होता है और वैसा क्यों नहीं होता, इसके उत्तर मैं नहीं दे सकता.

जो मैं कह रहा था, उसे लिखा कैसे जाये इस पर भी बहस हुई. जब "लड़की" लिखना था तो मैंने कहा कि "ladki" लिखो या "larki", क्योंकि अंग्रेज़ी में "ड़" की ध्वनि नहीं होती, तो वह बोला, पर हिन्दी को रोमन वर्णमाला में लिखने का नियम क्या है? मैंने कहा कि कोई नियम नहीं, जिसके जो मन में आये वह लिख लो. वह बोला कि जब तुम लोग ईमेल या एसएमएस में एक दूसरे को रोमन वर्णों में लिखते हो, तो बिना नियम के कैसे लिखते हो, और जिन हिन्दी शब्दों की ध्वनि अंग्रेज़ी में नहीं होती उसके लिखने के लिए जिससे किसी को कोई कन्फ़यूजन न हो, भारत सरकार ने कोई नियम क्यों बनाये, तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या कहूँ. भारत सरकार को हिन्दी के शब्दों को अंग्रेज़ी में कैसे लिखा जाये इससे अधिक अन्य महत्वपूर्ण काम करने होते होगे, मुझे नहीं लगता कि कोई इस पर नियम बना सकता है.

खैर जब काम समाप्त हुआ तो लगा मानो किसी चक्रव्यूह से निकल कर आया हूँ. पर बाद में सोच रहा था कि विभिन्न भाषाओं के बीच में काम करना कितना कठिन है. जब हम नयी भाषा सीखते हैं तो छोटे छोटे नियमों को सीखना तो आ जाता है, लेकिन जो भाषा बोलने से बनती है, जिसमें किस तरह कहा जाये यह नियम से अधिक आदत पर निर्भर होता है, तो वह किताबों से नहीं मिलता. सबसे अधिक बात जो मन को चु।भ रही थी वह थी कि जिसे मातृभाषा कहते हैं, उसके बारे में कितना कुछ नहीं जानते!

***

शुक्रवार, जनवरी 21, 2011

अलेसान्द्रा का प्रश्न

बोलोनिया में रहने वाली मेरी जान पहचान की अलेस्साँद्रा की कहानी आज कल हर दिन किसी न किसी अखबार पत्रिका या टीवी पर दिखायी जा रही है. अलेस्साँद्रा कहती है, "मेरा बस चलता तो मैं यह बात इस तरह से नहीं उठाती, लेकिन बात मेरे मानव अधिकारों की है और मैं पीछे नहीं हटूँगी."

हुआ यह कि अलेस्साँद्रा ने नगरपालिका दफ़्तर में अर्ज़ी दी अपना नया व्यक्तिगत पहचानपत्र यानि आई कार्ड बनाने की. नगरपालिका वालों ने कहा कि हम आप को आई कार्ड में विवाहित नहीं लिख सकते, आप को तलाक लेना पड़ेगा, आप का विवाह हमारे देश के कानून के हिसाब से गलत है.

Alessandra Bernaroli, Bologna, Italy

अलेस्साँद्रा कहती है, "क्या जबरदस्ती है, मैं क्यों तलाक लूँ? मैंने चर्च में भगवान के सामने शादी की है, फ़िर कोर्ट में सिविल विवाह किया है. हमने सुख दुख में साथ निभाने की कसम खायी है, जब हम दोनो खुश हैं तो हम क्यों तलाक लें, हम तलाक नहीं लेंगे."

इस कहानी को समझने के लिए हमें घड़ी की सूई को पीछे ले जाना पड़ेगा. 39 वर्ष पहले जब अलेस्साँद्रा पैदा हुई थी तो उसका नाम अलेस्साँद्रो रखा गया था. पर बचपन से ही अलेस्साँद्रो को समझ आ गया कि कुछ गलत था, उसका शरीर तो पुरुष का था लेकिन वह भीतर से स्वयं को स्त्री महसूस करता था. साथ ही उसे यह भी समझ आया कि समाज में इस तरह के लोगों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जाता, उनकी हँसी उड़ाई जाती है, शर्मनाम समझते हैं. इसलिए इस बात को उसने स्वयं से ठीक से नहीं स्वीकारा, बल्कि वर्ज़िश करना, पहलवानों वाला शरीर बनाना जैसे शौक पाल लिए. उसके माता पिता, दोनो अध्यापक हैं, लेकिन कुछ पुराने विचारों के थे और चूँकि कैथोलिक चर्च इस बात को ठीक नहीं मानता, तो उसने अपने भीतर की इस इच्छा को दबा और भुला दिया.

जब विश्वविद्यालय में पढ़ने गया तो वहाँ अलेस्साँद्रो की मुलाकात अपनी होने वाली पत्नी से हुई. जल्दी ही दोनो में प्यार हो गया, और दस वर्ष तक यह प्यार चला, फ़िर 2005 में दोनो ने वहले चर्च में विवाह किया फ़िर कोर्ट में सिविल विवाह भी किया. विवाह के कुछ समय बाद, उसमें इतनी हिम्मत आयी कि अपनी भावनाओं और इच्छाओं को इमानदारी से समझ सके, अपने आप को स्वीकार कर सके. उसने इस बात को अपनी पत्नी से बताया कि वह सेक्स बदल कर नारी बनना चाहता था.

"मेरी पत्नी बहुत हिम्मतवाली है, पर शर्माती है, इसलिए वह प्रेसवालों से कुछ नहीं कहना चाहती या मिलना चाहती. शुरु में उसे धक्का लगा, लेकिन फ़िर वह समझ गयी कि मैं जैसा भी हूँ मैं ही हूँ. तब से उसने हमेशा मेरा साथ दिया है, मेरे हर निर्णय को समझा है. मैंने अपने माता पिता से भी यह बात की, उन्हें भी धक्का लगा लेकिन फ़िर भी समय के साथ उन्होंने मुझे समझा, और मैंने लिंग बदलाव का रास्ता अपनाया."

लिंग बदलाव आसान नहीं. 2007 से ले कर अलेस्साँद्रा के 13 ओप्रेशन हुए हैं. अमरीका में जा कर गले का ओप्रेशन कराया जिससे आवाज़ औरत जैसे हुई. यौन हिस्से का ओप्रेशन थाईलैंड में हुआ. चेहरे के निचले भाग का भी एक नाज़ुक ओप्रेशन हो चुका है.

अलेस्साँद्रा कहती है, "शरीर का बाहरी बदलाव, यौन सम्बन्धों में बदलाव, यह सब आवश्यक हैं, लेकिन इन सबके साथ, एक बदलाव अपने अंदर भी है, जो आसान नहीं. आप किस तरह से दूसरों से बात करते हो, किस भाषा का प्रयोग करते हो, लोग आप से किस तरह बात करते हैं, जब पुरुष था तो यह भिन्न तरीके से होता था, अब नारी हो कर भिन्न होता है. पुरुष नारी से किस तरह मिलता बात करता है, और नारी पुरुष से किस तरह मिलती बात करती है, यह दोनो बातें भिन्न है, और मैंने समझी हैं. इनसे अलग मैंरे जीवन का एक हिस्सा है जो मैंने नारी और पुरुष दोनो की दृष्टि से देखा है. यह सब बातें बहुत जटिल हैं और कम शब्दों में नहीं समझायी जा सकती. इस विषय पर मेरे पास बहुत कुछ है कहने सुनाने को, मेरे मन में इस विषय पर किताब लिखने की इच्छा है."

Alessandra Bernaroli, Bologna, Italy

नर शरीर के साथ पैदा होना और अंदर से स्वयं को नारी महसूस करना या फ़िर, नारी शरीर के साथ पैदा होना पर भीतर से खुद को नर महसूस करना, इसे ट्राँसजेंडर कहा जाता है. अक्सर नर शरीर के साथ पैदा हुए हों पर भीतर से खुद को नारी महसूस करने वाले लोगों का यौन आकर्षण अन्य पुरुषों की ओर होता है, इसलिए अक्सर वह समलैंगिग माने जाते हैं, लेकिन अलेस्साँद्रो को प्यार हुआ एक लड़की से. पाँच साल पहले, दोनो ने चर्च में विधिवत विवाह किया. उस समय किसी ने उँगली नहीं उठायी क्योंकि उस समय अलेस्साँद्रो पुरुष थे और स्त्री से विवाह कर रहे थे. "शरीर की बाहरी और भीतरी यौन पहचान में अन्तर होना एक बात है, नर या नारी के लिए यौन आकार्षण महसूस करना अलग बात है", अलेस्साँद्रा समझाती है.

इटली में अधिकतर लोग कैथोलिक ईसाई हैं. इस धर्म में तलाक को आसानी से नहीं स्वीकारा जाता. साथ ही कैथोलिक चर्च समलैंगिकता के भी विरुद्ध है और समलैंगिक विवाहों को नहीं स्वीकारता. इन्हीं दो बातों से अलेस्साँद्रा का धर्मसंकट का प्रश्न उठा, क्योंकि उन्होंने बैंकाक जा कर पुरुष से नारी बनने की शल्यक्रिया करवाने के बाद, इतालवी कानून के हिसाब से कोर्ट में अर्ज़ी दी कि उन्हें लिंग बदलने की अनुमति दी जाये. कोर्ट ने उनकी यह बात स्वीकार की और इस तरह अलेस्साँद्रो कानूनी तौर से भी, अलेस्साँद्रा बन गये. लेकिन अलेस्साँद्रा के बारे में चर्च के लोगों ने नगरपालिका द्वारा उनके तलाक की जबरदस्ती करने का विरोध किया है, वह कहते हैं कि पुरुष रूप में अलेस्साँद्रो ने अपनी पत्नी से विधिवत विवाह किया था, हमारी नज़र में कुछ नहीं बदला है, यह दोनो पति पत्नि हैं.

इतालवी कानून जहाँ एक और समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं देता, दूसरी और ट्राँसजेंडर विषय में प्रगतिशील है, इसे एक बीमारी की तरह देखता है, उनके इलाज की सुविधा और लोगों को कानूनी लिंग बदलने की अनुमति देता है. अलेस्साँद्रा को क्या सलाह दी जाये, इस पर पुराने विचारों वाले लोग भी कुछ परेशान हैं, उन्हें भी कुछ समझ नहीं आता. अगर कहें कि उनका विवाह नहीं माना जा सकता क्योंकि वह दो औरतों का विवाह है, तो इसका यह अर्थ हुआ कि पति या पत्नी की बीमारी के नाम पर तलाक को स्वीकृति दी जा रही है. और अगर उन्हें तलाक के लिए मजबूर न करें तो समलैंगिक विवाह को स्वीकृति मिलती है.

अलेसान्द्रा ने मुझसे भारत में रहने वाले हिँजड़ों की स्थिति के बारे में पूछा. मुझे इस विषय में विषेश जानकारी नहीं थी, लेकिन मैंने उसे बताया कि इस वर्ष जनगणना में पहली बार भारत में ट्राँसजेन्डर लोगों को गिना जा रहा है, और उनके लिए पुरुष, स्त्री से अलग श्रेणी बनायी गयी है. अलेसान्द्रा बोली, "मुझे भारत के ट्राँसजेन्डर लोगों के बारे में मालूम नहीं इस लिए नहीं कह सकती कि यह सही है या गलत, लेकिन मैं नहीं मानती कि हमारे लिए एक अलग श्रेणी बनायी जाये. मैं अपने आप को पूर्ण रूप से स्त्री मानती हूँ और चाहती हूँ कि कानून मुझे नारी माने."

अलेस्साँद्रा कहती है, "हमारा समाज भिन्नता से डरता है, उसे स्वीकार नहीं करता. लेकिन मैं तलाक नहीं लूँगी. जब हम दोनो साथ खुश हैं तो हमें क्यों अलग किया जा रहा है? बात केवल आई कार्ड की नहीं, टेक्स, प्रापर्टी, सब की बी है, अगर नगरपालिका हमें पति पत्नी नहीं मानेगी तो वह सब झँझट खड़े हो जायेंगे. यह मेरे मानव अधिकारों की बात है, मैं लड़ूँगी."

आप का क्या विचार है, अलेसान्द्रा के प्रश्न के बारे में?

***
अलेसान्द्रा अलेसान्द्रा इटली के बड़े बैंक में कामगार यूनियन के लिए काम कार्यरत हैं और उनके काम का एक ध्येय यह भी है कि बैंक में काम करने वालों की भिन्नता को सम्पदा के रूप में देखा जाये न कि परेशानी के रूप में. इस विषय पर उन्होंने अन्य मित्रों के साथ मिल कर एक कम्पनी भी बनायी है जिसमें मानव भिन्नता से जुड़े विषयों का ध्यान और मान रख कर किस तरह बिज़नस किया जाये विषय पर सिखाया जाता है. उनकी तस्वीरें फेदेरीको बोरैला की हैं.

(Images of Alessandra Bernaroli are by Federico Borella)


रविवार, जनवरी 02, 2011

गार्गी की यवनी बेटी

कुछ दिन पहले स्पेन-चिली के फ़िल्म निर्देशक अलेहान्द्रो अमेनाबार (Alejandro Amenàbar) की फ़िल्म अगोरा (Agorà) देखी जिसमें चौथी शताब्दी की यवनी (ग्रीक) दर्शनशास्त्री और नक्षत्रशास्त्री हाइपाटिया (Hypatia) की कहानी है. पुरुष प्रधान समाज में स्वतंत्र सोचने वाली स्त्री के विषय के अतिरिक्त यह फ़िल्म धार्मिक कट्टरवाद के विषय को भी छूती है. इस फ़िल्म को देख कर भारत के पूर्व-इतिहास की ऐसी ही एक युवती, गार्गी, जिसकी कथा वेदों में लिखी है, के बारे में जानने की इच्छा भी मन में जागी.

Agora, a film by Alejandro Amernabar

ईसा से तीन सौ साल पहले यवनी सम्राट सिकन्दर यानि अलेक्ज़ान्डर (Alexander) ने आधुनिक तुर्की, सीरिया, मिस्र, ईराक, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत तक कर अपना साम्राज्य बनाया था. उनके नाम से बने यवनी शहर इन सभी देशों में आज भी उस इतिहास की गवाही देते हैं. हाइपेटिता की कहानी मिस्र (Egypt) में समुद्र तट पर बसे अलेज़ान्ड्रिया (Alexandria) शहर की है, जो उस समय अपने प्रकाश स्तम्भ तथा पुस्तकालय के लिए दुनिया भर में मशहूर था. तब तक यवन साम्राज्य कमज़ोर हो चुका था और रोमन साम्राज्य चर्म पर था.

हाइपेटिया, रोमन जिसे इपेत्सिया बुलाते हैं, अलेज़ान्ड्रिया के पुस्तकालय के अधिनायक की ज्ञानी बेटी थी जो दूर दूर से आये पुरुष छात्रों को दर्शनशास्त्र पढ़ाती थी तथा उसे नक्षत्र शास्त्र (Astronomy) में, विषेशकर धरती, सूर्य और अन्य ग्रहों के बारे में जानने में अधिक दिलचस्पी थी और वह विवाह से इन्कार करती थी. तब यवन और रोमन धार्मिक विश्वास था पुराने यवनी देवी देवताओं में, जैसे कि ज़ीअस, मिनर्वा, वीनस, आदि. इस धार्मिक विश्वास को बाद में "पागान" (Pagan) का नाम दिया गया.

Agora, a film by Alejandro Amernabar

फ़िल्म दिखाती है नये फैलते हुए ईसाई धर्म के द्वंद को, जो एक ओर तो शोषित दलित गुलामों को मानव मानता है और नये समताबद्ध समाज की संरचना करता है, दूसरी ओर उसके कुछ सदस्य अन्य धर्मों को मज़ाक उड़ाते हैं, और कुछ कट्टरपंथी अन्य विधर्मियों, यानि यहूदी (Jew) तथा पागान धर्मों में विश्वास करने वालों के विरुद्ध हिंसा का अभियान चलाते हैं. एक बार कट्टरपंथी राह चलती है तो बाकी सब धर्मों को दबा दिया जाता है, कुछ लोग वहाँ से भाग जाते है, बचे खुचे लोग धर्म परिवर्तन कर लेते हैं. हाइपेटिया पर डायन होने, पुरुषों को बहकाने और स्त्री शालिनता के विपरीत रहन सहन के आरोप लगा कर, मृत्युदंड की सजा दी जाती है. हाइपेटिया का ज्ञान कि धरती गोल है और ग्रह किस तरह सूर्य के आसपास घूमते हैं, अन्य कई सौ सालों के लिए खो जाते हैं. अलेज़ान्ड्रिया का अनूठा पुस्तकालय जहाँ सदियों का मानव ज्ञान संरक्षित था, नष्ट हो जाता है.

बाद के कुछ इतिहासकारों कहते हैं कि अलेज़ान्ड्रिया का प्राचीन पुस्तकालय पैगम्बर मुहम्मद के समय के बाद मुसलमानों ने नष्ट किया था और इसे "मुसलमान कट्टरवाद" के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि अन्य इतिहासकारों को कहना है कि यह प्राचीन पुस्कालय "ईसाई कट्टरवादियों" द्वारा नष्ट किया गया था. इस फ़िल्म में इसी को सच माना गया है और फ़िल्म में पुराने अलेज़ान्ड्रिया शहर को बहुत भव्य रूप से दिखाया गया है.

Agora, a film by Alejandro Amernabar

हाइपेटिया अन्य बहुत बातों में अपने समय से बहुत आगे थीं, लेकिन वह गुलामों के साथ हाने वाले अमानवीय व्यवहार के बारे में कुछ नहीं कहतीं, और न ही गुलामी को गलत मानती हैं.

मुझे फ़िल्म की सबसे अच्छी बात लगी कि किस तरह उसमें धार्मिक कट्टरवाद की बात को दिखाया गया है जो कि सोचने पर मजबूर करती है. उस समय का पागान धर्म सहिष्णु और उदार था, और उस समय अलेज़ान्ड्रिया में यहूदी, पागान, ईसाई, विभिन्न धर्मों को लोग शांति से साथ रहते थे. लेकिन एक बार विभिन्न धर्मों के कट्टरपंथी एक दूसरे के विरुद्ध जहर फैलाने लगे तो रूढ़िवादी ईसाई धार्मिक शासन बना और दूसरी ओर, ज्ञान और विकास दोनों के रास्ते रुक गये.

कुछ लोगों ने इस फ़िल्म को "ईसाई धर्म विरोधी" कहा है लेकिन खुशी की बात है कि कम से कम इटली में इस बात पर न कोई दंगे हुए, न किसी के कहा कि फ़िल्म को बैन किया जाये, आदि. बल्कि फ़िल्म को फ्राँस के कान फ़ैस्टिवल में विषेश पुरस्कार भी मिला. मेरे विचार में फ़िल्म ईसाई धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि कट्टरवाद के विरुद्ध है, क्योंकि फ़िल्म के अनुसार, उस समय हुई धार्मिक लड़ाईयों में पागान कट्टरपंथियों का भी उतना ही दोष था. अगर आप को यह फ़िल्म देखने का मौका मिले तो अवश्य देखियेगा.

इतिहास से हम क्या सबक सीख सकते हैं? क्या इतिहास हमें राह दिखा सकता है कि आज विश्व में छाये कट्टरवाद के खतरे से कैसे बचा जाये? फ़िल्म देख कर इस बात पर बहुत देर तक सोचता रहा, पर कोई आसान उत्तर नहीं मिला. एक तरफ से लगता है कि हर धार्मिक कट्टरवाद को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, तुरंत दबा दिया जाना चाहिये, पर यह भी लगता है कि हिंसा से हिंसा ही जन्मेंगी, दबाने से कट्टरवाद नष्ट नहीं होगा बल्कि और फैल सकता है.

***

हाइपेटिया उस समय की नायिका थी जब सामान्य जीवन में स्त्री को कुछ अधिकार नहीं थे, पढ़ने लिखने और खुल कर बोलने का अधिकार भी नहीं था. इसके बावजूद वह स्वतंत्र रूप से विकसित हो सकीं, अध्यापक बनी, वैज्ञानिक शौध किया, दर्शन पर पुरुषों से बहस की, वह इसलिए कि उन्हें अपने पिता से सहयोग मिला.

भारत के वेदों में वर्णित ब्रह्मावादिनी गार्गी भी हाइपेटिया की तरह पुरुष प्रधान समाज में रहती थीं. ऋगवेद को सबसे पुराना आदिग्रंथ माना जाता है, इसमें स्त्री की जगह पत्नि तथा ग्रहणी के रूप में ही है, यहाँ तक कि सभी देव देवता भी पुरुष ही हैं और देवियों के नाम बहुत कम जगह पर आते हैं. गार्गी को महाऋषि वचक्नु की बेटी और आजीवन ब्रह्मचारिणी कहा जाता है. बृहदारण्यक उपनिषद में, विदेह के राजा जनक द्वारा आयोजित एक शास्त्रार्थ में उनका एक वर्णन है.

वेदों में वर्णित अन्य प्रसिद्ध स्त्रियों में, जैसे अनुसूया, शाण्डिली, सावित्री, अरुन्धती, आदि को पतिव्रता, निष्ठा आदि जैसे गुणों की वजह से श्रेष्ठ माना जाता है, विदुषी होने के लिए नहीं. मित्र ऋषि की पत्नि मेत्रेयी को अवश्य विदुशी कहते हैं पर पुराणों के अनुसार, उन्हें यह ज्ञान उनके पति ने दिया. यानि हाइपेटिया की तरह स्वतंत्र व्यक्तित्व रखने वाली, ज्ञानवती स्त्री केवल गार्गी ही थी.

क्या गार्गी को भी समाज का सामना करना पड़ा था, इसके बारे में आज कैसे जान सकते हैं?
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