हिन्दी फ़िल्में देखिये तो लगता है कि छोटे शहरों में रहने वाली लड़कियों के जीवन बदल गये हैं. "बरेली की बरफ़ी", "शुद्ध देसी रोमान्स", और "तनु वेड्स मनु" जैसी फ़िल्मों में, छोटे शहरों की लड़कियों को न सड़कों पर डर लगता हैं, न वह लड़कों से वे स्वयं को किसी दृष्टि से पीछे समझती हैं। जाने क्यों, अक्सर पिछले कुछ सालों से हमारी फ़िल्मों में छोटे शहरों की लड़कियों की आधुनिकता को सिगरेट पीने से दिखाया जाता है (शायद इन फ़िल्मों को सिगरेट कम्पनियों से पैसे मिलते होंगे, क्योंकि अब भारत में सिगरेट के अन्य विज्ञापन दिखाना सम्भव नहीं)।
हिन्दी फ़िल्मों की लड़कियों और सचमुच की लड़कियों के जीवनों में कोई अन्तर हैं, तो कौन से हैं? पिछले दशकों में छोटे शहरों में रहने वाली लड़कियों और युवतियों की सोच बदली है, तो कैसे बदली है? और अगर बदली है तो उसका उन सामाजिक समस्याओं पर क्या असर पड़ा है जो कि लड़कियों के जीवनों से जुड़ी हुई हैं? इस आलेख में इसी बात से सम्बंधित सर्वे की बात करना चाहता हूँ।
गाँव कनक्शन का सर्वे
इन दिनों में गाँव कनक्शन पर उत्तरप्रदेश की 15 से 45 वर्षीय महिलाओं के साथ हुए एक सर्वे के बारे में छपा है। इस सर्वे में पाँच हज़ार औरतों ने भाग लिया।
सर्वे में 56 प्रतिशत महिलाओं कहा कि वह नौकरी करना चाहती हैं। इसमें से सबसे अधिक महिलाएँ स्कूल में अध्यापिका बनना चाहती हैं। 14 प्रतिशत महिलाएँ डॉक्टर बनना चाहती हैं और 6 प्रतिशत पुलिस में जाना चाहती हैं।
67 प्रतिशत ने कहा कि अगर मौका मिले तो वह आगे और पढ़ना चाहेंगी। 50 प्रतिशत महिलाओं-लड़कियों ने कहा कि उन्हें साइकिल चलाना पसंद है, लेकिन ससुराल में साइकिल चलाने की अनुमति कम ही मिलती है। 67 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें घर से बाहर निकलने के लिए पति या पिता से अनुमति लेनी पड़ती है, जबकि 15 प्रतिशत ने बताया कि वह घर से बाहर अकेले नहीं, किसी के साथ ही जा सकती हैं।
81 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वह जानती हैं कि उनकी शादी के समय उनके माता-पिता को दहेज देना पड़ेगा।
उत्तरप्रदेश में मेरा सर्वे
गाँव कनक्शन के इस सर्वे की लड़कियों-महिलाओं के जीवन, उनकी आशाएँ, और उनके सपने, फ़िल्मी छोटे शहरों की लड़कियों के जीवनों से बहुत भिन्न लगती हैं।
इस सर्वे के बारे में पढ़ कर मुझे अपना एक सर्वे याद आ गया। 2014 में, मैं उत्तरप्रदेश में कुछ दिन अपनी एक मित्र के पास ठहरा था जिनका एक प्राईवेट अस्पताल था और साथ में नर्सिंग ट्रेनिन्ग कॉलिज भी था जहाँ तीन वर्ष का नर्सिन्ग कोर्स होता था। वहाँ पढ़ने वालों को उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से छात्रवृत्ति मिल रही थी। मैंने इस सर्वे में द्वितीय वर्ष के छात्र-छात्राओं से स्वास्थ्य सम्बंधी तथा सामाजिक विषयों के प्रश्न पूछे थे।
सर्वे करने से पहले उसके प्रश्नों को तीसरे वर्ष के तीन छात्राओं में जाँचा गया और जाँच के अनुसार, जो प्रश्न अस्पष्ट थे या जिनके सही अर्थ समझने में छात्रों को कठिनाई हो रही थी, उन्हें सुधारा गया। किसी छात्र या छात्रा ने सर्वे में भाग लेने से मना नहीं किया, लेकिन करीब 20 प्रतिशत छात्राओं ने कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं दिये।
सर्वे में भाग लेने वाले
कुल 35 छात्रों ने सर्वे में हिस्सा लिया जिनमें 31 छात्राएँ (89%) थीं और 4 छात्र थे। चूँकि सर्वे में पुरुष छात्र केवल चार थे, उनके उत्तरों का अलग से विश्लेषण नहीं किया गया है।
छात्रों की औसत आयू 21.7 वर्ष थी। उनमें से 33 लोग (94%) उत्तरप्रदेश से थे और 2 लोग अन्य करीबी राज्यों (बिहार तथा उत्तराखँड) से थे।
उत्तरप्रदेश के 33 लोगों में से 9 लोग (27%) लखनऊ से थे। बाकी के 24 लोग (73%) राज्य के 8 जिलों से थे (सीतापुर, बलिया, माउ, बस्ती, अकबरपुर, एटा, लक्खिमपुर तथा बाराबँकी)। जिलों से आने वाले लोग जिला शहरों, उपजिलों के छोटे शहरों तथा गाँवों के रहने वाले थे। यानि सर्वे में प्रदेश की राजधानी से ले कर, गाँवों तक के, हर तरह की जगहों के लोग थे।
उनमें से 33 लोग (94%) हिन्दू थे, केवल 1 व्यक्ति मुसलमान परिवार से था और 1 ईसाई परिवार से। हिन्दू छात्रों में 20 लोग (60%) शिड्यूल कास्ट जातियों से थे और 6 लोग (18%) जनजातियों से थे।
छात्रों में से 19 लोग (54%) संयुक्त परिवारों में रहते थे, जबकि 16 लोग (46%) ईकाई (nuclear) परिवारों से थे।
छात्र परिवारों की आर्थिक स्थिति
उनमें से 32 लोगों (91%) ने खुद को मध्यम वर्गीय बताया, केवल 2 लोगों ने खुद को निम्न मध्यम वर्गीय कहा और 1 ने खुद को उच्च मध्यम वर्गीय कहा। उनमें से 18 लोगों (51%) के घर में स्कूटर, मोटरसाईकल या ट्रेक्टर थे जबकि बाकी के 17 लोगों (49%) के घरों में केवल बैलगाड़ी या साईकल थी या कोई भी व्यक्तिगत यात्रा साधन नहीं था।
उनमें से अधिकाँश के घर में टीवी था, जबकि करीब 50% लोगों के घर में फ्रिज था।
मेरे विचार में इसका अर्थ है कि बहुत से लोग जो अपने आप को मध्यम वर्ग को कह रहे थे, उनमें से करीब पचास प्रतिशत लोग निम्न मध्यम वर्ग या गरीब थे और उनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी।
पढ़ायी का स्तर और अंग्रेज़ी ज्ञान
नर्सिंग कॉलिज में आने से पहले 34 छात्रों ने 12 कक्षा तक पढ़ाई की थी, केवल एक छात्रा के पास बीए की डिग्री थी।
छात्रों की माओं ने औसत केवल 6 वर्ष की स्कूली पढ़ायी की थी। उनमें से 34% अनपढ़ थीं और 11% के पास कॉलिज की डिग्री थीं। उनके पिताओं की औसत पढ़ायी 11 वर्ष की थी। उनमें से 11% अनपढ़ थे और 42% कॉलिज में पढ़े थे।
सब छात्रों ने स्वीकारा कि उनके माता पिता की पीढ़ी में स्कूल-पढ़ाई के क्षेत्र में पुरुषों तथा महिलाओं के बीच में अधिक विषमताएँ थीं जो उनकी पीढ़ी में कम हो गयीं हैं। कई छात्राएँ जिनकी माएँ अनपढ़ थीं, बोलीं कि उन्हें अपनी माँ से पढ़ाई करने का बहुत प्रोत्साहन मिला था। जैसे कि एक छात्रा ने कहा, "मेरी माँ बचपन से मुझे कहती थी कि तुमको पढ़ना है, मेरी तरह अनपढ़ नहीं रहना।"
छात्रों में से 19 लोगों (54%) ने कहा कि उनकी अंग्रेज़ी कमज़ोर है जिससे उन्हें नर्सिंग की किताबों को पढ़ने व समझने में दिक्कत होती थी। उन्होंने बताया कि कुछ शिक्षिकाएँ अक्सर अपनी बात को समझाने के लिए उसे हिन्दी में भी समझाती हैं, जिससे उन्हें समझने में आसानी हो जाती थी।
बाकी के 16 लोगों ने कहा कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी थी और उन्हें नर्सिन्ग की किताबें पढ़ने समझने में दिक्कत नहीं होती थी। लेकिन उनसे जब सर्वे के दौरान अंग्रेज़ी में प्रश्न पूछे गये तो केवल एक छात्रा ही उसका सही अंग्रेज़ी में पूरा उत्तर दे पायी। बाकी लोगों को अंग्रेज़ी बोलने में कठिनाई थी। यानि जो छात्र अंग्रेज़ी की किताबों को पढ़ तथा समझ सकते हैं, उन्हें भी अंग्रेज़ी बोलने में हिचक या कठिनाई हो सकती है। इसका यह भी अर्थ है कि अंग्रेज़ी में उनकी अभिव्यक्ति कमज़ोर रहती है और उनमें आत्म-विश्वास कम हो जाता है।
नर्सिंग पढ़ने का निर्णय किसने लिया
19 लोगों (54%) ने नर्सिंग की पढ़ायी करने का निर्णय स्वयं लिया था, जबकि बाकी 16 (46%) लोगों में यह निर्णय परिवार या अन्य लोगों ने लिया।
अधिकाँश लोगो ने माना कि उनके मन में कुछ अन्य पढ़ने की कामनाएँ थीं लेकिन उन्होंने अंत में नर्सिन्ग को चुना क्योंकि इसमें छात्रवृत्ति मिलती है, वरना उनके परिवार के लिए उनकी पढ़ायी का खर्चा पूरा कठिन होता। नर्सिन्ग पढ़ने का एक कारण यह भी था कि इस काम में नौकरी आसानी से मिल जाती है।
केवल दो लोगों ने कहा कि वह सचमुच नर्सिन्ग की पढ़ायी ही करना चाहते थे। 15 लोगों (43%) का कहना था कि वह शिक्षक बनना चाहते थे। 4 लोगों (11%) ने कहा कि वह पुलिस में काम करना चाहते थे। बाकी के लोगों की अलग अलग राय थी, कोई फेशन डिज़ाईनर बनना चाहता था, कोई ब्यूटी पार्लर चलाना चाहता था, कोई कम्पयूटर कोर्स तो कोई वकील या एकाऊँटेन्ट। आगे पढ़ाई के बारे में उनमें से एक छात्रा ने कहा कि नर्सिन्ग की पढ़ायी पूरी करके, वह आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलिज में पढ़ने की कोशिश करेगी।
विवाह और जीवन साथी का चुनाव
छात्रों में से 5 लोग विवाहित थे, वह पाँचों छात्राएँ थीं और पाँचों के पति उनके परिवारों ने चुने थे।
बाकी 30 लोगों में से 24 (80%) ने कहा कि उनका जीवन साथी उनका परिवार चुनेगा. केवल 6 लोगों ने कहा कि वह अपना जीवन साथी स्वयं चुनना चाहेंगे, पर उनकी भी चाह थी कि उनका चुना हुआ जीवनसाथी उनके परिवार को पसंद आना चाहिये और वे परिवार की मर्ज़ी के विरुद्ध जा कर विवाह नहीं करना चाहेंगे। केवल एक छात्रा ने कहा कि चाहे उसका परिवार कुछ भी कहे, वह तो उसी से विवाह करेगी जो उसे पसंद होगा, और इसके लिए वह परिवार के विरुद्ध भी जा सकती है।
जाति और भेदभाव के अनुभव
केवल 6 लोगों (17%) ने कहा कि उनको जाति सम्बंधित भेदभाव के व्यक्तिगत अनुभव हुए थे। अन्य 9 लोगों (26%) ने कहा कि उनको स्वयं ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ लेकिन उनके परिवार में अन्य लोगों को ऐसे अनुभव हुए थे।
33 लोगों (95%) ने स्वीकारा कि समाज में जाति से सम्बंधित भेदभाव होता है।
भेदभाव के विषय पर बात करते समय कई छात्रों ने कहा कि नर्सिन्ग होस्टल में रहने की वजह से उनके जाति सम्बंधी विचार बदल गये थे। जैसे कि एक छात्रा ने कहा, "घर में कुछ भी कहते थे तो हम मान लेते थे, लेकिन होस्टल में हम लोग जात पात की बात नहीं सोचते, साथ बैठते, साथ खाना खाते हैं। अलग जातियों की लड़कियाँ मेरी मित्र हैं, इससे जाति के बारे में मेरी सोच बदल गयी है।"
साथ ही अधिकाँश लोगों का कहना था कि चाहे उनकी अपनी सोच बदल गयी है लेकिन जब वह अपने घर जाते हैं और घर में बड़े-बूढ़े लोग जाति का भेदभाव करते हैं तो वह उसका विरोध नहीं कर पाते। एक विवाहित छात्रा ने कहा, "मेरी सास जात-पात को बहुत मानती हैं, मैं अपने घर में किसी अन्य जाति के मित्र को नहीं बुला सकती। जब तक उनके साथ रहूँगी तो उनकी बात ही माननी पड़ेगी. मैं उनसे झगड़ा नहीं कर सकती।"
उनसे कहा गया कि मान लीजिये की आप की कोई सहेली या दोस्त अपनी जाति से भिन्न जाति या धर्म के व्यक्ति से प्रेम करता है और उससे विवाह करना चाहता है, लेकिन उसका परिवार इसके विरुद्ध है, तो आप किसकी तरफ़ होंगे और किसका साथ देंगे, अपनी सहेली या दोस्त की ओर या उसके परिवार की ओर?
3 लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहा. बाकी के 32 लोगों में से 21 (66%) ने कहा कि परिवार ठीक कहता है, जाति या धर्म से बाहर के व्यक्ति से विवाह करना उचित नहीं होगा, बाकी के 11 (34%) लोगों ने कहा कि जो जिससे प्रेम करता है उसे उसी से विवाह करना चाहिये।
घरेलू हिँसा
छात्रों से कहा गया कि मान लीजिये कि एक महिला का पति शाम को थका हुआ घर लौटता है तो देखता है कि पत्नी की सहेली आयी थी, वह उससे बातें कर रही थी, उसे समय का पता नहीं चला और उसने खाना नहीं बनाया था। अगर इस स्थिति में वह अपनी पत्नी को मारे तो क्या आप की राय में वह ठीक है?
10 लोगों (29%) का कहना था कि इस स्थिति में पति का पत्नी को मारना ठीक था। बाकी 25 (71%) लोगों ने कहा कि पति का मारना गलत था।
उन बाकी के 25 में से 11 लोगों (44%) ने कहा कि पति को पहले पत्नी से बात करनी चाहिये थी, अगर ऐसा पहली बार हुआ हो या फ़िर अगर वह पत्नी की विषेश सहेली थी जिससे बहुत सालों से नहीं मिली थी, तो पति को इस बात को समझना चाहिये था कि कभी कभी पत्नी से भूल हो सकती है और उसे मारने की बजाय प्यार से समझाना चाहिये था। लेकिन अगर समझाने के बावज़ूद पत्नी बार बार ऐसा करती है तो उन्होंने कहा कि तब पति का उसे मारना सही है। यानि कुल 70% लोग यह मान रहे थे कि कई परिस्थितियों में पति का पत्नी को मारने को सही समझा जा सकता है।
केवल 7 लोगों (20%) ने कहा कि किसी भी हालत में पति को पत्नी को मारने का अधिकार नहीं है।
इस विषय पर बात करते हुए उनसे इसका उल्टा प्रश्न भी पूछा गया कि क्या किसी स्थिति में पत्नी की हिँसा सही मानी जा सकती है? मान लीजिये कि पत्नी काम पर गयी है, शाम को थकी हुई घर लौटी है, जबकि उसके पति को उस दिन काम पर नहीं जाना था, वह सारा दिन घर पर ही था। पत्नी देखती है कि सारा घर गन्दा पड़ा है, खाना भी नहीं बना, पति के मित्र आये हैं, उनकी ताश और शराब चल रही है और पति ने जूए में बहुत पैसा खो दिया है, तो क्या ऐसी हालत में पत्नी पति से झगड़ा कर सकती है या उसे मार सकती है?
4 लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहा। बाकी 31 में से 26 लोगों (84%) ने कहा कि पत्नी को लड़ना या हिँसा नहीं करनी चाहिये। उनमें से अधिकतर का कहना था कि पति तो भगवान बराबर होता है, पत्नी को उसका सम्मान करना होता है, वह उस पर किसी भी हालत में हाथ नहीं उठा सकती।
तो ऐसी हालत में पत्नी को क्या करना चाहिये? अधिकतर लोगों का कहना था कि अगर पति अक्सर ऐसा करता हो कि हर महीने घर का पैसा जूए और नशे में गँवा देता हो तो ऐसे पति को सुधारने के लिए घर के बड़े-बूढ़ों को कहना चाहिये, उन्हें ही कुछ करना पड़ेगा।
5 लोगों (16%) ने कहा कि इस हालत में पत्नी का पति से लड़ना सही है और अगर यह बार बार हो तो ऐसे पति से तलाक भी ले सकते हैं।
परिवार में लड़कियों के प्रति भेदभाव
12 लोगों (34%) ने कहा कि उन्हें अपने परिवार में उन्होंने लड़को तथा लड़कियों के प्रति व्यवहार में भेदभाव का व्यक्तिगत अनुभव था। जबकि 32 लोगों ने माना कि समाज में लड़के तथा लड़कियों के प्रति भेदभाव आम होता है। 10 छात्राओं ने (29%), वह सभी लड़कियाँ थीं, इस भेदभाव को सही बताया।
उनसे कहा गया कि मान लीजिये कि एक घर में शाम को लड़का बाहर जाना चाहता है, परिवार में उसे कोई मना नहीं करता। लेकिन जब उस लड़के की हमउम्र बहन शाम को बाहर जाना चाहती है तो परिवार उसे मना करता है, कहता है कि लड़कियों को घर से बाहर जाने में खतरा है. क्या आपकी राय में यह सही है या गलत?
3 लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहा। बाकी के 32 लोगों में से 24 (75%) ने कहा कि परिवार सही कहता है क्योंकि लड़कियों के लिए शाम को बाहर जाने में खतरा है। केवल 8 लोगों (25%) ने कहा कि लड़कियों पर इस तरह रोक लगाना सही बात नहीं हैं।
फ़िर उनसे पूछा गया कि मान लीजिये कि आप की सहेली का विवाह हो चुका है, उसकी पहले एक बेटी है और अब वह फ़िर से गर्भवति हैं, उसका अल्ट्रासाउँड टैस्ट बताता है कि अगली भी बेटी होगी। तब उसकी सास कहती है कि गर्भपात करा दो। आप उसे क्या राय देंगी?
11 लोगों (31%) ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। बाकी के 24 लोगों में से 12 लोगों (50%) ने कहा कि सास की बात माननी पड़ेगी। 12 लोगों ने कहा कि उनकी सलाह होगी कि गर्भपात नहीं कराया जाये। दो छात्राओं ने कहा कि वह अपनी सहेली की सास को समझाने की कोशिश करेंगी।
सरकारी व प्राईवेट अस्पताल
छात्रों के अनुसार सरकारी अस्पतालों में अच्छी बाते हैं कि वहाँ कोई फीस नहीं होती, दवा भी निशुल्क होती है, स्पेशेलिस्ट डाक्टर अधिक होते हैं और सुविधाएँ अधिक होती हैं। उनकी बुरी बाते हैं कि वहाँ देखभाल अच्छी नहीं होती, अक्सर दवाईयाँ नहीं मिलती, सुविधाएँ नाम की होती हैं पर काम नहीं करती, कर्मचारी लापरवाह होते हैं, सफाई की कमी होती है, डाक्टर काम पर नहीं आते और बहुत भीड़ होती है।
प्राईवेट अस्पतालों में अच्छी बाते हैं कि वहाँ देखभाल बेहतर होती है, कर्मचारी ज़्यादा ध्यान से काम करते हैं, सफाई बेहतर होती है, भीड़ कम होती है और जो भी सुविधाएँ होती हैं वह ठीक से काम करती हैं। उनकी बुरी बातें हैं कि वहाँ पैसे बहुत लगते हैं, अक्सर बिना जरूरत के टैस्ट किये जाते हैं, बिना ज़रूरत की दवाएँ दी जाती हैं, और अगर आप गरीब हैं तो आप को कोई नहीं पूछता।
उनसे पूछा गया कि अगर आप बीमार हों तो आप कहाँ जाना चाहेंगे, सरकारी अस्पताल में या प्राईवेट अस्पताल में? 34 लोगों (97%) ने कहा कि अगर वह बीमार होंगे तो वह प्राईवेट अस्पताल में जाना चाहेंगे।
फ़िर, उनसे पूछा गया कि नर्सिंग की ट्रेनिन्ग पूरी होने के बाद आप सरकारी अस्पताल में काम करना चाहेंगे या प्राईवेट अस्पताल में? 34 लोगों (97%) ने कहा कि वे सरकारी अस्पताल में काम करना चाहेंगे। इसके कारण थे कि सरकारी काम में रहने के लिए घर मिलना, सेवा निवृति पर पैंशन मिलना, काम से छुट्टी लेना अधिक आसान है, काम करना भी अधिक आसान है और नौकरी से निकालना बहुत कठिन है।
यानि अपनी या परिवार की बीमारी हो तो लोग प्राईवेट अस्पताल में जाना पसंद करते हैं, जबकि नौकरी सरकारी अस्पताल में करना चाहते हैं। पर इस बात में उत्तरप्रदेश के नवजवान लोग बाकी भारत जैसे ही है। अप्रैल 2017 में सी.एस.डी.एस. ने भारत के विभिन्न राज्यों में रहने वाले नवजवानों का सर्वे किया था, उस में भी केवल 7 प्रतिशत लोगों ने प्राईवेट सेक्टर में नौकरी को प्राथमिकता दी थी, बाकी के 93 प्रतिशत लोगों ने सरकारी नौकरी चुने थे।
सर्वे में मिले उत्तरों पर विमर्श
जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो अगर उत्तरप्रदेश स्वतंत्र देश होता तो दुनिया में पाँचवें स्थान पर होता। विश्व स्तर पर मानव विकास मापदँड की दृष्टि से देखें तो भारत काफ़ी नीचे है, स्वास्थ्य के कुछ आकणों में हमारी स्थिति बँगलादेश से भी पीछे है।भारत के विभिन्न राज्यों के मानव विकास मापदँडों को देखें तो उत्तरप्रदेश का स्थान अन्य राज्यों की तुलना में बहुत नीचे है। चाहे वह बच्चियों के भ्रूणों की हत्या हो या वार्षिक बाल मृत्यू दर, उत्तरप्रदेश में इनकी स्थिति दयनीय है। स्वास्थ्य के कई आँकणों में उत्तरप्रदेश की स्थिति अफ्रीका के गरीब और पिछड़े देशों जैसी है या उनसे भी बदतर है।
ऐसी हालत में यह जानना कि उत्तरप्रदेश की युवा पीढ़ी क्या सोचती है, महत्वपूर्ण है। आज की नर्सिन्ग छात्राएँ कल यहाँ की स्वास्थ्य सेवाओं में हिस्सा लेंगी, परिवारों को सलाह देंगी, उनकी सोच तथा आचरण से समाज के अन्य लोग भी प्रभावित होंगे।
तो आप के विचार में नर्सों से की मेरी बातचीत उत्तरप्रदेश के भविष्य के बारे में हमें क्या बताती है? कुछ दिन पहले गोरखपुर के अस्पताल में 60 बच्चों की मृत्यु से भारत के समाचार पत्रों में हल्ला मचा था, पर उत्तरप्रदेश के लिए यह कोई नयी बात नहीं है। वहाँ के पिछले दस वर्षों के आँकणे देखिये, उत्तर प्रदेश में हर साल दस्त, न्योमोनिया, एन्सेफलाईटस, मलेरिया आदि बीमारियों से लाखों बच्चे मरते हैं, जिनका सही समय पर इलाज किया जाये तो वह बच्चे बच सकते हैं।
यही है भारत की अपने भीतर की विषमताएँ - भारत के दक्षिण के कुछ राज्यों के स्वास्थ्य आँकणे अमरीका जैसे हैं, और उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखँड जैसे राज्यों के अफ्रीका जैसे।
हमारी कथनी और करनी में भी अंतर है, क्योंकि पाराम्परिक विचारों को बदलना आसान नहीं है। अगर हम पूछें कि क्या आप नारी और पुरुष में बराबरी में विश्वास करते हैं, तो सब लोग हाँ कह देते हैं। अगर आप पूछते हैं कि घर और परिवार में नारी के साथ होने वाली हिँसा गलत है, तो भी सब लोग हाँ कह देते हैं। लेकिन इन विचारों की कथनी और प्रतिदिन के जीवन की करनी में विरोधाभास है, हम लोग कहते कुछ हैं, करते कुछ और।
इसका यह अर्थ नहीं कि सकारात्मक बदलाव नहीं हुए है। माता और पिता की पढ़ायी के आँकणे दिखाते हैं कि शिक्षा के स्तर में पिछली पीढ़ी में बहुत भेदभाव था, इस सर्वे में भाग लेने वाले की करीब एक तिहाई माएँ अनपढ़ थीं। इस दृष्टि से सर्वे की युवतियाँ उन घरों में पढ़ने-लिखने वाली युवतियों की पहली पीढ़ी हैं। शायद उनकी बेटियों में कथनी और करनी के यह विरोधाभास कम होंगे, वह लोग पारिवारिक हिँसा और भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठायेंगी।
अंत में
इस सर्वे से मुझे लगा कि सामाजिक विचारों को बदलना आसान नहीं है। हम जितने स्लोगन बना लें, पोस्टर बना लें, लोगों कों जानकारी हो जाती है लेकिन इससे उनके विचार या आचरण नहीं बदलते। ऊपर से दिखावे के लिए हम कुछ भी कह दें लेकिन हमारी भीतरी सोच क्या है, यह कहना समझना कठिन है।मैं उम्र में उन नर्सिंग के छात्रों से बहुत बड़ा था, बाहर से आया था और पुरुष था. इसलिए यह नहीं कह सकते कि उन्होंने मुझे हर प्रश्न का जो सोचते हैं वही सच-सच उत्तर दिया होगा, फ़िर भी इस सर्वे से उत्तरप्रदेश की युवा पीढ़ी, विषेशकर नवयुवतियाँ क्या सोचती हैं, इसकी कुछ जानकारी मिलती है।
आप बताईये कि आप के अपने अनुभव इस सर्वे में पायी जाने वाली स्थिति से कितने मिलते हैं और कितने भिन्न हैं? और अगर आप को इस तरह के प्रश्न पूछने का मौका मिलता तो बदलते उत्तरप्रदेश को समझने के लिए आप कौन से प्रश्न पूछते?
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