गुरुवार, अगस्त 27, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 26

अब तक की कहानी:  त्रिनेत्र ने ताकानोरी से कहा है वह उसे शक्तिवाहिनी मूर्ति तक ले कर जायेगा, और ओरी ने उसे वचन दिया है कि मूर्ति मिलने के बाद वह उनका और पीछा नहीं करेंगे। गुरु जी त्री के नाम एक कविता-पहेली छोड़ी थी, उसे पढ़ कर त्री, ओरी और आभा काजीरंगा के पास देवपानी के एक होटल में ठहरे थे। आज सुबह, त्री और ओरी लखमीपारा गाँव से हो कर शंखासुर की पहाड़ी को खोजने निकले थे। लखमीपारा के मन्दिर के पुजारी ने उन्हें शंखासुर जाने का रास्ता बताया है। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 26

 शंखासुर पहाड़ी, काज़ीरंगा, असम, 7 मार्च 2026

ओरी बोला, “तुमसे एक अन्य बात पूछना चाहता था। दिल्ली और कलकत्ता में लोग तुरंत जान जाते थे कि मैं विदेशी हूँ, वह मुझसे अंग्रेज़ी में बात करते थे, जबकि यहाँ लोग मेरी ओर ध्यान नहीं देते, कुछ तो मुझसे यहाँ की भाषा में बात करते हैं, और जब वह देखते हैं कि मैं उनकी बात नहीं समझ पा रहा तो सोचते हैं कि मैं नाटक कर रहा हूँ, ऐसा क्यों है?”

त्री मुस्कराया, “आभा का चेहरा क्या तुमसे बहुत भिन्न है? वह भी थोड़ी सी जापानी नहीं लगती?”

ओरी बोला, “नहीं, वह जापानी नहीं लगती, उसका चेहरा म्यंमार और थाईलैंड के लोगों से अधिक मिलता है।"

त्री हँसा, बोला, “चीनी, जापानी, म्यंमार, थाईलैंड, मुझे उनके चेहरों को अलग-अलग पहचानना नहीं आता, मुझे सभी एक जैसे लगते हैं।"

ओरी भी हँसा, “वैसे ही, मुझे भी तुम हिन्दुस्तानी आपस में एक जैसे लगते हो।"

"लेकिन तुम नक्शे में देखो तो यहाँ पर एक ओर भूटान और चीन हैं, दूसरी ओर म्यंमार और थाईलैंड हैं। यहाँ की बहुत सी जनजातियाँ आज की राष्ट्रीय सीमाओं से बँट गयी हैं लेकिन उनके लोग नहीं बँटे हैं। शायद इसलिए तुम्हें देख कर यहाँ के लोग सोचते हैं कि तुम भी हमारी किसी जन-जाति के होगे", त्री ने कहा।

वह दोनों ऐसे ही बातें कर रहे थे कि अचानक आगे से एक गोली चलने की आवाज़ आई।

त्री रुक गया, बोला, “पंडित जी कह रहे थे कि यहाँ पर गैंडों के सींग चुराने वाले तस्कर खतरनाक हो सकते हैं, हमें आगे नहीं जाना चाहिये?”

ओरी बोला, “अगर वह लोग कोई गलत काम कर रहे हैं, तो हमें उन्हें रोकना चाहिये।"

लेकिन त्री आगे नहीं बढ़ा, बोला, “जब बचने का कोई और रास्ता नहीं हो तब मैं लड़ सकता हूँ, लेकिन मैं जबरदस्ती किसी से लड़ने नहीं जाऊँगा।"

ओरी बोला, “यह तो कायरता होगी, क्या तुम कायर हो? देखोगे भी नहीं कि वहाँ कौन हैं और वह क्या कर रहे हैं?”
त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “ठीक है, तुम रुको, मैं अदृश्य हो कर देख कर आता हूँ, फिर यह निर्णय लेंगे कि कुछ करना चाहिये या नहीं।"

जैसे ही उसकी शक्ति जागृत हुई वह अदृश्य हो कर आगे देखने चला गया। ओरी पाँच मिनट रुका, फिर वह भी जिस ओर से गोली चलने की आवाज आई थी उसी ओर बढ़ा।

वहाँ से करीब दो किलोमीटर आगे जा कर उन्हें कुछ आदमी दिखे। एक फोरैस्ट गार्ड जीप में उनका पीछा कर रहा था। उसके एक हाथ में वॉकी-टॉकी थी जिससे वह अपने साथियों को बुला रहा था। उसकी जीप के सामने, पेड़ों के बीच में, तीन आदमी भाग रहे थे, जिनके चेहरे रुमालों से छिपे थे और जिनके हाथों में बन्दूकें थीं। अचानक एक पेड़ पर छुपा हुआ एक आदमी, नीचे जाती हुई फोरैस्ट गार्ड की जीप पर कूदा। उसके हाथ में एक चाकू था, जिससे उसने गार्ड पर हमला कर दिया। गार्ड के बायें कँधे पर चाकू का घाव लगा तो उसके हाथ से उसका वॉकी-टॉकी छूट कर गिर गया, उसकी कमीज़ तुरंत खून से लाल हो गयी और उसने जीप को रोक कर उतरने की कोशिश की।

जो तीन आदमी आगे भाग रहे थे, वे मुड़ कर जीप की ओर आये, उनमें से एक बोला, “सिपाहिया जी, क्यों मरने का शौक लगा है जो बीच में अटका डालने के लिए कूद पड़े?”

दूसरा आदमी बोला, “इस साले को पेड़ से बाँध दो, बाद में इसके साथी आ कर इसे खोल लेंगे। वह गैंडा उस तरफ भागा है, हमें उसका पीछा करना है।"

एक आदमी के पास रस्सी थी, उसने उससे गार्ड के हाथ बाँधे, और उसे एक पेड़ की तरफ खींचने लगा तो दर्द से गार्ड चिल्लाया, तब उस आदमी ने अपनी बन्दूक के कुन्दे से उस गार्ड के सिर पर ज़ोर से मारा तो वह बेहोश हो गया।

पास में छिपा हुआ त्री सब कुछ देख रहा था, उसने सोचा कि जब वह लोग गार्ड को छोड़ कर जायेंगे तो वह उसकी रस्सी खोल देगा, लेकिन ओरी तुरंत पेड़ों के बीस से बाहर निकल आया, चिल्ला कर बोला, “उस आदमी को छोड़ दो।"

चूँकि ताकानोरी अंग्रेज़ी में बोल रहा था और उन आदमियों को शायद उसकी बात समझ नहीं आयी, उनमें से एक ने अपनी बन्दूक उठायी और उसकी ओर निशाना साधा। तब त्री ने चिल्ला कर ओरी को पुकारा। उन आदमियों ने उसकी आवाज़ सुनी लेकिन वह दिखाई नहीं दिया, वह आसपास देखने लगे। इतनी देर में ताकानोरी ने अपनी आस्तीन से एक चाकू को निकाल कर, उसे निशाना साधने वाले तस्कर की ओर फैंका। उसका निशाना इतना सधा हुआ था कि काफी दूर होने पर भी वह चाकू सीधा उस आदमी की गर्दन में घुस गया। जब वहाँ से खून का फुव्वारा निकला तो उस आदमी के हाथ से उसकी बन्दूक छूट कर गिर गयी।

अपने साथी को नीचे तड़पता देख कर बाकी दोनों आदमियों ने भी अपनी बन्दूकें उठायी तो ओरी ने आस्तीन से दो चाकू और निकाल लिए, बोला, “समझदार हो तो बन्दूकें नीचे कर लो, वरना तुम दोनों की जान भी जायेगी।" यह कह कर वह निडर हो कर उनके सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। उसकी निडरता देख कर वह दोनों आदमी थोड़ा हिचकिचाये, तब अचानक त्री भी वहाँ प्रकट हो गया, और बंगाली में बोला, “यह आदमी बड़ा निशानेबाज है, मेरी मानो तो यहाँ से तुरंत भाग जाओ, वरना तुम दोनों की मृत्यु भी आज ही होगी।"

त्री को वहाँ अचानक प्रकट होता देख कर वह दोनों घबरा गये और अपने घायल साथी को वहीं छोड़ कर, पीछे पेड़ों में घुस कर भाग गये। उनका तीसरा साथी जो जिसने गार्ड को चाकू मारा था, वह जीप पर खड़ा सब कुछ देख रहा था, वह भी वहाँ से उतर कर भागा। 
ओरी ने घायल तस्कर की गर्दन से अपने चाकू को निकाल कर उस पर लगे खून को उसकी कमीज़ से पोंछा और वापस अपनी आस्तीन में छुपा लिया, बोला, "इस आदमी का बहुत सा खून बह गया है, इसका बचना मुश्किल होगा।"

त्री ने आगे बढ़ कर बेहोश गार्ड के हाथ से रस्सी खोली फिर उसकी कमीज़ को खोल कर उसके कँधे के घाव को देखा। वह चाकू जहाँ घुसा था, शायद वहाँ कोई खून की नस थी जिससे खून बहता जा रहा था। उसके बहते खून को देख कर त्री वहाँ मूर्ति की तरह खड़ा रह गया, उसका चेहरा फीका पड़ गया। 

ओरी ने पीछे से आ कर, अपनी जेब से एक साफ रुमाल निकाल कर उसे पहले गार्ड के घाव पर दबाया, फिर उसे कँधे पर बाँध कर टाईट खींच दिया। फिर उसने त्री से कहा, “उस वॉकी-टॉकी से इसके गार्ड साथियों को खबर करके यहाँ बुलाओ, इसे जल्दी अस्पताल ले जाना ज़रूरी है, नहीं तो यह भी नहीं बचेगा।"

त्री ने वॉकी-टॉकी का बटन दबा कर "हैलो, हैलो" बोला तो उसे उत्तर मिला। ओरी ने उसे याद दिलाया, “उन्हें हमारे बारे में कुछ मत कहना।"

त्री ने वॉकी-टॉकी से गार्ड के साथियों को उसकी और तस्करों की लड़ाई की बात बतायी, कहा कि घायल गार्ड को जल्दी से अस्पताल ले जाना ज़रूरी है। जब उन्होंने उससे पूछा कि वह कौन है तो उसने वॉकी-टॉकी को बंद कर दिया। 

ओरी बोला, “हम जितना कर सकते थे, उतना कर दिया, अब हमें यहाँ से जाना चाहिये।" उन दोनों के वस्त्रों पर भी खून के दाग लगे था, उनकी ओर इशारा करके उसने कहा, “हो सकता है कि वह गार्ड कुत्तों के साथ आयें और हमें खोजने की कोशिश करें। कुत्ते सूंघ कर देख लेंगे कि हम किधर गये हैं। उनसे बचने के लिए हमें पानी में चलना चाहिये।"

दोयाँग नदी वहाँ से अधिक दूर नहीं थी और उसके किनारे पर पानी गहरा नहीं था, उनके घुटनों से नीचे आ रहा था। वह उसमें चलते हुए लखमीपारा की ओर बढ़े।

त्री को उस लड़ाई से बहुत धक्का लगा था। अभी तक उसने गुरु जी द्वारा सिखायी लड़ने की कला को व्यायाम और अभ्यास की तरह से लिया था, उसने आजतक कभी किसी से इस तरह की मार-पिटाई नहीं की थी, न ही कभी इस तरह से खून बहाते घायल लोगों को मरते हुए देखा था। वहाँ से जाते हुए, बार-बार उसके सामने तस्कर की गर्दन में घुसे चाकू और फुव्वारे की तरह निकलते लाल खून की छवि उभर आती थी।

ओरी उसकी मनोस्थिति को समझ गया, बोला, “त्रिनेत्र, शायद आज तुमने पहली बार लड़ाई में किसी को इस तरह से मरते देखा है? तुम्हें इसके बारे में सोचने के लिए बाद में समय मिलेगा, लेकिन इस समय हमें अपने बचाव के बारे में सोचना है। हमारे कपड़ों पर खून लगा है और हो सकता है कि उन तस्करों के जासूस गाँव में हों, या हमारे होटल में भी हों। बेहतर होगा कि हम इस समय गाँव से हो कर नहीं लौटें और किसी तरह से होटल से अपना सामान ले कर यहाँ से चले जायें।"

उसकी बात सुन कर त्री थोड़ा होश में आया।

तब उसने अपने भीतर गार्गी की आवाज़ सुनी, वह कह रही थी, “दादा, आप लोग गाँव की ओर मत जाईये। बल्कि छोटी नदी को छोड़ कर, उत्तर दिशा में ब्रह्मपुत्र नदी की ओर आईये। हमारे पास नाव है, हम आप को नदी के किनारे किसी घाट से ले लेंगे। आप को होटल लौटने की भी आवश्यकता नहीं है, आभा दीदी वहाँ से सारा सामान ले आयेंगी।"

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अगला अध्याय सोमवार 31 अगस्त को पढ़ सकते हैं

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