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गुरुवार, अक्टूबर 08, 2026

दिमाग से जुड़ी विकलाँगताएँ

कुछ विकलांगताएँ इंसान के मस्तिष्क (दिमाग या ब्रेन) से जुड़ी होती हैं, जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी (cerebral palsy), डाउन सिंड्रोम (Down syndrome), डिस्लेक्सिया (dyslexia), आउटिज़्म (autism), इत्यादी।

इन्हें स्नायु-तंत्र की विकलांगता (neurological disability) कहते हैं क्योंकि इनमें दिमाग और स्नायु (nerves) की कुछ कमी या कमजोरी या बीमारी होती है। इन्हें बाल विकास की विकालंगता (developmental disability) भी कहते हैं क्योंकि अक्सर यह बचपन में पता चलती हैं जब बच्चा ठीक से, शारीरिक या मानसिक रूप से विकसित नहीं होता है। लेकिन दिमाग से जुड़ी कुछ विकलांगताएँ बड़े उम्र के लोगों में भी हो सकती हैं, जैसे कि दुर्घटना में सिर पर चोट लगने से।

सरलता के लिए, इस आलेख में इन सभी विकलांगताओं के लिए मैं "विकास-विकालंगता" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ।


 

यह आलेख विकास-विकालंगता वाले बच्चों-किशोरों और उनके परिवारों के लिए लिख रहा हूँ, ताकि वह अपने शारीरिक व कार्य-क्षमता के सशक्तिकरण की आवश्यकताओं (rehabilitation needs) को समझ सकें, ज़रूरत पड़ने पर उनके बारे में डॉक्टरों और थैरापिस्टों से बात कर सकें और स्वयं अपने बारे में निर्णय ले सकें।

आलेख लिखने के कारण

(1) विकास-विकालंगता सारा जीवन रहती है और उम्र के साथ व्यक्ति की ज़रूरतें बदलती रहती हैं। इसलिए आप को अक्सर डॉक्टरों या फिज़ियोथैरापिस्ट या अन्य थैरापिस्ट के पास जाना पड़ता है। इस आलेख से आप को अपने शरीर की कठिनाईयों की समझ आयेगी जिससे आप उन्हें अपनी बात बेहतर समझा सकते हैं।

(2) चूँकि विकास-विकालंगता सारा जीवन रहेगी तो आप हर बात के लिए डॉक्टर या थैरापिस्ट के पास नहीं जा सकते। इसलिए आप को अपनी देखभाल करना खुद सीखनी चाहिए ताकि आप घर पर अपने शरीर की क्षमता बनाये रखने के लिए नियमित रूप से वर्जिश, दिमागी एक्सरसाइज़, आदि कर सकें।

(3) आधुनिक तकनीकी (एप्प, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धि) की मदद से आप दुनिया भर के अपने जैसी कठिनाई के साथ जीने वाले अन्य लोगों से सम्पर्क कर सकते हैं, उनके अनुभवों से सीख सकते हैं, और उनके साथ अपने अनुभव बाँट सकते हैं। 

दिमाग के विभिन्न काम और उनसे जुड़ी विकलांगताएँ

इंसान का दिमाग अलग-अलग काम करता है, और विकास-विकलांगता की कठिनाईयाँ उनमें से किसी एक या कुछ कामों से जुड़ी होती हैं। विकास-विकलांगता को समझने के लिए, हम यह काम मुख्य रूप से तीन तरह के सोच सकते हैं - (1) माँसपेशियों को चलाना; (2)  सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि; (3)  सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि जताना। आईये अब इन्हें एक-एक करके देखें।

1. माँसपेशियों को चलाना:

माँसपेशियों को चलाना जीवन के लिए ज़रूरी है क्योंकि उनकी सहायता से हम चलते-फिरते, खाते-पीते, पढ़ते-लिखते सब तरह के काम करते हैं। इस क्षमता को विकास-विकलांगता समझने के लिए तीन अलग-अलग श्रेणियों में बाँट कर जाँचा जा सकता है - 

(अ) उँगलियों से महीन काम जैसे कढ़ाई करने या सूई में धागा डालने या लिखने की क्षमता। (Fine movement coordination and strength) - कुछ विकास-विकलांगताओं में केवल महीन काम करने में कठिनाई होती है।

(ए) बड़ी माँसपेशियों से मेहनत या ताकत वाला काम करना जैसे चलना, सामान उठाना या तीर चलाना या क्रिकेट का बल्ला घुमाना। (Gross movement coordination & strength)

(इ) मुँह-गले की माँसपेशियों द्वारा खाना चबाने और निगलने की क्षमता। अगर बच्चा ठीक से खाना नहीं सकता या जल-दूध आदि नहीं पी सकता तो बच्चे का स्वास्थ्य कमजोर हो जायेगा।

कुछ विकलांगताओं में जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी में शरीर के कुछ हिस्सों में यह क्षमता सही नहीं होती, जिससे वह अपनी माँस-पेशियों से सही तरीके से काम नहीं करवा पाते। 

आउटिज़्म में दिमाग में बाहर से सूचना लाने वाले स्नायु सैंसिटिव हो जाते हैं या अधिक काम करते हैं जिसकी वजह से वह किसी को छूना या अधिक पास आना, या शोर या तेज रोशनी पसंद नहीं करते। 

अगर आप को या परिवार में किसी को विकास-विकलांगता है तो इन तीनों तरह की माँस-पेशियों की क्षमता की अलग जाँच करनी चाहिये, क्योंकि इन सब का उपचार करने के लिए भिन्न तरीके हैं और हर व्यक्ति को उसकी ज़रूरत के अनुसार वर्जिश या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं।

2. सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि: 

दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में सोचने-समझने की भी अलग-अलग क्षमताएँ होती हैं। दिमाग का कोई हिस्सा यादाश्त का काम करता है, कोई दूसरा हिस्सा सुनी हुई बात को समझने का काम करता है, एक अन्य हिस्सा पढ़ी हुई बात को समझने का काम करता है, और अन्य हिस्सा गिनती का काम करता है, या अन्य हिस्सा भाषा या तर्क की समझ करता है। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि किस तरह की सोचने-समझने की क्षमता में कमी या कमज़ोरी है। अगर दिमाग का एक बड़ा हिस्सा पूरा काम नहीं कर रहा तो उससे बहुत सी क्षमताओं पर असर पड़ सकता है, जबकि अगर दिमाग का केवल कोई विशेष हिस्सा ठीक से काम नहीं कर रहा तो उसमें केवल किसी एक या दो क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। हर व्यक्ति भिन्न होता है, यह जानना कि वह किस बात में कमज़ोर है और किस बात में नॉरमल है, बहुत ज़रूरी है।

अक्सर बच्चे की एक तरह की समझ में कमी को, उसके पूरे दिमाग की कमज़ोरी समझ लेते हैं। 

डाउन सिंड्रोम में यादाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में कमजोरी हो सकती है, डिमैंशिया में यादाश्त काम नहीं करती, डिस्लेक्सिया में पढ़ने और लिखने में कठिनाई होती है। जब स्कूल जाने वाले बच्चों में यह विकलांगता हो तो उसे "सीखने की विकलांगता" (learning disability) भी कहते हैं।

 कई तरह की आउटिज़्म में भी समझ की कठिनाई हो सकती है जैसे कि आउसबर्गर सिंड्रोम आउटिज़्म में लोग शब्दों के संकेतात्मक अर्थ समझने में कठिनाई महसूस करते हैं, जैसे कि कोई कहे "अरे कितना बढ़िया गाना गाया, मार डाला रे" में "मार डाला" को सचमुच मारना समझ सकते हैं।

आधुनिक शोध ने दिखाया है कि अगर दिमाग के एक हिस्से में कमी है तो उसका दूसरा हिस्सा उस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है, लेकिन उसके लिए पढ़ाने और समझाने के नये तरीके सोचने पड़ सकते हैं। 

3. सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि: 

हमारे मन की सारी भावनाएँ भी दिमाग में ही बनती हैं। अगर दिमाग का यह हिस्सा ठीक से काम न करे तो वह लोग अपनी भावनाओं जैसे प्रेम या स्नेह को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाते या उनका अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रहता।

इस तरह की कठिनाईयाँ अधिकतर आउटिज़्म में दिखती हैं, जिनकी वजह से वह लोग किसी के प्रति प्रेम नहीं जता पाते और मित्र नहीं बना पाते। इन कठिनाईयों की वजह से कई बार विकास-विकालंगता वाले कुछ लोग अपने गलत व्यवहार या अपनी इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं कर पाते। 

अगर आप के परिवार में किसी बच्चे या किशोर को विकास-विकालंगता है

अगर आप के परिवार के बच्चे या किशोर को किसी तरह की विकास-विकालंगता है तो यह देखना चाहिये कि उस पर ऊपर बताई गई तीन तरह की क्षमताओं पर क्या असर है:

माँसपेशियों पर क्या असर है? ऊँगलियों के महीन काम पर क्या असर है? ताकत/मेहनत वाली बड़ी माँसपेशियों पर क्या असर है? खाना चबाने, निगलने पर क्या असर है?

सोचने-समझने की शक्ति पर क्या असर है? किस तरह की सोच-समझ पर कितना असर है जैसे कि गणित पर, तर्क समझने पर, सुनी बात पर, पड़ी बात पर, लिखने में, आदि। 

भावनाओं-व्यवहार पर क्या असर है?

केवल यह कहना काफी नहीं है कि विकास-विकालंगता है, दिमाग और शरीर के किस भाग पर उसका क्या असर है, जब तक वह पता नहीं चलेगा, उसकी ठीक से थैरेपी नहीं की जा सकती। अक्सर डॉक्टरों और थैरेपिस्ट को यह समझ नहीं होती या उनके पास समय नहीं होता कि वह हर बात की ठीक से जाँच करे और उसके लिए क्या करना चाहिये यह सलाह आप को धैर्य से समझायें। लेकिन अगर आप को यह समझ है तो आप अपने बच्चे के लिए सही उपचार खोज सकते हैं।

अगर बच्चे की कुछ माँसपेशियों में कोर्डिनेशन या संतुलन की कमी है तो उसकी थैरेपी भिन्न होगी, अगर उन माँसपेशियों में ताकत कम है तो उसकी थैरेपी अलग होगी। सोचिये कि अगर बच्चा लिखा हुआ पढ़ने में नहीं समझ पाता तो क्या उसके लिए सुन कर समझना या चित्रों से समझना अधिक आसान है? अगर उसे कहानी समझने में मुश्किल है तो क्या गणित में भी मुश्किल है? हर बात को अलग-अलग देखना और जाँचना चाहिये।

आधुनिक तकनीकी की सहायता

एक समय था जब हम सोचते थे कि अगर दिमाग के स्नायु-कोष (nerve cell) नष्ट हो गये हैं तो उसका कुछ नहीं हो सकता, वह नष्ट ही रहेंगे। जबकि आज की सोच है कि अगर दिमाग का एक हिस्सा काम नहीं कर रहा तो दिमाग के बाकी के हिस्से उस काम को कुछ हद तक करना सीख-सिखा सकते हैं।

अक्सर बच्चों-बड़ों के मन में लोगों की बातें सुन कर डर बैठ जाता है कि लोग हँसेंगे या बुरा-भला कहेंगे आदि। आप को मन में बैठे उन डरों की खुल कर बात करनी चाहिये और व्यक्ति को परिस्थिति से लड़ने की हिम्मत देनी चाहिये कि किसी के कहने-सोचने की परवाह मत करो। जब नये उपचार करते हैं तो उनका असर होने में समय लगता है, इसलिए हिम्मत बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। अगर आप को बच्चा कुछ नहीं कर पा रहा तो उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये, लेकिन अगर वह थोड़ा सा भी सुधार ला रहा है तो उसकी सराहना अवश्य करनी चाहिये।

यह सोचना कि थैरेपी से सारी कठिनाईयाँ ठीक हो जायेंगी, गलत है। कई बार, जो कमी बन गई है, उसमें सब कोशिश के बाद कोई अंतर नहीं आयेगा। लेकिन हर बच्चे के साथ इतनी कोशिश की जानी चाहिये कि उसका जितना विकास हो सकता है, उसे उसका मौका मिले। कई बार लोग सोचते हैं कि अगर बच्चा ठीक से चल नहीं पा रहा या बोल नहीं पा रहा तो बिना कोई जाँच किये सोच लेते हैं कि इसका दिमाग भी कमज़ोर है, वह बच्चे को मौका और सहारा नहीं देते। 

आज दुनिया भर के विकलांग लोग अपने और अपने परिवार वालों के अनुभव व्हाटसएप्प, फेसबुक, यूट्यूब आदि से बाँटते हैं, और आप उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। दुनिया की कोई भी भाषा हो, यूट्यूब पर आप उसके वीडियो के साथ अपनी भाषा में सबटाईटल के साथ देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप के बच्चे को सेरिब्रल पाल्सी है और उसे उँगलियों से महीन काम करने में कमजोरी है तो आप यूट्यूब पर इस विषय पर बहुत सारे वीडियो पायेंगे कि उँगलियों को महीन काम करने के लिए कौन सी एक्सरसाइज़ या थैरेपी कैसे करें।

बहुत से थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ इस तरह के वीडियो बनाते हैं और बहुत से माता-पिता या विकलांग व्यक्ति अपने अनुभवों के वीडियो बनाते हैं,  जिनसे आप घर बैठे सीख सकते हैं। वीडियो का फायदा है कि आप घर बैठे अपनी भाषा में सीख सकते हो और अपनी कोशिशों को मोबाइल से इंटरनेट पर डाल कर लोगों से सलाह माँग सकते हो।

अंत में

करीब पैंतिस-चालिस साल पहले जब मैंने विकलांग बच्चों के साथ काम करना शुरु किया था, उस समय स्थिति बहुत खराब थी। गाँव और छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के पास न सही अस्पताल या उपचार केन्द्र थे, न थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ। तब हम ऐसे विषयों पर सरल किताबें बनाते थे, और विभिन्न देशों के गाँवों जा कर वहाँ स्वास्थ्य सेवकों, स्वयंसेवको और परिवार वालों को सिखाते थे कि विकलांग व्यक्ति या बच्चे के लिए क्या करें, कैसे करें। आज अस्पताल, थैरेपिस्ट आदि भी अधिक हैं पर उससे भी महत्वपूर्ण बात है कि लोगों को इस बारे में जानकारी मिलना अधिक आसान हो सकता है और आप एक-दूसरे से भी सीख सकते हो।

आधुनिक तकनीकी, इंटरनेट और कृत्रिम-बुद्धि आदि की मदद से आप खुद इसके बारे में अधिक जानकारी पा कर, अपने लिए और अपने परिवार के लिए बेहतर उपचार खोज सकते हैं। 

बहुत से देशों में विकलांग एसोसियशन बनी हैं जो इस काम में आप को सहारा दे सकती हैं। सरकारों ने भी इस दिशा में नये कानून और सेवाएँ शुरु की हैं। आप को अपने क्षेत्र की विकलांग एसोसिएशन से संबध बनाने चाहिये और अगर आप के क्षेत्र में नहीं हो तो आप को खुद ऐसी एसोसिएशन बनाने का सोचना चाहिये।

अगर इस बारे में आप को कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो नीचे टिप्पणी लिखें, मैं उसका उत्तर देने की कोशिश अवश्य करूँगा।

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