शुक्रवार, मार्च 18, 2011

बीते दशक के सबसे प्रिय गीत

सुबह अचानक मन में आया कि जैसे जैसे उम्र बीतती हैं, दिन अधिक तेज़ी से गज़रने लगते हैं. लगता है कि अभी कल ही तो नव वर्ष के कार्ड भेजे थे, आज हवा में वँसत के ताज़े फ़ूलों की महक कल आने वाली गर्मी की असहनीय उमस का संदेशा दे रही है. फ़िर सोचा कि नये सहस्रयुग की पहली सदी का पहला दशक पूरा हो गया, पता ही नहीं चला. धर्मवीर भारती की कविता याद आती हैः

"दिन यूँ ही बीत गया
अँजुरी में भरा हुआ जल
जैसे रीत गया"

फ़िर सोचा कि समय के साथ तकनीकी कितनी जल्दी बदल रही है. कल की ही बात लगती है कि टेलेक्स, डोस (Dos) प्रयोग करने वाले कम्पयूटर, फाक्स, न्यूज़ग्रुप जैसी तकनीकें आयीं और चली भी गयीं. मेरे कुछ मित्र अब आईपेड का प्रयोग करते हैं पर मैं कोई चीज़, विषेशकर तकनीकी उपकरण, जल्दी नहीं बदलता.

लोग कहते हैं कि इन तकनीकों की वजह से लोग किताबें नहीं पढ़ते. मुझे नहीं लगता कि एक दिन कोई किताबें नहीं पढ़ेगा, मेरे विचार में लोग हमेशा किताबें पढ़ेंगे, फ़िल्मे देखेगे क्योंकि इनमें कहानियाँ हैं और मानव की कहानियाँ सुनने सुनाने की आदत तो आदिकाल से है. हाँ शायद कागज़ की किताब की जगह और सिनेमाहाल की जगह आईपेड या कुछ नया उपकरण ले लेगा.

फ़िल्मों की बात मन में आयी तो मन पंसद गीतों के बारे में सोचने लगा. इसी लिए लिस्ट बनाने की सोची कि पिछले दशक, यानि 2001 से 2010 के सबसे अच्छे संगीत वाली फ़िल्में कौन सी थीं? यानि वह फ़िल्में जिनमें केवल एक-दो याद रखने वाले गीत नहीं हों, बल्कि फ़िल्म का सारा संगीत मुझे पंसद होना चाहिये.

एक ज़माने में इस तरह की लिस्ट बनाते हुए यह याद करना असम्भव था कि दस साल पहले कौन सी फ़िल्में आयी थीं, पर आज गूगलदेव और विकिपीडिया देवी की मदद से हर साल की फ़िल्मों की लिस्ट खोजना आसान है. मेरी शर्त यह भी थी कि मेरी लिस्ट में शामिल होने के लिए फ़िल्म का संगीत इतना अच्छा होना चाहिये कि उस फ़िल्म का नाम सुनते ही उसके गीत अपने आप याद आ जायें, उन्हें खोजना न पड़े. तो प्रस्तुत है मेरी मन पसंद फ़िल्मों की लिस्ट जिनका संगीत मुझे सबसे अच्छा लगा.

Grafic by S Deepak on best Bollywood music 2001-2010

2001 में आयी फ़िल्मों में से कई फ़िल्मों का संगीत मुझे अच्छा लगा था जैसे कि - 'अशोका' (अनु मल्लिक), 'रहना है तेरे दिल में' (हेरिस जयराज) और 'ज़ुबैदा' (ए आर रहमान), लेकिन इतने साल बाद भी जिस फ़िल्म का संगीत दोबारा सुनने का मन करता है, वह है 'लगान' जिसमें संगीत था ए आर रहमान का. 'मितवा', 'राधा कैसे न जले', 'ओ पालनहारे' जैसे गीतों को याद करने के लिए कोई कठिनाई नहीं होती.

2002 में आयी फ़िल्मों में से मुझे संगीत अच्छा लगा था 'साथिया' (रहमान), 'देवदास' (इस्माईल दरबार), 'फ़िलहाल' (अनु मल्लिक), और 'लेजेंड आफ़ भगत सिंह' (रहमान) का. लेकिन जिस फ़िल्म का संगीत आज भी याद है वह थी 'सुर' जिसमें संगीत था एम एम करीम का. इस फ़िल्म से 'आ भी जा', 'खोया है तूने क्या ए दिल', 'क्या ढूँढ़ता है' और 'आवे मारिया', मुझे बहुत अच्छे लगे थे.

2003 में आयी फ़िल्मों से अच्छा संगीत वाली फ़िल्मों की सोचूँ तो 'कोई मिल गया', 'कल हो न हो', 'चलते चलते', 'झँकार बीटस' आदि के नाम याद आते हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं जिसे आज सुनना चाहूँगा. इस साल की फ़िल्मों से 'जिस्म' में श्रेया घोषाल का गाया "जादू है नशा है" की याद है लेकिन इस फ़िल्म से भी कोई और गीत याद नहीं आता.

2004 में निकली फ़िल्मों से मुझे सबसे पहले 'मीनाक्षी', 'स्वदेश' और 'युवा' में रहमान का संगीत याद आता है. इन तीनो फ़िल्मों में कई गीत है जो मुझे अब भी सुनना अच्छा लगता है. उसके अतिरिक्त 'धूम' और 'लक्ष्य' का संगीत भी अच्छा लगा था, लेकिन अगर इस साल की एक फ़िल्म चुननी हो तो वह होगी 'चमेली' जिसमें संगीत था संदेश शाँदलिया का. इसका 'भागे रे मन' जितनी बार सुन लूँ, मन नहीं भरता.

2005 में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों में इतनी फ़िल्में थीं जिनका संगीत मुझे अच्छा लगा था कि एक फ़िल्म को चुनना कठिन है. 'किसना' और 'वाटर' में रहमान का संगीत, 'पहेली' और 'रोग' में एम एम करीम का संगीत, 'परिणीता' में शाँतनु मोयत्रा का संगीत मुझे अच्छा लगा था. इसी साल हिमेश रेश्मैया ने 'आशिक बनाया आप ने' में धूम मचायी थी. 'बँटी और बबली' और 'दस' के गाने भी बढ़िया थे. बहुत सोच कर भी मैं इस साल की दो फ़िल्मों के बीच तय नहीं कर पा रहा कि मुझे सबसे अच्छी कौन सी फ़िल्म का संगीत लगा था, यह फ़िल्में थीं 'ब्लफ़ मास्टर' और 'मोर्निंग रागा'. 'ब्लफ़ मास्टर' में अभिशेख का गाया 'राईट हेयर राईट नाओ', 'से ना से ना शी डिट इट टू मी' जैसे गाने मुझे बहुत अच्छे लगे थे, जबकि 'मोर्निंग रागा' में मेरा परिचय हुआ था कर्नाटक संगीत से मिले जुले फ्यूजन संगीत से. इस फ़िल्म से 'थाये यशोधा', 'माटी' और शबाना आज़मी की गायी तान मुझे बहुत प्रिय है.

2006 में आयी फ़िल्मों में 'ओंकारा', 'कभी अलविदा न कहना', 'जानेमन' और 'रंग दे बँसती' का संगीत मुझे अच्छा लगा था. 'जानेमन' से अनु मल्लिक का 'अजनबी शहर है' सुन कर मुझे 1960 के दशक की शंकर जयकिशन की याद आती है. 'कभी अल्विदा न कहना' से शंकर एहसान लोय का 'मितवा' बहुत सुन्दर था. लेकिन इन में ऐसी कोई फ़िल्म नही़ जिसे मैं चुनना चाहूँगा.

2007 की फ़िल्मों में से मेरी प्रिय हैं प्रीतम की 'लाईफ़ इन ए मेट्रो' और 'जब वी मेट', और रहमान की 'गुरु'. 'नमस्ते लँडन' से हिमेश का 'मैं जहाँ रहूँ' बहुत अच्छा लगा था. 'तारे ज़मीन पर' का संगीत भी अच्छा लगा था. लेकिन इस साल सबसे पंसदीदा संगीत 'झूम बराबर झूम' फ़िल्म से था जिसमें संगीत था शंकर एहसान लोय का. तीन साल बाद भी इसके गाने मेरे आईपोड पर हैं.

2008 में एक बार फ़िर बहुत सी ए आर रहमान की फ़िल्मों का संगीत बहुत अच्छा था - 'गज़नी', 'जाने तू या जाने न' और 'जोधा अकबर'. इनके अतिरिक्त मुझे 'सिंग्ह इज़ किंग' और 'रेस' के गाने भी अच्छे लगे थे. पर साथ ही 'राक ओन' में शंकर एहसान लोय का संगीत बहुत अच्छा लगा था. इस साल की फ़िल्मों से सबसे पंसदीदा फ़िल्म एक फ़िल्म नहीं चुन पा रहा, 'जोधा अकबर' और 'राक आन' के बीच में फैसला नहीं कर पा रहा.

2009 में मुझे अच्छा संगीत लगा था 'लव आज कल', 'कुर्बान' और 'लंडन ड्रीमस' का, लेकिन इस साल दो फ़िल्मों का संगीत इतना अच्छा लगा कि दो साल के बाद भी, इन्हें अक्सर सुनता रहा हूँ - विशाल भारद्वाज की 'कमीने' और रहमान की 'दिल्ली 6', और इन दोनो के बीच से एक फ़िल्म को नहीं चुन पाता.

अंत में पिछले दशक के आखिरी साल 2010 में भी बहुत सी फ़िल्मों का संगीत मुझे अच्छा लगा जैसे 'खेलें हम जी जान से', 'स्ट्राईकर', 'राजनीति', 'वनस अपोन ए टाईम एइन मुम्बई', 'इश्किया', 'गुज़ारिश', 'बैंड बाजा बारात', आदि. इस साल से मेरा चुनाव है 'लम्हा' जिसमें मिथून का संगीत था. इस फ़िल्म से 'मदनों', 'साजना', 'रहमत खुदा' जैसे गाने मुझे लगता है कि कई साल बाद भी मुझे अच्छा लगते रहेंगे.

तो अगर मेरे पसंद की फ़िल्मों की लिस्ट बनायी जाये जिनका संगीत मुझे सबसे अच्छा लगा तो उसमें होंगी यह 11 फ़िल्में - लगान, सुर, चमेली, ब्लफ़ मास्टर, मार्निंग रागा, झूम बराबर झूम, जोधा अकबर, राक ओन, कमीने, दिल्ली 6 और लम्हा.

हम सब की पसंद भिन्न होती है, अगर आप से पूछा जाये कि आप को कौन सी फ़िल्म का संगीत सबसे अच्छा लगा तो आप क्या कहेंगे?

मुझे इन 11 में एक फ़िल्म चुननी हो तो मैं चुनूँगा, दिल्ली 6 को. अगर आप से पिछले दशक की एक फ़िल्म को चुनने का कहा जाये जिसका संगीत आप सबसे अच्छा लगा तो आप किस फ़िल्म को चुनेंगे?

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बुधवार, मार्च 16, 2011

देशभक्ती और भाषा

हिन्दी के भविष्य के बारे में चिन्ता भरी चर्चा हो रही हो, तो हम यह सवाल भी पूछ सकते हैं कि दुनिया की अन्य भाषाओं में भी क्या आज ऐसी ही चर्चाएँ हो रही हैं? और अगर हाँ तो वे क्या सोच रहे हैं, कर रहे हैं और उनसे क्या हम कुछ सीख सकते हैं. चूँकी मैं इटली में रहता हूँ, यूरोप में फ्राँसिसी, जर्मन आदि भाषाओं की इस तरह की चर्चा सुनने को मिलती हैं, लेकिन इस समय मैं केवल इतालवी भाषा में होने वाली चर्चा की करना चाहता हूँ.

इस वर्ष इटली के एक हो कर राष्ट्र बनने की 150वीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है. इस बात पर इतने झगड़े हो रहे हैं कि सुन कर अचरज होता है. अचरज इसलिए कि बहस में लोग इटली की एकता के विरुद्ध टीवी और अखबारों में खुले आम बोलते हैं, लेकिन इस पर कोई "देशद्रोही" कह कर या "देश का अपमान किया" कह कर, कोई यह बात नहीं कर रहा कि इन्हें जेल होनी चाहिये या इन पर मुकदमा होना चाहिये. जैसे कि उत्तर पूर्वी इटली के राज्य आल्तो अदिजे (Alto Adige) के मेयर ने टीवी पर साफ़ कह दिया कि वह इटली की एकता के किसी समारोह में भाग नहीं लेंगे और न ही उन्हें इटली की एकता की कोई खुशी है. इसका कारण है कि इटली का यह हिस्सा प्रथम विश्वयुद्ध के पहले आस्ट्रिया का हिस्सा था और युद्ध में आस्ट्रिया की हार के बाद इटली से जोड़ दिया गया था. आज भी वहाँ के बहुत से लोग आपस में और घर में जर्मन भाषा बोलते हैं. हालाँकि यूरोपीय संघ बनने के बाद से इटली और आस्ट्रिया के बीच की सीमा का आज सामान्य जीवन में कुछ असर नहीं, पर पुराने घाव हैं जिन्हें वह खुले आम कहते हैं.

इटली की सरकार में "लेगा नोर्द" (Lega Nord) नाम की पार्टी भी है जिसके लोग सोचते हैं कि उत्तरी इटली के लोग, दक्षिणी इटली से भिन्न और ऊँचे स्तर के हैं. इनका पुराना नारा था कि "रोम के लोग सब चोर हैं और हम चोरों की सरकार को नहीं मानेगें". इस नारे को उन्होंने सरकार में शामिल होने के बाद, कुछ सालों के लिए स्थगित कर दिया है. यह पार्टी उत्तरी इटली को अलग देश बनाने की बात करती थी, पर सरकार में आने के बाद इनका राग थोड़ा सा बदल गया है. अब यह लोग अलग देश बनाने की बजाय बात करते हैं राज्यों के फेडरेलाइज़ेशन की, यानि देश के विभिन्न राज्यों को अपने निर्णय लेने की और अपनी नीतियाँ निर्धारित करने की स्वतंत्रता हो. देश की एकता की 150वीं वर्षगाँठ को इनमें से कुछ लोग शोक दिवस के रूप में देखते हैं, इसलिए इनमें से बहुत से लोग इस बात से भी सहमत नहीं कि इस वर्ष राष्ट्र एकता दिवस की 17 मार्च को विषेश राष्ट्रीय छुट्टी दी जाये.

"सारे देश में एक दिन की छुट्टी नहीं की जा सकती. उससे तो हमारी फैक्टरियों का, हमारे काम का बहुत नुक्सान होगा. वैसे ही मन्दी चल रही है, उस पर से एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी, यह हम नहीं मान सकते", इस तरह की बातें करने वाले स्वयं सरकारी मंत्री भी थे. पहले सरकार ने घोषणा की कि 17 मार्च को पूरे देश में सरकारी छुट्टी होगी, पर जब सरकारी मंत्री ही इस छुट्टी के खिलाफ़ बोलने लगे तो सरकार ने कहा कि इस विषय पर मंत्री मीटिंग में बात की जायेगी. एक महीने तक बहस होती रही कि यह छुट्टी दी जाये या नहीं. आखिरकार छुट्टी को मान लिया गया, लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि अगर कोई इस दिन अपनी फैक्ट्री, दुकान या सुपरमार्किट खोले रखना चाहता है तो उन्हें इसकी छूट होगी.

इस पर कुछ अन्य पार्टियों ने और कामगार यूनियनों ने अभियान चलाया कि देश की एकता के विरुद्ध बोलने वालों को करारा जवाब दिया जाये और कई दिनों से कह रहे हैं कि 17 मार्च को हर घर की एक खिड़की पर इटली का राष्ट्रीय झँडा लगा होना चाहिये. मेरी एक मित्र बोली, "यह दुनिया इतनी बदल गयी है कि समझ में नहीं आता कि हमारी पहचान क्या है? मैं पुरानी कम्यूनिस्ट हूँ, हम लोग राष्ट्रवाद के विरुद्ध लड़ते थे, हम कहते थे केवल अपने देश की बात नहीं, बल्कि दुनिया में शाँति होनी चाहिये. तब राष्ट्रीय झँडा वह दकियानूसी लोग लगाते थे जो कहते थे कि हमारा देश सब अन्य देशों से ऊँचा है, हमारी संस्कृति सबसे अच्छी है, विदेशियों को देश से निकालो. आज वे दकियानूसी लोग देश का झँडा नहीं लगाना चाहते, और हम कम्यूनिस्ट हो कर देश का झँडा लगाने की बात रहे हैं."

इन चर्चाओं को सुन कर मुझे भारत में होने वाली कश्मीर या नागालैंड में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाया जाये या नहीं वाली चर्चाएँ याद आती हैं, हालाँकि भारत में इस तरह की बातों पर लोग बहुत गुस्सा हो जाते हैं, मरने मारने की बातें करने लगते हैं.

इस तरह की बहसों के साथ साथ, देश की भाषा के बारे में कुछ इस तरह की चर्चाएँ भी हो रही हैं जिसमे मुझे लगा कि शायद भारत में हिन्दी के बारे में होने वाली चर्चा से कुछ समानताएँ हैं.

इटली में हर क्षेत्र की अपनी स्थानीय बोली थी, लेकिन स्कूलों में केवल इतालवी भाषा में ही पढ़ायी होती है. पिछले कुछ सालों में वह लोग बढ़े हैं जो "हमें अपनी स्थानीय बोलियों पर गर्व है" की बात करते हैं. यह लोग इन स्थानीय भाषाओं में रेडियो प्रोग्राम करते हैं, नाटक, गीत समारोह आदि का आयोजन करते हैं, ब्लाग लिखते हैं. लेकिन युवा वर्ग को पुरानी स्थानीय बोलियों का उतना ज्ञान नहीं. धीरे धीरे स्थानीय बोलियाँ लुप्त हो रही हैं, युवा लोग घर में, और आपस में केवल इतालवी भाषा ही बोलते हैं.

दूसरी ओर पिछले दो दशकों में इटली में अंग्रेज़ी जानने बोलने की क्षमता पर भी बहुत सी बहसें हो रही हैं. नौकरी खोज रहे हों तो अंग्रेज़ी जानने से नौकरी मिलना अधिक आसान है. लेकिन भारत में हिन्दी की स्थिति से एक महत्वपूर्ण अंतर है. भारत में अच्छी नौकरी के लिए हिन्दी न भी आती हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता जबकि यहाँ पर बिना अच्छी इतालवी भाषा जाने काम नहीं चल सकता. अब यहाँ अंग्रेज़ी पहली कक्षा से ही पढ़ायी जा रही है. कम्पयूटरों और तकनीकी विकास के साथ, इतालवी भाषा में अंगरेज़ी के शब्दों के आने से भी चिन्ता व्यक्त की जाती है कि हमारी भाषा बिगड़ रही है, इसका क्या होगा!

वामपंथी पार्टी के अखबार ल'उनिता (L'Unità) यानि "एकता" ने कुछ दिन पहले एक इतालवी चिट्ठाकारों की गोष्ठी आयोजित की जिसमें देश की एकता की बात की गयी कि देश का चिट्ठाजगत इस विषय में क्या सोचता है? एक जाने माने चिट्ठाकार लियोनार्दो (Leonardo) ने इस बारे में अपने चिट्ठे में लिखाः
"आज जितने लोग इतालवी भाषा में लिखते हैं, छापते हैं, इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. भाषा विषेशज्ञ रोना रोते हैं कि भाषा का स्तर खराब हो रहा है, और उनकी बात अपनी जगह पर ठीक भी है. लेकिन मात्रा की दृष्टि से देखा जाये तो इतालवी भाषा में पिछले एक वर्ष में इतना लिखा गया जितना इंटरनेट के आविष्कार के बाद के पहले पंद्रह सालों में नहीं लिखा गया था. आज इंटरनेट पर इतालवी भाषा के चिट्ठे, वेबपन्ने, चेट, नेटवर्क फ़ल फ़ूल रहे हैं, हर कोई लिखना चाहता है.

बहुतों ने इटली की एकता की 150वीं वर्षगाँठ पर भी लिखा है, चाहे यही लिखा हो कि वह देश की एकता नहीं मनाना चाहते, कि जीवन में और बहुत सी कठिनाइयाँ हैं नागरिकों की, वे लोग उनकी बात करना चाहते हैं, पर यह सब बातें इतालवी भाषा में लिख रहे हैं ...

अगर आज देश की एकता के लिए जान देने वाले लोग यहाँ आकर हमें देख सकते तो वे क्या सोचेंगे? वे हैरान होगें और खुश होंगे यह देख कर कि देश के उत्तर से ले कर दक्षिण तक कितने लोग इतालवी भाषा में लिख रहे हैं. उनके समय में यह देश विभिन्न बोलियों में बँटा था और उन्होंने निर्णय किया था कि देश को एक बनाने के लिए उसे एक भाषा देनी होगी. आज हम इस भाषा में कितना लिख रहे हैं, हर कोई किताब, कविता, चिट्ठा लिख रहा है, हम लिखते हुए थकते नहीं. इतालवी भाषा के विकिपीडिया में 7 लाख अस्सी हज़ार विषयों पर लेख हैं, इतने तो स्पेनी भाषा में भी नहीं जो कि बीस देशों में बोली जाती है. यह सच है इतालवी भाषा इन सालों में बहुत बिगड़ी है, पर जितनी जीवित आज है इतनी पहले कभी नहीं थी. आज हम सब इसी भाषा के गाने गाते हैं, इसी भाषा में फ़िल्म देखते हैं, इसी भाषा में चेट करते हैं, चिट्ठे लिखते हैं."
क्या इसका मतलब है कि भारत में इंटरनेट के फ़ैलने से हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को बढ़ने का मौका मिलेगा? भारत में धीरे धीरे इंटरनेट का विस्तार हो रहा है, साथ ही हिन्दी, तमिल, तेलगू, मराठी, बँगाली आदि भाषाओं में लिखने का विस्तार भी हो रहा है. नयीं तकनीकें जो भारत में बन रही है, टेलीफ़ोन, कम्पयूटर, ईपेड आदि, इन सबको केवल पैसे वालों के लिए ही नहीं बल्कि जनता के बाज़ार में बिकना है तो हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को जगह देनी ही होगी. हर कोई अपनी बात कहना चाहता है, पर अपने तरीके से. जब उस 90 प्रतिशत भारत को मौका मिलेगा अपनी बात कहने का तो वह हिन्दी में या अपनी भाषा में ही करेगा.

तकनीकी में, विज्ञान में, इतिहास और कला में, आज कहीं भी विश्वविद्यालय स्तर की शोध का काम अगर हिन्दी में किया जाये तो उसे वह सम्मान नहीं मिलता जो अंग्रेज़ी में किये जाने वाले काम को मिलता है. शायद इसलिए कि आज उस 90 प्रतिशत की आर्थिक ताकत कम है. लेकिन कल तकनीकी के विकास के साथ जब वह 90 प्रतिशत इन विषयों को समझना जानना चाहेगा, तो हिन्दी में यह काम बढ़ेगा, इसलिए नहीं कि कुछ लोग हिन्दी प्रेमी हैं, बल्कि इसलिए कि बाज़ार उसकी माँग कर रहा है.

Flags and languages - design by Sunil Deepak

जिन्हें हम भारत में "अंग्रेज़ी भाषी" कहते हैं, उनमें से बहुत सा हिस्सा बोलने लायक अंग्रेज़ी तो जानता है पर वह भारतीय अंग्रेज़ी है जिसे समझने के लिए विदेशियों को अनुवाद की आवश्यकता होती है. इस अध कच्ची अंग्रेज़ी का विकास किस ओर होगा? शुद्ध अंग्रेज़ी की ओर या अपनी भाषाओं की ओर? जब भारतीय भाषाओं का बाज़ार बढ़ेगा तो क्या यह भारतीय अंग्रेज़ी एक दिन उन्हीं में घुल मिल जायेगी?

शुक्रवार, मार्च 04, 2011

हाहाकार का नाम

"ख़ामोशी" फ़िल्म में गुलज़ार साहब का एक बहुत सुन्दर गीत था, "हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबु ... प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो". लेकिन अगर आँखों में प्यार नहीं हाहाकार हो तो क्या उसे नाम देने की कोशिश करना ठीक है?

कुछ दिन पहले घुघूती बासूती जी के चिट्ठे पर "बच्चा खोने के दर्द" में जमनीबाई की कहानी पढ़ते पढ़ते, अचानक मन में कुछ साल पहले की एक पार्टी की याद उभर आयी थी. मेरे साथ काम करने वाले मित्र के यहाँ थी वह पार्टी. वहीं मेरी मुलाकात एक अर्जेनटीनी युवक से हुई जो तब जेनेवा में रहता था. मैं तब कई महीने तक जेनेवा में रह कर वापस इटली लौटा था और हम लोग आपस में जेनेवा में रहने के अपने अनुभवों की बात कर रहे थे. क्या नाम था उसका यह याद नहीं, लेकिन क्या बात कही थी उसने, वह याद है.

खाना लगा तो हम दोनो साथ साथ ही बैठे और बातें करते रहे. खाना समाप्त हुआ तो हम दोनो वाईन का गिलास ले कर, बाहर बालकनी में आ खड़े हुए. मेरे मित्र का घर पहाड़ी पर है और बालकनी के नीचे बड़ा बाग है, जहाँ महमानों के बच्चे शोर मचाते हुए खेल रहे थे. पहाड़ी पर उतरती शाम के साये, हल्की सी ठँड, बहुत सुन्दर लग रहा था. यात्राओं की बात चल रही थी, तो उसने अपने पंद्रह बीस साल पहले के एक अनुभव के बारे में बताना शुरु किया जब वह बुओनुस आयरस के विश्वविद्यालय से एन्थ्रोपोलोजी में नयी स्नातक डिग्री ले कर निकला था और अपने विश्वविद्यालय के कुछ मित्रों के साथ मिल कर वहीं के एक छोटे से फोरेन्सिक एन्थ्रोपोलोजी में काम करने वाले एक छोटे से गुट में काम करने लगा था.

एन्रथ्रोपोलोजी यानि मानवविज्ञान में मानव जीवन, रहन सहन, रीति रिवाज़, सभ्यता जैसे विषयों को पढ़ा जाता है, जैसे कि लोग आदिवासी जातियों के बारे में यह सब बातें जानने की कोशिश करते हैं. "फोरेन्सिक एन्थ्रोपोलोजी" (Forensic anthropology) यानि "कानूनी मानवविज्ञान", हड्डियों और अन्य मानव अवषेशों की सहायता से उनके बारे में जानने की कोशिश करता है. यही काम था उस गुट का, सत्तर के दशक में अर्जेन्टीना में हुए तानाशाही शासन में गुम कर दिये गये लोगों की सामूहिक कब्रों से हड्डियाँ निकाल कर, यह समझने की कोशिश करना कि वह किसकी हड्डियाँ थीं और उन्हें उस व्यक्ति के परिवार को देना ताकि वह उसका ठीक से संस्कार कर सकें. कुछ ही सालों में यह गुट इस तरह के काम करने में इतना दक्ष हो गया था कि आसपास के देशों से भी उन्हें बुलावे आने लगे थे कि वहाँ जा कर सामुहिक कब्रों में रखे अवषेशों की पहचान में उनकी मदद करें.

इसी काम में उस युवक को ग्वाटेमाला जाने का मौका मिला था, जिस यात्रा की वह बात बता रहा था, "बड़ी सामुहिक कब्र थी, जिसमें उन्होंने सौ से भी अधिक बच्चे मार कर डाले थे. उनकी हड्डियों को जोड़ कर शवों को अलग अलग करके पहचानने की कोशिश करने का काम था. सभी बच्चे बारह साल से छोटी उम्र के थे. बच्चों की हड्डियाँ देखने लगे तो समझ में आया कि उन्हें किस तरह मारा गया था. शायद उनके पास गोलियाँ कम थीं या गोलियाँ मँहगी होती हैं और वह इतना खर्चा नहीं करना चाहते थे. तो वह लोग बच्चे का सिर चट्टान पर मार कर फोड़ते थे और फ़िर उसके शव को नीचे खड्डे में फैंक देते थे."

शायद वाईन का असर था या उस सुन्दर शाम का, मैं पहले तो स्तब्ध सुनता रहा, फ़िर मुझे रोना आ गया. मुझे रोता देख वह चुप हो गया.

बासूती जी की पोस्ट पढ़ी तो यह बात याद आ गयी. दुनिया में कितने बच्चों का दर्द जिनके माता पिताओं को गायब कर दिया गया, कितने माता पिताओं का दर्द, जिनके बच्चों को गायब कर दिया गया.

मैंने इंटरनेट पर फोरेन्सिक एन्थ्रोपोलोजी के उस अर्जेन्टीनी गुट के बारे में खोजा तो मालूम चला कि उसका नाम है एआफ यानि "एकीपो अर्जेन्टिनो दे एन्थ्रोपोलोजिया फोरेन्से" (Equipo Argentino de Antropología Forense, EAAF). उनके बारे में अधिक जानना चाहते हैं तो उनके वेबपृष्ठ पर पढ़ सकते हैं. इंटरनेट पर एआफ की सन 2007 की वार्षिक रिपोर्ट भी है जिसमें उनके काम के बारे में बहुत सी जानकारी मिलती है.

मुझे इस रिपोर्ट में उन देशों की लम्बी लिस्ट देख कर हैरत हुई, जहाँ एआफ को इस तरह सामूहिक कब्रों में हड्डियों की पहचान के लिए बुलाया गया है. यानि दुनिया के इतने सारे देशों में तानाशाहों ने, या तथाकथित जनतंत्रों में भी पुलिस या मिलेट्री ने कितने हज़ारों लोगों को मारा होगा! हड्डियों से पहचानना कि यह कौन सा व्यक्ति था, इस काम में अर्जेन्टीना का यह गुट "एआफ" दुनिया के सबसे अनुभवी गुटों में गिना जाता है और यह लोग एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमरीका के विभिन्न देशों में काम कर चुके हैं. कुछ वर्ष पहले उन्होंने दक्षिण अमरीकी क्राँतिकारी चे ग्वेवारा के अवषेशों से उनकी कब्र को पहचान कर बहुत प्रसिद्ध पायी थी. जब एआफ ने काम करना शुरु किया था तो डीएनए की जाँच करना संभव नहीं था लेकिन पिछले दशक में यह तकनीक बहुत आसान हो गयी है और पहचान में आसानी हो गयी है. अपने बच्चों या प्रियजनों को खोजने वालों से थोड़ा सा खून देने को कहा जाता है और उस खून के डीएनए को हड्डियों के डीएनए से मिलाया जाता है.

सब लोगों के शव नहीं मिलते. एक एक करके मारना खर्चीला होता है, कहते हैं कि अर्जेन्टीना में लोगों को मिलट्री वाले जहाज़ में बिठा कर ले जाते थे, और समुद्र के ऊपर सबको बाहर धक्का दे देते थे.

Monument to the dead, certosa cemetry, Bologna

सत्तर के दशक में अर्जेंन्टीना में करीब 9000 लोग "गुम" किये गये. पहले तो सालों तक उन लोगों की माएँ, नानियाँ, दादियाँ लड़ती रहीं यह जानने के लिए कि उनके बच्चों का क्या हुआ. जिन नवयुवकों और नवयुवतियों को "गुम" किया गया, कई बार उनके बच्चों को नहीं मारा गया, बल्कि, उनके माँ बाप को मारने वाले मिलेट्री वालों के कुछ परिवारों ने उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला. आज भी, तीस चालिस सालों के बाद, उन्हीं परिवारों की नयी पीढ़ियाँ इसी लड़ाई में लगे हैं, या जानने के लिए कि उनके परिवार के लोगों का क्या हुआ. बहुतों के मन में आशा है कि शायद उनके खोये हुए बच्चों का पता मिल जाये. वह न भी मिले, परिवार वालों को अपने प्रियजन के मृत शरीर के अवषेश मिलना भी एक तरह की मानसिक शाँती है जिससे कि सालों की खोज और उससे जुड़ी आशा समाप्त हो जाती है.

हमारे रिश्ते, हमारे परिवार, हमारे बच्चे ही हमारे जीवन का सार हैं. उनके बिना जीवन भी अर्थहीन लगे. अगर अपना किसी दुर्घटना में मरे या मार दिया जाये, तो भी वेदना कम नहीं होती, लेकिन मन को समझ तो आ जाता है कि जाने वाला चला गया. जिन्होंने अपने खोये हैं, जो एक दिन घर से निकले फ़िर वापस नहीं आये, या जिन्हें पुलिस ले गयी पर उनका कुछ पता नहीं चले कि क्या हुआ, तो मन भटकता ही रहेगा, इसी आशा में शायद कहीं किसी तरह से बच गयें हों और एक दिन मिल जायें.

हड्डियों को नाम मिल जाने से, जिसे खोया था वह तो नहीं मिल सकता लेकिन उसे खोने का जो हाहाकार आँखों में बसा होता है, उसे एक नाम मिल जाता है.

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बुधवार, मार्च 02, 2011

दुनिया का पाकिस्तानीकरण

कुछ समय पहले सूडान में एक जनमत हुआ जिसमें देश के दक्षिणी भाग में रहने वाले लोगों को चुनना था कि वह सूडान में रहना चाहेंगे या फ़िर अपना अलग देश चाहेंगे. इस जनमत का नतीजा निकला है कि 98 प्रतिशत से अधिक दक्षिणी सूडान के लोग अपने लिए अपना अलग देश चाहते हैं. अधिकतर लोगों ने इस जीत का स्वागत किया है, वह कहते हैं कि इससे लाखों लोगों की मृत्यु और वर्षों से चलते दंगों का अंत होगा. धर्म के नाम पर अलग देश चाहने वालों की जीत से मेरे मन में बहुत से प्रश्न उठे, जिनके उत्तर शायद आसान नहीं.

अफ्रीकी जीवन के विषेशज्ञ प्रोफेसर अली मज़रुयी का एक लेख पढ़ा जिसमें मुझे अपने प्रश्नों की प्रतिध्वनि दिखी. प्रोफेसर मरज़ुई ने इसे "दुनिया का बढ़ता हुआ पाकिस्तानीकरण" कहा है. उन्होंने लिखा हैः
यूरोपीय साम्राज्यवाद के बाद के अफ्रीका महाद्वीप में दो तरह की लड़ाईयाँ हुई हैं - आत्म पहचान की लड़ाईयाँ जैसे कि रुवान्डा में हुटू और टुटसी की लड़ाई, और प्राकृतिक सम्पदा की लड़ाई जैसे कि नीजर डेल्टा में पैट्रोल के लिए होने वाली लड़ाई... पर अफ्रीकी महाद्वीप में 2000 से अधिक जाति गुट बसते हैं, अगर उनमें से दस प्रतिशत को भी अपने लिए स्वतंत्र राज्य मिले तो अफ्रीका छोटे छोटे देशों में बँट जायेगा जिनमें आपस में युद्ध होंगे. ..अफ्रीका में होने वाले विभिन्न, अपना अलग राज्य पाने के प्रयासों के पीछे, अधिकतर जाति या नस्ल के प्रश्न रहे हैं, न कि धार्मिक प्रश्न. 1950 के दशक में क्वामे न्करुमाह जैसे अफ्रीका नेताओं ने "पाकिस्तानीकरण" के विरुद्ध, यानि धार्मिक बुनियादों पर अलग होने के विचार पर चिंता व्यक्त की थी. जब भारत का विभाजन हुआ था, कई अफ्रीकी राष्ट्रवादी नेता, ब्रिटिश भारत में हिंदू मस्लिम तनाव का कारण बता कर में भारत के विभाजन करने के विरुद्ध थे, क्योंकि जानते थे कि अफ्रीका में भी ऐसे कुछ देश थे, जहाँ इस तरह के निर्णय लिये जा सकते थे. जैसे कि नाईजीरिया जहाँ उत्तर में मुसलमानों का बहुमत है और दक्षिण में ईसाईयों का.

आखिर यह नीति सुडान तक पहुँच गयी है, ईसाई बहुमत वाला दक्षिणी भाग, उत्तरी मुस्लिम भाग से अलग हो जायेगा. दक्षिणी सूडानी कहते हैं कि उत्तरी सूडानी उनसे भेदभाव करते हैं... लेकिन दक्षिण सूडान भी अलग जाति गुटों से बना है. कल को वहाँ रहने वाली अल्पमत गुट कहने लगेगें कि डिंका लोग हमें समान अधिकार नहीं देते. पैट्रोल की सम्पदा को कैसे बाँटा जाये, भी जटिल प्रश्न होगा.
धर्म के नाम पर, या अन्य किसी जाति विभिन्नता के नाम पर अलग देश माँगना, एक ऐसा चक्कर है जो कहीं नहीं रुकता. पाकिस्तान अलग देश बना तो क्या उसके अपने बलूचियों, सिंधियों, पँजाबियों, पठानों के बीच के अंतर्विरोध मिट गये? भारत के उत्तर में कश्मीर की घाटी में इसी नाम से हिँसा आज भी जारी है. किसी भी देश के सब निवासियों को जाति, धर्म आदि के भेदों से ऊपर उठ कर विकास के समान अधिकार मिलें यह अवश्यक है, और उन्हें ऐसी सरकारें चाहियें जो यह नीति लागू कर सकें. पर जब ऐसा नहीं होता, या किसी गुट को लगे कि उसके साथ न्याय नहीं हो रहा, तो अलग अपना देश या राज्य माँगने लगते हैं. लेकिन मुझे लगता है कि अक्सर, बँटवारा चाहने वाले, समान विकास और अधिकारों के प्रश्न को महत्वपूर्ण नहीं मानते, अपनी जाति, मान, रीति और धर्म के प्रश्न उठा कर राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काते हैं और पीछे ध्येय होता है कि कैसा बाकी सब गुटों से ताकतवर बने और देश की सम्पदा को अपने काबू में रखें.

कुछ देशों में मुस्लिम बहुमत वाले इलाकों ने शरीयत पर आधारित काननों को सब पर लागू कराना चाहा है, वह ज़ोर डालते हैं कि सब लोग उनके कहे के अनुसार पहने, खायें, व्यवहार करें. इससे अलग होने की भावना तेज होती है. नाईजीरिया में इसी वजह से तनाव बढ़े हैं. भारत के कुछ हिस्सों में हिंदू संस्कृति या मुसलमान आत्मनिष्ठा के नाम पर लोगों पर इसी तरह के दबाव डालते हैं. यही वजह है कि जब सूडान के दक्षिण वाले लोगों के जनमत में अलग होने के निर्णय के बारे में सुना तो मुझे कुछ भय सा लगा कि इससे अलग होने वाले गुटों को बल मिलेगा.

आज की दुनिया की बहुत सी समस्याओं की जड़ें पिछली सदी के यूरोपीय साम्राज्यवाद में छुपी हैं. साम्राज्यवाद के समाप्त होने के बाद भी, यूरोप ने विभिन्न तरीकों से अफ्रीका, अमरीका और एशिया के देशों में अपने स्वार्थ के लिए तानाशाहों को सहारा दिया है, जिसमें देशों में रहने वाले विभिन्न गुटों को समान अधिकार नहीं मिले. आज जहाँ एक ओर विभिन्न अरब देशों में इजिप्ट, टुनिज़ि, लिबिया जैसे देशों में हो रहे जनतंत्र के आन्दोलन इस्लाम की नहीं, मानव अधिकारों के मूल्यों की आवाज़ उठा रहे हैं, वहीं जनतंत्र की दुहायी देने वाले यूरोपी नेता अपने तानाशाह मित्रों पर आये खतरे से घबरा कर "इस्लामी रूढ़िवाद" के डर की बात कर रहे हैं.

दूसरी ओर, यूरोप में रहने वाले अन्य देशों से आये प्रवासियों में रूढ़िवादी धार्मिक नेताओं की आवाज़, अपने मानव अधिकारों के नाम पर पारम्परिक रीति रिवाज़ों और मूल्यों को बनाये रहने की लिए ही उठती है. यही लोग अक्सर विदेशों से अपने देशों में रुढ़िवादी और देशों को बाँटने वाली ताकतों को पैसा भेजते हैं. वह यूरोप या अमरीका जैसे देशों में रह कर भी संस्कृति बचाने के नाम पर अपने परिवारों और गुटों पर पूरा काबू बना कर रखते हैं और आवश्यकता पड़ने पर मारने मरवाने से नहीं घबराते. उनमें नारी के समान अधिकारों या विकास की बात कम ही होती है. इस विषय यूरोप में रहने वाले मुसलमान नेताओं के बारे में फरवरी के "हँस" में शीबा जी ने लिखा हैः
कठमुल्ला वर्ग बड़ी बेशर्मी से फ्रांस के बुरक़ा बैन पर टीवी, अखबार आदि में अवतरित हो कर फ्रांस की सरकार को लोकताँत्रिक मूल्य याद दिलाने लगता है. तब इन्हें शर्म नहीं आती कि जिस मुँह से यह ज़बरदस्ती बुरक़ा उतारने को बुरा कह रहे हैं "चुनाव की आज़ादी" के आधार पर, उसी मुँह से इन्हें अरब ईरान आदि देशों में ज़बरदस्ती औरतों को बुरक़ा पहनाने की भर्त्सना भी तो करनी चाहिये जो उतना ही चुनाव के अधिकार का हनन है. लेकिन नहीं, इन्हें अरब ईरान पर उंगली उठाने की ज़रूरत महसूस नहीं होती क्योंकि वहाँ की ज़बरदस्ती इन्हें जायज़ लगती है.
पर यह बात केवल मुसलमान गुटों की नहीं है. अमरीका में रहने वाले कट्टरपंथी यहूदी गुट एक अन्य उदाहरण है जिनका ईज़राईल पर गहरा प्रभाव है.

धार्मिक रूढ़िवाद और परम्परा बनाये रखने वालों की लड़ाई है कि अपने आप को कैसे अन्य गुटों से अलग किया जाये, दुनिया को कैसे बाँटा जाये, कैसे अपने धर्म का झँडा सबसे ऊँचा किया जाये और कैसे अन्य सब धर्मों को नीचा किया जाये. उदारवाद और मानव अधिकारों की दृष्टि से देखें तो धर्म व्यक्तिगत मामला है, कानून के लिए सभी समान होने चाहिये, सबको समान अधिकार और मौके मिलने चाहिये. समय के साथ इन दोनों में से किसका पलड़ा भारी होगा, कौन से रास्ते पर जायेगी मानवता?

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रविवार, फ़रवरी 27, 2011

रँगबिरँगे मुखोटों का त्योहार

बहुत सालों से वेनिस के रँगबिरँगे मुखोटों के कार्नेवाल को देखने की इच्छा थी, लेकिन हर बार बीच में कोई न कोई अड़चन आ जाती थी. हमारे शहर बोलोनिया से वेनिस कुछ विषेश दूर नहीं, रेलगाड़ी से केवल दो घँटे का रास्ता है. करीब तीस वर्ष पहले जब इटली में नया था तब अस्पताल में साथ काम करने वाले मित्र मुझे शाम को साथ वेनिस ले गये थे, लेकिन तब वाइन पी कर हुल्लड़ करने में हमारी अधिक दिलचस्पी थी, तो क्या देखा था उसकी मन में बस कुछ धुँधली सी यादें थीं. इसलिए कल जब मौका मिला छोटा कार्नेवाल देखने का, तो उसे खोना नहीं चाहा. आज उसी वेनिस के मुखोटों वाले कार्नेवाल की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

Venice carneval, 2011

कार्नेवाल शब्द लेटिन से बना है, जिसका अर्थ है "कारने लेवारे" (Carne=meat, levare=remove), यानि "माँस को हटा दीजिये". जैसे मुसलमानों में रोज़े होते हैं, कुछ उसी तरह कैथोलिक ईसाई अपने त्योहार ईस्टर के पहले 40 या 44 दिनों का खाने का परहेज़ करते हैं, जिसमें माँस खाना वर्जित होता है. ईस्टर की तारीख रोमन कैलेंडर से नहीं बल्कि वसंत की पूर्णमासी से निर्धारित की जाती है, इसलिए हर साल अलग दिन पड़ती है. कार्नेवाल का दिन मँगलवार का होता है जिसे "मोटा मँगलवार" (Mardì Gras) कहते हैं, क्योंकि इस दिन खाने में माँस हटाने से पहले, लोग जी भर के माँस खाते हैं, पीते पिलाते हैं, मजे करते हैं. इस वर्ष मोटा मँगलवार, यानि कार्नेवाल होगा 8 मार्च को. पर अब यह केवल मस्ती का त्योहार ही रह गया है क्योंकि अब अधिकतर लोग खाने में कम खाने, सादा खाने या माँस न खाने में विश्वास नहीं करते.

कार्नेवाल के त्योहार को विभिन्न शहर अपने अपने ढंग से मनाते हैं, हाँलाकि हर कार्नेवाल में एक जलूस का होना आवश्यक होता है. ब्राज़ील में रियो दे जानेइरो शहर का कार्नेवाल अपनी रंगीन झाँकियों और थोड़े से वस्त्र पहने हुए साम्बा नाचने वालों के लिए प्रसिद्ध है. इस समय में वहाँ सेक्स की स्वच्छँदता भी बहुत होती है. भारत में गोवा का कार्नेवाल भी अपनी झाँकियों और मस्ती के लिए प्रसिद्ध है. इटली में बहुत से शहर अपने जलूसों और झाँकियों के कार्नेवाल के लिए जाने जाते हैं, लेकिन वेनिस का कार्नेवाल सबसे अनोखा माना जाता है क्योंकि इसमें सतारहवीं और अठाहरवीं शताब्दी की पोशाकों के साथ रँगबिरँगे मुखोटे जुड़े हैं.

आजकल कार्नेवाल में लोग बहुत मेहनत करते हैं, लाखों रुपये खर्च करते हैं वस्त्र और झाँकिया बनवाने में. साथ ही इसमें व्यवसायिक लाभ की बात भी जुड़ गयी है क्योंकि लाखों पर्यटक कार्नेवाल को देखने देश विदेश से आते हैं. तो कार्नेवाल की अवधि बढ़ा दी गयी है, "मोटे मँगलवार" के बड़े जलूस और असली कार्नेवाल के दो तीन सप्ताह पहले ही, शनिवार और रविवार को छोटे कार्नेवाल आयोजित किये जाते हैं ताकि अधिक से अधिक पर्यटक उन्हें देखने आयें.

कल 26 फरवरी को वेनिस में कार्नेवाल का पहला जलूस था. इसकी खासियत थी "सात मारिया की यात्रा", जिसमें शहर की सात सुबसे सुन्दर युवतियों को चुना जाता है, और शहर के युवक उन्हें पालकी में कँधे पर उठा कर ले जाते हैं, उनके पीछे पीछे शहर के जाने माने व्यक्ति प्राचीन पौशाकें पहन कर चलते हैं. वेनिस कार्नेवाल के अखिरी दिन, इन्हीं सात मारियों का नावों का जलूस निकलेगा, और सबसे सुन्दर युवती को "वेनिस की मारिया" का खिताब मिलेगा. कार्नेवाल के आखिरी दिन सबसे सुन्दर मुखोटे और पौशाक वाले व्यक्ति को भी चुना जायेगा.

कल की इसी वेनिस यात्रा से कार्नेवाल की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं. इन्हे देख कर आप स्वयं निर्णय ले सकते हैं कि वेनिस का कार्नेवाल अनूठा है या नहीं. घँटों चल चल कर और भीड़ में धक्के खा कर थकान से चूर हो कर घर लौटा पर मुझे लगा कि वाह, बहुत सुन्दर और रँगबिरँगा कार्नेवाल है.

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011

Venice carneval, 2011


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गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

मलदान मिलेगा?

कोई अगर अपनी जान बचाने के लिए आप से आप का थोड़ा सा ताज़ा किया हुआ पाखाना माँगे तो क्या आप देंगे? आप सोच रहे होंगे कि शायद यह कोई मज़ाक है. लेकिन यह कोई मज़ाक नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक खोज का विषय है, जिसकी कहानी न्यु साईन्टिस्ट पत्रिका में श्री अनिल अनन्तस्वामी ने लिखी है.

Scene from Pushpak, Kamalahassan
"पाखाना" शब्द ही कुछ ऐसा है जिसका सामाजिक प्रभाव छोटी उम्र से ही बहुत तेज़ होता है जिसकी वजह से शब्द से भी कुछ घिन सी आने लगती है. कमालहसन की एक पुरानी फ़िल्म थी "पुष्पक" जिसमें कोई डायलाग नहीं थे, उसमें मलदान के कुछ दृश्य थे. अगर आप ने यह फ़िल्म देखी है तो मेरे विचार में इन दृश्यों को भूलना कठिन है. फ़िल्म में हीरो ने एक पुरुष को घर में बन्द किया है, और उसके पाखने को छुपाने के लिए हर रोज़ एक डिब्बे में बँद करके, उस पर रंगीन कागज़ चढ़ा कर, बसस्टाप के पास रख आता है, जहाँ उसे ले कर जो भी खोलता है वह पाखाना देख कर उल्टी कर देता है. तब रंगीन डिब्बों में बम आदि छोड़ने का काम नहीं शुरु हुआ था, इसलिए यह दृश्य विश्वस्नीय था, आज तो डिब्बा खोलने से पहले ही पुलिस बम विस्फोट टीम के साथ हाज़िर हो जायेगी.

खैर बात मज़ाक या फ़िल्म की नहीं, सचमुच की बीमारी की है.

हमारी आँतों में रहने वाले सूक्ष्म किटाणु विटामिन बनाते हैं, खाना हज़म करने में सहायता करते हैं और शरीर को स्वस्थ रखते हैं. अगर आप को कुछ दिन एँटीबायटिक खाने पड़े तो कई बार दस्त लग जाते हैं, क्योंकि एँटीबायटिक से अक्सर हमारे शरीर के यह किटाणु मर जाते हैं. अधिकतर तो यह दस्त की तकलीफ़ थोड़े से दिन ही रहती है, और धीरे धीरे, आँतों के किटाणुओं का विकास होने के साथ, अपने आप ठीक हो जाती है. लेकिन कभी कभी, अगर एँटीबायटिक से इलाज लम्बा करना पड़े या फ़िर व्यक्ति के शरीर में पहले से अन्य बीमारियों की कमज़ोरी हो, तो एँटीबायटिक की वजह से हुए दस्त जानलेवा भी हो सकते हैं. ऐसे में अक्सर आँतों में नये किटाणु बढ़ने लगते हैं जिनपर ऐटीबायटिक का असर कम पड़ता है और जिन्हें शरीर से हटाना बहुत कठिन होता है. ऐसे एक किटाणु का नाम है क्लोस्ट्रिडियम दिफ़िसिल (Claostridium difficile), जो अगर आँतों में बस जाये तो बहुत से लोगों की जान को खतरा हो जाता है.

अभी तक क्लास्ट्रिडियम दिफ़िसल जैसे किटाणुओं का इलाज़ नये और बहुत शक्तिशाली एँटीबायटिक से है किया जाता है जो मँहगे तो होते हैं पर फ़िर भी अक्सर मरीज़ को बचा नहीं पाते.

इस बीमारी का नया इलाज निकाला केनेडा के कालगरी शहर के अस्पताल में काम करने वाले कुछ चिकित्सकों ने. वह मरीज़ के परिवार वाले किसी व्यक्ति से, जिसे दस्त वगैरा न लगे हों, थोड़ा सा सामान्य पाखाना देने के लिए कहते हैं, जिसे नलकी द्वारा मरीज़ की आँतों के उस हिस्से में छोड़ा जाता है जहाँ यह नये कीटाणु अधिक होते हैं. उन्होंने पाया कि पाखाने में पाये जाने वाले सामान्य किटाणु इन नये किटाणुओं से लड़ने में एँटीबायटिक दवाईयों के मुकाबले में अधिक सफ़ल होते हैं, और कुछ दिनों में ही उनका सफ़ाया कर देते हैं. एक शौध ने दिखाया कि इस तरह परिवार के पाखाने से मिले सामान्य किटाणु मरीज़ के शरीर में 24 सप्ताह तक रह सकते हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार हमारा पाखाना किटाणुओं के चिड़ियाघर की तरह है, जिसमें 25 हज़ार तरह के विभिन्न किटाणु करोड़ों की संख्या में मिल सकते हैं. इनमें से बहुत से किटाणु सिमबायटिक होते हैं, यानी परस्पर फायदा करने वाले, अगर मानव शरीर से कुछ लेते हैं तो साथ ही मानव शरीर का फायदा भी करते हैं, विटामिन बना के, खाने को पचा के या हानिकारक किटाणुओं से लड़ कर. अपनी आँतों में रहने वाली इस किटाणु सम्पदा की रक्षा करने के लिए आवश्यक है हम लोगों को बिना ज़रूरत एँटीबायटिक दवाईयाँ नहीं खानी चाहिये, क्योंकि उनसे शरीर का फ़ायदा करने वाले किटाणु नष्ट हो जाते हैं.

एँटीबायटिक यानि वह दवाईयाँ जो बीमारी फ़ैलाने वाले सूक्ष्म किटाणुओं को मारती हैं, बहुत काम की चीज़ हैं. इनकी वजह से ही आज हम टीबी, कुष्ठ रोग, न्यूमोनिया, एन्सेफलाइटिस, जैसी बीमारियों को काबू में ला सकते हैं और इनकी वजह से लाखों जानें बचती हैं. आम उपयोग में आने वाली एँटीबायटिक हैं पैनिसिलिन, एम्पीसिलिन, जैंटामाइसिन, बेक्ट्रिम, रिफैम्पिसिन, आदि.

लेकिन एँटीबायटिक का असर वायरस यानि सूक्ष्म किटाणुओं से भी अतिसूक्ष्म जीवन कण जो कि आम फ्लू से ले कर एडस जैसी बीमारियाँ करते हैं, पर नहीं पड़ता. वायरस पर काबू पाने के लिए अलग दवाईयों की आवश्यकता होती है. एँटीबायटिक के अधिक गलत उपयोग इसी लिए होते हैं कि लोग फ्लू जैसी बीमारियों के लिए भी एँटिबायटिक ले लेते हैं. फ्लू जैसी बीमारी फ़ैलाने वाले वायरस, बिना एँटीबायटिक के शरीर कुछ दिनों में अपने आप साफ़ कर देता है.

दूसरी आम गलती है कि एक बार एँटीबायटिक का प्रयोग शुरु किया जाये तो कम से कम तीन या पाँच दिन दिन अवश्य लेना चाहिये लेकिन लोग "तबियत अब ठीक हो गयी है" सोच पर, इन्हें पूरा समय नहीं लेते, जिससे बीमारी वाले किटाणु पूरी तरह नहीं मरते और कभी कभी ऐसे किटाणुओं को जन्म देते हैं जिनपर किसी दवाई का असर नहीं होता.

पाखाने से इलाज का सुन कर दवा कम्पनियों ने तुरंत आपत्ति उठायी है कि यह इलाज गैरवैज्ञानिक सबूतों की बिनाह पर किया जा रहा है. इस तरह के इलाज होंगे तो दवा की बिक्री भी कम होगी, इसलिए भी कुछ दवा कम्पिनयाँ चिंता करती हैं. इसलिए इस चिकित्सा विधि पर कई जगह वैज्ञानिक शौध भी किये जा रहे हैं, जैसे कि होलैंड में और प्रारम्भिक परिणाम भी अच्छे लग रहे हैं.

design about excretion donation

यानि वह दिन भी आ सकता है जब अस्पताल में आप का प्रियजन दाखिल हो, तो जैसे रक्तदान के लिए कहते हैं, कभी कभी, डाक्टर आप से थोड़ा सा मलदान कीजिये के लिए भी कह सकते हैं. अक्सर रक्तदान का सुन कर रिश्तेदार भाग उठते हैं, लेकिन मलदान में यह दिक्कत नहीं आनी चाहिये.

आप का क्या विचार है, इस इलाज के बारे में?

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मंगलवार, फ़रवरी 22, 2011

बात निकलेगी तो ..

तीस पैंतीस साल पहले जगजीत सिंह का एक गीत था जो मुझे बहुत प्रिय था, "बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जायेगी ..". आज अचानक इटली के "फासीवाद" के बारे में छोटी सी बात से एक खोज शुरु की, वह मुझे ऐसे ही जाने कहाँ कहाँ घुमाते हुए बहुत दूर तक ले आयी. दरअसल बात शुरु हुई थी शहीद भगत सिंह से.

मैं पढ़ रहा था शहीद भगत सिंह के दस्तावेज़. लखनऊ की राहुल फाऊँडेशन ने 2006 में, श्री सत्यम द्वारा सम्पादित यह नया संस्करण छापा था जिसमें भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ संकलित हैं. दिल्ली के क्नाट प्लेस की एक दुकान में इस किताब के मुख्यपृष्ठ ने मेरा ध्यान आकर्षित किया था जिस पर नवयुवक भगतसिंह हैं और तस्वीर देख कर सोचा था कि भारत में भगतसिंह का नाम जानने वाले तो थोड़े बहुत अब भी मिल जायेंगे, लेकिन उनकी तस्वीर देख कर पहचानने वाले मुश्किल से मिलेंगे. उनका नाम सोचो तो मन में मनोज कुमार या अजय देवगन या बोबी देवल द्वारा अभिनीत भगत सिंह की छवियाँ ही मन में आती हैं.

Book Cover - documents of Bhagat Singh

जेल में लिखी डायरियों में भगत सिंह ने कई बार इटली के स्वतंत्रता युद्ध और देश को जोड़ने वाले व्यक्तियों जैसे कि माजीनी (Mazzini), कावूर (Cavour) और गरीबाल्दी (Garibaldi) का भी नाम लिया था और उनसे प्रेरणा ले कर भारत का स्वतंत्र स्वरूप कैसे हो इस पर सोचा था. इनके अतिरिक्त, वे विभिन्न इतालवी कम्यूनिस्ट विचारक, जैसे कि अंतोनियो ग्रामशी और रोज़ा लक्समबर्ग, के विचारों से भी प्रभावित थे. इस प्रभाव का एक कारण यह भी था कि 1861 में जब इटली एक देश बना था उस समय उसकी हालत कुछ कुछ पराधीन भारत जैसी थी, छोटे छोटे राजों महाराजों में बँटा देश जो आपस में लड़ते मरते और जिन पर अन्य पड़ोसी देश शासन करते थे.

भगत सिंह की बात सोचते हुए मन में इटली के दूसरे प्रभाव का ध्यान आया, फासीवाद के प्रभाव का, जिससे नाता था भारत के एक अन्य स्वतंत्रता सैनामी का, यानि सुभाष चन्द्र बोस. बोस भी भगत सिंह की तरह इतालवी देश एकाकरण के प्रमुख व्यक्ति जैसे माजीनी और गरीबाल्दी से प्रभावित थे, लेकिन साथ ही वह मुसोलीनी के फासीवाद से भी प्रभावित थे. द्वितीय महायुद्ध के दौरान जब वह कलकत्ता में ब्रिटिश सिपाहियों से बच कर भाग निकले थे, काबुल में इतालवी दूतावास ने उन्हें काऊँट ओरलान्दो मात्जो़त्ता के नाम का झूठा इतालवी पासपोर्ट बनवा कर यूरोप में यात्रा करवायी थी. उनकी सहायता के पीछे, मुसोलीनी का भारत प्रेम नहीं था, बल्कि "दुश्मनों का दुश्मन हमारा दोस्त" का विचार था कि बोस की सहायता करके वह अपने और हिटलर के दुश्मन अंग्रेजों के लिए झँझट बढ़वा रहे थे, लेकिन उन दिनों कुछ समय के लिए सुभाष इटली में रहे थे.

मुसोलीनी के फासीवाद से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माता भी प्रभावित थे और उसी प्रेरणा से उन्होंने अपनी संस्था का निर्माण किया था. क्या अर्थ था फासीवाद का और कहाँ से आया था यह शब्द? फासीवाद को तीसरा मार्ग घोषित किया गया. पहले दो मार्ग थे पूँजीवाद और कम्युनिस्म. फासीवाद राष्ट्रवादी तानीशाही का रास्ता था, जिसमें आज्ञाकारी और अनुशासित प्रजा होना आवश्यक था.

फासीवाद या फाशिस्म शब्द इटली के स्वतंत्रता संग्राम और फ्राँस की क्राँती से ही आया था. इस कथा का प्रारम्भ हुआ 1789 में फ्राँस की गणतंत्र क्राँती से, जिसका नारा था सब लोगों को बराबर अधिकार और स्वतंत्रता. इस क्राँती के 7 वर्ष बाद नेपोलियन की फौज उत्तरी इटली में घुस आयी. उस समय बोलोनिया शहर कैथोलिक धर्म के पोप के साम्राज्य का हिस्सा था और उनका साथ आस्ट्रिया की फौज देती थी. बोलोनिया में आस्ट्रिया की फौज हार गयी, और पोप के निर्युक्त गवर्नर को शहर छोड़ कर भागना पड़ा. उत्तरी इटली में नये गणतंत्र की स्थापना हुई, जिसका नाम रखा गया चिसपादाना और जिसकी राजधानी थी बोलोनिया. फ्राँस की क्राँती के चिन्ह "फाशियो लितोरियो" (Fascio Littorio), यानि रस्सी से बँधी लकड़ियाँ जिनका अर्थ था कि "एकता में शक्ति है", को पोप के नियुक्त गवर्नर के भवन में, पुराने धार्मिक निशान हटा कर, हर तरफ़ बनाया गया. तभी इतालवी झँडे को बनाया गया और उसके तीन रंगों को, लाल सफ़ेद और हरे रंगों को भी भवन में हर तरफ़ बनाया गया. यह गणतंत्र केवल तीन वर्ष चला. फ़िर पोप की सैनायें जीत कर वापस आ गयीं और उन्होंने झँडे के तीन रंगो को ढक दिया. कुछ वर्ष के बाद, नेपोलियन की फौजें फ़िर लौट आयीं, और इस बार पहले से भी बड़ा गणतंत्र बना जिसका नाम रखा गया चिसअल्पाईन और जिसकी राजधानी मिलान बना. फ़िर कभी आस्ट्रिया की मदद से पोप की सैना दोबारा शासन में आती, कभी गणतंत्र वालों का पलड़ा भारी होता. (तस्वीर में बोलोनिया के पुराने गवर्नर के भवन में फाशियो लितोरियो के चिन्ह)

Fascio littorio in Palazzo d'accursio of Bologna

यही दिन थे जब माजीनी, कावूर, गरीबाल्दी जैसे लोगों ने इटली के एकीकरण और स्वतंत्रता का सपना देखना शुरु किया जो 1861 में जा कर पूरा हुआ. इस वर्ष इस एकीकरण की 150वीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है. जब मुसोलीनी का समय आया और 1925 में उन्होंने फासीवाद की स्थापना की, तो उनकी प्रेरणा स्वतंत्रता और एकीकरण संग्राम के वही पुराने चिन्ह थे, फाशियो लितोरियो, यानि रस्सी से बँधी लकड़ियाँ, यानि देश की एकता का चिन्ह, उसी फाशियो से फ़ाशिस्तवाद का नाम रखा गया.

यानि बात जहाँ से शुरु हुई थी, घूम कर वहीं वापस आ गयी, और हम सब माजीनी, गरिबाल्दी के साथ जुड़े इतिहास के इन पन्नों को भूल गये, जिन्होंने भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस को प्रेरणा दी थी.

कभी यूरोप में आने वाले भारतीयों के लिए इटली से हो कर जाना आवश्यक था, क्योंकि सुएज़ कनाल से हो कर आने वाले पानी के जहाज़ दक्षिण इटली के बारी शहर में रुकते थे, फ़िर बारी से बर्लिन, पेरिस और लंदन तक की यात्रा रेलगाड़ी से की जाती थी. महात्मा गाँधी, रविन्द्रनाथ टैगोर, सुभाषचन्द्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया, मदन मोहन मालवीय, सरदार पटेल, सब लोग कभी न कभी इटली से गुज़रे थे. (तस्वीर में बारी की बंदरगाह)

Port of Bari, 2008

तब बोलोनिया शहर का रेलवे स्टेश्न उत्तर तथा मध्य इटली को जोड़ता था, अक्सर यहीं पर गाड़ी बदलनी पड़ती थी. शहर में घूमते समय कभी सोचो कि शायद एक बार यहाँ सुभाष बाबू आये थे, कहाँ रुके होंगे? किसके साथ थे, क्या सोचते होगे? तब तो उन्हें यहाँ के लोग नहीं जानते थे, किसने सहारा दिया होगा ऊन्हें? मन करता है कि बीते हुए कल में जाने वाली चिड़िया बन जाऊँ, इस सारे इतिहास को देखने और समझने.

बातों से बातों का सिलसिला जुड़ता जाता है, और मन कभी एक ओर जाता है, कभी दूसरी. बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी ...

शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

नारी मुक्ति की संत

शरीर की नग्नता में क्या नारी मुक्ति का मार्ग छुपा हो सकता है? कर्णाटक की संत महादेवी ने वस्त्रों का त्याग करके अपने समय के सामाजिक नियमों को तोड़ा था. क्यों?

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka
मधुश्री दत्ता की सन् 2000 की डाक्यूमेंटरी फ़िल्म "स्क्रिब्बल्स आन अक्का" (अक्का पर लिखे कुछ शब्द - Scribbles on Akka) देखने का मौका मिला जो बाहरवीं शताब्दी की दक्षिण भारतीय संत अक्का महादेवी की कविताओं के माध्यम से उनके क्राँतिकारी व्यक्तित्व को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने का प्रयास है. फ़िल्म उन असुविधाजनक व्यक्तित्वों के बारे में सोचने पर बाध्य करती है जो समाज के हो कर भी धर्म के नाम पर, समाज के नियमों को तोड़ने का काम करते हैं पर जिनका समाज पर इतना गहरा प्रभाव होता है कि चाह कर भी उनको छुपाया या भुलाया नहीं जा सकता.

महादेवी या अक्का (दीदी) बाहरवीं शताब्दी की वीरशैव धार्मिक आंदोलन का हिस्सा मानी जाती हैं. वीरशैव आंदोलन में वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा, जाति भेदभाव, अवतारवाद, अंधश्रद्धा आदि को बाधक ठहराया और अल्लमप्रभु, अक्कमहादेवी, चेन्न-बंसव तथा सिद्धराम जैसे संतों ने जातिरहित, वर्णरहित, वर्गरहित समाज के निर्माण की कोशिश की. इन संतों के लेखन वचन साहित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए जो कि गद्य शैली में लिखी कविताएँ हैं.

कणार्टक में शिमोगा के पास के उड़ुथाड़ी गाँव में जन्मी अक्कमहादेवी ने जब सन्यास लिया तो केवल घर परिवार ही नहीं छोड़ा, वस्त्रों का भी त्याग किया और उनके लेखन ने नारी शरीर और नारी यौनता के विषयों को जिस तरह खुल कर छुआ, वह सामान्य नहीं है. जैसे सुश्री लवलीन द्वारा अनुवादित अक्कमहादेवी की इस कविता को देखियेः
वस्त्र उतर जाएँ
गुप्त अंगों पर से तो
लज्जा व्याकुल हो जाते है जन
तू स्वामि जगत का, सर्वव्यापि
एक कण भी नहीं , जहाँ तू नहीं
फिर लज्जा किस से?
चेनामल्लिक अर्जुना देखे जग को
बन स्वयं नेत्र
फिर कैसे कोई ढके,
छिपाए अपने को?
(डा. रति सक्सेना द्वारा सम्पादित वेबपत्रिका "कृत्या" से )

मधुश्री दत्ता की डाक्युमेंटरी में आज की आधुनिक व्यवस्था में अक्का महादेवी किस रूप में जीवित हैं, इसको विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने की चेष्ठा है. गाँव में गणदेवी की तरह, औरतों के कोपोरेटिव में, जहाँ उनके नाम से पापड़ और अचार बनते हैं, काम करने वाली औरतों की दृष्टि में, म़ंदिर के पुजारी और धर्म ज्ञान की विवेचना करने वाले शास्त्री की दृष्टि में, फेमिनिस्ट लेखन और चित्रकला में, महादेवी विभिन्न रूपों में दिखती हैं. इन विभिन्न रूपों में सामान्य जन में उनका रूप उनके व्यक्तित्व को धर्म मिथिकों में छुपा कर, मन्दिर में पूजने वाली देवी बना देता है, जिसमें उनके वचनों की क्राँति को ढक दिया जाता है. लेकिन फ़िल्म में उनकी एक भक्त का साक्षात्कार भी है जिसने गाँव में अक्का महादेवी के मंदिर के आसपास भक्तों के लिए सुविधाएँ बनवायी हैं और जो महादेवी के असुविधाजनक संदेश को छुपाने के प्रयास पर हँसती है.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

फ़िल्म में महादेवी के कुछ वचनों को गीतों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें सुश्री सीमा बिस्वास पर विभिन्न परिवेशों में फ़िल्माया गया है, जिनमें एक परिवेश है एक ईसाई गिरजाघर में एक स्त्री द्वारा नन बनने की रीति, यानि महादेवी की बात को एक धर्म की सीमित दायरे से निकाल कर इन्सान के मन में ईश्वर से मिलने की ईच्छा के रूप में देखने की चेष्ठा.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

फ़िल्म को देख कर मानुषी में पढ़े मधु किश्वर के एक पुराने आलेख की याद आ गयी जिसमें बात थी किस तरह गाँव में रहने वाली औरतें सीता मैया के पाराम्परिक गीतों के माध्यम से नारी मुक्ति की बात उठाती हैं. परम्परागत समाज में जहाँ नारी चारों ओर से नियमों में बँधी हो जिनमें उसकी अपनी इच्छाओं आकाँक्षाओं के लिए जगह न हो, वहाँ महादेवी जैसी नारी के विचारों को धर्म स्वीकृति मिलना थोड़ी सी जगह बना सकता है जहाँ सामाजिक नियमों की परिधि से बाहर जाने की अभिलाषा की अभिव्यक्ति हो सकती है.

महादेवी का व्यक्तित्व शारीरिक नग्नता को केवल लज्जा का कारण सोचने पर भी प्रश्न उठाता है. फ़िल्म में कुछ चित्रकार अक्का महादेवी के नग्न शरीर को ईश्वर का प्रतिरूप देखते हैं, तो कुछ इसमें नारी मुक्ति की चिंगारी. परम्परागत समाज को चुनौती देती महादेवी की छवि की जटिलता को ब्राह्मण विद्वान भी स्वीकारते हैं और आम व्यक्ति भी.

Akka Mahadevi - Scribbles on Akka

मेरी दृष्टि में फ़िल्म का अंतिम संदेश यही है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में धर्म के संदेश को अलग अलग दृष्टिकोणों से देखा और समझा गया है. यही अनेकरूप विभिन्नता ही हिंदू धर्म की शक्ति रही है. इस जटिलता को सहेजना आज के भूमण्डलिकरण से जकड़े संसार में परम आवश्यक है, जहाँ सामाजिक जटिलताओं का सरलीकरण एवं ऐकाकीकरण करने की लालसाएँ बढ़ती जा रही हैं.

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रविवार, फ़रवरी 06, 2011

प्रेम निवेदन

हिन्दी फ़िल्मों के गानों में हमारे जीवन के सभी सुखों दुखों का हाल छिपा है. चाहे कोई भी मौका हो, मुंडन से ले कर मैंहदी तक, करवाचौथ से ले कर क्रियाकर्म तक, खाना बनाते समय सब्ज़ी जल गयी हो या काम पर जाते समय बस छूट गयी हो, प्रेयसी मिलने आये या दगा दे जाये, पापा गुस्सा हों या माँ ने मन पसंद खीर बनायी हो, कुछ भी मौका हो, बस उसका गीत मन में अपने आप आ जाता है. और चाहे उसे गायें या न गायें, मन में अपने आप ही गूँज जाता है. क्या आप को भी लगता है कि बिना इन गानों के जीवन का रस कुछ कम हो जायेगा?

और क्या आप के साथ कभी ऐसा हुआ है कि अचानक कोई गीत सुनते सुनते, अपने जीवन की वह बात समझ में आ जाती है जिस पर कभी ठीक से नहीं सोचा था? मेरे साथ यह अक्सर होता है.

अगले वर्ष मेरे विवाह को तीस साल हो जायेंगे. काम के लिए अक्सर देश विदेश घूमता भटकता रहता हूँ. इन्हीं यात्राओं से जुड़ी एक बात थी, जो अचानक "तनु वेड्स मनु" का एक गाना सुनते समय समझ आ गयी.

गाना के बोल लिखे हैं राजशेखर ने और गाया है मोहित चौहान ने . गाने के बोल हैं -
कितने दफ़े मुझको लगा
तेरे साथ उड़ते हुए
आसमानी दुकानो से ढूँढ़ के
पिघला दूँ यह चाँद मैं
तुम्हारे इन कानों में पहना ही दूँ
बूँदे बना
फ़िर यह मैं सोच लूँ समझेगी तू
जो मैं न कह सका
पर डरता हूँ कहीं
न यह तू पूछे कहीं
क्यों लाये हो ये यूँ ही
गाना सुना तो लगा कि वाह गीतकार ने सचमुच मेरे मन की बात को कैसे पकड़ लिया.

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देश विदेश में घूमते समय कई बार कुछ दिख जाता है जो लगता है कि बहुत सुन्दर लगेगा मेरी पत्नि पर. पर साथ में मन में यह भी भाव होता है कि शायद वह बिना कहे ही समझ जायेगी वह बात जो कह नहीं पाता हूँ. पर अक्सर होता है कि वह मेरी भेंट देख कर नाक सिकोड़ लेती है, "यह क्या ले आये? बिल्कुल ऐसा ही तो पहले भी था." या फ़िर, "क्यों बेकार में पैसे खर्च करते हो, तुम्हे मालूम है कि मैं इस तरह की चीज़ें नहीं पहनती."

और मन छोटा सा हो जाता है. सोचता हूँ, यूँ ही बेकार खरीद लिया. आगे से नहीं खरीदूँगा. पर अगली यात्रा में फ़िर भूल जाता हूँ. प्रेम निवेदन कैसे हो? यह नहीं होता, शायद उम्र का दोष है. आजकल के जोड़े तो आपस में "लव" या "माई लव" करके बोलते हैं, पर मुझसे इस तरह नहीं बोला जाता.

हर बार आशा रहती है कि वह मेरे मन की बात को बिना कहे ही समझ जाये. कभी लगता है कि वह मेरे मन की बात को समझती ही है, उसमें भेंट लाने या न लाने से कुछ नहीं होता?

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शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

गालिब खड़े बाज़ार में

अमरीकी विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका और कवयत्री रीटा डोव का  डिजिटल युग की कविता के बारे में वीडियो देख रहा था. इस तरह के वीडियो देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है. अपने मन पसंद विषयों पर कवियों, विचारकों, वैज्ञानिकों, लेखकों, दर्शकों, इतिहासकारों आदि को सुनना, जब जी करे तब. बिना यह चिन्ता करे कि कितने बजे टीवी या रेडियो पर आयेगा, अपनी मर्ज़ी से जब जी चाहे देखो और जितनी बार चाहे देखो कि अब ऐसी आदत पड़ी है कि सामान्य टीवी बहुत कम देखता हूँ.

बिग थिंक, टेड, 99 प्रतिशत, पोपटेक, जेल वीडियो कोनफ्रैंस, रिसर्च चैनल, वीडियो लेक्चर, जाने कितनी जगहें हैं जहाँ पर जानने समझने के लिए खजाने भरे हैं, और कोई फीस या घर से बाहर जाने की भी आवश्यकता नहीं. जब हम स्कूल जाते थे तो किसी विषय पर कुछ जानने समझने के लिए बस स्कूल की किताबें ही थीं. एनसाईक्लोपीडिया या फ़िर विषेश किताबें कभी पुस्कालय में पढ़ने को मिल जाती, पर यह कभी कभी ही होता. आज आप सरकारी स्कूल में हों या कानवैंट में, विश्वविद्यालय में हों या मेरे जैसे घर में बैठ कर दिलचस्पी रखने वाले, कोई भी विषय हो, दुनिया के जाने माने विशेषज्ञ उसके बारे में क्या कहते हैं, हार्वर्ड, कैमब्रिज या मिट जैसे जगतविख्यात विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर क्या पढ़ाते हैं, जाने माने डाक्यूमैंट्री बनाने वालों ने उस पर क्या फ़िल्म बनायी है, सब कुछ देखना सुनना  आसान. बस इंटरनेट चाहिये. चाहे अभी भी अधिकाँश स्कूल पाठ्यक्रम में रखी किताबों के रट्टे ही लगवायें, पर भविष्य में ज्ञान जाँचने के तरीके अवश्य बदलने पड़ेंगे.

कवयत्री रीटा डोव कहती हैं कि साहित्य की सभी विधाओं में से कविता आज के डिजिटल युग के सबसे उपयुक्त है, क्योंकि आज कल लोगों का ध्यान किसी बात पर थोड़ी सी देर के लिए ही जुड़ता है. कविता को ट्विटर के माध्यम से आसानी से बाँटा जा सकता है, दुनिया में कहीं भी पलों में पहुँचा सकते हैं, जो डिजिटल युग में कविता के बहुत उपयोगी है. आज जिस तरह से इंटरनेट पर वीडियो देखना आसान हो गया है, इससे यह भी आवश्यक नहीं कि आप कविता को पढ़ें, बल्कि आप कविता को उसके कवि के मुख से भी सुन सकते हैं. सुश्री डोव की बातें मुझे बहुत दिलचस्प लगीं, अगर आप चाहें तो उनकी पूरी बात को सुन सकते हैं.

रीटा डोव का वीडियो देखने के बाद सोच रहा था कि समय के साथ कविता कैसे बदली. उस समय जब किताबें नहीं थीं, प्रिटिंग प्रेस का आविष्कार नहीं हुआ था, तब कविता केवल बोलने और गाने के माध्यम से ही जानी जा सकती थी. गाँवों में घूमने वाले कविता कहानियाँ गाने वाले पारम्परिक कलाकार उन्हें कँठस्थ याद करते थे, इसलिए कविता और कथा का विषेश तरह से विकास हुआ जिसमें याद करने और गाने में आसानी हो. शायद इसी तरह गज़ल और शेरों का भी प्रचलन हुआ क्योंकि उनमें शब्दों का दोहराव और धुन, बोल कर या गा कर सुनाने के लिए ही बने थे.

फ़िर समय आया छपाई की प्रेस का और किताबों का. एक दशक पहले तक छपाई की तकनीक आसान नहीं थी और कुछ छपवाने में पैसा भी लगता था. तभी किताब छापना, बेचना, जैसे व्यव्साय बने, किताबें छापने वाले बने.

आज की दुनिया में लिखने पढ़ने की नयी क्राँती आ रही है. इंटरनेट, ईमेल, फेसबुक जैसे माध्यमों ने कविता, कहानी और उपन्यास, लिखना, पढ़ना, बाँटना, सबको बदल दिया है. लेखकों का गणतंत्र है, हर कोई चिट्ठा बना ले, जो मन में आये लिख ले. अगले ही क्षण, चाहे तो आप पढ़िये, उस पर टिप्पणी लिखिये, उसकी आलोचना कीजिये या प्रशँसा.

पर इतनी भीड़ में अच्छे लेखक और कवि कहीं खो तो नहीं जायेंगे? सचमुच सब अच्छे कवि लेखक, क्या इंटरनेट और फैसबुक से अपने पढ़नेवालों तक पहुँच पायेंगे? यानि अगर आज गालिब या महादेवी वर्मा लिखना शुरु करते, अपना चिट्ठा बनाते, फैसबुक पर पन्ना बनाते, तो क्या सचमुच गालिब और महादेवी वर्मा जैसा बन पाते? और आज के गालिब या महादेवी वर्मा को अगर न चिट्ठा लिखने में दिलचस्पी हो, न उनका कोई फैसबुक पर पन्ना हो, तो क्या आज वह गालिब और महादेवी वर्मा बन पायेंगे?

Ghalib Mahadevi Varma, collage

फैसबुक पर मिर्ज़ा गालिब के पन्ने के चालिस हज़ार से अधिक फैन हैं, जबकि महादेवी वर्मा के पन्ने को केवल छः सौ लोग चाहते हैं.

पर जिन्हें इन माध्यमों से खुद को बेचना आता है, जिन्हें अड़ोसियों पड़ोसियों को बेझिझक संदेश भेज कर अपनी प्रशँसा करना करवाना आता है, जिन्हें प्रतियोगिताओं में अपने लिए वोट माँगना आता है, उनके पीछे तो लाखों जाते हैं, उनके सामने क्या भविष्य के गालिब जी या महादेवी जी टिक पायेंगे? और अगर आप शर्मीलें हैं, खुद को बेझिझक बेच नहीं सकते तो क्या आप का लेखन घटिया माना जाये?

अगर गालिब या महादेवी आज ज़िन्दा होते तो क्या उन्हें अपनी कला को समझने वाले मिलते? आप का क्या विचार है?

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गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

फुरसत के रात दिन

कुछ दिन पहले पंडित भीमसेन जोशी के देहावसान का समाचार पढ़ा तो 1975-76 के वो दिन याद आ गये जब उन्हें पहली बार सुना था. पहले तो परम्परागत शास्त्रीय संगीत में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी, लगता था कि बस "आ आ" करते रहते हैं जिसमें मुझे कोई रस नहीं मिलता था. तब छोटी बुआ दिल्ली के जानकीदेवी महाविद्यालय में पढ़ाती थीं और महाविद्यालय परिसर के अन्दर ही हँसध्वनि के घरों में रहती थीं. मेरा खाली समय अक्सर वहीं गुज़रता था. दीदी या भाँजे के साथ बड़े मैदान में घूमते घूमते, बाते चुकती ही नहीं थीं.

जानकी देवी में नहीं होता था तो शंकर रोड पर मित्रों के साथ होता. कालिज से घर आ कर, एक बार मित्रों के साथ घूमने और गप्प मारने के लिए निकलता तो रात को देर तक घर वापस नहीं लौटता था. तब सब मित्रों के नाम, काका, मुन्ना, शिशु, नानी, पप्पू, आदि, सभी छोटे बच्चों को प्यार से पुकारने वाले नाम ही थे.

वहीं जानकी देवी में हँसध्वनि वाले घर में ही पहली बार शास्त्रीय संगीत की सुंदरता मन में समझ आयी थी जब पहली बार फ़ूफ़ा ने कुमार गंधर्व का निरगुणी भजनों वाला रिकार्ड सुनवाया था.
उड़ जायेगा, उड़ जायेगा
हँस अकेला
जग दर्शन का मेला
एक बार मन को शास्त्रीय संगीत का रस चखने का स्वाद लगा तो फ़िर तो लत ही पड़ गयी. उन्हीं दिनों में शाम को जानकी देवी महाविद्यालय वालों की तरफ़ से, छात्राओं की शास्त्रीय संगीत से पहचान कराने के लिए जाने माने गायकों और संगीतकारों को बुलाया जाने लगा. तब कुमार गँधर्व को सुना, पंडित भीमसेन जोशी को सुना, पंडित जसराज को सुना. कालेज के रंगमँच पर जब वह गाने की तैयारी करते तो हम बच्चे लोग वहीं आसपास घूमते, वैसे भी सुनने वालों की बहुत भीड़ नहीं होती थी, बस पचास सौ लोग जमा हो जाते थे. तो उन्हें सुनने के साथ साथ, व्यक्ति को भी करीब से देखने का मौका मिलता था.

अब पैंतीस साल बाद, शास्त्रीय संगीत को सुने ज़माना बीत गया. कुछ वर्ष पहले सुश्री अश्विनी भिड़े देशपाँडे और श्री उदय भवालकर जब बोलोनिया आये थे, तभी अखिरी बार ठीक से बैठ कर उन्हें सुना था. भारत से कोई गायक आये तो उसे सुनने जाना और बैठ कर ठीक से सुनना तो हो जाता है, लेकिन आम दिनों में अब नहीं सुना जाता, शायद क्योंकि अब ध्यान को एक जगह या एक बात पर रोकने की आदत कम होती जा रही है. इस लिए नयी फ़िल्म का गाना हो या भीमसेन जोशी का भजन, कुछ अन्य काम करते हुए साथ साथ सुनते रहो, यह तो होता है लेकिन ध्यान से बैठ कर पाँच दस मिनट से अधिक कुछ सुनना पड़े तो मन अधीर हो जाता है.

फेसबुक पर 700 से अधिक मित्र हैं. क्या नाम हैं, कौन क्या करता है, कहाँ रहता है, इस सब से कुछ मतलब नहीं. कभी किसी की लिखी किसी बात पर नज़र पड़ी तो "लाइक" का बटन दबा दिया, या फ़िर बहुत अच्छा लगा तो कुछ लिख भी दिया, दो मिनट बाद ही याद नहीं रहता कि किसको क्या लिखा था. मित्र सुख दुख के नहीं, नलके की टूटी हैं, जब दिल किया खोल कर एक घूँट पिया, नहीं किया तो टूटी बंद रखी. लगे कि अधिक बातें करके मित्र हमारा समय बरबाद कर रहे हैं तो कहा कि हम व्यस्त हैं और गूगल चेट को बंद कर दिया. दो मिनट कोई वीडियो देखा, विषेश आनन्द नहीं मिला तो बन्द किया और कुछ अन्य पन्ना खोल लिया.

तो ऐसे में लम्बी तान ले कर राग शुरु होगा, तो कैसे चलेगा? इसे तो धीमे स्वर में वातावरण बनाने के लिए चलाईये, बस पृष्ठभूमि हल्की सी आवाज़ आये. आवाज़ तेज़ होगी तो परेशानी होगी, जिससे काम ठीक से नहीं होता.

हाँ भूपेन्द्र का गाना आये कि "दिल ढूँढ़ता है फ़िर वही फुरसत के रात दिन", तो एक पल के लिए मन भावुक हो जाता है. कितने अच्छे दिन थे! कैसा लगा था जब पहली बार प्रभा अत्रे को सुना था, या जब पहली बार किशोरी आमोनकर का "म्हारो प्रणाम" सुना था. फ़िर कुछ क्षणों में मन किसी और बात में लग जाता है.

बस मस्त रहिये जी, अधिक सोचा नहीं करते, यही ब्रह्ममंत्र है आज का. बहुत भावुकता आ रही हो तो फेसबुक पर लिख दीजिये, "आज हम उदास हैं", आप के दसियों मित्र आप का "लाईक" का बटन दबा कर, या कुछ लिख कर, उदासी को भगा देंगे.

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शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

भाषाओं के चक्रव्यूह

लूका का ईमेल आया कि वह भाषाओं पर शौध कर रहा है और मुझ से हिन्दी के बारे में बात करना चाहेगा, और साथ में कहा कि मेरा नाम उसे बोलोनिया विश्वविद्यालय में काम करने वाली मेरी एक पुरानी मित्र से मिला था, तो मैंने अधिक सोचा नहीं, हाँ कर दी.

आज सुबह उसके साथ चार घँटे गुज़ारे तो समझ में आया कि हम जिस भाषा को अपनी सोचते और कहते हैं, उसके कई पक्षों को ठीक से नहीं समझते और जानते. लूका हालैंड के उट्रेख्ट विश्वविद्यालय में शौध कर रहा है जहाँ दुनिया भर की भाषाओं को परखा जा रहा है. इस शौध में लूका को कुछ भारतीय भाषाओं के बारे में जानकारी जमा करने की ज़िम्मेदारी मिली है, जिनमें हिन्दी, पँजाबी, बँगला, तमिल, तेलगू और मलयालम भी हैं.

Luca Ducceschi, Italian researcher on Indian languages

पहले ही वाक्य का हिन्दी अनुवाद करते हुए मैं रुक गया. "I wash" का क्या अनुवाद करता? मैंने पूछा कि यह तो बताना पड़ेगा कि क्या धोना है, हाथ, मुँह या कपड़े, इसको जाने बिना इस वाक्य का हिन्दी अनुवाद नहीं हो सकता. लूका बोला, धोना नहीं, अंग्रेज़ी में तो इसका अर्थ हुआ कि मैंने नहाया. मैंने कहा कि शायद लंदन में पानी की कमी नहीं, उनके लिए नहाने और धोने में फ़र्क न हो, पर भारत में तो हम इसका अर्थ हाथ मुँह धोने के लिए करेंगे, या फ़िर कपड़े या प्लेट धोने के लिए करेंगे, जबकि अगर नहाना हो तो उसे "I take bath" कहना चाहिये!

"उसे" और "उससे" में क्या अंतर है, क्या आप ने कभी सोचा है? "मैंने उसे कहा" और "मैंने उससे कहा" में कौन सा वाक्य सही है? मेरा कहना था कि "उससे" अधिक ठीक है, पर लूका की हिन्दी व्याकरण की किताब में "उसे" और "उससे" का अंतर नहीं समझाया गया था. मैं यह तो माना कि इस वाक्य में उसे या उससे कुछ भी प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन उसके बाद, एक और प्रश्न पर मैं फ़िर अटक गया.

मैं बोला कि "मैंने उसे किताब दी" में तो केवल "उसे" का ही प्रयोग हो सकता है, और "मैंने उससे प्रश्न पूछा" में केवल "उससे" का ही प्रयोग होना चाहिये. तो लूका ने पूछा कि इसका नियम समझाओ, किस स्थिति में उसे का प्रयोग होना चाहिये, और किस स्थिति में उससे का? जितना अलग अलग वाक्यों के बारे में सोचता, उतना ही नियम स्पष्ट समझ नहीं आते. थोड़ी देर में लगने लगा कि उसके शौध में सहायता के लिए हाँ कह कर मैंने बेमतलब ही परेशानी अपने सिर पर ले ली थी.

अगले हिस्से के अनुवाद में तो और भी झँझट हुई. जिस वाक्य का अनुवाद करना था, वह था, "This woman (Mary) told that she (Mary) will win the race". मैंने अनुवाद किया, "इस औरत ने बताया कि वह दौड़ जीतेगी." लूका का कहना था कि जब "इस" की बात हो रही है तो इस वाक्य के दूसरे हिस्से में, "वह" की जगह "यह" का प्रयोग होना चाहिये. इस तरह के कितने ही वाक्यों पर बार बार अटकते रहे. मैं कुछ कहता और वह कहता कि यह बात अन्य भाषाओं से मेल नहीं खाती, अवश्य कुछ गलती होगी.

"This woman is in danger. She needs help." इसका मेरा अनुवाद था, "यह औरत खतरे में है. इसे मदद चाहिये." तो लूका बोला कि जब तुम पहले वाक्य में "वह" का प्रयोग करते हो, तो इस वाक्य में, "इसे" की जगह, "उसे" होना चाहिये. आखिर तंग आ कर मैं बोला कि मुझे बोलना आता है, हर बात के नियम और ऐसा क्यों होता है और वैसा क्यों नहीं होता, इसके उत्तर मैं नहीं दे सकता.

जो मैं कह रहा था, उसे लिखा कैसे जाये इस पर भी बहस हुई. जब "लड़की" लिखना था तो मैंने कहा कि "ladki" लिखो या "larki", क्योंकि अंग्रेज़ी में "ड़" की ध्वनि नहीं होती, तो वह बोला, पर हिन्दी को रोमन वर्णमाला में लिखने का नियम क्या है? मैंने कहा कि कोई नियम नहीं, जिसके जो मन में आये वह लिख लो. वह बोला कि जब तुम लोग ईमेल या एसएमएस में एक दूसरे को रोमन वर्णों में लिखते हो, तो बिना नियम के कैसे लिखते हो, और जिन हिन्दी शब्दों की ध्वनि अंग्रेज़ी में नहीं होती उसके लिखने के लिए जिससे किसी को कोई कन्फ़यूजन न हो, भारत सरकार ने कोई नियम क्यों बनाये, तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या कहूँ. भारत सरकार को हिन्दी के शब्दों को अंग्रेज़ी में कैसे लिखा जाये इससे अधिक अन्य महत्वपूर्ण काम करने होते होगे, मुझे नहीं लगता कि कोई इस पर नियम बना सकता है.

खैर जब काम समाप्त हुआ तो लगा मानो किसी चक्रव्यूह से निकल कर आया हूँ. पर बाद में सोच रहा था कि विभिन्न भाषाओं के बीच में काम करना कितना कठिन है. जब हम नयी भाषा सीखते हैं तो छोटे छोटे नियमों को सीखना तो आ जाता है, लेकिन जो भाषा बोलने से बनती है, जिसमें किस तरह कहा जाये यह नियम से अधिक आदत पर निर्भर होता है, तो वह किताबों से नहीं मिलता. सबसे अधिक बात जो मन को चु।भ रही थी वह थी कि जिसे मातृभाषा कहते हैं, उसके बारे में कितना कुछ नहीं जानते!

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शुक्रवार, जनवरी 21, 2011

अलेसान्द्रा का प्रश्न

बोलोनिया में रहने वाली मेरी जान पहचान की अलेस्साँद्रा की कहानी आज कल हर दिन किसी न किसी अखबार पत्रिका या टीवी पर दिखायी जा रही है. अलेस्साँद्रा कहती है, "मेरा बस चलता तो मैं यह बात इस तरह से नहीं उठाती, लेकिन बात मेरे मानव अधिकारों की है और मैं पीछे नहीं हटूँगी."

हुआ यह कि अलेस्साँद्रा ने नगरपालिका दफ़्तर में अर्ज़ी दी अपना नया व्यक्तिगत पहचानपत्र यानि आई कार्ड बनाने की. नगरपालिका वालों ने कहा कि हम आप को आई कार्ड में विवाहित नहीं लिख सकते, आप को तलाक लेना पड़ेगा, आप का विवाह हमारे देश के कानून के हिसाब से गलत है.

Alessandra Bernaroli, Bologna, Italy

अलेस्साँद्रा कहती है, "क्या जबरदस्ती है, मैं क्यों तलाक लूँ? मैंने चर्च में भगवान के सामने शादी की है, फ़िर कोर्ट में सिविल विवाह किया है. हमने सुख दुख में साथ निभाने की कसम खायी है, जब हम दोनो खुश हैं तो हम क्यों तलाक लें, हम तलाक नहीं लेंगे."

इस कहानी को समझने के लिए हमें घड़ी की सूई को पीछे ले जाना पड़ेगा. 39 वर्ष पहले जब अलेस्साँद्रा पैदा हुई थी तो उसका नाम अलेस्साँद्रो रखा गया था. पर बचपन से ही अलेस्साँद्रो को समझ आ गया कि कुछ गलत था, उसका शरीर तो पुरुष का था लेकिन वह भीतर से स्वयं को स्त्री महसूस करता था. साथ ही उसे यह भी समझ आया कि समाज में इस तरह के लोगों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जाता, उनकी हँसी उड़ाई जाती है, शर्मनाम समझते हैं. इसलिए इस बात को उसने स्वयं से ठीक से नहीं स्वीकारा, बल्कि वर्ज़िश करना, पहलवानों वाला शरीर बनाना जैसे शौक पाल लिए. उसके माता पिता, दोनो अध्यापक हैं, लेकिन कुछ पुराने विचारों के थे और चूँकि कैथोलिक चर्च इस बात को ठीक नहीं मानता, तो उसने अपने भीतर की इस इच्छा को दबा और भुला दिया.

जब विश्वविद्यालय में पढ़ने गया तो वहाँ अलेस्साँद्रो की मुलाकात अपनी होने वाली पत्नी से हुई. जल्दी ही दोनो में प्यार हो गया, और दस वर्ष तक यह प्यार चला, फ़िर 2005 में दोनो ने वहले चर्च में विवाह किया फ़िर कोर्ट में सिविल विवाह भी किया. विवाह के कुछ समय बाद, उसमें इतनी हिम्मत आयी कि अपनी भावनाओं और इच्छाओं को इमानदारी से समझ सके, अपने आप को स्वीकार कर सके. उसने इस बात को अपनी पत्नी से बताया कि वह सेक्स बदल कर नारी बनना चाहता था.

"मेरी पत्नी बहुत हिम्मतवाली है, पर शर्माती है, इसलिए वह प्रेसवालों से कुछ नहीं कहना चाहती या मिलना चाहती. शुरु में उसे धक्का लगा, लेकिन फ़िर वह समझ गयी कि मैं जैसा भी हूँ मैं ही हूँ. तब से उसने हमेशा मेरा साथ दिया है, मेरे हर निर्णय को समझा है. मैंने अपने माता पिता से भी यह बात की, उन्हें भी धक्का लगा लेकिन फ़िर भी समय के साथ उन्होंने मुझे समझा, और मैंने लिंग बदलाव का रास्ता अपनाया."

लिंग बदलाव आसान नहीं. 2007 से ले कर अलेस्साँद्रा के 13 ओप्रेशन हुए हैं. अमरीका में जा कर गले का ओप्रेशन कराया जिससे आवाज़ औरत जैसे हुई. यौन हिस्से का ओप्रेशन थाईलैंड में हुआ. चेहरे के निचले भाग का भी एक नाज़ुक ओप्रेशन हो चुका है.

अलेस्साँद्रा कहती है, "शरीर का बाहरी बदलाव, यौन सम्बन्धों में बदलाव, यह सब आवश्यक हैं, लेकिन इन सबके साथ, एक बदलाव अपने अंदर भी है, जो आसान नहीं. आप किस तरह से दूसरों से बात करते हो, किस भाषा का प्रयोग करते हो, लोग आप से किस तरह बात करते हैं, जब पुरुष था तो यह भिन्न तरीके से होता था, अब नारी हो कर भिन्न होता है. पुरुष नारी से किस तरह मिलता बात करता है, और नारी पुरुष से किस तरह मिलती बात करती है, यह दोनो बातें भिन्न है, और मैंने समझी हैं. इनसे अलग मैंरे जीवन का एक हिस्सा है जो मैंने नारी और पुरुष दोनो की दृष्टि से देखा है. यह सब बातें बहुत जटिल हैं और कम शब्दों में नहीं समझायी जा सकती. इस विषय पर मेरे पास बहुत कुछ है कहने सुनाने को, मेरे मन में इस विषय पर किताब लिखने की इच्छा है."

Alessandra Bernaroli, Bologna, Italy

नर शरीर के साथ पैदा होना और अंदर से स्वयं को नारी महसूस करना या फ़िर, नारी शरीर के साथ पैदा होना पर भीतर से खुद को नर महसूस करना, इसे ट्राँसजेंडर कहा जाता है. अक्सर नर शरीर के साथ पैदा हुए हों पर भीतर से खुद को नारी महसूस करने वाले लोगों का यौन आकर्षण अन्य पुरुषों की ओर होता है, इसलिए अक्सर वह समलैंगिग माने जाते हैं, लेकिन अलेस्साँद्रो को प्यार हुआ एक लड़की से. पाँच साल पहले, दोनो ने चर्च में विधिवत विवाह किया. उस समय किसी ने उँगली नहीं उठायी क्योंकि उस समय अलेस्साँद्रो पुरुष थे और स्त्री से विवाह कर रहे थे. "शरीर की बाहरी और भीतरी यौन पहचान में अन्तर होना एक बात है, नर या नारी के लिए यौन आकार्षण महसूस करना अलग बात है", अलेस्साँद्रा समझाती है.

इटली में अधिकतर लोग कैथोलिक ईसाई हैं. इस धर्म में तलाक को आसानी से नहीं स्वीकारा जाता. साथ ही कैथोलिक चर्च समलैंगिकता के भी विरुद्ध है और समलैंगिक विवाहों को नहीं स्वीकारता. इन्हीं दो बातों से अलेस्साँद्रा का धर्मसंकट का प्रश्न उठा, क्योंकि उन्होंने बैंकाक जा कर पुरुष से नारी बनने की शल्यक्रिया करवाने के बाद, इतालवी कानून के हिसाब से कोर्ट में अर्ज़ी दी कि उन्हें लिंग बदलने की अनुमति दी जाये. कोर्ट ने उनकी यह बात स्वीकार की और इस तरह अलेस्साँद्रो कानूनी तौर से भी, अलेस्साँद्रा बन गये. लेकिन अलेस्साँद्रा के बारे में चर्च के लोगों ने नगरपालिका द्वारा उनके तलाक की जबरदस्ती करने का विरोध किया है, वह कहते हैं कि पुरुष रूप में अलेस्साँद्रो ने अपनी पत्नी से विधिवत विवाह किया था, हमारी नज़र में कुछ नहीं बदला है, यह दोनो पति पत्नि हैं.

इतालवी कानून जहाँ एक और समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं देता, दूसरी और ट्राँसजेंडर विषय में प्रगतिशील है, इसे एक बीमारी की तरह देखता है, उनके इलाज की सुविधा और लोगों को कानूनी लिंग बदलने की अनुमति देता है. अलेस्साँद्रा को क्या सलाह दी जाये, इस पर पुराने विचारों वाले लोग भी कुछ परेशान हैं, उन्हें भी कुछ समझ नहीं आता. अगर कहें कि उनका विवाह नहीं माना जा सकता क्योंकि वह दो औरतों का विवाह है, तो इसका यह अर्थ हुआ कि पति या पत्नी की बीमारी के नाम पर तलाक को स्वीकृति दी जा रही है. और अगर उन्हें तलाक के लिए मजबूर न करें तो समलैंगिक विवाह को स्वीकृति मिलती है.

अलेसान्द्रा ने मुझसे भारत में रहने वाले हिँजड़ों की स्थिति के बारे में पूछा. मुझे इस विषय में विषेश जानकारी नहीं थी, लेकिन मैंने उसे बताया कि इस वर्ष जनगणना में पहली बार भारत में ट्राँसजेन्डर लोगों को गिना जा रहा है, और उनके लिए पुरुष, स्त्री से अलग श्रेणी बनायी गयी है. अलेसान्द्रा बोली, "मुझे भारत के ट्राँसजेन्डर लोगों के बारे में मालूम नहीं इस लिए नहीं कह सकती कि यह सही है या गलत, लेकिन मैं नहीं मानती कि हमारे लिए एक अलग श्रेणी बनायी जाये. मैं अपने आप को पूर्ण रूप से स्त्री मानती हूँ और चाहती हूँ कि कानून मुझे नारी माने."

अलेस्साँद्रा कहती है, "हमारा समाज भिन्नता से डरता है, उसे स्वीकार नहीं करता. लेकिन मैं तलाक नहीं लूँगी. जब हम दोनो साथ खुश हैं तो हमें क्यों अलग किया जा रहा है? बात केवल आई कार्ड की नहीं, टेक्स, प्रापर्टी, सब की बी है, अगर नगरपालिका हमें पति पत्नी नहीं मानेगी तो वह सब झँझट खड़े हो जायेंगे. यह मेरे मानव अधिकारों की बात है, मैं लड़ूँगी."

आप का क्या विचार है, अलेसान्द्रा के प्रश्न के बारे में?

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अलेसान्द्रा अलेसान्द्रा इटली के बड़े बैंक में कामगार यूनियन के लिए काम कार्यरत हैं और उनके काम का एक ध्येय यह भी है कि बैंक में काम करने वालों की भिन्नता को सम्पदा के रूप में देखा जाये न कि परेशानी के रूप में. इस विषय पर उन्होंने अन्य मित्रों के साथ मिल कर एक कम्पनी भी बनायी है जिसमें मानव भिन्नता से जुड़े विषयों का ध्यान और मान रख कर किस तरह बिज़नस किया जाये विषय पर सिखाया जाता है. उनकी तस्वीरें फेदेरीको बोरैला की हैं.

(Images of Alessandra Bernaroli are by Federico Borella)


रविवार, जनवरी 02, 2011

गार्गी की यवनी बेटी

कुछ दिन पहले स्पेन-चिली के फ़िल्म निर्देशक अलेहान्द्रो अमेनाबार (Alejandro Amenàbar) की फ़िल्म अगोरा (Agorà) देखी जिसमें चौथी शताब्दी की यवनी (ग्रीक) दर्शनशास्त्री और नक्षत्रशास्त्री हाइपाटिया (Hypatia) की कहानी है. पुरुष प्रधान समाज में स्वतंत्र सोचने वाली स्त्री के विषय के अतिरिक्त यह फ़िल्म धार्मिक कट्टरवाद के विषय को भी छूती है. इस फ़िल्म को देख कर भारत के पूर्व-इतिहास की ऐसी ही एक युवती, गार्गी, जिसकी कथा वेदों में लिखी है, के बारे में जानने की इच्छा भी मन में जागी.

Agora, a film by Alejandro Amernabar

ईसा से तीन सौ साल पहले यवनी सम्राट सिकन्दर यानि अलेक्ज़ान्डर (Alexander) ने आधुनिक तुर्की, सीरिया, मिस्र, ईराक, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत तक कर अपना साम्राज्य बनाया था. उनके नाम से बने यवनी शहर इन सभी देशों में आज भी उस इतिहास की गवाही देते हैं. हाइपेटिता की कहानी मिस्र (Egypt) में समुद्र तट पर बसे अलेज़ान्ड्रिया (Alexandria) शहर की है, जो उस समय अपने प्रकाश स्तम्भ तथा पुस्तकालय के लिए दुनिया भर में मशहूर था. तब तक यवन साम्राज्य कमज़ोर हो चुका था और रोमन साम्राज्य चर्म पर था.

हाइपेटिया, रोमन जिसे इपेत्सिया बुलाते हैं, अलेज़ान्ड्रिया के पुस्तकालय के अधिनायक की ज्ञानी बेटी थी जो दूर दूर से आये पुरुष छात्रों को दर्शनशास्त्र पढ़ाती थी तथा उसे नक्षत्र शास्त्र (Astronomy) में, विषेशकर धरती, सूर्य और अन्य ग्रहों के बारे में जानने में अधिक दिलचस्पी थी और वह विवाह से इन्कार करती थी. तब यवन और रोमन धार्मिक विश्वास था पुराने यवनी देवी देवताओं में, जैसे कि ज़ीअस, मिनर्वा, वीनस, आदि. इस धार्मिक विश्वास को बाद में "पागान" (Pagan) का नाम दिया गया.

Agora, a film by Alejandro Amernabar

फ़िल्म दिखाती है नये फैलते हुए ईसाई धर्म के द्वंद को, जो एक ओर तो शोषित दलित गुलामों को मानव मानता है और नये समताबद्ध समाज की संरचना करता है, दूसरी ओर उसके कुछ सदस्य अन्य धर्मों को मज़ाक उड़ाते हैं, और कुछ कट्टरपंथी अन्य विधर्मियों, यानि यहूदी (Jew) तथा पागान धर्मों में विश्वास करने वालों के विरुद्ध हिंसा का अभियान चलाते हैं. एक बार कट्टरपंथी राह चलती है तो बाकी सब धर्मों को दबा दिया जाता है, कुछ लोग वहाँ से भाग जाते है, बचे खुचे लोग धर्म परिवर्तन कर लेते हैं. हाइपेटिया पर डायन होने, पुरुषों को बहकाने और स्त्री शालिनता के विपरीत रहन सहन के आरोप लगा कर, मृत्युदंड की सजा दी जाती है. हाइपेटिया का ज्ञान कि धरती गोल है और ग्रह किस तरह सूर्य के आसपास घूमते हैं, अन्य कई सौ सालों के लिए खो जाते हैं. अलेज़ान्ड्रिया का अनूठा पुस्तकालय जहाँ सदियों का मानव ज्ञान संरक्षित था, नष्ट हो जाता है.

बाद के कुछ इतिहासकारों कहते हैं कि अलेज़ान्ड्रिया का प्राचीन पुस्तकालय पैगम्बर मुहम्मद के समय के बाद मुसलमानों ने नष्ट किया था और इसे "मुसलमान कट्टरवाद" के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि अन्य इतिहासकारों को कहना है कि यह प्राचीन पुस्कालय "ईसाई कट्टरवादियों" द्वारा नष्ट किया गया था. इस फ़िल्म में इसी को सच माना गया है और फ़िल्म में पुराने अलेज़ान्ड्रिया शहर को बहुत भव्य रूप से दिखाया गया है.

Agora, a film by Alejandro Amernabar

हाइपेटिया अन्य बहुत बातों में अपने समय से बहुत आगे थीं, लेकिन वह गुलामों के साथ हाने वाले अमानवीय व्यवहार के बारे में कुछ नहीं कहतीं, और न ही गुलामी को गलत मानती हैं.

मुझे फ़िल्म की सबसे अच्छी बात लगी कि किस तरह उसमें धार्मिक कट्टरवाद की बात को दिखाया गया है जो कि सोचने पर मजबूर करती है. उस समय का पागान धर्म सहिष्णु और उदार था, और उस समय अलेज़ान्ड्रिया में यहूदी, पागान, ईसाई, विभिन्न धर्मों को लोग शांति से साथ रहते थे. लेकिन एक बार विभिन्न धर्मों के कट्टरपंथी एक दूसरे के विरुद्ध जहर फैलाने लगे तो रूढ़िवादी ईसाई धार्मिक शासन बना और दूसरी ओर, ज्ञान और विकास दोनों के रास्ते रुक गये.

कुछ लोगों ने इस फ़िल्म को "ईसाई धर्म विरोधी" कहा है लेकिन खुशी की बात है कि कम से कम इटली में इस बात पर न कोई दंगे हुए, न किसी के कहा कि फ़िल्म को बैन किया जाये, आदि. बल्कि फ़िल्म को फ्राँस के कान फ़ैस्टिवल में विषेश पुरस्कार भी मिला. मेरे विचार में फ़िल्म ईसाई धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि कट्टरवाद के विरुद्ध है, क्योंकि फ़िल्म के अनुसार, उस समय हुई धार्मिक लड़ाईयों में पागान कट्टरपंथियों का भी उतना ही दोष था. अगर आप को यह फ़िल्म देखने का मौका मिले तो अवश्य देखियेगा.

इतिहास से हम क्या सबक सीख सकते हैं? क्या इतिहास हमें राह दिखा सकता है कि आज विश्व में छाये कट्टरवाद के खतरे से कैसे बचा जाये? फ़िल्म देख कर इस बात पर बहुत देर तक सोचता रहा, पर कोई आसान उत्तर नहीं मिला. एक तरफ से लगता है कि हर धार्मिक कट्टरवाद को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, तुरंत दबा दिया जाना चाहिये, पर यह भी लगता है कि हिंसा से हिंसा ही जन्मेंगी, दबाने से कट्टरवाद नष्ट नहीं होगा बल्कि और फैल सकता है.

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हाइपेटिया उस समय की नायिका थी जब सामान्य जीवन में स्त्री को कुछ अधिकार नहीं थे, पढ़ने लिखने और खुल कर बोलने का अधिकार भी नहीं था. इसके बावजूद वह स्वतंत्र रूप से विकसित हो सकीं, अध्यापक बनी, वैज्ञानिक शौध किया, दर्शन पर पुरुषों से बहस की, वह इसलिए कि उन्हें अपने पिता से सहयोग मिला.

भारत के वेदों में वर्णित ब्रह्मावादिनी गार्गी भी हाइपेटिया की तरह पुरुष प्रधान समाज में रहती थीं. ऋगवेद को सबसे पुराना आदिग्रंथ माना जाता है, इसमें स्त्री की जगह पत्नि तथा ग्रहणी के रूप में ही है, यहाँ तक कि सभी देव देवता भी पुरुष ही हैं और देवियों के नाम बहुत कम जगह पर आते हैं. गार्गी को महाऋषि वचक्नु की बेटी और आजीवन ब्रह्मचारिणी कहा जाता है. बृहदारण्यक उपनिषद में, विदेह के राजा जनक द्वारा आयोजित एक शास्त्रार्थ में उनका एक वर्णन है.

वेदों में वर्णित अन्य प्रसिद्ध स्त्रियों में, जैसे अनुसूया, शाण्डिली, सावित्री, अरुन्धती, आदि को पतिव्रता, निष्ठा आदि जैसे गुणों की वजह से श्रेष्ठ माना जाता है, विदुषी होने के लिए नहीं. मित्र ऋषि की पत्नि मेत्रेयी को अवश्य विदुशी कहते हैं पर पुराणों के अनुसार, उन्हें यह ज्ञान उनके पति ने दिया. यानि हाइपेटिया की तरह स्वतंत्र व्यक्तित्व रखने वाली, ज्ञानवती स्त्री केवल गार्गी ही थी.

क्या गार्गी को भी समाज का सामना करना पड़ा था, इसके बारे में आज कैसे जान सकते हैं?

शनिवार, दिसंबर 11, 2010

इच्छा मृत्यु या हत्या ?

संजय लीला भँसाली की फ़िल्मों से अन्य जो भी शिकायत हो, उनके मौलिक कलात्मक अंदाज़ को, तथा उसकी सौंदर्यपूर्ण और संवेदशनशील अभिव्यक्ति को, नहीं नकारा जा सकता. उनकी फ़िल्मों के विषयों की प्रेरणा तो अक्सर विश्व सिनेमा से मिली लगती है, लेकिन फ़िल्म को कहने का तरीका उनका अपना है.

मेरे विचार में उनकी फ़िल्मों की विशेषता है कि उनमें एक ओर मानव भावों को प्रधानता दी जाती है, दूसरी ओर उन भावनाओं की संकेतात्मक अभिव्यक्ति करने के लिए अक्सर वह कोई विशेष वातावरण बनाते हैं जिसमें प्रकृति, रंग, भवन वास्तुकला, संगीत आदि, कला के हर पक्ष को वह खोज कर गढ़ा जाता है. इस तरह उनकी फ़िल्मों का वातावरण भव्य, सुंदर और भावपूर्ण तो होता है, पर साथ ही, अगर सोच कर देखा जाये तो नकली या नाटकीय भी. यह तो उनकी कला अभिव्यक्ति की व्यक्तिगत शैली है, जो विषेशकर पिछली कुछ फ़िल्मों में गहरी हो गयी है. कोई कलाकार अपनी कला की अभिव्यक्ति के लिए किस शैली को चुनता है, यह तो उसका निजि निर्णय है, लेकिन मुझे लगता है कि बहुत से आलोचक उनकी फ़िल्मों को केवल इस शैली के मापदँड से देख कर उनकी आलोचना लिखते हैं, उसके परे नहीं जा पाते.

"खामोशी" से ले कर "देवदास", "साँवरिया" और "ब्लैक" तक, मुझे अब तक उनकी कोई फ़िल्म सिनेमा हाल में देखने का मौका नहीं मिला था, टेलीविज़न पर ही डीवीडी से देखा था, और हर बार सोचता था कि उनकी फ़िल्मों के हर दृश्य की भव्य नाटकीयता को सिनेमा हाल के बड़े परदे पर देखना अच्छा लगेगा. इसलिए इस बार भारत में था तो उनकी नयी फ़िल्म "गुज़ारिश" को सिनेमा हाल में देखने का मौका मिला, तो बहुत अच्छा लगा.

Guzaarish by Sanjay Leela Bhansali

इस फ़िल्म में भी वह अपनी कला शैली पर ही डटे हैं, यानि फ़िल्म में देखने में भव्य भी है और सुंदर भी, हर एक दृश्य जैसे चित्रकार ने तूलिका से बनाया हो. घने बादलों और बारिश के रंगों का फ़िल्म में प्रभुत्व हैं - गहरा नीला, भूरा, कत्थई, काला.

गोवा की जो सामान्य छवि मन में होती है, नीला समुद्र तट और उस पर अठखेलियाँ करते पर्यटक, या "आयेंगा खायेंगा, तुम हमको क्या बोलता" जैसी भाषा बोलने वाले मछुआरे, वे सब नहीं दिखते इस फ़िल्म में. फ़िल्म के तीनो मुख्य चरित्र, ईथन, सोफ़िया, उसकी देखभाल करने वाली नर्स देवयानी और जादू सीखने वाला शिष्य ओमार, गोवा के गाँवों के पुर्तगाली घर, वहाँ के पुर्तगाली रहन सहन, वस्त्रों आदि के साथ, भारतीय और पुर्तगाली सम्मिश्रण से रचा गया है, कुछ कुछ वैसा जैसे "ब्लैक" के लिए रचा गया था.

फ़िल्म के सभी अभिनेता अभिनेत्रियाँ, हृतिक रोशन और एश्वर्या राय से ले कर छोटे बड़े सभी चरित्र, चाहे वह डाक्टर हो या रसोई में काम करने वाली मारिया या चर्च का पादरी, हर एक को सोच कर सावधानी से रचा गया है जिससे कि सभी पात्रों हाड़ माँस के व्यक्ति हैं, केवल कहानी को बढ़ाने वाले कागज़ी चरित्र नहीं. अभिनय की दृष्टि से सभी प्रशंसनीय हैं, किसी के अभिनय के सुर में बेसुरापन नहीं लगता. हृतिक रोशन ने तो ईथन के भाग में जान डाली ही है, लेकिन बहुत समय के बाद मुझे एश्वर्य राय भी अच्छी लगीं.

भँसाली जी ने पहले भी "खामोशी" और "ब्लैक" फ़िल्मों में विकलाँगता की बात बहुत संवदेना के साथ की थी और "गुज़ारिश" में एक बार फ़िर इस विषय को छूना प्रशंसनीय है. आज के मल्टीप्लेक्स वातावरण में, व्यवसायिक प्रेम कहानियों से निकल कर, गम्भीर बातों को छूने का साहस सामान्य बात नहीं.

लेकिन जहाँ फ़िल्म एक ओर कला अनुभव के रूप में खरी उतरती है, उसकी कथा के संदेश, यानि विकलाँगता और इच्छा मृत्यु, के बारे में मेरे मन में कुछ दुविधाएँ हैं. लेकिन उन दुविधाओं के बारे में बात करने से पहले, मैं कुछ माह पहले अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्रिका "तहलका" में छपे एक लेख के बारे में कहना चाहूँगा जिसमें बात थी तमिलनाडू तथा दक्षिण भारत में गरीब परिवारों में, वृद्ध माता पिता को जान से मारने की.

इस लेख के अनुसार, कुछ गरीब परिवारों में वृद्ध माता पिता की जबरदस्ती तेल से मालिश की जाती है और दिन भर उन्हें नारियल का पानी पिलाया है जिससे उनके गुर्दे काम करना बन्द देते हैं और दो तीन दिनों में बूढ़े मर जाते हैं. अगर तेल मालिश और नारियल के पानी से बात न बने तो नाक बन्द करके जबरदस्ती मुँह में मिट्टी या जहर भी दिया जा सकता है. कुछ वृद्ध इसी डर से घर छोड़ कर चले जाते हैं, पर साथ ही वे अपने बच्चों को दोष नहीं देना चाहते क्योंकि वह जानते हैं कि गरीबी में बूढ़े माता पिता का ध्यान रखना आसान नहीं. कई बार इस तरह मारने से पहले, सब रिश्तेदारों को बुलाया जाता हैं ताकि मरनेवाले से मिल कर सब लोग ठीक से विदा ले सकें.

जीवन और मानव अधिकारों को बात करते हुए भी, मुझे मालूम है कि गरीब घर में भूखे प्यासे लोग जो जीवन मृत्यु के निर्णय लेते हैं, उन्हें वह लोग नहीं समझ सकते जिन्होंने स्वयं भूख न झेली हो. नैतिकता की बात करना आसान है पर जब छोटे छोटे खर्चों पर पूरे परिवार के जीने मरने का भविष्य टिका हो तो असली अनैकतिकता, गरीबी और भुखमरी हैं. अनचाही बच्चियों या विकलाँग बच्चों को मारने के लिए ज़हर या गला घोंटने की ज़रूरत नहीं, बस इतना काफ़ी है कि खाने के लिए कम दो या बीमारी में डाक्टर के पास न ले जाओ.

लेकिन आज के जीवन में, जिसमें खरीदना, दिखना, सफलता पाना ही जीवन के सबसे महत्वपूर्ण ध्येय हैं, शायद बात भुखमरी वाली गरीबी की नहीं, मनचाहा न खरीद पाने वाली गरीबी की है जिसमें बूढ़े माता पिता या विकलाँग बच्चों की जानें, हमारी आकाक्षाओं की राह में रुकावट बन जाती है और जिन्हें राह से हटाना अधिक आसान है? सचमुच स्वेच्छा से मरना चाहने वालों से, लालच में मारने वाले कई गुणा अधिक हैं और इसी लिए मानव जीवन रक्षा के कानून बने हैं. इस दृष्टि से देख कर मेरे मन में "गुज़ारिश" से कुछ दुविधाएँ उठीं थीं.

"गुज़ारिश" फ़िल्म के नायक ईथन को, 14 वर्ष पहले एक दुर्घटना की वजह से शरीर के गर्दन से नीचे के भाग को लकवा मार गया है. वह न हाथ पाँव हिला सकते हैं न शरीर पर स्पर्श का अनुभव कर सकते हैं. अपने आप वह करवट भी नहीं ले सकते और लेटे रहने की वजह से, उनकी पीठ पर घाव बन रहे हैं और उनके गुर्दे भी काम नहीं कर रहे जिससे उन्हें नियमित रूप से डायलेसिस की आवश्यकता होने लगी है. उनका जिगर भी ठीक से काम नहीं कर रहा. इन सब का अर्थ है कि उनका शरीर धीरे धीरे मृत्यु के करीब जा रहा है और वह उनके जीवन के कुछ ही महीने बचे हैं.

इस हालत में, यह जान कर कि अंत समय आ रहा है, कुछ महीनों की बात है, और घुट घुट कर मरने के बजाय, ईथन चाहता है कि उसे शान्ति से मरने दिया जाये, यह बात मेरी समझ में आती है. लेकिन फ़िल्म में ईथन के मरने की इच्छा की बात इस दृष्टि से नहीं की जाती, या की जाती है पर बहुत सीमित रूप में.

बजाय यह कहने के कि ईथन कुछ ही महीनों में मरने वाला है, और शायद वह घुट घुट के, तड़प तड़प के मरेगा, अदालत में बहस के दौरान तर्क दिये जाते हैं कि चूँकि ईथन कुछ महसूस नहीं कर सकता, अपने आप हिल भी नहीं सकता, और इसकी वजह से मानसिक तकलीफ़ में है इसलिए उसे मरने दिया जाये. लेकिन अगर इस विचार को सही मान लिया जाये तो शायद यह नहीं माना जायेगा कि जिनका आधा या पूरा शरीर लकवे से बँधा है, या जो विकलाँगता की वजह से सीमित है, उन सबको मरने दिया जाये या मार दिया जाये? वैसे "गुज़ारिश" में कई बार कहा जाता है कि बात सभी या अन्य विकलाँग व्यक्तियों की नहीं, केवल ईथन की है लेकिन ईथन के बारे में जो तर्क दिये जाते हैं वे तर्क तो अन्य व्यक्तियों के लिए भी कहे जा सकते हैं.

बोलोनिया में मेरे एक मित्र क्लाऊडियो इमप्रूदेंते का, जन्म से ही गर्दन से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त है. वह बोल भी नहीं सकते लेकिन पारदर्शी बोर्ड जिसपर ए, बी, सी, डी, लिखा हो, के माध्यम से आँखों के इशारे से बात करते हैं, लिखते हैं, मानव अधिकारों की बात करते हैं, स्कूलों में बच्चों को विकलाँगता और मानव अधिकारों की बात समझाते हैं. अगर "गुज़ारिश" के तर्कों को मान लिया जाये तो क्या यह समाज इस बात की अनुमति देगा कि क्लाऊडियो जैसे लोगों को जन्म होते ही जीवित न रखा जाये?

मैं सोचता हूँ कि जीवन की गुणवत्ता को मापने की कसौटी विकलाँगता का होना या होना नहीं है. बहुत से लोग, विकलाँगता के बावजूद जीवन को खुल कर, पूरा जीते हैं, और कुछ लोग विकलाँग न हो कर भी, जीवन को उस तरह से नहीं जी पाते.

मैं यह नहीं कहता कि हर हालत में जबरदस्ती मानव शरीर को मशीनों के सहारे ज़िन्दा रखा जाये. जीवन और मृत्यु, दोनों जुड़े हुए हैं और प्रकृति का हिस्सा हैं, बिना मृत्यु के जीवन नहीं हो सकता. मैं मानता हूँ कि जब वह समय आये जिसमें जीवन केवल पीड़ा भरी मृत्यु की प्रतीक्षा भर ही रह जाये, तो व्यक्ति को शान्ति से मरने का अधिकार चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिये. लेकिन मेरे विचार में "गुज़ारिश" में इस विचार को बिल्कुल ठीक ढंग से नहीं प्रस्तुत किया गया है. बजाय ईथन की विकलाँगता के तर्क दे कर, अगर फ़िल्म ईथन के सम्मान से और शांति से मर पाने के मानव अधिकार की बात करती तो वह बेहतर होता.

Guzaarish by Sanjay Leela Bhansali

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गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

यादों के दर्पण

जुगनू जी को घर पर पहली बार कब देखा, यह ठीक से याद नहीं. पापा से जुड़े नवजवानों को हम लोग घर में "शिष्य" कहते थे, जुगनू शारदेय जी उनमें से ही थे. यह उनकी पहली तस्वीर हमारे दिल्ली के राजेन्द्र नगर वाले घर से है जो शायद 1984 में खींची गयी थी.

Jugnu Shardeya, Hindi writer, thinker

पिछले सालों में बीच बीच में उनसे मुलाकात होती रही है. पिछले वर्ष से उनकी तबियत ठीक नहीं चल रही थी, लेकिन कुछ सप्ताह पहले जब वह मिले तो उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक लगा और बहुत अच्छा लगा. यह दूसरी तस्वीर इसी मौके से है.

Jugnu Shardeya, Hindi writer, thinker

उनको शुभकामनाओं के साथ, आज उनका एक पुराना लेख प्रस्तुत है जो उन्होंने करीब चालिस साल पहले लिखा था और "जन" पत्रिका में छपा उनका पहला आलेख था.

यादों के दर्पण में सिमटा हुआ अतीत

(आत्मकथा, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ, हिन्द पाकेट बुक्स, शाहदरा दिल्ली)

एक सीधे साधे और सच्चे आदमी ने अपनी कहानी, अपनी ही जुबानी प्रस्तुत की है. न लाग, न लपेट, सिर्फ मन की पीड़ा, अतीत के स्मरण और भविष्य का सपना. इस इन्सान को हिन्दुस्तान की पुरानी पीढ़ी भूल गयी है और जिन्हें उसकी याद है वे विवश हैं और नयी पीढ़ी जो इतिहास कक्षाओं में पढ़ती है उसमें इस आदमी का कहीं जिक़र नहीं होता. इस इन्सान की कहानी "संयक्त भारत और बँटे हुए पाकिस्तान के लिए एक आलोक स्तम्भ है." जीवन भर संघर्षशील रहने वाले, हर जोर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज उठाने वाले खान अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ की आत्मकथा पहली बार किसी भाषा में प्रकाशित हुई है (मुझे खुशी है वह भाषा हिन्दी है)

एक ओर जहाँ अंग्रेजों के अत्याचार का भण्डाफोड़ है वहीं दूसरी ओर खिलाफ़त आन्दोलन, मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की हकीकत का प्रस्तुत पुस्तक द्वारा पता चलता है. उस वक्त के समाज की सही स्थिति, पिछड़ापन, गरीबी और अशिक्षा के मूल कारणों का पता चलता है. ब्राह्मणवादी परम्पराएँ किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति में बाधक रही हैं. इसका मर्मगाही उदाहरण पुस्तक में से दे रहा हूँ. पश्तनु बच्चे जब पढ़ने पाठशाला में जाते थे तबके ब्राह्मण अर्थात मुल्ला मौलवी कहते थेः

सबक चिः द मद्रसे वाई
द पराइ द पैसे वाई.
जन्नत के बः जाए नवी,
दोजख के बः धंसे वही.

(जो लोग मदरसे में सबक पढ़ते हैं, वे पैसों के लिए ऐसा करते हैं. उनको जन्नत में जगह नहीं मिलेगी. वे दोजख में धक्के खाते रहेंगे.)

सीमान्त गांधी लिखते हैं, "इस्लाम के प्रादुर्भाव से पहले पख्तून हिन्दू थे और हमारे समाज में भी वह गलत नियम नियम प्रचलित था कि विद्या केवल ब्राह्मणों के लिए है. इस नियम के अधीन हम भी उसी तरह विभिक्त हो गये, जैसे बाकी हिन्दू अलग अलग टुकड़ों और वर्गों में थे."

पुस्तक में आत्मकथ्य के साथ सीमांत गांधी के विचारों, आस्थाओं और सिद्धान्तों का दर्शन है. पन्द्रह वर्षों तक स्वाधीनता संग्राम में जेल में रहने वाले रहबर बादशाह को पाकिस्तान की तथाकथित इस्लामी सरकार ने भी पन्द्रह वर्षों तक जेल में रखा. इस्लाम और पाकिस्तान के सम्बंध में वह कहते हैं, "... इस्लाम जिस समय इस देश में आ रहा था, उस समय आँखों में वह आध्यात्मिक आलोक, ईश्वरीय विचार, त्याग और तपस्या का भाव बाकी नहीं रहा था, जो इस्लामी पैगम्बर लाये थे या जिनका प्रचार अबूबकर और उमर जैसे महान पुरुषों ने किया था. ... इस्लाम जब हमारे देश पहुँचा, अरब राज्य साम्राज्यशाही और निरंकुशता में उन्मत हो चुके थे. उनमें धर्म प्रचार की लगन और नेकी फैलाने के भाव का अभाव हो चुका था ... इन्हीं महान व्यक्तियों के बलिदान के कारण अब पाकिस्तान स्थापित हुआ है. यह बात अलग है कि जिन पठानों ने पाकिस्तान के पूर्वजों को इस्लाम में दीक्षित किया था, उनके साथ पाकिस्तान का बर्ताव क्या है?"

मातृभाषा के सच्चे भक्त बाचाखान कने एक बार अफगानिस्तान के शाह अमानुल्ला खाँ से साफ कहा, "कितने शर्म की बात है कि आप को अन्य भाषाएँ आती हैं पर पश्तो नहीं आती. ... जाति की उन्नति अपनी भाषा से होती है." पुस्तक पढ़ने से यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि अहिंसा, विषेश तौर से सिविल नाफ़रमानी के बल पर अन्याय को खत्म किया जा सकता है. भाचाखान ने खूँखार पठानों को अपने स्नेह और प्रेम के बल पर अहिंसक बना कर सत्याग्रह का मार्ग दिखाया. (अंग्रेजों ने कहा था, "अहिंसावादी पठान हिंसावादी पठान से अधिक खतरनाक होता है.")

पुस्तक की भाषा और शब्दावली में कहीं कोई जाल नहीं, अपने मन के विचार हैं जिसके कारण कुछ लोग इसे प्रचारात्मक भी कह सकते हैं. स्थान स्थान पर बाचाखान ने, पाकिस्तान, भारत और दुनिया के अन्य मुल्कों के प्रति अपने विचार प्रस्तुत किये हैं. यहाँ कुछ बातों को मैं रखना चाहता हूँ, "मेरे निकट पाकिस्तान से दोस्ती मुमकिन नहीं, क्योंकि पाकिस्तान की बुनियाद नफरत है. पाकिस्तान की घुट्टी में नफरत, जलन, द्वेष, दुश्मनी वैमनस्य आदि दुर्भाव सने हैं. इसकी पैदाइश अंग्रेजों की कृपा से हुई है. पाकिस्तान तो शांति और मैत्री की बात सोच भी नहीं सकता. वह श्रेय साधना, सलह, सफाई का घेर विरोधी है. वह फर्जी जिहादी नारों से जनता को काबू में रखना चाहता है."

"... कांग्रेस ने, जो भारत की प्रतिनिधि संस्था थी, हमें न केवल अपने से दूर फेंक गिया, अपितु शत्रुओं के हवाले कर दिया था ..."

रहबर बादशाह के विचार, दर्शन और आस्थाएँ पुस्तक में बड़ी सच्चाई के साथ प्रस्तुत किये गये हैं, इसमें कोई प्रचार नहीं है, किसी से शिकवा शिकायत नहीं, सिर्फ सपना है स्वतंत्र पख्तूनिस्तान का, और गुस्सा है, नामर्दगी पर (चाहे वह भारत सरकार की तथाकथित तटस्थता हो अथवा पाक सरकार द्वारा निहत्थे पठानों पर गोली वर्षा) और गरीबी और अन्याय के खिलाफ एक आवाज है जिसे सुनना "कांग्रेसी" पसंद नहीं करते. पुस्तक में तीन भाषण हैं जो अत्यंत ही महत्वपूर्ण और पख्तूनिस्तान की वास्तविक स्मस्या को रखने वाले हैं.

इस पुस्तक को लिपिबद्ध करने वाले श्री कुँवर भानु नारंग और श्रीराम सरन नगीना तथा हिन्दी रूपांतरकार श्री जगन्नाथ प्रभाकर बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने यादों के दर्पण में बिखरे हुए अतीत को बाँधा है.

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मंगलवार, दिसंबर 07, 2010

चर्चा - भाषा की पूजा

कुछ दिन पहले 1967 की "जन" पत्रिका में छपा, हिन्दी लेखक और विचारक श्री रघुवीर सहाय के हिन्दी भाषा के बारे में लिखे आलेख को "भाषा की पूजा" के नाम से प्रस्तुत किया था. आज प्रस्तुत है इसी आलेख के बाद में हुई चर्चा की रिपोर्ट जिसमें हिन्दी लेखन जगत के बहुत से जाने माने नाम इस बहस पर और रघुवीर सहाय के आलेख के बारे में, हिन्दी या प्रान्तीय भाषाएँ या अँग्रेजी के विषय पर कहते हैं. इन नामों में हैं श्रीकांत वर्मा, मुद्राराक्षस, मनोहर श्याम जोशी, नेमीचन्दर जैन, इत्यादि. यह रिपोर्ट श्री रमेश गौड़ ने तैयार की थी.

चर्चा

श्री नेमिचन्द्र जैनः लेख में स्वतः सिद्ध प्रकार के वक्तव्य हैं. भावुक अभिव्यक्ति और चिन्तन का यह एक नमूना है. सभी मातृभाषाएँ इस्तेमाल की जायें तो समस्या सुलझ जायेगी, इस तरह की धारणा लगती है जो गलत है.

श्री विनय कुमारः  यह मान लिया गया है कि राजनीतिक ही अन्ततः भाषा के सम्बंध में निर्णय करेगा. भाषा की सड़न आदि के लिए केन्द्रीय सत्ता या सत्ताधारी दल को ही ज़िम्मेदार माना गया है. वास्तव में समस्या अधिक व्यापक है. सुविधा प्राप्त ऊँची हैसियत का पूरा वर्ग स्थिति के लिए ज़िम्मेदार है. अंग्रेज़ी हटाने का एहसास रखने वालों में भी चिंतन के स्तर पर अंग्रेज़ी का प्रभाव है. अंग्रेज़ी का इस्तेमाल एक तो स्वार्थ सिद्धि के लिए होता है, दूसरे दिमागी मजबूरी में. अंग्रेज़ी व्यक्तित्व के साथ जुड़ गयी है. इसलिए उसे सत्ताधारी दल तक ही सीमित नहीं करना चाहिये.

श्री भारतभूषण अग्रवालः अंग्रेज़ी जानने वाले शायद दो प्रतिशत ही नहीं हैं, आज़ादी के बाद बढ़े हैं.

श्री विनय कुमारः तीन चार साल पहले दसवें दर्जे तक अंग्रेज़ी पढ़े लोग 1.3 प्रतिशत थे, इसलिए दो प्रतिशत से अधिक नहीं.

श्री भारत भूषण अग्रवालः यह कहना आसान तरीका है कि मातृभाषा चले. लेकिन यह व्यवहारिक नहीं है. सारी अखिल भारतीय सेवाएँ केन्द्र की हैं. मातृभाषा चलने पर एक क्षेत्र के लोग दूसरे में कैसे काम करेंगे. केन्द्र में चौदह भाषाएँ चलें, यह कहना भी ठीक नहीं. करना यह होगा कि केन्द्र में हिन्दी चले और प्रान्तों में प्रान्तीय भाषाएँ, इतना ज़रूर है कि पिछले बीस सालों में मामला इतना बिगड़ गया है कि क्रांती जैसी चीज़ अब इसे सुलझा सकती है.

श्री रामानंद दोषीः भाषा सुविधा का माध्यम है. रोजमर्रा की भाषा और होती है, नौकरी आदि प्राप्त करने की दूसरी. हिन्दी या अंग्रेज़ी, कोई एक भाषा तो सीखनी ही होगी. केन्द्र में एक भाषा हो चाहे हिन्दी हो या कोई और भारतीय भाषा. चौदह भाषाओं का केन्द्र मे् चलना असम्भव है.

श्री श्रीकांत वर्माः चौदह भाषाओं की बात सही है. हिन्दी भाषी राजनीतिक और हिन्दी के लेखक, पराने तो सभी, कुछ नये भी, साम्राज्यवादी मनोवृति के हैं. लोक सभा में अन्य भाषओं के प्रयोग का विरोध हिन्दी वालों ने ही किया. वे समझते हें कि इससे हमारा नेतृत्व खतम हो जायेगा. हिन्दी भी एक क्षेत्रीय भाषा है. वह सम्पर्क भाषा है, उसे वही स्थान मिलना चाहिये, झूठी या अन्धी श्रद्धा नहीं. हिन्दी के साम्राज्यवाद की मनोवृति को खतम करना चाहिये. एकता भाषा के कारण नहीं होती. भारत की एकता का आधार पहले धर्म था, जैसे जैसे धर्म का ह्वास होता जायेगा, राजनीति उसकी जगह ले लेगी. स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी युद्ध के प्रचार की भाषा थी. अब वह स्थिति नहीं है. इसलिए सभी भाषाओं को उनका स्थान देना होगा. तमिलनाड में तमिल समर्थकों के जीतने से राष्ट्रीय एकता बढ़ी है. फ़िलहाल सभी भाषाओं का इस्तेमाल हो. हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृत होती है या नहीं, यह बाद की बात है.

डा. सदाशिव कारन्थः एक राष्ट्र के लिए एक भाषा की ज़रूरत नहीं. आर्थिक एकता हो तो विभिन्न भाषाएँ होते हुए भी राष्ट्र एक हो सकता है. केंद्रीय प्रशासन में एक ही भाषा होनी चाहिये, लेकिन राजनीति और हिन्दी को जोड़ने के कारण अभी यह मुश्किल है. जब तक मातृभाषा को ले कर जनता तक नहीं पहुँचते, तब तक कुछ नहीं हो सकता. पहले से ही हिन्दी को केन्द्रीय भाषा घोषित करने से उसका घोर विरोध होगा, देश टूट भी सकता है.

श्री परिमल दासः सन 1947 में ही हिन्दी को राजभाषा बना देना चाहिये था. एक भाषा होने से ही राष्ट्रीय एकता हो सकती है. जिसे हिन्दी का साम्राज्यवाद कहा जा रहा है, वह साम्राज्यवाद है नहीं, लेकिन अगर हो भी तो मैं उसे राष्ट्रहित में मानता हूँ. भाषा के प्रश्न को भौगोलिक राजनीतिक दृष्टि से देखना चाहिये, उत्तर दक्षिण, मध्य क्षेत्र और तटवर्ती क्षेत्र की दृष्टि से नहीं. गांधी जी और नेता जी ने महसूस किया था कि मध्यक्षेत्र ही कुछ करने में समर्थ हो सकता है, हिन्दी ही राष्ट्रीय एकता को बचा सकती है. लेकिन हिन्दी भाषी लोगों ने हिन्दी के प्रति प्रेम नहीं. वे नपुसंक हैं. गैर हिन्दी इलाकों के लोग ही फैलायेंगे, और राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलायेंगे.

श्री वेदप्रताप वैदिकः अंग्रेज़ी ने अभिव्यक्ति, चिंतन और दफ़्तर दोनो का स्थान घेर रखा है. हिन्दी को दफ़्तर के स्तर पर तो ला सकते हैं, अभिव्यक्ति और चिंतन के स्तर पर नहीं. सारी भाषाओं का दफ़्तर के स्तर पर प्रयोग बहुत मुश्किल, लेकिन अगर अभिव्यक्ति के स्तर पर सभी भाषाओं को स्वीकार कर लिया जाये, तो छोटे मोटे दफ़्तरी कामों के लिए हिन्दी के प्रयोग का विरोध नहीं होगा.

श्री रुद्र नारायण झाः लेख में भाषा समस्या का राजनीतिक समाधान खोजा गया है. प्रान्तीय भाषाओं को प्रान्तों में पूरी छूट होनी चाहिये, लेकिन सुनने की भी तो कोई भाषा होनी चाहिये. हिन्दी ने कोई भी साम्राज्यवादी काम नहीं किया है. सभी भाषाएँ चलें लेकिन एक केंद्रीय भाषा को भी तो मान्यता देनी पड़ेगी.

श्री ओम प्रकाश दीपकः जब तक अहिंदी भाषी इलाके हिन्दी को स्वीकार नहीं करते, तब तक क्या करें?

श्री रुद्र नारायण झाः इस प्रकार तो अंग्रेज़ी केन्द्रीय भाषा बनी रहेगी.

श्री ओम प्रकाश दीपकः आप के तर्क से तो यही नतीजा निकलता है.

श्री मन्थन नाथ गुप्तः राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान एक नारा उठा था, हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान. इसमें हिन्दू की वजह से पाकिस्तान बना. अब हिन्दी से देखिये क्या हो. जब दूसरे देश कई भाषाएँ ले कर एक रह सकते हैं तो भारत क्यों नहीं रह सकता. अभी तो सभी भाषाओं को मान्यता देनी होगी. फ़िर उस स्थिति से उत्पन्न प्रभावों के फ़लस्वरूप हो सकता है कि किसी एक भाषा पर सहमति हो जाये.

श्री रामधनीः भाषा का सवाल सामाजिक और आर्थिक सवालों से जुड़ा है. राष्ट्रभाषाएँ तो सभी हैं. बहुमत की भाषा को सम्पर्क भाषा मानना होगा, लेकिन हिन्दी के लिए जेहाद करने की ज़रूरत नहीं. यह जेहाद ही साम्राज्यवाद है. अंग्रेज़ी को तो हटा ही देना चाहिये. अंग्रेज़ी का मुल्क की ज़िन्दगी में कोई स्थान नहीं है. राष्ट्रीय एकता का इस साम्राज्यवाद से लाभ नहीं, नुकसान होगा. केन्द्र में सभी प्रान्तीय भाषाओं के प्रयोग को सिद्धान्ततः स्वीकार कर लेना चाहिये, अकेले हिन्दी का आग्रह और उसके लिए आन्दोलन अंग्रेज़ी के साम्राज्यवाद के स्थान पर नये साम्राज्यवाद की स्थापना करना है.

श्री मुद्राराक्षसः धर्म या भाषा को एकता का आधार बताना इतिहास की गलत व्याख्या है. भारत जितना बड़ा आज है, पहले कभी नहीं था. और यह एकता उसे अंग्रेज़ी शासन ने दी. पाकिस्तान बनने से आज यह ज़रूरत पैदा हो गयी है कि यह एकता बनी रहे. हिन्दी को जो साम्राज्यवादी बना रहे हैं, वे किसी को भी बना सकते हैं, लेकिन इससे क्या हम हिन्दी को छोड़ दें? अगर दक्षिण और बंगाल कट जाते हें तो यह कोई दुर्घटना नहीं होगी, भला ही होगा. भाषा नहीं होगी तो विभाजन के लिए दूसरे कारण पैदा हो जायेंगे. हिन्दी को अपनी सही छोटी जगह पर लाने की बात कहना समय को गलत समझना है, यह बड़ी बात कहना है. आज की राजनीतिक स्थिति में हिन्दी के साम्राज्यवाद की बात कहने में कुछ निहित स्वार्थ हैं.

श्री ओम प्रकाश दीपकः श्री मुद्राराक्षस ने इरादों के बारे में जो बात कही है उसे गम्भीरता से नहीं लेना चाहिये..

श्री मनोहर श्याम जोशीः भाषा का सवाल देश की अधूरी क्रांति से जुड़ा है. इसलिए साम्राज्यवाद आदि के सवाल उठते हैं. जब तक यह पूरी नहीं होती, तब तक समस्या बनी रहेगी.

श्री रमेश उपाध्यायः भाषा के सम्बन्ध में इतने भाषणों, बहसों आदि के बाद भी कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया जा सका इसके लिए वे लोग ज़म्मेदार हैं जो यथास्थिति को बनाये रखना चाहते हैं, स्वयं को खतरों से दूर रखने, जो मिल रहा है और उसे लेते रहने का लालच, और बिगड़ी परिस्थिति से अधिकतम लाभ उठाने की इच्छा के कारण हिन्दी के सम्बन्ध में यथास्थिति को कायम रखना, या केवल राजनीतिक लाभ के लिए असम्भव सुझाव रखना या पूँजीवादी व्यवस्था पर आँच न आये इसलिए अंग्रेज़ी की गुलामी चालू रखना, इन तीनों दृष्टियों से एक तरफ़ तो भाषा सम्बन्धी कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होने पाता, दूसरी तरफ़ भाषा विवाद का नशा लोगों को सामाजिक चेतना से पृथक रखता है.

श्री ओम प्रकाश दीपकः हिन्दी को हम लोक भाषा के रूप में लेते हें या अंग्रेज़ी की तरह सामन्ती राजभाषा के रूप में? मैं नहीं समझता कि हिन्दी साम्राज्यवादी हो सकती है, लेकिन हिन्दी नेताओं की दृष्टि जरूर ऐसी या संकीर्ण स्वार्थ वाली हो सकती है. बहस के लिए मान भी लें कि देश के अन्य टुकड़े होना अनिवार्य है, तो आखिर उससे भी तो हिन्दी एक क्षेत्र की ही भाषा रह जायेगी. देश की एकता के लिए मातृभाषाओं के अधिकार क्यों न स्वीकार करें? देश की एकता अंग्रेज़ों ने स्थापित नहीं की, बहुत पुरानी है, वरना बर्मा और श्री लंका के भारत से निकलने पर भी खून खराबा होता या फ़िर पाकिस्तान भी आसानी से बन जाता. लोकसभा में विभिन्न भाषाओं को मान्यता देनी ही होगी. उसी तरह केन्द्रीय सरकार का काम भी जनता के साथ उसी की भाषा में होना चाहिये. जब तक कोई एक भाषा सभी के लिए मातृभाषा जैसी नहीं होती, सभी भाषाओं का इस्तेमाल करना पड़ेगा. रह गये, केन्द्रीय सरकार के दफ़्तर. उनमें भी कोई ऐसा रास्ता निकालना पड़ेगा जो सबको मान्य हो. आगे चल कर कोई एक भाषा मान्य हो, इसके लिए भी फिलहाल सभी भाषाओं को मान्यता देना अनिवार्य लगता है. अन्ततः तो जैसा जोशी जी ने कहा है, मामला देश की अधूरी क्रांति के साथ जुड़ा है.

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