रविवार, अगस्त 09, 2026

क्या पढ़ा (1) - हिंदी कहानियाँ-आलेख

लगभग पिछले चालिस सालों से, जबसे दिल्ली छोड़ कर इटली में रहने लगा था, मेरा हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ना बहुत कम हो गया था, जब भारत जाता था तो इक्का-दुक्का पढ़ लेता था। पिछले साल अगस्त में मैंने "नॉटनुल" की वार्षिक सदस्यता ली तो इतने सालों के बाद हिंदी की पत्रिकाएँ पढ़ने का मौका मिलने लगा। अब इस बात को करीब एक साल हो गया है, एक दिन मैं याद करने लगा कि पिछले बारह महीनों में हिंदी पत्रिकाओं में क्या अच्छा पढ़ा, तो कुछ भी याद नहीं कर पाया। तब सोचा कि आगे से मुझे जो पढ़ा हुआ अच्छा लगेगा, उसके बारे में इस ब्लॉग पर लिखने की कोशिश करनी चाहिये, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे याद किया जा सके।

 

मुझे आशावादी साहित्य पढ़ना अच्छा लगता है, मैं चाहता हूँ कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें या दुख हों, लेकिन कहानी के क्षितिज पर एक आशा की छोटी सी किरण भी होनी चाहिये, सब कुछ बिल्कुल नकारात्मक नहीं होना चाहिये। दूसरी बात है कहानी का कथानक, उसके कहने का अन्दाज़, उसकी बातें। पिछले वर्ष में जब हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ीं तो मुझे समझ में आया कि मुझे हिंदी कहानियाँ पढ़ना इतना अच्छा नहीं लगता, बल्कि आलेख पढ़ना अधिक अच्छा लगता है।

इसीलिए आज के मेरे इस आलेख में कहानियाँ कम पायेंगे और आलेख अधिक।

कथा-कहानियाँ 

चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी "फर्ज", नया ज्ञानोदय पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी। इसमें दामोदर भगत का बेटा बैजनाथ अपनी पसंद की युवती से ब्याह करना चाहता है, पर भगत जी ने पाँच साल पहले किसी को ज़ुबान दी थी कि उनकी सुंदर, सुस्कृंत कन्या से पुत्र का ब्याह करेंगे। गुस्से में भगत जी निर्णय लेते हैं कि अगर बैजनाथ उनकी बात नहीं मानेगा तो वह उसे अपनी जयदाद से बेदखल कर देंगे। कह तो देते हैं लेकिन उनके मन में इस बारे में कुछ संशय है, इसलिए वह अपने फुलकाहा गाँव के वरिष्ठ ज्ञानी वेदानन्द गिरि से सलाह लेने जाते हैं ... जब यह कहानी शुरु हुई, तो मेरे मन में अपेक्षा थी कि वह किस दिशा में जायेगी, लेकिन कहानी ने वह घिसा-पिटा रास्ता नहीं लेती, बल्कि एक दूसरी ही दिशा में चल पड़ती है। कहानी में वेदानन्द बाबू की यादों के किस्से और उनकी भगत जी को समझाने की कोशिशें, मुझे अच्छी लगीं। कहानी का अंत थोड़ा सा कन्वीनियंट लगा, पर कहानी पढ़ने में मज़ा आया।

मुकेश नौटियाल की कहानी "सियारसिंगी", जुलाई 2026 की पाखी पत्रिका में पढ़ी। इस कहानी में दो कहानियाँ हैं, एक कहानी है एक पहाड़ी गाँव की औरत, उसके बेटे और उसके खोये हुए भाई की। और दूसरी कहानी है एक तिब्बती शरणार्थी युवती और उसके साथ रहने वाले गूँगे-बहरे लड़के की। इन दो कहानियों को स्कूल में पढ़ाने वाले एक मास्टर जी जोड़ते हैं जो गाँव वाली औरत की चिट्ठियाँ लिखते हैं और उसके भाई को खोजने देहरादून की तिब्बती बस्ती में जाते हैं। कहानी में दो लोकविश्वास की कहानियाँ भी जुड़ी हैं, एक सियारों के माथे में उगने वाली जादुई शक्ति वाली सियारसिंगी की और दूसरी, इन्सानों को आग पर पका कर उनके कपाल से निकाले जाने वाले रामतेल की। यह सारी कहानी संयोगों पर टिकी है, कहानी के हर मोड़ पर मास्टर जी हर जगह पर जो भी खोजते हैं, वह उन्हें आसानी से मिल जाता है। पर जादुई-यदार्थवाद की कहानी में तर्क की अपेक्षा करना शायद उचित भी नहीं है। इस कहानी में मुझे उसकी भाषा और पहाड़ी लोकजीवन की खुशबु अच्छी लगीं। 

नर्मदेश्वर की कहानी "सूई धागा", परिकथा पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी, अच्छी लगी। छोटी सी, सीधी-साधी कहानी है, जद्दी चाचा नाम के दर्जी और संदीप नाम के लड़के की, कि कैसे समय के साथ संदीप की उनसे जान-पहचान बनती है और लड़के को समझ आती है कि ऊपर से सख्त दिखने वाले जद्दी चाचा मन के नर्मदिल हैं। कहानी में जद्दी चाचा का अपने बेटों के नाम पेट्रोल और डीज़ल देख कर कुछ अजीब सा लगा, सोचा कि लेखक को उन नामों की कहानी भी बतानी चाहिये थी। इस कहानी से मुझे बचपन के दिनों की याद आई जब दर्जी, सफाई वाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, दुकानदार, आदि बेनाम नहीं सचमुच के लोग होते थे, हम उनके नामों और परिवारों के इतिहासों को जानते थे, और वे हमारे।

आलेख, संस्मरण, आदि 

बिपिन तिवारी, अभिषेख गुप्ता और रोहतास कुमार का सुधीर विद्यार्थी से लम्बा साक्षात्कार "विप्लव राग" शीर्षक से, बनास जन पत्रिका में पढ़ा जो मुझे अच्छा लगा। सुधीर विद्यार्थी जी 1953 में पैदा हुए थे, उन्होंने इतिहास में एमए की और बीसवीं सदी के क्राँतिकारियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। इस साक्षत्कार-आलेख में बहुत सी रोचक बातें जानने को मिली, जैसे कि बनारसीदास चतुर्वेदी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, सुंदरलाल, बाबा नागार्जुन, आदि के संस्मरण, क्राँतिकारियों के बारे में गाँधी जी और नेहरू जी के बीच मतभेद, लोगों द्वारा भगतसिंह के सिर पर पगड़ी रखने का अर्थ, पंडित परमानन्द की कहानी, सुनीति चौधरी और शांति घोष की बातें, आदि। आलेख में अपने लेखन के बारे में सुधीर जी कहते हैं, "मैं किसी लायब्रेरी में नहीं बैठा, न किसी आर्काइव में गया। उस इतिहास को मैंने देखा-सुना-जाना, क्राँतिकारियों की आँखों से, उनके शब्दों से। इतिहास को बताते हुए कई-कई बार उन्हें रोते हुए देखा ..."। 64 पन्नों का यह साक्षात्कार है, किसी छोटी किताब के बराबर लम्बा है, पर बहुत दिलचस्प है। 

प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का मई 2026 में 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनके बारे में दो आलेख पढ़े। एक आलेख "हँस पत्रिका" में पढ़ा जिसमें युवा शायर महेंद्र कुमार सानी ने अपने स्मृति-आलेख, "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो", में उनके प्रिय और प्रसिद्ध शेरों को याद किया है। जबकि डॉ. जियाउर रहमान ज़ाफ़री ने "ककसाड़ पत्रिका" के जुलाई अंक में अपने आलेख, "शायर बशीर बद्र को याद करने वाले ...", में उनके जीवन की कुछ बातों बतायीं हैं जैसे कि कैसे 1987 में मेरठ के दंगे में अपना घर खो कर वह भोपाल चले आये थे, कैसे अंतिम वर्षों में उनकी यादाश्त नहीं रही थी और कैसे बड़े बाग कब्रिस्तान में उनके जनाज़े साथ केवल मोबाइल की रोशनी और थोड़े से लोग थे। यहाँ मैं बद्र साहब का वह शेर याद करना चाहूँगा जिसे मैंने अपना जीवन जीने का मंत्र बनाया है: "हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल देंगे, रास्ता हो जायेगा।

शिव कुमार पाण्डेय का आलेख, "बस्तर की बोली-भाषा", भी ककसाड़ पत्रिका में ही पढ़ा। मुझे जनजातियों के जीवन से जुड़े लेख पढ़ना अच्छा लगता है इसलिए "ककसाड़" मासिक पत्रिका हमेशा चाव से पढ़ता हूँ। इस आलेख में पाण्डेय जी ने बस्तर की भाषाओं और बोलियों का बहुत दिलचस्प विवरण दिया है। जैसे कि गोंडी भाषा बस्तर में कांकेर और भानुप्रतापपुर के साथ-साथ अन्य बहुत से क्षेत्रों में भी बोली जाती है जिनमें कोन्टा, भोपाल पटनम, दाँतेवाड़ा, गढ़चिरोली, बालाधार, आदि भी शामिल हैं। हर जगह की गोंडी थोड़ी सी भिन्न है, लोग एक-दूसरे की गोंडी को समझते हैं, लेकिन उत्तर अपनी गोंडी में देते हैं। गोंडी के अतिरिक्त इस आलेख में "हल्बी" भाषा का भी जिक्र है जिसे बस्तर की सम्पर्क की भाषा भी कह सकते हैं और जिसमें छत्तीगढ़िया, मराठी और उड़िया भाषाएँ मिली हुई हैं। लेकिन गोंडी, हल्बी और बस्तर की अन्य 36 बोलियों में आपस में क्या सम्बंध है, यह बात मुझे ठीक से समझ नहीं आई, इसलिए इस विषय पर और पढ़ना अच्छा लगेगा। 

अकार पत्रिका में प्रियंवद का सम्पादकीय पढ़ा जिसमें उन्होंने हिंदी के वरिष्ठ लेखक तथा पहल पत्रिका के सम्पादक ज्ञानरंजन जी के बारे में लिखा है वह अच्छा लगा। उसमें उन्होंने, अन्य लेखकों के ज्ञानरंजन जी को लिखे पत्रों के माध्यम से, उनकी मार्क्सवादी-कथाकार बनने की यात्रा और फ़िर उनका कथाकार से अधिक सम्पादक बन जाने की बात, अन्य लेखकों के साथ उनके सम्बंधों, आदि की बातें बतायी हैं। ज्ञानरंजन जी की यह बात कि "मैं अपनों के प्रति बहुत निर्मम हूँ", मुझे बहुत परिचित सी लगी, क्योंकि एक समय था जब मेरी सोच भी कुछ वैसी ही थी, मुझे भी यह लगता था कि अगर मैं आप की कड़वी आलोचना करता हूँ तो इसका मतलब है कि आप मेरे प्रिय हैं (अब मैं इस सोच से बचने की कोशिश करता हूँ)। ज्ञानरंजन जी का इस साल के प्रारम्भ में देहांत हो गया था।

अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य छपे हैं, इन्हें भी मैंने बहुत रुचि से पढ़ा और यह मुझे बहुत अच्छे लगे। इनमें से कुछ की बात करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे गहरा छुआ:

मनोज रूपड़ा के वक्तव्य में, उनकी स्मृतियों में हिंसा की घटनाओं, कुत्तों का घायल बिल्ली को नोच कर खाने से ले कर जलती रेल की बोगी में झुलसती लाशों के विवरणों, ने दिल को हिला दिया।

जया जादवानी की जीवन गाथा पढ़ी तो लगा कि उनके जैसा जीवन जीते हुए पढ़ना और लिखना का मतलब कितनी कठिनाईयों से लड़ना है। वह लिखती हैं, "द्वंद कुछ नया सोचने का, कुछ नया रचने का अब ज़्यादा है। कुछ ऐसा जो वर्जित हो, जिसे अब तक कहा न जा सका हो। कहा भी गया हो तो उसके भीतर घुस कर नहीं। मैं चाहती हूँ मेरा सत्य मेरे होने से निकले ..."

जितेन्द्र भाटिया के वक्तव्य में उनका कहानी लिखने को वैताल के वृक्ष से "स्मृति के शव को नीचे उतारने जैसा" पढ़ कर बहुत देर तक सोचता रहा। मुझे लगा कि शायद स्मृतियाँ शव नहीं होतीं, जीवित होती हैं पर उनमें एक अलग किस्म का जीवन होता है। जैसे विक्रम के गलत उत्तर देने पर वह शव उड़ कर वापस पेड़ पर लौट जाता है, वैसे ही स्मृतियाँ भी हमारे मानसिक पटल पर उड़ती-घूमती रहती हैं। उनकी एक अन्य बात कि "कविता के मुकाबले में गद्य लेखन, प्रेरणा से अधिक एक धैर्यपूर्ण रियाज़ और अपने आगे-पीछे देखने-समझने की विवेकपूर्ण मशक्कत माँगता है", ने भी सोचने पर मजबूर किया।

दिव्या विजय की बात कि व्यक्ति अपने आप को लेखक कब महसूस करता है, मुझे दिलचस्प लगी। मैं अक्सर कला प्रदर्शनियों में कलाकारों से साक्षत्कार करता हूँ, वहाँ भी अक्सर उनके मन में यही संशय मिलता है, कि शायद मैं कलाकार नहीं हूँ, मैंने कला के लिए बलिदान वाला जीवन नहीं जिया। दिव्या जी लिखती हैं, "लिख देना, छप जाना, क्या इतने भर से लेखक बना जा सकता है? वह क्या है जो किसी व्यक्ति को लेखक में बदल देता है?"

राही डूमरचीर के वक्तव्य में संताल गाँव और मित्रों के बीच में एक प्रवासी परिवार का हिस्सा होने का द्वंद है, जो संतालों को नीचा और पिछड़ा हुआ मानता है, उनसे सम्बंध नहीं रखना चाहता, वहाँ की प्रकृति-पहाड़ की सुंदरता को नहीं देख पाता। वह लिखते हैं, "... दंभ भी आनुवांशिक होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वत: हस्तांतरित होता रहता है ... आदिवासियों के प्रति हमदर्दी ही हिलोर मारती थी, प्यार नहीं कर पाता था ... जँगल में अराजकता का राज होता है, कोई कायदा, कानून नहीं होता, यह वही कह सकता है जिसे सिर्फ बगीचे वाली व्यवस्था नज़र आती है ...हमारा समय पुरखे, पेड़ों, जंगलों में निवास करता है। उनके बीच पलता-बढ़ता है। उन्हीं के साथ-साथ चलता है। उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है ... मनुष्य विरोधी हो कर तो फ़िर भी रहा जा सकता है, पर धरती विरोधी हो कर कितने दिनों तक बचे रह पायेंगे हम?" 

कथा क्रम पत्रिका के अप्रैल-जून अंक में मधुरेश जी का लम्बा आलेख "शरत चन्द्र और उनका 'शेष प्रश्न': प्रेम दृष्टि और स्त्री चिंता के सवाल" में शरत चन्द्र के उपन्यास "शेष प्रश्न" के विभिन्न पात्रों विशेषकर कमल के बारे में, विवेचना तो है ही, साथ ही इस उपन्यास के विभिन्न संस्करणों के अनुवादों की गुणवत्ता और साहित्यिक भिन्नताओं की बात भी है। इस सब के साथ, आलेख में हिंदी साहित्य के पुराने अनुवादकों और प्रकाशकों की बाते भी हैं जो मुझे बहुत दिलचस्प लगीं। उदाहरण के लिए इस उपन्यास के 1927 में निकले संस्करण जिसका अनुवाद धन्य कुमार जैन ने किया था और नाथूराम 'प्रेमी' ने प्रकाशित किया था, की बात करते हुए वह नाथूराम प्रेमी के बारे में वह पुरानी जानकारी देते हैं जिससे आज का साहित्य जगत अवश्य ही अपरिचित होगा। उन्होंने लिखा है: "नाथूराम प्रेमी किस कद-बुत के प्रकाशक थे, इसके लिए चंद उदाहरण ही काफी होंगे। वे प्रेमचन्द्र और जैनेन्द्र के ही प्रकाशक नहीं थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'कबीर' और 'हिन्दी साहित्य की भूमिका' के प्रकाशक भी वही थे।"

अंत में

रिटायर होने के बाद से, हर रोज़ इतना कुछ पढ़ता हूँ, कि सब के बारे में लिखना सम्भव नहीं है, लेकिन जो पढ़ा उसमें क्या याद रखने लायक लगा, यह लिखना शायद थोड़ा सा आसान है। मेरे लिए ब्लॉग मेरी डायरी है, इस आलेख को लिखने की चेष्ठा का मेरा यही अर्थ है।

इस आलेख में जिन कहानियों और आलेखों के बारे में मैंने लिखा है, अगर आप कहें कि उसमें से चुन कर यह बताईये कि सबसे अधिक अच्छा क्या लगा, तो मेरा चुनाव होगा, अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य - इस बार सबसे अधिक दिलचस्प मुझे वही लगे।

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गुरुवार, अगस्त 06, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 20

अब तक की कहानी:  ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। त्री, रंगा और गार्गी बाबा के आश्रम आते हैं। पीछे से ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जाता है और रास्ते में उसे आभा की शक्ति का खतरा समझ में आता है। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 20

 नारायणपुर, असम, 4 मार्च 2026, रात

नारायणपुर में ताकानोरी का घर, घंटाघर के सामने से बेलागुड़ी सत्र जाने वाली सड़क पर है। दो मंजिला घर में सात कमरे हैं, चार नीचे और तीन ऊपर। ओरी अकेला ऊपर रहता है और सारे गार्ड नीचे।

घर पहुँच कर उसने उन तीनों को नीचे के एक कमरे में बंद करवा दिया। फ़िर गार्ड से कहा कि वह आभा के लिए बाथरूम में साबुन, शैम्पू, वगैरा रख दे।

जब गार्ड कमरे से गये और वह तीनों वहाँ अकेले हुए, तो खिड़की के पास लगे पेड़ों के माध्यम से, वसंत ने त्री को संदेश भेजा, और उसे बताया कि वह लोग नारायणपुर में ताकानोरी के घर पर ठहरे हैं और सभी ठीक-ठाक हैं। 

घर लौट कर ओरी नहाने गया और बहुत देर तक अपने सुडोल और गठी हुई माँसपेशियों वाले शरीर को शीशे में देख कर निहारता रहा। वह अपने आप से बहुत खुश महसूस कर रहा था कि उसने त्रिनेत्र के साथियों को पकड़ लिया है। उसकी पीठ वाले टैटू सचमुच डराने वाले थे, वहाँ पर एक लाल आँखों वाले हँसते हुए कंकाल का चेहरा बना है जिसके मुख से लाल आग निकल रही है और जिसके चारों ओर नारंगी रंग की मछलियाँ बनी हैं। अंत में वह सिल्क का ड्रैसिन्ग गाउन पहन कर बाहर निकल कर आया, सोच रहा था कि अब वह मूर्ति उसे अवश्य मिल जायेगी।

नीचे जा कर उसने रसोई में काम करने वाली को हटाया और खुद रात के खाने के लिए रामेन सूप बनाया और फ़िर, गार्ड से अपने कमरे में दो लोगों के लिए मेज़ पर खाना लगाने के लिए कहा। मेज़ के बीच में लाल रंग की मोमबत्ती जल रही थी। उसे लगा कि कमरे का वातावरण बहुत अच्छा बना है। तब उसने एक गार्ड से आभा को ऊपर लाने के लिए कहा।

जब ताकानोरी के गार्ड ने उसे साहब के साथ खाना खाने जाने के लिए तैयार होने के लिए कहा था, तो आभा समझ गयी थी कि वह क्या सोच रहा है। उसने निश्चय किया कि वह उसके साथ ऐसा व्यवहार करेगी जिससे उसे लगे कि वह उसे अच्छा लगता है, ताकि वह उससे खुल कर बातें करे।

जब गार्ड उसे बुलाने आया तो वह बोली, “बच्चे भी भूखे हैं, पहले इनके लिए खाना लाओ, फ़िर तुम्हारे साहब से मिलने जाऊँगी।"

गार्ड ने कार में बैल का हमला देखा था, वह मन ही मन में आभा से डर रहा था, सोच रहा था कि वह कोई चुड़ैल या जादुगरनी है। वह भाग कर रसोई से बच्चों के लिए खाना ले आया, तब वह कमरे से निकली। गार्ड ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो उसने उसे झटका कर दूर कर दिया और गर्व से सिर उठा कर सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गयी। उसने कोई श्रंगार नहीं किया था लेकिन उसके तीखे नाक-नक्श बहुत सुंदर लग रहे थे।

जब उसने ओरी के कमरे में सजी हुई मेज़ देखी तो मुस्करा कर बोली, “मेरी इतनी खातिरदारी क्यों हो रही है, क्या मुझसे जबरदस्ती करने का प्लैन बनाया है?”

उसकी बात सुन कर ओरी गुस्सा हो गया, बोला, “मुझे ऐरा-गेरा समझा है क्या? मैं समुराई खानदान से हूँ, मैंने आज कभी किसी औरत से जबरदस्ती नहीं की, औरतें खुद मेरे पास आती हैं और मेरे आगे-पीछे घूमती हैं।"

आभा मुस्करायी, कुछ कहा नहीं, कमरे में इधर-उधर देखा। एक ओर ताकानोरी का बिस्तर लगा था, उसके पास छोटी सी मेज़ पर एक बूढे जापानी की फ्रैम में लगी तस्वीर रखी थी। एक ओर खिड़की के पास एक दूसरी मेज़ पर हाथ में धनुष-बाण लिए हुए, घोड़े पर सवार जापानी पोशाक पहने हुए एक योद्धा की तस्वीर थी, जिसके सामने कुछ फ़ूल रखे थे और एक अगरबत्ती जल रही थी। वह किसी आराध्य-देवता का मन्दिर जैसा लग रहा था।

“वह बूढ़े व्यक्ति कौन हैं? तुम्हारे पिता हैं?”, उसने पूछा।

ओरी तस्वीर की ओर मुड़ कर झुका और उसे नमन किया, बोला, “वह यामागुचि सान हैं, उन्होंने मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया है, मैं उनका सेवक हूँ, वह पिता समान मेरे वंदनीय हैं।"

“और वह घुड़सवार यौद्धा?”

ताकानोरी ने उस तस्वीर की ओर भी झुक कर नमन किया, बोला, “वह हाचिमनतारो योशिए हैं, प्राचीन जापान के बहुत बड़े यौद्धा थे। हम उन्हें हाचिमन-शिन का अवतार मानते हैं। हमारे शिंतो धर्म में हाचिमन-शिन साहस और युद्ध के देवता हैं।"

“उस तस्वीर के दाहिनी ओर जापानी भाषा में कुछ लिखा हुआ भी है, उसका क्या अर्थ है?”

ओरी उसके प्रश्नों से बहुत खुश हुआ, उसे लगा कि वह पढ़ी-लिखी सुसंस्कृत युवती है, जो जापानी सभ्यता के बारे में जानना चाहती है। जब से वह भारत आया है, उसके कमरे में आने वाली किसी युवती ने अभी तक उसकी तस्वीरों में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। वह बोला, “एक बार हाचिमनतारो एक पहाड़ से उतर कर नीचे आ रहे थे, उनके रास्ते के दोनों ओर चैर्री के पेड़ लगे थे, तब उन्होंने एक कविता कही, ‘अगर मत-आओ द्वार पर हवाएँ नहीं चलीं, तो राह पर चैर्री के फ़ूल क्यों बिखरे हैं'। उस तस्वीर पर यही शब्द लिखे हैं।"

“मत-आओ द्वार का क्या मतलब?”

“वह द्वार जहाँ से यौद्धा को नहीं जाना चाहिये। इसका मतलब है कि कवि पूछ रहा है कि अगर मुझे यहाँ नहीं आना चाहिये था तो फ़िर मेरी राह में यह फ़ूल क्यों बिखेरे?"

उस कविता के शब्द आभा को सचमुच अच्छे लगे। उसे लगा कि ओरी जैसा भी है, उसके दिल में अपने अग्रजों और गुरुओं के प्रति आदर और कविता की जगह भी है।

ओरी उसके चेहरे के भाव से समझ गया कि उसे यह कविता अच्छी लगी है, खुश हो कर बोला, “आओ, रामेन सूप ठंडा हो रहा है।"

वह खाना खाने के लिए कुर्सी पर बैठी तो पूछा, “यह रामेन सूप क्या कोई जापानी भोजन है? यहाँ पर कैसे मिला?”

“मैं इन्हें जापान से लाया हूँ। यह गेहूँ की मोटी नूडल्स हैं जिसमें कन्साइ मिला कर बनाते हैं", उसने कहा।

वह उससे पूछना चाहती थी कि कन्साइ क्या होता है, लेकिन उससे पहले, ओरी बात बदलते हुए बोला, “तुम्हारी गुप्त-शक्ति जीव-जन्तुओं को तुम्हारी ओर आकर्षित करती है और वह तुम्हारी रक्षा करते हैं। इस शक्ति के बारे में कुछ बताओ?”

“बचपन से मुझे घायल पशु-पक्षियों को बचाना अच्छा लगता था, और घायल जीव-जन्तु मेरे पास बहुत आसानी से आ जाते थे", वह सोचते हुए बोली, “लेकिन तब मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि इसमें मेरी कोई विशेष शक्ति है। मैं मैइतै जनजाति की हूँ, हम लोग मणिपुर में रहते हैं। जब छोटी थी तो मैं पशु-पक्षियों की डॉक्टर बनना चाहती थी लेकिन उसके लिए कॉलेज हमारे गाँव से दूर था, उस पढ़ाई के लिए मुझे इम्फाल जा कर रहना पड़ता। उसके लिए मेरे पिता नहीं माने और स्कूल के बाद मेरा विवाह हो गया। मेरे पति विवेक का दो साल पहले एक बम विस्फोट में देहांत हो गया। उसके बाद से यह शक्ति, जिसे तुम मेरी गुप्त-शक्ति कहते हो, धीरे-धीरे वह कुछ सामने आई है।"

उसकी बात सुन कर ओरी सोच में पड़ गया, बोला, “यानि, तुम्हारे पति की मृत्यु के सदमें ने तुम्हारे भीतर सोयी गुप्त-शक्ति को जगा दिया?”

आभा की आँखें भीग गयीं, आँसू पोंछते हुए बोली, “जिस विस्फोट ने विवेक की जान ली थी, उसी में मेरी बेटी मयूरी भी मुझसे छिन गयी। बेटी और पति को एक साथ खोना, इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है?”

ओरी ने उसके मस्तिष्क में झाँका, इस बार आभा ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। वहाँ उसे केवल दुख और उदासी दिख रहे थे, यानि वह सच बोल रही है। वह बोला, “जापान में हमारे यामागुचि सान को उस कोरियाई भिक्षुक की तलाश थी, जिसे तुम लोग जामुन बाबा कहते हो। उन्हें उनकी हरिताश्म पत्थर की बनी देवी तारा की प्रतिमा चाहिये, जिसे बाबा कोरिया से ले कर आये थे। तुम इस बारे में क्या जानती हो?”

“मैं केवल इतना जाती हूँ कि बाबा त्रिनेत्र के गुरु थे, मैं उनसे कभी नहीं मिली। मैं त्रिनेत्र से भी कुछ दिन पहले ही मिली हूँ, वह मेरे भाई का दोस्त है। मुझे उस मृ्र्ति के बारे में कुछ नहीं मालूम।"

ओरी थोड़ी देर तक सोचता रहा, फ़िर बोला, “तुम मुझे अच्छी लगती हो। क्या तुम आज रात को यहाँ मेरे साथ रुकना चाहती हो? मैं तुम पर कोई जबरदस्ती नहीं करूँगा, लेकिन अगर तुम स्वेच्छा से रुको, तो मुझे अच्छा लगेगा।"

आभा ने उसे तुरंत उत्तर नहीं दिया, कुछ देर तक सोचती रही, फ़िर लम्बी साँस ले कर बोली, “मैं सोचती थी कि तुम गुँडे और खूनी हो, पर अब समझी हूँ कि तुम जैसे बाहर से लगते हो, वैसे नहीं हो। तुम दिलचस्प व्यक्ति हो, लेकिन मैं अभी किसी अन्य पुरुष से प्रेम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हूँ।"

ओरी ने अपने गार्ड को बुलाया और उसे आभा को नीचे बच्चों के पास ले जाने के लिए कहा, बोला, “मुझे तुम तीनों के बदले वह तारा माँ की प्रतिमा चाहिये। अगर त्रिनेत्र तुमसे सम्पर्क करे तो उसे कहना कि अगर वह प्रतिमा मुझे नहीं मिलेगी तो मैं तुम तीनों को मार दूँगा।"

आभा ने उसकी ओर देखा, कुछ नहीं बोली।

वह मुस्कराया, बोला, “मैंने तुमसे कहा कि तुम मुझे अच्छी लगती हो, वह झूठ नहीं था। लेकिन मेरा धर्म अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना है। अगर तुम्हारी हत्या से मुझे वह मूर्ति मिलेगी तो मैं तुम्हारी गर्दन काटने से एक क्षण के लिए भी नहीं हिचकिचाऊँगा, तुम यह बात समझती हो न?”

उसकी आँखों में कुछ था, जिसे वह समझ नहीं पायी कि वह सच कह रहा है या झूठी धमकी दे रहा है।

वह मुस्करा कर बोली, “जापानी रामेन का खाना खिलाने के लिए धन्यवाद। रामेन अच्छी हैं, पर मुझे खाने में बिना मिर्च-मसाले के अच्छा नहीं लगता। मेरे ख्याल में तुम्हारी रामेन में थोड़ी सी लाल मिर्च मिल जायेगी तो और भी बढ़िया लगेगी।"

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सोमवार, अगस्त 03, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 19

अब तक की कहानी:  ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। त्री, रंगा और गार्गी बाबा के आश्रम आते हैं। पीछे से ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जा रहा है। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 19 

मजूली से नारायणपुर, असम, 4 मार्च 2026

ताकानोरी ने जून-मिन की समाधी लेने की खबर तुरंत रिकू को दी थी और उसने उसे ऐसे डाँटा था मानो इसमें उसकी कोई गलती हो। एक पल के लिए ओरी को बहुत गुस्सा आया था, फ़िर उसने अपने आप को समझाया कि वह यह काम रिकू के लिए नहीं, बल्कि उसके दादा जी के लिए कर रहा है और जब तक वह कोई काम करेगा, उसका धर्म है उसे पूरे मन और निष्ठा से करना। अगर वह रिकू से बदला लेने के लिए दादा जी से विश्वासघात करेगा तो वह अपने आप को समुराई नहीं मान सकता, सचमुच अधर्मी याकूज़ा बन जायेगा। 

उसने अपने गुस्से को दबा कर, त्रिनेत्र के बारे में सोचा था कि वह उसे कैसे खोजे। जून-मिन और उसके शिष्य का मामला उतना साफ नहीं था जितना वह दोनों दिखाने की कोशिश कर रहे थे। जिस तरह से वीडियो में दिखता था कि जून-मिन एक बक्से में बंद हो कर, धरती के गर्भ में दबाया गया था, उसका मतलब था कि वह मर गया होगा। लेकिन वह इतनी आसानी से क्यों मरेगा? इसमें अवश्य कोई धोखा है। तीस वर्षों से लापता व्यक्ति, एक अन्वेषण-किरण को महसूस करके, उसी दिन समाधी ले कर आत्महत्या कर ले, क्यों? यह कोई संयोग नहीं लगता, इसके पीछे अवश्य उनकी कुछ चाल है।

जून-मिन के शिष्य की प्रतीक्षा करने, वह सुबह ही जीप ले कर कमलाबाड़ी आ गया था। उसने अपनी जीप फैरी घाट से कुछ दूर, घरों के पीछे छुपा कर खड़ी की और वहाँ से अन्वेषण-किरण से हर आने वाली फैरी की जाँच करने लगा। आखिर में, दोपहर में उसने शक्ति-लहरें आने वाली फैरी से नहीं बल्कि कमलाबाड़ी के पूर्व में एक मैदान से आती हुई महसूस कीं। उसने तुरंत अपने नये ड्राईवर से उधर जाने के लिए कहा।

दस मिनट में उनकी जीप उस मैदान में पहुँच गई जहाँ से शक्ति-लहरें महसूस हो रहीं थीं। वहाँ जून-मिन के शिष्य की जगह पर एक युवती और दो बच्चे को पक्षियों के बीच में खेलते हुए देख कर उसे अचरज हुआ। उसने अपने गुँडों से उन तीनों को उठा कर कार में लाने के लिए कहा और वे सब तुरंत वहाँ से भाग निकले। उन्होंने फैरी ली और पहले वह लोग मरियानी की ओर गये और वहाँ से वह जीप में नारायणपुर की ओर निकले।

ओरी ने सोचा कि वह तीनों अवश्य ही त्रिनेत्र के साथी हैं, नहीं तो इतने सारे शक्तिवान लोग वहाँ पर क्यों एकत्रित हो गये थे? वह यह सोच कर खुश हो रहा है कि अब त्रिनेत्र उससे नहीं बच पायेगा, उस युवती और उन बच्चों को बचाने वह अपने आप उसके पास आयेगा।

वह सबसे पीछे वाली सीट पर आभा के साथ बैठा था। उनके आगे वाली सीट पर दोनों बच्चे और एक गुँडा बैठे थे। साथ में उनका नया ड्राईवर और एक अन्य गुँडा था। रिकू ने उसके लिए इन नये गुँडों का प्रबंध किया था।

रास्ते में उसने फ़िर से आभा के दिमाग में खोजा। वह भी तुरंत समझ गयी कि वह उसके दिमाग में घुस रहा है, क्योंकि उसे इस शक्ति का ठीक से प्रयोग करना नहीं आता था। गार्गी जब उसके दिमाग में झाँकती थी तो ऐसा महसूस होता था मानो किसी ने प्यार से सहलाया हो। जबकि ओरी का दिमाग में घुसना हथौड़े मारने जैसा था। आभा ने ओरी को रोकने की कोशिश की, लेकिन नहीं रोक पायी और वह समझ गया कि त्रिनेत्र कहीं बाहर गया है।

उसने वसंत और तृप्ति के दिमाग खंगालने की भी कोशिश की लेकिन वहाँ से उसे कुछ नयी जानकारी नहीं मिली। उस लड़के के दिमाग में उसे हर ओर घने जंगल और पेड़ दिखे, जैसे वहाँ पर हरे रंग का समुद्र हो जिसमें कुछ भी देखना या खोजना असम्भव था। बच्ची की शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई थी लेकिन वहाँ से उसे त्रिनेत्र की कुछ छवियाँ मिलीं। इस जाँच के बाद उसने सोचा कि शायद आभा त्रिनेत्र की पत्नी है और वह दोनों उनके बच्चे हैं।

उनके दिमागों की इस जाँच से वह जल्दी ही थक गया और उसने उनसे अन्य प्रश्न नहीं किये, सोचा कि नारायणपुर में घर पहुँच कर ठीक से पूछताछ करेगा और फ़िर त्रिनेत्र को पकड़ने का प्लैन बनायेगा। वह तीनों भी कार में चुपचाप बैठे थे, पर आभा उसके गुदे हुए शरीर के रंग-बिरंगे टैटू को कौतूहल से देख रही थी। वह उनके बारे में जानना चाहती थी, अंत में वह अपने आप को नहीं रोक पायी, पूछा, “तुम्हारे सारे शरीर पर यह चित्र क्यों बने हैं?”

ओरी को अपने टैटू वाले त्वचा-चित्रों पर बहुत गर्व है, बोला, “इन्हें जापानी में इरेज़ूमी कहते हैं। यह सामान्य टैटू नहीं हैं जो मशीन से बनाते हैं, मैंने इन्हें पाराम्परिक विधि से गुदवाया है, जिसमें दर्द सहना पड़ता है”, उसने अपनी कमीज़ के बटन खोल खोल कर अपनी छाती और कँधे दिखाये, वह सारा हिस्सा उन रंगीन टैटू-चित्रों से ढका था। वह मुस्करा कर बोला, "मेरी पीठ, छाती, पेट, जाँघें, मेरे शरीर की हर जगह चित्रित है।"

वह मोर की तरह ऐसे इतरा रहा था कि आभा को हँसी आने लगी, उसे छुपाने के लिए वह खिड़की से बाहर देखने लगी। कुछ देर बाद ओरी ने पूछा, “क्या तुम त्रिनेत्र की पत्नि हो?”

जब उसने उत्तर नहीं दिया तो ओरी ने उसकी कलाई  को पकड़ लिया और दबाते हुए बोला, "जब तुमसे कुछ पूछूँ तो मुझे उसका जवाब तुरंत चाहिये, समझी?"

उस समय उनकी जीप एक रैड लाईट पर रुकी हुई थी। उसके दबाने से आभा की कलाई में पीड़ा हुई तो वह बोली, “मेरा हाथ छोड़िये, मुझे दर्द हो रहा है।"

सड़क के किनारे एक साँड घास चर रहा था, शायद उसने आभा के दिमाग की पीड़ा-लहर को महसूस किया तो वह अचानक जैसे नींद से जागा और सिर उठा कर उनकी जीप की ओर भागा आया। ड्राईवर ने अपने साथ वाली खिड़की खुली रखी हुई थी, साँड ने वहीं से उस पर हमला किया और खिड़की से सीर जीप के भीतर घुसा कर मारा। यह सब कुछ इतना अचानक हुआ कि किसी को समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।

ओरी ने तुरंत आभा की ओर देखा, उसने महसूस किया कि आभा की शक्ति-लहरें उत्तेजित हो कर उसके सिर के आसपास मँडरा रही हैं, तो उसने तुरंत उसकी कलाई छोड दी। वह समझ गया कि उस साँड का हमला आभा की वजह से हुआ है, वह चिल्लाया, “रोको उसे, ऐसे मत करो।" लेकिन आभा को कुछ समझ नहीं आया।

सीट के पीछे ओरी की तलवार रखी थी, उसके बिना वह कहीं नहीं जाता था। उसने उसे उठाया, उसमें से तलवार बाहर निकाली, पीछे वाला दरवाज़ा खोल कर जीप से उतरा और सीधा साँड की गर्दन पर वार किया। साँड की गर्दन से खून निकला तो शायद आभा को उस जन्तु का दर्द महसूस हुआ और उसकी शक्ति-लहर शाँत हो गयी। जब उसके और साँड के बीच का तार टूट गया तो वह वहाँ से भाग गया।   

ताकानोरी ने अपने ड्राईवर को देखा कि साँड के सींग से उसके माथे पर बड़े घाव बन गये थे और खून से उसके चेहरा, गर्दन और कमीज लाल हो रहे थे। उसने ड्राईवर को अपना रुमाल निकाल कर दिया, कहा कि उसे अपने माथे पर खून रोकने के लिए दबा कर रखे।

उसके गुँडों ने पास के डॉक्टर का पता पूछा और घायल ड्राईवर को वहाँ ले गये। उसके उपचार में समय लगना था, उन्होंने उसे वहीं छोड दिया और ओरी ने दूसरे आदमी से गाड़ी चलाने के लिए कहा। तब तक अँधेरा होने लगा था।

उसने आभा से पूछा, “तुमने उस जानवर से हमारी जीप पर हमला क्यों करवाया?”

“मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया, तुमने मेरी कलाई को ज़ोर से दबाया था, तो मुझे दर्द हो रहा था, इसलिए वह मुझे बचाने आया।"

अचानक ओरी ने हाथ बढ़ा कर अगली सीट पर बैठे वसंत के सिर के बाल पकड़ कर खींचे, तो वह दर्द से चिल्लाया, लेकिन उसने उसके बालों को नहीं छोड़ा, बोला, “तुम झूठ बोल रही हो। मुझे ठीक से उत्तर नहीं दोगी तो तुम्हारे बेटे का गला काट दूँगा।"

आभा घबरा कर चिल्लाई, “छोड़ो उसे, उसने कुछ नहीं किया। मैंने तुम्हें कहा है कि मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया।"

उस समय उनके साथ में सड़क पर एक बैलगाड़ी जा रही थी। जब वह चिल्लायी तो अचानक उसका बैल उनकी जीप की ओर घूम कर आगे आने लगा। ताकानोरी ने उसे देखते ही घबरा कर वसंत के बालों को छोड़ दिया और ड्राईवर से बोला, "जीप को तेजी से आगे निकाल लो, नहीं तो वह बैल हम पर हमला करेगा।"

ड्राईवर तुरंत तेज़ चला कर जीप को आगे ले गया। बैल के साथ बैलगाड़ी भी थी, वह उनका पीछा नहीं कर पाया।

ओरी कुछ शाँत हुआ तो उसने आभा के दिमाग के भीतर दोबारा झाँका, तो महसूस किया कि वहाँ पर उथल-पुथल मची है, शक्ति को केन्द्रित करके चलाने के लिए जो एकाग्रता और ध्यान चाहिये, वहाँ वैसा नहीं है। वह बोला, “तुम्हें अपनी शक्ति पर ठीक से काबू करना नहीं आता, क्यों? त्रिनेत्र ने तुम्हें यह शिक्षा नहीं दी?”

आभा बोली, “मैं उसे ठीक से नहीं जानती। वह मेरा गुरु नहीं है, वह एक अनाथाश्रम चलाता है और मैं उसके मित्र की बहन हूँ, विधवा हूँ।"

“उसका अनाथाश्रम कहाँ है?”

आभा को समझ नहीं आया कि क्या कहे। अगर वह उसे गँगटोक कहेगी तो वह वहाँ उनके अनाथाश्रम पर हमला कर सकता है, बोली, “वह मणिपुर में है, यहाँ से करीब आठ सौ किलोमीटर दूर है।"

ओरी ने तुरंत उसके दिमाग में झाँका तो उसे वहाँ अनाथाश्रम की बिल्डिंग दिखी, जिसके आसपास खेत और पहाड़ थे। उसे लगा कि आभा ने उसे जगह का नाम सही नहीं बताया है, लेकिन उसे समझ नहीं आया कि वह उससे वहाँ का सही नाम कैसे जान सकता है? उसने पूछा, “और यह दोनों बच्चे? यह किसके हैं?”

“यह दोनों भी अनाथ हैं", वह बोली।

ताकानोरी सोच में डूब गया। आभा के पास शक्ति है, और उन दोनों बच्चों में भी शक्ति है। शक्ति वाले इतने लोग एक जगह पर, एक साथ इकट्ठे कैसे हो गये? जापान में जब वह बड़ा हो रहा था तब यामागुचि सान के पास वह अकेला शक्ति वाला बच्चा था।

वह जानता है कि जून-मिन की मूर्ति से बच्चों की गुप्त-शक्ति विकसित होती है। शायद वह मूर्ति त्रिनेत्र के पास है, और उसकी मदद से ही उसने इन सब की शक्तियों को विकसित किया है?

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गुरुवार, जुलाई 30, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 18

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, मजूली पहुँच कर, उनके आश्रम आते हैं। समाधी के दर्शन करके वह बाहर आ रहे हैं जब त्री को जगदीश बाबू दिख जाते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 18

मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, शाम

गार्गी जगदीश बाबू को बुलाने गयी, बोली, “बाबू जी, हमारे बापू की तबियत ठीक नहीं है …”, और त्री की ओर इशारा किया।

जगदीश बाबू ने रास्ते के किनारे पर सिर झुका कर बैठे हुए त्री को देखा, लेकिन पहचान नहीं पाये। वह उसके पास आये, पूछा, “क्या हुआ भाई?”

त्री ने सिर ऊपर नहीं उठाया पर उनके साथ खड़ी गार्गी ने उन्हें धीरे से कहा, “जगदीश बाबू हमें आप से अकेले में ज़रूरी बात करनी है, हमें अपने दफ्तर में ले चलिये।"

उन्हें उसकी बात समझने में थोड़ी देर लगी पर शायद वह त्री को पहचान गये, आवाज़ ऊँची करके बोले, “हाँ, मैं तुम्हें दवाई देता हूँ, तुम लोग मेरे साथ चलो, तुम्हारे बापू की तबियत ठीक नहीं है।"

त्री और गार्गी जगदीश बाबू के साथ चले, त्री सिर झुका कर और लँगड़ा कर चल रहा था। रंगनाथ उनके पीछे कुछ दूर पर था और देख रहा था कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा। जब उसे विश्वास हो गया कि किसी ने उनकी बातचीत पर ध्यान नहीं दिया है, तो वह भी उनके पीछे जगदीश बाबू के दफ्तर की ओर आया। वहाँ उसने बाहर बैठे हुए सोमचाई को देखा, तो उसके पास जा कर बैठ गया और जेब से रंग-बिरंगे कँचे निकाल कर उन्हें हाथों में उछालने लगा।

वह कँचों को उछालने के खेल में माहिर है, जब वह उनसे खेलता है तो ऐसा लगता है मानो वह कँचे धीरे-धीरे हवा में तैर रहे हैं और नीचे नहीं गिरते। जब उसने एक साथ हवा में चार कँचे घुमाये तो सोमचाई का ध्यान उसके खेल पर लग गया। तब उसने कँचे सोमचाई की ओर बढ़ाये और उसे उन्हें उछालने के लिए कहा। सोमचाई को समझ नहीं आया कि वह क्या कह रहा है, तो उसने मुस्करा कर, हाथ से उन्हें उछालने का इशारा किया। सोमचाई ने उसे सिर हिला कर मना किया, लेकिन इतनी देर में जगदीश बाबू, त्री और गार्गी को आश्रम के भीतर के किसी कमरे में ले जा चुके थे।

भीतर जा कर जगदीश बाबू रोने लगे, त्री से बोले, “त्रिनेत्र बेटा, तुम्हें क्या बताऊँ। बाबा ने समाधी ले ली, हमें अनाथ कर दिया। लेकिन हमारे लिए यही दुख कम नहीं था, एक और आफत सिर पर आ पड़ी है। कल ताकानोरी और उसके गुँडे यहाँ आ धमके, उन्होंने हमारे एक बच्चे की गर्दन काटने की धमकी दी और बाबा ने तुम्हारे लिए जो चिट्ठी छोड़ी थी, उसे ले लिया। कल रात को उन्होंने बाबा की समाधी को तोड़ने की कोशिश की। इसमें उनके एक आदमी की आँख फूट गयी और दूसरे के पैर में गोली लगी है। वह कहता है कि वह किसी मूर्ति को खोज रहा है और जब तक उसे वह नहीं मिलेगी, वह हमें छोड़ेगा नहीं। अब हम क्या करें, हमें इन पापियों से कैसे मुक्ति मिलेगी?"

त्री ने उन्हें ढाढ़स बँधाया, “काका आप चिंता नहीं कीजिये, हमारे गुरु जी इतने कमज़ोर नहीं हैं कि एक गुँडे से हार जायेंगे। आप धीरज रखिये, सब ठीक हो जायेगा। गुरु जी ने जो चिट्ठी मेरे लिए छोड़ी थी, आप को मालूम है कि उसमें क्या लिखा है?” 

“उसमें एक कविता जैसी लिखी है, जिसका अर्थ उन्हें समझ नहीं आ रहा है। तब उन्होंने मुझे उसका अंग्रेज़ी अनुवाद करने के लिए कहा। मैंने अनुवाद तो कर दिया है, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आया कि बाबा क्या कहना चाहते थे", उन्होंने उसकी ओर एक कागज़ बढ़ाया, “जब अनुवाद कर रहा था तो मैंने उनकी चिट्ठी की बातों को यहाँ लिख लिया है। शायद यह कोई पहेली है? ताकानोरी कह रहा था कि जब तुम आओगे तो तुमसे इसका अर्थ पूछेगा।"

त्री ने उस कागज़ पर जल्दी से नज़र घुमायी और उसे तह करके जेब में रख लिया, बोला, “मैं समझ गया कि गुरु जी मुझे क्या कहना चाहते हैं। आप इस कविता की बिल्कुल चिंता नहीं कीजिये। जाने से पहले मैं आप से एक बात कहना चाहता हूँ। अगले दिनों में अगर आप मुझे ताकानोरी के साथ देखें तो उस समय मैं चाहे कुछ भी कहूँ या करूँ, आप ऐसा दिखाईये कि मुझे नहीं पहचानते और उनके सामने मुझसे बात करने की कोशिश भी नहीं कीजिये, समझे?”

जगदीश बाबू ने हामी भरी तो वह दोनों उठ कर पीछे के रास्ते से वृद्धाश्रम के गेट की ओर निकल गये। रंगनाथ ने उन्हें जाते देखा तो उसने मुस्करा कर सोमचाई से विदा ली और गेट की ओर आया।

वहाँ से वे सीधा फुलानीबाड़ी घाट की ओर गये, और घाट से श्री भोला मन्दिर के लिए मोटर-बोट ली, और फ़िर वहाँ से पैदल चल कर सुबह वाले रास्ते से लौटे। तब तक अँधेरा होने लगा था। जब वह सुरंग द्वार वाले पीपल के पेड़ के पास पहुँचे तो अचानक गार्गी रुक गयी, बोली, “माधव की शक्ति-लहर महसूस हो रही है, वह यहाँ आसपास कहीं छिपा हुआ है।" उसने आवाज़ लगाई, “माधव, हम हैं, बाहर आ जाओ।"

तब माधव झाड़ियों के नीचे से बाहर निकला। उसके कपड़ों और चेहरे पर धूल लगी थी और उस धूल में आँसू बहने के निशान दिख रहे थे।

त्री ने आगे बढ़ कर उसे बाहों में जकड़ लिया, पूछा, “क्या हुआ?”

माधव की आँखें फ़िर से भर आयीं, बोला, “एक आदमी आया था, मोटा, लम्बा-चौड़ा, पहलवान जैसा, वह आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को जबरदस्ती अपनी जीप में बिठा कर ले गया।"

पता चला कि दोपहर को ज़रीना ने उनके लिए खाना बनाया था। खाने के बाद उन्होंने कुछ देर आराम किया था, फ़िर वे सुरंग से होते हुए जँगल में घूमने आये थे।

त्री ने पूछा, “जब तुम लोग सुरंग से बाहर निकले तो किसी खुली जगह पर तो नहीं गये?”

“पहले तो हम जँगल में ही घूम रहे थे। लेकिन फ़िर पता नहीं कैसे, तीन सफेद बगुले जैसे पक्षी थे, वह आभा दीदी के एकदम पास आ गये। वह बहुत सुंदर पक्षी थे, उनकी पीली चोंच और सिर पर पीली कलगी थी और उन्हें हमसे बिल्कुल डर नहीं लग रहा था। हम उनके साथ खेलने लगे और उनके पीछे-पीछे चलते गये। उनके साथ हम एक मैदान में पहुँचे, वहाँ और भी बहुत सारे पक्षी जमा हो गये, वह सभी आभा दीदी के आसपास घूम रहे थे। हमें बहुत मज़ा आ रहा था। तब मुझे सू-सू आया था, तो मैं एक झाड़ी के पीछे सू-सू करने चला गया। तभी मैदान में एक जीप आयी, तो मैं छुप गया। जीप से तीन आदमी उतरे और उन्होंने आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को पकड़ लिया। फ़िर वह पहलवान आदमी जीप से उतरा, उसने आभा दीदी से कुछ पूछा और जब दीदी ने उत्तर नहीं दिया तो उसने उन्हें चाँटा मारा। फ़िर वह लोग उन्हें जीप में बिठा कर कहीं ले गये", माधव ने बताया।

त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “इसीलिए आज हमें वृद्धाश्रम के आसपास ताकानोरी की शक्ति महसूस नहीं हो रही थी, क्योंकि वह मुझे खोजने कमलाबाड़ी घाट की ओर आया था और उसने आभा और बच्चों की शक्ति-लहरों को देख लिया। यह कितनी देर पहले की बात है?”

“करीब आधा घंटा पहले की।"

त्री ने कहा, “शायद वह लोग अभी यहाँ से बहुत दूर नहीं गये, गार्गी, तुम उनकी शक्ति-लहर को खोजने की कोशिश करो।"

गार्गी ने आँखें बंद कीं और कुछ क्षणों के बाद बोली, “वह लोग किसी नाव या फैरी बोट में बैठे हैं, वह नाव नदी पार करके मरियानी की ओर जा रही है।"

त्री ने रंगनाथ को इशारा किया तो उसने भी नदी की दिशा में ध्यान लगाया, बोला, “ताकानोरी सोमचाई से टेलीफोन पर बात कर रहा है, कहता है कि उसे तीन लोग मिले हैं जो त्रिनेत्र के साथी लगते हैं और वह उन्हें घर ले कर जा रहा है।"

“कौन से घर?”

“यह तो उसने नहीं कहा।"

त्री ने कुछ देर तक सोचा, फ़िर गार्गी से कहा, “ताकानोरी के पास अन्वेषण-शक्ति है, तुम हमारी शक्ति-लहरों को ढक दो ताकि वह हमें नहीं देख पाये।"

गार्गी बोली, “दादा, मुझे बच्ची नहीं समझो, मैंने यहाँ आते ही हम सब की शक्ति-लहरों को ढक दिया था।"

त्री बोला, “अब हमें सोचना है कि हम उन तीनों तक संदेश कैसे पहुँचायें कि वह चिंता नहीं करें, हम उन्हें छुड़वाने का कोई रास्ता खोज निकलेंगे।"

गार्गी बोली, “दादा, मैं वसंत से बात कर सकती हूँ।"

"नहीं गार्गी, मैं नहीं चाहता कि हम ऐसा कुछ करें जिससे ताकानोरी को हमारा पता चल जाये।"

सोच कर रंगनाथ बोला, “दादा, वह सब लोग हमेशा तो एक साथ नहीं रहेंगे और वह उन्हें जहाँ भी ले कर जायेगा, चौबिस घंटे उनके पास नहीं रहेगा। जब वह उन्हें अकेला छोड़ेगा, तब हम उनसे बात कर सकते हैं, तब तक गार्गी उन पर नज़र रखेगी।"

अचानक माधव बोला, “उस केले के पेड़ को देखो, कैसे हिल रहा है, इसका मतलब है कि वसंत हमें कुछ कह रहा है।" सब ने उधर देखा, उस पेड़ के लम्बे हरे पत्ते, हाथी के कानों की तरह आगे-पीछे हिल रहे थे।

त्री बोला, “शायद वह पेड़ों के माध्यम से हमारी बातें सुन रहा है। वसंत अगर तुम मेरी आवाज़ सुन सकते हो, तो केले के साथ वाले पेड़ की पत्तियाँ हिलाओ।"

तुरंत केले के साथ वाले पेड़ की शाखाएँ भी ऊपर-नीचे हिलने लगीं।

त्री मुस्कराया, बोला, “बहुत बढ़िया वसंत। तुम लोग कोई चिंता नहीं करो, समय आने पर हम तुम्हें वहाँ से छुड़ा लेंगे। तुम हमें संदेश भिजवा देना कि तुम कहाँ हो और सब ठीक हो या नहीं। जब तुम लोग अकेले होगे, तब गार्गी भी तुमसे बात करेगी। अगर ताकानोरी तुमसे कुछ पूछे तो उसे मेरे मोबाइल का नम्बर दे देना, कहना कि मैं उससे बात करना चाहता हूँ।"

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सोमवार, जुलाई 27, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 17

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, मजूली पहुँच कर, उनके आश्रम आते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 17

 मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, दोपहर

 गुरु जी का तहखाने वाला घर काफ़ी बड़ा था। उसमें चार कमरे थे। त्री ने इशारा करके कहा, "वह गुरु जी का कमरा है, उसमें नहीं जाओ, बाकी घर में तुम जहाँ चाहो वहाँ जा सकते हो।

जब वह वहाँ पहुँचे तो दोपहर हो चुकी थी और तीनों को भूख लगी थी। गार्गी बोली, “यहाँ रसोई में गैस का चूल्हा रखा है, क्या हम कुछ खाना पका सकते हैं?”

त्री ने मना किया, बोला, “खाना बनायेंगे तो चिमनी की पाईप से धूँआ और गँध ऊपर जा सकते हैं, उससे लोगों को शक हो जायेगा, इस समय यह खतरा लेना ठीक नहीं। उधर अलमारी में देखो, वहाँ कुछ फ़ल, गाजर, मूली आदि रखे होंगे, उन्हें खाना बेहतर होगा।"

फ़ल-सब्जियाँ खा कर त्री ने गार्गी और रंगनाथ से कहा, “तुम दोनों ऊपर जा कर पता लगाओ कि वृद्धाश्रम में क्या हो रहा है?" वह उसे सीढ़ियों की ओर ले कर गया।

रंगनाथ ने ऊपर देखा तो बोला, “यह सीढ़ियाँ तो कुछ अजीब सी लगती हैं।" वह सीढ़ियाँ कमरे की छत तक जा कर रुक जाती थीं।

त्री बोला, “क्योंकि वहाँ एक छिपा हुआ दरवाज़ा है।" उसने सीढ़ियाँ चढ़ कर दीवार पर लगा एक बटन दबाया तो ऊपर से छत का एक हिस्सा खुल गया। उसने सिर को बाहर निकाल कर आसपास देखा। जब कोई नहीं दिखा तो उन्हें ऊपर आने का इशारा किया।

वह सीढ़ियाँ झाड़-झँखाड़ के बीच में एक खण्डहर के पीछे निकलीं, वहाँ आसपास घना जँगल था। त्री ने उन्हें इशारे से बताया, “उधर जाओ, वहाँ एक बाग है, उससे हो कर गुरु जी के घर के पिछले दरवाज़े तक पहुँच जाओगे, जो खुला होगा। उनके घर की खिड़कियों से वृद्धाश्रम का गेट दिखता है, तुम बस वहाँ से देख कर आओ।"

वह दोनों उस दिशा में बढ़े, धीरे-धीरे देखभाल कर कदम रख रहे थे ताकि बिल्कुल शोर नहीं हो, हालाँकि रंगनाथ ने अपनी श्रवण शक्ति से जाँच लिया था कि वहाँ कोई नहीं है। पेड़ों के बीच से हो कर वह गुरु जी के घर के पिछवाड़े वाले बाग में घुसे, देखा कि उसका पीछे वाला दरवाज़ा खुला हुआ है। गार्गी ने वहीं से कुछ क्षणों तक आँखें बंद करके, मन की दृष्टि से घर के भीतर खोजा और जब किसी व्यक्ति का भास नहीं हुआ तो वह दोनों दबे पाँव भीतर गये।

घर में देखा कि वहाँ किसी ने कुछ खोजने की कोशिश की है। सारे संदूक, दराज़ और अलमारियाँ खुले थे और चद्दर-कपड़े बाहर बिखरे हुए थे। वह खिड़की की ओर गये और छिप कर बाहर देखा। रंगनाथ ने आश्रम के भीतर से आते-जाते लोगों की बातों को सुना।

गेट के सामने एक कच्ची सड़क थी जो वृद्धाश्रम की ओर जा रही थी और जिस पर लोगों की कतार लगी थी, वह लोग एक-एक करके, धीरे-धीरे वृद्धाश्रम के भीतर जा रहे थे, और साथ से लोग बाहर निकल रहे थे। बाहर कोई पहरेदार या गार्ड नहीं था।

दोनों दबे पाँव, जैसे गये थे, वैसे ही वापस खण्डहर तक लौट कर आये। फ़िर नीचे तहखाने में आ कर त्री को सारी बात बतायी।

गार्गी बोली, “मैंने पूरे क्षेत्र को जाँचा लेकिन आश्रम में किसी की शक्ति-लहर महसूस नहीं हुई। इसका मतलब है कि ताकानोरी इस समय यहाँ नहीं है।"

“नदी की दूसरी ओर, नारायणपुर की तरफ भी शक्ति-लहर को खोजा? शायद वह वहाँ हो?” त्री ने पूछा।

“हाँ मैंने उस ओर भी देखा, वहाँ भी ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ।"

रंगनाथ बोला, “मैंने आश्रम से निकलने वाले लोगों के बातें सुनीं, लेकिन कोई विशेष बात नहीं पता चली, केवल गुरु जी की बातें कर रहे थे, और कह रहे थे कि आश्रम वालों को समाधी देखने वालों के लिए पानी पिलाने की व्यवस्था करनी चाहिये।"  

त्री बोला, “ठीक है, हम भी ऊपर जा कर समाधी देखने वालों की कतार में खड़े हो जायेंगे। यहाँ सब लोग गुरु जी को जामुन बाबा कहते हैं, अगर कोई पूछेगा तो हम भी यही कहेंगे कि उनकी समाधी को देखने आये हैं। लेकिन जहाँ तक हो सके, तुम दोनों कुछ नहीं बोलना, मुझे बात करने देना। आश्रम के गेट से घुसते ही, दायीं ओर की बिल्डिंग में उनके संचालक जगदीश बाबू का दफ्तर है, मुझे उनसे मिल कर बात करनी है। लेकिन वहाँ ताकानोरी का कम्प्यूटर वाला आदमी सोमचाई भी हो सकता है, हमें उससे बचना है। रंगनाथ, तुम उस ओर ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश करना, अगर तुम्हें जगदीश बाबू या सोमचाई का नाम सुनाई दे तो मुझे बताना।"

वह तीनों तहखाने से निकल आये, फ़िर जँगल से निकल कर वृद्धाश्रम की ओर गये और वहाँ खड़ी कतार में लग गये।

कतार में खड़े लोग आपस में बातें कर रहे थे। जब किसी ने त्री से पूछा तो उसने कहा कि वे अलीपुर द्वार के एक चाय-बागान से आये हैं और केवल बँगाली बोलते-समझते हैं, असमियाँ नहीं जानते। बाबा का नाम बँगाल तक फ़ैल गया है, और लोग उनकी समाधी देखने इतनी दूर से आ रहे हैं, यह सुन कर लोगों को अचरज हुआ। कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और उनके पीछे नये लोग आ कर जुड़ते जाते थे।

जब तक उनकी गेट से भीतर घुसने की बारी आयी, तब तक शाम होने वाली थी और कतार छोटी सी रह गयी थी। जब वह लोग वृद्धाश्रम की बिल्डिंग के पास से गुज़रे तो रंगनाथ ने अपनी श्रवण शक्ति लगा कर आसपास हो रही बातों को सुनने की कोशिश की। थोड़ी देर में ही उसने सोमचाई की आवाज़ को पकड़ लिया, और उसकी बातों को ध्यान से सुना। कुछ देर तक सुनने के बाद उसने त्री को कहा, “दादा, सोमचाई टेलीफोन पर ताकानोरी से बात कर रहा था, बोला कि बटेर को जोरहाट ले कर गये हैं, वहाँ उसकी आँख का ओपरेशन हुआ है और मटरू भी अस्पताल में भर्ती है।"

त्री ने पूछा, “ताकानोरी ने जवाब में कुछ कहा कि वह कहाँ पर है?”

“नहीं", रंगनाथ ने सिर हिला कर मना किया।

“ठीक है, तुम जगदीश बाबू का पता लगाने की कोशिश करो कि वह कहाँ हैं।"

तब तक वे समाधी-स्थल पर पहुँच गये। चूँकि अब भीड कम हो गयी थी इसलिए लोगों को वहाँ रुकने का अधिक समय मिल रहा था। लोग समाधी स्थल की परिक्रमा कर रहे थे और कुछ लोग वहाँ हाथ जोड कर प्रार्थना भी कर रहे थे।

समाधी के पास पहुँचे तो त्री ने धीरे से गार्गी से कहा, “ज़रा कोशिश करके देखो कि क्या समाधी में गुरु जी की शक्ति-लहर महसूस होती है?”

वह तीनों वहाँ आँखें बंद करके, हाथ जोड़ कर खड़े थे। रंगनाथ ने सुना कि एक बूढ़ा दूसरे से कह रहा है, “यह भीड़ सम्भालने का काम बहुत थकाने वाला है, पता नहीं यह सब कितने दिन चलेगा। मैं कल जगदीश बाबू से कहूँगा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है।"

वहाँ से चलने लगे तो गार्गी बोली, “समाधी से बहुत हलका सा शक्ति का भास होता है, शायद उनकी शक्ति कमज़ोर हो रही है, या वह बहुत गहराई में हैं।"

त्री का चेहरा गम्भीर हो गया, बोला, “उनकी शक्ति इतनी आसानी से क्षीण नहीं होगी, वह अवश्य ही गहराई में हैं।"

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, ज़मीन के नीचे दबने के बाद गुरु जी साँस कैसे लेंगे?”

त्री ने उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, पूछा, “जगदीश बाबू का पता नहीं चला?”

रंगनाथ ने फ़िर से अपनी श्रवण-शक्ति का ध्यान लगा कर  उसे आसपास घुमाया और बोला, “आश्रम में कई लोग उनकी बात कर रहे हैं लेकिन अभी तक किसी को उन्हें उनके नाम से बुलाते हुए नहीं सुना। मैं उनकी आवाज़ नहीं पहचानता, उनका पता कैसे लगाऊँगा?”

वे वापस वृद्धालय के गेट की ओर जा रहे थे जब अचानक त्री रुक गया, बोला, “वह सामने हैं जगदीश बाबू, वह इधर ही आ रहे हैं। उनके साथ दो अन्य लोग हैं, हमें उनसे अकेले में बात करने का कोई बहाना चाहिये।"

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रविवार, जुलाई 26, 2026

बाघा जतिन और उनके पौत्र

करीब तेरह साल पहले मुझे पैरिस से पृथ्वीन्द्र मुखर्जी की ईमेल मिली, कि उनके दादा बाघा जतिन पर फ़िल्म निर्देशक हरिसाधन दासगुप्ता ने एक फ़िल्म बनायी थी और वह हरिसाधन जी के पुत्र फ़िल्म निर्देशक राजा दासगुप्ता का सम्पर्क खोज रहे थे। मैंने बचपन में बाघा जतिन का नाम सुना था लेकिन उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, बस इतना जानता था कि वह अंग्रेज़ी सरकार से लड़ने वाले एक क्राँतिकारी थे। मैंने सोचा कि बाघा जतिन के पौत्र से सम्पर्क हुआ है तो इसका फायदा उठाना चाहिये और उनसे उनके दादा के बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिये।

इस तरह से पृथ्वीन्द्र जी से कुछ संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। तब मैं एक शोध रिपोर्ट पर काम कर रहा था, सोचा कि उसे पूरा करके पृथ्वीन्द्र जी से बातचीत करूँगा लेकिन जैसा अक्सर होता है, कुछ दिनों में मैं इस बात को भूल गया। दो साल पहले जब उनके देहांत की खबर पढ़ी तो अपनी वह पुरानी बातचीत याद आयी, बहुत दुख हुआ कि मैंने उस समय उनसे बात क्यों नहीं की।

कुछ ऐसा ही मेरे साथ पहले भी एक बार हुआ था जब मैंने दिल्ली में मित्र कर्बान अली से कहा था कि जब दिल्ली आऊँगा तो उनके पिता जी कप्तान अब्बास अली से बातचीत करने आऊँगा। कप्तान अब्बास अली जी ने 1940 के दशक में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद हिंद फौज में भाग लिया था, वहीं पर वह कप्तान बने थे। जब 2014 में उनकी मृत्यु की खबर मिली थी तब भी यही दुख हुआ था कि समय रहते उनसे क्यों नहीं मिला था।

खैर इस बार मैंने सोचा कि बाघा जतिन के बारे में इंटरनैट पर खोज करके लिखूँ। यही सोचते-सोचते दो साल बीत गये हैं, पर आखिर में वह आलेख लिखने का समय मुझे मिल ही गया।

बाघा जतिन - जतिन्द्रनाथ मुखर्जी

जतिन्द्रनाथ का जन्म सन् 1879 में उनकी ननिहाल कुष्टिया जिले के केया गाँव में हुआ था। उनका पैतृिक घर वहाँ से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में साधुहाटी में था, जहाँ वह बड़े हुए। यह दोनों जगहें अब बँगलादेश के खुलना डिविज़न का हिस्सा हैं। हाई स्कूल के बाद 1895 में वह कलकत्ता सैंट्रल कॉलेज में पढ़ने गये।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में वह स्वामी विवेकानन्द और बहन निवेदिता से मिले। स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त उनकी मुलाकात अरविंदो घोष, रासबिहारी बोस आदि व्यक्तियों के सम्पर्क में आये। इस तरह से वह भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले युगांतर अभियान तथा अनुशीलन समिति से जुड़े और भारत के स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बन गये। अनुशीलन समिति में बंकिमचन्द्र चैटर्जी और स्वामी विवेकानन्द के हिन्दू-शक्ता आध्यात्मिक विचारधारा की सोच वाले लोग थे जो स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्राँति का रास्ता खोज रहे थे।

1906 में अपने गाँव से लौटते समय जतिन्द्रनाथ का जँगल में एक बाघ से सामना हुआ और वह अपनी छुरी से उसे मारने में सफल हुए जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ सरकार की ओर से बाघ का खिताब मिला और लोग उन्हें बाघा जतिन बुलाने लगे।

1908-09 में मुज़्ज़फरपुर के मजिस्ट्रेट की हत्या की साजिश का मुकदमा चला जिसमें अरविंद घोष के साथ अन्य आरोपियों में जतिन्द्रनाथ भी थे। इस मुकदमें में अनुशीलन समिति को बैन कर दिया गया, बहुत लोगों को सजा मिली लेकिन जतिन्द्रनाथ को सबूत न मिलने पर बरी किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें "हावड़ा-शिवपुर साजिश" के मुकदमें में दोबारा गिरफ्तार किया गया और वह ग्यारह महीनों तक हावड़ा जेल में रहे।

उन्होंने जर्मनी में हथियारों के लिए सम्पर्क किया लेकिन अंग्रेज़ों को उनके हथियारों के आने की खबर मिल गयी, और उनकी फौज से संघर्ष करते हुए 10 सितम्बर 1915 को जतिन्द्रनाथ का देहांत हो गया, उस समय वह छत्तीस साल के थे।

बाघा जतिन के पौत्र पृथ्वीन्द्र मुखर्जी

सन् 1900 में जतिन्द्रनाथ का विवाह इन्दुबाला बैनर्जी से हुआ, उनके चार बच्चे हुए, एक बेटी आशालता और तीन बेटे, अतीन्द्र, तेजेन्द्र और बिरेन्द्र। जिस समय जतिन्द्रनाथ की मृत्यु हुई, तेजेन्द्रनाथ उस समय केवल छह साल के थे। उनके पहले पुत्र अतीन्द्र की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी, इसलिए तेजेन्द्र को उनका बड़ा बेटा मानते हैं।

तेजेन्द्रनाथ के तीन बेटे थे, रथीन्द्रनाथ, पृथ्वीन्द्रनाथ और ध्रितीन्द्रनाथ।

पृथ्वीन्द्र का जन्म 20 अक्टूबर 1936 में हुआ। जब वह पाँच साल के थे उन्हें पोलियो हो गया जिससे उनकी टाँग कमज़ोर हो गयी और वह चल या खड़े नहीं हो पाते थे। उनके मामा प्रबोधकुमार चैटर्जी ने उन्हें विज्ञान पढ़ाया और उनके फूफा ललितकुमार रायचौधरी ने उन्हें संस्कृत पढ़ायी। जब वह बारह वर्ष के थे जब वह परिवार के साथ पाँडेचैरी में अरविंद आश्रम में रहने आये और वहाँ पढ़ाई पूरी करके 1956 से श्री ओरोबिन्दो आश्रम के अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र में तीन भाषाएँ (अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी) पढ़ाने लगे। 

पृथ्वीन्द्र को बचपन से कविता लिखने का शौक था, वह बंगाली और अंग्रेज़ी में कविता लिखते थे। 1955 में उन्होंने भारत में गाँधी जी से पहले, विषेशकर स्वामी अरविंद और अपने दादा जतिन्द्रनाथ के समय में भारत की स्वतंत्रता की कोशिशों के बारे में शोध करना शुरु किया। यह शोध पहले एक बंगाली पत्रिका बासुमति और फ़िर पुस्तक रूप में छपा। साथ ही उनका कविता लेखन चलता रहा और बंगाली व अंग्रेज़ी कविताओं के संकलन भी छपे। साथ ही वह फ्राँसिसी के कुछ प्रसिद्ध लेखकों की किताबों का बंगाली में अनुवाद कर रहे थे। इस तरह से पच्चीस वर्ष के होते-होते वह कवि, लेखक और अनुवादक के रूप में जाने जाने लगे।

पृथ्वीन्द्र को बचपन से संगीत में भी रुचि थी। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन और पश्चिमी संगीत दोनों सीखे। वह भारतीय रागों और पश्चिमी संगीत के सिद्धातों को मिला कर संगीत रचना चाहते थे। इस तरह से वह भारतीय-पश्चिमी मिला-जुला आरकेस्ट्रा बना कर उनकी कन्सर्ट आयोजित करने लगे और उन्होंने श्री ओरोबिन्दु आश्रम का बैंड-दल बनाया। 

तीस वर्ष की आयु में 1966 में फ्राँसिसी सरकार की छात्रवित्ति ले कर वह पैरिस पहुँचे। फ्राँस में उनकी टाँग के आपरेशन भी हुए जिससे उनके लिए बैसाखी से चलना कुछ आसान हो गया। वहाँ उन्होंने 1970 में श्री ओरोबिन्दो के दर्शन पर पीएचडी की, और उसके बाद पैरिस के विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे, साथ ही रेडियो के कार्यक्रम तथा पत्रकारिता में लग गये। 1981 में उन्हें फुलब्राईट छात्रवित्ति मिली जिससे वह अमरीका गये। फ्राँस लौटने के बाद वह पैरिस में बँगाली पढ़ाने लगे। उन्होंने अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी भाषाओं में करीब सत्तर पुस्तकें लिखीं। उन्हें श्री ओरोबिन्दो पुरस्कार, फ्राँस सरकार से शिवालिएर और भारतीय सरकार से पद्मश्री सम्मान मिले। 

पृथ्वीन्द्र ने दो विवाह किये और उनके तीन बच्चे हुए, दो बेटियाँ अद्या और अमृता, और एक पुत्र, अर्जव।

अंत में - बाहरी क्राँति से आंतरिक क्राँति

जतिन बाघा की कहानी स्वामी अरविंद या ओरोबिन्दो से जुड़ी हुई है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में दोनों सशस्त्र क्राँति की बात कर रहे थे। स्वामी ओरोबिन्दो को 1908 में अलीपुर बम्ब विस्फोट केस में जेल हुई। जतिन को 1910 में हावड़ा-शिबपुर केस में। स्वामी ओरोबिन्दो को जेल में आध्यात्मिक ज्योति मिली, जब वह बाहर आये तो वह बदल चुके थे। वह भारत की स्वतंत्रता की बात करते थे, पर वह आत्मा के विकास और स्वाधीनता के प्रति अधिक सजग थे। जतिन बाघा ने शस्त्र क्राँति का सपना नहीं छोड़ा और 1915 में पुलिस की गोलियों से घायल हो कर उनका देहांत हुआ। उनके पोत्र पृथ्वीन्द्र, अपनी माँ तथा भाईयों के साथ पाँडेचैरी के स्वामी ओरोबिन्दो के आश्रम में बड़े हुए और उनका परिवार आजीवन "माँ" (मिर्रा अलफस्सा, स्वामी ओरोबिन्दो की संगनी) के आध्यात्मिक सानिध्य में रहा।

यानि सोचिये कि शस्त्र क्राँति या देश की स्वाधीनता की कामना, कहीं पर आत्मा की क्राँती के साथ कब, क्यों और कैसे जुड़ जाती है?  

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नोट: इस आलेख में उपयोग की गयी तीनों तस्वीरें इंटरनेट से साभार ली गयी हैं

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गुरुवार, जुलाई 23, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 16

अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, वहाँ पहुँचते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 16

मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, सुबह

त्री, रंगनाथ और गार्गी वृद्धाश्रम की ओर जाने के लिए तैयार हो गये।

त्री ने आभा से कहा, “हम सीढ़ियों से ऊपर नहीं जायेंगे बल्कि एक गुप्त सुरंग से बाहर निकलेंगे। तुम भी हमारे साथ चल कर सुरंग का रास्ता देख लो और जब यहाँ तहखाने में बैठे-बैठे बोर हो जाओ तो बच्चों को कुछ देर तक बाहर घुमा सकती हो। वसंत तुम्हारी शक्ति-लहरों को ढक कर तुम्हें उस जापानी की अन्वेषण-किरण से छुपा लेगा, लेकिन यह काम वह पेड़ों की सहायता से करता है, अगर तुम लोग खुले में जाओगे तो वहाँ वह तुम्हें नहीं छुपा सकता, इसलिए तुम बच्चों को खुली जगह में नहीं जाने देना।"

नाश्ते के बाद माधव और तृप्ति सोने के लिए वापस बिस्तर पर लौट गये, लेकिन वसंत वहीं बैठा उनकी बातें सुन रहा था, बोला, “मैं भी आप के साथ चलता हूँ, आभा दीदी के साथ लौट आऊँगा।"

आभा बोली, “क्या माधव और तृप्ति को यहाँ अकेले छोड़ना ठीक होगा?”

“इस घर में उन्हें कोई खतरा नहीं है। ज़रीना, वह लड़की जो ऊपर रहती है और हमें रात को मिली थी, वह हमारी साथी है। फरीद, वह नाव वाला जो हमें रात को मजूली ले कर आया था, ज़रीना उसकी बेटी है। वह सुन-बोल नहीं सकती, लेकिन इशारों की वर्णमाला जानती है और लिख-पढ़ सकती है। गुरु जी ने उसे गूँगे-बहरों के स्कूल में पढ़ने भिजवाया था, इसलिए वह लोग गुरु जी को बहुत मानते हैं। जब हमें अपने छुपने के लिए कमलाबाड़ी घाट के पास जगह चाहिये थी, तब गुरु जी ने यह घर बनवाया था और बाहर जाने के लिए सुरंग भी बनवायी। तुम्हें कुछ भी ज़रूरत हो तो ज़रीना को कहो", त्री ने सारी बात बतायी।

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, यह इशारों की वर्णमाला क्या होती है?”

“जैसे अक्षरों की वर्णमाला होती है, वैसे ही हम हर अक्षर के लिए उंगलियों से भिन्न मुद्रा बना सकते हैं, वह मुद्राओं की वर्णमाला होती है। जैसे कि तुम्हारे नाम को अगर मुद्राओं की भाषा में कहना हो तो 'र' कहने के लिए तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से क्रोस बनाओ और बाकी दोनों उंगलियों पर अंगूठा रख दो। 'न' कहने के लिए सभी उंगलियों के सिरों को अंगूठे के सिरे से मिलाओ। फ़िर 'ग' कहने के लिए 'न' वाली मुद्रा में मध्यमा को ऊपर उठाओ", यह कहते हुए उसने अपने हाथों से मुद्राएँ बदल कर अक्षर बना कर दिखाये, बोला, “इस तरह से यह 'रंग' शब्द बन गया।"  

रंगनाथ बोला, “यह भाषा तो बहुत कठिन लगती है।"

त्री मुस्कराया, “जब कोई चीज़ नहीं करनी आती तो वह कठिन लगती है। अगर तुम हर रोज़ मुद्रा की भाषा की एक-दो नयी मुद्राएँ सीख लो और हर रोज़ उनका अभ्यास करो तो एक महीने में इशारों में फटाफट बोलने लगोगे।"

गार्गी बोली, “जब हम घर लौटेंगे तो मैं यह इशारों की भाषा भी सीखूँगी ताकि ज़रूरत पड़े तो मैं आप को इशारों से गुप्त संदेश दे सकती हूँ।" रंगनाथ बोला, “केवल तुम्हारे सीखने से कुछ नहीं होगा, उसे समझने वाला भी चाहिये, नहीं तो क्या अपने आप से बातें करोगी?"

गार्गी ने पूछा, “दादा, कल रात जब हम यहाँ आये तो आप ने घंटी बजायी थी? ज़रीना दीदी ने उसे कैसे सुना?”

त्री मुस्कराया, “ऊपर जब घंटी बजाओ तो घंटी बजती है और साथ में एक बल्ब जलता-बुझता है, ज़रीना उसे देख सकती है।"

रंगनाथ ने पूछा, “ज़रीना दीदी टेलीफोन पर कही बातें भी समझ सकती हैं?”

“हाँ, उसके मोबाइल में एक एप्प है, तुम उसे कुछ कहोगे तो वह एप्प उसे मुद्रा की भाषा में वही बात वीडियो में दिखायेगी", कह कर त्री खड़ा हो गया, "चलो, अब हमें चलना चाहिये"।

वह तहखाने की रसोई में गया और एक अलमारी के पास जा कर, उसने एक जगह दबाया तो वह अलमारी दरवाज़े की तरह खुल गयी। उसके पीछे एक गुप्त रास्ता छिपा था। जैसे ही वह भीतर घुसा, वहाँ एक बत्ती जल गयी। उसके पीछे रंगनाथ और गार्गी गये और उनके पीछे आभा और वसंत।

त्री ने आभा को दिखाया कि सुरंग खोलने के लिए अलमारी को कैसे खोलते-बंद करते हैं। वह बोला, “इस सुरंग में सैन्सर लगे हैं, तुम जिधर जाओ, वहाँ की बत्ती अपने आप जल जाती है और पीछे वाली कुछ देर बाद अपने आप बुझ जाती है।"

सुरंग का रास्ता पार करने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और जब वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकले तो देखा कि उस सुरंग का दरवाज़ा एक मोटे तने वाले पीपल के पेड़ का हिस्सा था। जब वह बंद होता था और उसे ध्यान से नहीं देखो, तो दिखाई नहीं देता था।

वसंत बोला, “देखो, यह तो बहुत बड़ा पीपल का पेड़ है, इसके भीतर पूरा कमरा है।"

त्री बोला, “यहाँ के लोग इस पेड़ को पवित्र मानते हैं, इसे संत माधवदेव का पेड़ भी कहते हैं क्योंकि इसके नीचे एक बार संत माधव देव रहे थे। उनका गाँव हरिसिंगबरा, यहाँ से अधिक दूर नहीं है।"

वसंत ने पूछा, “यह पेड़ कितना पुराना होगा, दो सौ साल?”

“संत माधव देव करीब पाँच सौ साल पहले पैदा हुए थे, और कहते हैं कि उनके समय में भी इस पेड़ को बहुत प्राचीन मानते थे। इसलिए हो सकता है कि यह पेड़ एक हज़ार साल या उससे भी पुराना हो। यहाँ सब लोग इसे जानते हैं। अगर तुम आसपास कहीं खो जाओ तो लोगों से पूछो कि संत माधव देव का पीपल का पेड़ कहाँ है, वह तुम्हें यहाँ का रास्ता दिखा देंगे”, त्री ने समझाया, फ़िर बोला, “आभा और वसंत, तुम लोग अब वापस जाओ।"

आभा बोली, “बाद में जब माधव और तृप्ति जागेंगे, उन्हें साथ ले कर हम लोग यहाँ लौटेंगे।" वह  दोनों पीपल के पेड़ की ओर लौट गये।

त्री, रंगनाथ और गार्गी आगे चले। उन्होंने गाँव के गरीब लोगों जैसे कपड़े पहने थे, जैसे कि एक पिता अपने बच्चों के साथ कहीं जा रहा हो। करीब एक घंटा चल कर वे श्री भोला मन्दिर पहुँचे और वहाँ से मोटरबोट ली जो उन्हें फुलानीबाड़ी के घाट तक ले गयी। त्री उस क्षेत्र में पहले कई बार आ चुका था, इसलिए उसने अपना चेहरा गमछे से ढक लिया था। घाट पर पहुँचने से पहले ही गार्गी ने तीनों की शक्ति-लहरों को ढक लिया।    

फुलानीबाड़ी के घाट से जो रास्ता गाँव की ओर जाता है, वहाँ आगे जा कर पेड़ों के पीछे एक छोटा सा मैदान है, जिसके एक किनारे पर झाड़ियाँ के पीछे एक चबूतरा बना था। वह जगह सड़क से छिपी हुई थी। उस चबूतरे के पीछे जा कर त्री ने उसकी एक ईंट हटा कर दबाया तो उसमें एक छोटा सा गुप्त द्वार खुल गया, जिसमें वह तीनों झुक कर घुस गये।

वहाँ पर एक अन्य सुरंग थी जो नीचे जा रही थी, उसमें घुसने के बाद त्री ने गार्गी से कहा कि वहाँ शक्ति ढकने की आवश्यकता नहीं है।

रंगनाथ बोला, “दादा, हर जगह सुरंगें बनी हैं, इसका मतलब है कि गुरु जी बहुत सालों से इस खतरे का सामना करने के लिए तैयारी कर रहे थे?”

त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी। वह जानता है कि बच्चे समझदार हैं, वह उनसे पूरी बात नहीं छुपा सकता। लेकिन अगर उनमें से कोई उस जापानी याकूज़ा के चँगुल में आ गया तो वह इनके दिमाग में घुस कर सब बातों को जान जायेगा, इसलिए वह उन्हें सब बातें नहीं बताना चाहता।

गार्गी बोली, “वह जापानी आदमी गुरु जी का पीछा क्यों कर रहा है? वह उनसे क्या चाहता है?”

“गुरु जी कोरिया से हैं। वह भी अनाथ थे और उन्हें भी एक बौद्ध भिक्षुक ने पाला था, जो बाद में उनके गुरु बने। उनके गुरु जी का नाम कूवी महाराज था और उनके पास हरिताश्म पत्थर की बनी माँ तारा की एक मूर्ति थी, जिसके प्रभाव से बच्चों की गुप्त-शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं। कुछ जापानी लोग उस मूर्ति को पाना चाहते हैं", त्री ने बताया।

“यह हरिताश्म पत्थर क्या होता है?”

“हरिताश्म को अंग्रेज़ी में जेड कहते हैं, यह हरे रंग के संगमरमर जैसा होता है, लेकिन मुलायम होता है। उसकी मालाएँ और गहने भी बनाते हैं।"

“क्या यह पत्थर भारत में मिलता है? हमारे अखाड़े में भी तो हरे रंग की माँ तारा की कई मूर्तियाँ हैं?”

“यह पत्थर भारत में नहीं मिलता", त्री ने बताया, “हमारे उत्तर-पूर्व में एक देश है म्यंमार, उसे पहले बर्मा कहते थे, वहाँ पर हरिताश्म की खानें हैं। लेकिन सुना है कि हमारे मिज़ोराम में, म्यंमार की सीमा के पास भी, शायद यह पत्थर मिलते हैं।"

“इसका मतलब है कि जापानी लोग गुरु जी का चालीस-पैंतालिस सालों से पीछा कर रहे हैं?” रंगनाथ ने पूछा।

गार्गी बोली, “इतने सालों में तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली है, आज तो बहुत से अपराध इंटरनेट के माध्यम से होते हैं। इतने सालों के बाद भी वह लोग इस पुरानी बात के पीछे क्यों पड़े हैं?”

त्री मुस्कराया, बोला, “गुरु जी कहते हैं कि इस बात को यामागुचि नहीं भूल सकता, यह उसके आत्म-सम्मान की बात बन गयी है। तीन बार गुरु जी उसके चँगुल में आये और तीनों बार वह उसे चकमा दे कर भाग गये। आखिरी बार उसने गुरु जी को थाईलैंड में 1996 में खोजा था। उस बात को भी अब तीस साल हो गये। वह पहले वाले यामागुचि तो अब बहुत बूढ़े हो गये हैं, लेकिन उनका पोता है, रिकू यामागुचि, वह अब उनका गैंग चलाता है। शायद वह अपने दादा का अधूरा काम पूरा करना चाहता है।"

“पहले वह लोग गुरु जी को खोज लेते थे, तो वह उन्हें चकमा दे कर वहाँ से भाग कर नयी जगह में छिप जाते थे। लेकिन इस बार वह नहीं भागे, बल्कि उन्होंने समाधी ले ली, क्यों?”, गार्गी का दिमाग बहुत तेज़ है, वह हर अनकही बात को पकड़ लेती है। 

“क्यों कि अब गुरु जी बूढ़े हो रहे हैं, वह डरते हैं कि कहीं उनकी मृत्यु के बाद, यामागुचि के जासूस हमारे पीछे न लग जायें, और हमारे अनाथाश्रम पर हमला कर दें, क्योंकि मैं उनके उत्तराधिकारी हूँ।"

“क्या इसका मतलब है कि अब वह मूर्ति हमारे पास है? वह हमारे अनाथाश्रम में है?” गार्गी ने पूछा।

त्री फ़िर से मुस्कराया, सोचा कि गार्गी से कुछ छुपाना बहुत कठिन है, बोला, “जो मूर्ति गुरु जी कोरिया से लाये थे, कुछ साल पहले वह टूट गयी थी। उन्होंने उस मूर्ति के टुकड़ों को कुछ नयी मूर्तियों में जड़वा दिया है। उसमें से एक नयी मूर्ति हमारे पास, हमारे अनाथाश्रम में भी है।"

यह बातें करते-करते वह तीनों सुरंग को पार करके, वृद्धाश्रम से कुछ दूर, गुरु जी के ज़मीन के नीचे छिपे हुए तहखाने वाले कमरों में पहुँच गये।

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