लगभग पिछले चालिस सालों से, जबसे दिल्ली छोड़ कर इटली में रहने लगा था, मेरा हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ना बहुत कम हो गया था, जब भारत जाता था तो इक्का-दुक्का पढ़ लेता था। पिछले साल अगस्त में मैंने "नॉटनुल" की वार्षिक सदस्यता ली तो इतने सालों के बाद हिंदी की पत्रिकाएँ पढ़ने का मौका मिलने लगा। अब इस बात को करीब एक साल हो गया है, एक दिन मैं याद करने लगा कि पिछले बारह महीनों में हिंदी पत्रिकाओं में क्या अच्छा पढ़ा, तो कुछ भी याद नहीं कर पाया। तब सोचा कि आगे से मुझे जो पढ़ा हुआ अच्छा लगेगा, उसके बारे में इस ब्लॉग पर लिखने की कोशिश करनी चाहिये, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे याद किया जा सके।
मुझे आशावादी साहित्य पढ़ना अच्छा लगता है, मैं चाहता हूँ कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें या दुख हों, लेकिन कहानी के क्षितिज पर एक आशा की छोटी सी किरण भी होनी चाहिये, सब कुछ बिल्कुल नकारात्मक नहीं होना चाहिये। दूसरी बात है कहानी का कथानक, उसके कहने का अन्दाज़, उसकी बातें। पिछले वर्ष में जब हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ीं तो मुझे समझ में आया कि मुझे हिंदी कहानियाँ पढ़ना इतना अच्छा नहीं लगता, बल्कि आलेख पढ़ना अधिक अच्छा लगता है।
इसीलिए आज के मेरे इस आलेख में कहानियाँ कम पायेंगे और आलेख अधिक।
कथा-कहानियाँ
चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी "फर्ज", नया ज्ञानोदय पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी। इसमें दामोदर भगत का बेटा बैजनाथ अपनी पसंद की युवती से ब्याह करना चाहता है, पर भगत जी ने पाँच साल पहले किसी को ज़ुबान दी थी कि उनकी सुंदर, सुस्कृंत कन्या से पुत्र का ब्याह करेंगे। गुस्से में भगत जी निर्णय लेते हैं कि अगर बैजनाथ उनकी बात नहीं मानेगा तो वह उसे अपनी जयदाद से बेदखल कर देंगे। कह तो देते हैं लेकिन उनके मन में इस बारे में कुछ संशय है, इसलिए वह अपने फुलकाहा गाँव के वरिष्ठ ज्ञानी वेदानन्द गिरि से सलाह लेने जाते हैं ... जब यह कहानी शुरु हुई, तो मेरे मन में अपेक्षा थी कि वह किस दिशा में जायेगी, लेकिन कहानी ने वह घिसा-पिटा रास्ता नहीं लेती, बल्कि एक दूसरी ही दिशा में चल पड़ती है। कहानी में वेदानन्द बाबू की यादों के किस्से और उनकी भगत जी को समझाने की कोशिशें, मुझे अच्छी लगीं। कहानी का अंत थोड़ा सा कन्वीनियंट लगा, पर कहानी पढ़ने में मज़ा आया।
मुकेश नौटियाल की कहानी "सियारसिंगी", जुलाई 2026 की पाखी पत्रिका में पढ़ी। इस कहानी में दो कहानियाँ हैं, एक कहानी है एक पहाड़ी गाँव की औरत, उसके बेटे और उसके खोये हुए भाई की। और दूसरी कहानी है एक तिब्बती शरणार्थी युवती और उसके साथ रहने वाले गूँगे-बहरे लड़के की। इन दो कहानियों को स्कूल में पढ़ाने वाले एक मास्टर जी जोड़ते हैं जो गाँव वाली औरत की चिट्ठियाँ लिखते हैं और उसके भाई को खोजने देहरादून की तिब्बती बस्ती में जाते हैं। कहानी में दो लोकविश्वास की कहानियाँ भी जुड़ी हैं, एक सियारों के माथे में उगने वाली जादुई शक्ति वाली सियारसिंगी की और दूसरी, इन्सानों को आग पर पका कर उनके कपाल से निकाले जाने वाले रामतेल की। यह सारी कहानी संयोगों पर टिकी है, कहानी के हर मोड़ पर मास्टर जी हर जगह पर जो भी खोजते हैं, वह उन्हें आसानी से मिल जाता है। पर जादुई-यदार्थवाद की कहानी में तर्क की अपेक्षा करना शायद उचित भी नहीं है। इस कहानी में मुझे उसकी भाषा और पहाड़ी लोकजीवन की खुशबु अच्छी लगीं।
नर्मदेश्वर की कहानी "सूई धागा", परिकथा पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी, अच्छी लगी। छोटी सी, सीधी-साधी कहानी है, जद्दी चाचा नाम के दर्जी और संदीप नाम के लड़के की, कि कैसे समय के साथ संदीप की उनसे जान-पहचान बनती है और लड़के को समझ आती है कि ऊपर से सख्त दिखने वाले जद्दी चाचा मन के नर्मदिल हैं। कहानी में जद्दी चाचा का अपने बेटों के नाम पेट्रोल और डीज़ल देख कर कुछ अजीब सा लगा, सोचा कि लेखक को उन नामों की कहानी भी बतानी चाहिये थी। इस कहानी से मुझे बचपन के दिनों की याद आई जब दर्जी, सफाई वाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, दुकानदार, आदि बेनाम नहीं सचमुच के लोग होते थे, हम उनके नामों और परिवारों के इतिहासों को जानते थे, और वे हमारे।
आलेख, संस्मरण, आदि
बिपिन तिवारी, अभिषेख गुप्ता और रोहतास कुमार का सुधीर विद्यार्थी से लम्बा साक्षात्कार "विप्लव राग" शीर्षक से, बनास जन पत्रिका में पढ़ा जो मुझे अच्छा लगा। सुधीर विद्यार्थी जी 1953 में पैदा हुए थे, उन्होंने इतिहास में एमए की और बीसवीं सदी के क्राँतिकारियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। इस साक्षत्कार-आलेख में बहुत सी रोचक बातें जानने को मिली, जैसे कि बनारसीदास चतुर्वेदी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, सुंदरलाल, बाबा नागार्जुन, आदि के संस्मरण, क्राँतिकारियों के बारे में गाँधी जी और नेहरू जी के बीच मतभेद, लोगों द्वारा भगतसिंह के सिर पर पगड़ी रखने का अर्थ, पंडित परमानन्द की कहानी, सुनीति चौधरी और शांति घोष की बातें, आदि। आलेख में अपने लेखन के बारे में सुधीर जी कहते हैं, "मैं किसी लायब्रेरी में नहीं बैठा, न किसी आर्काइव में गया। उस इतिहास को मैंने देखा-सुना-जाना, क्राँतिकारियों की आँखों से, उनके शब्दों से। इतिहास को बताते हुए कई-कई बार उन्हें रोते हुए देखा ..."। 64 पन्नों का यह साक्षात्कार है, किसी छोटी किताब के बराबर लम्बा है, पर बहुत दिलचस्प है।
प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का मई 2026 में 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनके बारे में दो आलेख पढ़े। एक आलेख "हँस पत्रिका" में पढ़ा जिसमें युवा शायर महेंद्र कुमार सानी ने अपने स्मृति-आलेख, "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो", में उनके प्रिय और प्रसिद्ध शेरों को याद किया है। जबकि डॉ. जियाउर रहमान ज़ाफ़री ने "ककसाड़ पत्रिका" के जुलाई अंक में अपने आलेख, "शायर बशीर बद्र को याद करने वाले ...", में उनके जीवन की कुछ बातों बतायीं हैं जैसे कि कैसे 1987 में मेरठ के दंगे में अपना घर खो कर वह भोपाल चले आये थे, कैसे अंतिम वर्षों में उनकी यादाश्त नहीं रही थी और कैसे बड़े बाग कब्रिस्तान में उनके जनाज़े साथ केवल मोबाइल की रोशनी और थोड़े से लोग थे। यहाँ मैं बद्र साहब का वह शेर याद करना चाहूँगा जिसे मैंने अपना जीवन जीने का मंत्र बनाया है: "हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल देंगे, रास्ता हो जायेगा।"
शिव कुमार पाण्डेय का आलेख, "बस्तर की बोली-भाषा", भी ककसाड़ पत्रिका में ही पढ़ा। मुझे जनजातियों के जीवन से जुड़े लेख पढ़ना अच्छा लगता है इसलिए "ककसाड़" मासिक पत्रिका हमेशा चाव से पढ़ता हूँ। इस आलेख में पाण्डेय जी ने बस्तर की भाषाओं और बोलियों का बहुत दिलचस्प विवरण दिया है। जैसे कि गोंडी भाषा बस्तर में कांकेर और भानुप्रतापपुर के साथ-साथ अन्य बहुत से क्षेत्रों में भी बोली जाती है जिनमें कोन्टा, भोपाल पटनम, दाँतेवाड़ा, गढ़चिरोली, बालाधार, आदि भी शामिल हैं। हर जगह की गोंडी थोड़ी सी भिन्न है, लोग एक-दूसरे की गोंडी को समझते हैं, लेकिन उत्तर अपनी गोंडी में देते हैं। गोंडी के अतिरिक्त इस आलेख में "हल्बी" भाषा का भी जिक्र है जिसे बस्तर की सम्पर्क की भाषा भी कह सकते हैं और जिसमें छत्तीगढ़िया, मराठी और उड़िया भाषाएँ मिली हुई हैं। लेकिन गोंडी, हल्बी और बस्तर की अन्य 36 बोलियों में आपस में क्या सम्बंध है, यह बात मुझे ठीक से समझ नहीं आई, इसलिए इस विषय पर और पढ़ना अच्छा लगेगा।
अकार पत्रिका में प्रियंवद का सम्पादकीय पढ़ा जिसमें उन्होंने हिंदी के वरिष्ठ लेखक तथा पहल पत्रिका के सम्पादक ज्ञानरंजन जी के बारे में लिखा है वह अच्छा लगा। उसमें उन्होंने, अन्य लेखकों के ज्ञानरंजन जी को लिखे पत्रों के माध्यम से, उनकी मार्क्सवादी-कथाकार बनने की यात्रा और फ़िर उनका कथाकार से अधिक सम्पादक बन जाने की बात, अन्य लेखकों के साथ उनके सम्बंधों, आदि की बातें बतायी हैं। ज्ञानरंजन जी की यह बात कि "मैं अपनों के प्रति बहुत निर्मम हूँ", मुझे बहुत परिचित सी लगी, क्योंकि एक समय था जब मेरी सोच भी कुछ वैसी ही थी, मुझे भी यह लगता था कि अगर मैं आप की कड़वी आलोचना करता हूँ तो इसका मतलब है कि आप मेरे प्रिय हैं (अब मैं इस सोच से बचने की कोशिश करता हूँ)। ज्ञानरंजन जी का इस साल के प्रारम्भ में देहांत हो गया था।
अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य छपे हैं, इन्हें भी मैंने बहुत रुचि से पढ़ा और यह मुझे बहुत अच्छे लगे। इनमें से कुछ की बात करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे गहरा छुआ:
मनोज रूपड़ा के वक्तव्य में, उनकी स्मृतियों में हिंसा की घटनाओं, कुत्तों का घायल बिल्ली को नोच कर खाने से ले कर जलती रेल की बोगी में झुलसती लाशों के विवरणों, ने दिल को हिला दिया।
जया जादवानी की जीवन गाथा पढ़ी तो लगा कि उनके जैसा जीवन जीते हुए पढ़ना और लिखना का मतलब कितनी कठिनाईयों से लड़ना है। वह लिखती हैं, "द्वंद कुछ नया सोचने का, कुछ नया रचने का अब ज़्यादा है। कुछ ऐसा जो वर्जित हो, जिसे अब तक कहा न जा सका हो। कहा भी गया हो तो उसके भीतर घुस कर नहीं। मैं चाहती हूँ मेरा सत्य मेरे होने से निकले ..."
जितेन्द्र भाटिया के वक्तव्य में उनका कहानी लिखने को वैताल के वृक्ष से "स्मृति के शव को नीचे उतारने जैसा" पढ़ कर बहुत देर तक सोचता रहा। मुझे लगा कि शायद स्मृतियाँ शव नहीं होतीं, जीवित होती हैं पर उनमें एक अलग किस्म का जीवन होता है। जैसे विक्रम के गलत उत्तर देने पर वह शव उड़ कर वापस पेड़ पर लौट जाता है, वैसे ही स्मृतियाँ भी हमारे मानसिक पटल पर उड़ती-घूमती रहती हैं। उनकी एक अन्य बात कि "कविता के मुकाबले में गद्य लेखन, प्रेरणा से अधिक एक धैर्यपूर्ण रियाज़ और अपने आगे-पीछे देखने-समझने की विवेकपूर्ण मशक्कत माँगता है", ने भी सोचने पर मजबूर किया।
दिव्या विजय की बात कि व्यक्ति अपने आप को लेखक कब महसूस करता है, मुझे दिलचस्प लगी। मैं अक्सर कला प्रदर्शनियों में कलाकारों से साक्षत्कार करता हूँ, वहाँ भी अक्सर उनके मन में यही संशय मिलता है, कि शायद मैं कलाकार नहीं हूँ, मैंने कला के लिए बलिदान वाला जीवन नहीं जिया। दिव्या जी लिखती हैं, "लिख देना, छप जाना, क्या इतने भर से लेखक बना जा सकता है? वह क्या है जो किसी व्यक्ति को लेखक में बदल देता है?"
राही डूमरचीर के वक्तव्य में संताल गाँव और मित्रों के बीच में एक प्रवासी परिवार का हिस्सा होने का द्वंद है, जो संतालों को नीचा और पिछड़ा हुआ मानता है, उनसे सम्बंध नहीं रखना चाहता, वहाँ की प्रकृति-पहाड़ की सुंदरता को नहीं देख पाता। वह लिखते हैं, "... दंभ भी आनुवांशिक होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वत: हस्तांतरित होता रहता है ... आदिवासियों के प्रति हमदर्दी ही हिलोर मारती थी, प्यार नहीं कर पाता था ... जँगल में अराजकता का राज होता है, कोई कायदा, कानून नहीं होता, यह वही कह सकता है जिसे सिर्फ बगीचे वाली व्यवस्था नज़र आती है ...हमारा समय पुरखे, पेड़ों, जंगलों में निवास करता है। उनके बीच पलता-बढ़ता है। उन्हीं के साथ-साथ चलता है। उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है ... मनुष्य विरोधी हो कर तो फ़िर भी रहा जा सकता है, पर धरती विरोधी हो कर कितने दिनों तक बचे रह पायेंगे हम?"
कथा क्रम पत्रिका के अप्रैल-जून अंक में मधुरेश जी का लम्बा आलेख "शरत चन्द्र और उनका 'शेष प्रश्न': प्रेम दृष्टि और स्त्री चिंता के सवाल" में शरत चन्द्र के उपन्यास "शेष प्रश्न" के विभिन्न पात्रों विशेषकर कमल के बारे में, विवेचना तो है ही, साथ ही इस उपन्यास के विभिन्न संस्करणों के अनुवादों की गुणवत्ता और साहित्यिक भिन्नताओं की बात भी है। इस सब के साथ, आलेख में हिंदी साहित्य के पुराने अनुवादकों और प्रकाशकों की बाते भी हैं जो मुझे बहुत दिलचस्प लगीं। उदाहरण के लिए इस उपन्यास के 1927 में निकले संस्करण जिसका अनुवाद धन्य कुमार जैन ने किया था और नाथूराम 'प्रेमी' ने प्रकाशित किया था, की बात करते हुए वह नाथूराम प्रेमी के बारे में वह पुरानी जानकारी देते हैं जिससे आज का साहित्य जगत अवश्य ही अपरिचित होगा। उन्होंने लिखा है: "नाथूराम प्रेमी किस कद-बुत के प्रकाशक थे, इसके लिए चंद उदाहरण ही काफी होंगे। वे प्रेमचन्द्र और जैनेन्द्र के ही प्रकाशक नहीं थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'कबीर' और 'हिन्दी साहित्य की भूमिका' के प्रकाशक भी वही थे।"
अंत में
रिटायर होने के बाद से, हर रोज़ इतना कुछ पढ़ता हूँ, कि सब के बारे में लिखना सम्भव नहीं है, लेकिन जो पढ़ा उसमें क्या याद रखने लायक लगा, यह लिखना शायद थोड़ा सा आसान है। मेरे लिए ब्लॉग मेरी डायरी है, इस आलेख को लिखने की चेष्ठा का मेरा यही अर्थ है।
इस आलेख में जिन कहानियों और आलेखों के बारे में मैंने लिखा है, अगर आप कहें कि उसमें से चुन कर यह बताईये कि सबसे अधिक अच्छा क्या लगा, तो मेरा चुनाव होगा, अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य - इस बार सबसे अधिक दिलचस्प मुझे वही लगे।
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