बुधवार, अगस्त 29, 2012

ब्राज़ील यात्रा डायरी - खोयी सभ्यता की तलाश (1)

23 अगस्त 2012, गोईयास वेल्यो

उस दिन वहाँ पर दो कक्षाओं के बच्चे अपनी अध्यापिकाओं के साथ आये थे। पहाड़ की ढलान पर ऊपर-नीचे जाती सीढ़ियाँ, नीचे दिखता चमकता नदी का पानी और अमेरिंडयन जनजाति के गाँव की झोपड़ियाँ, बच्चे यह सब कुछ मंत्रमुग्ध हो कर देख रहे थे।

एक ओर हारोल्दो और गुस्तावियो स्वागत के ढोल बजा रहे थे। दूसरी ओर एक चबूतरे पर रेजीना और शर्ली हाथ में कटोरियाँ ले कर खड़ी थीं जिनमें एक पौधे के बीजों से बनाया गहरा कत्थई रँग था जिससे वे हर बच्चे के गालों पर स्वागत चिन्ह बना रही थीं।

Vila Esperança, Indigenous culture festival, Brazil

बच्चों के साथ आयीं दो अध्यापिकाएँ भी उत्साहित सी हो कर बच्चों के साथ अपने गालों पर स्वागत चिन्ह लगवाने लगीं, जबकि दो अन्य अध्यापिकाएँ दूर से ही खड़ी देख रही थीं। उनके चेहरे के भाव से स्पष्ट था कि उन्हें यह सब अच्छा नहीं लग रहा था।

चेहरे पर स्वागत चिन्ह बनवाने के बाद बच्चे एक चकौराकार भवन में गये  जिसकी छत बीच में से खुली थी और जिसके बीच में लकड़ी का खम्बा लगा था। भवन की दीवारों पर अमेरिंडियन मुखौटे लगे थे। एक ओर रॉबसन और लुसिया जनजातियों के गीत गा रहे थे। गीतों के बाद रॉबसन ने धरती, अम्बर, पवन और अग्नि की पूजा की और फ़िर बच्चों को एक अमेरिंडियन लोककथा सुनायी।

फ़िर बारी आयी नत्यों की। जनजातियों के विभिन्न नृत्य थे, जिन्हें पहले रॉबसन सिखाता फ़िर सब बच्चे मिल कर करते। बच्चों ने खूब मस्ती की।

Vila Esperança, Indigenous culture festival, Brazil

नृत्य के बाद बच्चों को छोटे छोटे गुटों में बाँट दिया गया। कोई जनजातियों की कला सीखने गया, कोई जनजातियों में आभूषण कैसे बनाते हैं यह सीखने। कोई मूर्तियों को बनाने की कला सीख रहा था, तो कोई सूखी घास से वस्त्र कैसे बनायें यह सीख रहा था। एक घँटे तक बच्चे इस तरह अलग अलग गुटों में कुछ न कुछ सीखते रहे।

इसके बाद सब बच्चे वापस चकौराकार भवन में एकत्रित हुए, जहाँ रॉबसन ने पहले प्रकृति को प्रसाद चढ़ाया फ़िर सब बच्चों को खाने को मिला। प्रसाद के खाने में उबला हुआ भुट्टा, केला, तरबूज आदि थे और पीने के लिए अनानास का रस था। इसके साथ ही "जनजाति सभ्यता को जानने-समझने" का कार्यक्रम समाप्त हुआ।

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दोपहर को मैं रॉबसन के साथ बैठा बात कर रहा था। रॉबसन ने "विल्ला स्पेरान्सा" (Vila Esperança) यानि "आशा घर" नाम की संस्था बनायी है, जहाँ हर सप्ताह इस तरह के कार्यक्रम होते हैं जिनमें जनजातियों या अफ्रीकी सभ्यताओं के गीतों, कहानियों, नृत्यों, कलाओं, आदि के बारे में बच्चों को सिखाया जाता है।

रॉबसन बोला, "मैं देखने में युरोपीय लगता हूँ लेकिन मेरे परिवार में अफ्रीकी और यहाँ के मूल निवासियों की जनजातियों का खून भी है। यूरोप से आये लोगों के खून से घुलने-मिलने से बनने वाले हमारे परिवार जैसे बहुत परिवार हैं ब्राज़ील में, जिनमें कुछ लोग यूरोप के लगते हैं, कुछ अफ्रीका के और कुछ जनजातियों के। लेकिन हमारे देश में यूरोपीय सभ्यता को उच्च समझा जाता है, और जनजाति तथा अफ्रीकी सभ्यताओं को नीचा मानते हैं। हर कोई अपने आप को यूरोपीय दिखाना चाहता है। जिनका चेहरा यूरोपीय लोगों की तरह गोरा है वह अपने परिवार के अफ्रीकी और जनजाति वाले हिस्से को छुपाने की कोशिश करते हैं। जिनके चेहरे और रंग में अफ्रीकी या जनजाति का प्रभाव स्पष्ट होता है, वह लोग इस भेदभाव को छोटी उम्र से ही महसूस करते हैं। यह नीचा होने की भावना, हीन भावना बचपन से ही मन में घर कर लेती है, इसे निकालना बहुत कठिन है। हमें बचपन से ही शिक्षा मिलती है कि अपनी अफ्रीकी और जनजाति मूल की सभ्यता को भूल जाओ, बस यूरोपी सभ्यता को मान्यता दो।"

Vila Esperança, Indigenous culture festival, United colours of Brazil

इसी भावना के विरुद्ध काम करने की सोची रॉबसन ने और "आशा घर" को 1989 में संस्थापित किया। वह बोला, "वैसे तो बहुत सी किताबों में लिखा होता है, और लोग भाषणों में कहते हैं कि रंग और सभ्यता का भेदभाव करना गलत बात है, लेकिन वे केवल बातें हैं। हमारे घरों और परिवारों में, हमारे आम जीवन में, टीवी पर दिखाये जाने वाले कार्यक्रमों में, विज्ञापनों में, हर जगह पर हमारा समाज एक दूसरा संदेश देता है, जो कहता है कि त्वचा का सांवला या काला रंग होना, अफ्रीकी या जनजाति के नाक-नक्श होने का अर्थ हमारी हीनता और नीचेपन का सबूत है।"

हाँ, हमारे भारत में भी अक्सर यही बात होती है, मैंने रॉबसन को बताया। भारत में अगर आप का काला रंग हो या जाति नीची मानी जाये तो इस वजह से, हमारे समाज में, छोटी उम्र से ही अक्सर यही संदेश मिलता है कि तुम नीचे हो, तुममे कमी है। उस पर भारत में हमारी भाषाओं से जुड़ी हीन भावना भी है, अगर तुम्हें अच्छी अंग्रेज़ी बोलनी न आये, तो लोग सोचते हैं कि तुम घटिया हो, तुममें कुछ भी करने की शक्ति नहीं है। नर्सरी स्कूल से ही बच्चों को सिखाते हैं कि अपनी भाषा में बोलना बुरा है, और दो-तीन साल के बच्चों को भी अंग्रेज़ी की बाल-कवितायें याद करायी जाती हैं।

रॉबसन बोला, "हमारी अपनी मूल भाषाएँ तो अब लुप्त ही हो गयी हैं, हम सभी केवल पोर्तगीज़ भाषा बोलते हैं, उनकी भाषा जिन्होंने हमारे देश पर राज किया था। कुछ जनजातियों की प्राचीन भाषाओं के शब्द, उनके धार्मिक रीति रिवाज़ों के साथ जुड़ी प्रार्थनाओं में बचे हुए हैं, लेकिन आज उन शब्दों के अर्थ कोई नहीं जानता। इसलिए हम अपने राज्य के स्कूलों के लिए यह कार्यक्रम आयोजित करते हैं। मेरे लिए 'आशा घर'  का यह कार्यक्रम बहुत महत्वपूर्ण है कि इस बात को केवल किताबों या भाषणों में नहीं कहा जाये, बल्कि बच्चे यहाँ आ कर अपनी अफ्रीकी और जनजाति की सभ्यताओं का अनुभव करें, उन्हें स्वीकार करें। यह समझें कि उनके यह गीत, कहानियाँ, मिथक, नृत्य आदि हीन नहीं हैं, इनकी अपनी गरिमा है, अपना आनन्द है। हम चाहते हैं कि हमारे साथ समय बिता कर बच्चे यह समझें कि कोई ऊँचा-नीचा नहीं है, बल्कि हमें अपने अंदर दौड़ रहे अफ्रीकी और जनजातियों के खून पर गर्व होना चाहिये। अगर हमारी अपनी सोच बदलेगी, तभी हम दुनिया से लड़ सकेंगे और उसकी सोच को बदल सकेंगे।"

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रॉबसन से बात करने के कुछ देर बाद मेरी बात रेजीमार से हुई जो कि 'आशा घर' द्वारा चलाये जाने वाले प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक है। रेजीमार अफ्रीकी मूल का है। वह बोला, "अन्य जगहों पर बातें बराबरी की होती हैं, वह कहते हैं कि हम सब एक बराबर हैं, हममें कोई ऊँचा-नीचा नहीं, लेकिन वह सिर्फ़ कहने की बाते हैं, उसमें जीवन की सच्चाई नहीं है। यहाँ 'आशा घर' में हम इन विचारों को कहने की नहीं, जीने की कोशिश करते है। हम कहते हैं कि इस तरह जियो कि हर इन्सान की गरिमा को महत्व दो। मैं यह नहीं कहता कि समाज में हर कोई भेदभाव करता है, लेकिन अगर अन्य लोग भेदभाव न भी करें, तब भी हमारे अपने मन में हीन भावना इतनी गहरी होती है कि हम स्वयं भीतर से अपने आप को अन्य लोगों के बराबर नहीं मानते। इसलिए छोटे बच्चों के साथ काम करना बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे वह अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने जीवन की सुंदरता को अनुभव करें और उनके अन्दर वह हीन भावना न पनपे।"

"लेकिन अगर स्कूल में बराबरी का महत्व समझ में आ भी जाये तो स्कूल के बाहर का असर उससे रुक सकेगा? बच्चे स्कूल से बाहर जायेंगे तो खेल के मैदान में, घर में, वहीं भेदभाव वाला समाज नहीं मिलेगा उन्हें?" मैंने उससे पूछा।

"हमारा स्कूल अन्य स्कूलों से भिन्न है, हमारे यहाँ बच्चे शिक्षा का केन्द्र हैं, न कि शिक्षक या फ़िर किताबें। हम कोशिश करते हैं कि बच्चों को प्रश्न पूछने, अपने उत्तर स्वयं खोजने की क्षमता दें। हमारी कक्षा में बच्चा कुछ भी पूछ सकता है, कुछ भी कह सकता है, शुरु से हम उन्हें यही सिखाते हैं। हमारे बच्चे एक बार दुनिया को अपनी तरह से समझने का तरीका सीख लेते हैं तो घर परिवार, समाज हर जगह इसका असर पड़ता है। पंद्रह साल हो गये मुझे यहाँ पढ़ाते, इन सालों में इतनी बार औरों से अपनी आलोचना सुनी है कि 'आप के स्कूल के बच्चे, प्रश्न बहुत पूछते हैं, टीचर कुछ भी कहे उसे यूँ ही नहीं मान लेते' तो मुझे बहुत गर्व होता है। मैं सोचता हूँ कि हमारे बच्चे बाहर के हर भेदभाव से लड़ सकते हैं, क्योंकि इतना आत्मविश्वास बन जाता है उनका।"

24 अगस्त, 2012, गोईयास वेल्यो

सुबह उठा तो बाहर सैर करने की सोची। हमारे होटल के बिल्कुल साथ में नदी बहती है, रियो वेरमेल्यो (Rio Vermelho), यानि "सिँदूरी नदी"। सैर करते हुए उसी नदी के किनारे पहुँच गया. नदी के ऊपर एक पुराना कुछ टूटा हुआ सा पुल था, जिसके पीछे एक झरना भी दिख रहा था। बहुत सुन्दर जगह थी। आसपास कोई था भी नहीं, बस एक बूढ़े से खानाबदोश किस्म के व्यक्ति दिखे जो अपने दो कुत्तों के साथ घूम रहे थे। उन्होंने मेरी ओर देखा तक नहीं, अपने में ही मग्न थे। आधे घँटे तक वहीं झरने के पास बैठा रहा, कुछ तस्वीरें खींचीं। रात को नींद ठीक नहीं आयी थी, लेकिन उस आधे घँटे में सारी थकान दूर हो गयी।

Rio Vermelho, Goias Velho, Brazil

वापस होटल पहुँचा तो जी भर के नाश्ता खाया। नाश्ते में इमली का खट्टा सा रस भी था जो मुझे बहुत अच्छा लगा। यहाँ पर इतनी अलग अलग तरह के फ़ल मिलते हैं, जो दुनियाँ में अन्य कहीं नहीं देखे जैसे माराकुजा और कुपुआसू। और उनका स्वाद भी बहुत बढ़िया है। नाश्ते में इतना खा लिया कि बाद में अपने पर खीज आ रहा थी। अपने को रोकने की और आत्मसंयम की शक्ति मेरी बहुत कम है।

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"आशा घर" में पढ़ने वाले एक बच्चे के पिता से बात हुई तो उसने एक अन्य बात बतायी। बोला, "इस स्कूल के बारे में शहर में बहुत से गलत बातें कही जाती हैं, कहते हैं कि यहाँ बच्चों के धर्म बदल देते हैं। इसलिए बहुत से लोग यहाँ अपने बच्चे को नहीं भेजना चाहते। मैं इस बात को नहीं मानता। मेरे बच्चों ने कोई धर्म नहीं बदला, बल्कि यहाँ की शिक्षा ने उन्हें सोचने समझने की ताकत दी है। मेरा बड़ा बेटा अब विश्वविद्यालय में पढ़ता है, वह यहीं से पढ़ा है। वह कहता है कि इस स्कूल में पढ़े हुए दिन उसके जीवन के सबसे सुन्दर दिन थे और उसने जो यहाँ सीखा है उससे उसका दिमाग और चरित्र दोनो बने हैं।"

बाद में मैंने यह बात रॉबसन से पूछी कि यहाँ के अन्य धर्मों वाले लोग तुमसे नाराज़ क्यों हैं? वह बोला, "मैं कन्दोमब्ले धर्म में विश्वास करता हूँ जो कि अफ्रीकी मूल के आये लोगों के मूल धर्म से प्रेरित है। अफ्रीकी गुलामों को यहाँ ला कर उन्हें जबरदस्ती ईसाई बनाया गया, लेकिन उन्होंने अपने मूल धर्म को छुपा कर बचाये रखा। हमारा आज का कन्दोमब्ले धर्म उनके पुराने अफ्रीकी धर्म से साथ ईसाई धर्म और यहाँ रहने वाले मूल जनजाति के निवासियों के धर्म के सम्मिश्रण से बना है। हमारे धर्म के अनुसार पृथ्वी की हर वस्तु, पेड़ पौधे, पहाड़, पत्थर, मानव और पशु-पक्षी, सबमें एक ही परमात्मा है। 'आशा घर' की बहुत से कार्यक्रम मेरे धर्म के विश्वास से प्रभावित हैं, लेकिन हमारे यहाँ कैथोलिक, एवान्जेलिक सब धर्मों के लोग काम करते हैं, सब धर्मों के बच्चे पढ़ते हैं, मैंने कभी किसी का धर्म बदलने की कोशिश नहीं की। मैं उनके धर्म का मान करता हूँ क्योंकि अगर सोचोगे कि हर वस्तु में वही परमात्मा है तो कोई भी तुमसे भिन्न नहीं है, तो मैं उनके विरुद्ध कैसे कुछ कह या कर सकता हूँ? लेकिन यहाँ के कैथोलिक और एवान्जेलिक ईसाई लोग हमारे विरुद्ध प्रचार करते हैं कि हम उनके बच्चों का धर्म बदलना चाहते हैं।"

मैं सोच रहा था कि दुनिया के दो कोनों पर हैं भारत और ब्राज़ील, लेकिन फ़िर भी कितनी बातों में हमारी समस्याएँ एक जैसी हैं! रॉबसन ने कहा कि उन पर यह भी आरोप लगाया जाता है कि वह बच्चों से ईसाई धर्म की आलोचना की बातें करते हैं।

मेरे विचार में यह सोचना कि कोई अन्य तुम्हारे भगवान की या पैगम्बर की आलोचना या बुराई कर सकता है, यह बात असम्भव है। क्योंकि भगवान या पैगम्बर इतने कमज़ोर नहीं हो सकते कि किसी के कुछ कहने, लिखने या चित्र बनाने से उनकी बेइज़्ज़ती हो जाये। यह तो मानव के अपने मन की असुरक्षा की भावना है जो यह सोच सकती है। दूसरी ओर बात है धर्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाना या उनको दबाना और उनके मानव अधिकार और गरिमा का शोषण करना। धर्म के नाम पर जो लोग इस तरह की बात करते हैं उसकी आलोचना करना तो मेरे विचार में भगवान की पूजा के बराबर होगी।

पर यह सच है कि दुनिया के कई देशों में बहुसंख्यकों के धर्म की रक्षा के नाम पर दूसरे अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों के साथ अन्याय होता है, उन्हें दबाया जाता है। बहुत से देशों ने तो ऐसे कानून भी बनाये हैं जहाँ धर्म की बेइज़्ज़ती के नाम पर लोगों को कारावास या मृत्यू दँड तक दे देते हैं।

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इस बार पोर्तगीज़ बोलने में मुझे अधिक कठिनाई हो रही है!

आखिरी बार पोर्तगीज़ यहीं ब्राज़ील में ही बोली थी, करीब चौदह महीने पहले। उसके बाद किसी पोर्तगीज़ भाषा के देश में जाने का मौका नहीं मिला। शायद इस लिए मेरी भाषा को कुछ जंग सा लग गया, या फ़िर शायद यह उम्र का असर है।

एक अन्य कारण भी हो सकता है इसका, मेरा ईबुक रीडर! पहले कोई भी यात्रा होती थी, तो मेरे साथ में एक किताब तो अवश्य होती थी, लेकिन नये देश में जा कर, वहाँ के समाचार पत्र पढ़ना, टीवी देखना, लोगों से बातें करना, इस सबसे भाषा का अभ्यास तुरंत शुरु हो जाता था। इस बार मेरे पास मेरा ईबुक रीडर है जिसमें 153 किताबें हैं, बस हर समय उसी में मग्न रहता हूँ। शायद इसी लिए इस बार पोर्तगीज़ भाषा को ठीक से  बोलने में इतनी कठिनायी हो रही है.

26 अगस्त 2012, गोईयानिया

कल शाम को हम गोईयास वेल्यो से वापस आये। आज रविवार को मैं खाली था, सुबह सुबह शहर का नक्शा ले कर निकल पड़ा कि धूप तेज़ होने से पहले शहर में कुछ नया देखा जाये।

रास्ते में एक बाग में छोटा उल्लू का बच्चा दिखा जो तेज़ स्वर में पुकार रहा था, शायद उसके माता पिता उसके खाने की खोज में ही गये थे। मैं तस्वीर खींचने के लिए करीब गया तो एक पत्थर के नीचे खुदे हुए खड्डे में दुबक गया।

Baby owl, Goiania, Brazil

आजकल ब्राज़ील के राष्ट्रीय फ़ूल इपे के खिलने का मौसम है। इपे के अधिकतर पेड़ों में पत्ते नहीं हैं वे बस फ़ूलों से भरे हैं। बागों में गुलाबी, जामुनी, पीले, नीले, विभिन्न रंगों के इपे दिखते हैं.

Ipé tree, Goiania, Brazil

घूमते घूमते विश्वविद्यालय वाले इलाके में पहुँच गया, जहाँ एक बाग में ब्राज़ीली शिल्पकारों की बनायी बहुत सी मूर्तियाँ लगीं थीं। मिट्टी की बनी एक कलाकृति मुझसे सबसे अच्छी लगी, पर शायद विश्वविद्यालय के छात्रों को एक हाथ की कलाकृति सबसे अधिक पसंद थी जिसके ऊपर उन्होंने अपने संदेश लिख दिये थे। उस हाथ की कलाकृति के अतिरिक्त किसी अन्य कलाकृति को लिख कर नहीं बिगाड़ा गया था.
Terracotta Sculptures University square, Goiania, Brazil

Hand Sculpture university square, Goiania, Brazil

तीन घँटे तक चला, जब वापस होटल पहुँचा तो टाँगें थकान से चूर हो रही थीं। फ़िर भी खाना खा कर होटल के करीब एक बाग में लगे चित्रकला बाज़ार में गया, क्योंकि वहाँ अपने एक पुराने मित्र तादेओ से मिलना चाहता था। तादेओ भी चित्रकार है और कुछ वर्ष पहले खरीदी उसकी एक कलाकृति बोलोनिया में हमारे घर में भी लगी है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। उसे बचपन में कुष्ठ रोग हुआ था, जिसकी वजह से उसे अपने परिवार से हटा कर कुष्ठ रोगियों की कोलोनी में रहना पड़ा, परिवार तथा भाई-बहनों से उसके सब नाते टूट गये थे। उसे इस बात का बहुत दुख है।
 
आज वह बात नहीं है क्योंकि अब कुष्ठ रोग का उपचार आसान है इसलिए किसी को उसके परिवार से निकाल कर कोलोनी में बन्द करने वाली बातें अब नहीं होतीं। सोचा था कि तादेओ की एक अन्य पैंटिंग खरीदूँगा, लेकिन बाज़ार में वह नहीं दिखा। अन्य चित्रकारों से पूछा तो उसके एक मित्र ने बताया कि उसकी तबियत ठीक नहीं थी.

Ashwarya Rai in art market, Goiania, Brazil

चित्रकला बाज़ार में भारत की एश्वर्या राय भी दिखीं. एक कलाकार ने उनकी बड़ी तस्वीर पर चमकते सितारे और मोती टाँक कर तस्वीर बनायी थी जिसे लोग दिलचस्पी से देख रहे थे और किसकी तस्वीर है यह पूछ रहे थे। सोच रहा था कि ऐसे चित्रकला बाज़ार, जहाँ शहर के आसपास रहने वाले कलाकार अपनी कलाकृतियाँ दिखायें और बेचें, हर देश में होने चाहिये।

अब नींद आ रही है, जल्दी सोना चाहिये क्योंकि कल सुबह सुबह बेलेन जाने की उड़ान लेनी है।

27 अगस्त 2012, बेलेम

आज दोपहर को बेलेम पहुँचे. होटल बस अड्डे के सामने है. मैं सामान आदि रख कर घूमने निकला, सोचा था कि यहाँ के एक संग्रहालय और बाग में घूमूँगा लेकिन सोमवार होने की वजह से दोनो ही बन्द थे। शाम को खाना खाने हम लोग पुरानी बँदरगाह की ओर गये जहाँ पुराने गौदामों में नये रेस्टोरेंट, दुकाने आदि खोली गयी हैं। वहीं एक "किलो रेस्टोरेंट" में खाना खाया। किलो रेस्टोरेंट में आप अपनी प्लेट में कुछ भी खाना ले लेजिये, बाद में उसके वजन के हिसाब से उसकी कीमत चुकाईये। इस तरह अगर आप चाहें तो केवल चावल सब्जी खाईये नहीं, तो केवल माँस मछली, उससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता, बस वजन के हिसाब से कीमत लगेगी। शहर के अधिकतर किलो रेस्टोरैंटों में 20 या 22 रियाइस यानि 500 या 550 रुपये प्रति किलो की कीमत होती है लेकिन बँदरगाह के नये शापिंग सेंटर की कीमत दुगनी थी, फ़िर भी वहाँ खाना अच्छा था।

मैंने खाने के साथ खूब आम भी खाये। इस साल बोलोनिया में कई बार आम खोजने गया था पर नहीं मिले थे, केवल चटनी वाले कच्चे आम मिलते थे। वहीं छत पर लटकते चबूतरे पर बैठ कर एक युवक गिटार बजा रहा था और साथ गीत गा रहा था, वही चबूतरा भवन में इधर उधर घूम रहा था।

खाना खा कर यहाँ के पुराने पुर्तगाली किले और उसके सामने बने कैथेड्रल को देखने गये। सफ़ेद रंग का कैथेड्रल, सफेद और लाल रोशनियों से सजा, रात के अँधेरे में बहुत सुन्दर लग रहा था।

Cathedral, Belem, Brazil

मेरे साथ यहाँ आयी मेरी ब्राज़ीली साथी दियोलिँदा यहीं नदी के बीच में एक द्वीप में पैदा हुई थी। वह अपने बचपन की, साठ साल पहले की बातें बता रही थी कि कैसे यहाँ पर सड़क नहीं थी और वह अपनी माँ के साथ बाग में लगने वाले हाट में खाने का सामान बेचने आती थी। उसकी माँ अफ्रीकी मूल की थीं और पिता एक फ्राँसिसी और अमेज़न जनजाति के सम्मिश्रित परिवार से थे। उसके परिवार में गोरे, सांवले, काले, हर रँग और नस्ल के दिखने वाले लोग हैं। उसके अपने बच्चों में भी अफ्रीकी रँग और चेहरे वाले भी हैं और सुनहरे बालों वाले यूरोपीय दिखने वाले भी।

गोयानिया में आकाश इतना नीला दिखता था मानो शेम्पू से धोया हो. यहाँ का आसमान उसके मुकाबले में कुछ मटमैला सा है - नीचे की तस्वीर में गोयानिया की एक झील।

Bosque do Buritis lake, Goiania, Brazil

कल सुबह अबायतेटूबा (जोकि अमरीकी जनजातियों की भाषा का शब्द है और जिसका अर्थ है "भीमकाय लोगों का गाँव") जाना है जो कि अमेज़न जँगल के बीच में बसा है। राज्य स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी आयेगी हमें लेने, और आधा रास्ता नाव में नदी पार करने का होगा। वहाँ पिछले वर्ष भी गया था, वहाँ के लोग सागर जैसे अमेज़न नदी के बीच में अलग अलग द्वीपों में रहते हैं।

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(अंत भाग 01)

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