उन दिनों रात को उनके साथ ही बिस्तर पर सोता था, उनका हाथ पकड़ कर सहलाता रहता या छोटे बच्चे की तरह उनसे लिपट जाता। सारी उम्र कठिनाईयों से लड़ने वाली माँ, चमड़ी में लिपटी हड्डियों का ढाँचा रह गयी थी, लगता कि ज़ोर से दबाओ तो चटख जायेंगी।
रात को वह कई बार उठतीं और मुझे भी जगा देतीं। एक रात को उन्होंने मुझे चार-पाँच बार जगाया। समझा-बुझा कर हर बार उन्हें दोबारा सुला देता था। सुबह चार बजे के करीब जब उन्होंने फ़िर से जगाया तो मैंने नींद में ही उनसे कुछ गुस्से से कहा कि माँ बहुत नींद आ रही है, मुझे सोने दो, तो वह रोने लगीं। अचानक उनकी समझ कुछ देर के लिए लौट आयी थी, कातर हो कर बोलीं कि इस तरह का जीना मरने से बदतर है। फ़िर कहा, "तू तो डाक्टर है, मुझे कुछ दवा दे कर सुला नहीं सकता कि इस नर्क से छुटकारा मिले?" उनके साथ साथ मैं भी रो पड़ा था। कुछ देर में ही वह सब कुछ भूल कर फ़िर से सो गयीं थीं।
8 फरवरी को मैं चीन में काम पर गया था, जब एक रात को माँ के बारे में बुरा सपना देखा। दिल घबराया तो रात को उठ कर छोटी बहन को ईमेल लिखी और माँ का हाल पूछा। बहन का उत्तर थोड़ी देर में ही आ गया, माँ होश में नहीं थीं और उन्हें अस्पताल में इनटेंसिव-केयर में रखा गया था। अगले दिन ही भारत आने की उड़ान खोजी। दिल्ली पहुँचा तो अस्पताल में डाक्टर बोले कि कुछ और नहीं हो सकता, तो सोचा कि अगर कुछ नहीं हो सकता तो माँ को घर ले जा कर स्वयं ही उनके आखिरी दिनों में उनकी देखभाल करूँ। कम से कम घर के सब लोग साथ तो रह सकेंगे, अस्पताल में तो किसी को पास नहीं जाने देते। इसके अतिरिक्त अस्पताल में उन्होंने माँ के कुछ गैरज़रूरी टैस्ट किये थे, जिनसे मेरा मन खिन्न था। मुझे लगा कि प्राईवेट अस्पतालों को पैसा लेने की इतनी भूख लग गयी है कि बिना वजह, मरणासन्न मरीज़ के शरीर को दुख देने से भी नहीं हिचकिचाते।
करीब तीस साल पहले मैंने कुछ समय इनटेंसिव केयर विभाग में काम किया था, सोचा कि उनकी जितनी देखभाल करनी चाहिये, वह करनी तो मुझे आती है। उन्हें घर ला कर सब इंतज़ाम किया। नाक से पेट में ट्यूब जिससे खाना दिया जाये, इंट्रावीनस ड्रिप दवाई देने के लिए, पिशाब के लिए केथेटर। माँ की पीठ पर घाव बन गया था, बाँहें और टाँगें दर्द से जुड़ी अकड़ गयी थीं जिन पर खून के गट्ठे बन गये थे, बेहोशी में भी दिन रात पीड़ा से कराह रही थीं। बार बार माँ के शब्द मन में आते कि मुझे तड़प-तड़प कर मत मरने देना, ऐसी दवा देना कि आराम से चली जाऊँ। मेरे अंदर का डाक्टर, कैसे क्या दवाई दी जाये, कैसे करवट बदलायी जाये, कब क्या खाने को दिया जाये सोचता था। अंदर का बेटा माँ के जाने का सोच कर द्रवित हो उठता। कई बार मन में आता कि इस तरह के इलाज से माँ की तड़प को और भी लम्बा कर रहा था। लगता कि माँ मुझसे चिरनिंद्रा की दवा माँग रही हों, दर्द से मुक्ति मांग रही हो, पर मुझमें इतनी ताकत नहीं थी कि माँ की यह इच्छा पूरी कर पाता।
माँ के जाने के बाद उनकी डायरियाँ पढ़ रहा हूँ। डायरी वाली माँ, मेरी यादों वाली माँ से अलग लगती है। बाहर से बहादुर, निडर दिखने वाली माँ, अपने डरों को सिर्फ़ अपनी डायरी को ही कह पाती थी। डायरी में अतीत के बहुत से लोगों की कहानियाँ और बातें हैं, लोहिया की समाजवादी पार्टी की बातें, भारत के पहले प्रधान मंत्री नेहरू की बातें, भारत-पाकिस्तान विभाजन की बातें, पिता के मित्रों लेखकों-कवियों की बातें, अपने अकेलेपन की बातें -
"... पाकिस्तान से आये तो दिल्ली में माडलबस्ती शीदीपुरा में एक मुसलमान के खाली घर में हमें शरण मिली, घर आधा जला हुआ था. मैं मृदुला साराभाई के शान्ती दल में काम करने लगी, घूम घूम कर मुसलमान लड़कियों को खोजते और उन्हें बचा कर उनके परिवारों में भेजते। तब अरुणा आसिफ़ अली, सुभद्रा जोशी आदि से भी भेंट हुई। कमला देवी चट्टोपाध्याय से रिफ्यूज़ी सेंटर में मिली। शाम को गाँधी जी की प्रार्थना सभा में जाते।
पहले मुझे तीन महीने सोशलिस्ट पार्टी के केंद्रीय दफ्तर में बाड़ा हिंदुराव में हिंदी टाईपिंग का काम मिला, वहाँ जे. स्वामीनाथन, सूरजप्रकाश, कश्यप भार्गव और दीपक जी से मिली। चमनलाल भी मित्र थे जिन्होंने फैज़रोड पर एक मुसलमान के खाली घर में स्कूल खोला तो मैं, कश्पी, दीपक और विमला, जो बाद में चमन की पत्नी बनी, वहाँ स्कूल में काम करते और मेरे तीन भाई और एक बहन वहाँ पढ़ने लगे. मुझे 40 रुपये तन्ख्वाह मिलती जिसमें से 20 रुपये अपने भाई बहन की फ़ीस में दे देती. छः मास वहाँ काम किया...
.. 1949 में जब लोहिया नेपाल आंदोलन के संदर्भ में जेल से छूटे तो औखला में एक पार्टी दी गयी। मैं भी वहाँ थी। और मेरे साथ एक युगोस्लाविया की लड़की मलाडा कलाबावा भी थी जो लोहिया के यहां ही रह रही थी, बारहखम्बा रोड में पदमसिंह के यहां। आयु उसकी उस समय 23-24 की होगी. लड़की बहुत ही अच्छी थी। लोहिया की दोस्त थी। हम दोनो नहर के किनारे बैठे बात कर रहे थे. वह हिंदी जानती थी।
तभी एक टोकरी में पांच छः आम लिए लोहिया हमारे पास आ कर बैठ गये कि अरे तुम लोग यहां बैठी हो और सब आम खत्म हो गये हैं। इतने स्नेह से वह दे रहे थे कि मेरी आँखों में पानी भर आया। तो बोले, पीठ थपथपा कर, जल्दी से खा लो। मुझे आम अधिक अच्छा नहीं लगता था फ़िर भी मैंने हाथ में लिया। तभी कश्पी, सूरज और दीपक तीनो आ गये, बोले कि यह तो बहुत ज्यादती है कि तुम दोनो सब आम खाओगी और हम देखते रहेंगे। मैंने मलाडा से कहा कि तुम ले लो और बाकी उन्हें दे दो और अपने हाथ वाला आम भी उन्हें दे दिया। मलाडा ने मेरी शिकायत लोहिया से की तो वह बहुत नाराज़ हुए कि मैंने तुम्हें बाँटने को नहीं दिये थे। मैंने माफ़ी माँग ली तो खिलखिला कर हँस पड़े। साथ ही कहा कि बहादुर तो तुम हो लेकिन समझदार नहीं हो...
..जब नेहरू की सरकार बनी तो लेजेस्लेटिव असेम्बली में संसद भवन में काम करना शुरु किया। तब सिद्धवा, दादा धर्माधिकारी, शाहनवाज़, पूर्णिमा बैनर्जी, मदनमोहन चतुर्वेदी आदि से पहचान हुई. मौलाना आज़ाद तब शिक्षा मंत्री थे, मसूद उनका पी.ए. था, मुझे उनके साथ काम मिलता। काम बहुत था और देर तक रुकना पड़ता था। मैं साईकल से आती जाती थी, रात को लौटती तो बिल्कुल सुनसान होता, रात के ग्यारह बारह भी बज जाते थे। वहाँ एक दक्षिण भारतीय अफसर था जिसने मुझे तंग करना शुरु कर दिया, उल्टी सीधी अटपट बातें करने लगा। तो मैं पंडित नेहरु के पास गयी जो मुझे मृदुला बहन के समय से जानते थे और मुझे बहादुर बेटी के नाम से पुकारते थे क्योंकि मैंने एक बार शान्ति दल में एक मुसलमान लड़की को भीड़ से बचाया था। तब मैं कभी भी तीन मूर्ति भवन के अंदर आ-जा सकती थी।
मैंने पंडित जी को कहा कि मुझे असेम्बली से घर जाने में बहुत देर हो जाती है और अकेले घर जाने में डर लगता है। तो वह बोले तुम बहादुर लड़की हो, डर कैसा। मैंने कहा कि मुझे दरियागंज में नयी खुली टीचर्स इंस्टिट्यूट में भेज दीजिये, अभी तो ट्रेनिंग शुरु हुए दो महीने ही हुए हैं, मैं वह पूरा कर लूँगी. मौलाना आज़ाद के पी.ए., मसूद साहब मुझे फार्म दे गये, बस मैं संसद का काम छोड़ कर बेसिक टीचर्स ट्रैंनिग में चली गयी, जहाँ तीस रुपये महीने का वज़ीफ़ा मिलता था। एक साल बाद ट्रेनिंग पूरी हुई, मुझे दिल्ली के नवादा गाँव के स्कूल में नौकरी मिल गयी...
कितनी बातें जीवन की, कुछ भी नहीं रहता। बस यही लिखे कागज़ बचे हैं और यादें.
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