गुरुवार, जून 30, 2005

एक दिन अचानक

शाँत आसमान से जैसे अचानक बिना किसी चेतावनी के बिजली गिर जाये।

ठंडी हवा चल रही हो, सुन्दर मौसम हो, ख़िले हुए फ़ूलों की खुशबु, आप के साथ में मनपसंद साथी, मनोरम संगीत और अचानक पता नहीं कहां से बर्फ का तूफान आ जाये।

या सुखद यात्रा में, हँसी मजाक और नौक झौंक चल रही हो, अचानक टूटे पुल से बस नीचे नदी में जा गिरे।

यानि एक दिन अचानक ही, और बस उस एक क्षण में सब कुछ बदल जाये, तो कैसा हो ? कल शाम को काम से घर लौटा तो मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

सुपुत्र जी क्मप्यूटर के सामने चिंतित बैठे थे, बोले, "पापा, इसकी हार्ड डिस्क तो गयी।"

हैं? ऐसे कैसे हार्ड डिस्क चली गयी? कितने काम, ईमेल के पते, पासवर्ड ... सब कुछ एक पल में ही चले गये? पिछली बार जब ऐसा हुआ था तो सोचा था, आगे से ऐसी नादानी नहीं करेंगे, कि सभी महत्वपूर्ण फाइलें को दोनो क्मप्यूटरों में कॉपी करके रखेंगे ताकि ... पर कुछ दिन, महीने बाद इस सब के बारे में भूल गया था।

अब पछताये क्या होत जब क्मप्यूटर के उड़ गयो दिमाग ?

तो मन को शाँत करने के लिये आज एक कविता, बच्चन जी की "मधुशाला", की कुछ पंक्तियाँ पढ़िये क्योंकि बड़ी बीमारी को इलाज़ भी बड़ा ही चाहियेः

उतर नशा जब इसका जाता,
आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली
नित्य ढ़ला जाती हाला॥

जीवन के संताप, शोक सब
इसको पी कर मिट जाते॥

सुरा सुप्त होते मद लोभी,
जाग्रत रहती मधुशाला.


कुछ माह पहले लंदन गया था, वहाँ की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं:


 


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मंगलवार, जून 28, 2005

माजरा क्या है?

दुनिया में दो तरह के लोग रहते हैं, एक वह जो तमाशा करते हैं और दूसरे वह जो आस पास से खड़े हो कर पूछते हैं, क्या माजरा है भाई साहब?

दूसरी श्रेणी के लोग, यानी माजरा क्या है पूछने वाले, पहली श्रेणी के लोगों से बहुत अधिक हैं। जब से टेलीविज़न का आविष्कार हुआ है तब से तो माजरा देखने वालों की संख्या और भी कई गुना बढ़ गयी है।"अरे साला, देखो कैसे अपनी जोरु को पीट रहा है?" "अजी, क्या अखबार में मुँह घुसाये बैठे हो, देखो बाहर पुलिस शास्त्री जी के सुपुत्र को ले कर जा रही है।" "देखा तुमने कैसे चुन्नु की बीवी ने चौदराईन को दो टूक ज़बाव दिया, बोलती बन्द हो गयी उसकी।" "कौन जाने कौन था, बेचारा यूँ सड़क पर ही मर गया।"... इत्यादी अन्य बातें हो सकती है जो "माजरा क्या है" जैसे सवाल के बाद, माजरा देखने वालों में अक्सर निकल आती हैं।

माजरा देखने वाले, रस ले ले कर खुशी से दूसरों पर आयी मुसीबत का मजा उठाते है।

कभी कभी, माजरा देख कर भी चुपचाप ही रहना पड़ता है।

यानी मन में खुशी के लड्डु फूट रहे हों, फिर भी चेहरा गम्भीर बना कर यूँ रहने पर हम मजबूर होते हैं मानो हमें सचमुच बहुत दुख हो रहा हो। घर में अगर पिता जी का झापड़ अगर आप के छोटे या बड़े भाई को पड़े, या फिर जब मास्टर साहब उस लड़के को मुर्गा बनवायें जिससे आप का झगड़ा हुआ था, तो ऐसा भी हो सकता है कि आप माजरा तो खुशी से देखें, पर खुशी को छुपा कर।

तो क्या, माजरा देखना केवल दूसरों की मुसीबतों में ही हो सकता है? जब दूसरे लोग खुशी मना रहें हो तो क्या वहाँ माजरा देखने वाले नहीं हो सकते? आप का क्या खयाल है?

अरे साहब आप क्या सिर्फ हमारे चिट्ठे को पढ़ कर मन ही मन खुश होते रहेंगे कि कितनी बेवकूफी की बातें लिखी हैं हमने ? माजरा देखना छोड़िये और आप भी अपनी कलम उठाइये, इन माजरा देखने वालों ने तो नाक में दम कर दिया है.


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सोमवार, जून 27, 2005

संस्कृति सभ्यत्ता की रक्षा

आज अपने ब्लॉग पर पहली टिप्पणी मिली श्री अनूप शुक्ला की जो अनुगूँज नाम के वेब पृष्ठ को चलाते हैं जहाँ हिन्दी में ब्लॉग (चिट्ठा) लिखने वाले आपस में बातचीत कर सकते हैं। अनुगूँज का ही एक प्रयत्न है कि चिट्ठा लिखने वाले हम सब लोग किसी एक विषय पर कुछ लिखें। शायद इसका उद्देश्य है कि हम लोग फ़िर एक-दूसरे के चिट्ठों को पढ़ने के लिये प्रेरित होंगे वरना तो हर कोई सिर्फ अपने अपने चिट्ठों मे लगा रहेगा और हम लोग एक साथ अपना सामूहिक संगठन नहीं कर पायेंगे? इस माह का विषय है "माजरा क्या है"। अगला ब्लॉग आलेख, मेरा भी इसी विषय पर होगा।

कल शाम को बाग में एक पाकिस्तानी दम्पत्ति से मुलाकात हुई। अपनी चार पाँच साल की बेटी के साथ सैर कर रहे थे। बात करने लगे तो वह कहने लगे की उनकी पत्नी सिर्फ घर में रहतीं हैं, न तो उन्हें कुछ इतालवी भाषा आती है और न ही वह चाहतें हैं कि पत्नी उसे सीखें या अकेले बाहर जाने की सोचे, काम करने की सोचना तो बहुत दूंर की बात है। थोड़ी देर तो मैंने उनके विचार बदलने के लिये बहस शुरु कर दी मगर फ़िर देखा के हम दोनों को ही गुस्सा आने लगा है तो चुप हो गया। उनका ख़्याल है यही तरीका है यहाँ रह कर अपनी संस्कृति और सभ्यता को बचाने का। इस पूरी बहस के दौरान उनकी पत्नी ने एक शब्द भी नहीं कहा न ही उन्होंने अपनी पत्नी की कोई राय इस बारे में जानना आवश्यक समझा।

एक बाद में इस बारे में सोच रहा था तो इलाहाबाद में परिवार के कुछ लोगों की याद आ गयी। वह भी तो कुछ इसी तरह सोचते थे। उनके घर में लड़कियाँ पढ़ सकतीं थीं पर नौकरी नहीं करवाते थे, इसलिए सभी बेटियाँ बी.ए., एम.ए. आदि करके भी घर में बन्द रहतीं थी, क्यों कि बेटियों के नौकरी करने से परिवार के आत्म सम्मान को ठेस लगती थी।

 हमारे हिन्दुस्तान में न जाने कितने परिवार होंगे आज भी जहाँ ऐसा ही सोचते हैं लोग और लड़कियाँ घुट घुट कर सारा जीवन गुज़ारने को ही अपना धर्म समझती हैं।

मैं यह नहीं कहता कि हर लड़की को नौकरी करनी चाहिये, लेकिन परिवार का बंधन कि हमारे घर की बहु-बेटियाँ नौकरी नहीं करेंगे, गलत समझता हूँ। और उस पाकिस्तानी पुरुष की सोच कि पति के बिना उनकी पत्नि घर से भी बाहर न निकलें, किसी से बात नहीं करें, सामान न खरीद पायें, मेरे लिए मध्ययुगीन सोच है और मुझे हँसी आती है जब ऐसे लोग कहते हैं कि इस्लाम में औरतों को सभी अधिकार हैं।

आज की कविता मे हैं महादेवी वर्मा की कुछ पंक्त्तियाः


तुम हो विधु के बिम्ब और मैं मुग्धा रश्मि अजान,
जिसे खींच लाते अस्थिर कर कौतूहल के बाण.

स्वरलहरी मैं मधुर स्वप्न की तुम निन्द्रा के तार,
जिसमें होता इस जीवन का उपक्रम उपसंहार.

मुझे बाँधने आते हो लघु सीमा मे चुपचाप,
कर पाओगे भिन्न कभी क्या ज्वाला से उत्ताप?
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रविवार, जून 26, 2005

स्टीर्ट रेव फैस्टीवल - सड़क पर मस्ती

हर साल की तरह, इस साल भी गर्मियों का मतलब है कि हमारे शहर बोलोनिया मे रोज़ नाटक, नृत्य, फ़िल्म आदि के प्रोग्राम होते हैं

कल रात को मैं स्टीर्ट रेव फैस्टीवल मे गया - रेव फ़ैस्टीवल का अर्थ है कि सड़कों पर संगीत हो, पीयो, मस्ती करो और सब लोग मिल कर नाचें। इस वर्ष एक अन्य फैस्टिवल (यस फैस्टीवल) कल 25 जून को शुरु हुआ और वह आज रात को करीब आधी रात तक स्माप्त होगा।

 

इससे पहले मैंने इस रैव फैस्टीवल के बारे में केवल सुना था, क्योंकि शहर के बहुत से लोग इसके खिलाफ़ हैं, उनके ख़्याल से यह केवल गन्दगी फ़ैलाने, शोर मचाने और तोड़ फ़ोड़ करने का बहाना है। कहते हैं कि लोग नशे में धुत हो कर बेकाबू हो जाते हैं।

 

जब मारगेरीता बाग पहुँचा जहाँ आज इस फैस्टीवल का प्रारम्भ होना था, दूर से ही संगीत सुनायी दे रहा था। करीब पहुँच कर तो लगा कि संगीत इतना तेज़ था कि कान के परदे हिल जायें। लोग, अधिकतर जवान लड़के और लड़कियाँ, गर्मी और मस्ती के मारे, कपड़े उतार कर जोर-शोर से नाच रहे थे, बियर पी रहे थे और कहीं कोई लोग मारिजुआना जैसे नशे में मग्न थे। कुछ-कुछ होली जैसा माहोल लग रहा था। मेरे लिए सबसे बड़ी मुसीबत थी तेज़ संगीत का शोर, इसीलिये मैं आधे घंटे में ही पस्त हो कर वहाँ से लौट आया।

 

सच है कि ये सब मज़े तमाशे एक उम्र तक ही शोभा देते हैं।

आज से मेरा यह ब्लौग ब्लौगर.कौम में शिफ्ट हो गया है। पहले तो मुझे इस बारे में मुझे बहुत डर लग रहा कि कैसे होगा, पर फिर हिन्दी वेबरिंग के देबू यानि देबाशीष की मदद से सब कुछ ठीक हो गया। हिन्दी के ब्लॉगर एक दूसरे की और मेरे जैसे प्रौंढ़ों-बूढ़ों की हमेशा मदद करते हैं।

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शनिवार, जून 25, 2005

वापस बोलोनिया

छुट्टियाँ खत्म हो गयीं और हम सब वापस बोलोनिया में घर वापस आ गये हैं।

घर आ कर अज़ीब लग रहा है, बिबियोने वाले घर की आदत पड़ गयी थी। यहाँ गरमी भी है और उमस भी इतनी कि जी घबरा जाये। बिबियोने मे समय का अहसास ही मिट गया था, चाहे जितने बजे उठो, चाहे जितने बजे खाना खाओ, कुछ काम नहीं था, बस सैर, तैरना, सोना और देर तक अखबार पढ़ना।

घर वापस आ कर कुछ अज़ीब लगता है, फ़िर से वही घड़ी की तानाशाही और भागम-भाग.

घर वापस आ कर टेलीफ़ोन की आन्सरिंग मशीन पर अंजोर और मिन्नी दीदी का मैसेज है, मिन्नी दीदी आजकल अमरीका में हैं।

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बुधवार, जून 22, 2005

श्यौराज सिहं बेचैन

छुट्टियाँ इतनी जल्दी बीत रहीं हैं कि पता ही नहीं चला। परसों घर वापस जायेंगे।

इन दिनों मे युनीकोड लिपि मे रघु फॉन्ट से लिखने का खूब अभ्यास हो रहा है। हिन्दी लिखने की रफ्तार भी तेज हो गयी है पर मात्रा लिखने में इतालवी की-बोर्ड की वजह से कुछ वर्ण नहीं लिख पाता हूँ, उन्हें लिखने का तरीका समझ नहीं आया। शूशा लिपि मे लिखने की आदत पड़ गयी थी, तब अल्ट का बटन दबा कर कुछ नम्बर दबाओ तो अधिकतर शब्द लिखे जाते थे, पर युनिकोड मे यह मुमकिन नहीं लगता।

आज दिन मे जून के हँस मे श्यौराज सिहं बेचैन की आत्मकथा "राहें बदलीं कि जीवन बदलता गया" पढ़ना शुरु किया तो उसे अधूरा छोड़ने का मन ही नहीं किया। पत्नी से कहा था कि आज शाम को हम लोग लाइट हाऊस की तरफ लम्बी सैर करने जायेंगे। दोपहर में कुछ देर आराम करने के बाद वह तैयार हो गयी पर मेरा वह आत्मकथा अधूरा छोड़ने का जरा भी मन नहीं था। जब एक घँटे के बाद उसे पूरा पढ़ कर के हँस को बन्द किया तभी चैन आया। रास्ते में घूमते समय भी मन मे बार-बार उस आत्मकथा की ही बातें याद आ रहीं थीं.

आज एक कविता पढ़िये, श्यौराज सिंह की इसी आत्मकथा सेः

मेरे बचपन के नाजुक से नन्हे कदम,
जिस तरफ मुड़ गये रास्ता बन गया.
धूप में,
छांव में, शहर में, गांव में,
भूख ले कर चली और मैं चलता गया,
दुख का येहसास
बेचैन करता गया,
मुक्ति का भाव मानस में बढ़ता गया.
पूरा संसार पुस्तक सा
खुलता गया,
जितना पढ़ पाया मैं उतना पढ़ता गया.
इतनी काली अंधेरी विरासत
मिली,
मेरे भीतर का दीपक था जलता गया.
क्या चला मैं जो लाखौं वहीं रुक
गये,
राहें बदलीं के जीवन बदल सा गया.

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सोमवार, जून 20, 2005

मल्लिका शेरावत

आज सुबह सैर पर सोच रहा था कि हिन्दी के सप्ताह के नाम, जैसे सोमवार, बुधवार इत्यादि कब और कैसे बने? क्या हमने अंग्रेजी के सन्डे, मन्डे वगैरह को ले कर उनका हिन्दी में उनुवाद कर लिया या फिर ये तो हमारी भाषा में पहले से ही थे ? अगर इन्हें अंग्रेजी से लिया गया है तो हमारी हिन्दी में अग्रेजों के आने से पहले उन दिनों के क्या नाम होते थे ? क्या आप में से कोई इस प्रश्न का उत्तर दे सकता है?

आज हवा चल रही है सुबह से ‌ सुबह तो समुद्र मे नहाने गया था पर आज दोपहर को घर से निकलने का मन नहीं कर रहा था। सुबह समुद्र के पानी मे पीठ पर लेटा आखेँ बन्द करके तैर रहा था, और मेरे मन मे गाने के शब्द गूँज रहे थे, "मचलती हुई हवा मे छम छम, हमारे संग संग चलें गंगा की लहरें.." आँख खोली तो देखा तट से काफी दूर आ गया था ‌ पाँव नीचे लगाने की कोशिश की तो पाया कि पानी गहरा था और जमीन पर पाँव नहीं लगते थे।

 एक क्षण के लिये तो डर लगा पर फिर बिना किसी दिक्कत के वापस तट के समीप आ गया। बाद मे सोच रहा था कि कुछ भी मौका हो, यह हमारे मन मे हिन्दी फिल्मों के गाने ही क्यों आ जाते हैं?

जून के हँस मे मेरे मिन्नी दीदी (अर्चना वर्मा ) की नयी कविता छपी है, "2" जिसमे लिखा हैः

"तुम अगर सुंदर या आजाद न हुई होतीं
तो हादसा न होता,
क्योंकि वह तो होता ही
रहता है
स्त्री की देह के साथ...
लेकिन पूछो तो सही एक बार,
हमलावर की जबान
पर नाम किसका था."

यह कविता मल्लिका शेरावत की देह से उत्तेजित युवक के बारे मे है और उसी युवक की शिकार एक लड़की के बारे मे। 

हमारे समाज में अक्सर कहते हैं कि स्त्रियों पर हमले तो हमेशा होते ही आये हैं। पर उस स्थिति मे लड़की के कपड़ों या व्यवहार को ही दोषी ठहराया जाता है "क्योंकि उनसे वह लड़कियाँ बेचारे भोले लड़कों पर बुरे काम करने पर मजबूर करतीं हैं"। यानि कि गलती तो हर हाल मे लड़की या स्त्री की ही होगी।

पर मैं यह नही मानता. मेरे ख्याल से मल्लिका शेरावत जैसी लड़कियां ही वह बदलाव लायेंगी जिससे हर लड़की सिर ऊँचा कर के चल पायेगी। लड़कियों पर अकेले मे हमला करने वालों मे कोई दम नहीं होता, डरपोक होते हैं वह और अगर लड़कियाँ हिम्मत से सर ऊँचा कर के चलें और कोई सामने छेड़े तो उसे खुल कर, चिल्ला कर जोर से गाली दे सकें तो शायद उनमे से आधे तो डर से भाग जायें - आप की क्या राय है? 

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शनिवार, जून 18, 2005

ब्रान्दो के साथ सैर

उत्तर-पूर्वी इटली में छुट्टियाँ - समुद्र तट पर बसा शहर बिबियोने - डायरी का तीसरा दिन  

 
आज शनिवार है, यानि लोगों की एक सप्ताह वाली छुट्टियाँ समाप्त हो रही हैं और लोगों को घर वापस जाना है।
 
अभी सुबह जब ब्रान्दो के साथ सैर को निकला तो विभिन्न घरों के सामने लोगों के झुंड खड़े थे, अपना-अपना सामान लिये हुये, अपनी बस के इन्तजार में। कुछ दूर पर एक अजैंसी के बाहर एक बस से उतर कर, नये आये विदेशी पर्यटक लोग अपने-अपने घर या फ्लैट की अलाटमैंट की इन्तजार कर रहे थे। इटली के आसपास के देशों से, जैसे कि जर्मनी, पोलैंड, चेक रिपब्लिक आदि से यह सब टूरिस्ट शुक्रवार की रात को चलते हैं और यहाँ शनिवार को सुबह पहुँचते हैं और उन्हें उतार कर, वही बसें पिछले हफ्ते के आये टूरिस्टों को ले कर वापस लौट जातीं हैं।
 
यह सारा शहर इसी पर्यटक इकोनोमी से चलता है। यहाँ के रहने वालों की संख्या दस-पंद्रह हजार है, लेकिन गर्मियों में यहां उत्तरी यूरोप से लाखों पर्यटक आते हैं क्योंकि उनके अपने समुद्रतट गर्मियों में भी कुछ ठंडे होते हैं। 

पहले एक देश होता था चेकोस्लोवाकिया, आज दो देश बन गये हैं - चेक और स्लोवाकिया। यहाँ इन दोनो देशों को अलग होने मे कोई खून खराबा नहीं हुआ, क्यों? उन्होंने जनमत किया और अलग हो गये। लेकिन मैं सोचता हूँ कि आज के यूरोप मे छोटे-छोटे देश बनाने का क्या फायदा, जब की दूसरी ओर से कोशिश हो रही है कि संयुक्त्त राष्टृ यूरोप का निर्माण करने का ?

जैसे आज यूरोप मे एक देश से दूसरे देश जाने मे न तो वीजा चाहिये और न ही वहाँ काम ढ़ूढ़ंने के लिये कोई परमिशन, अगर भारत, बंगलादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि देशों मे यूँ होने लगे तो कैसा होगा ? यह नहीं करते क्योंकि शायद इन सब देशों से बहुत से लोग भारत की तरफ आ जायेंगे, क्यों कि उन्हें भारत में कमाने के अधिक मौके मिल सकते हैं। मैं सोच रहा था कि क्या इसी तरह भारतीय व्यापारी भी तो इन नये देशों मे व्यापार बढ़ाने के नये माध्यम खोज सकते हैं, पर ‌क्या एक दिन वैसा हो सकेगा ? वैसे नेपालियों के लिए भारत आना आसान है, लेकिन उसमें शायद धर्म की बात भी आ जाती है।
 
जो लोग और देश धर्म के नाम पर हिन्दुस्तान से अलग हुए हैं, उनके लोगों को वापस हिन्दुस्तान में खुल कर आने देना, थोड़ा अजीब सा लगता है।
 
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शुक्रवार, जून 17, 2005

लाईट हाऊस

उत्तर-पूर्वी इटली में छुट्टियाँ - समुद्र तट पर बसा शहर बिबियोने - डायरी का दूसरा दिन  

सुबह 6 बजे नींद खुली, नाश्ता किया और अपने कुत्ते ब्रान्दो के साथ सैर को निकल गया, लाईट हाऊस की तरफ। रास्ते में चीड़ के पेड़ों की और उनके पीछे दिख रहे समुद्र की बहुत सारी तस्वीरें खींचीं। लाईट हाऊस पहुँच कर पाया कि वहाँ एक इतालवी टी. वी. फिल्म की (फिल्म का नाम था "समुद्र के सामने ज़ुर्म") शूटिगं चल रही थी इस लिये वह सब रास्ता बंद कर दिया गया था।

पर वहाँ शूटिंग देखने के लिये कोई भीड़ भड़्क्का नहीं था, शायद इसलिये भी कि बिब्योने के टूरिस्ट भिन्न भिन्न यूरोपी देशों से आये हैं और उन्हें इतालवी फिल्मी सितारों में कोई दिलचस्पी ही नहीं है।

ब्रान्दो के साथ सैर पर जाने का यह फायदा होता है कि रास्ते में मिलने वाले सभी कुत्ता-स्वामियों से सलाम या कम से कम थोड़ी मुस्कुराहट तो हो ही जाती है। जब भी कोई कुत्ता दिखता है मेरा पहला सवाल होता है "मास्कियो ओ फैम्मिना?" यानी पुरुष कुत्ता या मादा कुत्ता?

पुरुष कुत्तों से ब्रान्दो की बिल्कुल नहीं बनती, इस लिये वहाँ रुकने का सवाल ही नहीं होता। मादा कुत्तों के स्वामियों से अवश्य कुछ बात हो जाती है। आज सुबह इस नर-मादा जाँच मे भाषा की बाधा बार-बार आ रही थी, क्योंकि कोई पोलिश भाषा बोलने वाला था तो कोई जर्मन या हन्गेरियन या अन्य पूर्वी यूरोप भाषी।

ढाई घँटे की सैर के बाद घर वापस लौटे तो थकान से मेरी और ब्रान्दो दोनो की हालत खस्ता हो रही थी।

आज एक तस्वीर में मेरा बेटा और हमारा कुत्ता ब्रांदो 


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सोमवार, जून 13, 2005

बिब्योने की छुट्टियँ।

आज से इस ब्लॉग का पुनर्जन्म हो रहा है, क्योंकि आज से यह हिंदी के प्रचलित शुशा फौंट में नहीं बल्कि युनीकोड में लिखा जायेगा। हम सभी हिंदी ब्लॉगर देबू यानि देबाशीष के बनाये हिन्दी वेबरिंग से जुड़े हैं। लोगों को ब्लॉग पढ़ने में दिक्कत हो रही थी इसलिए देबू ने इसे ठीक करने की कुछ कोशिश की तो उसी ने मुझे हिंदी के नये युनीकोड के बारे में बताया। 
 
इंटरनेट पर हिंदी में कुछ लिखने की सबसे बड़ी दिक्त है कि पहले किसी फॉन्ट में लिखना सीखना पड़ता है, जो आसान नहीं है क्योंकि कीबोर्ड पर अंग्रेज़ी वर्णमाला है और याद करना कि हिंदी की वर्णमाला का कौन सा वर्ण कहाँ है, कठिन होता है। इसलिए युनीकोड का सुन कर पहले तो मैंने सोचा कि कौन सीखेगा कि इस नये कीबोर्ड को कैसे सीखूंगा, पर कुछ कोशिश कर के देखा तो लगा कि इसमे लिखना खास कठिन नहीं है, बल्कि बाकी फॉन्ट के मुकाबले में आसान है। 

धीरे-धीरे युनीकोड सीख रहा हूँ, बस अभी कुछ स्वर और मात्राएँ लिखना समझ नहीं आया है। देबू कहता है कि एक बार युनिकोड स्थापित हो जायेगा तो फिर बदलना नहीं पड़ेगा।

आज हम लोग बिब्योने नाम की समुद्र-तट पर बसे शहर में, जो उत्तर-पूर्वी इटली मे वेनिस के उत्तर में है, वहाँ छुट्टियों मे आये हैं। आज सुबह ही यहाँ पहुँचे हैं, अब अगले दिनों मे हिन्दी लिखने का अभ्यास करने का समय मिलेगा।
 
छुट्टियों के पहले दिन, आज सुबह की सैर की तीन तस्वीरें:

 

 

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