शाँत आसमान से जैसे अचानक बिना किसी चेतावनी के बिजली गिर जाये।
ठंडी हवा चल रही हो, सुन्दर मौसम हो, ख़िले हुए फ़ूलों की खुशबु, आप के साथ में मनपसंद साथी, मनोरम संगीत और अचानक पता नहीं कहां से बर्फ का तूफान आ जाये।
या सुखद यात्रा में, हँसी मजाक और नौक झौंक चल रही हो, अचानक टूटे पुल से बस नीचे नदी में जा गिरे।
यानि एक दिन अचानक ही, और बस उस एक क्षण में सब कुछ बदल जाये, तो कैसा हो ? कल शाम को काम से घर लौटा तो मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
सुपुत्र जी क्मप्यूटर के सामने चिंतित बैठे थे, बोले, "पापा, इसकी हार्ड डिस्क तो गयी।"
हैं? ऐसे कैसे हार्ड डिस्क चली गयी? कितने काम, ईमेल के पते, पासवर्ड ... सब कुछ एक पल में ही चले गये? पिछली बार जब ऐसा हुआ था तो सोचा था, आगे से ऐसी नादानी नहीं करेंगे, कि सभी महत्वपूर्ण फाइलें को दोनो क्मप्यूटरों में कॉपी करके रखेंगे ताकि ... पर कुछ दिन, महीने बाद इस सब के बारे में भूल गया था।
अब पछताये क्या होत जब क्मप्यूटर के उड़ गयो दिमाग ?
तो मन को शाँत करने के लिये आज एक कविता, बच्चन जी की "मधुशाला", की कुछ पंक्तियाँ पढ़िये क्योंकि बड़ी बीमारी को इलाज़ भी बड़ा ही चाहियेः
उतर नशा जब इसका जाता,
आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली
नित्य ढ़ला जाती हाला॥
जीवन के संताप, शोक सब
इसको पी कर मिट जाते॥
सुरा सुप्त होते मद लोभी,
जाग्रत रहती मधुशाला.
कुछ माह पहले लंदन गया था, वहाँ की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं:
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