बुधवार, जनवरी 14, 2026

फ़िल्मों के आदर्शवादी धर्मेन्द्र

कुछ सप्ताह पहले फ़िल्म अभिनेता धर्मेन्द्र की मृत्यु हुई थी। उन्होंने बहुत सी फ़िल्मों में भिन्न तरह के किरदार निभाये थे। वह फ़िल्मों में कई बार आदर्शवादी व्यक्ति, विषेशकर लेखक या कवि के रूप में भी आये थे, जो मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। आज मैं उनमें से कुछ फ़िल्मों की बात करना चाहता हूँ।

Stills of Dharmendra from the film Satyakam

 

बन्दिनी (बिमल रॉय, 1963)

मैं नौ साल का था जब पापा के साथ दिल्ली के ओडियन सिनेमा में 'बन्दिनी' देखने गया था। मैंने बंगाली लेखक जरासंध के बंगाली उपन्यास 'तामसी' का हिन्दी अनुवाद पढ़ा था जिस पर यह फ़िल्म आधारित थी, और वह उपन्यास मुझे बहुत अच्छा लगा था। 'बन्दिनी' की नायिका कल्याणी (नूतन) को अपने गाँव में कैद काट रहे स्वतंत्रता-संग्रामी विकास (अशोक कुमार) से प्रेम हो जाता है, लेकिन वहाँ से जाने के बाद वह उसे भूल सा जाता है।

बदनामी की वजह से गाँव से निकाली कल्याणी एक खून के अपराध के लिए जेल काट रही है, जहाँ वह आदर्शवादी डॉ. देवेन (धर्मेन्द्र) से मिलती है। देवेन उससे प्रेम करता है और उससे विवाह करना चाहता है लेकिन अंत में कल्याणी बीमार विकास के पास लौट जाती है।

कोई पढ़ा-लिखा, सुन्दर नवजवान क्या किसी का खून करने वाली युवती से इतना प्रेम कर सकता है कि उससे विवाह करना चाहेगा, चाहे वह कितनी भी सुन्दर और सुशील क्यों न हो और चाहे वह खून उसने परिस्थिति से मजबूर हो कर ही किया हो? सोचूँ तो यह कुछ अविश्वास्नीय सी बात लगती है लेकिन धर्मेन्द्र और नूतन दोनों ही इस फ़िल्म में इतने अच्छे थे कि उसे विश्वास्नीय बना देते हैं।

अनुपमा (ऋषिकेश मुखर्जी, 1966)

उमा (शर्मिला टैगोर) को जन्म देते हुए उसकी माँ की मृत्यु हो गयी थी। इसी अपराध-बोध में पली-बड़ी हुई उमा चुपचाप रहने वाली अंतर्मुखी नवयुवती है। उसका विवाह एक अच्छे परिवार के युवक से तय हुआ है। बीमार पिता के साथ पहाड़ पर आयी उमा की मुलाकात आदर्शवादी कवि-लेखक अशोक (धर्मेन्द्र) से होती है, जो उमा की भावनाओं को समझता है। आखिर में उमा पिता के तय किये रिश्ते को छोड़ कर कम पैसे वाले अशोक को चुनती है।

इस फ़िल्म के सभी गाने बहुत सुंदर थे। उनमें से एक गीत, "या दिल की सुनो दुनिया वालों", अशोक के आदर्शवाद का घोषणापत्र है।

बहारें फ़िर भी आयेंगी (शाहिद लतीफ, 1966)

अखबार प्रकाशन जगत पर बनी इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर-नायक पहले गुरुदत्त थे, लेकिन उनकी आत्महत्या के बाद यह भाग धर्मेन्द्र को मिला। इसमें उन्होंने खान मजदूरों के शोषण के बारे में लिखने वाले आदर्शवादी पत्रकार जीतेन (धर्मेन्द्र) का भाग निभाया था। जिस अखबार के लिए वह काम करते हैं उसकी मालकिन अमिता (माला सिन्हा) उनसे प्रेम करने लगती हैं लेकिन जीतेन को उनकी छोटी बहन सुनीता (तनूजा) से प्रेम है।  

सत्यकाम (ऋषिकेश मुखर्जी, 1969)

सत्यकाम आचार्य (धर्मेन्द्र) अपने दादा जी (अशोक कुमार) के पास बड़ा हुआ है जिन्होंने उसे जीवन में हर हाल में सच बोलने और सच का साथ देने की शिक्षा दी है। सत्यकाम की मुलाकात रंजना (शर्मीला टैगोर) से होती है, जिसका बलात्कार हुआ है और वह गर्भवति है। सब कुछ जान कर भी वह उससे विवाह कर लेता है और उसके बेटे को अपना लेता है।

सच बोलने और घूस न लेने की आदतों की वजह से सत्यकाम को कार्यक्षेत्र में सफलता नहीं मिलती, उसके तबादले होते रहते हैं और उसके साथ काम करने वाले उससे चिढ़ते हैं लेकिन वह अपने आदर्श नहीं छोड़ता। टीबी से बीमार सत्यकाम की कम उम्र में मृत्यु हो जाती है।

मैंने यह फ़िल्म दिल्ली के पटेल नगर में 'विवेक' सिनेमा पर देखी थी और इसका मुझ पर गहरा असर पड़ा था। फ़िल्म के अंत के पास एक दृश्य है जिसमें सत्यकाम अस्पताल में भर्ती है, वह खाँसता है तो उसके रुमाल पर खून की बूँदें आ जाती हैं जिन्हें उसकी पत्नी देख लेती है और इस तरह से पति की गम्भीर परिस्थिति को समझ जाती है। इस दृश्य में धर्मेन्द्र की आँखों के भाव ने मेरे मन को छू लिया था। कुछ ऐसा ही एक दृश्य गुलज़ार की 'परिचय' फ़िल्म में भी था जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी थे, हालाँकि लोग संजीव कुमार को बेहतर अभिनेता मानते हैं, लेकिन मेरे विचार में उस भाव को दर्शाने में सत्यकाम के धर्मेन्द्र उनसे बेहतर थे।

नया ज़माना (प्रमोद चक्रवर्ती, 1971)

इस फ़िल्म की कहानी बिमल रॉय की 1945 की फ़िल्म 'हमराही' से मिलती-जुलती थी।

अनूप (धर्मेन्द्र) एक नये लेखक हैं जिन्होंने मजदूरों की यूनियन के संघर्ष पर "नया ज़माना" नाम की किताब लिखी है। अनूप को सीमा (हेमा मालिनी) से प्रेम है लेकिन सीमा के उद्योगपति भाई राजन/राजेन्द्र (प्राण) को यह रिश्ता स्वीकार नहीं। राजन उनके उपन्यास "नया ज़माना" को अपने नाम से छपवा लेते हैं और गरीबों के घर जलवा कर अनूप पर दोष लगवा देते हैं। सीमा अपने भाई से लड़ती है। इस फ़िल्म का गीत "नया ज़माना आयेगा", साम्यवाद और मज़दूर युनियनों के अधिकारों की बात करता है।

अंत में

इन फ़िल्मों के अतिरिक्त अन्य बहुत सी फ़िल्मों में धर्मेन्द्र ने आदर्शवादी, बौद्धिक, मध्यमवर्गीय पुरुषों के बाग निभाये थे जैसे कि आदमी और इन्सान, फागुन, इत्यादि।

मेरे विचार में उन्हें एक्शन हीरो की तरह अधिक देखा गया और उनकी अभिनय प्रतिभा को वह पहचान नहीं मिली जो मिलनी चाहिये थी।

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