सोमवार, जुलाई 20, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 15

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़े हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 15

मजूली द्वीप की यात्रा, असम, 3-4 मार्च 2026

 रात के दस बजे अचानक त्री के मोबाइल की घंटी बजी।

“काका, क्या हुआ?” उसने पूछा।

जगदीश बाबू ने पूछा, “तुम लोग कहाँ हो और यहाँ कब पहुँच रहे हो?”

“क्यों? हम लोग कोहोरा के पास हैं, आज रात को मरियानी पहुँच कर वहीं आसपास कहीं रुक जायेंगे, बहुत थक गये हैं। हम कल मजूली की फैरी पकड़ेंगे, दोपहर तक आप के यहाँ पहुँच जायेंगे।”

जगदीश बाबू ने उसे ताकानोरी की समाधी को खुदवाने की कोशिशों के बारे में बताया, बोले, “वह अपने कम्प्यूटर वाले लड़के सोमचाई को यहाँ छोड़ कर गया है। यह सोमचाई बुरा आदमी नहीं लगता। ताकानोरी कह रहा था कि वह नारायणपुर वापस जा रहा है लेकिन मेरे विचार में वह झूठ बोल रहा था, मुझे डर है कि वह यहीं कहीं, हमारे आसपास ही छुपा हुआ है और जैसे ही तुम यहाँ पहुँचोगे, वह तुम्हें पकड़ लेगा।"

त्री बोला, “आप चिंता नहीं कीजिये काका, वहाँ आने से पहले मैं आप को खबर कर दूँगा।"

उसके साथ बैठी आभा और पीछे बैठे बच्चे, सभी सो रहे थे लेकिन फोन की आवाज़ से आभा जाग गयी। जब उसने फोन बंद किया तो

वह धीरे से बोली, “वह जापानी नारायणपुर क्यों चला गया?”

त्री बोला, “मेरा ख्याल है कि उन्होंने जगदीश काका के मोबाइल में स्पाईवेयर लगाया है, जिससे वह लोग देख सकते हैं कि वह किसे फोन कर रहे हैं और उनकी बातें भी सुन सकते हैं। इसलिए सबसे पहले हमें इस मोबाइल के सिम-कार्ड को बदलना है।" उसने अपनी जेब से एक छोटा लिफाफा निकाल कर आभा की ओर बढ़ाया, बोला, “इसमें मोबाइल खोलने वाला पिन है और एक नया सिम-कार्ड है। उसे बदल दो और पुराने सिम को खिड़की से बाहर फ़ैंक दो।"

आभा ने मोबाइल को लिया और उसका सिम कार्ड बदलने लगी, तो त्री बोला, “मैंने काका से झूठ बोला है। हम लोग मरियानी नहीं रुकेंगे, आज रात को ही मजूली पहुँच जायेंगे। मेरे ख्याल में वह जापानी वहीं आसपास छुपा हुआ होगा और अपनी अन्वेषण-किरण से हमें खोजेगा, लेकिन हम उसके लिए तैयार होंगे।"

वह बोली, “तुम आज सुबह से लगातार गाड़ी चला रहे हो, हम लोग रास्ते में खाने के लिए भी बहुत थोड़ी देर के लिए रुके। हमने तो कुछ आराम किया है लेकिन तुम, क्या तुम्हें आराम भी बिल्कुल आवश्यकता नहीं है?”

त्री मुस्कराया लेकिन कुछ नहीं बोला।

वह लोग रात को साढ़े ग्यारह बजे के करीब गोसाईंगाँव के घाट पर पहुँचे। बच्चों को जगाने में कुछ समय लगा, त्री ने उन्हें पानी की बोतल दी और सबसे आँखो पर पानी के छींटें मारने के लिए कहा। कार को पार्किन्ग में छोड़ कर वह आगे पैदल ही बढ़े।

गुरु जी का पुराना नाववाला मछुआरा फरीद, अपनी नाव के साथ अँधेरे में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। जैसा उन्होंने पहले से निश्चित किया था, यह बताने के लिए कि वहाँ कोई खतरा नहीं है, वह मिसिन्ग भाषा में एक गीत गा रहा था, “ओकोल कापे दूदोने नो, केराद कमाइ मेमोदाग ...”।

उसके गीत की आवाज़ सुनते हुए, त्री उन्हें वहाँ तक ले आया। फरीद की नाव घाट पर तैयार खड़ी थी, और घाट खाली था। उसने उन्हें नाव में बिठाया और बिना आवाज़ किये, धीरे-धीरे चप्पु चलाते हुए, उसे ब्रह्मपुत्र नदी की धारा के बीच में ले आया।

आभा ने फुसफुसा कर त्री से पूछा, “यह आदमी ऐसे ही अँधेरे में नाव कैसे चलायेगा? कहीं फँस गये तो?”

त्री ने धीरे से उसका हाथ दबाया, कुछ बोला नहीं। गोसाईंगाँव से कमलाबाड़ी का फैरी टर्मिनल करीब दस किलोमीटर दूर था। त्री थका हुआ था, जल्दी ही आँखें बंद करके बैठे-बैठे सो गया। अँधेरे में बच्चे भी दोबारा सो गये। केवल आभा डरी हुई थी, वह जाग रही थी।

वह एक बार पहले भी मजूली आयी थी, जानती थी कि वहाँ नदी के बीच में बहुत सारे द्वीप हैं, जिनके आसपास पानी की गहराई कम हो जाती है और वहाँ पर नाव फँस सकती है। लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि नाव वाला फरीद वहीं पैदा हुआ है और बचपन से उसने वहाँ नाव चलाई है, वह रास्ते को अच्छी तरह से जानता है।

उन्हें मजूली पहुँचने में करीब तीन घंटे लगे। उन्हें कमलाबाड़ी उतार कर फरीद वहाँ रुका नहीं, त्री को नमस्कार करके तुरंत चला गया।

त्री ने गार्गी से कहा, “हमारी सबकी शक्ति-लहरों को ढक दो।"

गार्गी ने तुरंत सबकी शक्ति लहर को ढका, फ़िर बोली, “दादा, हम बहुत लोग हैं, मैं थक जाऊँगी, अधिक देर नहीं कर पाऊँगी।"

त्री बोला, “हमें थोड़ी देर के लिए ही चाहिये, केवल दस मिनट की बात है।" 

वह उन्हें घाट से कुछ दूर बामुनगाँव नामघर की ओर ले गया। नामघर के पीछे दो-तीन घर थे, उनमें से एक घर के दरवाज़े पर उसने तीन बार घंटी बजायी तो दरवाज़ा खुला। भीतर साड़ी पहने हुए एक लड़की खड़ी थी, उसने त्री को हाथ जोड़ कर नमस्ते की लेकिन कुछ नहीं बोली और उन्हें सीधा एक कोठरी में ले गयी, जहाँ पर नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ थीं। उसने उन्हें नीचे जाने का इशारा किया।

करीब चालिस सीढ़ियाँ थीं, नीचे जाते हुए त्री ने गार्गी से कहा, “अब हमारी शक्ति-लहरों को ढकने की आवश्यकता नहीं है।"

आभा ने पूछा, “ज़मीन की सतह के नीचे से शक्ति-लहर का पता नहीं चलता?” तो गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी।

नीचे तहखाने में बिजली लगी थी। एक ओर गुसलखाना और टॉयलेट बने थे, दूसरी ओर रसोई थी और बीच में दीवार के साथ तीन-टायर वाले रेलगाड़ी के डिब्बे जैसे बिस्तर लगे थे। बाकी सबको आराम करने के लिए कह कर, त्री, वसंत और माधव, वह तीनों कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर आधे रास्ते तक ऊपर आये। उन्हें ऊपर जाते देख कर आभा भी उनके पीछे ऊपर आयी।

वहाँ त्री ने वसंत से कहा, “कोशिश करके देखो कि क्या तुम बाहर के पेड़-पत्तों से बात कर सकते हो?”

वसंत ने एक मिनट आँखें बंद की, फ़िर सिर हिला कर मना किया, तो वह लोग कुछ अन्य सीढ़ियाँ चढ़ कर थोड़ा और ऊपर आये। वहाँ पहुँच कर वसंत ने फ़िर से आँखें बंद कीं और त्री से बोला, “दादा, यहाँ से मैं उनसे बात कर सकता हूँ।"

"पूछो कि मजूली में और हमारे आसपास कहीं पर कोई शक्ति-लहर दिख रही है?”

वसंत ने आँखें बंद कर लीं, कुछ देर के बाद आँखें खोल कर बोला, “वह कहते हैं कि दक्षिण में जहाँ पर मजूली द्वीप समाप्त होता है,

वहाँ पर नदी के दूसरी ओर छह-सात किलोमीटर दूर जा कर एक शक्ति-लहर दिखती है।"

त्री ने थोड़ी देर तक सोचा, फ़िर माधव को घुमाया और कहा, “सामने उस दिशा में देखो, यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर, तुम्हें वहाँ कोई शक्ति-लहर महसूस होती है?”

माधव ने भी कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद की फ़िर बोला, “नहीं दादा, मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखा।"

त्री बोला, “इसका मतलब है कि ताकानोरी ने ठीक कहा था, वह सचमुच नारायणपुर में ही है। दूसरी बात है कि उसकी शक्ति-लहर कमज़ोर है, क्योंकि वह माधव को यहाँ से नहीं दिखी। इसका मतलब है कि वह हमें इतनी दूर से नहीं खोज सकता, अवश्य कल हमें यहाँ पर खोजने आयेगा।" 

वह चारों नीचे लौट आये और त्री ने उन्हें भी सोने के लिए कहा। आभा चुपचाप, जिस बिस्तर पर तृप्ति सोई थी, उसके साथ जा कर लेट गयी। अपनी बेटी को खोने के बाद यह पहली बार थी कि वह किसी बच्चे के साथ इस तरह से बिस्तर पर लेटी थी। अचानक उसे अपनी बेटी की बहुत याद आयी और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। बहुत देर तक वह चुपचाप रोती रही, फ़िर उसे भी नींद आ गयी।

सुबह आठ बजे त्री ने सबको जगाया और मुँह-हाथ धो कर नाश्ता करने के लिए कहा। नाश्ते के लिए तहखाने की रसोई में केले, अनानास और पका हुआ कटहल रखे थे। जब सबने अपनी प्लेटों में नाश्ता ले लिया तो त्री बोला, “नाश्ते के बाद तीन लोग - मैं, रंगनाथ और गार्गी, हम गुरु जी के वृद्धाश्रम की जाँच करने जायेंगे। उनका आश्रम यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर है। मेरे विचार में उस जापानी की अन्वेषण-किरण केवल तीन-चार किलोमीटर की परिधि में काम करती है, लेकिन फ़िर भी वहाँ पहुँचते ही गार्गी करीब बीस-पच्चीस मिनट के लिए हमारी शक्ति-लहरों को ढक लेगी। वहाँ जाँच करके हम लोग शाम तक लौट आयेंगे।"

"और हम लोग? क्या हम सारा दिन इस तहखाने में बंद रहेंगे?”, आभा ने पूछा।

“तुम लोग यहीं रहोगे, पर मैं तुम्हें एक गुप्त रास्ता दिखाऊँगा, तुम लोग वहाँ से आसपास थोड़ा-बहुत घूम सकते हो, पर दूर नहीं जा सकते।"

आभा बोली, “अच्छा बताओ, रात को वसंत ने उस जापानी व्यक्ति की शक्ति-लहर को कैसे खोजा था?”

त्री ने उसे बताया कि पेड़-पौधे भी गुप्त-शक्ति की लहरों को महसूस कर सकते हैं और आपस में संदेश भेज सकते हैं। इस तरह से वसंत चाहे तो उसे पेड़ों से, बहुत दूर की खबरें भी आसानी से मिल जाती हैं। उसने अपना मोबाइल निकाल कर उस पर गूगल मैप खोला और मजूली द्वीप के दक्षिणी भाग को आभा को दिखाया, बोला, “हमें यहाँ जाना है, गुरु जी का वृद्धाश्रम वहीं है। वह जापानी नदी के दूसरे ओर, उनके आश्रम से करीब छह-सात किलोमीटर दूर है, वहाँ हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।"

आभा ने थोड़ी देर सोचा, फ़िर पूछा, “रात को तुमने माधव से भी आँखें बंद करके शक्ति-लहर को देखने के लिए कहा था?”

“क्योंकि माधव की दो दृष्टि-शक्तियाँ है, वह अपनी आँखों से और मन की आँखों से, दोनों से दस-बारह किलोमीटर की दूरी तक देख सकता है। शक्ति-लहरों से एक विशेष तरह का प्रकाश निकलता है, वह उसे पहचान लेता है। वैसे तो वह जापानी बहुत दूर है, इसलिए मुझे पता था कि माधव को उसकी शक्ति-लहर नहीं दिखेगी, लेकिन मैंने उससे यह इस लिए पूछा था ताकि हमें डबल पक्का हो जाये कि आसपास हमें खोजने वाला कोई नहीं है।"

आभा बोली, “यह शक्ति वाली बातें मेरे लिए नयी हैं, इन्हें समझने में मुझे कुछ समय लगेगा।"

कुछ देर बाद त्री ने उससे पूछा, “जब तुम सोने गयीं थीं, उस समय कुछ हुआ था?”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने देखा कि अचानक ही फर्श पर चिलचट्टे, कानखजूरे, बिच्छू, छिपकलियाँ, आदि जीव-जन्तु निकल आये, और वह सब तुम्हारे बिस्तर के आसपास घूम रहे थे। मुझे लगा कि वह तुम्हारी पहरेदारी कर रहे हैं। थोड़ी देर के बाद शायद तुम सो गयीं और वह सभी अपने बिलों में वापस लौट गये। जब वह दिखते हैं तो मुझे पता चल जाता है कि तुम्हारी शक्ति जागृत है।"

उसकी बात सुन कर आभा कुछ देर तक सोचती रही, फ़िर रुँधे स्वर में बोली, “बेटी खोने के बाद आज पहली बार एक छोटी बच्ची के साथ इस तरह से लेटी थी, इसलिए उसकी याद आ गयी तो मुझे रोना आ गया।"

त्री सोचता हुआ बोला, “इसका मतलब है कि जब तुम्हारे मन में भावनायें तीव्र होती हैं, तब तुम्हारी शक्ति आपने आप जागृत हो जाती है।"

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अगला अध्याय सोमवार 20 जुलाई को पढ़ सकेंगे

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गुरुवार, जुलाई 16, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 14

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोद कर भीतर देखना चाहता है। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़ते हैं। इसके आगे पढ़िये ...

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अध्याय 14

 मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026 रात्रि

शाम को जामुन बाबा की समाधी को देखने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कम हो गयी। जब सूरज डूबा और श्रद्धालु चले गये तो वृद्धाश्रम के द्वार बंद हो गये।

ताकानोरी ने पहले से ही बाबा की समाधी को खुदवाने के लिए मजदूर बुलवा लिये थे।

जगदीश बाबू ने एक बार फ़िर उसे रोकने की कोशिश की, बोले, “आपने देखा कि आज कितने लोग उनकी समाधी पर प्रार्थना करने आये? बाबा को यहाँ के लोग बहुत मानते हैं। कल उन्हें पता चलेगा कि किसी ने उनकी समाधी को तोड़ा है तो वह बहुत गुस्सा होंगे और यहाँ दंगा भी हो सकता है।"

ताकानोरी बोला, “मुझे वार्निन्ग देने के लिए धन्यवाद। उसे खोद कर, भीतर देख कर, हम उसे बंद कर देंगे, और यह सारा काम रातों-रात पूरा हो जायेगा। कल किसी को पता नहीं लगना चाहिये कि हमने समाधी को खोदा है। ध्यान रहे कि अगर यह खबर बाहर फ़ैली तो सबसे पहले मैं तुम्हारी गर्दन काट कर, तुम्हारे सिर को गेट पर टाँग दूँगा।"

उन्होंने आठ मजदूर बुलाये थे। जब बटेर ने उन्हें बताया कि क्या काम करना है तो उन्होंने तुरंत मना कर दिया, बोले कि उन्हें पैसे नहीं चाहिये, वह यह काम नहीं कर सकते।

ओरी वहीं खड़ा था, उसने अपनी कताना तलवार निकाल ली, बोला, “जो यह काम नहीं करेगा, मैं  उसे काट कर यहीं गड़वा दूँगा, तब तुम अपने बाबा जी के साथ रह कर, हमेशा के लिए उनकी सेवा करते रहना।"

बटेर, लक्की और मटरू ने पिस्तौलें निकाल लीं और मजदूरों को घेर लिया। डरे हुए मजदूरों ने आखिर में फावड़े उठा लिये। सबसे पहला काम था समाधी वाली जगह से काला पत्थर हटाना। उस पत्थर को मजदूरों ने एक दिन पहले ही वहाँ रखा था, उसे हटाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये थी, लेकिन बहुत मेहनत के बाद भी, मजदूर उसे अपनी जगह से नहीं हिला पाये।

बटेर ने मटरू को इशारा किया, कहा, “यह सब लोग बेकार की ड्रामेबाजी कर रहे हैं। तुम वह लोहे का सरिया ले कर उसे इस पत्थर की साईड में घुसा दो, जब उस पर जोर लगायेंगे तो यह पत्थर आराम से ऊपर उठ जायेगा।"

मटरू ने लोहे का नुकीली नोक वाला सरिया लिया और जहाँ पत्थरों में जोड़ था, उस पर हथौड़े मार कर उसे वहाँ घुसाने की कोशिश की। पता नहीं कैसे, पत्थर का एक टुकड़ा टूट कर सीधा बटेर की बायीं आँख में लगा और उसे चीरता हुआ आँख के भीतर घुस गया। बटेर के हाथ से पिस्तौल छूट कर नीचे गिरी और चीख मार कर उसने हाथों से अपनी आँख को ढकने की कोशिश की, कुछ क्षणों में उसका हाथ और चेहरा उसके खून से सन गये।

जब उसकी पिस्तौल नीचे गिरी तो फर्श के पत्थर से टकरा कर उसका ट्रिगर चल गया और गोली निकल कर मटरू के दायें पैर में जा लगी। गालियाँ देते हुए मटरू वहीं पैर पकड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ से लोहे का सरिया छूट कर गिर गया।

ओरी बहुत गुस्सा हुआ, बोला, “तुम लोग आदमी हो या जोकर? एक छोटा सा काम करने में तुम लोगों ने यह क्या तमाशा लगाया है?”

जगदीश बाबू बोले, “समाधी-स्थल पर खुदाई की कोशिश करके तुमने घोर पाप किया है, इसीलिए आज यहाँ पर इतना खून बहा है। अभी भी समय है, मैं कहता हूँ कि तुम लोग रुक जाओ।"

मटरू चिल्लाया, “हमें डॉक्टर की ज़रूरत है, अस्पताल जाना है, एम्बुलैंस को बुलाओ।"

उधर बटेर "हाय, हाय" करके चिल्ला रहा था। जगदीश बाबू ने उसका हाथ हटा कर उसकी आँख को देखा, वह पत्थर उसकी आँख के भीतर घुसा हुआ था। वह बोले, “इसकी यह आँख तो पूरी नष्ट हो गयी है, इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। हमारा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, कमलाबाड़ी सत्र के पास है, यहाँ से बीस-बाईस किलोमीटर का रास्ता होगा, वहाँ पहुँचने में कम से कम घंटा-डेढ़ घंटा लगेगा। बीच में कुछ रास्ता कच्ची सड़क का है और अँधेरे में वहाँ जाना आसान नहीं होगा।"

बटेर को चक्कर आ रहे थे, वह बेहोश सा हो कर ज़मीन पर लेट गया। उसकी आँख से खून बहना नहीं रुका था और वह खून उसके सिर के आसपास जमा हो रहा था।

मटरू के पैर के आसपास भी फर्श खून से लाल हो गया था, वह ज़मीन पर बैठ कर चिल्ला रहा था। लक्की उनके पास खड़ा था, उसे गुस्सा आ गया, वह ताकानोरी से बोला, “अरे, इनके लिए कुछ करो, तुम इंसान हो या हैवान?”

ओरी को समझ नहीं आया कि उसने क्या कहा, लेकिन उसके बोलने के अन्दाज़ से समझ गया कि वह अपने साथियों के लिए मदद माँग रहा है, बोला, “यह सब तुम लोगों की लापरवाही से हुआ है, अब तुम उसका फ़ल भुगतो।"

जगदीश बाबू बोले, “आप की कार में इन्हें अस्पताल भेज देते हैं, बेचारे बहुत पीड़ा में हैं।”

ओरी बोला, “मेरी कार में नहीं, इन्हें अस्पताल ले जाने के लिए किसी दूसरी गाड़ी का प्रबंध करो।" फ़िर मजदूरों से बोला, “इन दोनों आदमियों को उठा कर उधर किनारे पर बिठा दो, और तुम उस पत्थर को हटाओ।"

जगदीश बाबू को मालूम था कि फुलानीबाड़ी के स्कूल के करीब एक आदमी आटोरिक्शा चलाता है, उन्होंने उसे बुलाने के लिए अपने एक व्यक्ति को भेजा।

बटेर और मटरू के घायल होने से मजदूर और भी डर गये थे, ओरी के कहने के बाद भी वह अपनी जगह से नहीं हिले, बल्कि अपने फावड़े वहीं रख कर वे वहाँ से जाने लगे।

ओरी गुस्से में आग-बबूला हो गया, उसने पिस्तौल निकाल ली और मजदूरों की ओर निशाना लगाते हुए बोला, “एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हें भून कर रख दूँगा।"

जगदीश बाबू ने पास जा कर उसे धीरे से कहा, “गोलियाँ चलीं तो शोर होगा और आसपास के घरों से लोग यहाँ आ जायेंगे। कितनों को मारेंगे? कल सुबह तक यह बात सारे मजूली द्वीप में फ़ैल जायेगी और लोग डँडे-हँसली-छुरी-चाकू जो मिलेगा, उसे ले कर तुमसे लड़ने आ जायेंगे, तो क्या तुम पाँच सौ लोगों का सामना कर पाओगे? और उसके बाद तुम यहाँ से जीवित निकल पाओगे?”

मजदूर चले गये और ओरी वहाँ पर हाथ मसलता हुआ खड़ा रह गया। थोड़ी देर में फुलानीबाड़ी से आटो वाला आ गया तो लक्की अपने दोनों साथियों को उसमें बिठा कर उन्हें कमलाबाड़ी के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में ले गया।

सोमचाई ने यह सारा तमाशा दूर से देखा। जब उसे लगा कि ओरी कुछ शाँत हुआ है तो वह उसके पास आया, बोला, “आप तलवार और बंदूक, सब कुछ चला सकते हैं, लड़ भी सकते हैं, लेकिन मुझे तो सिर्फ कम्प्यूटर का काम आता है। मैंने जीवन में कभी किसी से लड़ाई नहीं की। अब हम यहाँ अकेले रह गये हैं, हमें आगे का भी सोचना होगा। यहाँ के लोगों से बात करने के लिए हमारे पास स्थानीय आदमी होने चाहियें।”

ओरी सोच में पड़ गया, बोला, “ठीक है, मैं फोन करके कुछ और आदमी बुलाता हूँ।" उसे चिंता होने लगी कि जब वह यह बातें रिकू यामागुचि को बतायेगा तो वह बहुत गुस्सा होगा कि क्या वह एक पत्थर भी नहीं हटवा पाया? अंत में उसने सोचा कि वह रिकू को कुछ नहीं बतायेगा। वह बोला, “लेकिन यहाँ से जाने से पहले, मैं इस पत्थर को हटाना चाहता हूँ।"

जब ओरी ने आगे बढ़ कर ज़मीन से लोहे का सरिया उठाया तो उस पर मटरू का खून लगा हुआ था।

जगदीश बाबू बोले, “आप ने देखा कि जिसने भी बाबा की समाधी की मर्यादा भंग करने की कोशिश की, उनका क्या हुआ? फ़िर भी आप नहीं समझे? आप क्यों अपनी जान को खतरे में डालना चाहते हैं?”

ओरी ने यह दिखाने के लिए कि उसे इन अँधविश्वासों की बिल्कुल परवाह नहीं है, हथोड़ा उठा कर उससे सरिये को पत्थरों के बीच में घुसाने के लिए मारने लगा। शायद उस पर लगे खून की वजह से सरिया चिकना हो गया था और फिसल रहा था, या शायद उसने हथोड़ा ठीक से नहीं मारा। जो भी कारण था, वह सरिया पत्थरों के बीच में जाने के बजाय, फर्श की सतह पर फ़िसल गया और ताकानोरी भी उसके पीछे फिसल कर गिरा। वैसे उसे कहीं विशेष चोट नहीं लगी लेकिन उसे गिरा हुआ देख कर जगदीश बाबू और सोमचाई हँसने लगे।

जगदीश बाबू बोले, “साहिब, अभी भी मान जाईये। जब तक बाबा खुद नहीं चाहेंगे, आप उनकी समाधी में बाधा नहीं डाल सकते।"

ओरी को बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका मन किया कि वह जगदीश बाबू और सोमचाई, दोनों के सिर अपनी तलवार से काट दे, लेकिन उसने आत्मसंयम दिखाते हुए अपने गुस्से को दबाया और उठ कर खड़ा हुआ। सोमचाई से बोला, “वह स्कूल के लड़कों वाले वीडियो जो तुमने मुझे दिखाये थे, मैं उन्हें दोबारा देखना चाहता हूँ।"

सोमचाई ने तुरंत मोबाइल निकाल कर एक वीडियो को खोला और उसे दिखाया। ओरी ने उसे तीन-चार बार देखा, फ़िर एक जगह पर उसे रोक कर सोमचाई को दिखाया, बोला, “वह बाबा जब समाधी के लिए जा रहा था तो उसके कटोरे में एक मूर्ति थी, वह इस वीडियो में दिखती है, तुम बताओ कि वह कितनी बड़ी है?”

सोमचाई ने वीडियो को ध्यान से देखा, उसमें कटोरे में रखी मूर्ति साफ दिख रही थी। वह बोला, “उनके हाथों के आकार से तुलना करें तो वह तीन-साढ़े तीन इँच की लगती है।"

ओरी बोला, “यह वह प्रतिमा नहीं है, जो यामागुचि को चाहिये। जो हमें चाहिये, वह प्रतिमा आठ-साढ़े आठ इँच से बड़ी होनी चाहिये। यानि वह उसे अपने साथ समाधी में ले कर नहीं गया।"

जगदीश बाबू ने उनकी बातें सुनी तो मन ही मन मुस्कराये, लेकिन उन्होंने अपनी खुशी को चेहरे पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।

ताकानोरी बोला, “इस समय यहाँ रुकने से मेरा कुछ फायदा नहीं है। बाबा का उत्तराधिकारी कल यहाँ पहुँचेगा। सोमचाई, तुम यहाँ रुको और जब वह आये तो मुझे खबर करो॑। मैं आज रात को ही नारायणपुर लौट जाता हूँ, वहाँ से अन्य आदमियों का प्रबंध भी करूँगा।"

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सोमवार, जुलाई 13, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 13

अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और वह जामुन बाबा को खोज रहा है क्योंकि उसे उनकी शक्ति वाली हरित तारा की मूर्ति चाहिये। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आया है और वहाँ लोगों को जान से मार देने की धमकी दे कर उनसे बाबा के बारे में पूछता है। जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, त्रिनेत्र, आभा और पाँचों बच्चे गँगटोक से मजूली द्वीप की यात्रा पर निकलते हैं। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 13

असम यात्रा, 3 मार्च 2026

गार्गी ने आभा से पूछा, “दीदी, मणिपुर कैसी जगह है? आप इम्फाल में रहती हैं?”

“बहुत सुंदर है हमारा मणिपुर", आभा बोली, “लेकिन मैं इम्फाल में नहीं रहती। इम्फाल हमारी राजधानी है, बड़ा शहर है। उसके दक्षिण में एक झील है, लोकटक झील, वह बहुत सुंदर जगह है। मैं उस झील के पास एक गाँव में रहती हूँ, थमनापोकपी गाँव, वहाँ मेरे पति का पुराना घर है।"

तृप्ति बोली, “और आप के घर में कौन-कौन हैं?”

आभा की आँखें अचानक नम हो गयीं, धीरे से बोली, “बस मैं हूँ, मेरे ससुर हैं और हमारा कुत्ता है, डब्लयू। वैसे उसका नाम विलसन है लेकिन मेरे पति उसे डब्लयू बुलाते थे।"

त्री ने बात बदलने के लिए पूछा, “मणिपुर के अपने जीवन के बारे में कुछ और बताओ, हम वहाँ के बारे में कुछ नहीं जानते।"

वह बोली, “हमारा परिवार मैतेई है। हमारे मैतेई लोगों में सात वंश हैं, हमारी भाषा में उन्हें सालाई कहते हैं, जैसे कि खुमान, मैरंग, अंगोम, वगैरा। मैं मैरंग सालाई में पैदा हुई थी और मेरे पति का परिवार खुमान सालाई की ओइनम जाति का है। खुमान को ऊँची सालाई मानते हैं। हम लोगों के प्राचीन पाराम्परिक विश्वास को सनमही कहते हैं क्योंकि हम सनमही देवता को बहुत मानते हैं, जोकि हमारे सृष्टि देवता सिदाबा मापू के बेटे हैं। चार-पाँच सौ साल पहले मणिपुर में वैष्णव धर्म आया और फ़ैल गया। इस तरह से हमारे परिवार में हम वैष्णव और सनमही दोनों को मानते हैं।"

त्री बोला, “मेरे गुरु जी कहते हैं कि हमारे देशों में धर्म ऐसे ही बनते-बदलते हैं, कि नयी सोचें आती हैं और पुरानी सोच में घुल-मिल जाती है, फ़िर समय के साथ दोनों के देवी-देवता भी घुल-मिल जाते हैं। उनके कोरिया देश में पहले सिन्दो धर्म था, जिसमें मानते हैं कि प्रकृति, पहाड़, नदी, आकाश, सब में आत्मा होती है। फ़िर जब वहाँ पर बौद्ध धर्म आया तो सिन्दो और बौद्ध, वह दोनों विचार घुल-मिल गये। वैसे तो मेरे गुरु जी बौद्ध भिक्षुक हैं पर भारत आने के बाद, वह शिव-भक्त भी बन गये।"

आभा बोली, “जब मैं चित्र बनाती हूँ, तो उसमें वैष्णव और सनमही देवी-देवता मिला कर बनाती हूँ।"

गार्गी ने पूछा, “सनमही देवता कैसे होते हैं?”

आभा मुस्करायी, बोली, “यह तो देवी-देवता पर निर्भर करता है। जैसे कि पखांगबा को भूरे रंग के सींग वाले हिरण के रूप में दिखाते हैं। एक बार सिदाबा मापू ने अपने बेटों, सनमही और पखांगबा को ब्रह्माँड का चक्कर लगाने के लिए कहा तो सनमही सचमुच पूरी दुनिया का चक्कर लगाने चला गया, जबकि पखांगबा ने पिता के सिंहासन का चक्कर लगाया और बोला कि यही मेरा ब्रह्माँड है।"

त्री बोला, “बिल्कुल यही कहानी शिव जी और उनके दोनों पुत्रों, कार्तिकेय और गणेश की भी है। उसमें कार्तिकेय सारी दुनिया का चक्कर लगाने निकल जाते हैं, जबकि गणेश जी केवल अपने माता-पिता की परिक्रमा करते हैं। गुरु जी भी यही कहते हैं कि जब हमारे धर्म मिलते हैं, तो उनकी कहानियाँ भी आपस में मिल जाती हैं।"

इसी तरह बातें करते हुए उनका रास्ता कट रहा था और वे लोग अलीपुर द्वार से हो कर भाटीबाड़ी पहुँच गये। वहाँ त्री ने एक ढाबे पर कार रोकी, बोला, “असम सीमा यहाँ से करीब तीस किलोमीटर आगे है, हम यहाँ पर थोड़ी देर ही रुकेंगे। अगर हो सके तो मैं आज रात तक जोरहाट पहुँचना चाहता हूँ।"

वहाँ से खाना खा कर वह लोग चलने ही वाले थे कि जगदीश बाबू का फोन आया, बोले, “त्री बेटा, तुम कहाँ पहुँचे हो? आज सुबह जामुन बाबा को खोजते हुए यहाँ कुछ बुरे आदमी आये हैं। उनका सरदार ताकानोरी नाम का एक जापानी है। उन्होंने हमारे साथ मार-पिटाई की और आज रात को वह बाबा की समाधी खोदने का प्लैन बना रहे हैं। जो चिट्ठी बाबा ने तुम्हारे लिए छोड़ी थी, वह उन्होंने ले ली है। वह जानते हैं कि तुम आ रहे हो और वे तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में हैं।"

त्री बोला, “काका, आप हमारी चिंता नहीं करें और वह जो चाहते हैं उन्हें करने दीजिये, आप बीच में नहीं पड़िये, समझे? आप सावधान रहिये, और जब तक कोई एमरजैंसी न हो मुझे दोबारा टेलीफोन न करें।"

जब उनकी बात खत्म हुई तो रंगनाथ ने पूछा, “दादा, उन लोगों से लड़ने के लिए हमारा क्या प्लैन है?”

“ताकानोरी के पास गुप्त-शक्तियाँ हैं। एक तो अन्वेषण-किरण है जिससे वह आसपास लोगों की शक्ति-लहरों को खोज सकता है। उसकी और कौन सी शक्तियाँ हैं, हमें नहीं मालूम। सबसे पहले हमें यह समझने की कोशिश करनी है कि उसकी शक्तियाँ कौन सी हैं, लेकिन हमें होशियार रहना पड़ेगा क्योंकि वह अन्वेषण-किरण से हमें पहचान सकता है।"

“अन्वेषण-किरण कैसे काम करती है?” वसंत ने पूछा।

“हमारी कुछ शक्तियाँ हर समय जागृत रहती हैं, जैसे माधव की दृष्टि-शक्ति और रंगनाथ की श्रवण-शक्ति। लेकिन कुछ शक्तियों को ध्यान लगा कर जगाना पड़ता है, वह हमेशा काम नहीं करतीं, जैसे मेरी गिरगिट-शक्ति और गार्गी का अजगर-पाश। अन्वेषण-किरण भी हमेशा काम नहीं करती, उसे जगाना पड़ता है।"

गार्गी बोली, “जैसे मैं लोगों के दिमाग में घुस कर देख सकती हूँ कि वह क्या सोच रहे हैं, क्या अन्वेषण-किरण भी वैसी ही होती है?”

"मेरे विचार में तुम्हारी और उसकी शक्ति भिन्न हैं। तुम लोगों के विचार पढ़ सकती हो, जबकि अन्वेषण-किरण से शक्ति वाले लोगों को खोज सकते हैं, लेकिन वह उनके विचार नहीं पढ़ सकते", त्री बोला, “लेकिन मुझे इसका पक्का पता नहीं है, हमें इसकी जाँच करनी होगी।"

गार्गी बोली, “इसका मतलब है कि हमें अपनी शक्ति-लहरों को ढक कर रखना होगा।"

आभा बोली, “मेरी जीवों को आकर्षित करने वाली शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई है, लेकिन मैं सोते-सोते भी दूर से लोगों की बातें सुन सकती हूँ। अगर मैं किसी बहाने से उसके पास जाऊँ तो शायद वह मुझे न पहचाने और मैं उसकी बातें सुन सकती हूँ?”

त्री, रंगनाथ और गार्गी, तीनों एक साथ बोले, “हम आप को खतरे में नहीं डाल सकते। अगर उसने आप को पकड़ लिया तो?”

तृप्ति बोली, “मैं और माधव, आभा दीदी के बच्चे बन कर इनके साथ जा सकते हैं। मेरी शक्तियाँ भी ठीक से विकसित नहीं हुईं लेकिन जरूरत पड़ने पर मैं कुछ देर के लिए अपनी और इनकी शक्ति-लहरों को ढक सकती हूँ।"

गार्गी बोली, “लेकिन माधव की शक्तियाँ विकसित हैं, तुम्हारे लिए उसे छिपाना कठिन होगा।"

तृप्ति बोली, “तो मैं और आभा दीदी, हम दोनों माँ-बेटी बन कर थोड़ी देर के लिए उनके पास जायेंगी और उनकी बातें सुन कर वापस लौट आयेंगीं?”

त्री बोला, “नहीं, ताकानोरी मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। उसे पता नहीं है कि हम सब के पास शक्तियाँ हैं। यह हमारा रहस्य ही हमारा गुप्त-शस्त्र है, उसे इसका पता नहीं चलना चाहिये।"

गार्गी बोली, “वहाँ जा कर हम कहाँ रहेंगे? अगर उसके आसपास रहेंगे तो वह हमें खोज नहीं लेगा?”

त्री बोला, “तुम उसकी चिंता नहीं करो, हमारे लिए वहाँ एक छिपने की जगह है। अब तुम सभी थोड़ी देर सोने की कोशिश करो। हम लोग वहाँ पर कल सुबह के तीन-चार बजे से पहले नहीं पहुँचेगे, और वहाँ हमें लड़ने के लिए सतर्क और तैयार रहना है, इसलिए तुम इस समय जितना आराम करोगे उतना बेहतर होगा।"

वसंत बोला, “दादा, उन्होंने टेलीफोन पर कहा था कि गुँडे आज रात को गुरु जी की समाधी को खोदेंगे, हम उसे कैसे रोकेंगे?”

“तुम उसकी चिंता नहीं करो", त्री मुस्कराया, “गुरु जी में बहुत शक्ति है, वह अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं।"

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गुरुवार, जुलाई 09, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 12

अब तक की कहानी: ताकानोरी ने जामुन बाबा को खोज लिया था, लेकिन उससे बचने के लिए बाबा ने जीवित समाधी ले ली थी। गँगटोक से त्रिनेत्र अपने साथ पाँच बाल-तिरंगा यौद्धाओ को साथ ले कर बाबा की रक्षा के लिए मजूली के वृद्धाश्रम में जाने के लिए निकल चुका है, उनके साथ आभा भी आ रही है। इधर ताकानोरी ने बाबा के वृद्धाश्रम का पता लगा लिया और वहाँ पर अपने साथी सोमचाई और 3 गुँडों के साथ वहाँ पहुँच गया है। ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली हरित तारा की मर्ति खोजनी है। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 12

मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026

आश्रम के दफ्तर का द्वार खुला था लेकिन भीतर कोई नहीं था, सब लोग बाहर मैदान में थे।

जगदीश बाबू वहाँ पास में खड़े थे, उन्होंने ताकानोरी और उसके आदमियों को दफ्तर में जाते देखा तो वह उनके पीछे-पीछे आये, बोले,

“अगर आप को जामुन बाबा की समाधी देखनी है तो बाहर कतार में खड़ा होना पड़ेगा, यहाँ वृद्धाश्रम में आप को कुछ नहीं मिलेगा।"

ओरी ने अंग्रेज़ी में पूछा, “यह बाबा आश्रम में कहाँ रहते थे? हम उनका कमरा देखना चाहते हैं।"

जगदीश बाबू के माथे पर बल पड़ गये, बोले, “बाहर के लोगों को वहाँ जाने की अनुमति नहीं है।"

बटेर ने आगे बढ़ कर जगदीश बाबू के कँधे पर ज़ोर से हाथ मारा, बोला, “बुढ़ऊ, जिन्दा रहना है या नहीं? साहिब जो पूछें उसका सीधा जवाब दो, वरना ऐसा झापड़ दूँगा कि तुम्हारी नकली बतीसी मुँह से निकल कर तुम्हारे हाथ में आ जायेगी।"

शोर सुन कर बाहर से दो अन्य वृद्ध वहाँ आये, एक पुरुष और एक स्त्री। उन्होंने बटेर को जगदीश बाबू को मारते देखा तो दरवाज़े से चिल्लाये, “कौन हो तुम? क्या कर रहे हो? जगदीश बाबू को हाथ मत लगाओ।"

ओरी ने बटेर को इशारा किया तो वह पीछे हट गया, उसने दोबारा पूछा, “उनका कमरा कौन सा है?”

जगदीश बाबू के उसे घूर कर देखा, कुछ उत्तर नहीं दिया। ताकानोरी के इशारे पर बटेर ने जगदीश बाबू को चटाक से एक थप्पड़ मारा, वह लड़खड़ा कर वहीं गिर पड़े और उनकी नाक से खून बहने लगा, उनकी ऐनक दूसरी ओर गिरी, पर सौभाग्यवश टूटी नहीं।

ताकानोरी के इशारे पर लक्की और मटरू दरवाज़े पर खड़े लोगों के पास गये, बोले, “बाहर से आश्रम के सभी लोगों को यहाँ बुलाओ, हमें तुम सबसे बात करनी है।"

बटेर ने जगदीश बाबू की गर्दन से उनका कुर्ता पकड़ कर उठाया और एक कुर्सी पास खींच कर उन्हें बैठा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, अगर आज तुम्हें अपने जामुन बाबा से मिलने स्वर्ग लोक जाने की जल्दी नहीं हो, तो साहब जो पूछें उसका सीधा और तुरंत जवाब चाहिये। ज़्यादा चालाकी दिखाओगे तो साहिब मुँडी काट कर हाथ में थमा देंगे।"

जगदीश बाबू फ़िर भी कुछ नहीं बोले और उसे घूरते रहे। ताकानोरी ने लम्बी साँस ली और वह भी एक कुर्सी पर बैठ गया।

केवल सोमचाई नहीं बैठा, उसने आगे बढ़ कर ज़मीन से जगदीश बाबू की ऐनक उठा कर उन्हें दी, फ़िर वहीं पीछे जा कर खड़ा हो गया। वह कम्प्यूटर का काम करता है, उसने कभी मारा-मारी नहीं की है और जगदीश बाबू की नाक से बहता खून देख कर उसका जी घबराने लगा था। उन्हें एक बूढ़े आदमी को इस तरह से मारते देख कर भी उसे धक्का लगा था।

धीरे-धीरे आश्रम के सभी वृद्ध उस कक्ष में आ कर इक्ट्ठे हो गये। बटेर ने पूछा, “यहाँ कितने लोग रहते हैं?”

एक वृद्धा बोली, “सतरह औरतें और सात आदमी, हम कुल चौबीस लोग और हमारे संचालक, जगदीश बाबू, पच्चीस।"

बटेर ने कमरे में एकत्रित लोगों को गिना, बोला, “फ़िर यहाँ पर सत्ताईस लोग कैसे हैं?”

एक बूढ़ा आदमी बोला, “मुझसे मिलने मेरी बेटी और नाती बाहर से आये हैं", उसने एक युवती और एक किशोर की ओर इशारा किया।

उनका नाती चौदह-पंद्रह साल का लगता था। बटेर ने इशारा करके उसे आगे बुलाया और उसके कँधे पर हाथ रख लिया, बोला, “हमारे पास टाईम कम है, इसलिए साहिब जो पूछेंगे, उसका ठीक से जवाब दो। अगर सही जवाब नहीं मिलेगा तो मैं इस लड़के को मार डालूँगा, समझे?”

कक्ष में सन्नाटा छा गया। उस लड़के के नाना बोले, “मेरे बच्चे को जाने दो। यह लोग यहाँ नहीं रहते, इन्हें कुछ नहीं मालूम, मारना है तो मुझे मारो।"

बटेर ने कुछ उत्तर नहीं दिया, बस अपना हाथ कँधे से उठा कर उस लड़के को सिर के बालों से पकड़ लिया और दूसरे हाथ में खुला हुआ रामपुरिया चाकू निकाल कर, उसे उसके गले के साथ सटा दिया।

ओरी मुस्कराया और बोला, “यह बाबा कहाँ रहते थे? उनका कमरा किधर है?”

इस बार जगदीश बाबू ने काँपती आवाज़ में उत्तर दिया, बोले, “आश्रम के गेट के बाहर, बायीं ओर पेड़ों के बीच में उनका घर है।"

ओरी के इशारे पर लक्की और मटरू, बाबा का घर खोजने गये।

ताकानोरी बोला, “समाधी के पास जो मन्दिर है, वहाँ पर तारा माँ की सफेद और हरी, दो रंगों की मूर्तियाँ लगीं हैं। मैं वैसी ही एक विशेष हरी मूर्ति खोज रहा हूँ। क्या बाबा के पास ऐसी कोई विशेष मूर्ति थी?”

“माँ तारा की मूर्तियाँ?”, एक वृद्धा बोली, “वे तो यहाँ आश्रम में हर जगह मिलेंगीं। उनमें विशे़ष कौन सी है, यह तो भगवान जानें। बाबा ने जब समाधी ली, तब भी उनके हाथ में एक कटोरा था जिसमें हरे रंग की माँ तारा की मूर्ति थी।"

जगदीश बाबू बोले, “जामुन बाबा को माँ तारा की मूर्तियों से बहुत प्रेम था, यहाँ पर वैसी बहुत सी मूर्तियाँ मिलेंगीं। लेकिन उनमें कोई विशेष मूर्ति हमें नहीं मालूम।"

ओरी ने आँखें बन्द कर लीं और अपनी अन्वेषण-किरण से धीरे-धीरे सारे वृद्धाश्रम का निरीक्षण किया लेकिन उसे वहाँ शक्ति लहर का स्पंदन महसूस नहीं हुआ। इसका मतलब है कि बाबा ने वह मूर्ति वृद्धाश्रम के भीतर नहीं है, शायद उसे बाहर कहीं छिपाया गया है या वह धरती के नीचे गहरी दबी हुई है, जहाँ उसकी अन्वेषण-किरण नहीं पहुँच रही। शायद बाबा ने उस मूर्ति के साथ समाधी ली है और अगर ऐसा है तो उन्हें उनकी समाधी को खोदना पड़ेगा?

उसने पूछा, “बाबा ने समाधी लेने से पहले क्या किसी के लिए कुछ निर्देश छोड़े?”

“कैसे निर्देश?” जगदीश बाबू को उसका प्रश्न समझ नहीं आया।

"किसी के लिए कोई कागज़, चिट्ठी या संदेश?”

जब जगदीश बाबू ने उत्तर नहीं दिया तो ओरी के इशारे पर बटेर ने फ़िर से चाकू निकाल कर लड़के के गले से सटा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, सोच लो, जवाब नहीं दोगे तो इसकी गर्दन काट दूँगा, फ़िर मत रोना।"

जगदीश बाबू को झुरझुरी सी आयी, घबरा कर बोले, “एक चिट्ठी दी है, त्रिनेत्र के नाम है।"

“त्रिनेत्र कौन है?”

"उनका शिष्य और उत्तराधिकारी, वह यहाँ नहीं रहता।"

“चिट्ठी दिखाओ।"

जगदीश बाबू लड़खड़ाते हुए अपनी कुर्सी से उठे, बोले, “मेरे दफ्तर में रखी है, मैं ले कर आता हूँ।"

ताकानोरी ने सोमचाई को उनके साथ जाने का इशारा किया। जगदीश बाबू ने दालान पार किया और पीछे अपने दफ्तर के कमरे में गये। तब तक उनकी नाक से खून बहना बंद हो गया था पर उसके दाग उनके कुर्ते पर जमे हुए थे।

सोमचाई बोला, “ताकानोरी एक जापानी याकूज़ा है। यह लोग बहुत क्रूर होते हैं। इसलिए उसकी बात मानने में ही आप सब की भलाई है, अगर वह गुस्सा हो गया, तो अपनी कताना-तलवार से सबके सिर काट देगा।"

जगदीश बाबू ने उसकी बात का उत्तर नहीं दिया, अपनी मेज़ पर रखी जामुन बाबा की चिट्ठी को उठा कर सोमचाई को दिया और दोनों लौट आये। कमरे में घुसे तो देखा कि लक्की और मटरू भी बाबा के घर से कुछ सामान ले कर आ गये हैं।

उस सामान को मेज़ पर रखते हुए लक्की बोला, “वह छोटा सा घर है, बस दो कमरे है। वहाँ हमें केवल यही सामान मिला।"

सामान में कुछ संस्कृत की किताबें थीं, एक रुद्राक्ष की माला, एक तुलसी की माला और एक बौद्ध भिक्षुक की मूर्ति थी। मूर्ति पर सालों से अगरबत्तियों के धूँए की कालिख के निशान जम गये थे।

ओरी ने तुरंत हाथ जोड़ कर उस मूर्ति को प्रणाम किया, बोला, “यह बाबा के गुरु साबुनिम कीवू की मूर्ति है।" फ़िर लक्की से बोला,

“जाओ इस सामान को जहाँ से उठाया है, वहीं पर ठीक से रख कर आओ, और मूर्ति को ध्यान से ले कर जाना, टूटनी नहीं चाहिये।"
फ़िर उसने सोमचाई को चिट्ठी देने का इशारा किया।

जगदीश बाबू निढ़ाल हो कर कुर्सी पर बैठ गये, उनके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था, मानो अपने दफ्तर तक जाने में उन्होंने बहुत मेहनत की हो।

ओरी ने उनसे पूछा, “बाबा का शिष्य कौन है? वह कहाँ रहता है और यहाँ कब आयेगा?”

“जामुन बाबा के निर्देश अनुसार, मैंने उसे आज सुबह फोन किया था। उसने कहा था कि वह जल्दी आयेगा, कल शाम तक यहाँ पहुँच जायेगा। लेकिन वह कहाँ रहता है, मुझे नहीं मालूम। वह यहाँ आता रहता है, उसकी उम्र तीस साल के आसपास की होगी।"

“उसका मोबाइल नम्बर सोमचाई को दीजिये।" नम्बर ले कर सोमचाई ने अपना लैपटॉप कम्प्यूटर खोला और उसके बारे में जानकारी खोजने लगा।

ताकानोरी ने बाबा की चिट्ठी को खोला, उसमें केवल एक कागज़ था जिस पर हिंदी में कुछ लिखा था। उसने बटेर से उसे पढ़ने के लिए कहा।

कागज़ हाथ में ले कर बटेर मुस्कराया, बोला, “यह तो कोई कविता लगती है।"

“पढ़ो।"

“चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे, 
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल।
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि,
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की।
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, बोली
त्रिनेत्र कहाँ हैं, उन्हें निमंत्रण क्यों नहीं भेजा?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"

बटेर ने कविता पढ़ तो ली लेकिन उसका अनुवाद करके उसे ताकानोरी को समझाना आसान नहीं था। वह बोला, “इसमें लक्ष्मी, विष्णु और शिव जी की बातें हैं, शायद यह कोई प्रार्थना है।"

ओरी ने उससे वह कागज़ लिया और जगदीश बाबू से कहा, “आप की अंग्रेज़ी अच्छी है, आप इसका अनुवाद करके मुझे दीजिये।" उन्होंने चुपचाप उससे वह कागज़ ले लिया।

इतने में सोमचाई ने ताकानोरी को बुलाया और अपने लैपटॉप पर दिखाते हुए बोला, “इस मोबाइल नम्बर का सिम-कार्ड पहली बार 1998 में बनारस में खरीदा गया था। उसके बाद उसे 2014 में दिल्ली में बदला गया, पर नम्बर नहीं बदला। यह प्रीपेड लगता है और इसका नम्बर किसी दूसरे सिम-कार्ड से जुड़ा हुआ है, इसके बारे में पता करना आसान नहीं है, मुझे कुछ दिन लगेंगे।"

ताकानोरी सोचते हुए बोला, “बाबा के शिष्य आज चलेगा और कल शाम को पहुँचेगा, इसका मतलब है कि वह कहीं दूर रहता है। हो सकता है कि वह प्रतिमा उसके पास हो? खैर हम जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करेंगे। आज रात को जब लोगों की भीड़ नहीं होगी, उस समय हम वह समाधी खोद कर बाबा के शव और उनकी मूर्ति की जाँच करेंगे। जब वह शिष्य यहाँ आयेगा, तो उससे इस कविता का अर्थ भी पूछेंगे।"

जगदीश बाबू, जामुन बाबा की कविता का अनुवाद करने में लगे थे, लेकिन उनके कान ताकानोरी और सोमचाई की बातें सुन रहे थे, ताकि मौका मिलते ही त्रिनेत्र को खबर कर सकें। जब उन्होंने सुना कि वह लोग गुरु जी की समाधी को खोद कर उनके शरीर को बाहर निकालने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। लेकिन उन्होंने सोचा कि जामुन बाबा सामान्य व्यक्ति नहीं थे, वह अपनी समाधी की रक्षा स्वयं करेंगे।

बटेर, लक्की और मटरू को भी किसी संत पुरुष की समाधी खोदने की बात अच्छी नहीं लगी। वह गुँडे अवश्य हैं, लेकिन संतों के प्रकोप से डरते हैं। पर वह यह भी जानते हैं कि जापानी साहिब को यह काम करने से रोकना कठिन होगा।

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सोमवार, जुलाई 06, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 11

अब तक की कहानी: ताकानोरी ने जामुन बाबा को खोज लिया है लेकिन बाबा उसके जाल से निकल जाते हैं और वृद्धाश्रम में जीवित समाधी ले लेते हैं। गँगटोक में त्रिनेत्र के अनाथाश्रम में उसके मित्र की बहन आभा आई है। उन्हें समझ में आता है कि आभा की भी एक गुप्त-शक्ति है, कि वह कीड़े-मकोड़ों से बातें कर सकती है। त्रिनेत्र अपने साथ अनाथाश्रम के गुप्त शक्ति वाले पाँच बच्चों के साथ, बाबा की रक्षा के लिए मजूली के वृद्धाश्रम में जाने के लिए तैयार हो रहा है। इधर ताकानोरी अपने साथी सोमचाई और तीन गुँडों के साथ वृद्धाश्रम में पहुँच गया है और शक्ति वाली हरित तारा की मूर्ति को खोज रहा है। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 11

गँगटोक से असम की ओर, 3 मार्च 2026

भोजनालय में आभा और बच्चे चुपचाप त्रिनेत्र को देख रहे थे। टेलीफोन पर अपने गुरु जी के समाधी लेने की बात सुन कर जब वह रोया था तो वह वहीं थे।

उस रात को जब उसके घर में आभा जागी थी तो त्री ने उसे कहा था, “चलो तुम्हें छात्रावास छोड़ कर आता हूँ।"

“क्यों? अगर मैं तुम्हारे कमरे में रुकी तो तुम्हारा नाम बदनाम हो जायेगा?”, आभा ने पूछा था।

“नहीं, यहाँ कोई नहीं है जो मेरा या तुम्हारा नाम बदनाम करे", त्री मुस्कराया था, “लेकिन कुछ घंटे बाद हमें एक लम्बी यात्रा पर जाना है। तुम अपने कमरे में जाओगी तो मैं अपनी चटाई पर ठीक से सो सकूँगा।"

“तुम बच्चों को ले कर कहाँ जा रहे हो?”

त्री एक पल उसे चुपचाप देखता रहा, बोला, “हम ऐसे ही घूमने जा रहे हैं।"

“घूमने जा रहे हो, तो कल रात को हथियारों की बात क्यों हो रही थी?”

त्री ने उसे उत्तर नहीं दिया तो वह बोली, “मैं बच्ची नहीं हूँ, मैंने अपने पति और बेटी को खोया है। अगर कोई कठिन परिस्थिति आई है, जिसके बारे में तुम बच्चों से बात कर सकते हो तो मुझे क्यों नहीं बता सकते?”

फ़िर भी जब त्री ने कुछ नहीं कहा तो वह बोली, “कल पहले तुम्हारे अखाड़े में मुझे वह अजीब सा अनुभव हुआ। फ़िर,  तुम लोग किसी गुप्त-शक्ति की बात रहे थे, कि मेरी शक्ति कीड़े-मकोड़ों और जीव-जंतुओं से जुड़ी है। उसके बाद, जब मैं यहाँ भीतर सो रही थी तो मुझे बाहर से तुम्हारी बातें स्पष्ट सुनाई दे रहीं थीं, ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरे दिमाग का एक हिस्सा सोया हो और दूसरा, जागा हुआ सतर्क हो।"

त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “जो गुप्त-शक्ति मुझमें और बच्चों में हैं, वह तुममें भी हैं, लेकिन तुम्हारी शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई हैं, तुम उस पर नियंत्रण करना नहीं जानती। तुममें जीव-जन्तुओं से बात करने की शक्ति है और तुम्हारी श्रवण शक्ति भी विकसित लगती है। अगर तुम इन शक्तियों को पूर्ण विकसित करना चाहती हो तो तुम्हें कुछ समय यहाँ हमारे पास रहना पड़ेगा। अगर तुम अपने भाई के पास या गाँव में लौट जाओगी, तो हो सकता है कि तुम्हारी यह शक्ति जो यहाँ जागृत हुई है, वह फ़िर से सो जाये।"

“कल रात को तृप्ति ने अपनी मनोशक्ति से एक लोटे को उठाया था और गार्गी ने मुझे अंतरमन के भीतर से छुआ था?"

त्री ने सिर हिला कर हामी भरी, बोला, “हाँ, उनकी यही शक्तियाँ हैं। कुछ दिनों में जब हम लौटेंगे, तुम भी यहाँ वापस आ सकती हो, हम तुम्हारी शक्तियों को विकसित करने में तुम्हारी मदद करेंगे।"

“शक्ति विकसित करने से क्या फायदा है?”

“यह लाभ-नुकसान की बात नहीं है, शक्ति का होना एक ज़िम्मेदारी है। इनसे हम गरीब, निर्बल, असहाय और शोषित जनों की मदद करते हैं। तुम कह सकती हो कि हम शक्ति-यौद्धा हैं और यह हमारा धर्म है।"

“कल रात को वसंत किसी तिरंगा यौद्धा की बात कर रहा था?”

त्री मुस्कराया, बोला, “जब वसंत यहाँ आया था, तब उसने हमारे नामों के पहले अक्षर, त, र और ग को मिला कर तिरंगा बना दिया था। तब से बच्चे हम सब को तिरंगा-यौद्धा भी कहते हैं।"

“तो मुझे भी बताओ कि कल सुबह तुम तिरंगा यौद्धा किसकी मदद के लिए युद्ध पर जाओगे?”

“मेरे गुरु जी मुश्किल में हैं। मैं असम में गुवाहाटी के पास पैदा हुआ था और बचपन में अनाथ हो गया था। गुरु जी ने मुझे शरण दी, मुझे पाला-पोसा, मेरी शक्ति को पहचाना और उसे विकसित किया। उनके कहने पर ही मैंने यह अनाथाश्रम खोला है। कुछ लोग बहुत सालों से उनका पीछा कर रहे हैं। कल सुबह गुरु जी ने मुझे बताया कि उन लोगों ने उन्हें खोज लिया है, इससे उनकी जान को खतरा है, और हम उनकी रक्षा करने जा रहे हैं।"

आभा चुप हो गयी थी और वह उसे लड़कियों के छात्रावास के पास छोड़ कर लौट आया था।

आज सुबह जब वह बच्चों के साथ नाश्ता कर रहा था और जगदीश बाबू ने उसे गुरु जी की समाधी लेने का समाचार दिया, उस समय आभा वहाँ थी।

जब वे गाड़ी में बैठे तो आभा उसके साथ आगे वाली सीट पर बैठी। उनकी कार अनाथाश्रम से बाहर निकली ही थी कि वह बोली, “मैं भी तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ।"

त्री ने कहा, “नहीं, तुम हमारे साथ नहीं आ सकतीं।"

“क्यों?”

“क्योंकि इसमें खतरा है।"

“अगर छह साल की तृप्ति तुम्हारे साथ जा सकती है तो मैं क्यों नहीं?”

“क्योंकि जिसे तुम छह साल की बच्ची कहती हो, वह चाहे तो अपनी शक्ति से चाकू-तलवार चला कर अपनी रक्षा कर सकती है और हमारे युद्ध में योगदान दे सकती है।"

आभा कुछ सोच कर बोली, “दो साल पहले तस्करों ने बम से मेरे पति की कार उड़ा कर, उनकी और मेरी बेटी की जान ली थी। तब मैंने कई महीनों तक आत्महत्या करने की सोची थी। लेकिन अब मैं जीना चाहती हूँ और उन लोगों से बदला लेना चाहती हूँ। मैं भी तुम्हारी तरह यौद्धा बनना चाहती हूँ, डर कर घर में छिप कर जीना नहीं चाहती। मेरी शक्ति तुम लोगों की तरह विकसित नहीं है, मुझे लड़ाई करनी भी ठीक से नहीं आती, लेकिन मैं सीधी-साधी सामान्य औरत दिखती हूँ और तुमने देखा कि मेरी श्रवण शक्ति बहुत अच्छी है, मैं सोते हुए भी दूर से बातें सुन सकती हूँ। अगर मैं तुम्हारे साथ रहूँगी तो हम लोग एक परिवार जैसा लगेंगे और गुँडों को धोखा देना अधिक आसान होगा।"

पीछे बैठे बच्चे उनकी बातों को ध्यान से सुन रहे थे लेकिन उनमें से कोई कुछ नहीं बोला।

“और वहाँ तुम कुछ हो गया तो?” त्री बोला।

“अधिक से अधिक वह मुझे मार देंगे और क्या? मैं मरने से नहीं डरती।"

“और अगर मरो नहीं, पर सारे जीवन के लिए अपाहिज हो जाओ तो?”

“क्यों, क्या अपाहिज लोग इन्सान नहीं होते? अगर बुरे लोगों के साथ युद्ध में मैं घायल होती हूँ या मर जाती हूँ तो मुझे इसका रत्ती भर भी रंज नहीं होगा।"

यह बातें करते हुए, वह लोग रानी खोला पुल पर पहुँच गये थे। वहाँ से कुर्स्यांग जाने वाली सड़क अधिक दूर नहीं थी, इसलिए त्री को वहाँ पहुँचने से पहले ही यह निर्णय लेना था, वह बोला, “विशाल से बात करते हैं।"

आभा गुस्सा हो गयी, बोली, “इसमें भैया से पूछने की क्या ज़रूरत है? मैं क्या उन पर निर्भर करती हूँ? मैं उनके यहाँ कुछ दिन के लिए आयी थी, लेकिन मेरा अपना घर है, मैं अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हूँ। वैसे भी वह मेरे बड़े भाई हैं, तुम उनसे पूछोगे कि इसे युद्ध में ले जायें या नहीं, तो वह क्या कहेंगे? वह तो मना ही करेंगे।”

पीछे से गार्गी बोली, “आभा दीदी ठीक कहती हैं, उन्हें साथ ले जाने, या न ले जाने का निर्णय तो आप को ही लेना पड़ेगा। इनके भाई से पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, यह कोई बच्ची नहीं हैं।"

आखिर में त्री बोला, “ठीक है, तुम हमारे साथ चलना चाहती हो तो चलो।"

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गुरुवार, जुलाई 02, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 10

 

अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। त्रिनेत्र को बताये बिना बाबा अपने वृद्धाश्रम के मंदिर के सामने समाधी ले लेते हैं। जब त्रिनेत्र को पता चलता है तो वह बहुत दुखी होता है। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 10

नारायणपुर, असम, 3 मार्च 2026

सुबह जापान से रिकू का फोन आया, उसने इधर-उधर की बात नहीं की, सीधा पूछा, “ओरी, क्या हुआ? अभी तक जून-मिन का पता नहीं चला?”

“यामागुचि सान, हमें उसका पता चल गया है। वह बूढ़ा हो गया है, लेकिन अभी भी चालाक है। कल वह हमसे बच कर भागने में सफल हुआ लेकिन अब हमें पता चल गया है कि वह किस क्षेत्र में रहता है, आप कुछ दिन और धैर्य रखिये, मैं उसे अवश्य खोज निकालूँगा", ताकानोरी ने कहा।

“तुम्हें वहाँ गये हुए तीन महीने हो गये हैं, इतने समय में तुम उसे खोज क्यों नहीं पाये?”

“आप चिंता नहीं करें, मुझे पक्का विश्वास है कि कुछ समय में मैं उसे खोज निकालूँगा", उसने उसे आश्वासन दिया।

सोमचाई ने कम्प्यूटर के प्रोग्राम की सहायता से जून-मिन की पुरानी तस्वीर को ले कर, एक कृत्रिम-बुद्धि प्रोग्राम से उनकी नयी तस्वीरें बनायी थीं और उन्हें अपने आदमियों को दिया था ताकि वह उनको दिखा कर शहर में पूछताछ करें। कुछ घंटे बाद, बटेर खबर ले कर आया, बोला, “एक दुकानदार ने इस तस्वीर को पहचान लिया, कहा कि यह तो जामुन बाबा हैं और उसके यहाँ कभी-कभी सामान खरीदने आते हैं। लेकिन वह कहाँ रहते हैं, उसे पता नहीं था। बोला कि वह हर महीने-दो महीने में नारायणपुर आते हैं और वहाँ से तेल, साबुन वगैरा खरीद कर ले जाते हैं।"

सोमचाई ने इंटरनैट पर "जामुन बाबा" को खोजा तो उसे इंस्टाग्राम पर उसी दिन सुबह के कुछ वीडियो मिल गये। वह तुरंत मोबाइल को ले कर ताकानोरी के पास गया, बोला, “कुछ वीडियो मिले हैं। इनके अनुसार, कल शाम को जामुन बाबा यानि जून-मिन ने समाधी ले कर प्राण त्यागे हैं।"

ओरी ने वीडियो देखे। एक वीडियो में वह हिस्सा था जब बाबा एकत्रित लोगों के सामने कुछ बोल रहे थे और उनकी सफेद चद्दर उसके पीछे हवा में ऊपर उठ गयी थी। एक दूसरे वीडियो में उनके बक्से में बैठने और बक्से को ज़मीन में गाड़ने के दृश्य थे। वीडियो में लोग "जामुन बाबा" का नाम बार-बार ले रहे थे। 

“यह समाधी लेना, इसका क्या मतलब है?” ओरी ने पूछा।

“वीडियो देख कर लगता है कि कल उन्होंने अपने आप को एक गड्ढ़े में जीवित दफन करवा लिया, अब तक वह मर गये होंगे।"

“यह वीडियो झूठा भी हो सकता है? शायद उसने यह वीडियो आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से बनवा कर हमें गुमराह करने के लिए लगवाये हों?”

“मेरी जाँच में यह आर्टिफीशयल इन्टैल्लीजैंस से नहीं बने हैं। इन्हें किसी स्कूल के लड़कों ने इंस्टाग्राम पर डाले हैं। यह झूठे नहीं लगते, लेकिन इस बात की पुष्ठी करना आसान है। यहाँ से कुछ दूर ब्रह्मपुत्र नदी के मजूली द्वीप पर उनका एक वृद्धाश्रम है, हम वहाँ जा कर उसकी जाँच कर सकते हैं", सोमचाई बोला।

ओरी ने तुरंत जीप तैयार करवायी और वे लोग चापोड़ी घाट आये। वहाँ से उन्होंने वृद्धाश्रम जाने के लिए एक नाव को किराये पर लिया।

जामुन बाबा के जीवित समाधी लेने की खबर धीरे-धीरे फ़ैल रही थी, बहुत से लोग यह बात सुन कर उनकी समाधी को देखने आ रहे थे, इसलिए वृद्धाश्रम में समाधी-स्थल को देखने वालों की भीड़ लगी थी। ओरी और उसके आदमियों ने उनके बीच से जल्दी आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन वह भीड़ इतनी अधिक थी कि वह कुछ नहीं कर पाये। भीड़ के साथ-साथ वह भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

आगे आये तो देखा कि वृद्धाश्रम के द्वार से बाहर दूर तक कतार लगी है, जो बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। ताकानोरी के आदमियों ने कतार से आगे जा कर घुसने की कोशिश की, तो कतार में खड़े हुए लोग गुस्सा हो गये। आखिर में उन्हें भी पीछे कतार में ही आना पड़ा।

ओरी को इस देरी पर बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका बस चलता तो वह अपनी तलवार निकाल कर, लोगों को मारता-काटता आगे बढ़ जाता लेकिन सोमचाई ने उसे रोका, कहा कि अगर वह सौ लोगों को भी मार देगा तब भी बाकी के हज़ारों लोग पत्थरों से उसका सिर फोड़ देंगे।

दो घंटे के बाद जब वह समाधी-स्थल पर पहुँचे तो उसकी दृष्टि साथ में बने मन्दिर की ओर गयी। उसकी बाहरी दीवार पर बहुत सी मूर्तियाँ बनी थीं, उनके बीच मूर्तियों की एक पंक्ति ने उसका ध्यान खींचा। उस पंक्ति में श्वेत तारा और हरित तारा की मूर्तियाँ साथ-साथ लगी थी। उसने वहाँ खड़े हो कर तुरंत आँखें बंद कीं और अन्वेषण-किरण से उन मूर्तियों को जाँचा, उसे लगा कि उनमें हलकी सी शक्ति-लहर का आभास हो रहा है। यह देख कर उसके मन को चैन मिला, कि अगर जून-मिन की हरिताश्म तारा की मूर्ति नहीं भी मिलेगी, तो वह इन मूर्तियों को यामागुचि सान के लिए जापान ले जा सकता है।

उसे समाधी-स्थल पर आगे न बढ़ता देख कर, कतार में उसके पीछे वाले लोगों ने शोर मचाया तो उसके आदमियों ने उन्हें समझाया कि वह विदेश से आया बौद्ध भिक्षुक है और समाधी लेने वाले जामुन बाबा का पुराना शिष्य है, तो सब लोग चुप हो गये।

वह सोमचाई के साथ मन्दिर के प्रांगण में पीछे की ओर जा कर खड़ा हो गया, बोला, “कल सुबह मैंने उसकी शक्ति-लहर को नारायणपुर में पकड़ा था और कल शाम को ही उसने समाधी ले कर प्राण त्याग दिये, क्यों? मुझे इस बात पर शक हो रहा है। यह उस बूढ़े की हमसे बचने की कोई चाल लगती है। मान लो कि उसका समाधी लेना केवल एक ड्रामा है? हो सकता है कि जब लकड़ी का बक्सा नीचे गड्ढे में उतारा गया तो वह भीतर नहीं था, पीछे से निकल कर कहीं पर छिप गया था, तो? या उस बक्से में साँस लेने की नलकी लगी थी, रात को जब लोग चले गये तो उन्होंने गड्ढ़े को खोल कर उसे बाहर निकाल लिया हो? या फ़िर, यहाँ समाधी स्थल के नीचे कोई सुरंग बनी हुई हो, लोगों के सामने उसने समाधी ली पर नीचे जा कर, वह बक्से से निकल कर, सुरंग से कहीं भाग गया हो?”

सोमचाई बोला, “पहाड़ी के भीतर रास्ता या सुरंग बनाने आदि में बहुत समय लगेगा। अगर ऐसा हुआ तो इसका मतलब होगा कि इसकी योजना उसने बहुत पहले बनायी थी और कल जैसे ही उसे लगा कि हमने उसे तलाश कर लिया है तो उसने समाधी ले ली? लेकिन उसे यह करने की क्या आवश्यकता थी? आप ने कहा था कि वह पिछले छयालिस सालों से भाग रहा है, जब कोई उसे खोज लेता था तो वह भाग कर कहीं और चला जाता था। तो इस बार वह कहीं और क्यों नहीं गया, उसने मरने के लिए समाधी क्यों ली?”

ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “सचमुच वह बूढ़ा बहुत चालाक है और हमसे कोई खेल खेल रहा है। मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होगा कि वह आसपास में कहीं पर छिप कर, हमें यहाँ बातें करता हुआ देख रहा है और हँस कर मज़े ले रहा है।" फ़िर, आसपास देखते हुए बोला, “यहाँ एक वृद्धाश्रम है, पहले यहाँ के बूढ़ों से पूछताछ करनी चाहिये। अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं इस समाधी को खुदवा कर उसके मृत शरीर को अपनी आँखों से देखूँगा।"

सोमचाई ने समाधी को देखने आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ की ओर देखा, बोला, “इन लोगों के सामने हम कुछ नहीं कर सकते। इनके सामने अगर हम इस समाधी को हाथ भी लगायेंगे तो यह लोग हमारी धज्जियाँ उड़ा देंगे। यही नहीं, हमारे तीनों आदमी भी इस बाबा के भक्त बन गये लगते हैं, देखो कैसे हाथ जोड़ कर खड़े हैं।"

सचमुच बटेर, लक्की और मटरू भी, अन्य श्रद्धालुओं की तरह जून-मिन की समाधी के पास हाथ जोड़ कर खड़े थे।
“एक मिनट रुको, मैं अभी आता हूँ", कह कर ओरी मन्दिर के भीतर गया।

जब उसने मन्दिर के बीच में बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति देखी तो उसकी दृष्टि उनकी हथेलियों पर रखी हरित तारा और श्वेत तारा की प्रतिमाँओ की ओर गयी। उसने आँखें बन्द करके उनकी जाँच की, उसे लगा कि उनमें भी शक्ति का स्पंदन है।

उसने मन्दिरकक्ष की अन्य दोनों मूर्तियों, ताँडव करते शिव और ध्यानलीन बुद्ध को भी ध्यान से देखा तो उनमें भी शक्ति का कंपन महसूस किया। वह समझ गया कि यह मन्दिर, यह प्रतिमाएँ, यह कोई सामान्य जगह नहीं हैं, इनमें ईश्वर की ऊर्जा का विशेष वास है।
उसने सोचा कि उन बड़ी मूर्तियों को जापान ले जाना कठिन होगा, लेकिन वह तारा की छोटी प्रतिमाओं को यहाँ से ले जा सकता है। यामागुचि तो शक्ति वाली मूर्तियाँ चाहिये, और यहाँ पर वैसी मूर्तियों की कमी नहीं है।

जब वह मंदिर से बाहर निकला तो उसे देखते ही सोमचाई समझ गया कि मन्दिर में कुछ हुआ है। वह जब भीतर गया था तो चिड़चिड़ा लग रहा था, जबकि अब वह मुस्कराता हुआ बाहर आया है।

“उन आदमियों को बुलाओ, हम वृद्धाश्रम में बात करने जायेंगे", ओरी ने उसे कहा। 

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सोमवार, जून 29, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 09

अभी तक की कहानी: जामुन बाबा की शक्तिमय मूर्ति की तलाश में, उनका पीछा करने वाला जापानी याकूज़ा-गुँडा ताकानोरी भारत आया है और उसने बाबा को नारायणपुर में खोज लिया है। बाबा उससे बच पर भागने में सफल होते हैं और मजूली द्वीप पर वृद्धाश्रम में लौट आते हैं। उधर, गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम में, बाबा का पुत्र-समान शिष्य त्रिनेत्र, कुछ शक्तिमय बच्चों के साथ उनके आश्रम की यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हो यहा है। बाबा अपने वृद्धाश्रम में सूचित करते हैं कि वह समाधी लेंगे। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 09

मजूली द्वीप, असम, 2 मार्च 2026

बाबा दोपहर के साढ़े चार बजे अपने घर से निकले।

आज उन्होंने केसरिया वस्त्र की जगह पर एक सफेद चद्दर को अपने तन पर लपेटा था। उनकी भिक्षा के कटोरे में  हरिताश्म तारा की एक मूर्ति थी जिसके बिना वह कहीं नहीं जाते। आज उन्होंने अपनी खड़ाऊँ भी नहीं पहनी,  नंगे पाँव ही घर से निकले।

वह आज समाधी ले रहे हैं, यह खबर सारे क्षेत्र में फ़ैल चुकी है। आसपास के गाँवों के लोग और पास के हाई स्कूल के बहुत से छात्र, आश्रम में जमा हो गये हैं और अन्य लोग आते जा आ रहे हैं। वृद्धाश्रम का मैदान उनसे भरा है।

इस मैदान के उत्तरी कोने पर, नदी के पास, एक छोटी सी पहाड़ी पर काले पत्थर का मन्दिर बना है। इसके प्रमुख कक्ष में एक ओर नटराज हैं और दूसरी ओर ध्यानमुद्रा में महात्मा बुद्ध। कक्ष के बीच में खड़े हुए बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की बड़ी मूर्ति है, जिसके दोनों हाथ छाती के सामने हैं और हथेलियाँ ऊपर उठी हुईं हैं। उनकी दायीं हथेली पर हरिताश्म तारा की मूर्ति है और बायीं ओर श्वेत तारा की। इसी मंदिर के प्रांगण में बाबा समाधी लेंगे।

मन्दिर के सामने, मजदूरों ने दोपहर को ही खोदना शुरु कर दिया था और अब उनकी समाधी के लिए दो मीटर गहरा गड्ढ़ा तैयार है।
जैसे ही वह आश्रम के गेट से भीतर घुसे तो वहाँ एकत्रित लोग उन्हें देखने के लिए उठ खड़े हुए। किसी ने पुकारा, “जामुन बाबा की जय", तो सारी भीड़ उस नारे को बार-बार दोहराने लगी। बाबा वहीं बीच में रुक गये, भिक्षा के कटोरे को हाथ में लिए, नतमस्तक हो कर चुपचाप वहाँ आँखें बंद करके खड़े हो गये। धीरे-धीरे जब भीड़ चुप हुई तब वह आगे बढ़े।

पहाड़ी के ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास आश्रम में रहने वाले वृद्ध कतार बना कर खड़े थे, कई लोगों की आँखों से आँसू बह रहे थे। बाबा ने सिर उठा कर किसी की ओर नहीं देखा, नतमस्तक ही चुपचाप उनके बीच से निकले। जब वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगे तो पीछे से

एक वृद्धा ने पुकार कर कहा, “जामुन बाबा, हमें एक अंतिम प्रवचन का दान दे दो।"

बाबा वहीं ठिठक कर सीढ़ियों पर रुक गये। एक-दो क्षण वहाँ चुपचाप खड़े रहे, फ़िर लोगों की ओर मुड़े। बहुत देर तक कुछ नहीं बोले। उनके शरीर पर लिपटी चादर का पिछला हिस्सा हवा से ऊपर उठा और कुछ क्षणों के लिए उनके ऊपर झुक कर एक शेषनाग की तरह लहराता रहा। लोग स्तब्ध हो कर इस दृष्य को देख रहे थे।

वह बोले, “मैं बहुत भाग्यवान हूँ, कि मुझे आप के साथ रहने और आप की सेवा करने का अवसर मिला। आज मेरी आत्मा, अंतहीन आकाश में ब्रह्माँड से जुड़ कर एक हो जायेगी और मुझे करुणामयी तारा माँ की गोद में चिरनिन्द्रा मिलेगी। मेरी यह आकाँक्षा सफल हो, इसके लिए आप की प्रार्थना की मुझे अपेक्षा है। आप लोगों से मेरी एक प्रार्थना भी है कि जैसे आप मेरे साथ प्रेम और शाँति के साथ रहे, मेरे बाद भी यह आश्रम वैसे ही चलायेंगे।"

उन्होंने अपने हाथों को जोड़ कर, उन्हें सिर के ऊपर उठा कर, सभी को प्रणाम किया और धीरे-धीरे बाकी सीढ़ियाँ चढ़ कर अपने समाधी-स्थान की ओर गये।

उस समय जगदीश बाबू की आँखों से भी आँसू झरने लगे और उन्होंने महामृत्यंजय मंत्र का पाठ शुरु कर दिया, "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्"।

हालाँकि उन्होंने बार-बार वहाँ इकट्ठे लोगों से बाबा की तस्वीरें खींचने या वीडियो रिकॉर्ड करने से मना किया था, फ़िर भी कुछ लोग मोबाइल निकाल कर उनकी तस्वीरें खींच रहे थे।

ऊपर जा कर बाबा पहले मन्दिर में गये और वहाँ कुछ देर तक प्रार्थना की, फ़िर बाहर आ कर, मन्दिर की तीन बार प्रदक्षिणा की। अंत में वह खुदे हुए गड्ढ़े के पास रखे चकोराकार लकड़ी के बक्से के पास आये और हाथ में भिक्षा का कटोरा पकड़े हुए उसके भीतर आँखें बंद करके पद्मासन में बैठ गये।

मैदान में सन्नाटा छा गया। कुछ देर के बाद आश्रम की एक वृद्धा आगे आयी और लाठी के सहारे चलते हुए मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गयी। उसने बाबा के सामने हाथ जोड़े और उस बक्से के पाटों को बंद कर दिया। पीछे कुछ मजदूर तैयार खड़े थे, वह रस्सियाँ ले कर आये और उनसे उस बक्से को लपेट दिया, फ़िर रस्सियों के सहारे उठा कर उस बक्से को गड्ढ़े के भीतर रख दिया।

बक्से के ऊपर पहली मिट्टी की मुट्ठी डालने वही वृद्धा आयी। मुट्ठी में मिट्टी ले कर वह कुछ देर तक गड्ढ़े के पास खड़ी रही। उसकी आँखों से आँसू बह रह थे और उसकी सफेद साड़ी का पल्लू भी ध्वज की तरह कुछ क्षणों के लिए हवा में उड़ा। फ़िर एक लम्बी साँस ले कर उसने वह मिट्टी गड्ढ़े में फैंकी और साड़ी के कोने से आँसू पोंछते हुए सीढ़ियाँ उतर कर नीचे लौट आयी।

उसके बाद मजदूरों ने भी मिट्टी गड्ढ़े में डाली।

तब तक आश्रम के वृद्धों ने वहाँ एकत्रित लोगों को एक कतार बनाने के लिए कहा। उनमें सबसे आगे जगदीश बाबू थे। एक-एक करके सब लोग मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ते, गड्ढे के पास पड़ी हुई मिट्टी को हाथ में लेते और गड्ढ़े में डाल देते।

इस काम को पूरा करने में करीब आधा घंटा लगा। जब सबने स्माधी-कुण्ड में मिट्टी डाल दी तो बची हुई मिट्टी से मजदूरों ने उस गड्ढ़े को भर दिया। समाधी-स्थल के लिए, प्रांगण के फर्श जैसा, एक चकोर कटा हुआ काला पत्थर पहले से तैयार रखा था, उसे लगा कर मजदूरों ने फर्श को पूरा कर दिया। अब वहाँ बाहर से बाबा के समाधी-स्थल का कोई निशान नहीं बचा था।

बाबा के निर्देशों के अनुसार, वहाँ एकत्रित सब लोगों को प्रसाद बाँटा गया, और फ़िर धीरे-धीरे लोग वहाँ से जाने लगे। सब यही बात कर रहे थे कि जीवित समाधी लेने वाले जामुन बाबा अब बड़े संत माने जायेंगे और वह जगह दूर-दूर तक तीर्थ-स्थान की तरह प्रसिद्ध हो जायेगी।

जब जगदीश बाबू ने त्रिनेत्र को अगले दिन सुबह टेलीफोन पर यह बात बतायी तो वह स्तब्ध रह गया, बोला, “कल शाम को? तो आप ने मुझे पहले खबर क्यों नहीं की? हम आज सुबह उनके पास आने के लिए तैयार हुए हैं।”

“बेटा, मैंने तो उन्हें बहुत कहा था कि पहले तुम्हें बुला लेना चाहिये। तुम उनके उत्तराधिकारी हो, तुम्हारा यहाँ होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन वह नहीं माने।"

त्री रोने लगा। जगदीश बाबू कुछ देर तक उसके रोने की आवाज़ सुनते रहे, फ़िर बोले, “वह तुम्हारे लिए एक पत्र छोड़ कर गये हैं।"

“उसमें क्या लिखा है?”

“मुझे पता नहीं, लिफाफा बंद है। उन्होंने कहा कि जब तुम यहाँ आओगे, उसे तभी तुम्हें देना है।"

त्री ने अपने आँसू पोंछे, बोला, “हम लोग आज सुबह गँगटोक से चल रहे हैं, कल शाम तक वहाँ पहुँच जायेंगे।"

“तुम्हारे साथ और कौन आ रहा है?”, जगदीश बाबू ने पूछा।

“हमारे अनाथाश्रम के कुछ बच्चे हैं, उन्हें गुरु जी से मिलवाना चाहता था। अब वह उनकी समाधी को देखेंगे।"

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शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

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टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

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गुरुवार, जून 25, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 08

अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है।

दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है। अचानक उनकी मेहमान आभा की गुप्त-शक्ति जाग जाती है। आगे पढ़िये:

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अध्याय 08

       गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

वह दोनों अखाड़े से बाहर आये तो देखा कि रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति उधर भागे आ रहे हैं। उनके पीछे, अनाथाश्रम के कुछ कुत्ते और बिल्लियाँ भी थे।

गार्गी ने पूछा, “क्या हुआ? मुझे लगा कि जैसे इधर कोई भूचाल आ रहा हो और कोई मुझे यहाँ खींच रहा हो।"

रंगनाथ बोला, “हाँ, घूँ-घूँ की अजीब सी आवाज़ें आ रही थीं।"

माधव मुस्कराया, बोला, “अखाड़े के ऊपर इन्द्रधनुष जैसी रोशनियाँ डिस्को डाँस कर रही थीं और पशुशाला में मुर्गियाँ, गायें, भैंसे, बछड़े, सभी बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे।"

त्री बोला, “चलो, मेरे घर चलते हैं, वहाँ बात करेंगे।"

त्री का छोटा सा घर, पेड़ों के झुरमुट के बीच में है और अखाड़े से अधिक दूर नहीं है। उसके घर में, एक कमरे में एक ओर कुछ कपड़े टंगे थे और एक स्टूल पर कुछ किताबें रखी थीं, बस, बाकी का सारा घर खाली था।

त्री ने एक दरवाज़े के पीछे से एक लिपटी हुई चटाई को निकाल कर बीच में बिछा दिया, बोला, “यहाँ बैठो", फ़िर वसंत से कहा, “घर के आसपास अभेद्य दीवार बना दो ताकि कोई हमारी बात नहीं सुन सके।"

इस सारे समय में आभा चुप थी, उनके बातें ध्यान से सुन रही थी।

त्री बच्चों से बोला, “तुमने ठीक देखा था, आभा के भीतर भी गुप्त-शक्ति है। आज जब हम अखाड़े में गये तब वह शक्ति अचानक जाग गयी। मैंने ऐसी शक्ति के बारे में पहले कभी नहीं सुना था। वह जीव-जन्तुओं को, विशेषकर कीड़ों-मकोड़ों को बुला सकती है। हो सकता है कि वह उनसे बातें भी कर सकती है।"

आभा बोली, “तुम लोग मेरे बारे में ऐसे बातें क्यों कर रहे हो जैसे कि मैं यहाँ नहीं हूँ? तुम यह कौन सी गुप्त-शक्ति की बातें कर रहे हो? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"

त्री ने गार्गी को इशारा किया तो उसने आभा के मस्तिष्क में एक क्षण के लिए एक शक्ति-लहर भेजी। आभा को जैसे बिजली का झटका लगा, लेकिन वह समझ गयी कि जो अनुभूति उसने महसूस की है, उसे गार्गी ने भेजा है। उसने आश्चर्य से गार्गी को देखा, पूछा,

“तुमने यह क्या किया और कैसे किया?”

तब रंगनाथ बोला, “दीदी, दुनिया में हमारे जैसे कुछ लोग एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा होते हैं। त्री दादा के साथ, हम लोग हर रोज़ ध्यान, व्यायाम और अभ्यास से, उस शक्ति को साधते हैं। अगर बचपन में इस शक्ति को साधा नहीं जाये तो समय के साथ यह मुरझा जाती है। शायद आप भी एक गुप्त-शक्ति के साथ पैदा हुई थीं, लेकिन किसी वजह से आप की शक्ति मुरझाई नहीं, उसका बीज आप के भीतर आज भी जीवित है। हमारी शक्तियों की वजह से, हमारे अखाड़े की मिट्टी में ऐसा वातावरण बना है, जिससे व्यक्तियों के भीतर छिपी शक्तियाँ विकसित और प्रबल हो जाती है। आज अखाड़े में आप के भीतर सोयी हुई शक्ति जाग गयी है।"

“तुम यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आया", आभा बोली।

तो रंगनाथ ने तृप्ति से कहा, “उस लोटे को उठाओ।"

स्टूल के पास ज़मीन पर एक लोटा रखा था, तृप्ति ने उसे देखा तो वह हिलने लगा और फ़िर अपने आप सरक कर वह उसके पास आ गया।

रंगनाथ बोला, “आप ने देखा? तृप्ती की शक्ति धातुओं के साथ काम करती है, अपनी शक्ति से वह उस लोटे को अपने पास खींच लायी। वैसे ही वसंत की शक्ति पेड़-पौधों के साथ काम करती है", उसने वसंत को इशारा किया।

कमरे की खिड़की के बाहर एक बेल लगी थी जिसमें लाल और सफेद रंग के फ़ूल खिले थे। वसंत ने उस ओर देखा तो बेल का एक हिस्सा हिलने लगा, फ़िर मुड़ कर वह कमरे में घुस आया और दीवार के साथ-साथ चलता हुआ, जितनी दूर आ सकता था वहाँ आ कर रुक गया।

तृप्ति और वसंत के कारनामों को आभा ने हैरानी से देखा।

माधव बोला, “आभा दीदी की शक्ति का रंग अब दिखने लगा है, वह गुलाबी है।"

गार्गी बोली, “आप के पास भी ऐसी एक शक्ति है, उससे आप कीड़ों-मकोड़ों और जीव-जन्तुओं को बुला सकती हैं।”

त्री बोला, “लगता है कि तुम्हारी शक्ति ताकतवर है, लेकिन अभी तुम्हें उस पर नियंत्रण करना नहीं आता।"

आभा ने उबासी ली, बोली, “तुम लोग यह क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। साथ में मेरा सिर झन्ना रहा है और मुझे बहुत थकान लग रही है।"

तृप्ति बोली, “दीदी, जब तक हम ठीक से शक्ति-साधना नहीं सीखते, तब तक उसका उपयोग करने से ऐसा ही होता है। मैंने अभी तुम्हें लोटा हिला कर दिखाया था, मुझे भी बहुत थकान हो गयी है।"

आभा की आँखें बैठे-बैठे नींद से बंद हो रही थीं। त्री ने रंगनाथ को अलमारी से एक तकिया निकाल कर लाने के लिए कहा, और आभा से बोला, “थोड़ी देर तुम यहीं चटाई पर लेट जाओ, कुछ देर आराम करने से तुम्हारी थकान ठीक हो जायेगी।"

आभा ने उठने की कोशिश की, बोली कि वह छात्रावास में अपने कमरे में जायेगी, लेकिन चटाई से उठ नहीं पायी। आखिर में उसने तकिये पर सिर रख कर आँखें बंद कर लीं।

तृप्ति बोली, “मैं भी थोड़ी देर दीदी के साथ आराम करूँगी", और वह भी आभा के पास लेट गयी।

त्री उठ खड़ा हुआ, बाकी चारों बच्चों को ले कर बाहर आ गया, बोला, “मैंने फैसला किया है कि कल तुम सभी मेरे साथ चलोगे। हम लोग सुबह नाश्ते के बाद निकलेंगे, रास्ते में आभा को उसके भाई के पास छोड कर, हम लोग मजूली जायेंगे।"

सभी बच्चे खुश हो गये तो त्री ने उन्हें शोर न करने का इशारा किया, बोला, “तुम लोग अपना सामान तैयार कर लो क्योंकि हमें वहाँ कुछ दिन रुकना होगा।"

रंगनाथ ने पूछा, “और हमारे हथियार? उन्हें ले कर चलेंगे?”

त्री ने कुछ देर सोचा फ़िर बोला, “नहीं, बेहतर होगा कि हम अपने साथ कोई हथियार नहीं ले कर जायें। वैसे भी तुम उनका प्रयोग अभी सीख रहे हो। लेकिन अगर तुममें से कोई दुश्मन के हाथ आ गया और उसने देखा कि तुम्हारे पास कोई हथियार हैं तो वह तुम्हें जान से भी मार सकता है। अच्छा होगा कि तुम उन्हें सामान्य बच्चे लगो। हमारी शक्तियाँ ही हमारा हथियार हैं।" 

वसंत बोला, “यह हमारे तिरंगा-यौद्धाओं की सैना का पहला युद्ध होगा, हम बड़े गुरु जी की रक्षा करेंगे।"

शुरु में जब त्री के साथ केवल रंगनाथ और गार्गी थे, तो रंगा ने अपने नामों के पहले अक्षर जोड़ कर अपने आप को तिरंगा-योद्धा कहना शुरु किया था। बाद में अन्य बच्चों के आने के बावजूद, वही पुराना नाम उन्हें अभी भी अच्छा लगता है, हालाँकि त्री ने उन्हें कई बार समझाया है कि वह किसी पर हमला करने वाले यौद्धा नहीं है, वह केवल रक्षा के लिए युद्ध करते हैं।

बच्चे वहाँ से चले गये और त्री वहीं बैठ कर प्रतीक्षा करता रहा। कुछ देर के बाद उसने देखा कि तृप्ति की आँखें खुली हैं तो उसे उठने का इशारा किया, “चलो, मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड आता हूँ।"

“दादा, आभा दीदी बहुत अच्छी हैं, क्या वह हमारे साथ नहीं रह सकतीं?”, रास्ते में उसने पूछा।

त्री को केवल इतना पता है कि आभा का गाँव मणिपुर में लोकटक झील के पास में है। वह बोला, “आभा का गाँव में अपना घर-परिवार है, वह उन्हें छोड़ कर हमारे साथ कैसे रुकेगी?"

तृप्ति को छात्रावास में छोड़ कर वह अनाथाश्रम के संचालक से बात करने उनके दफ्तर गया और उन्हें कहा, "कल सुबह मैं, रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति, हम छह लोग कुछ दिनों के लिए आसाम जा रहे हैं। आभा भी हमारे साथ जायेगी, उसे रास्ते में कुर्स्यांग छोड़ते हुए जायेंगे। हम कुछ दिन बाहर रहेंगे।"

जब वह घर लौटा तो देखा कि आभा अभी भी बेसुध सी गहरी नींद में सो रही है, उसके जागने की प्रतीक्षा में वह वहाँ पालथी मार कर बैठ गया।

 
***** 

सोमवार, जून 22, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 07

अब तक: जापानी याकूज़ा-खूनी ताकानोरी, जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। वह बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से निकल भागने में सफल होते हैं। ताकानोरी से बचने के लिए, बाबा ने अपने वृद्धाश्रम में समाधी लेने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर, त्रिनेत्र गुप्त-शक्ति वाले बच्चों के लिए गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, वह अपने साथ पाँच बच्चों को ले कर मजूली में जामुन बाबा की सहायता करने जाना चाहता है। आगे पढ़िये:

 प्रारम्भ से पढ़िये  -  पिछला भाग पढ़िये

अध्याय 07 

गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

दोपहर में बच्चे जब स्कूल से लौटे तो त्रिनेत्र ने रंगनाथ से बाकी शिष्यों को अखाड़े में बुलाने के लिए कहा। थोड़ी देर में ही पाँचों वहाँ आ गये।

त्री ने कहा, “गार्गी, ज़रा देखो कि यहाँ कोई हमारी बात तो नहीं सुन रहा?”

"दादा, और तो कोई नहीं है लेकिन आश्रम में तीन शक्ति-लहरें महसूस हो रही हैं, उनमें से कोई सुन भी सकता है।"

रंगनाथ के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “यह तीसरा कौन है?

त्री बोला, “तीसरी आभा है, लेकिन उसकी शक्ति पूरी विकसित नहीं हुई है", फ़िर माधव से बोला, “क्या तुम देख सकते हो उसकी शक्ति का रंग कौन सा है?”

माधव ने आँखें बन्द कर लीं और कुछ क्षणों के लिए आभा पर ध्यान केन्द्रित किया, फ़िर बोला, “नहीं दादा, उनकी लहर का रंग बहुत हल्का है।"

तब त्री ने वसंत से कहा, "अखाड़े के आसपास अभेद्य दीवार बनाओ, ताकि वह तीनों भी हमारी बातें नहीं सुनें।

वसंत पेड़ों के माध्यम से हवा में अवरोध पैदा करवा सकता है, जिससे ध्वनि की लहरें रुक जाती हैं और परिधि के बाहर कोई नहीं सुन सकता। उसने कुछ पल के लिए आँखें बन्द कीं, फ़िर मुस्करा कर धीरे से सिर हिलाया। 

त्री बोला, “तुम्हें इसलिए बुलाया है क्योंकि हमें एक विपदा का सामना करना है।  मेरे गुरु जी के पीछे बहुत सालों से एक जापानी गैंग लगा हैं, आज सुबह वह लोग उन्हें खोजने में सफल हुए हैं। गुरु जी ने ऐसी परिस्थितियों का पहले भी सामना किया है, वह नहीं चाहते कि हम उनकी चिंता करें। लेकिन इस बार उनका पीछा करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, उसके पास गुप्त-शक्ति है, उसने उन्हें अन्वेषण-किरण से खोजा है। आज गुरु जी वहाँ से बच कर निकल आये, लेकिन अगले दिनों में उन्हें खतरा है। मैं उन्हें वहाँ अकेला नहीं छोड़ना चाहता, मैंने फैसला किया है कि मैं उनके पास जाऊँगा।"

सभी शिष्य उसकी ओर गम्भीरता से देख रहे थे।

रंगनाथ ने पूछा, “दादा, वह लोग उनके पीछे क्यों लगे हैं?”

“तुम्हें जितना कम मालूम हो उतना अच्छा है।"

गार्गी बोली, “दादा, क्या आप वहाँ अकेले जाओगे?”

"हाँ, मैं तुम लोगों को खतरे में नहीं डालना चाहता। जब मैं जाऊँगा तब तुम्हें, विशेषकर रंगनाथ और गार्गी को, यहाँ की देखभाल की ज़िम्मेदारी सम्भालनी पड़ेगी।"

रंगनाथ बोला, “दादा, अगर गुरु जी का पीछा करने वालों के पास अन्वेषण-किरण है, तो आप को अपनी शक्ति ढकने की ज़रुरत पड़ सकती है, नहीं तो वह आप को भी खोज लेंगे। आप हमें अपने साथ ले कर जाओ। हम बच्चे हैं, अगर वह जान भी जायेंगे कि हमारे पास शक्तियाँ हैं, तब भी हमें अधिक महत्व नहीं देंगे, वे छोटे बच्चों से नहीं डरेंगे। लेकिन हमारी शक्तियाँ इस लड़ाई में आप के काम आ सकती हैं।"

“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी शक्तियाँ इस लड़ाई में मेरे काम आ सकती हैं, लेकिन अगर तुममें से किसी को कुछ हो गया तो मैं अपने आप को कभी क्षमा नहीं करूँगा।"

माधव बोला, “दादा, और अगर आप को कुछ हो गया तो हमारा ध्यान कौन रखेगा? अगर हम आप के साथ में होंगे तो जैसे रंगा दादा कहते हैं, कोई बच्चों को अधिक महत्व नहीं देगा और हम आप की मदद कर सकते हैं। आप ठीक रहोगे तो बाद में हमारी देखभाल भी करोगे।"

गार्गी बोली, “आप हमें उनसे लड़ाई के समय साथ नहीं रखना चाहते, तो भी हम लोग वहाँ पास में कहीं पर रह सकते हैं और वहाँ से आप की कुछ मदद कर सकते हैं।"

त्री कुछ देर तक सोचता रहा, फ़िर बोला, “मैं यह निर्णय लेने से पहले महादेव का मार्गदर्शन चाहता हूँ।" जब वह मुश्किल में होता है और उसे समझ नहीं आता कि क्या निर्णय लेना चाहिये, तो वह मंदिर में शिव जी के सामने ध्यान लगाता है और उनसे पूछता है। उसे लगता है कि शिव जी हमेशा उसके अंतरमन के प्रश्नों के उत्तर देते हैं, उसका मार्गदर्शन करते हैं।

वसंत ने पूछा, “दादा, गुरु जी ने और क्या कहा?” 

“गुरु जी आज सुबह नारायणपुर गये थे। उनके और मेरे बीच एक मानसिक तार जुड़ा है, वह जब चाहें, मेरे मन में बात कह सकते हैं, लेकिन आज उन्होंने यह बात मुझे टेलीफोन पर बतायी। इसका मतलब है कि उस समय उन्होंने अपनी शक्ति को ढक लिया था, वह उसका प्रयोग नहीं कर सकते थे। तब से मैं उनसे सीधा सम्पर्क नहीं कर पाया हूँ, शायद वह नहीं चाहते कि उनका पीछा करने वालों को उनके आश्रम का पता चले।"

गार्गी बोली, “अगर उन्होंने गुरु जी को अन्वेषण-किरण से खोजा है तो उन्हें केवल एक शक्ति-लहर की अनुभूति हुई होगी, उसे पक्का पता नहीं होगा कि वह गुरु जी ही हैं?”

वसंत बोला, “अगर अब वह लोग गुरु जी की शक्ति-लहर को नहीं खोज पा रहे, और उन्हें वहाँ पर हममें से कोई बच्चा मिल जाये, तो शायद वह सोच सकते हैं कि जो शक्ति-लहर उन्होंने महसूस की थी, वह गुरु जी नहीं थी, बल्कि हमारी थी?”

माधव बोला, “अगर हम लोग नारायणपुर जायें तो रंगा भैया उनकी बातें दूर से सुन सकते हैं और पता लगा सकते हैं कि वह कितना जानते हैं और उनकी आगे की क्या योजना है?”

त्री ने हाथ उठा कर उन्हें चुप कराया, बोला, “तुमने जो कहना था वह कह दिया, अब मुझे सोचने का समय दो और तुम लोग यहाँ से जाओ।"

बच्चे वहाँ से गये तो त्रिनेत्र मन्दिर में नटराज की प्रतिमा के सामने पद्मासन लगा कर बैठ गया और शिव जी का ध्यान लगा कर उनसे मार्गदर्शन माँगा।

कुछ देर के बाद जब वह अखाड़े से बाहर निकला तो देखा कि वहाँ एक पेड़ के पास आभा बैठी है। उसे देख कर वह उठ कर आयी, बोली, “मैं आप से मिलने आयी थी, लेकिन बच्चों ने मुझे कहा कि आप व्यस्त हैं, कोई भीतर नहीं जा सकता।"

“कहिये", त्री ने कहा।

“मैंने विशाल को टेलीफोन किया था, वह मुझे लेने आज नहीं आ सकता, क्या मैं यहाँ से कल सुबह जा सकती हूँ?”

“हाँ, आप विशाल को कहिये कि उसे यहाँ आने की आवश्यकता नहीं, कल सुबह हम लोग रास्ते में आप को वहाँ पर छोड़ देंगे।"

“बच्चे कह रहे थे कि यहाँ एक अखाड़ा है जहाँ वह व्यायाम करते हैं, क्या मैं आप के अखाड़े को देख सकती हूँ?” आभा ने पूछा।

त्री ने एक पल के लिए सोचा कि उसे मना कर दे, फ़िर बोला, “आईये, मैं आप को दिखाता हूँ।"

उसने अखाड़े का द्वार खोला और वह दोनों भीतर घुसे। आभा वहीं दरवाज़े के पास रुक गयी, बोली, “हरे पत्तों की छाया में ढकी यह जगह बहुत सुंदर है, किसी जँगल का हिस्सा लगती है। यहाँ बहुत शाँति है।" फ़िर उसने मन्दिर की ओर देखा, बोली, “वहाँ क्या है? लगता है जैसे कोई मुझे उस ओर खींच रहा है। मुझे भीतर से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है।"

इससे पहले कि वह उसे कुछ कहता, आभा ने आँखें बन्द कर लीं और उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा धीरे-धीरे आगे-पीछे डोलने लगा। त्री को लगा कि वह ध्यान में चली गयी है।

इसके साथ ही अखाड़े में लगे पेड़-पौधों से अजीब सी सरसराहट की आवाज़ें आने लगी। कुछ ही देर में उनके आसपास की सारी धरती, जीव-जन्तुओं से भर गयी - उनमें कुछ गिलहरियाँ, चूहे और साँप थे, और उनके साथ हज़ारों छोटे-बड़े कीड़े-मकोड़े थे। सभी जीव-जन्तु किसी तंद्रा में डूबे लग रहे थे, वह उनके आसपास चक्कर लगाने लगे।

त्री घबराया, उसने आभा के कँधे पर हाथ रख कर उसे पुकारा तो उसका डोलना रुका। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, लेकिन उसकी दृष्टि खाली घूम रही थी, जैसे कि वह कुछ देख नहीं पा रही हो। तब त्री ने ज़ोर से ताली बजायी तो आभा के सिर को झटका लगा और वह जैसे नींद से जागी। उसी क्षण में जिस शक्ति ने उन जीव-जन्तुओं बाहर बुलाया था, वह क्षीण हो गई तो वह सभी अपने बिलों या पेड़ों की ओर चले गये। एक मिनट में सभी जीव-जन्तु वहाँ से गुम हो गये।

आभा ने आश्चर्य से उन्हें जाते हुए देखा। अक्सर लोग साँपों, कीड़ों-मकोड़ों से डरते हैं, लेकिन उसकी दृष्टि में बिल्कुल भी भय नहीं था। उसने त्री से पूछा, “यह कैसे किया तुमने? मुझे लगा कि मैं कोई सपना देख रही हूँ।"

जब वह कुछ नहीं बोला तो वह बोली, “तुम कोई जादूगर हो? बताओ, तुमने यह कैसे किया?”

त्री ने उसका हाथ पकड़ा, बोला, “चलो, यहाँ से बाहर चलते हैं, फ़िर तुम्हें बताऊँगा।" 

*****

उपन्यास का अगला भाग बृहस्पतिवार 25 जून को पढ़ सकते हैं। 

गुरुवार, जून 18, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 06

अब तक: जापानी यामागुची गैंग का याकूज़ा-खूनी ताकानोरी जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लेने भारत आया है। ताकानोरी एक दिन बाबा को नारायणपुर में खोज लेता है लेकिन वह उसके चँगुल से भागने में सफल होते हैं। बाबा अपने शिष्य त्रिनेत्र को इसकी सूचना देते हैं तो वह कहता है कि वह तुरंत वहाँ आ रहा है। इधर मजूली द्वीप में बाबा अपने वृद्धाश्रम में सबको बताते हैं कि उन्होंने समाधी लेने का निर्णय लिया है। आगे पढ़िये:

 प्रारम्भ से पढ़िये  -  पिछला भाग पढ़िये

 गँगटोक, सिक्किम, 2 मार्च 2026

त्री ने सोचा कि शायद उसने आभा को वहाँ बुला कर गलती की है। वह उसके मित्र विशाल की बहन है और कुछ दिनों के लिए उनके अनाथाश्रम में रहने आयी है।

विशाल का कुर्स्यांग में होटल है, मोयरंग होटल और कैफे। उस जगह पर किसी ज़माने में एक चाय-बागान होता था। होटल-मालिक बनने से पहले विशाल कलाकार बनने के सपने देखता था। होटल मालिक बनने के बाद, अब हर साल वह अपने होटल के विस्तृत बाग में एक कला प्रदर्शिनी आयोजित करता है।

त्री पहले पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाता था, पर पिछले कई सालों से वह ताँबे की मूर्तियाँ बनाने लगा है। वह विशाल से एक कला-प्रदर्शनी में मिला था और जल्दी ही दोनों मित्र बन गये थे।

विशाल ने उसे अपनी बहन आभा की दुखद कहानी सुनायी थी। आभा का पति विवेक, एक पत्रकार था और दो साल पहले वह भारत-म्यनमार सीमा पर होने वाली तस्करी के बारे में जानकारी जमा कर रहा था जब किसी ने उसकी कार को बम विस्फोट से उड़ा दिया था। उस समय, उसके साथ उनकी चार साल की बेटी मयूरी भी थी, जो पिता के साथ उस बम विस्फोट में मरी थी।

इस घटना के बाद आभा एक गहन उदासी में डूब गयी थी और करीब एक साल तक घर से बाहर नहीं निकली थी। कुछ महीने पहले विशाल उसे कुर्स्यांग ले कर आया था, जहाँ वह त्री से मिली थी। उसने अपने भाई से त्री के अनाथाश्रम के बारे में सुना था और कला प्रदर्शनी में वह उसकी ताँबे की मूर्तियों से बहुत प्रभावित हुई थी। उसने त्री से पूछा था, “काँसे को मूर्तियों में कैसे ढालते हो? क्या उसे पहले पिघलाना पड़ता है?”

त्री ने कहा था, "यह कैसे करता हूँ उसे बता कर समझाना कठिन है, तुम कुछ दिन हमारे यहाँ आ कर देखो। मेरा अधिकतर समय तो अनाथाश्रम को चलाने में निकलता है, पर जब कुछ खाली समय मिलता है तो मैं शिल्पकार भी बन जाता हूँ। हमारे यहाँ लड़कियों का होस्टल है, तुम वहाँ ठहर सकती हो।"

आजकल त्री सात प्रतिमाओं का गुट बना रहा है, जिसमें एक कृष्ण हैं, एक राधा, एक गाय और तीन गोपियाँ। अभी तक उसने तीन गोपियों और एक गाय की प्रतिमाएँ पूरी की हैं और अब राधा को बनाने में जुटा है। यह काम करते हुए वह ताँबे को काटने वाली मशीन का उपयोग करता है, जिससे बहुत शोर होता है, इसलिए वह कानों पर शोर कम करने वाले इयरफोन लगाता है।

देवी प्रतिमा के रक्षकआभा को उनके यहाँ आये हुए करीब एक सप्ताह हुआ है। शायद बच्चियों के बीच में रह कर उसे अपनी बेटी की याद आती है। गार्गी ने त्री को बताया है कि वह अक्सर बालकनी में बैठ कर, दूर पहाड़ों को देखती रहती है, और कभी-कभी रोती भी है। त्री को समझ नहीं आता कि वह उसकी किस तरह से सहायता करे।

हर रोज़ की तरह उस दिन भी सुबह मुँह-अँधेरे, त्री ने अपने शिष्यों के साथ उनकी गुप्त-शक्ति के विकास के लिए अभ्यास किये थे। उनके अनाथाश्रम में गुप्त-शक्ति वाले कुल सात बच्चे हैं लेकिन उनमें से दो बच्चे अभी छोटे हैं, वे पाँच साल के नहीं हुए हैं, इसलिए वह प्रशिक्षण में हिस्सा नहीं लेते। बाकी के पाँच बच्चों के साथ, उनके स्कूल जाने से पहले, त्री हर रोज़ सुबह दो घंटे के लिए उन्हें विशेष अभ्यास कराता है।

यह प्रशिक्षण उनके अनाथाश्रम से कुछ दूर, पेड़ों से घिरे हुए एक अखाड़े में होता है, जिसके चारों ओर बेलों-लताओं से ढकी हुई एक ऊँची दीवार है। ड्रोन से देखें तो उस अखाड़े का पूरा क्षेत्र, पेड़ों की शाखाओं और घने पत्तों से इस तरह ढका हुआ है कि ऊपर से धरती का एक इँच भी दिखाई नहीं देता।

अखाड़े के कोने में एक छोटा सा, परन्तु सुंदर मन्दिर है, जिसमें एक ओर ताँडव नृत्य करते हुए नटराज की प्रतिमा है और दूसरी ओर ध्यानलीन बुद्ध की, उन दोनों के बीच में बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की प्रतिमा है।

मंदिर के सामने, खुले में एक चबूतरा है जिसके चारों ओर सफेद और हरे रंग की माँ तारा की प्रतिमाओं की कतार बनी है। इस चबूतरे के सामने वह हर रोज़ बच्चों से विभिन्न अभ्यास तथा व्यायाम कराता है।

त्री कहता है कि उन्हें एक-दूसरे के साथ मिल कर एक-जीवात्मा की तरह सोचना सीखना है। वह उन्हें समझाता है, “हमें केवल लड़ना नहीं सीखना, हमें अपने भीतर करुणा, एकाग्रता और ध्यान के गुण भी बढ़ाने हैं, क्योंकि हम अपनी शक्तियों का प्रयोग केवल निर्बलों और शक्तिहीनों की रक्षा के लिए कर सकते हैं, किसी गलत काम या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।"

उसके शिष्यों में रंगनाथ सबसे बड़ा है। वह तेरह साल का है और उसकी प्रमुख शक्तियाँ हैं, सुनना और सूँघना। वह उन ध्वनियों को सुन सकता है जिन्हें सामान्य लोग नहीं सुन पाते। दो सौ मीटर दूर खड़ा व्यक्ति धीमे स्वर में क्या फुसफुसा रहा है, वह उसे सुन सकता है। वह व्यक्तियों, पशुओं, वस्तुओं आदि की गंध को सूँघ कर उन्हें पहचान सकता है। इसलिए उससे कुछ भी छिपाना बहुत कठिन है। उसके दिमाग में सिनेस्थीसिया है, यानि वह विभिन्न गंधों को अलग-अलग रंगों में देखता है।  

रंगनाथ के बाद, दूसरे नम्बर पर है गार्गी विनायक, जो बारह साल की है। उसकी प्रमुख गुप्त-शक्ति को वह लोग अजगर-पाश कहते हैं। वह किसी भी व्यक्ति के मस्तिष्क में घुस कर उसकी माँसपेशियों की नसों को बाँध सकती है ताकि वह अपनी जगह से हिल नहीं पाये। उसके पास विचार पढ़ने की शक्ति भी है। किसी के मन में क्या है, वह उसे जान सकती है और लोगों की शक्ति-लहरों को महसूस कर लेती है। 

तीसरे नम्बर पर है नौ बरस का वसंत, जिसकी गुप्त-शक्ति विचित्र है। जब त्रिनेत्र ने उसके बारे में गुरु जी को बताया था तो वह भी चकित हो गये थे। उसकी शक्ति वनस्पति जगत से जुड़ी है, वह पेड़ों-पौधों से, यहाँ तक कि घास के तिनकों से भी, बातें कर सकता है। वह जैसा चाहे, पेड़-पौधे उसी दिशा में विकसित हो जाते हैं। अखाड़े के क्षेत्र को पेड़ों की शाखाओं और घने पत्तों से उसी ने ढका है। अगर कोई बीमार हो तो वह पेड़ों से बात करके बता सकता है कि रोगी को किस पत्ते या जड़ी-बूटी को औषधि के रूप में दिया जाये।

चौथे नम्बर पर है आठ साल का माधव, जिसके पास दृष्टि शक्ति है। उसकी आँखें सामान्य रोशनी में बहुत दूर तक देख सकती हैं। साथ ही वह अल्ट्रावायोलैट और इन्फ्रारैड रोशनी को भी देख सकता है, जो सामान्य व्यक्तियों को नहीं दिखतीं। वह लोगों की शक्ति-लहरों को भी विभिन्न रंगों में देखता है।

उनकी पाँचवी और उम्र में सबसे छोटी, छह साल की शिष्या है तृप्ति। उसकी शक्ति लोहे और स्टील जैसी धातुओं से जुड़ी है। उसे अभी अपनी शक्ति को ठीक से संचालित करना नहीं आता, इसलिए जब वह पास होती है तो अक्सर चम्मच और चाकू जैसी चीज़ें मेज़ से उठ कर हवा में उड़ने लगती हैं। उसकी श्रवण शक्ति भी अच्छी है। 

उनका अनाथाश्रम कुर्स्यांग से गँगटोक जाने वाली सड़क के पास है। उनके यहाँ अधिकतर बच्चे सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर-पूर्व से आते हैं, एक-दो बच्चे भूटान और नेपाल के भी हैं।

गुरु जी ने त्री को सिखाया था कि गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों को अक्सर पढ़ने-लिखने, बात समझने और एक जगह पर शाँत बैठने में कठिनाई होती है। इस वजह से ऐसे बच्चे अक्सर स्कूलों में पढ़ाई में कमज़ोर होते हैं और कभी-कभी तो उन्हें मानसिक रूप से विकलाँग भी समझा जाता है। इस बात को ध्यान में रख कर त्री ने उत्तर-भारत के सभी अनाथाश्रमों में कहलवाया है कि अगर उनके यहाँ कोई बच्चा ऐसा हो जिसे पढ़ने-लिखने में दिक्कत हो, तो वे उसे उनके अनाथाश्रम में भेजें। ज़रूरत पड़े तो ऐसे बच्चों की जाँच करने वह खुद भी जाता है। इस तरह से उनके यहाँ सात गुप्त-शक्ति वाले बच्चे एकत्रित हो गये हैं।

उस दिन व्यायाम और अभ्यास समाप्त होने के बाद, बाकी बच्चे चले गये, लेकिन गार्गी नहीं गयी, बोली, “त्री दादा, आप से एक बात करनी है।"

त्री बोला, “अगर चाहें तो रंगा और तृप्ति, बाहर से भी हमारी बातें सुन सकते हैं, तुम उनके सामने भी मुझसे बात कर सकती थीं, यह अकेले में क्यों?" 

वह बोली, “अगर वह दोनों सुनना चाहते हैं तो सुन लें, पर मेरे ख्याल में अभी वह यहाँ नहीं रुकेंगे क्योंकि अभी टीवी पर रंगा दादा की कार्टून फ़िल्म का टाईम हो रहा है।"

त्री मुस्कराया, “अच्छा बताओ, तुम क्या बात करना चाहती हो?”

"हमारे होस्टल में जो आभा दीदी आयी हुई हैं, क्या उनमें भी कोई गुप्त-शक्ति है।"

त्री के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “क्यों? क्या तुमने कुछ महसूस किया?”

गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी, बोली, “मुझे उनमें शक्ति-लहरें महसूस होती हैं। जब वह यहाँ आयीं थीं, तब नहीं होती थीं, लेकिन पिछले एक-दो दिनों में होने लगी हैं, शायद उन पर हमारा और हमारी मूर्तियों का प्रभाव पड़ा है?"

त्री सोच में डूब गया। बच्चों की शक्ति को बचपन में विकसित नहीं किया जाये तो वह मुरझा जाती है। शायद आभा का शक्ति-बीज किसी वजह से पूरा नहीं मुरझाया था, और यहाँ रहने से वह फ़िर से जाग गया है। उसने गार्गी से कहा, “तुमने मुझे बता कर अच्छा किया, मैं इसकी जाँच करूँगा।"

कुछ देर बाद वह आभा को खोजने गया। वह लड़कियों के होस्टल के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठी कोई किताब पढ़ रही थी। त्री को देख कर वह उठने लगी तो उसने उसे बैठे रहने का इशारा किया, उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला, “आप कुछ दिनों से मेरी शिल्पशाला में नहीं आईं, तो मैं सोच रहा था कि शायद आप की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए आप से मिलने चला आया।"

वह बोली, “जब मैं यहाँ आयी थी तो सोचा था कि ताँबे से शिल्प बनाना सीखूँगी, लेकिन वह मेरे बस का नहीं है। आप की ताँबे की परत इतनी भारी होती है कि मैं उसे उठा नहीं सकती। उसे मशीन से काटना, हथौड़ों से पीट कर सीधा करना या मोड़ कर आकार देना, इस सब के लिए जो ताकत चाहिये, वह मेरे बस की बात नहीं। लेकिन यहाँ आप के पास आ कर पता नहीं कैसे, मेरा मन कुछ शाँत हो गया है।"

त्री ने भी महसूस किया कि आभा के माथे से शक्ति-लहर की हलकी सी अनुभूति आ रही है। क्या उसे आभा से इस बारे में बात करनी चाहिये? थोड़ा सा सोच कर वह इस नतीजे पर पहुँचा कि इस विषय में जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं होगा।

वह वहाँ से उठ रहा था जब उसके मोबाइल की घंटी बजी। उसने देखा कि गुरु जी का फोन है तो वह समझ गया कि कुछ विशेष बात है क्योंकि वह उसे कभी फोन नहीं करते। उसने उनसे केवल एक मिनट तक ही बात की और फ़िर फोन बंद कर दिया।

आभा ने सुना कि उसने फोन पर किसी से कहा, “गुरु जी, हम आ रहे हैं" और उसका गम्भीर चेहरा देखा तो पूछा, “क्या हुआ? तुम्हें कहाँ जाना है?”

“एक एमरजैंसी हो गयी है, और हमें कल सुबह ही यहाँ से निकलना होगा। आप को यहाँ अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा, अच्छा होगा कि आप अपने भाई के पास कुर्स्यांग लौट जायें।"

“क्यों? मेरे यहाँ अकेले रहने में क्या कोई दिक्कत है?”

त्री ने सिर हिला कर मना किया, बोला, “हम लोग कुछ दिनों में लौट आयेंगे, तब आप यहाँ वापस आ सकती हैं। लेकिन इन दिनों में अगर आप विशाल के पास चली जायें तो बेहतर होगा।"

*****

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