गुरुवार, मई 28, 2026

नया धारावाहिक उपन्यास

करीब एक-डेढ़ महीना पहले मैंने एक नया फैंतेसी उपन्यास लिखा, "देवी प्रतिमा के रक्षक"। यह एक छोटा सा हल्का-फुल्का उपन्यास है, जिसमें ताकानोरी नाम का एक जापानी याकूज़ा-गुँडा, एक गुप्त-शक्ति वाली मूर्ति की खोज में हिन्दुस्तान आता है और उसका मुकाबला एक अनाथालय में काम करने वाले युवक त्रिनेत्र और वहाँ रहने वाले अनाथ बच्चे करते हैं।

साथ की तस्वीर में उपन्यास के तीन प्रधान पात्र हैं - कोरिया के बौद्ध भिक्षुक जून मिन जिन्हें उनके भारतीय भक्त जामुन बाबा के नाम से जानते हैं, जापानी याकूज़ा ताकानोरी और अनाथाश्रम में काम करने वाला त्रिनेत्र। अगले सोमवार, 1 जून 2026 से आप इस उपन्यास को इसी ब्लाग पर पढ़ सकेंगे। 

अमेज़न या अन्य ओन-लाईन पर्टल या प्रकाशक के पास अपने उपन्यास को छपवाने की जगह पर मैंने अपने उपन्यास को ब्लॉग पर डालने का निर्णय क्यों लिया, इस आलेख में मैं इसकी बात करना चाहता हूँ।  

बचपन की यादें

जब मैं छोटा था तब बहुत सी हिंदी पत्रिकाएँ छपती थीं। पहले चँदामामा पत्रिका में रामायण की कथा छपती थी, वह पढ़ता था। कुछ बड़ा हुआ तो हमारे घर पर धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी सप्ताहिक पत्रिकाएँ आती थीं। उनमें अक्सर धारावाहिक उपन्यास छपते थे, यानि हर सप्ताह उपन्यास का एक नया अध्याय पढ़ने को मिलता था। तब पत्रिका आने और उपन्यास पढने की बहुत प्रतीक्षा रहती थी। शिवानी, शंकर, किशन चंदर, अन्नपूर्णा देवी और बिमल मित्र जैसे लेखकों से मेरा इसी तरह से परिचय हुआ था।

आजकल हिंदी की वैसी साप्ताहिक पत्रिकाएँ आनी बंद हो गयीं हैं। हिंदी की कुछ मासिक पत्रिकाएँ हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि उपन्यास के एक अध्याय को पढ़ने के लिए कोई एक महीने तक प्रतीक्षा करेगा। बल्कि, एक महीने पहले क्या पढ़ा था, उसे याद रखना कठिन होगा। मैं सोच रहा था कि पहले जैसा धारावाहिक उपन्यास पढ़ने का अनुभव आज के पाठकों को कैसे दिया जा सकता है? तब उसे ब्लाग में छापने की बात मन में आयी।

इस ब्लाग के आलेखों को दो सौ - तीन सौ पाठक आसानी से मिल जाते हैं, और कुछ लोकप्रिय आलेखों को पढ़ने वालों की संख्या कुछ हज़ार तक पहुँच जाती है। मैंने सोचा है कि अगर मेरे उपन्यास को ब्लाग से सौ - दो सौ पाठक मिल जायें तो मेरे लिए काफ़ी हैं और इसके लिए मुझे किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

मुझे अच्छी पैंशन मिलती है, मुझे और पैसे की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी जहाँ तक मुझे मालूम है, आम हिंदी लेखकों की किताबों से कमायी अधिक नहीं होती।   

हिंदी किताबों के प्रकाशक 

हिंदी प्रकाशनों के बारे में जितना पढ़ा-जाना है, उससे लगता है किताब छपवाना बहुत कठिन है, और वह मेरे बस की बात नहीं है। मेरे एक अन्य उपन्यास को छापने की मित्र अरविंद मोहन की सहायता से एक प्रतिष्ठित प्रकाशक से करीब तीन साल पहले बात हुई थी, वह अभी तक नहीं छपा और न ही उसके छपने के कुछ आसार दिखाई देते हैं।

कुछ दिन पहले जाने-माने पत्रकार और लेखक प्रिय दर्शन ने कुछ दिन पहले फेसबुक पर हिंदी लेखकों की स्थिति के बारे में लिखा था, कि "लेखक का पारिश्रमिक या तो बंद हो चुका है या घटता जा रहा है। जो वेब पोर्टल पहले लेखक को पैसे देते थे, उन्होंने पारिश्रमिक देना बंद कर दिया है, क्योंकि वे 'घाटे' में चल रहे हैं। किताबों की रॉयल्टी इतनी कम मिलती है कि बताने में कोई शर्मिंदा हो जाए। ... प्रकाशन की दुनिया में पैसे देकर- या अपनी अफ़सरी या नेतागीरी के बूते किताबें बिकवा कर- किताबें छपवाने का जो नया चलन शुरू हुआ है, उसने लेखकों के सामने एक नई मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी किताबें प्रकशकों के यहां पड़ी रहती हैं- उनका प्रकाशन टलता जाता है। किताबों के प्रचार का ज़िम्मा भी लेखक का है प्रकाशक का नहीं"।

वैसे अगर मैं चाहूँ तो मैं अपने उपन्यास को पैसे दे भी कर छपवा सकता हूँ, पर मुझे लगता है कि उससे मैं अपने उपन्यास को कुछ जान-पहचान के लोगों को भेज दूँगा, लेकिन उसे सामान्य पाठक नहीं मिलेंगे। वैसे भी यह हल्का-फुल्का जासूसी किस्म का उपन्यास है, शायद इसे ब्लाग पर अधिक लोग पढ़ेंगे।

वैसे तो दुनिया में एमाज़ॉन और नॉटनुल जैसी वेबसाईट हैं जहाँ किताबें छापी जा सकती हैं। मुझे एमाज़ॉन के किन्डल प्रकाशन का अनुभव नहीं है, लेकिन मैं नॉटनुल पर नियमित हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ता हूँ। उनमें किताबें छपवा सकता हूँ, लेकिन मुझे लगा कि अगर मुझे लेखन की कमाई नहीं चाहिए, तो मैं अन्य झंझट क्यों करूँ?

कुछ अन्य ख्याली पुलाव

एक बार उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन पूरा हो जायेगा तो सोचा है कि जो पाठक चाहेंगे मैं उन्हें इस उपन्यास को उन्हें ईमेल से पीडीएफ, इपब और मोबी फॉरमैट में भी भेज सकता हूँ, ताकि जो लोग मेरे ब्लाग को नहीं पढ़ना चाहते, वह भी इसे पढ सकते हैं।

मैं यह भी चाहता हूँ कि युवा लोग हिंदी में पढ़ें और लिखें। उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए मैं युवा पाठकों के लिए "आलोचना पुरस्कार" आयोजित करने की भी सोच रहा हूँ, यानि सोचा है कि मेरे उपन्यासों की सार्थक आलोचना लिखने वाले पाँच-दस युवाओं को मैं कुछ पुरस्कार दे सकता हूँ और उनकी आलोचना को ब्लाग पर जगह दे सकता हूँ - इसके बारे में भी सोच कर अगले दिनों में कुछ निर्णय लूँगा।

आशा है कि अगले सोमवार एक जून से आप मेरे उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" को पढ़ेंगे और मुझे अपनी राय भेजेंगे। बाकी की सब बातें अभी दिमाग में घूम रही हैं, अगले कुछ दिनों में मैं इस विषय में निर्णय लूँगा। इस बारे में मेरे साथी ब्लॉग लेखक और पाठक मुझे कुछ सलाह देना चाहें तो उसके लिए आप को अग्रिम धन्यवाद।

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मंगलवार, अप्रैल 28, 2026

गुवाहाटी जाने की यात्रा

आज से दस साल पहले अप्रैल 2016 में, मैं भारत में दो साल के गुवाहाटी प्रवास के बाद इटली लौटा था।

आज जब उस दसवीं वर्षगाँठ की बात अचानक याद आ गयी तो सोचा कि क्यों न उन दिनों की यादों को ताज़ा किया जाये और उन दिनों पर एक आलेख लिखा जाये। तीन दशकों तक विदेश में रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के बाद, जब 2014 में मैंने भारत जाने की सोची थी तब गुवाहाटी जाने का विचार मन में नहीं था, बल्कि कुछ अन्य काम करने की सोची थी।

सोचता था कि कहीं मन का काम नहीं मिलेगा तो किसी मन-पसंद छोटे शहर में जगह को खोज कर वहाँ अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लूँगा। लेकिन अपना क्लीनिक खोलने से पहले, मैं कुछ मित्रों के पास रह कर देखना चाहता था कि शायद उनके साथ मन लग जाये, सोचता था कि वह बेहतर होगा क्यों कि मैं अकेले रहने के विचार से डरता था।

हम कुछ सोच कर चलते हैं और नियति हमें किसी ओर दिशा में ले जाती है। आज के इस आलेख में मेरी गुवाहाटी पहुँचने की उस यात्रा के विभिन्न पड़ावों की बाते हैं। 

केसला, मध्यप्रदेश 

सारा जीवन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के बाद मैंने निश्चय किया था कि 2014 में, अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर कुछ समय भारत में बिताने जाऊँगा। मेरी वह यात्रा केसला के गाँव से शुरु हुई।

मेरी बात सबसे पहले इटारसी के पास, केसला (मध्यप्रदेश) में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत समाजवादी विचारधारा वाले सुनील जी से हुई थी। वह वहाँ पर बहुत समय से गरीब लोगों के विकास और मानव अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। मैंने सोचा था कि उनके साथ काम करूँगा। जब अप्रैल 2014 में मुझे उनकी अकस्मात मृत्यु का समचार मिला तो गहरा धक्का लगा। मुझे लगा कि उनके बिना शायद वहाँ पर काम करना नहीं हो पायेगा, फ़िर भी भारत पहुँच कर सबसे पहले मैं उनके घर पर केसला ही गया था।

केसला गाँव, मध्यप्रदेश

सुनील जी की पत्नि मॉन्टी (स्मिता) से मेरा दूर का रिश्ता भी है, और हमारी पुरानी जान-पहचान भी थी। केसला में मैं कुछ दिन उनके साथ उनके घर पर रहा, सुनील की के विभिन्न साथियों से मेरी जान-पहचान हुई। लेकिन मुझे लगा कि सुनील जी के अचानक जाने की वजह से वहाँ जो जगह रिक्त हुई थी, उसका घाव उस समय बिल्कुल ताज़ा था। मैंने सोचा कि पता नहीं, उनके बिना, बाकी के उनके साथी उस काम को किस तरह आगे चला पायेंगे?

यह भी सोचा कि वहाँ सुनील जी के न होने से, वहाँ रह कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नया काम शुरु करना मेरे लिए कठिन होगा। यह सोच कर मैं वहाँ से चल पड़ा।

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

तब मैं केसला से बिलासपुर गया। वहाँ पर गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में बहुत प्रशंसा सुनी थी। उन्होंने मुझे वहाँ पर कुष्ठ रोग उपचार और विकलांगता कार्यक्रम में काम करने के लिए कहा, उस काम का विचार भी मुझे बहुत अच्छा लगा था।

जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था को डॉ. योगेश जैन जैसे आदर्शवादी डॉक्टरों ने शुरु किया था, उनके साथ काम करने का विचार मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मैं उनके सामुदायिक स्वस्थ्य कर्मचारियों के साथ कुछ गाँवों के क्लिनिक देखने भी गया।

जन स्वास्थ्य सहयोग का मानपुर गाँव में क्लिनिक, छत्तीसगढ़

लेकिन एक दिक्कत थी, कि उनके होस्टल में जगह नहीं थी, वहाँ काम करने का मतलब था कि मुझे पास के किसी गाँव में अलग घर ले कर रहना पड़ता। मैं अकेला रहने के विचार से डर रहा था। दो-तीन दिन वहाँ रहा, बहुत सोचा, पर मुझे लगा कि मैं वहाँ गाँव में अकेला नहीं रह पाऊँगा। आखिर में मैं वहाँ से निकल पड़ा।

जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ करने से रुक जाते हैं लेकिन उसके निशान आप के मन में रह जाते हैं। उसके बाद सालों तक आप अपने आप से पूछते हैं कि अगर मैंने वह रास्ता चुन लिया होता तो मेरा जीवन कैसा होता? गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग में काम करने के बारे में मुझे ऐसा ही लगता रहा है, दुख होता है कि मैंने वहाँ पर अकेले रहने की कोशिश क्यों नहीं की।  

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

बिलासपुर से मैं लखनऊ गया जहाँ पर मेरी पुरानी मित्र डॉ. ब्रिजिता का सैंट मेरी क्लीनिक, अस्पताल और नर्सिन्ग कॉलेज था। 

सैंट मेरी की नर्सिन्ग की छात्राएँ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

अस्पताल और नर्सिन्ग स्कूल के काम के साथ-साथ डॉ. ब्रिजिता आसपास के जिलों में बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य तथा विकलाँग जनों के लिए कार्यक्रम चला रही थीं। मैं उनके पास करीब एक मास रुका।

उनके साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम में काम करने का विचार था लेकिन भीषण गर्मी में गाँवों में घूमने के एक-दो अनुभवों के बाद मैं समझ गया कि मैं गाँवों के उस कठिन वातावरण में अधिक दिन तक नहीं रह पाऊँगा। इस तरह से मैंने डॉ. ब्रिजिता से भी विदा ली।

मनाली, हिमाचल प्रदेश

मेरे एक अन्य मित्र के पिता मनाली के क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संस्था चला रहे थे, जहाँ वह सामुदायिक विकास के साथ-साथ, स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी काम करते थे। लखनऊ के बाद मैं कुछ दिन उनके पास रहने गया। उनकी संस्था का डॉक्टर काम छोड कर चला गया था, उन्हें एक डॉक्टर की आवश्यकता थी। 

उनकी संस्था का अधिकाँश काम मनाली शहर में था पर उनका घर शहर के बाहर, कुछ दूर जा कर था। उनके घर के साथ उनका एक अन्य फ्लैट भी था, उन्होंने कहा कि अगर मैं उनके साथ काम करूँगा तो उस फ्लैट में रह सकता हूँ।

वहाँ बाकी सब कुछ बढ़िया था, लेकिन पहाड़ों के बीच में, सर्दियों में ठंड और हिमपात के साथ, शहर के बाहर उस बहुत सुंदर लेकिन सुनसान जगह में रहने के विचार से मुझे डर लगा। इतनी सुंदर जगह पर रहने का सोच कर अच्छा भी लगता था, पर शहर से बिल्कुल बाहर, सुनसान जगह का डर भी था।

शुरु गाँव, मनाली, हिमाचल प्रदेश

उन्हीं दिनों में मुझे एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रैंस के लिए आयरलैंड जाना था, सोचा कि वहाँ से लौट कर ही निर्णय लूँगा कि मनाली में काम स्वीकारूँ या नहीं।

उन दिनों में मन में थोड़ी सी मायूसी भी थी कि अभी तक कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी जहाँ मुझे पूरे दिल से लगे कि हाँ, मैं यहाँ रह कर, इस जगह में काम करना चाहता हूँ। हर जगह की कुछ बातें अच्छी लगती थीं, कुछ नहीं।

सोचा कि शायद मुझे अपना क्लिनिक खोलने के लिए अपनी पसंद का छोटा गाँव खोजना पड़ेगा, जो किसी शहर से बहुत दूर नहीं हो, और जहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत दूर न हो। ऐसी कोई जगह सचमुच हो सकती है, इसका मुझे शक था।

गुवाहाटी, असम

आयरलैंड और इटली में कुछ दिन बिता कर मैं वापस भारत लौटा तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मेरे पुराने मित्र चपल खासनबिस के माध्यम से मुझे बँगलौर की स्वयंसेवी संस्था "मोबिलिटी इंडिया" के लिए गुवाहाटी में विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने के काम का आफर मिला।

मैं कुछ साल पहले, एक अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार पहले गुवाहाटी गया था और वहाँ करीब दस दिन रहा था, इसलिए वह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं था।  

मैं गुवाहटी पहुँचा, कुछ मित्रों के माध्यम से मैंने उज़ान बाज़ार क्षेत्र के एक होटल में कमरा बुक किया था। मेरा विचार था कि वहाँ पर सप्ताह-दस दिन रुक कर, वहाँ की स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलूँगा, और विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम शुरु हो सकता है या नहीं, इसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।

पहले दिन सुबह मुझे एक संस्था के दफ्तर में किसी से मिलने जाना था, होटल से निकला और कुछ दूर पर मेरी मुलाकात बतखों के एक दल से हो गयी। सड़क के किनारे पर वह बतखें एक कतार में चल रही थीं, सुबह का दफ्तर जाने वाला सारा ट्रैफिक, उनके पास धीमा करके जा रहा था ताकि उन्हें दिक्कत नहीं हो। पता चला कि वह पास के उग्रतारा मंदिर की बतखें हैं।

उग्रतारा मंदिर की बतखें, गुवाहाटी, असम

पता नहीं क्यों, उन बतखों को देख कर मुझे लगा मानो नियति ने मुझे संदेश भेजा हो कि इसी शहर में मुझे रुकना है, सोचा कि जिस शहर के लोग बतखों के सड़क पर चलने का ध्यान रख सकते हैं, वहाँ रहना अच्छा होगा।

अंत में

जिस दिन मैं गुवाहाटी में उग्रतारा की बतखों से मिला था, उसी दिन मेरी मुलाकात फादर पॉल से भी हुई, जिनके साथ मैं बहुत समय तक रहा और जो असम के उन दिनों में मेरे सबसे करीबी मित्र बने।

यही मेरी किस्मत में लिखा था कि मैं गुवाहाटी में रहूँ और वहाँ बहुत से लोगों से मित्रता बने और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र को जानू और समझूँ। 

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शुक्रवार, मार्च 20, 2026

मेरा फैंतासी उपन्यास

बहुत सालों से मैं एक हल्का-फुल्का सा जासूसी उपन्यास, जेम्स बॉन्ड जैसा कुछ, लिखना चाहता था। बचपन में ऐसी किताबें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

साठ के दशक में, घर पर पापा की अलमारी में बहुत सी गम्भीर साहित्य वाली किताबें थीं, जिन्हें मैंने बहुत छोटी उम्र में पढ़ना शुरु कर दिया था - नानक सिंह, रांगेय राघव, किशन चंदर, चतुरसेन, जैसे बहुत से लेखक मुझे अच्छे लगते थे। घर में सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएँ भी आती थीं जिनमें मुझे शिवानी, शंकर, बिमल मित्र जैसे लेखकों को पढ़ना भी अच्छा लगता था।

लेकिन गम्भीर साहित्य के साथ हल्का-फुल्का साहित्य भी मुझे प्रिय था। मेरी मौसी की सहेली जो हमारी पड़ोसी थी, उनके यहाँ जासूसी उपन्यास पढ़ने को मिलते थे। मौसी के अपने सबसे प्रिय लेखक थे गुलशन नन्दा, जिनकी बहुत सी किताबें मैंने गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ी थीं। छुट्टियों में हम कई बार बड़ी मौसी के यहाँ पश्चिमी बंगाल में अलीपुर द्वार जाते थे, जहाँ जाने की यात्रा में तीन दिन लगते थे, तब रास्ते भर मैं स्टेशन से खरीदी जासूसी और गुलशन नन्दा किस्म की किताबें पढ़ता था।

नया उपन्यास - देवी प्रतिमा के रक्षक 

आखिर में मैं अपना सपना पूरा करने में सफल हुआ। असल में इसे लघु उपन्यास कहना चाहिये, और इसे लिखने में मुझे बहुत मज़ा आया। मैं इसके प्रकाशन के बारे में सोच रहा हूँ, नये लेखकों के लिए हिंदी किताबों के प्रकाशक मिलना कठिन लगता है, और चूँकि मैं विदेश में रहता हूँ, प्रकाशित करवाने में और भी दिक्कते हैं। वैसे तो सुना है कि हिंदी किताबों के लेखन की कमाई से जीवन-यापन कठिन है, लेकिन मेरे पास मेरी पैंशन है, मुझे पैसे की आवश्यकता भी नहीं है, इसलिए मैंने सोचा है कि इसे अपने इस ब्लाग पर ही प्रकाशित कर चाहिये। आप की क्या राय है?

उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" का कवर चित्र

यह उपन्यास लिखने की यात्रा

मेरे पहले दो उपन्यास साहित्यिक विषयों पर थे। एक उपन्यास लिखने में मुझे दो-तीन साल लगते थे, लेकिन मन कभी संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए मैं उन्हें बार-बार लिखता, दस-पंद्रह बार भी। जबकि इस फैंतासी उपन्यास लिखने में सिर्फ दो महीने लगे।

शुरु में सोचा था कि उपन्यास एक रहमदिल खूनी पर होगा, जिसे अपने खून-खराबे पर पछतावा है और जो अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अब केवल बुरे लोगों को मारता है, यानि कि वह एक तरह का रोबिनहुड-खूनी है। लेकिन जब उसे लिखने लगा तो वह कहानी उस खूनी के हृदय परिवर्तन की बात पर केन्द्रित हो गयी, यानि कि उस खूनी का दिल क्यों और कैसे बदलता है।

मेरे उपन्यास का खूनी, ताकानोरी ओकामो, एक जापानी याकूज़ा है, जिसे दक्षिण कोरिया के एक बुद्ध भिक्षुक की विशेष शक्ति वाली मूर्ति की खोज है। वह भिक्षुक जी उस मूर्ति के साथ कई सालों से भारत में एक वृद्धाश्रम में छिपे हुए रहते हैं।

उपन्यास लिखते हुए कथानक में एक और परिवर्तन हुआ, कि उस खूनी की कहानी के साथ, यह एक अनाथाश्रम में रहने वाले कुछ गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों की कहानी भी बन गयी। उपन्यास पूरा करने के बाद मुझे लगा कि शायद मेरी कहानी के नायक त्रिनेत्र और उनके साथी बच्चे "मिस्टर इंडिया" फ़िल्म से कुछ हद तक प्रभावित हैं।

शायद यह उपन्यास बड़े बच्चों, किशोरों और नवजवानों के लिए अधिक उपयुक्त है, पर यह निर्णय तो पाठक ही कर सकते हैं। यह उपन्यास भारत के उत्तर-पूर्व की पृष्ठभूमि पर है, इसका एक बड़ा हिस्सा, असम के मजूली द्वीप पर केन्द्रित है, उसके अलावा इसमें विष्णुपुर, गंगटोक और मणिपुर भी हैं।  

उपन्यास का कवर

मेरे बेटे ने कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) यानि आर्टिफीशियल इन्टैलिजैंस से इसके लिए बहुत से कवर बना कर दिये, जिनके कुछ नमूने आप नीचे देख सकते हैं।

ए.आई. से बने मूल चित्र

अंत में मैंने जो कवर चुना, मुझे लगा कि उसके रंग अच्छे नहीं हैं, वह स्पष्ट रूप से दिखता है कि ए.आई. से बना है। मैंने उसके रंग हटा कर उन्हें कम्प्यूटर पर हाथ से रंगा और कुछ फिल्टर लगा कर देखे। जब उपन्यास निकलेगा, तब आप को इस पर राय देने का मौका मिलेगा। 

अंत में

पाठकों को यह उपन्यास कैसा लगेगा, पता नहीं, लेकिन मुझे इसे लिखने में बहुत आनन्द आया। यह लिखा भी फटाफट ही गया। जून में मेरा जन्मदिन होता है, सोचा है कि इस अवसर पर, "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इसी ब्लॉग पर पाठकों के लिए किश्तों में प्रकाशित किया जाये।

मेरे मन में एक और ख्वाहिश भी है, साईन्स फिक्शन का उपन्यास लिखने की। फैंतासी लिखने में इतना मज़ा आया, मुझे आशा है कि साईन्स फिक्शन लिखने में भी उतना ही आनन्द आयेगा। अभी उसकी पलैनिन्ग शुरु की है।

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बुधवार, जनवरी 14, 2026

फ़िल्मों के आदर्शवादी धर्मेन्द्र

कुछ सप्ताह पहले फ़िल्म अभिनेता धर्मेन्द्र की मृत्यु हुई थी। उन्होंने बहुत सी फ़िल्मों में भिन्न तरह के किरदार निभाये थे। वह फ़िल्मों में कई बार आदर्शवादी व्यक्ति, विषेशकर लेखक या कवि के रूप में भी आये थे, जो मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। आज मैं उनमें से कुछ फ़िल्मों की बात करना चाहता हूँ।

Stills of Dharmendra from the film Satyakam

 

बन्दिनी (बिमल रॉय, 1963)

मैं नौ साल का था जब पापा के साथ दिल्ली के ओडियन सिनेमा में 'बन्दिनी' देखने गया था। मैंने बंगाली लेखक जरासंध के बंगाली उपन्यास 'तामसी' का हिन्दी अनुवाद पढ़ा था जिस पर यह फ़िल्म आधारित थी, और वह उपन्यास मुझे बहुत अच्छा लगा था। 'बन्दिनी' की नायिका कल्याणी (नूतन) को अपने गाँव में कैद काट रहे स्वतंत्रता-संग्रामी विकास (अशोक कुमार) से प्रेम हो जाता है, लेकिन वहाँ से जाने के बाद वह उसे भूल सा जाता है।

बदनामी की वजह से गाँव से निकाली कल्याणी एक खून के अपराध के लिए जेल काट रही है, जहाँ वह आदर्शवादी डॉ. देवेन (धर्मेन्द्र) से मिलती है। देवेन उससे प्रेम करता है और उससे विवाह करना चाहता है लेकिन अंत में कल्याणी बीमार विकास के पास लौट जाती है।

कोई पढ़ा-लिखा, सुन्दर नवजवान क्या किसी का खून करने वाली युवती से इतना प्रेम कर सकता है कि उससे विवाह करना चाहेगा, चाहे वह कितनी भी सुन्दर और सुशील क्यों न हो और चाहे वह खून उसने परिस्थिति से मजबूर हो कर ही किया हो? सोचूँ तो यह कुछ अविश्वास्नीय सी बात लगती है लेकिन धर्मेन्द्र और नूतन दोनों ही इस फ़िल्म में इतने अच्छे थे कि उसे विश्वास्नीय बना देते हैं।

अनुपमा (ऋषिकेश मुखर्जी, 1966)

उमा (शर्मिला टैगोर) को जन्म देते हुए उसकी माँ की मृत्यु हो गयी थी। इसी अपराध-बोध में पली-बड़ी हुई उमा चुपचाप रहने वाली अंतर्मुखी नवयुवती है। उसका विवाह एक अच्छे परिवार के युवक से तय हुआ है। बीमार पिता के साथ पहाड़ पर आयी उमा की मुलाकात आदर्शवादी कवि-लेखक अशोक (धर्मेन्द्र) से होती है, जो उमा की भावनाओं को समझता है। आखिर में उमा पिता के तय किये रिश्ते को छोड़ कर कम पैसे वाले अशोक को चुनती है।

इस फ़िल्म के सभी गाने बहुत सुंदर थे। उनमें से एक गीत, "या दिल की सुनो दुनिया वालों", अशोक के आदर्शवाद का घोषणापत्र है।

बहारें फ़िर भी आयेंगी (शाहिद लतीफ, 1966)

अखबार प्रकाशन जगत पर बनी इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर-नायक पहले गुरुदत्त थे, लेकिन उनकी आत्महत्या के बाद यह भाग धर्मेन्द्र को मिला। इसमें उन्होंने खान मजदूरों के शोषण के बारे में लिखने वाले आदर्शवादी पत्रकार जीतेन (धर्मेन्द्र) का भाग निभाया था। जिस अखबार के लिए वह काम करते हैं उसकी मालकिन अमिता (माला सिन्हा) उनसे प्रेम करने लगती हैं लेकिन जीतेन को उनकी छोटी बहन सुनीता (तनूजा) से प्रेम है।  

सत्यकाम (ऋषिकेश मुखर्जी, 1969)

सत्यकाम आचार्य (धर्मेन्द्र) अपने दादा जी (अशोक कुमार) के पास बड़ा हुआ है जिन्होंने उसे जीवन में हर हाल में सच बोलने और सच का साथ देने की शिक्षा दी है। सत्यकाम की मुलाकात रंजना (शर्मीला टैगोर) से होती है, जिसका बलात्कार हुआ है और वह गर्भवति है। सब कुछ जान कर भी वह उससे विवाह कर लेता है और उसके बेटे को अपना लेता है।

सच बोलने और घूस न लेने की आदतों की वजह से सत्यकाम को कार्यक्षेत्र में सफलता नहीं मिलती, उसके तबादले होते रहते हैं और उसके साथ काम करने वाले उससे चिढ़ते हैं लेकिन वह अपने आदर्श नहीं छोड़ता। टीबी से बीमार सत्यकाम की कम उम्र में मृत्यु हो जाती है।

मैंने यह फ़िल्म दिल्ली के पटेल नगर में 'विवेक' सिनेमा पर देखी थी और इसका मुझ पर गहरा असर पड़ा था। फ़िल्म के अंत के पास एक दृश्य है जिसमें सत्यकाम अस्पताल में भर्ती है, वह खाँसता है तो उसके रुमाल पर खून की बूँदें आ जाती हैं जिन्हें उसकी पत्नी देख लेती है और इस तरह से पति की गम्भीर परिस्थिति को समझ जाती है। इस दृश्य में धर्मेन्द्र की आँखों के भाव ने मेरे मन को छू लिया था। कुछ ऐसा ही एक दृश्य गुलज़ार की 'परिचय' फ़िल्म में भी था जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी थे, हालाँकि लोग संजीव कुमार को बेहतर अभिनेता मानते हैं, लेकिन मेरे विचार में उस भाव को दर्शाने में सत्यकाम के धर्मेन्द्र उनसे बेहतर थे।

नया ज़माना (प्रमोद चक्रवर्ती, 1971)

इस फ़िल्म की कहानी बिमल रॉय की 1945 की फ़िल्म 'हमराही' से मिलती-जुलती थी।

अनूप (धर्मेन्द्र) एक नये लेखक हैं जिन्होंने मजदूरों की यूनियन के संघर्ष पर "नया ज़माना" नाम की किताब लिखी है। अनूप को सीमा (हेमा मालिनी) से प्रेम है लेकिन सीमा के उद्योगपति भाई राजन/राजेन्द्र (प्राण) को यह रिश्ता स्वीकार नहीं। राजन उनके उपन्यास "नया ज़माना" को अपने नाम से छपवा लेते हैं और गरीबों के घर जलवा कर अनूप पर दोष लगवा देते हैं। सीमा अपने भाई से लड़ती है। इस फ़िल्म का गीत "नया ज़माना आयेगा", साम्यवाद और मज़दूर युनियनों के अधिकारों की बात करता है।

अंत में

इन फ़िल्मों के अतिरिक्त अन्य बहुत सी फ़िल्मों में धर्मेन्द्र ने आदर्शवादी, बौद्धिक, मध्यमवर्गीय पुरुषों के बाग निभाये थे जैसे कि आदमी और इन्सान, फागुन, इत्यादि।

मेरे विचार में उन्हें एक्शन हीरो की तरह अधिक देखा गया और उनकी अभिनय प्रतिभा को वह पहचान नहीं मिली जो मिलनी चाहिये थी।

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इस वर्ष के लोकप्रिय आलेख