मंगलवार, अप्रैल 28, 2026

गुवाहाटी जाने की यात्रा

आज से दस साल पहले अप्रैल 2016 में, मैं भारत में दो साल के गुवाहाटी प्रवास के बाद इटली लौटा था।

आज यह बात अचानक याद आ गयी तो सोचा कि क्यों न उन दिनों की यादों को ताज़ा किया जाये। तीन दशकों तक विदेश में स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने के बाद जब भारत जाने की सोची थी तब गुवाहाटी जाने का विचार मन में नहीं था, बल्कि कुछ अन्य काम करने की सोची थी।

सोचता था कि कहीं मन का काम नहीं मिलेगा तो किसी मन-पसंद छोटे शहर में जगह को खोज कर वहाँ अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लूँगा। उससे पहले कुछ मित्रों के पास रह कर देखना चाहता था कि शायद वहाँ मन लग जाये तो बेहतर होगा क्यों कि अकेले रहने के विचार से डरता था।

आज के इस आलेख में मेरी गुवाहाटी पहुँचने की उस यात्रा के विभिन्न पड़ावों की बाते हैं। 

केसला, मध्यप्रदेश 

सारा जीवन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के बाद मैंने निश्चय किया था कि 2014 में, अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर कुछ समय भारत में बिताने जाऊँगा।

तब मेरी बात केसला (मध्यप्रदेश) में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत समाजवादी विचारधारा वाले सुनील जी से हुई, सोचा कि उनके साथ काम करूँगा। अप्रैल 2014 में उनकी अकस्मात मृत्यु के बाद लगा कि शायद यह नहीं हो पायेगा, फ़िर भी भारत पहुँच कर सबसे पहले मैं उनके घर पर केसला ही गया था।

केसला गाँव, मध्यप्रदेश

 सुनील जी की पत्नि मॉन्टी (स्मिता) से एक रिश्ते के साथ-साथ, हमारी पुरानी जान-पहचान भी थी। केसला में मैं कुछ दिन उनके साथ रहा, उनके विभिन्न साथियों से जान-पहचान हुई। लेकिन मुझे लगा कि सुनील जी के अचानक जाने की वजह से वहाँ जो जगह रिक्त हुई है, उसका घाव उस समय बिल्कुल ताज़ा था, यह देखना पड़ेगा कि उनके लोग उस काम को किस तरह आगे चला पायेंगे।

यह भी सोचा कि उनका सहारा न होने से, वहाँ स्वास्थ्य क्षेत्र में कुछ नया काम शुरु करना मेरे लिए कठिन होगा।

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

तब मैं केसला से बिलासपुर गया, वहाँ पर गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के कार्यक्रम के कुष्ठ रोग और विकलांगता कार्यक्रम में काम करने का विचार मुझे अच्छा लग रहा था।

बाकी सब बातें ठीक हो गयी, साथ में डॉ. योगेश जैन जैसे आदर्शवादी डॉक्टरों के साथ काम करने का विचार मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। मैं उनके सामुदायिक स्वस्थ्य कर्मचारियों के साथ कुछ गाँवों के क्लिनिक में भी गया।

जन स्वास्थ्य सहयोग का मानपुर गाँव में क्लिनिक, छत्तीसगढ़

लेकिन एक दिक्कत थी, कि उनके होस्टल में जगह नहीं थी, वहाँ काम करने का मतलब था कि मुझे पास के किसी गाँव में अलग घर ले कर रहना पड़ता और मैं अकेला रहने के विचार से डर रहा था। दो-तीन दिन वहाँ रह कर सोचा, पर लगा कि मैं वहाँ गाँव में अकेला नहीं रह पाऊँगा।

जीवन में हमेशा ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ करने से रुक जाते हैं लेकिन उसके निशान आप के मन में रह जाते हैं, आप अपने आप से पूछते हैं कि अगर वह रास्ता चुना होता तो? गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग में काम करने के बारे में मुझे ऐसा ही लगता रहा है।   

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

बिलासपुर से मैं लखनऊ गया जहाँ पर मेरी पुरानी मित्र डॉ. ब्रिजिता का सैंट मेरी क्लीनिक, अस्पताल और नर्सिन्ग कॉलेज था। 

सैंट मेरी की नर्सिन्ग की छात्राएँ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

अस्पताल के काम के साथ-साथ वह बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य तथा विकलाँग जनों के लिए कार्यक्रम चला रही थीं। मैं उनके पास करीब एक मास रुका।

उनके साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम में काम करने का विचार था लेकिन भीषण गर्मी में गाँवों में घूमने के एक-दो अनुभवों के बाद मुझे लगा कि मैं उन परिस्थितियों में नहीं रह पाऊँगा।

मनाली, हिमाचल प्रदेश

एक अन्य मित्र के पिता मनाली के क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संस्था चला रहे थे, जहाँ वह सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों के साथ करते थे। लखनऊ के बाद मैं कुछ दिन उनके पास रहने गया। 

उनका काम मुख्य मनाली शहर में था पर उनका घर शहर के बाहर, कुछ दूर जा कर था। उनके घर के साथ उनका एक अन्य फ्लैट भी था, अगर मैं उनके साथ काम करता तो वहाँ पर रह सकता था।

लेकिन सर्दियों में ठंड और हिमपात के साथ, शहर के बाहर उस बहुत सुंदर लेकिन सुनसान जगह में रहने के विचार से मुझे लगा कि शायद यह भी मेरे लिए कठिन होगा, पर इतनी सुंदर जगह पर रहने का सोच कर अच्छा भी लगता था।

शुरु गाँव, मनाली, हिमाचल प्रदेश

उन्हीं दिनों में मुझे एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रैंस के लिए आयरलैंड जाना था, सोचा कि वहाँ से लौट कर ही निर्णय लूँगा कि मनाली में काम करूँ या नहीं।

उन दिनों में मन में थोड़ी सी मायूसी भी थी कि अभी तक कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी जहाँ मुझे पूरे दिल से लगे कि हाँ, मैं यहाँ रह कर, इस परिस्थिति में काम करना चाहता हूँ। हर जगह की कुछ बातें अच्छी लगती थीं, कुछ नहीं।

सोचा कि शायद मुझे अपना क्लिनिक खोलने के लिए अपनी पसंद का छोटा गाँव खोजना पड़ेगा, जो किसी शहर से बहुत दूर नहीं हो, और जहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बहुत दूर न हो। ऐसी कोई जगह सचमुच हो सकती है, इसका मुझे शक था।

गुवाहाटी, असम

आयरलैंड और इटली में कुछ दिन बिता कर मैं वापस भारत लौटा तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मेरे पुराने मित्र चपल खासनबिस के माध्यम से मुझे बँगलौर की स्वयंसेवी संस्था "मोबिलिटी इंडिया" के लिए गुवाहाटी में विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने के काम का आफर मिला।

मैं कुछ साल पहले, एक अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार पहले गुवाहाटी गया था और वहाँ करीब दस दिन रहा था, इसलिए वह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं था।  

मैं गुवाहटी पहुँचा, कुछ मित्रों के माध्यम से मैंने उज़ान बाज़ार क्षेत्र के एक होटल में कमरा बुक किया था। मेरा विचार था कि वहाँ पर सप्ताह-दस दिन रुक कर, वहाँ की स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलूँगा, और विकलांग जनों के लिए नया कार्यक्रम शुरु हो सकता है या नहीं, इसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।

पहले दिन सुबह मुझे एक संस्था के दफ्तर में किसी से मिलने जाना था, होटल से निकला और कुछ दूर पर मेरी मुलाकात बतखों के एक दल से हो गयी। सड़क के किनारे पर वह बतखें एक कतार में चल रही थीं, सुबह का दफ्तर जाने वाला सारा ट्रैफिक, उनके पास धीमा करके जा रहा था ताकि उन्हें दिक्कत नहीं हो। पता चला कि वह पास के उग्रतारा मंदिर की बतखें हैं।

उग्रतारा मंदिर की बतखें, गुवाहाटी, असम

पता नहीं क्यों, उन बतखों को देख कर मुझे लगा मानो नियति ने मुझे संदेश भेजा हो कि इसी शहर में मुझे रुकना है, सोचा कि जिस शहर के लोग बतखों के सड़क पर चलने का ध्यान रख सकते हैं, वहाँ रहना अच्छा होगा।

अंत में

जिस दिन मैं गुवाहाटी में उग्रतारा की बतखों से मिला था, उसी दिन मेरी मुलाकात फादर पॉल से भी हुई, जिनके साथ मैं बहुत समय तक रहा और जो असम के उन दिनों में मेरे सबसे करीबी मित्र बने।

यही मेरी किस्मत में लिखा था कि मैं गुवाहाटी में रहूँ और वहाँ बहुत से लोगों से मित्रता बने और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र को जानू और समझूँ। 

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