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गुरुवार, अक्टूबर 08, 2026

दिमाग से जुड़ी विकलाँगताएँ

कुछ विकलांगताएँ इंसान के मस्तिष्क (दिमाग या ब्रेन) से जुड़ी होती हैं, जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी (cerebral palsy), डाउन सिंड्रोम (Down syndrome), डिस्लेक्सिया (dyslexia), आउटिज़्म (autism), इत्यादी।

इन्हें स्नायु-तंत्र की विकलांगता (neurological disability) कहते हैं क्योंकि इनमें दिमाग और स्नायु (nerves) की कुछ कमी या कमजोरी या बीमारी होती है। इन्हें बाल विकास की विकालंगता (developmental disability) भी कहते हैं क्योंकि अक्सर यह बचपन में पता चलती हैं जब बच्चा ठीक से, शारीरिक या मानसिक रूप से विकसित नहीं होता है। लेकिन दिमाग से जुड़ी कुछ विकलांगताएँ बड़े उम्र के लोगों में भी हो सकती हैं, जैसे कि दुर्घटना में सिर पर चोट लगने से।

सरलता के लिए, इस आलेख में इन सभी विकलांगताओं के लिए मैं "विकास-विकालंगता" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ।


 

यह आलेख विकास-विकालंगता वाले बच्चों-किशोरों और उनके परिवारों के लिए लिख रहा हूँ, ताकि वह अपने शारीरिक व कार्य-क्षमता के सशक्तिकरण की आवश्यकताओं (rehabilitation needs) को समझ सकें, ज़रूरत पड़ने पर उनके बारे में डॉक्टरों और थैरापिस्टों से बात कर सकें और स्वयं अपने बारे में निर्णय ले सकें।

आलेख लिखने के कारण

(1) विकास-विकालंगता सारा जीवन रहती है और उम्र के साथ व्यक्ति की ज़रूरतें बदलती रहती हैं। इसलिए आप को अक्सर डॉक्टरों या फिज़ियोथैरापिस्ट या अन्य थैरापिस्ट के पास जाना पड़ता है। इस आलेख से आप को अपने शरीर की कठिनाईयों की समझ आयेगी जिससे आप उन्हें अपनी बात बेहतर समझा सकते हैं।

(2) चूँकि विकास-विकालंगता सारा जीवन रहेगी तो आप हर बात के लिए डॉक्टर या थैरापिस्ट के पास नहीं जा सकते। इसलिए आप को अपनी देखभाल करना खुद सीखनी चाहिए ताकि आप घर पर अपने शरीर की क्षमता बनाये रखने के लिए नियमित रूप से वर्जिश, दिमागी एक्सरसाइज़, आदि कर सकें।

(3) आधुनिक तकनीकी (एप्प, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धि) की मदद से आप दुनिया भर के अपने जैसी कठिनाई के साथ जीने वाले अन्य लोगों से सम्पर्क कर सकते हैं, उनके अनुभवों से सीख सकते हैं, और उनके साथ अपने अनुभव बाँट सकते हैं। 

दिमाग के विभिन्न काम और उनसे जुड़ी विकलांगताएँ

इंसान का दिमाग अलग-अलग काम करता है, और विकास-विकलांगता की कठिनाईयाँ उनमें से किसी एक या कुछ कामों से जुड़ी होती हैं। विकास-विकलांगता को समझने के लिए, हम यह काम मुख्य रूप से तीन तरह के सोच सकते हैं - (1) माँसपेशियों को चलाना; (2)  सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि; (3)  सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि जताना। आईये अब इन्हें एक-एक करके देखें।

1. माँसपेशियों को चलाना:

माँसपेशियों को चलाना जीवन के लिए ज़रूरी है क्योंकि उनकी सहायता से हम चलते-फिरते, खाते-पीते, पढ़ते-लिखते सब तरह के काम करते हैं। इस क्षमता को विकास-विकलांगता समझने के लिए तीन अलग-अलग श्रेणियों में बाँट कर जाँचा जा सकता है - 

(अ) उँगलियों से महीन काम जैसे कढ़ाई करने या सूई में धागा डालने या लिखने की क्षमता। (Fine movement coordination and strength) - कुछ विकास-विकलांगताओं में केवल महीन काम करने में कठिनाई होती है।

(ए) बड़ी माँसपेशियों से मेहनत या ताकत वाला काम करना जैसे चलना, सामान उठाना या तीर चलाना या क्रिकेट का बल्ला घुमाना। (Gross movement coordination & strength)

(इ) मुँह-गले की माँसपेशियों द्वारा खाना चबाने और निगलने की क्षमता। अगर बच्चा ठीक से खाना नहीं सकता या जल-दूध आदि नहीं पी सकता तो बच्चे का स्वास्थ्य कमजोर हो जायेगा।

कुछ विकलांगताओं में जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी में शरीर के कुछ हिस्सों में यह क्षमता सही नहीं होती, जिससे वह अपनी माँस-पेशियों से सही तरीके से काम नहीं करवा पाते। 

आउटिज़्म में दिमाग में बाहर से सूचना लाने वाले स्नायु सैंसिटिव हो जाते हैं या अधिक काम करते हैं जिसकी वजह से वह किसी को छूना या अधिक पास आना, या शोर या तेज रोशनी पसंद नहीं करते। 

अगर आप को या परिवार में किसी को विकास-विकलांगता है तो इन तीनों तरह की माँस-पेशियों की क्षमता की अलग जाँच करनी चाहिये, क्योंकि इन सब का उपचार करने के लिए भिन्न तरीके हैं और हर व्यक्ति को उसकी ज़रूरत के अनुसार वर्जिश या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं।

2. सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि: 

दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में सोचने-समझने की भी अलग-अलग क्षमताएँ होती हैं। दिमाग का कोई हिस्सा यादाश्त का काम करता है, कोई दूसरा हिस्सा सुनी हुई बात को समझने का काम करता है, एक अन्य हिस्सा पढ़ी हुई बात को समझने का काम करता है, और अन्य हिस्सा गिनती का काम करता है, या अन्य हिस्सा भाषा या तर्क की समझ करता है। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि किस तरह की सोचने-समझने की क्षमता में कमी या कमज़ोरी है। अगर दिमाग का एक बड़ा हिस्सा पूरा काम नहीं कर रहा तो उससे बहुत सी क्षमताओं पर असर पड़ सकता है, जबकि अगर दिमाग का केवल कोई विशेष हिस्सा ठीक से काम नहीं कर रहा तो उसमें केवल किसी एक या दो क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। हर व्यक्ति भिन्न होता है, यह जानना कि वह किस बात में कमज़ोर है और किस बात में नॉरमल है, बहुत ज़रूरी है।

अक्सर बच्चे की एक तरह की समझ में कमी को, उसके पूरे दिमाग की कमज़ोरी समझ लेते हैं। 

डाउन सिंड्रोम में यादाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में कमजोरी हो सकती है, डिमैंशिया में यादाश्त काम नहीं करती, डिस्लेक्सिया में पढ़ने और लिखने में कठिनाई होती है। जब स्कूल जाने वाले बच्चों में यह विकलांगता हो तो उसे "सीखने की विकलांगता" (learning disability) भी कहते हैं।

 कई तरह की आउटिज़्म में भी समझ की कठिनाई हो सकती है जैसे कि आउसबर्गर सिंड्रोम आउटिज़्म में लोग शब्दों के संकेतात्मक अर्थ समझने में कठिनाई महसूस करते हैं, जैसे कि कोई कहे "अरे कितना बढ़िया गाना गाया, मार डाला रे" में "मार डाला" को सचमुच मारना समझ सकते हैं।

आधुनिक शोध ने दिखाया है कि अगर दिमाग के एक हिस्से में कमी है तो उसका दूसरा हिस्सा उस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है, लेकिन उसके लिए पढ़ाने और समझाने के नये तरीके सोचने पड़ सकते हैं। 

3. सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि: 

हमारे मन की सारी भावनाएँ भी दिमाग में ही बनती हैं। अगर दिमाग का यह हिस्सा ठीक से काम न करे तो वह लोग अपनी भावनाओं जैसे प्रेम या स्नेह को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाते या उनका अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रहता।

इस तरह की कठिनाईयाँ अधिकतर आउटिज़्म में दिखती हैं, जिनकी वजह से वह लोग किसी के प्रति प्रेम नहीं जता पाते और मित्र नहीं बना पाते। इन कठिनाईयों की वजह से कई बार विकास-विकालंगता वाले कुछ लोग अपने गलत व्यवहार या अपनी इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं कर पाते। 

अगर आप के परिवार में किसी बच्चे या किशोर को विकास-विकालंगता है

अगर आप के परिवार के बच्चे या किशोर को किसी तरह की विकास-विकालंगता है तो यह देखना चाहिये कि उस पर ऊपर बताई गई तीन तरह की क्षमताओं पर क्या असर है:

माँसपेशियों पर क्या असर है? ऊँगलियों के महीन काम पर क्या असर है? ताकत/मेहनत वाली बड़ी माँसपेशियों पर क्या असर है? खाना चबाने, निगलने पर क्या असर है?

सोचने-समझने की शक्ति पर क्या असर है? किस तरह की सोच-समझ पर कितना असर है जैसे कि गणित पर, तर्क समझने पर, सुनी बात पर, पड़ी बात पर, लिखने में, आदि। 

भावनाओं-व्यवहार पर क्या असर है?

केवल यह कहना काफी नहीं है कि विकास-विकालंगता है, दिमाग और शरीर के किस भाग पर उसका क्या असर है, जब तक वह पता नहीं चलेगा, उसकी ठीक से थैरेपी नहीं की जा सकती। अक्सर डॉक्टरों और थैरेपिस्ट को यह समझ नहीं होती या उनके पास समय नहीं होता कि वह हर बात की ठीक से जाँच करे और उसके लिए क्या करना चाहिये यह सलाह आप को धैर्य से समझायें। लेकिन अगर आप को यह समझ है तो आप अपने बच्चे के लिए सही उपचार खोज सकते हैं।

अगर बच्चे की कुछ माँसपेशियों में कोर्डिनेशन या संतुलन की कमी है तो उसकी थैरेपी भिन्न होगी, अगर उन माँसपेशियों में ताकत कम है तो उसकी थैरेपी अलग होगी। सोचिये कि अगर बच्चा लिखा हुआ पढ़ने में नहीं समझ पाता तो क्या उसके लिए सुन कर समझना या चित्रों से समझना अधिक आसान है? अगर उसे कहानी समझने में मुश्किल है तो क्या गणित में भी मुश्किल है? हर बात को अलग-अलग देखना और जाँचना चाहिये।

आधुनिक तकनीकी की सहायता

एक समय था जब हम सोचते थे कि अगर दिमाग के स्नायु-कोष (nerve cell) नष्ट हो गये हैं तो उसका कुछ नहीं हो सकता, वह नष्ट ही रहेंगे। जबकि आज की सोच है कि अगर दिमाग का एक हिस्सा काम नहीं कर रहा तो दिमाग के बाकी के हिस्से उस काम को कुछ हद तक करना सीख-सिखा सकते हैं।

अक्सर बच्चों-बड़ों के मन में लोगों की बातें सुन कर डर बैठ जाता है कि लोग हँसेंगे या बुरा-भला कहेंगे आदि। आप को मन में बैठे उन डरों की खुल कर बात करनी चाहिये और व्यक्ति को परिस्थिति से लड़ने की हिम्मत देनी चाहिये कि किसी के कहने-सोचने की परवाह मत करो। जब नये उपचार करते हैं तो उनका असर होने में समय लगता है, इसलिए हिम्मत बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। अगर आप को बच्चा कुछ नहीं कर पा रहा तो उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये, लेकिन अगर वह थोड़ा सा भी सुधार ला रहा है तो उसकी सराहना अवश्य करनी चाहिये।

यह सोचना कि थैरेपी से सारी कठिनाईयाँ ठीक हो जायेंगी, गलत है। कई बार, जो कमी बन गई है, उसमें सब कोशिश के बाद कोई अंतर नहीं आयेगा। लेकिन हर बच्चे के साथ इतनी कोशिश की जानी चाहिये कि उसका जितना विकास हो सकता है, उसे उसका मौका मिले। कई बार लोग सोचते हैं कि अगर बच्चा ठीक से चल नहीं पा रहा या बोल नहीं पा रहा तो बिना कोई जाँच किये सोच लेते हैं कि इसका दिमाग भी कमज़ोर है, वह बच्चे को मौका और सहारा नहीं देते। 

आज दुनिया भर के विकलांग लोग अपने और अपने परिवार वालों के अनुभव व्हाटसएप्प, फेसबुक, यूट्यूब आदि से बाँटते हैं, और आप उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। दुनिया की कोई भी भाषा हो, यूट्यूब पर आप उसके वीडियो के साथ अपनी भाषा में सबटाईटल के साथ देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप के बच्चे को सेरिब्रल पाल्सी है और उसे उँगलियों से महीन काम करने में कमजोरी है तो आप यूट्यूब पर इस विषय पर बहुत सारे वीडियो पायेंगे कि उँगलियों को महीन काम करने के लिए कौन सी एक्सरसाइज़ या थैरेपी कैसे करें।

बहुत से थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ इस तरह के वीडियो बनाते हैं और बहुत से माता-पिता या विकलांग व्यक्ति अपने अनुभवों के वीडियो बनाते हैं,  जिनसे आप घर बैठे सीख सकते हैं। वीडियो का फायदा है कि आप घर बैठे अपनी भाषा में सीख सकते हो और अपनी कोशिशों को मोबाइल से इंटरनेट पर डाल कर लोगों से सलाह माँग सकते हो।

अंत में

करीब पैंतिस-चालिस साल पहले जब मैंने विकलांग बच्चों के साथ काम करना शुरु किया था, उस समय स्थिति बहुत खराब थी। गाँव और छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के पास न सही अस्पताल या उपचार केन्द्र थे, न थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ। तब हम ऐसे विषयों पर सरल किताबें बनाते थे, और विभिन्न देशों के गाँवों जा कर वहाँ स्वास्थ्य सेवकों, स्वयंसेवको और परिवार वालों को सिखाते थे कि विकलांग व्यक्ति या बच्चे के लिए क्या करें, कैसे करें। आज अस्पताल, थैरेपिस्ट आदि भी अधिक हैं पर उससे भी महत्वपूर्ण बात है कि लोगों को इस बारे में जानकारी मिलना अधिक आसान हो सकता है और आप एक-दूसरे से भी सीख सकते हो।

आधुनिक तकनीकी, इंटरनेट और कृत्रिम-बुद्धि आदि की मदद से आप खुद इसके बारे में अधिक जानकारी पा कर, अपने लिए और अपने परिवार के लिए बेहतर उपचार खोज सकते हैं। 

बहुत से देशों में विकलांग एसोसियशन बनी हैं जो इस काम में आप को सहारा दे सकती हैं। सरकारों ने भी इस दिशा में नये कानून और सेवाएँ शुरु की हैं। आप को अपने क्षेत्र की विकलांग एसोसिएशन से संबध बनाने चाहिये और अगर आप के क्षेत्र में नहीं हो तो आप को खुद ऐसी एसोसिएशन बनाने का सोचना चाहिये।

अगर इस बारे में आप को कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो नीचे टिप्पणी लिखें, मैं उसका उत्तर देने की कोशिश अवश्य करूँगा।

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रविवार, अक्टूबर 04, 2026

कुँवर नारायण - तीन कविताएँ

"कल्पना" पत्रिका हैदराबाद से निकलती थी। इसका कार्यालय 516 सुल्तान बाज़ार में था और इसके प्रकाशक मधुसूदन चतुर्वेदी थे। जुलाई 1960 में इसके सम्पादक मँडल के सदस्य थे - डा. आयेन्द्र शर्मा (प्रधान), मधुसूदन चतुर्वेदी, बद्रीविशाल पित्ती, मुनीन्द्र, जगदीश मित्तल (कला), गौतम राव।

उन दिनों में मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक हैदराबाद में रहते थे और "मैनकाईन्ड" नाम की अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए काम करते थे जिसका दफ्तर "कल्पना" के साथ जुड़ा था, और दोनों पत्रिकाएँ एक ही प्रकाशक द्वारा, एक ही प्रिटिन्ग प्रैस से छपती थीं।

साथ की हमारी पारिवारिक तस्वीर उन्हीं दिनों की है। यह जून 1960 में ही ली गयी थी जब हम गर्मियों की छुट्टियों में हैदराबाद गये थे, और राजा दुबे के घर पर ठहरे थे। इस तस्वीर में जाने माने उद्योगपति और डॉ. लोहिया की समाजवादी पार्टी के सहयोगी बद्रीविशाल पित्ती भी हैं। यह मेरे छठे जन्मदिन पर खींची गयी थी। उन्हीं दिनों में पित्ती जी के घर पर प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन साहब से भी मुलाकात याद है। 

खैर "कल्पना" के जुलाई 1960 अंक में मेरे पिता की एक कहानी छपी थी, जिसे इस ब्लॉग पर छापने की बहुत दिनों से सोच रहा था। आज जब वह पत्रिका निकाली तो उसमें कुँवर नारायण की तीन कविताएँ देखीं जो मेरे विचार में इंटरनैट पर उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें साझा कर रहा हूँ। अगले दिनों में "कल्पना" के इस अंक से कुछ अन्य सामग्री भी साझा करने का विचार है।

***

कुँवर नारायण की तीन कविताएँ

बन्धु यह तो ...

डूब कर जो कुछ उबारा
ज़िन्दगी है;
टूट कर जो कुछ सँवारा
ज़िन्दगी है;
आँख के नम आईने में चकमकाती सूरतें
सूरज नहीं हैं
जो छलक कर दूसरा सूरज बना लें !
दीखती हैं क्यों कि कोई देखता है,
देखती हैं क्योंकि कोई दीखता है;
और वह स्रष्टा
वही स्रष्टा नहीं है
आस्था जिसके सृजन में
कभी रक्खी कभी चकनाचूर की ।
 
ज़िन्दगी आखिर रहे क्यों
याचना जैसे किसी मजबूर की ?
बन्धु, यह तो
देन है अच्युत लबालब आत्मा की,
सृष्टी छलकन है किसी भरपूर की ।
 

सवेरे-सवेरे

 
कार्तिक की एक हँसमुख सुबह ।
नदी-तट से लौटती गंगा नहा कर
सुवासित भीगी हवाएँ
सदा पावन
माँ सरीखी
अभी जैसे मन्दिर में चढ़ा कर खुशरंग फूल
ठंड से सीत्कारती घर में घुसी हों,
और सोते देख मुझको जगाती हों ----
सिरहाने रख एक अँजुलि फूल हरसिंगार के,
नर्म ठंडी उँगलियों से गाल छू कर प्यार से,
बाल बिखरे हुए तनिक सँवार के ...
 

कार्निस पर

 
कार्निस पर
एक नटखट किरण बच्चे-सी
खड़ी जंगला पकड़ कर,
किलकती है, "मुझे देखो !"
 
साँस रोके ---
बाँह फैलाए खड़ा गुलमुहर ...
कब वह कूद कर आ जाये उसकी गोद में !
 
*** 

मंगलवार, सितंबर 22, 2026

लेखन यात्रा - अलका सरावगी

अलका जी मेरी जान-पहचान बीस-पच्चीस साल पहले अशोक जी (अशोक सेकसरिया) की वजह से हुई थी। अशोक जी, जैसा कि आप अलका जी के साक्षात्कार में पढ़ेंगे, ने उनके सृजनात्मक जीवन में महत्वपूर्ण भाग निभाया था। वैसे मैं अशोक जी को बचपन से जानता था जब वह दिल्ली में रहते थे और मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक के साथ समाजवादी पत्रिका 'जन' में काम करते थे और अक्सर हमारे घर आते थे।

अलका सरावगी 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

उसके बाद बीच-बीच में किसी न किसी वजह से अलका जी से पत्राचार होता रहता था। उनके तीन उपन्यास इतालवी भाषा में अनुवादित हो कर छपे हैं और उन्हें इतालवी सरकार का Order of the Star Cavelier सम्मान भी मिल चुका है।

कुछ साल पहले वह वेनिस युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में अपने लेखन के बारे में बोलने आयीं थीं तो मैं उन्हें सुनने गया था, लेकिन घर लौटने वाली ट्रेन के छूटने की चिंता में, बाद में वहाँ रुक कर उनसे बात नहीं कर पाया था। पिछले साल कलकत्ता जा कर उनसे मिलने की बात थी, पर वह भी नहीं बन पाई थी।

बहुत समय से सोच रहा था कि अपने इस ब्लॉग के लिए उनसे बातचीत करूँ। यह आलेख एक प्रश्न-उत्तर के रूप में शुरु हुआ था। उसमें मैंने उनके कुछ वीडियो देख कर, कुछ अन्य बातें जोड़ीं। इस बातचीत को आप अलका जी की जुबानी ही पढ़ सकते हैं।  

अलका सरावगी की जुबानी

व्यक्तिगत

हमारा एक मध्यवर्गीय मारवाड़ी परिवार था, जहां लड़कियों को रोका-टोका जाता है कि ऐसे मत करो, वैसे मत बोलो। इसे मैंने बहुत रज़िस्ट किया। घर के काम देखने-सीखने में मेरा मन नहीं लगता था, इसलिए खाना बनाना भी नहीं सीखा जबकि मां बहुत अच्छा खाना बनाती थी। घर के काम में मन इसलिए भी शायद नहीं लगा क्योंकि बहुत प्यार करने वाली दादी ने बचपन में कान में फूंक दिया था कि भगवान ने तुम्हें चौका-चूल्हा घर-वर संभालने नहीं भेजा है।

जब सब सहेलियाँ मिल कर कोई फिल्म देखने जाती थीं तो हमें अनुमति नहीं मिलती थी। इन सब बातों को ले कर मन में गुस्सा और विद्रोह का भाव था, और पिता जी की बहुत सी बातें गलत लगती थीं। बारह-तेरह साल की थी जब पीरियड शुुरु हुए तो सब कहते कि यहां मत बैठो, वहां मत बैठो, यह मत छूओ, वगैरा, तो उससे बहुत घुटन होती थी। 

मेरे पिता जी अपनी लड़कियों को आगे बढ़ाना चाहते थे, उन्हें गाड़ी चलाना सिखवाया था। स्कूल में स्विमिंग पूल था तो मैंने तैरना भी सीखा था। एन.सी.सी में भर्ती हुई थी और उसके कैम्प में रोने-धोने के बाद जाने दिया गया था। कांचरापाड़ा कैम्प में पिता गाड़ी की डिक्की भरकर पच्चीस लड़कियों का खाना लेकर पहुंचे थे। वे छह फुट लंबे शानदार व्यक्तित्व वाले थे। स्कूल के वार्षिक समारोह में किसी नाटक के बाद मुख्य पात्र निभाने वाली लड़की को उन्होंने हॉल में खड़े हो कर अपनी तरफ़ से मेडल घोषित कर दिया था। उन पर गर्व करने के हमारे पास तमाम कारण थे। मेरे हमेशा फर्स्ट आने पर उन्हें भी बहुत गर्व था, पर मेरे साथ ही पढ़ने वाली बड़ी बहन के कारण वे इसे छुपा लेते थे। या शायद इसलिए कि मेरे पाँव धरती पर रहें।

दो बड़ी बहनों की कम उम्र में शादी हुई तो उनके जीवन को देख कर लगता था कि आगे मुझे भी वैसा ही जीवन मिलेगा। स्कूल के दिनों में "सारा आकाश" पढ़ रही थी और मन ही मन में विद्रोही बन रही थी, सोचती थी कि उस उपन्यास की प्रभा जैसा ही मुझे भी कोई ससुराल मिलेगा जहां लोग तरह-तरह के ताने कसेंगे। मां से कहती थी कि बंगाली घर में पैदा होती तो अच्छा होता, वह लोग मेरे पढ़ने लिखने पर खुश होते। मेरी बहनों का तो बीे.ए. भी नहीं हुआ था जब उनकी शादी हुई थी। ग़नीमत थी कि मेरी शादी बीस साल की उम्र में जाकर हुई, जब मैंने बी.ए. पास कर लिया था।

बाहरी तौर पर मेरे ससुराल का परिवार उस तरह से मॉर्डन नहीं था जैसा पीहर में था। पिता पैंट-शर्ट पहनते और शौक से रहते। अंग्रेज़ी में फर्राटे से बोलते और शेरो-शायरी उन्हें कंठस्थ थी। ससुर धोती-कुरते वाले थे और सास सीधे पल्ले से साड़ी पहनतीं, जबकि माँ उल्टे पल्लेवाले आधुनिक अंदाज़ में।

लेकिन, ससुराल में अपेक्षकृत पिता की तरह मजबूती से मुझे  हां या नहीं कहने वाले लोग नहीं थे। पिता की इच्छा के सामने अपनी चलाई नहीं जा सकती थी। उनके गुस्से से भी सबको डर लगता था। मेरी सास की तरफ से सहयोग था, वह पढ़ने-लिखने की बहुत क़दर करती थीं। वे बहुत धार्मिक थीं और शायद इसीलिए हर आत्मा को उसके प्रवाह से रोकने के पक्ष में नहीं थीं। उनका हमेशा सहयोग रहा।

मैंने शादी के बाद ही एम.ए. किया, फिर एम.फिल. किया। पति कहते थे कि बिना झगड़ा-झमेला किये जो कर सकती हो वह करो। वह समर्थन करते थे। लेकिन वैसी उन लोगों का सोच नहीं थी, यह बिना कहे ही ज़ाहिर था कि उस समय अगर कोई घर का काम होता तो वही ज्यादा ज़रूरी माना जाता था। 

जब मेरे एम.ए. के इम्तहान चल रहे थे तो मेरे ससुर ने मुझे बुलाया, पूछा कि क्या कर रही हो, तो मैंने कहा कि पढ़ रही हूँ। बोले कि इतना पढ़ना क्या जरूरी है? मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं। अगर बचपन से स्कूल में टॉपर रहे हों तो मन में हमेशा टॉपर रहने की भावना रहती है। वहां हमारी स्पेस मेरा बैडरूम ही था, वहां पर हर ओर किताबें ही किताबें बिछा रखी थीं। एम.ए. में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया तो सब खुश भी हुए।

उन दिनों में कुछ लिखने की याद तो बिल्कुल नहीं है। तब तक मैंने पी.एच.डी. और लेक्चरार बनने की परीक्षाएं दे डाली थीं। एक कॉलेज में पार्ट-टाइम नौकरी मिली, तो समझ में आया कि पढ़ाना मेरे बस की बात नहीं है। मैं अपनी ऊर्जा सिर्फ़ लिखने के लिए बचाना चाहती थी।

मेरी दादी

मेरे ख्याल से मैं तीन या चार साल की थी, मेरी दादी सुंदरकांड का पाठ करती थीं। तब मुझे पढ़ना नहीं आता था, पर दादी से सुन कर मुझे सुंदरकांड पूरा याद हो गया था। मैं उसे पूरा रिसाइट कर सकती थी, जो कि काफी बड़ा है। तब हमारे घर में यह चलन था कि अगर कोई भी बाहर का आदमी आता तो कहते कि सुंदरकांड वाली लड़की को बुलाओ। सबके सामने कहा जाता कि सुंदरकांड सुनाओ तो मैं सुना देती थी, पर लोग सुनते-सुनते बोर हो जाते थे, तो कहते थे, अच्छा, ठीक है।

मुझे अपनी दादी से बहुत प्रेम था। वह मुझे अपने जीवन की बहुत सी बातें बताती थीं, कि कैसे वह लोग राजस्थान से कलकत्ता आये, कलकत्ता में शादी होने के बाद वह वापस राजस्थान चली गयीं, वहां से आते-जाते रहे, परिवार में क्या-क्या घटनाएं - दुर्घटनाएं घटीं, वह क्या खाती-पीती थी, कैसे उनका जीवन बदल गया। उन्हें मुझ में एक श्रोता मिला हुआ था, और मुझे उनकी बातों में बहुत रस आता था। उनके चेहरे की एक-एक रेखा, एक-एक झुर्री तक, मुझे आज भी याद है।

वह मुझे कहती थीं कि ऊपरवाले ने तुम्हें यह सब सामान्य काम करने के लिए नहीं, कुछ और करने के लिए बनाया है। वह और काम क्या था या क्या हो सकता है, उसकी उन्हें कोई स्पष्ट कल्पना नहीं थी। लेकिन उनकी यह बात मेरे भीतर कहीं पर रह गयी और पनपती रही।

बचपन

हमारे बचपन के ज़माने में स्क्रीन तो था नहीं। किताबें और पत्रिकाएं घर में आती थीं और चाव से पढ़ी जाती थीं। माँ पापुलर उपन्यास पढ़ती थीं—शिवानी, रानू,ओम प्रकाश शर्मा, आचार्य चतुरसेन, ये कुछ नाम तो बिलकुल याद हैं। मुझे बचपन से पढ़ने का बेहद शौक़ था। जो कुछ मिल जाए उसे पढ़ डालती थी। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि पत्रिकाएँ, चंदामामा और चंपक के साथ पढ़ी जाती थीं। अक्सर मैं अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी किताब पढ़ लेती थी। बाद में चौदह साल की उम्र से अंग्रेजी में एनिड ब्लाइटन की किताब जन्मदिन पर किसी ने दी। उसके बाद उनका चस्का लगा और फिर आगे चलकर शेरलॉक होम्स, अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन पढ़ी गईं। जो कुछ मिल जाए वही पढ़ा जाता था। मेरी दादी दोस्तोवेस्की का हिंदी अनुवाद पढ़ती थीं। घर में साकेत, यशोधरा जैसी मैथिली शरण गुप्त की रचनाएँ थीं। पिता ग़ज़ल और गीतों के शौकीन थे और बाकायदा एक कॉपी रखते थे जिसमें उन्हें उतारते थे।

स्कूल में पढ़ने में अच्छी थी इसलिए शिक्षिकाओं की प्रिय थी। स्कूल की लायब्रेरियन भी मुझे अच्छी विद्यार्थी समझती थी, आठवीं में आते-आते मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के सारे खंड, और अन्य जो लेखक हमारे स्लेबस में होते और लायब्रेरी में उनकी किताबें मिल जातीं तो उनको पढ़ने लग जाती थी।

इस तरह से शब्दों से मेरा लगाव गहरा था और सब को मालूम था। बचपन में स्कूल की पत्रिका के लिए एकाध बार कुछ लिखा, पर विशेष कुछ नहीं लिखा। अलबत्ता परीक्षा में निबंध में हमेशा सबसे अधिक मार्क्स मिलते रहे। घर पर खाना खाते हुए पढ़ना मना था, पिता जी नाराज होते थे, इसलिए जब उनकी आवाज़ सुनती थी तो किताब को कुर्सी पर अपने नीचे रख कर उस पर बैठ जाती थी। पंडित रामचन्द्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास घर में पता नहीं कहां से आया था, वह भी पढ़ती रहती थी। हिंदी साहित्य से मेरा परिचय उसके माध्यम से हुआ, वह पुरानी प्रति अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।

पढ़ना

कॉलेज के दिनों में अंग्रेज़ी की बहुत किताबें पढ़ी गईं । एक सहेली के घर में बहुत सारी किताबें थीं - आर्थर हेली, लियोन यूरी खासकर पढ़े गए। ऐन रेंड की ‘फ़ाउंटेनहेड’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। अंग्रेज़ी के बेस्टसेलर टाइप के तमाम उपन्यास पढ़े जो मिल जाते थे। सॉमरसेट मॉम के उपन्यास और कहानियाँ पढ़ना याद है।

मैंने हिंदी साहित्य जो मैंने दसवीं-ग्याहरवीं क्लास तक पढ़ा था, उसके बाद कॉलेज में पढ़ते समय वह छूट गया था, तब अंग्रेजी साहित्य पर अधिक जोर था। अशोक जी से मिलने के बाद मैं हिंदी साहित्य की ओर लौटी। अशोक जी कहते थे कि हमेशा एक डायरी रखिए और उसमें लिखिये। इसलिए डायरी रखी, जिसमें उनकी बातें सुनकर लिख लेती कि कौन सी किताबें पढ़नी है।

संयुक्त परिवार में रहते हुए और बच्चों के कारण, मेरे पास अपने लिए समय बहुत कम होता था। मैं अक्सर अपने उपन्यास की थीम से संबंधित नॉन-फिक्शन की किताबें पढ़ती रहती हूँ। समकालीन हिंदी साहित्य भी काफ़ी पढ़ती हूँ। प्रकाशक या लेखक मित्र कविता, कहानी, उपन्यास की किताबें भेज देते हैं, तो कोशिश करती हूँ कि उन्हें पढ़ कर फेसबुक पर ही सही, कुछ लिखूँ। मोबाइल पर ऑनलाइन वेब-साइट्स पर लेख और कहानियाँ पढ़ी जाती हैं। पत्रिकाओं में प्रकाशित किसी कहानी की चर्चा हो तो उसे खोज कर पढ़ती हूँ।

मेरा बेटा अंग्रेज़ी के बुकर और नोबेल पुरस्कृत लेखकों को बहुत पढ़ता है। पर वे किताबें आसपास रहते हुए भी नहीं पढ़ पाती हूँ, इसका अफ़सोस रहता है।

अशोक सेकसरिया और लेखन की शुरुआत

पच्चीस साल की उम्र में, जब मेरी शादी और दो बच्चे हो चुके थे, मुझे मेरे गुरु लेखक-पत्रकार अशोक सेक्सरिया मिले। बच्चों के लिए शब्दकोश बनाने के प्रोजेक्ट में उनसे परिचय मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। जिस दिन मैं पहली बार बालकोश के दफ्तर में गयी, तभी समझ गयी थी कि मेरे जीवन का यही अर्थ है। वहां चारों ओर किताबें थीं, बातें थीं, लोग थे। अशोक सेकसरिया मुझे वहाँ मिले, वही मेरे गुरु और मैंटोर बने। वह एक जाने माने लेखक और पत्रकार थे। उसके बाद मैंने सोचा नहीं कि इस माहोल के बाहर भी मेरा कोई जीवन है।

अशोक सेकसरिया व अलका सरावगी - तस्वीर अलका सरावगी के सौजन्य से

अशोक जी को अपने बारे में कुछ भी बताने से वह कहते थे, इसे लिख डालिए। मुझे लगता कि इतनी मामूली बातों को कौन पढ़ेगा? बहरहाल मैंने 'अंग्रेज़ी स्कूल में पहला दिन' शीर्षक से एक फीचर लिख डाला जो कलकत्ता की एक पत्रिका में छपा, जिसके राजकिशोर जी संपादक थे। जब मैंने उसे पढ़ा तो मैंने उसमें एक वाक्य था, "कितना कातर था वह बचपन", तो उसमें अशोक जी ने 'कातर' शब्द को काट करके कुछ और शब्द लिख दिया था, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उस पर काफी बहस की। तब अशोक जी ने अपनी गलती मान ली कि उन्हे उस शब्द को बदलना नहीं चाहिए था और खासकर कि मुझसे बिना पूछे। बाद में आगे चलकर अशोक जी ने मुझे बताया कि इस बात से उनको लगा था कि मैं अपने शब्दों के प्रति बहुत सजग हूं और अपने शब्द के लिए मैं उनसे लड़ पड़ी थी तो इस बात के लिए उनके मन में मेरे प्रति बहुत सम्मान हुआ था।

समाजवादी आंदोलन के लोगों की पत्रिका "सामयिक वार्ता" निकलती थी, अशोक जी उसके लिए बहुत काम करते थे, हर समय उसके लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते रहते थे। सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक जैसे लोग वहाँ आते रहते थे। मेरी पॉलीटिकल अवेयरनेस की शिक्षा-दीक्षा उनके कमरे में हुई, जो कि रेलवे प्लेटफार्म की तरह का कमरा था जिसमें सिर्फ किताबें और सिगरेट का धुआं और धूल रहती थी। अशोक जी की खटिया थी, हमेशा उस पर बैठे रहते थे। पास में कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ रहती थी जिन पर हम लोग बैठे रहते थे।

उनके घर पर बहुत सारे लेखकों से मेरा परिचय और मिलना हुआ - कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, गिरधर राठी, अशोक वाजपेयी, विभूति नारायण राय। यह सारे लोग जब कलकत्ता आते तो अशोक जी से मिलने आते और मेरे लिए यह एक ट्रेनिंग स्कूल था, जहाँ सुनने के लिए बहुत सारी बातें मिलती थी और सुनने में बड़ा आनंद आता था।

जब मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो अशोकजी इस बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें लगा मैं आगे लिख नहीं पाऊँगी।  खैर पुरस्कार मिला और उसके बाद भी मैं लिखती रही। अशोक जी को शायद इससे आश्वासन भी मिला होगा कि एक पुरस्कार मुझे नष्ट नहीं कर पाया, जैसा कि मैं उनको बार-बार कहती थी कि ऐसा नहीं होगा।

मेरे लेखन में और मेरे जीवन जीने के तरीके में, अशोक जी की एक बहुत बड़ी उपस्थिति हमेशा रही। वह ऐसे गुरु थे जो कुछ भी नहीं सिखाता है, कुछ भी नहीं पढ़ाता है,  फिर भी उसका होना ही एक तरह की एक मिसाल थी। 

कहानियाँ

तीस साल की उम्र में पहली कहानी छपने के बाद, मैं उत्साह में भर कर लगातार लिखती गई।

शायद 1989 में, हम सब परिवार सहित कलकत्ते के पास किसी के घर में दो दिन के लिए गए थे। वहां मुझे एक शक्स दिखाई दिया जो कुछ अजीब सा दिखता था, मुंह फाड़ कर मुस्कराता था, ऐसा ढीला पजामा पहने था कि वह लहंगे की तरह फट-फट करता चलता था। वह हंसता रहता था और हमारी सेवा-टहल ऐसे करता था जैसे घर का नौकर हो, लेकिन वह खाता हम सब के साथ में था और रहता भी उसी घर में सब के साथ था। घर में उसका स्थान क्या है, मुझे यह समझ में नहीं आता था। जब हम लौट रहे थे तब मैंने देखा कि वह रो रहा था। इसलिए जब गाड़ी चल पड़ी तो मैं बड़ी उदास हुई और मैंने उसके बारे में जानना चाहा। पहले तो उन लोगों को समझ में नहीं आया कि हम किसकी बात कर रहे हैं, क्योंकि अन्य लोगों के लिए जैसे वह था ही नहीं, अदृश्य सा था। बोले, कौन, वह पागल? तो मैंने कहा कि वह पागल नहीं है, तो सब हंस पड़े और खूब हंसे।

उस पर मैंने एक कहानी लिखी - "आपकी हँसी"। अशोक जी ने कहा कि रवींद्र कालिया है और यह उनका पता है यह भेज दीजिए। इस तरह से उस कहानी को "वर्तमान साहित्य" के महाविशेषांक में भेजा। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती जैसे लेखकों के साथ, वह 'प्रथम रचना' करके छपी और चर्चित हुई। मेरे पास बहुत सारी चिट्ठियां आईं कि ऐसा आदमी, हाशिए पर फेंका हुआ मार्जिनलाइज्ड आदमी, जिसकी तरफ हम कभी ध्यान भी नहीं देते हैं और वह दिखता ही नहीं है, उन सबकी ज़िंदगी में कहीं न कहीं मौजूद था।

1996 में मेरा पहला कहानी संग्रह आया। वह कहानियाँ आसपास के जीवन और उससे जुड़े सोच पर आधारित थीं। कुछ स्त्री होने के अनुभव पर भी थीं, हालाँकि उनमें स्त्री-विमर्श या फेमिनिज्म नहीं था। शिल्प की दृष्टि से उनमें कुछ नयापन भी था।

उपन्यास

कलिकथा की शुरुआत भी एक कहानी की तरह हुई थी। उसका शीर्षक था, "बीच वाला कमरा कहाँ है"। यह हमारे किसी परिचित के हार्ट के बाइपास करवा कर लौटने पर कही गई बात पर आधारित थी। पर वह कहानी दो पैराग्राफ के बाद रुक गई थी। आज़ादी के पहले जब बीच वाला कमरा नहीं था, उस समय को खोजते हुए इस कहानी ने उपन्यास का विराट रूप धारण कर लिया।

अलका सरावगी व प्रो. थॉमस दाह्नहार्ट, 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक

 

मेरी कहानियाँ ‘आधार प्रकाशन’ ने हज़ारों प्रूफ की गलतियों के साथ छापी थीं। कलकत्ता के पुस्तक मेले में आए प्रकाशक को मैंने चाय पर घर बुलाया और कह दिया कि मेरे पास बन्दूक होती तो मैं उन्हें गोली मार देती। फिर अपने गुस्से का प्रायश्चित करने के लिए उन्हें ही उपन्यास दिया। उन्होंने भी उसे ऐसा बढ़िया छापा कि निर्मल वर्मा तक हाथ में लेकर देर तक कवर देखते रहे। कलिकथा पर अनेक पत्र आए— समीक्षाएँ भी झोली भर कर आयीं। यह सब मेरी आशा से परे था।

कलिकथा के बाद कुछ एक ऐसी दुर्घटना घटी जिससे मैं डिप्रेशन में चली गई। पांच-छह महीने तक किसी की कोई बात सुनने-कहने का, कुछ भी करने का, दिल नहीं होता था। तब एक मीटिंग के लिए फोन आया। घर वाले भी सब कह रहे थे कि तुम उठो, घर के बाहर निकलो, तो मैंने सोचा कि चलो ठीक है, वहां जा कर बैठ जाते हैं।

मैं वहां गई तो मुझे एक महिला मिलीं, उन्होंने बिल्कुल दादी की जैसी सफ़ेद साड़ी पहनी थी, दादी जैसा उनका स्नेहिल  चेहरा था। उन्होंने कहा कि अरे हमने तुम्हारी कलिकथा पढ़ी है। वह मुझे अपने जीवन की कहानियां सुनाने लगींं, तो मैंने उन्हें कहा कि आप की कहानियां इतनी सशक्त हैं, आप इन पर क्यों नहीं लिखती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, मैं लिख नहीं सकती, तुम्हें लिखना हो तो तुम लिखो। इस तरह से "शेष कादंबरी" की शुरुआत हुई और उसे लिखते हुए मेरा डिप्रेशन गायब हो गया और मैंने अपने आप को जैसे फिर से डिस्कवर किया, कि अल्टीमेटली मैं लेखक हूं और जीवन में चाहे कितना भी बड़ा कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मान सकती। "शेष कादंबरी" ने इस तरह से मेरा उद्धार किया। मेरे शब्दों ने और लेखन ने मुझे फिर से जीवन जीने की हिम्मत दी है।

मेरे उपन्यास "गांधी और सरलादेवी चौधरानी" में गांधी जी एक मुख्य पात्र के रूप में है। गांधी जी को जानना भी मेरे लिए एक यात्रा थी, यह समझना कि किस तरह से उन्होंने अपने को बनाया, किस तरह से उन्होंने उस समाज को बनाया जिसने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। गांधी की क्या सोच थी, उनकी कितनी अंदरूनी ताकत थी जिसके भरोसे वह खड़े हो जाते थे, उन्हें भरोसा होता था कि वह ऐसा बदलाव ला सकेंगे। मैंने इस किताब में गांधी के जीवन का एक साल का पीरियड लिया है जो जलियांवाला बाग के 6 महीने बाद से शुरू होता है जब गांधी जी पहली बार लाहौर गए थे।

सरलादेवी चौधरानी, लाहौर के देशभक्त वकील-पत्रकार रामभज दत्त चौधरी की पत्नी थी और रवींद्रनाथ टैगोर की बहन की लड़की थीं। गांधी जी उन्हें एक सहयोगी नेता की तरह देख रहे थे क्योंकि वह इस देश की औरतों में जागृति लाना चाहते थे। सरलादेवी चौधरानी के साथ उनका यह एक साल का जीवन, उसे आप प्रेम प्रसंग भी कह सकते हैं या एक तरह का सपना जो वह देख रहे थे। सरला देवी एक ऐसा चरित्र है जो अपने समय के बहुत आगे देख सकता है, सोच सकता है।

गांधी और सरलादेवी में बहुत ही फोकस है, देश ही उनके लिए सब कुछ है और देश की आज़ादी के अलावा कुछ नहीं था। व्यक्तिगत कुछ भी महत्व नहीं रखता है। प्रेम के लिए वे दोनों तैयार नहीं थे। पर प्रेम हुआ और गांधी ने अपने पत्र में इसे साफ़ स्वीकार किया। इस तरह से यह एक ह्यूमन साइकोलॉजी का, एक स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों का, दोनों ही का एक बहुत ही अनयूजुअल चरित्र हैं।  वह सम्बंध क्यों टूटता है और किस तरह टूटता है,यह उपन्यास उसकी बात कहता है।

मेरे पांचवें उपन्यास, "जानकीदास तेजपाल मेन्शन" को अपेक्षित सराहना नहीं मिली, ऐसा मुझे लगा। अपने बच्चे सबको श्रेष्ठ लगते हैं, इसलिए अपनी राय को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। कई साल बाद उसे इंदु शर्मा कथा यू.के. में सम्मान मिला, तो तसल्ली ज़रूर हुई। 

लिखना

मैं यह कह सकती हूँ कि पात्र का चुनाव और विषय बहुत कुछ संयोग पर आधारित होता है। अचानक कोई कहानी आप को पकड़ लेती है और आप उसमें धँसते चले जाते हैं। वह सोते-जागते नए रूप लेती रहती है और जीवन के जिस छोटे ग्राफ से वह शुरू हुई थी, वह फैलता जाता है। पात्र बिल्कुल वही नहीं रहते जहाँ से उन्हें शुरू में देखा था। वे जैसे ख़ुद को लिखवाते हैं जिसमें आप का पढ़ा- लिखा- देखा- सुना हुआ अनायास जुड़ता जाता है। कोई योजना से वे नहीं चलते।

लिखते हुए यदि यह भय रहे कि कोई आपको ग़लत समझ लेगा या कोई शख़्स उसे असली ज़िंदगी में पहचान कर आप से नाराज़ हो जाएगा, तो लिखा जा नहीं सकता। मेरे साथ ऐसा हुआ भी है। पर यह ख़तरा उठाये बिना जीवन रचा नहीं जा सकता।

हमको पहले का सब कुछ अनलर्न करके लिखना होता है और अगर आप अनलर्न नहीं कर पाते हैं तो फिर आप कहीं न कहीं अपने आप को दोहराने लग जाते हैं।

पात्र लेखक को अपनी अंगुली पकड़ा कर मनमाने तरीके से चलाते हैं। उसमें बहुत कुछ प्रीमेडीटेटेड नहीं होता, वह भी एक यात्रा होती है, डिस्कवरी की। पात्रों के साथ चलते हुए, आप लिखते भी हैं और साथ-साथ अपने आप को भी जानते चलते हैं, क्योंकि लिखा किरदार आपसे अलग भी होता है और वह आपका अपना ही होता है, खासकर जब तक किताब छप नहीं जाए।

अन्य लेखक

हिंदी के अन्य लेखकों से अधिकतर मेरे औपचारिक संबंध ही रहे हैं क्योंकि कलकत्ता में रहते हुए मिलना-जुलना कम होता है। अनामिका, गीतांजलि श्री, प्रत्यक्षा, प्रियदर्शन, रजनी गुप्त, उदयन वाजपेयी, यतीश कुमार, अम्बर पांडे कुछ नाम हैं जिनसे अपनापन महसूस हुआ है। अन्य भाषाओं के लेखकों में असम के नीलिम कुमार हैं। अभी उनकी आत्मकथा पढ़ रही हूँ। गुजराती में ग़ुलाम मोहम्मद शेख हैं। बांग्ला और अंग्रेज़ी के कई लेखक हैं। 


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मंगलवार, अक्टूबर 14, 2025

यात्रा की तैयारी

मेरी दिल्ली जाने की तैयारी शुरु हो गयी है। अगले सप्ताह भारत पहुँच रहा हूँ। तैयारी करते हुए सोच रहा था कि पहले की यात्राओं और अब की यात्राओं में कितना कुछ बदल गया है।

लाने-ले जाने वाली बदलती दुनिया 

एक ज़माना था जब भारत जाने से पहले लम्बी लिस्टें बनाता था कि कौन से मसाले, कौन सी दालें, कौन से गानों के कैसेट, कौन सी फिल्मों के वीडियो कैसेट, वगैरा लाना भूलना नहीं है। उन लिस्टों में और भी न जाने क्या क्या होता था। तब सबसे बड़ी चिन्ता होती थी कि सूटकेस का वज़न अधिक हो गया तो सामान एयरपोर्ट पर न छोड़ना पड़े।

फ़िर समय बीता, सन् दो हज़ार के आसपास कैसेट के बदले में सी.डी. या डी.वी.डी. आ गयीं। तभी यहाँ इटली में भी प्रवासी आने लगे तो यहाँ भी एशिआई दुकाने खुलने लगीं। इसलिए पहले दालों और मसालों को लाना कम हुआ फ़िर बिल्कुल समाप्त हो गया। फ़िर हर तरह के फ़ल-सब्जियाँ भी यहाँ मिलने लगे। 

जैसे-जैसे समय बीत रहा है, अधिक चीज़े यहाँ मिलने लगी हैं और उनकी क्वालिटी बेहतर हो रही है। एक उदाहरण आमों का। वैसे तो सुपरमार्किट में ब्राज़ीली या अफ्रीकी आम भी मिलते हैं, लेकिन पिछले दस-पंद्रह सालों से पाकिस्तानी आम भी आने लगे थे, जो स्वाद में अच्छे थे लेकिन बहुत मँहगे होते थे, सात-आठ यूरो का एक किलो। इस साल यहाँ स्पेन से एक बहुत बढ़िया आम मिल रहा है, ढाई यूरो का एक किलो। हर साल इस तरह से कुछ न कुछ अन्य चीज़ें बिकने लगी हैं, जैसे कि हल्दीराम के गोलगप्पे के डिब्बे। 

हमारे छोटे से शहर में भारतीय दो ही हैं लेकिन यहाँ बँगलादेश और पाकिस्तान के बहुत से प्रवासी हैं, इसलिए यहाँ उनकी दुकाने भी खुली हैं और हर तरह का सामान भी मिलने लगा है। पहले जाने से, दो पहीने पहले से सपने आने लगते थे कि आम खाने हैं, मिठाई खानी है, मेथी, भिंडी और करेले की सब्ज़ी खानी है, इन दुकानों की वजह से अब वह सब बहुत कम हो गया है।

एक ओर लाने वाले सामान में कमी हुई है तो दूसरी ओर भारत ले जाने वाले सामान में बड़ा बदलाव आया है। 

सबसे बड़ी दिक्कत है कि घर के लोगों के लिए क्या गिफ्ट ले कर जाओ?  वहाँ पर अब सब कुछ मिलने लगा है। पहले चॉकलेट, व्हिस्की जैसी गिफ्ट ले कर जाता था, अब बहुत सोचना पड़ता कि किसके लिए क्या ले कर जाऊँ, अधिकाँश के लिए कुछ नहीं ले कर जाता। कई बार कपड़े ले कर गया हूँ लेकिन अक्सर उन पर भी "मेड इन इंडिया", या बंगलादेश या चीन या वियतनाम का नाम लिखा होता है, इसलिए लगता है कि उन्हें ले कर जाना बेकार है। 

वहाँ हिन्दुस्तान की शहर-सड़कें इतनी तेज़ी से बदल रहीं हैं कि मन में थोड़ा सा यह डर भी होता कि वहाँ जाऊँगा तो सब कुछ बदला-बदला दिखेगा। पहले प्लैन बनते थे कि इस दोस्त से मिलना है, वहाँ रिश्तेदार के यहाँ जाना है, वगैरा। वह भी अब बहुत कम हो गया है क्योंकि व्हाटसएप्प और फेसबुक से सबकी खबर मिलती रहती है, कभी कभी वीडियो कॉल से बात भी हो जाती है, तो लगता नहीं कि उनसे बहुत दिनों से नहीं मिले, अब मिलना चाहिये।

लेकिन अभी भी कुछ चीज़ें हैं 

इटली में हमारे शहर में अभी दोसा, पूरी-भाजी और छोले-भटूरे जैसी चीज़ें नहीं मिलती, इसलिए सोचता हूँ कि उन्हें खाना है। आयुर्वेदिक दवाएँ खरीद कर लानी हैं। सिनेमा हॉल में जा कर नयी फ़िल्में देखने का आकर्षण भी है। वैसे तो यहाँ सब फ़िल्में देखने को मिल जाती हैं लेकिन हिन्दुस्तान में सिनेमा हॉल में कोई हिट फ़िल्म देखने का मज़ा कुछ और है, बस एक बात अच्छी नहीं लगती कि लोग अक्सर वहाँ भी मोबाइलों पर लगे दिखते हैं।

मुझे संग्रहालय जाने, चिड़ियाघर जाने, बाज़ार में घूमने, संगीत और नृत्य के कार्यक्रम देखने आदि भी बहुत अच्छे लगते हैं, इसलिए इसकी लिस्ट भी बनती है कि कौन सी जगहों पर जाना है। पिछली बार गया था तो इंडिया गेट के पास नये सैनिक स्मारक को और मैहरोली पुरात्तव पार्क को देखने गया था। इस बार के.एम. कला संग्रहालय और दिल्ली आर्ट गैलरी की नयी प्रदर्शनी को देखना है। करीब दो-तीन दशकों के बाद इस बार मैडिकल कॉलेज के कुछ पुराने साथियों से मिलने की योजना भी है। चूँकि घुटनों में दर्द रहता है, लम्बी यात्रा करने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाया।

लेकिन हिन्दुस्तान जाने में घरवालों से मिलने की चाह अभी भी सबसे प्रबल होती है, सबके साथ बैठना, बतियाना, गप्प मारना, वहाँ जाने का सबसे बड़ा सुख और आकर्षण यही लगता है। अमरीका से मेरी दूसरी बहन भी वहाँ आयेगी, तब भाई-बहन साथ में बैठ कर खूब गप्प मारेंगे, अतीत की बातों और जो लोग नहीं रहे उन्हें याद करेंगे, कुछ बहसें और लड़ाईयाँ भी होंगी। घर लौटने का सबसे बड़ा सुख यही होगा। नीचे वाली तस्वीर पिछली यात्रा से है।


 

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बुधवार, जुलाई 02, 2025

यौन दुराचरण और हमारी चुप्पियाँ

पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर साहित्यकारों से जुड़ी यौन दुराचरण की एक बहस चल रही है। मैं फेसबुक पर कम ही जाता हूँ और कोशिश करता हूँ कि नकारात्मक बातें न पढ़ू, फ़िर भी इस बहस के कुछ हिस्सों पर मेरी नज़र पड़ी। उस बहस में जिन व्यक्तियों की और जिस घटना की बात हो रही है, मैं दोनों से अपरिचित हूँ, इसलिए उसके बारे में कुछ नहीं लिखना चाहता।

लेकिन इस बात से मुझे अपने कार्य-जीवन से जुड़ीं यौन दुराचरण की बातें याद आ गईं। यह आलेख मेरी उन यादों, अनुभवों, तथा विचारों के बारे में है।


आप क्या करेंगे?  

अगर आप को पता चले कि आप का मित्र या ऐसा व्यक्ति जिसे आप बहुत मानते हैं वह यौन-दुराचरण कर रहा है तो आप क्या करेंगे? यह बातें फ़िल्मों में देख कर या दैनिक या पत्रिका में पढ़ कर आसान लगती है, और हम सोचते हैं कि इसके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। 

जैसे कि मीरा नायर की फ़िल्म "मॉनसून वेडिन्ग" में यह प्रश्न उठता है, जब पता चलता है कि परिवार का एक सम्मानित आदमी जिसने परिवार की कई अवसरों पर मदद की है, घर की बच्ची के साथ जबरदस्ती यौन सम्बंध करता था। उस फ़िल्म में परिवार के वरिष्ठ लोग उस आदमी को वहाँ से चले जाने के लिए कहते हैं। लेकिन फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में क्या होता है? वहाँ अक्सर इस विषय पर चुप्पियाँ मिलती हैं, और लोग इस बारे में बात करने में असहज हो जाते हैं।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी यही बताते है कि सामान्य जीवन में इस तरह के निर्णय लेना कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। अगर आप को यौन विषय पर पढ़ने-सुनने से परेशानी होती है, तो मेरी सलाह है कि आप इस आलेख को आगे नहीं पढ़िये।

दो जाने-माने नाम

एब्बे पिएर फ्राँस में १९१२ में पैदा हुए थे और उनकी मृत्यु सन् २००७ में हुई थी। उन्हें लोग संत मानते-बुलाते थे। सन् १९४९ में एब्बे पिएर ने यूरोप में एम्माउस नाम की संस्था बनाई थी जो गरीबों, विकलांगों, कुष्ठ रोगियों, शरणार्थियों आदि के साथ सक्रिय थीं। उनकी संस्था से प्रभावित हो कर बहुत सी अन्य एम्माउस एसोसियेशन भी बनीं। चूँकि मैं भी कुष्ठ रोग और विकलांगता के क्षेत्र में सक्रिय था, उनमें से कई संस्थाओं के साथ मेरे सम्पर्क बने और उनके साथ बहुत बार काम भी किया।

करीब तीस-पैंतीस साल पहले, नब्बे के दशक में मैं एब्बे पिएर से एक बार मिला था और उनकी बातों और सोच से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए जब पिछले वर्ष (२०२४ में), एब्बे पिएर के बारे में खबरें आईं कि उन्होंने बहुत सी बच्चियों के साथ यौन दुराचार किया था, तो मुझे बहुत धक्का लगा था। इस विषय पर एक नई किताब आई है जिसकी लेखिकाओं ने इस विषय पर छानबीन की है जिससे स्पष्ट होता है कि उनके यौन दुराचार की बातें लोगों को बहुत पहले से मालूम थीं लेकिन इसके बारे में कोई खुल कर नहीं बोलता था। ३३ स्त्रियों ने बचपन में उनके इस तरह के व्यवहार के व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में गवाही दी है।

जब इस तरह की बातें पता चलती हैं तो पहला प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है - उस व्यक्ति के अच्छे कामों के बारे में क्या किया जाये? उन्हें भुला दिया जाना चाहिये? किसी व्यक्ति की बात करते हुए  उसके अच्छे और बुरे कर्मों को किस तराजू में कैसे तोला जाये?

दूसरी बात है समय की। एब्बे पिएर को गुज़रे हुए सतरह साल हो चुके हैं तो अब यह बातें कहने का क्या लाभ है? मेरे विचार में सच्ची बात को अभिव्यक्त करना भी आवश्यक है। इस समाचार के बाद कुछ एम्माउस संस्थाओं ने अपनी वेबसाईट आदि से एब्बे पिएर का नाम हटा दिया है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इतने सालों के बाद की उन औरतों की स्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता, या फ़िर किसी को मानसिक रोग हो तो वह गलत सम्बंध की बात की कल्पना भी कर सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा विश्वास करना कठिन है। लेकिन मुझे लगता है कि इतनी सारी औरतों की शिकायतों को मानसिक रोग कहना सच्चाई से मुँह छुपाना है।

दूसरी बात डेविड वर्नर की है। पिछड़े और विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बहुत सारे लोग डेविड वर्नर की दो किताबों को जानते हैं, "जहाँ कोई डॉक्टर नहीं है" और "गाँव के विकलांग बच्चे"। १९८०-९० के समय में यह दोनों किताबें बहुत प्रसिद्ध थीं और इनसे प्रेरणा पा कर इस तरह की अन्य कई किताबें भी लिखी गईं जैसे कि "जहाँ कोई डैंटिस्ट नहीं है", "जहाँ कोई मनोरोग विषेशज्ञ नहीं है", आदि।

मैंं डेविड से पहली बार १९८८ में मिला था और विकलांगता से सम्बंधित विषयों पर उसकी सोच-समझ को प्रेरणादायक पाया था।

२००३-४ के आसपास मैंने सुना कि उस पर आरोप लगा है कि मैक्सिको के जिस गाँव में रहता और काम करता था, वहाँ के कई बच्चों के साथ उसके यौन सम्बंध भी थे। मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मेरी एक अंग्रेज़ी मित्र ने मुझे उसकी एक चिट्ठी दिखायी जिसमें वह इस तरह के "प्रेम सम्बंधों" को वह बच्चों के मानसिक विकास के लिए सही बता रहा था। हमारे मित्रों के गुट ने उस समय उससे सब सम्बंध तोड़ लिए थे। बाद में मैंने सुना कि वह अपनी बात से पलट गया है, वह इंकार करता है कि उसने ऐसा कुछ किया था।

डेविड मुझसे करीब बीस साल बड़ा था, अगर वह आज जीवित है तो नब्बे साल का होगा। बहुत सालों से मेरा उससे सम्पर्क नहीं है। लेकिन इसके बारे में मेरे मन में दुविधा है। उसकी जिन किताबों की वजह से लाखों लोगों को लाभ भी हुआ था और आज भी होता होगा, उनके लिए उसके योगदान को कैसे देखा जाये? मैं कई विकलांग लोगों को जानता हूँ जो कहते हैं कि उसकी किताबों में उन्होंने अपना जीवन जीने की राह पाई है।

मी टू - व्यस्कों में सम्बंधों की जटिलताएँ

कुछ वर्ष पहले "मी टू" (मुझे भी) के नाम से यौन दुराचार की बहुत सी बातें बाहर निकलीं, कई लोगों पर आरोप लगे जिसमें बड़ी उम्र के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध या उच्चे पद के अफसरों-अधिकारियों ने अपने नीचे काम करने वाली युवतियों को सैक्स के लिए मजबूर किया था। कानूनी जाँच में बहुत से ऐसे आरोप सही निकले और कुछ में आरोपितों को सजा मिली या नौकरी से निकाला गया। कुछ ऐसे आरोप झूठे भी निकले। 

कुछ स्त्रियों का कहना है कि जिस समय यह हादसा हुआ था, यह इतना अप्रत्याशित था कि उस समय वह कुछ नहीं कह पायीं। अगर महिला ने रोका नहीं या स्पष्ट मना नहीं किया तो क्या इसे गलतफहमी का नतीजा भी माना जा सकता है?

यह भी सच है कि नीचे काम करने वाले को दबाव महसूस होता है कि अगर वह ऐसे सम्बंधों को नहीं स्वीकारेंगे तो उनके केरियर पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि इस तरह के सम्बंध हमेशा गलत होते हैं। लेकिन ऐसे कई दम्पत्ति हैं जिनकी जानपहचान और प्रेम साथ में काम करने की वजह से हुए, जब उनमें से एक ऊँचे पदवे पर था और दूसरा नीचे। इसलिए यह सोचना कि ऊँचे और नीचे पद वालों के बीच किसी तरह के सम्बंध नहीं बने, को लागू करना कठिन होगा।

यह भी हो सकता है कि कैरियर में आगे बढ़ने के लिए या किसी लाभ की आशा से कुछ व्यक्ति इस तरह के सम्बंध सोच-समझ कर बनायें, लेकिन बाद में प्रमोशन या लाभ न मिलने पर गुस्सा हो जायें और बदला लेने के लिए कहें कि उनके साथ जबरदस्ती हुई है। यह बात सोच कर मुझे व्यस्क व्यक्तियों के बीच हुए सम्बंधों का मामला अधिक कठिन लगता है। 

समलैंगिक यौन दुराचरण की जटिलतायें

नब्बे के दशक में एक अधेड़ उम्र की नर्स हमारे एक प्रोजेक्ट में काम करने तीन महीने के लिए विदेश गईं। उन्होंने लौट कर मुझसे शिकायत की वहाँ काम करने वाली, उनसे दस वर्ष बड़ी हमारे प्रोजेक्ट की प्रमुख ने उनसे यौन सम्बंध बनाने की कोशिश की। वह चाहती थीं कि हम उस प्रोजेक्ट प्रमुख को नौकरी से निकाल दें। जहाँ तक मुझे समझ में आया शिकायत करने वाली महिला के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं हुई थी, बल्कि वह सोचती थीं कि लेसबियन होना गलत है और ऐसी औरतों को प्रोजक्ट में ज़िम्मेदारी के पद पर नहीं रखना चाहिए। जबकि मुझे लगा कि लेसबियन होना और व्यस्क महिला से सम्बंध के लिए कहना या पूछना कोई जुर्म नहीं है। अंत में मैंने इस शिकायत के बारे में कुछ नहीं किया।

एक बार भारत में एक कुष्ठआश्रम के काम करने वाली यूरोपीय मूल की नर्स-नन के बारे में भी मुझे यही शिकायत मिली कि वह लेसबियन है। मैं उन्हें बहुत सालों से जानता था और मुझे लगा कि वह बहुत मेहनत तथा प्यार से रोगियों की सेवा करती थीं। मैंने सोचा कि लेसबियन होना अपराध नहीं है, और अगर वह किसी से जबरदस्ती नहीं कर रहीं तो यह उनका निजि मामला है। बाद में मुझे खबर मिली कि उनकी संस्था (कोनग्रेगशन) ने उन्हें संस्था से निकाल दिया है और वह यूरोप वापस लौट आईं।

कुछ साल पहले अमरीकी अभिनेता केविन स्पेसी पर भी कुछ पुरुषों ने आरोप लगाये थे कि कुछ दशक पहले जब वह नाबालिग थे तब स्पेसी ने उनके साथ जबरदस्ती सम्बंध बनाये थे। इन आरोपों की वजह से स्पेसी को कई फिल्मों और सीरियल से निकाल दिया गया, लेकिन बाद में न्यायालय ने उन आरोपों को सही नहीं माना। एक ओर से यह हो सकता है कि इतने पुराने ज़ुर्म को अदालत में साबित करना आसान नहीं है, लेकिन दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि प्रसिद्ध और पैसे वाले व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाने का कारण व्यक्तिगत लाभ की आशा हो। 

एक और अनुभव

मेरा तीसरा अनुभव एक यूरोपी पुरुष से जुड़ा है जो करीब बीस साल से अफ्रीका में काम करते थे। उन्होंने वहाँ की महिला से विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे, जिनमें वहाँ के कुछ गोद लिए हुए बच्चे भी थे। उन्होंने बहुत से बच्चों को छात्रवृति दिलवा कर यूरोप पढ़ने भेजा था। एक दिन उनके विरुद्ध शिकायत आई कि वह वहाँ अनाथाश्रम के बच्चों से यौन सम्बंध बनाते हैं। इस बात की जाँच के लिए वहाँ एक व्यक्ति को भेजा गया। तीन सप्ताह तक उस व्यक्ति ने वहाँ के बच्चों से, वहाँ काम करने वालों से, आदि से साक्षात्कार किये, और इस बारे में प्रश्न पूछे। पता चला कि आरोप लगाने वालों में कुछ लोगों का उनसे झगड़ा हुआ था, लेकिन किसी बच्चे से इसके बारे में बातचीत से कोई संदेहजनक बात नहीं निकली। आखिर में कुछ सबूत नहीं मिलने से यह जाँच बंद कर दी गयी और उनके विरुद्ध कुछ कार्यवाही नहीं की गई।

इस बात के चार-पाँच साल के बाद उस देश की सरकार ने उन्हें अपने देशवासियों की सेवा के लिए विषेश पुरस्कार दिया। इस बात को बीस-पच्चीस साल हो गये हैं और वह सज्जन, जो अब वृद्ध हैं, आज भी उसी देश में रहते हैं और उसी अनाथाश्रम में स्वयंसेवक की तरह काम करते हैं।

सच कहूँ तो आज भी मेरे मन में इस घटना के बारे में दुविधाएँ हैं, हालाँकि उनके अपने गोद लिए हुए बच्चे, जो अब व्यस्क हैं, कहते हैं कि उनके पिता पर लगे आरोप झूठे थे। आप बताईये कि आप इस मामले में क्या करते?

अंत में

मेरे लिए, व्यक्तिगत स्तर पर, इस विषय पर सबसे बड़ी दुविधा का कारण है कि जहाँ बलात्कार जैसे सबूत नहीं हों, किसी पर लगे आरोपों को कैसे जाँचा जाये? बाद में मन में संदेह रह जाता है, उसे निकालना असम्भव होता है, तो यह लगता है कि आरोप लगाना बहुत आसान है, लोग कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि जब कोई औरत, अतीत में हुई किसी बात को बताती है, तो उसके लिए यह कहना आसान नहीं होता, उसे कैसे गम्भीरता से न लिया जाये?

अंत में बात घूम-फ़िर कर वहीं आ जाती है कि उपन्यासों, फ़िल्मों या अखबारों या फेसबुक में यह बातें आसान लग सकती हैं, कि यह हुआ, ऐसा या वैसा करना चाहिए था। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में कुछ भी लिखना आसान है। लेकिन जब आप को निर्णय लेना पड़े तो यह कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। 

पटना की घटना से जुड़ी बहस पर साहित्यकारों और साहित्य की बात करते हुए, मित्र ओम थानवी ने लिखा है, "अच्छा या बड़ा लेखक जाति, विचार, चरित्र, आचरण के बावजूद अच्छा या बड़ा होता है। कम-से-कम इस तरह के आधारों पर उसे त्याज्य या उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।" कुछ यही बात अन्य क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए भी कही जा सकती है।

आप बताईये आप इस विषय के बारे में क्या सोचते हैं? 

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शुक्रवार, जून 20, 2025

राशन की चीनी

आज सुबह चाय बना रहा था तो अचानक मन में बचपन की एक याद कौंधी। 

यह बात १९६३-६४ की है। मैं और मेरी छोटी बहन, हम दोनों अपनी छोटी बुआ के पास मेरठ में गर्मियों की छुट्टियों पर गये थे। १०१ नम्बर का उनका घर साकेत में था। साथ में और सामने बहुत सी खुली जगह थी। बुआ के घर में पीछे पपीते का पेड़ लगा था और साथ वाले घर में अंगूर लगे थे। एक बार दोपहर में जब अन्य लोग सो रहे थे, पड़ोसी घर से अंगूर चुरा कर खाने की सजा भी मिली थी। बुआ के यहाँ अजीत नाम के गढ़वाली सज्जन रसोईये का काम करते थे।

तब मैं नौ-दस साल का था और सुबह दूध पीता था। दिल्ली में घर पर दूध में चीनी मिला कर पीते थे। उन दिनों में चीनी राशन से मिलती थी और शायद मेरठ में उसकी कमी चल रही थी, इसलिए वहाँ दूध फीका पीना पड़ता था। ऐसी आदत पड़ी थी कि बिना चीनी का दूध पीया ही नहीं जाता था, मतली आने लगती थी। तब अजीत कहता कि गुड़ का टुकड़ा मुँह में रख लो और साथ में दूध का घूँट पीयो, चीनी की कमी महसूस नहीं होगी।

पिछले दस-पंद्रह सालों से मैं दूध, चाय और कॉफी बिना चीनी के पीता हूँ। मसूढ़ों में तकलीफ रहती थी तब डैन्टिस्ट ने कहा कि शायद मेरे मसूढ़ों को चीनी और कॉफी का सम्मिश्रिण सूट नहीं करता, इसलिए मुझे कुछ दिन तक बिना चीनी की कॉफी पी कर देखना चाहिए। एक बार कॉफी से शुरु किया तो चाय और दूध में भी चीनी डालना छोड़ दिया।

तब से फीका पीने की ऐसी आदत पड़ी है कि अगर चाय में चीनी हो तो मुझसे पी नहीं जाती, मतली आने लगती है। भारत में छोटे-बड़े शहरों में घूमते हुए कई बार ऐसा होता है कि वह लोग चाय बना कर रख लेते हैं जिसमें चीनी मिली होती है और आप उनसे बिना चीनी की चाय माँगिये तो वह मना कर देते हैं। रेल में भी यही होता है।

कर्णटक में एक पशु मेले में चाय बेचने वाली - Image by Sunil Deepak

तब सोचता हूँ कि जीवन भी कितना विचित्र है। कभी चीनी न होने पर उसके लिए तरसते थे और आज चीनी होने पर तरसते हैं।

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साठ-सत्तर के दशक के बारे में सोचो तो मन में प्रश्न उठता है कि अगर गुड़ मिलने में कोई कठिनाई नहीं होती थी तो चीनी क्यों नहीं मिलती थी? गुड़ से चीनी बनाना ऐसा कठिन नहीं है। शायद तब बात गन्ने या गुड़ की कमी की नहीं थी बल्कि फैक्टरियों को चीनी बनाने के कोटा मिलना की थी, क्योंकि कोई फैक्टरी वाला, जितनी अनुमति मिली हो उससे अधिक चीनी का उत्पादन नहीं कर सकता था। अगर वह कोटे से अधिक उत्पादन करते थे तो सरकारी बाबू उन पर जुर्माना लगा देते थे।

यह कोटे वाली बात आज की पीढ़ी के लिए समझना आसान नहीं है। एक बार मैंने विक्स बनाने वाली कम्पनी के अधीक्षक का एक साक्षात्कार सुना था जिसमें उन्होंने बताया कि इंदिरा गाँधी की सरकार के समय में एक साल फ्लू का बुखार बहुत फ़ैला। इसलिए विक्स की माँग बहुत थी तो कम्पनी ने उत्पादन बढ़ा दिया। इस बात के कुछ महीने बाद उन्हें दिल्ली के एक अफसर ने बुलाया, वह अपने वकील के साथ गये। उन्हें कहा गया कि तुमने कोटे से अधिक विक्स बना कर अपराध किया है, उसका जुर्माना देना पड़ेगा।

आज का हिन्दुस्तान में बहुत सी बातें बदली हैं, अब फैक्टरियों को कोटे से अधिक बनाने का जुर्माना नहीं लगता, क्योकि अब कोटे नहीं होते। लेकिन कई क्षेत्रों में कुछ सरकारी बाबूओं की सोच में बहुत बदलाव नहीं हुआ है। उनका ध्येय जनसेवा नहीं, जब तक आप उनके हाथ गर्म नहीं करें तब तक उनका काम आप के काम में अड़चने डालना है।

आप की क्या राय है, हिन्दुस्तान में क्या बदलना चाहिए जो अभी भी नहीं बदला?

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शनिवार, जून 07, 2025

झाड़ू-पौंछे का रोबोट

बचपन से देखा था कि माँ सुबह स्कूल में पढ़ाने जाने से पहले घर में झाड़ू लगा कर जाती थी, अक्सर झाड़ू के बाद गीला पौंछा भी लगता था। जब मेरी छोटी बहनें बड़ी हुईं तो कभी-कभी वह भी माँ का हाथ बँटाती थीं। जब से इटली में आया तो हमेशा पत्नी को यही काम करते देखा। यह हमारी झाड़ू-पौंछे की पुरानी दुनिया थी।

चीन में सड़क की सफाई करने वाले कर्मचारी

पहले गर्मियों की छुट्टियों में जब बेटे को ले कर पत्नी महीने-दो महीने के लिए समुद्र तट वाले घर में रहने चली जाती, तो मैं उनसे मिलने जाने के लिए सप्ताह-अंत की प्रतीक्षा करता था। लेकिन उन दिनों में घर की सफाई की ज़िम्मेदारी मेरी होती थी। तब मैं हफ्ते में एक बार झाड़ू लगाता था, और कभी-कभी पौंछा भी लगाता था। साथ में यह ध्यान रखता था कि जिस दिन पत्नी को घर लौटना है, उससे पहले घर की सफाई ठीक से की जाये। लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि वह लोग छुट्टियों से एक-दो दिन पहले घर लौट आये और मुझे ठीक से सफाई करने का मौका नहीं मिला। तब पत्नी के माथे पर बल पड़ जाते कि "अरे, घर कितना गंदा हो रहा है"।

करीब दस साल पहले, मैं दो साल के लिए गौहाटी में काम करने गया तो वहाँ किराये के घर में अकेला रहता था। वहाँ घर में एक झाड़ू-पौंछा लगाने वाली आती थी। पिछले तीस-चालीस सालों में मुझे यहाँ पर एकदम साफ-सुथरे में रहने की ऐसी आदत हो गई थी कि मुझे लगता कि गौहाटी की झाड़ू-पौंछा लगाने वाली ठीक से काम नहीं करती थी, जल्दी-जल्दी दो हाथ चलाती और चली जाती। मैं एक-दो बार तो उसे ठीक से सफाई करने को कहा, जब देखा कि उनका काम तो उसे हटा कर एक अन्य महिला को रखा। जब समझ में आया कि काम तो वैसे ही होगा तो उन्हें काम पर आने से मना कर दिया। तब मैं खुद ही सुबह घर में अच्छी तरह से झाड़ू-पौंछा लगा कर ही काम पर जाता था।

नयी दुनिया की नयी सफाई

कुछ साल पहले हमने सफाई करने वाला रोबोट खरीदा। यह घर की धूल, मिट्टी, कूड़ा जमा करने में बढ़िया काम करता है, हालाँकि मेरी पत्नी को उससे संतोष नहीं होता, वह कई बार, इसकी सफाई के बाद, अलग से वेक्यूम क्लीनर ले कर उससे दोबारा सफाई करती है। लेकिन अब जब पत्नी गर्मियों में एक-दो महीने के लिए समुद्र तट पर रहने चली जाती है (और मैं वहाँ नहीं जाता क्योंकि मैं वहाँ तीन-चार दिन में ऊब जाता हूँ), तो घर में मेरे मित्र रोबोट जी ही सफाई करते हैं।

रोबोट से कालीन की सफाई

घर के पिछवाड़े में इस रोबोट का बिस्तर लगा है, वहाँ रख दो तो पूरा चार्ज हो जाते हैं। हर दूसरे-तीसरे दिन इन्हें काम पर लगा देता हूँ। गोल-गोल घूम कर यह कमरे के कोने-कोने में जाते हैं। इनके भीतर कम्पयूटर लगा है, इनके पास घर का पूरा नक्शा है कि कहाँ  क्या रखा है, सोफे और मेज़ आदि के चक्कर लगाना आता है, और यह सीढ़ियों से नीचे नहीं गिरते। ऊँचाई कम है इसलिए यह अलमारियों, बिस्तरों आदि के नीचे घुस कर सफाई कर सकते हैं। इन्हें चलाने से पहले, मैं कमरे की जो चीज़ें आसानी से हट सकती हैं, उन्हें वहाँ से हटा लेता हूँ ताकि यह खुले घूमें।

रोबोट अलमारियों, बिस्तर आदि के नीचे भी घुस जाता है

छोटे-मोटे कालीन आदि भी झाड़ कर हटा देता हूँ, जबकि मोटे कालीन को वहीं अपनी जगह पर छोड़ देता हूँ ताकि उसके  ऊपर से भी अच्छी तरह से सफाई हो जाये। 

जब यह काम कर लेता है तो वापस अपने बिस्तर की ओर लौट जाता है और अपने आप को रिचार्ज के लिए लगा लेता है। चूँकि हमारे पिछवाड़े में बारिश के समय पानी जमा हो जाता है, इसलिए हमने इनका बिस्तर ज़मीन से उठा कर चबूतरे पर बनाया है, तो जब रिचार्ज करना हो बेचारा चबूतरे के पास जा कर थोड़ी देर तक तड़पता है, फ़िर वहीं बत्ती बुझा कर बैठा रहता है कि हम इसे उठा कर इसके रिचार्ज-पोर्ट पर रखें।

सफाई वाले रोबोट का रिचार्ज

हमारे मॉडल में केवल वैक्यूम से कूड़ा खींचने वाला झाड़ू है, लेकिन बाज़ार में दूसरे मॉडल मिलते हैं जिनमें पौंछा लगाने की सुविधा भी है। हमने अपना सस्ता सफाई का रोबोट मॉडल, दो-तीन साल पहले, करीब दो सौ यूरो (पंद्रह-सोलह हज़ार रुपये) का खरीदा था। आजकल यहाँ इटली में घर में सफाई का काम करने वाले लोग एक घंटे का करीब दस यूरो (आठ-नौ सौ रुपये) लेते हैं, उस हिसाब इन्हें खरीदना कम खर्चीला है। इसका बटन है, जिसे दबाओ तो कूड़े वाला हिस्सा बाहर निकल आता है और उसे साफ करना आसान है। 

बटन दबा कर रोबोट से कूड़ा बाहर निकालना

 जब यह रोबोट जी मेरे आस-पास घुर-घुर करके घूम रहे होते हैं, तो मैं कभी-कभी इनसे बातें भी करता हूँ। कल जब मानव-शरीर जैसे रोबोट बनेंगे तो शायद उनसे पूछूँगा, "भाई साहब, आप चाय पीयेंगे?"

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मंगलवार, मई 21, 2024

किताब, चाय और यादें

हमारे घर में एक छोटा सा बाग है, मैं उसे रुमाली बाग कहता हूँ, क्योंकि वो छोटे से रुमाल जैसा है। उसमें एक झूला है, बाहर की सड़क की ओर पीठ किये, पौधों की क्यारी से लगा हुआ,  जिस पर हरी और सफेद धारियों वाले कुशन हैं, और सामने एक गोल मेज़ और दो कुर्सियाँ हैं, और तीन ओर पौधे लगे हैं। वहीं, एक कुर्सी को करीब खींच कर, उस पर चाय का प्याला रख कर, आज सुबह मैं झूले पर बैठा अपनी किताब पढ़ रहा था।

उपन्यास पढ़ने के लिए यह झूला मेरी सबसे प्रिय जगह है, लेकिन जब नॉन-फिक्शन पढ़ता हूँ तो यहाँ नहीं बैठता। वैसे यहाँ बैठने का मौका कम ही मिलता है, क्योंकि हमारे यहाँ आधा साल सर्दी चलती है, और जब सर्दी नहीं होती तो शायद पहाड़ों की वजह से बारिश बहुत होती है।

जब गर्मी आती है तो बाग में फ़ूल खिल जाते हैं, आसपास के पेड़ों में पक्षी घोंसले बनाते हैं और सुबह से चहचहाने लगते हैं। हमारे सामने वालों के यहाँ चीड़ के दो ऊँचे पेड़ हैं, मुझे उनसे ज़रा सी खुन्दक है क्योंकि उनकी वजह से, मुझे उनके पीछे वाला पहाड़ नहीं दिखता, लेकिन उनमें पक्षियों की पूरी कोलोनी बसती है, जिनके गीत गर्मियों के दिनों का पार्श्वसंगीत बन जाते हैं।

जब गर्मी आती है तो मच्छर भी आ जाते हैं, लेकिन अभी तक सुबह-शाम का तापमान दस-बारह डिग्री के आसपास घूम रहा है इसलिए इस वर्ष अभी तक मच्छर नहीं आये।

खैर, बात बाहर बैठ कर किताब पढ़ते हुए चाय पीने की शुरु थी। पढ़ते-पढ़ते, अपनी किताब को नीचे रख कर मैं सोचने लगा कि अगर कुछ दिन इस तरह से धूप निकलती रहे तो मैं वेनिस में कला-बिएन्नाले प्रदर्शनी को देखने जा सकता हूँ।  

यहीं से शुरु हुई मेरी सोयीं यादों के जगने की शुरुआत, जो कब, कहाँ, और किस बात से जाग जाती हैं, यह कहना कठिन होता है। आज उन यादों को जगाया हुसैन साहब की कला प्रदर्शनी के विचार ने। वेनिस बिएन्नाले की प्रदर्शनियों में इस बार दिल्ली के केएनएम संग्रहालय वालों की मकबूल फिदा हुसैन साहब के चित्रों की प्रदर्शनी भी है, जिसे देखना चाहता हूँ। यही सोचते हुए बचपन की एक बात याद आ आई।

क्नॉट प्लेस का पुराना कॉफी हाऊज़ ...

मेरा ख्याल है कि यह बात १९६३ या ६४ की है। उस समय दिल्ली में क्नॉट प्लेस में, जहाँ आज पालिका बाज़ार है, वहाँ पर प्रसिद्ध कॉफी हाऊज़ होता था, जिसके आसपास अर्ध-चक्र में लकड़ी के खोखे बने थे जिनमें विभिन्न राज्यों के एम्पोरियम थे। मेरे ख्याल में उस समय बाबा खड़गसिंह मार्ग पर नये भवनों के निर्माण का काम चल रहा था। तब मैं नौ-दस साल का था। खैर, जिस शाम की मैं बात कर रहा हूँ, उस शाम मेरे मम्मी-पापा के साथ पिता के कुछ पत्रकार-लेखक मित्र थे और हुसैन साहब भी बैठे थे।

फ़िर सब लोग उठे कि चलो त्रिवेणी कला संगम चलो, वहाँ पर हुसैन साहब की कोई प्रदर्शनी लगी थी जिसका उद्घाटन होना था। हम साथ चल रहे थे तो मुझे हुसैन साहब का नंगे पाँव चलना बहुत अजीब लगा था। हम सब लोग बारहखम्बा रोड से होते हुए पैदल ही त्रिवेणी कला संगम आये। प्रदर्शनी के उद्घाटन के लिए वहाँ पर भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन आये थे। तब सिक्योरिटी की चिंता नहीं होती थी। मैं भी हुसैन साहब के चित्रों को देख रहा था जब डॉ. ज़ाकिर हुसैन जी ने मुझे रोका, मुझसे पूछा कि मुझे वह चित्र कैसे लग रहे थे? मैं झूठ नहीं बोल पाया, बोला कि पता नहीं यह क्या बनाया है, शायद कोई जेल बनायी है जिसके आसपास यह नुकीले काँटों वाली तारे लगी हैं। हुसैन साहब ने मेरी आलोचना सुनी तो मुस्कराये, डॉ. ज़ाकिर हुसैन साहब भी हँसे।

हालाँकि मुझे हुसैन साहब की उस प्रदर्शनी के चित्र अच्छे नहीं लगे थे लेकिन मैंने उनके कुछ अन्य चित्र देखे थे, जैसे कि हैदराबाद में बदरीविशाल पित्ती जी के घर में, जो मुझे अच्छे लगते थे। रामायण पर बनी उनकी चित्र-श्रिंखला मुझे बहुत अच्छी लगी थी।

रघुवीर जी, अशोक जी, जुगनू जी ...

हुसैन जी की चित्र-प्रदर्शनी से शुरु हुई यादें वहाँ से पापा के मित्रों तक पहुँच गयीं। मुझे पापा के साथ क्नॉट प्लेस के कॉफी हाउज़ जाने का मौका शायद दो-तीन बार ही मिला था, वे मित्र-बैठकें बच्चों के लिए नहीं होती थीं।  पापा के कुछ मित्र लेखकों से मुलाकात ७ रकाबगंज रोड पर हुई थी, जहाँ डॉ. राम मनोहर लोहिया का घर था और शायद उनके सर्वैंट क्वाटर में समाजवादी पार्टी की पत्रिका "जन" का दफ्तर था जिसमें पापा काम करते थे। उस घर में एक बार जब खान अब्दुल गफ्फार साहब आये थे तो उन्हें देखा था। 

अधिकतर लोगों से मुलाकात घर पर होती थी, जब वह पापा से मिलने आते थे। राजेन्द्र नगर में सरवेश्वर दयाल सक्सेना जी हमारे घर के पास रहते थे। कभी-कभी घर आते, एक-दो बार राशन की दुकान पर भी मिले। एक सुबह मुझे उनका मफलर लपेटे, मुख पर बंदर टोपी, सलेटी स्वैटर और धारीवाला पजामे में घर आना याद है। तब मैं उनकी ओर ध्यान नहीं देता था, अब जब उनकी कविताएँ पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ कि वह मिलें तो उनसे कितनी बातें करना चाहूँगा।

ऐसी ही बात कुछ रघुवीर सहाय के साथ भी थी, वह भी अक्सर घर आते थे। तब मुझे कुछ नहीं मालूम था कि सर्वेश्वर जी या रघुवीर जी, क्या लिखते थे।

केवल मोहन राकेश जी, जो साठ के दशक में राजेन्द्र नगर में आर-ब्लॉक में रहते थे, केवल उनके लेखन से मेरा कुछ परिचय था, उनके घर जा कर लगता था कि हाँ यह प्रसिद्ध लेखक हैं। उन दिनों में उनकी बेटी पूर्वा का मुडंन हुआ था। जब उनकी अचानक मृत्यु हुई थी तो बहुत धक्का लगा था।

बंगला देश युद्ध के दौरान पापा "दिनमान" के लिए कई बार बंगलादेश गये थे। फ़िर बिहार छात्र आंदोलन के समय वह जेपी के साथ थे। इस वजह से छात्र आंदोलन से जुड़े बिहार के लोग घर आने लगे थे। उनमें से अधिकांश नाम भूल गया हूँ, केवल जुगनू शारदेय और अख्तर भाई के नाम याद हैं। फ़िर १९७५ में अचानक पापा भी चले गये तो बहुत से रिश्ते टूट गये। पहले वाले लोगों में से केवल अशोक सेकसरिया और जुगनू जी से कुछ सम्बंध बने रहे। एक बार मैं कलकत्ता में अशोक जी के १६ लार्ड सिन्हा वाले घर में कुछ दिन तक ठहरा था।

लेकिन वे सब भी क्या लिखते थे, क्या सोचते थे, उस समय मुझे कुछ मालूम नहीं था। उन दिनों में मैं मेडिकल कॉलेज में था, लेखन, साहित्य और राजनीति आदि के बारे में सोचने का शायद समय ही नहीं था?

गौहाटी में ...

जुगनू जी की बात से मुझे मेरा गौहाटी वाला घर याद आ गया। २०१५ में जब मैं गौहाटी में रहता था तो जुगनू जी मेरे पास रहने आये थे। उन दिनों में मैंने निर्णय किया था कि अपने घर के सब काम मैं खुद करूँगा। तीन कमरों का घर था। खाना बनाने के साथ, मैं खुद ही घर के सब काम जैसे कपड़े धोना, सफाई-झाड़ू-पौंछा, आदि भी करता था। सुबह सब काम करके संस्था के दफ्तर गया। शाम को घर लौटा तो सारे घर में सिगरेट की राख और टुकड़े बिखरे थे। मैंने जुगनू जी से कहा, कि सुबह मैंने इतनी मेहनत से झाड़ू लगाया, पौंछा लगाया, और आप से हाथ में अपनी एशट्रे भी नहीं ली जाती कि अपनी सिगरेट की राख को उसमें झाड़ें? बाद में मुझे शर्म भी आयी कि मुझे उनसे इस तरह से नहीं बोलना चाहिये था, तो उनसे क्षमा मांगी। खैर दो दिन के बाद वह किसी अन्य व्यक्ति के पास ठहरने चले गये।
 
जुगनू जी वह मेरी आखिरी मुलाकात थी। कुछ साल पहले फेसबुक से पता चला कि वह नहीं रहे।

लौट कर बुद्धू ...

कहाँ से शुरु हुई मेरी यादों की लड़ी, कहाँ पहुँच गयी। खैर, यादों का एक सुख है, कितनी भी दूर ले जायें, वहाँ से लौटने में समय नहीं लगता और मैं लौट कर वापस अपने रुमाली बाग में अपने उपन्यास पर आ गया।
 
असली बात तो वेनिस में हुसैन जी के चित्रों की प्रदर्शनी है, यह कमब्खत बारिश रुके तो वहाँ जाने का कार्यक्रम बनाना है। 

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मंगलवार, मार्च 26, 2024

एक बार फ़िर २५ मार्च की होली

२५ मार्च १९७५ को भी होली का दिन था। उस दिन सुबह पापा (ओमप्रकाश दीपक) को ढाका जाना था, लेकिन रात में उन्हें हार्ट अटैक हुआ था।

उन दिनों वह एंडियन एक्सप्रेस की अंग्रेज़ी की साप्ताहिक पत्रिका एवरीमैन के लिए काम कर रहे थे, और सुबह जब ड्राईवर उन्हें हवाई अड्डे ले जाने आया था तब तक वह अपनी लम्बी अंतिम यात्रा के लिए निकल चुके थे। उस समय वह ४७ साल के थे।

कल, एक बार फ़िर, २५ मार्च की होली थी। कल जब होली की बात हो रही थी तब मुझे वह रात याद आई थी, उनकी उखड़ती हुई साँस की आवाज़ और साथ में बैठी माँ, उन्हें पुकारती हुईं, उनकी छाती को मलती हुई।

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परिवार की तस्वीर - यह एक तस्वीर है जिसमें हम सब लोग हैं, दादी, पापा, मम्मी और हम तीनों। कुछ माह पहले मेरे बेटे ने किसी सोफ्टवैर से इसमें रंग भर दिये थे। यह उस साल की है जब नेहरू जी की मृत्यु हुई थी, और इसे मेरठ में छिपीटैंक के एक स्टूडियो में खींचा गया था।

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पापा अगर अब होते तो ९७ साल के होते। मन ही मन में उनसे मेरी बातचीत चलती रहती है। बहुत दुनिया घूमी और भिन्न विचारधाराएँ देशों को कहाँ ले जाती है, करीब से देखने का मौका मिला। जीवन में अलग-अलग सोच वाले लोगों के साथ काम करने का मौका भी मिला, उनके आदर्शों और सोच के बारे में मेरी अपनी व्यक्तिगत सोच भी बनी।

जब इसके बारे में सोचता हूँ तो उनकी कमी महसूस होती है - मैं मन में उनसे अपनी सोच की बात कहता हूँ लेकिन उनका उत्तर नहीं मिलता। मैं सत्तर साल का हो रहा हूँ लेकिन स्मृतियों वाले पापा अभी भी ४७ साल पर ही रुके हैं, तो मैं उन्हें कहता हूँ कि पापा मेरे जीवन का अनुभव आप से अधिक हो गया। 

अक्सर जब कोई अच्छी किताब पढ़ता हूँ तब भी मन में उनसे बात होती है, सोचता हूँ कि उन्हें वह किताब अच्छी लगती या नहीं? शायद सभी बच्चे ऐसा ही करते हैं, हमारी उम्र चाहे कितनी भी हो जाये, मन ही मन अपने माता-पिता से बातें करना जीवन भर चलता रहता है?

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पापा की २३वीं बरसी पर, १९९८ में माँ ने अपनी डायरी में लिखा था -

आज सचमुच जीवन का सफ़र जहाँ से शुरु किया था उसकी बहुत याद आ रही है। कश्यप भार्गव तुम्हारा प्रिय मित्र। हमारी शादी में उसकी माँ और बहने दोनो थीं। एक बार जानकीदेवी कॉलेज से निकल रही थी तो सविता मिली थी। तुम्हारे जाने के साल भर बाद ही, उसी तिथि और उसी समय में ही, कश्यप भी नहीं रहा था। वैसे ही दिल के दौरे में वही 25 मार्च को, वह भी नहीं रहा। क्या कहती उससे। अकेले ही बच्चों का पालन पोषण किया होगा उसने। कई बार मन में आया कि उसके स्कूल, बाल भारती में , जा कर पता लगाऊँ, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी उससे मिलने की।

ज़िन्दगी में दूसरे लोग ही नहीं खुद अपनी नज़रें, अपना दिल और अपने अहसास भी धोखा दे जाते हैं तो इसका कुछ हो भी तो नहीं सकता। ज़िन्दगी को बेहद गम्भीरता से लेने वाले और उस पर लम्बी बहसें करने वाला कश्पी जो मुझे लखनऊ छोड़ने गया था और लखनऊ में साथ भी रहा था। फ़ैज़ाबाद में भी हमारी शादी में भी उसने मेरे भाई की भूमिका निभाई थी। मुझे ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद दिया था उसने। जीवन के कुछ महत्वपूर्ण निर्णय तुमने और कश्यपी ने कैसे लिये थे? आज भी मुझे इस पर हैरानी होती है।

तुम्हारी मृत्यु के बाद सविता को ले कर आया था और जाते हुए कहने लगा कि अब मेरी ही बारी है, सूरजप्रकाश और दीपक तो नहीं रहे, मैं अकेला क्या करूँगा। और ठीक एक वर्ष बाद तुम्हारे जैसा वही समय, वही दिन, वह भी चला गया। सचमुच उसकी बारी आ गयी थी. इस पर हैरान हूँ।

पापा के उस मित्र कश्पी (कश्यप भार्गव) और दिल्ली के बालभारती स्कूल में पढ़ाने वाली उनकी पत्नी सविता भार्गव से कभी कहीं मिलने की मुझे कोई याद नहीं, न ही कभी उनके बच्चों से कभी कोई परिचय हुआ। जब भी माँ कश्पी की बात करती थी तो मन में यही प्रश्न उठता था कि वह पापा के इतने अच्छे दोस्त थे तो हमारी कभी उनसे मुलाकात या जान पहचान कैसे नहीं हुई?

उनके बच्चे कहाँ होंगे? मन में आता है कि उनसे मिलना अच्छा लगेगा।

***

जब पापा गुज़रे थे तब मैं मेडिकल कॉलेज के तीसरे वर्ष में पढ़ रहा था। उन दिनों में पापा जयप्रकाश नारायण जी के साथ बिहार में बहुत समय बिता रहे थे, वे बिहार छात्र आन्दोलन और सम्पूर्ण क्रांति वाले दिन थे। जे.पी. के कहने से ही इंडियन एक्सप्रेस के गुएनका जी ने मेरी मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई के लिए छात्रवृति स्वीकार कर ली थी, वरना शायद डॉक्टर बनने का सपना कठिनाई से पूरा होता।

शायद इसीलिए सारा जीवन मन में लगता रहा है कि इंडियन एक्सप्रेस "हमारा अपना" अखबार है। यादें कहाँ से शुरु होती हैं और कहाँ चली जाती हैं!


मंगलवार, फ़रवरी 20, 2024

पति, पत्नी और वह

पत्नी कल कुछ दिनों के लिए बेटे के पास गई थी और मैं घर पर अकेला था, तभी इस लघु-कथा का प्लॉट दिमाग में आया।

*****

सुबह नींद खुली तो बाहर अभी भी अंधेरा था। कुछ देर तक फोन पर इमेल, फेसबुक, आदि चैक किये, फ़िर सोचा कि उठ कर कॉफी बना लूँ। नीचे आ रहा था कि सीढ़ी पर पाँव ठीक से नहीं रखा, गिर ही जाता पर समय पर हाथ बढ़ा कर दीवार से सहारा ले लिया, इसलिए गिरा नहीं केवल पैर थोड़ा सा मुड़ गया।

मेरे मुँह से "हाय राम" निकला तो वह बोली, “देख कर चलो, ध्यान दिया करो।"

“ठीक है, सुबह-सुबह उपदेश मत दो", मैंने उत्तर दिया।

“एक दिन ऐसे ही हड्डी टूट जायेगी, फ़िर मेरे उपदेशों को याद करना", उसने चिढ़ कर कहा।

कॉफी पी कर कमप्यूटर पर बैठा तो समय का पता ही नहीं चला। साढ़े आठ बज रहे थे, उसने कहा, “आज सारा दिन यहीं बैठे रहोगे क्या? नहाना-धोना नहीं है?”

“उठता हूँ, बस यह वीडियो पूरा देख लूँ।"

“यह वीडियो कहीं जा रहा है? इसे पॉज़ कर दो, पहले नहा लो, फ़िर बाकी का देख लेना।"

“अच्छा, अच्छा, अभी थोड़ी देर में जाता हूँ, तुम जिस बात के पीछे पड़ जाती हो तो उसे छोड़ती नहीं", मुझे भी गुस्सा आ गया।

“नहाने के बाद तुम्हें दूध और सब्ज़ी लेने भी जाना है", वह मुस्करा कर बोली।

वह बहुत ज़िद्दी है, जब तक अपनी बात नहीं मनवा लेती, चुप नहीं होती, इसलिए अंत में मुझे उठना ही पड़ा। नहा कर निकला ही था कि बन्नू का फोन आ गया।

बोला, “दोपहर को मिल सकता है? गर्मी बहुत हो रही है, कहीं बियर पीने चलते हैं, फ़िर बाहर खाना खा लेंगे।"

मैंने कहा, “नहीं यार, सच में गर्मी बहुत है, दोपहर को बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा। शाम को मिलते हैं।"

उसने कहा, “सारा दिन घर पर अकेले बोर हो रहा हूँ, चल न, कहीं गपशप मारेंगे।"

मैं हँसा, बोला, “एक नयी एप्प आई है, जीवनसाथी एप्प, अपने फोन पर डाऊनलोड कर ले, सारा अकेलापन दूर हो जायेगा।"

फोन रखा तो वह बोली, “अपने दोस्त से मेरी इतनी तारीफें कर रहे थे, अब एप्प रिवयू में मुझे पाँच स्टार देना, समझे?”

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शनिवार, अगस्त 13, 2022

यादों की संध्या

संध्या की सैर को मैं यादों का समय कहता हूँ। सारा दिन कुछ न कुछ व्यस्तता चलती रहती है, अन्य कुछ काम नहीं हो तो लिखने-पढ़ने की व्यस्तता। सैर का समय अकेले रहने और सोचने का समय बन जाता है। शायद उम्र का असर है कि जिन बातों और लोगों के बारे में ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में दशकों से नहीं सोचा था, अब बुढ़ापे में वह सब यादें अचानक ही उभर आती हैं।

यादों को जगाने के लिए "क्यू" यानि संकेत की आवश्यकता होती है, वह क्यू कोई गंध, खाना, दृश्य, कुछ भी हो सकता है, लेकिन मेरे लिए अक्सर वह क्यू कोई पुराना हिंदी फ़िल्म का गीत होता है। बचपन के खेल, स्कूल और कॉलेज के दिन, दोस्तों के साथ मस्ती, पारिवारिक घटनाएँ, जीवन के हर महत्वपूर्ण समय की यादों के साथ उस समय की फ़िल्मों के गाने भी दिमाग के बक्से में बंद हो जाते हैं। इस आलेख में एक शाम की सैर और कुछ छोटी-बड़ी यादों की बातें हैं।


आज सुबह से आसमान बादलों से ढका था, सुहावना मौसम हो रहा था, हवा में हल्की ठँडक थी। सारा दिन बादल रहे लेकिन जल की एक बूँद भी नहीं गिरी। शाम को जब मेरा सैर का समय आया तो हल्की बूँदाबाँदी शुरु हुई। पत्नी ने कहा कि जाना है तो छतरी ले कर जाओ, लेकिन मैंने सोचा कि थोड़ी देर प्रतीक्षा करके देखते हैं, अगर यह बूँदाबाँदी नहीं रुकेगी तो छतरी ले कर ही जाऊँगा। पंद्रह मिनट प्रतीक्षा के बाद बाहर झाँका तो बादलों के बीच में से नीला आसमान झाँकने लगा था। इस वर्ष अक्सर यही हो रहा है कि बादल कम आते हैं और अक्सर बिना बरसे ही लौट जाते हैं। हमारे शहर का इतिहास जानने वाले लोग कहते हैं कि ऐसा पहली बार हुआ कि हमारे घर के पीछे बहने वाली नदी में करीब आठ महीनों से पानी नहीं है। पूरे पश्चिमी यूरोप में यही हाल है।

खैर मैंने देखा कि बारिश नहीं हो रही तो तुरंत जूते पहने और हेडफ़ोन लगा लिया। शाम की सैर का समय कुछ न कुछ सुनने का समय है। कभी डाऊनलोड किये हुए हिंदी, अंग्रेज़ी या इतालवी गाने सुनता हूँ, कभी हिंदी के रेडियो स्टेशन तो कभी क्लब हाऊस पर कोई बातचीत या गाने के कार्यक्रम। आज मन किया विविध भारती सुनने का। यहाँ शाम के साढ़े सात बजे थे, तो मुम्बई से प्रसारित होने वाले विविध भारती के लिए रात के ग्यारह बजे थे और चूँकि आज गुरुवार है, मुझे मालूम था कि इस समय सप्ताहिक "विविधा" कार्यक्रम आ रहा होगा, जिसमें अक्सर हिंदी फ़िल्मों से जुड़ी हस्तियों के साक्षात्कारों की पुरानी रिकोर्डिंग सुनायी जाती हैं।

मोबाईल पर विविध भारती का एप्प खोला तो कार्यक्रम शुरु हो चुका हो चुका था और पुराने फ़िल्म निर्देशक, लेखक तथा अभिनेता किशोर साहू की बात हो रही थी। उनका नाम सुनते ही मन में "गाईड" फ़िल्म की बचपन एक याद उभर आयी। तब हम लोग पुरानी दिल्ली में फ़िल्मिस्तान सिनेमा के पास रहते थे। वह घर हमने १९६६ में छोड़ा था, इसका मतलब है कि वह याद इससे पहले की थी। मन में उभरी तस्वीर में एक दोपहर थी, नानी चारपाई पर चद्दर बिछा कर, उस पर दाल की वणियाँ बना कर सुखाने के लिए रख रही थी। बारामदे के पीछे खिड़की पर ट्राँज़िस्टर बज रहा था जिस पर उस दिन पहली बार किशोर कुमार और लता मँगेशकर का गाया गीत, "काँटों से खींच के यह आँचल, तोड़ के बँधन बाँधी पायल" सुना था। एक पल के लिए मैं उस आंगन में नानी को देखता हुआ सात-आठ साल का बच्चा बन गया था, यह याद इतनी जीवंत थी।

बचपन में पापा हैदराबाद में थे और माँ अध्यापिका-प्रशिक्षण का कोर्स कर रही थी और उसके बाद उन्हें नवादा गाँव के नगरपालिका के प्राथमिक स्कूल में नौकरी मिली थी, तो मैं और मेरी बहन, हम दोनों नानी के पास ही रहते थे। नानी और माँ में केवल अठारह या उन्निस साल का अंतर था, इसलिए मेरी सबसे छोटी मौसी उम्र में मेरी बड़ी बहन से छोटी थी।

नानी जब पैदा हुई थी तो उनकी माँ चल बसी थीं, इसलिए नानी अपनी मौसी के पास बड़ी हुईं थीं और उनके मौसेरे भाई, इन्द्रसेन जौहर, अपने समय के प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता और निर्देशक बने थे। नानी की शादी करवाने के बाद उनके विधुर पिता ने नानी की उम्र की लड़की से शादी की थी, इस तरह से नानी की पहली संतानें भी उनके पिता की अन्य संतानों से उम्र में बड़ी थीं, और नानी के सबसे छोटे भाई मेरे हमउम्र थे।

नानी सुबह उठ कर अंगीठी जलाती थी। घर में एक कोठरी थी, जिसमें कच्चा और पक्का कोयला रखा होता था। अंगीठी की जाली पर नानी पहले थोड़ा सा कच्चा कोयला रखती, और उसके ऊपर पक्का कोयला। फ़िर नीचे राख वाली जगह पर कागज़ जलाती जिससे कच्चे कोयले आग पकड़ लेते। वह राख भी जमा की जाती थी, उससे बर्तन धोये जाते थे और उसे गाय या भैंस के गोबर में मिला कर उपले बनाये जाते थे।

उपलों को नानी अपनी पश्चिमी पंजाब के झेलम जिले की भाषा में "गोया" कहती थी। लेकिन उस घर में उपले कम ही बनते थे शायद क्योंकि शहर में गोबर आसानी से नहीं मिलता था। नानी का गाँव वाला घर जिस पर नाना ने "दीवान फार्म" का बोर्ड लगा रखा था, नवादा और नजफ़ गढ़ के बीच में ककरौला मोड़ नाम की जगह से थोड़ा पहले था। जहाँ नानी की रसोई थी, वहाँ अब "द्वारका मोड़" नाम के दिल्ली मेट्रो स्टेशन की दायीं सीढ़ियाँ हैं और जहाँ उनका बड़ा वाला कूँआ था वहाँ अब मेरे मामा के बनाया एक स्कूल चलता है। बचपन में वहाँ मैं अपनी छोटी मौसियों के साथ तसला ले कर गोबर उठाने जाता था। अगर आप ने कभी गोबर नहीं उठाया तो शायद आप को उसे हाथ से छूने या उठाने का सोच कर अज़ीब लगे, लेकिन बचपन में मुझे ताज़े गोबर की गर्मी को हाथ से छूना बहुत अच्छा लगता था। गाँव वाले उस घर में, दूध, दाल, सब्जी, हर चीज़ में उपलों की गंध आती थी।

आज उत्तरपूर्वी इटली में, दिल्ली से हज़ारों मील दूर, किशोर साहू के नाम और उनकी बातों से, साठ वर्ष पहले की यह सब यादें एक पल के लिए मन में कौंध गयीं, एक क्षण के लिए उपलों की गंध वाले उस खाने की वह सुगंध भी जीवित हो उठी।

किशोर साहू के बाद बात हुई पुरानी फ़िल्म अभिनेत्री मनोरमा की। उनका मुँह बना कर और आँखें मटका कर अभिनय करना मुझे अच्छा नहीं लगता था। उनकी बातें सुन रहा था तो मन में हमारे करोल बाग वाले घर की यादें उभर आयीं। तब दिल्ली में नियमित दूरदर्शन के कार्यक्रम आते थे, जिनमें मेरे सबसे प्रिय कार्यक्रम थे चित्रहार और फ़िल्में। छयासठ से अड़सठ तक हम उस घर में तीन साल रहे और उन तीन सालों में दूरदर्शन पर बहुत फ़िल्में देखीं। तब रंगीन टीवी नहीं होता था और टीवी कम ही घरों में थे। बिना जान पहचान के हम बच्चे मोहल्ले के आसपास के किसी भी टीवी वाले घर में घुस जाते थे, कभी किसी ने मना नहीं किया। हम लोग टीवी के सामने ज़मीन पर पालथी मार कर बैठ जाते।

तब रामजस रोड पर एक स्कूल में भी शाम को फ़िल्म आती तो वहाँ की एक अध्यापिका आ कर टीवी वाला कमरा खोल देती थीं, वहाँ खूब भीड़ जमती। उन सालों की दूरदर्शन पर देखी मेरी प्रिय फ़िल्मों में से वैजयंतीमाला की "मधुमति", मधुबाला की "महल", नूतन की "सीमा" और राजकपूर की "जागते रहो" थीं।

उन फ़िल्मों के बारे में सोचते हुए, उस समय सैर करते करते मैं हमारी सूखी हुई नदी के पुल पर पहुँच गया। वहाँ खड़े हो कर पहाड़ों के पीछे डूबते सूरज को देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि उस जगह पर पहाड़ों से घाटी में नीचे आती हुई बढ़िया हवा आती है। इस साल पानी न होने से पहले तो नदी के पत्थरों के बीच में लम्बी घास उग आयी थी, शायद उसे नदी के तल के नीचे की धरती में छुपी उमस मिल गयी थी। फ़िर भी जब पानी नहीं बरसा तो वह घास बहुत सी जगह पर सूख कर पीली सी हो गयी है, इस तरह से पुल से देखो तो संध्या के डूबते सूरज की रोशनी में नदी के तल पर बिछी घास के हरे और पीले रंग बहुत सुंदर लगते हैं। नदी के किनारे लगे पेड़ों के पत्ते जब सर्दी शुरु होती है तो सितम्बर के अंत में पीले और लाल रंग के हो कर गिर जाते हैं, लेकिन इस साल सूखे की वजह से अभी अगस्त के महीने में ही वह पत्ते पीले पड़ रहे हैं। बादलों से ढके आकश में प्रकृति के यह सारे रंग बहुत मनोरम लगते हैं।



पुल पर ही खड़ा था, जब विविध भारती पर आ रहे कार्यक्रम में शम्मी कपूर की बात होने लगी। उनकी एक पुराने साक्षात्कार की रिकार्डिंग सुनवायी जा रही थी। थोड़ा सा आश्चर्य हुआ यह जान कर कि वह अच्छा गाते थे। उस साक्षात्कार में उन्होंने "तीसरी मंजिल", "एन ईवनिंग इन पैरिस" जैसी फ़िल्मों के कुछ गाने गा कर सुनाये।

शम्मी कपूर के नाम से उनकी फ़िल्म "कश्मीर की कली" और फ़िर नानी के घर की याद आ गयी। घर के पास, ईदगाह को जाने वाली सड़क के पार एक फायर ब्रिगेड का स्टेशन होता था, जिसके सामने मैं सुबह स्कूल की बस की प्रतीक्षा करता था। वहीं पर फायरब्रिगेड में काम करने वाले एक सरदार जी से जानपहचान हो गयी थी। उनके पास एक छोटा सा पॉकेट साईज़ का ट्राँज़िस्टर था जिसमें इयरफ़ोन लगा कर सुनते थे। उन्होंने एक दिन मुझे वह इयरफ़ोन लगा कर रेडियो सुनवाया तो उस समय उसमें "कश्मीर की कली" फ़िल्म का गीत आ रहा था, "यह चाँद सा रोशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा"। आज शम्मी कपूर जी की आवाज़ सुनी तो अचानक उस गीत को सुनने की वह याद आ गयी।

जब हम लोग करोल बाग में रहने आये, उन दिनों में मैं रेडियो पर नयी फ़िल्मों के गाने सुनने का दीवाना था, कोई भी गाना एक बार सुनता था तो उसकी धुन, शब्द, फ़िल्म का नाम, गाने वाले, लेखक, सब कुछ याद हो जाता था, इसलिए जब अंताक्षरी खेलते तो मैं उसमें चैम्पियन था। उन्हीं दिनों में दूरदर्शन पर पुरानी फ़िल्में देखने लगे थे तो सपने देखता कि जब बड़ा होऊँगा और पास में पैसा होगा तो सब फ़िल्मों को देखूँगा। आज तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली कि वह सारी फ़िल्में जो बचपन में देखना चाहता था और नहीं देख पाया था, अब जब चाहूँ तो यूट्यूब पर उनको देख सकता हूँ, तो क्यों नहीं देखता?

सैर से वापस घर लौटते समय सोच रहा था कि इन पचास-साठ सालों में दुनिया कितनी बदल गयी। बचपन का वह मैं, अगर उसे मालूम होता कि एक समय ऐसा भी आयेगा कि दुनिया में कहीं भी, किसी से बात करलो, जो मन आये वह संगीत सुन लो या फ़िल्म देख लो, तो उसे कितनी खुशी होती, और वह क्या क्या ख्याली पुलाव पकाता। 

अन्य दिनों में इस तरह की यादें, घर लौटने के दस मिनट में रात को देखे सपनों की तरह गुम हो जाती हैं, लेकिन आज सोचा है कि अपने ब्लाग के लिए इन्हें शब्दों में बाँध लूँगा।

बुधवार, मई 25, 2022

अरे ओ साम्बा, कित्ती छोरियाँ थीं?

भारत में कितनी औरतें हैं यह प्रश्न गब्बर सिंह ने नहीं पूछा था, लेकिन यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।

कुछ माह पहले भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने 2019 से 2021 के बीच में किये गये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजों की रिपोर्ट निकाली थी। इस रिपोर्ट के अनुसार आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार देश में लड़कियों तथा औरतों की कुल जनसंख्या लड़कों तथा पुरुषों की कुल जनसंख्या से अधिक हुई है। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है जिससे देश की सामाजिक, आर्थिक व स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है। यह भारत के लिए गर्व की बात है। अपने इस आलेख में मैंने इस बदलाव की राष्ट्रीय तथा राज्यीय स्तर पर कुछ विषलेशण करने की कोशिश की है।



नारी और पुरुष जनसंख्या के अनुपात

कुल जनसंख्या में लड़कियों तथा औरतों की संख्या लड़कों तथा पुरुषों की संख्या से अधिक होनी चाहिए। अगर गर्भ में भ्रूण के बनते समय उसका नर या मादा होने के मौके एक बराबर ही होते हैं, तो समाज में नर और नारियों की संख्या भी एक बराबर होनी चाहिये। तो पुरुषों की संख्या औरतों से कम क्यों होती है? इसके कई कारण होते हैं। सबसे पहले हम नर तथा नारी जनसंख्या पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों को देख सकते हैं। 

नर भ्रूणों को स्वभाविक गर्भपात का खतरा अधिक होता है, इस लिए पैदा होने वाले बच्चों में लड़कियाँ अधिक होती हैं। 

पैदा होने के बाद भी लड़के कई बीमारियों का सामना करने में लड़कियों से कमजोर होते हैं। समूचे जीवन काल में, बचपन से ले कर बुढ़ापे तक, चाहे एक्सीडैंट हों या आत्महत्या, चाहे शराब अधिक पीना हो या नशे की वजह हो, चाहे लड़ाईयाँ हों या सामान्य हिँसा, लड़के व पुरुष ही अधिक मरते हैं। लड़कों व पुरुषों की हड्डियाँ व माँस पेशियाँ अधिक मजबूत होती हैं, वह अधिक ऊँचे और शक्तिशाली होते हैं, लेकिन वह मजबूत शरीर बीमारियों से लड़ने तथा मानसिक दृष्टि से कम शक्तिशाली होते हैं। 

जबकि औरतों के जीवन में सबसे बड़ा स्वास्थ्य से जुड़ा खतरा होता है उनका गर्भवति होना और बच्चे को जन्म देना। पिछड़े व गरीब समाजों में औरतों की उर्वरता दर अधिक होती है, यानि बच्चों की संख्या अधिक होती है। कृषि से जुड़े गरीब समाजों को बच्चों के बाहुबल की आवश्यकता होती है। गरीब देशों की स्वास्थ्य सेवाएँ भी निम्न स्तर की होती हैं, तो बच्चों को टीके नहीं लगाये जाते या बीमार होने पर उनका सही उपचार नहीं हो पाता। इन सब वजहों से गरीब समाजों में बच्चे अधिक होते हैं। इसलिए गर्भवति होने वाली उम्र में गरीब समाजों में नवयुतियों के मरने का खतरा अधिक होता है। जबकि विकसित समाजों में, विषेशकर अगर लड़कियाँ पढ़ी लिखी हों, तो उनके बच्चे देर से पैदा होते हैं और उनकी संख्या कम हो जाती है। 

नारी शरीर की दूसरी कमजोरी का कारण है मासिक माहवारी। अगर उन्हें सही खाना मिलता रहे तो सामान्य माहवारी का उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर नहीं पड़ता, वरना इससे उनके रक्त में लोहे की कमी से अनीमिया होने का खतरा रहता है। लेकिन अगर प्रसव तथा माहवारी से जुड़े खतरों को छोड़ दें तो नारी शरीर में बीमारियों से लड़ने की अधिक शक्ति होती है। नारी शरीर के हारमोन उनकी बहुत सारी बिमारियों से, जैसे कि बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर तथा हृद्यरोग आदि से जब तक माहवारी चलती है, तब तक उनकी रक्षा करते हैं, उन बीमारियों से पुरुष अधिक मरते हैं। बुढ़ापे में भी नारी हारमोन उनकी कुछ हद तक रक्षा करते हैं जिससे कि औरतों की औसत जीवन अपेक्षा पुरुषों से अधिक होती है। 

प्राकृतिक स्वास्थ्य संबंधी कारणों के अतिरिक्त नर-नारी जनसंख्या पर सामाजिक सोच का असर पड़ता है। बहुत से समाजों में लड़कियों को पैदा होने से पहले ही गर्भपात करवा कर मरवा देते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि लड़कों से परिवार और संस्कृतियाँ चलती हैं। पैदा होने के बाद बेटों के तुलना में उन्हें खाना कम दिया जाता है, खेलकूद और पढ़ायी के अवसर कम मिलते हैं। और जब वह बीमार होती हैं तो उनका इलाज देर से करवाया जाता है और कम करवाया जाता है।



देशों में कुल जनसंख्या में नर अधिक होंगे या नारियाँ, उस आकंणे पर ऊपर बताये गये सब भिन्न प्रभावों के नतीजों को जोड़ कर देखना पड़ेगा। विश्व स्तर पर उन आकंणों को देखें तो हम पाते हैं कि विकसित देशों में जनसंख्या में नारियाँ अधिक होती हैं, जबकि कम विकसित तथा गरीब देशों में पुरुषों की संख्या अधिक होती है। जैसे जैसे समाज विकसित होने लगते हैं, औरतें अधिक पढ़ती लिखती हैं, नौकरी करके स्वंतत्र रहने के काबिल बन जाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर माता पिता की देखभाल भी कर सकती हैं, तो जनसंख्या में उनका अनुपात बढ़ने लगता है। 

अन्य देशों से नर-नारी अनुपात के कुछ आकंणे

नये भारतीय सर्वेषण के नतीजों को देखने से पहले आईये पहले हम कुछ अन्य देशों में नर-नारी अनुपात की क्या स्थिति है उसको देखते हैं।

इस दृष्टि से पहले दुनिया के कुछ विकसित देशों की स्थिति कैसी है, पहले उसके आकणें देखते हैं। 1000 पुरुषों के अनुपात में देखें तो फ्राँस में 1054 औरतें हैं, जर्मनी में 1039, ईंग्लैंड और स्पेन में 1024, इटली में 1035, अमरीका में 1030, तथा जापान में 1057। यानि हर विकसित देश में लड़कियों व औरतों की संख्या लड़कों तथा पुरुषों की संख्या से अधिक है। 

आईये अब भारत के आसपास के देशों की स्थिति देखें। यहाँ पर 1000 पुरुषों के अनुपात में पाकिस्तान में 986 औरतें हैं, बँगलादेश में 976, नेपाल में 1016, और चीन में 953। यानि नेपाल में स्थिति बेहतर हैं जबकि चीन, पाकिस्तान व बँगलादेश में खराब है। हाँलाकि पिछले दो दशकों में चीन बहुत अधिक विकसित हुआ है लेकिन चीन में अभी कुछ समय पहले तक नियम था कि परिवार में एक से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिये, और वहाँ की सामाजिक सोच इस तरह की है जिसमें वह सोचते हैं कि लड़के ही पैदा होंने चाहिए, इसके दुष्प्रभाव पड़े हैं।

विभिन्न देशों के आंकणें देखते समय वहाँ की अन्य परिस्थितयों के असर के बारे में सोचना चाहिये। जहाँ युद्ध हो रहे हैं वहाँ पुरुषों की संख्या और भी कम हो सकती है। कुछ जगहों में पुरुषों को घर-गाँव छोड़ कर पैसा कमाने के लिए दूर कहीं जाना पड़ता है, तो वहाँ भी जनसंख्या में पुरुषों की संख्या कम हो जायेगी, जबकि जिन जगहों पर पुरुष प्रवासी काम खोजने आते हैं, वहाँ पर उनका अनुपात बढ़ जाता है। जब आंकणों में किसी जगह पर बहुत अधिक पुरुष या नारियाँ दिखें तो वहाँ की सामाजिक स्थिति के बारे में अन्य कारणों को समझना आवश्यक हो जाता है।

भारत के राष्ट्रीय स्तर के आंकणे

राष्ट्रीय स्तर पर यह आकंणे सन् 1901 के बाद से जमा किये जाते रहे हैं। चूँकि सौ वर्ष पहले के भारत में आज के पाकिस्तान, बँगलादेश तथा कुछ हद तक मयनमार भी शामिल थे तो उनके आंकणों की आधुनिक भारत के आंकणों से पूरी तरह तुलना नहीं की जा सकती लेकिन उनसे हमारी स्थिति के बारे में कुछ जानकारी तो मिलती है।

1901 में भारत में हर 1000 पुरुषों से सामने 972 औरतें थीं, जबकि 1970 में उनकी संख्या 930 रह गयी थी। 2005-06 में जब तृतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेषण में यह जानकारी जमा की गयी तो भी स्थिति में बदलाव नहीं आया था, 1000 पुरुषों के सामने 939 औरतें थीं। 2015-16 में जब चौथा सर्वेषण किया गया तो पहली बार महत्वपूर्ण बदलाव दिखा जब औरतों की संख्या बढ़ कर 991 हो गयी थी। इस वर्ष आये परिणामों में स्थिति और मजबूत हुई है, इस बार 1000 पुरुषों के मुकाबले में 1020 औरतें हैं।

इन आकंणो से हम क्या निष्कर्श निकाल सकते हैं? मेरे विचार में सौ साल पहले औरतों की संख्या कम होने का कारण था उन्हें खाना अच्छा न मिलना, बच्चे अधिक होना, और प्रसव के समय स्वास्थ्य सेवाओं की कमी। यह सभी बातें 1970 के सर्वेषण तक अधिक नहीं बदली थीं। 1990 के दशक में भारत में विकास बढ़ा, साथ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहतर हुई लेकिन साथ ही गर्भवति औरतों के लिए अल्ट्रासाँऊड टेस्ट कराने की सुविधाएँ भी तेजी सी बढ़ी जिनसे परिवारों के लिए होने वाले बच्चे का लिंग जानना बहुत आसान हो गया, जिससे बच्चियों की भ्रूण बहुत अधिक संख्या में गिरवाये जाने लगे। इसका असर 2005-06 के सर्वेषण पर पड़ा और बच्चे कम होने, भोजन बेहतर होने व स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर होने के बावजूद औरतों की संख्या कम ही रही।

भारत में बच्चियों का गर्भपात

हालाँकि भारत सरकार ने गर्भवति औरतों में अल्ट्रासाऊँड टेस्ट से लिंग ज्ञात करने की रोकथाम के लिए 1994 से कानून बनाया था, इसे 2005-06 के सर्वेषण के बाद सही तरह से लागू किया गया जब डाक्टरों पर सजा को बढ़ाया गया। लेकिन सामाजिक स्तर पर भारत में बेटियों की स्थिति अधिक नहीं बदली, इस कानून का भी कुछ विषेश असर नहीं पड़ा है।

भारत में बच्ची होने पर गर्भपात कराने की परम्परा अभी महत्वपूर्ण तरीके से नहीं बदली, यह हम एक अन्य आंकणे से समझ सकते हैं - छः वर्ष से छोटे बच्चों में लड़कों और लड़कियों के अनुपात को देखा जाये। 2001 में छः वर्ष से छोटे बच्चों की जनसंख्या में हर 1000 लड़कों के सामने 927 लड़कियाँ थीं। 2005-06 में यह संख्या घट कर 918 हो गयी। 2015-16 में यह संख्या बदली नहीं थी, 919 थी। और, 2019-21 के नये सर्वेषण में भी यह अधिक नहीं बदली, 924 है।

इसका अर्थ है कि औरतों की संख्या में बढ़ोतरी का बदलाव जो 2019-21 के सर्वेषण में दिखता है वह अन्य वजहों से हुआ है जैसे कि उन्हें पोषण बेहतर मिलना, छोटी उम्र में विवाह कम होना, विवाह के बाद बच्चे कम होना और प्रसव के समय बेहतर स्वास्थ्य सेवा मिलना।

ग्रामीण तथा शहरी क्षत्रों में अंतर

राष्ट्रीय स्तर पर और बहुत से प्रदेशों में ग्रामीण क्षेत्रों में औरतों की स्थिति शहरों से बेहतर है। राष्ट्रीय स्तर पर 1998-99 में 1000 पुरुषों के अनुपात में शहरी क्षेत्रों में 928 औरतें थीं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी संख्या 957 थी। बाईस साल बाद, 2019-21 के सर्वेषण में राष्ट्रीय स्तर के आंकणों में दोनों क्षेत्रों में स्थिति सुधरी है, शहरों में उनकी संख्या 985 हो गयी है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में संख्या 1037 हो गयी है।

लेकिन यह बदलाव बड़े शहरों से जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं आया। दिल्ली, चंदीगढ़, पुड्डूचेरी जैसे शहरों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में औरतों की संख्या शहरों से कम है। यह आंकणे देख कर मुझे लगा कि इन क्षेत्रों में स्थिति को समझने के लिए विषेश शोध किये जाने चाहिये। एक कारण हो सकता है कि यहाँ बच्चियों का गर्भपात अधिक होता हो? शायद उससे भी बड़ा कारण है कि देश के अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी युवक इन गाँवों में सस्ती रहने की जगह पाते हैं जिसकी वजह से यहाँ पुरुषों की संख्या अधिक हो जाती है?

अन्य कुछ बातें भी हैं। जैसे कि सामान्य सोच है कि गाँवों में समाज अधिक पाराम्परिक या रूढ़िवादी होते हैं, वहाँ सामाजिक सोच को बदलने में समय लगता है। वहाँ स्वास्थ्य सेवाओं को पाना भी कठिन हो सकता है, हालाँकि प्राथमिक सेवा केंद्रों तथा आशा कर्मियों से बहुत जगहों पर स्थिति में बहुत सुधार आया है। लेकिन इन सबको ठीक से समझने के लिए विषेश शोध होने चाहिये।

राज्य स्तर के आंकणे

अंत में राज्य स्तर के आंकणों के बारे में कुछ जानकारी प्रस्तुत है। जैसा कि मैंने ऊपर बताया है, इन आंकणों पर अन्य बहुत सी बातों का असर पड़ता है इसलिए उनके महत्व को ठीक से समझने के लिए सावधानी बरतनी चाहिये।

मेरे विचार में राज्यों की स्थिति को देश के विभिन्न भागों में बाँट कर देखना अधिक आसान है। मैंने राज्यों को चार भागों में बाँटा है - पहले भाग में हैं उत्तरपूर्व को छोड़ कर उत्तरी व मध्य भारत की सभी राज्य; दूसरे भाग में मैंने दक्षिण भारत के राज्यों को रखा है, जिनमें गोवा भी है; तीसरा भाग है उत्तरपूर्व के राज्य जिनमें सिक्किम भी है; और चौथा भाग है केन्द्रीय प्रशासित क्षेत्र जैसे कि अँडमान या चँदी गढ़, इनमें दिल्ली भी है।

उत्तर तथा मध्य भारत के राज्य

2015-16 के आंकणों के अनुसार, उत्तर व मध्य भारत में सात राज्यों में औरतों की संख्या की स्थिति नकरात्मक थी - हरियाणा 876, राजस्थान 887, पँजाब 905, गुजरात 950, महाराष्ट्र 952, एवं जम्मु कश्मीर में 971। उत्तरप्रदेश में स्थिति बाकियों के मुकाबले में कुछ ठीक थी, 995। बाकी के सभी प्रदेशों में (झारखँड, पश्चिम बँगाल, उत्तरखँड, छत्तीसगढ़, ओडीशा, बिहार व हिमाचल प्रदेश) में औरतों की संख्या पुरुष अनुपात में 1000 से अधिक थी, उनमें से सबसे उच्चस्थान पर थे बिहार 1062 तथा हिमाचल प्रदेश 1087।

2019-21 के आंकणें देखें तो कुछ बदलाव दिखते हैं। जम्मू कश्मीर को छोड़ कर अन्य सभी राज्यों में स्थिति में कुछ सुधार आया है, हालाँकि पँजाब व राजस्थान में सुधार की मात्रा थोड़ी सी ही है। इन परिवर्तनों के बाद सबसे अधिक नकारात्मक स्थितियाँ इन राज्यों में हैं - राजस्थान 891, हरियाणा 926, पँजाब 938, जम्मू कश्मीर 948, गुजरात 965, महाराष्ट्र 966, और मध्यप्रदेश 970। बाकी सभी राज्यों में औरतों का अनुपात 1000 से ऊपर है। सबसे बेहतर स्थिति है ओडीशा में 1063 तथा बिहार में 1090। मेरे विचार में जिन राज्यों में स्थिति सकारात्मक दिखती है वहाँ के आंकणों पर अधिक पुरुषों के प्रवासी होने का भी प्रभाव है।

दक्षिण भारत के राज्य

गोवा सहित दक्षिण भारत के राज्यों में 2015-16 में स्थिति केवल कर्णाटक में नकारात्मक थी, 979, बाकी सभी राज्यों में स्थिति सकारात्मक थी।

2019-21 के सर्वेक्षण में इन सभी राज्यों में स्थिति सकारात्मक हो गयी थी।

उत्तरपूर्वी भारत के राज्य

उत्तरपूर्वी भारत के आठ राज्यों में से 2015-16 में 3 राज्यों में स्थिति नकारात्मक थी - सिक्किम 942, अरुणाचल 958 तथा नागालैंड 968। दो राज्यों में स्थिति थोड़ी सी नकारात्मक थी, असम में 993 और त्रिपुरा में 998, जबकि मेघालय, मिजोरम तथा मणीपुर में स्थिति सकारात्मक थी।

इस बार के 2019-21 सर्वेक्षण में इन सभी राज्यों में स्थिति सुधरी है, हालाँकि अभी भी सिक्किम में 990 तथा अरुणाचल में 997 होने से थोड़ी सी नकारात्मक है।

दिल्ली तथा केन्द्र प्रशासित भाग

अंत में दिल्ली तथा केन्द्र प्रशासित भागों में देखें तो 2015-16 में चार क्षेत्रों में स्थिति गम्भीर थी - दादरा, नगर हवेली, दमन, दीव 813, दिल्ली 854, चंदीगढ़ 934 तथा अँडमान 977। सभी जगहों पर इन क्षेत्रों के ग्रामीण हिस्सों की स्थिति और भी गम्भीर थी, जिसका एक कारण अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी पुरुष हो सकता है।

2019-21 में स्थिति में कुछ सुधार हुआ और कुछ स्थिति और भी नकारात्मक हुई - दादरा, नगर हवेली आदि 827, दिल्ली 913, चंदीगढ़ 917, अँडमान 963, लदाख 971। अँडमान में कितने प्रवासी है, वहाँ क्या कारण हो सकते हैं, उसके आंकणों से मुझे थोड़ी हैरानी हुई।


अंत में

अगर हम पूरे भारत के स्तर पर विभिन्न राज्यों में नारी और पुरुष जनसंख्या के अनुपात में आये परिवर्तनों को देखें तो पाते हैं कि बहुत राज्यों में स्थिति सुधरी है, विषेशकर लक्षद्वीप, केरल, कर्णाटक, तमिलनाडू, हरियाणा, सिक्किम, झारखँड, नागालैंड तथा अरुणाचल में। कुछ जगहों पर अनुपात कुछ घटा है जैसे कि हिमाचल प्रदेश, हालाँकि कुछ स्थिति अभी भी सकारात्मक है।

राज्य स्तर के आंकणों में आने वाले बदलावों को ठीक से समझना आसान नहीं है क्योंकि उस पर अन्य कारणों के साथ साथ पुरुषों के काम की खोज में अन्य राज्यों में जाने से भी बहुत असर पड़ता है। इसकी वजह से समृद्ध राज्य जहाँ प्रवासी आते हैं उनकी पुरुष संख्या बढ़ी दिखती है और पिछड़े राज्य, जहाँ से पुरुष प्रवासी बन कर निकलते हैं, उनके आंकड़े सच्चाई से बेहतर दिखते हैं।

राज्यों की स्थिति चाहे जो भी हो, राष्ट्रीय स्तर पर भारत की जनसंख्या में औरतों के अनुपात में इस तरह से बढ़ौती बहुत सकारात्मक बदलाव है। केवल एक आंकणे पर अधिक बातें कहना सही बात नहीं होगी, उसके लिए हमें स्वास्थ्य से संबंधित अन्य आंकणों को देखना पड़ेगा। लेकिन यह स्थिति भारत को विकास की ओर बढ़ाने में यह सही राह पर होने का आभास देती है।

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