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बुधवार, अक्टूबर 23, 2024

व्यक्तिगत संरचनाएँ: वेनिस कला प्रदर्शनी

आजकल वेनिस द्वीवार्षिकी कला प्रदर्शनी (Biennale) चल रही है। लेकिन चाह कर भी उसे देखने नहीं गया, क्योंकि प्रदर्शनी बहुत फ़ैले हुए क्षेत्र में लगती है जिससे वहाँ चलना बहुत पड़ता है और मेरे घुटने दुखने लगते हैं। लेकिन प्रमुख प्रदर्शनी के साथ-साथ वेनिस शहर में बहुत सी अन्य छोटी-बड़ी कला प्रदर्शनियाँ भी लगती हैं, जिन्हें देखना मेरे लिए अधिक आसान है। ऐसी ही एक कला प्रदर्शनी वेनिस के यूरोपी सांस्कृतिक केन्द्र  में लगी तो कुछ दिन पहले मैं उसे देखने गया।

इस आलेख में मैंने आप के लिए अपनी पसंद की कुछ कलाकृतियाँ की लघु-प्रदर्शनी बनाई है। 

यूरोपी सांस्कृतिक केन्द्र का भवन तीन हिस्सों में बंटा है - पालात्ज़ो बैम्बो, पालात्ज़ो मोरो तथा मारिनारेस्सा के बाग। इसमें कुल मिला कर करीब चालिस कक्ष हैं जिनमें विभिन्न देशों के करीब दो सौ कलाकारों की यह प्रदर्शनी लगी है। यह भवन वेनिस रेलवे स्टेशन से रिआल्तो पुल जाने वाले प्रमुख रास्ते पर है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures

इस प्रदर्शनी में चैक रिपब्लिक की एक कलाकृति ने मुझे बहुत प्रभावित किया, देख कर ऐसा लगा मानो किसी ने छाती पर मुक्का मारा हो और साँस नहीं ली जा रही हो। इसलिए मेरे लिए यह इस प्रदर्शनी की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृति थी। यह कलाकृति आप को नीचे मेरे आलेख के अंत में मिलेगी।

इस प्रदर्शनी को "व्यक्तिगत संरचनाएँ: सीमाओं से परे" का नाम दिया गया है और यह २४ नवम्बर २०२४ तक चलेगी। इसे देखने के लिए कोई टिकट नहीं चाहिये। अगर आप इन दिनों में वेनिस आ रहे हैं और आप को कला में रुचि है, तो इस प्रदर्शनी को अवश्य देखें।

नीचे की सभी कलाकृतियों की तस्वीरों पर क्लिक करके आप उन्हें बड़ा करके देख सकते हैं। तो आईये चलते हैं मेरी यह लघु कला प्रदर्शनी देखने।

ग्रीस के कोसतिस ज्योर्जो (Kostis Georgiou) की कलाकृतियाँ

यह पहली दो कलाकृतियाँ भवन में घुसने से पहले, उसके सामने वाले बाग में दिखती है। एलुमिनियम की बनी मानव मूर्तयों को उन्होंने लाल रंग से रंगा है। एक में दो आकृतियाँ एक चक्र के ऊपर हवा में टिकी हैं, दूसरी में एक सीढ़ी के आसपास चार आकृतियाँ ऊपर नीचे हैं। कुछ रंग की वजह से, कुछ आकृतियों का हवा में तैरना और खेलना, मुझे अच्छा लगा। अगर आप कोसतिस के वेब-स्थल वाली लिंक पर देखेंगे तो वहाँ लाल रंग से  इस तरह की अन्य अनेक कलाकृतियाँ देख सकते हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Kostis Georgiou

अमरीका की अलकनंदा मुखर्जी (Alakananda Mukerjin) की कला

अलकनंदा की जल-रंगों कि विभिन्न चित्रकला इस प्रदर्शनी में दिखी। मुझे यह विषेश नहीं भाईं, कुछ बेतरतीब सी लगीं, लेकिन साथ ही लगा कि उनकी आकृतियों में मकबूल फिदा हुसैन साहब की आकृतियों की प्रेरणा दिखती है। क्या आप को भी ऐसा लगता है?

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Alakananda Mukherjin

 आस्ट्रेलिया की एनेट्टे गोल्डन (Annette Golden) की चित्रकला

प्रदर्शनी में एनेट्ट की कलाकृतियों के लिए एक पूरा कमरा था जिसमें उनकी बीस-पच्चीस कलाकृतियाँ लगी थीं। वह एक्रेलिक, तेल-रंग और धातुओं की पत्तियाँ लगा कर केनवास पर कलाकृतियाँ बनाती हैं, जिनमें रंगबिरंगे विभिन्न नारी स्वरूप दिखते हैं। उन्हीं में से एक कलाकृति प्रस्तुत है जिसकी काली पृष्ठभूमि पर लाल और नीले रंगों से बनी युवती मुझे अच्छी लगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Annette Golden

न्यूज़ीलैंड तथा भारत के अरीज़ कटकी (Areez Katki) का इस्टालेशन

अरीज़ पारसी हैं और उनके इंस्टालेशन में रुमालों में ज़राथुस्त्रा गाथा के सतरह हा (टुकड़े या हिस्से) दिखते हैं। रुमालों पर उन्होंने चित्र बना कर, उन्हें धागों से छत से लटकाया था। पीछे खिड़की से आती वेनिस की रोशनी और और वहाँ से दिखते भवनों के साथ उनके प्राचीन धर्म ग्रंथ का चित्रण मुझे अच्छा लगा हालाँकि उन चित्रों में कौन सी कहानी थी, यह समझ नहीं आया।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Areez Katki

अमरीका के ब्रायन माक (Brian J. Mac) की वास्तुकला की कलाकृति

ब्रायन माक अमरीकी वास्तुकार हैं। अपने २७ सालों के वास्तुकार कार्य के हर साल उन्होंने एक डिब्बा बनाया जिसमें उनके रेखाचित्र, मॉडल, इत्यादि तोड़-मोड़ कर घुसा दिये। एक तरह से उनका पूरा कार्यजीवन इस तरह से उनकी कलाकृति में दिखता है। इसे देखते हुए मैं सोच रहा था कि हमारी हर चीज़ के साथ हमारी यादें जुड़ी होती हैं, कि  इसे वहाँ से खरीदा था, इसे वैसे बनाया था, आदि, लेकिन हमारे बाद हमारी यादों की कोई कीमत नहीं रहती, उस सब सामान को कूड़े की तरह फ़ैंक देते हैं। इस दृष्टि से यह कलाकृति मुझे यादों का व्यक्तिगत स्मारक लगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Brian J. Mac

रोमेनिया की कालिन टोपा (Calin Topa) और अदा गालेस (Ada Gales) की इन्स्टालेशन

कालिन स्वरों और ध्वनि की कलाकार है, उन्होंने इस प्रदर्शनी में एक लाल रोशनी वाला एक गलियारा बनाया, और जिसे स्वरों से भरा है। उस गलियारे की दीवारों पर अदा ने अपने शब्द लिखे हैं, और इस तरह से दोनों की कला-दृष्टि का संगम हुआ। मैं आप को कालिन की ध्वनि नहीं महसूस करा सकता लेकिन अदा के विभिन्न वाक्यों में से जो शब्द मैंने चुने हैं उनमें लिखा है, "मैं कभी कला बनाना चाहती हूँ और कभी थाई नूडल खाना चाहती हूँ"।  

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Calin Topa
 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Ada Gales
 
ध्वनियों को मिला कर भी कला बनती है, के विषय पर कई इंस्टालेशन मैं पहले भी देख चुका हूँ लेकिन यह एक कला अनुभव है, यह बात मुझे अभी भी कुछ अजीब सी लगती है, हालाँकि इसे तार्किक स्तर पर समझता हूँ। मेरे लिए कला देखने की चीज़ है, छू कर देखने की चीज़ है। इसी तरह से मुझे कला प्रदर्शनियों में वीडियो इंस्टालेशन भी कुछ अजीब से लगते हैं।

स्विटज़रलैंड की केरोल कोहलर (Carole Kohler) की लुकन-छिपाई

केरोल कोहलर ने कपड़े उतराते हुए व्यक्तियों की मूर्तियाँ बनायी थीं और कोलाज बनाये थे जिन्हें ३-डी चश्में से देखो तो उनके भीतर छुपी हुई आकृतियाँ दिखती थीं। मैं आप को वे छिपी हुई आकृतियाँ नहीं दिखा सकता लेकिन आप उनकी कपड़े उतारने वालों  की मूर्तियों की एक झलक देख सकते हैं। सब मूर्तियों में बनियान या कमीज उतारने वालों के कपड़े से चेहरे छिप गये हैं, अवश्य इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ है, जैसे बच्चे अपना चेहरा ढक कर सोचते हैं कि उन्हें कोई नहीं देख सकता। या शायद, कलाकार कहना चाहता है कि हम कड़वी सच्चाई देखने से डरते हैं और उनसे अपना मुँह चुराते हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Carole Kohler

स्विटज़रलैंड के क्रिस्टोफ स्टुकेलबर्गर (Christoph Stuckelberger) की जड़ें

स्टुकेलबर्गर हर वस्तु के नयी तरह से देखने के लिए कहते हैं। उनकी कलाकृतियों के लिए एक पूरा कक्ष था जिसमें वस्तुओ के भितर से बाहर, या नीचे से ऊपर, उल्टा दिखाया गया था। इस तस्वीर में आप उनकी "जड़ें" देख सकते हैं जो आपस में एक दूसरे के ऊपर-नीचे जा कर एक जाल बनाती हैं। जिस वस्तु को एक तरह से देखने की आदत हो, जब वह उससे भिन्न दिखे तो हमें रुकने और सोचने के लिए नया दृष्टिकोण देती है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Christoph Stuckelberger

हंगरी के डेविड सज़ेंतग्रोती (David Szengroti) की अमूर्त चित्रकला

प्रदर्शनी में बहुत सी अमूर्त चित्रकला के नमूने थे जो मुझे अच्छे लगे। मैंने उनमें से इस लघु-प्रदर्शनी के लिए हंगरी के चित्रकार सज़ेंतग्रोती की तीन चित्रकलाओ को चुन कर उनकी एक मिली-जुली तस्वीर बनायी है। ऐसी कलाकृतियों के सामने मैं लम्बे समय तक खड़ा रह कर उन्हें देख सकता हूँ। इसमें रंगो का चुनाव, उनके आपस में सम्बंध, उनमें दिखती अमूर्त आकृतियाँ, सब का असर मिल जुल कर मुझे बहुत सुंदर लगा। 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - David Szengroti (composit)

बेल्जियम की जाँन ओपगेन्होफ्फेन (Jeanne Opgenhoffen) की सिरामिक कला

ज़ाँन अपने सिरामिक के काम के लिए जानी जाती हैं। उनकी जिस कलाकृति को मैंने इस आलेख के लिए चुना है उसके लिए उन्होंने पहले महीन सेरामिक के चिप्स जैसे आकार के टुकड़े बनाये, फ़िर उन सबको जोड़ कर यह अमूर्त चित्र बनाये, जिनमें रंगों और अकृतियों का मेल मुझे बहुत अच्छा लगा। इसे देख कर सोचना कि इसे बनाने में उन्हें कितना समय और मेहनत लगी होगी, से इसकी सुंदरता और भी महत्वपूर्ण लगती है। इस तस्वीर पर क्लिक करके इसे बड़ा करके देखिये तब इसकी सुंदरता दिखेगी।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Jeanne Opgenhoffen

सीरिया-फिलिस्तीन के खैर अलाह सलीम (Khair Alah Salim) की चित्रकला

सलीम फिलिस्तीनी हैं और सीरिया में रहते हैं, उनकी केनवास पर एक्रेलिक से बनी इस तस्वीर की उदास मुस्कान वाली युवती मुझे बहुत अच्छी लगी। लगता है जैसे उसका चेहरा एक अंडे के छिलके के ऊपर बना है जिसमें दरारें पड़ रही हैं, जिनसे उसकी उदासी और भी गहरी हो जाती है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Khair Alah Salim

फ्राँस के निकोलास लावारेन्न (Nicolas Lavarenne) और कोरीन फन्कन (Corin Funken) की कलाकृतियाँ

निकोलास ने रेज़िन से सोती हुई युवती की शिल्पकला बनाई है जिसकी बाजू नीचे, कोरीन की चित्रकला के सामने लडक रही है। निकोलास की मूर्ति छत पर लोहे के हैम्मोक पर झूल रही है, जबकि कोरीन की चित्रकला में वेनिस शहर के समुद्र से जुड़ी बातों-घटनाओं का चित्रण है जिसे उन्होंने "हमारा समुद्र" का नाम दिया है। मुझे कोरीन की चित्रकला कुछ विषेश नहीं लगी लेकिन निकोलास की मूर्ति के चेहरे का भाव और उनका कक्ष में छत पर तैरना बहुत अच्छे लगे।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Nicolas Lavarenne

 नाईजीरिया की ओर्री शेनजोबी (Orry Shenjobi) की आ-वाम-बे पार्टी

ओर्री की कलाकृतियों का एक पूरा कक्ष है जिसमें दीवारों पर उन्होंने वहाँ की पाराम्परिक पार्टी जिसे आ-वाम-बे कहते हैं, में भाग लेने वालों की तस्वीरों के ऊपर से विभिन्न चीज़ो को जॊड़ कर कोलाज जैसे बनाये हैं। उनकी कलाकृति ऊर्जा, रंगों और आनंद लेते हुए लोगों से भरी हुई है। इस कक्ष में बहुत देर तक रुका। नीचे वाली तस्वीर में आप को उस कक्ष की दो दीवारों के हिस्से दिखेंगे। इस तस्वीर पर भी क्लिक करके उसे बड़ा करके देखिये, तब दिखेगा कि किस तरह उन्होंने तस्वीरों पर अन्य वस्तुओं को जोड़ कर कैसे कोलाज बनाये हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Orry Shenjobi (composit)

चिल्ली की पेटरिशिया टोरो रिब्बेक (Patricia Toro Ribbeck) की मिठाईयाँ

दक्षिण अमरीका की इस कलाकार ने रंग-बिरंगी चमकती हुई सिरामिक से तरह-तरह के केक, पेस्ट्रियाँ और मिठाईयाँ बनाई हैं, जिन्हें देख कर भूख लग जाती है। मेरे विचार में यह कलाकृति जिस घर में रहेगी वहाँ रहने वाले लोग डाईटिन्ग नहीं कर सकते। वह कहती हैं कि इसे उन्हें कोविड के समय में घर में बन्द रहने के समय बनाया था क्योंकि उस समय वह सुंदर सपने देखना चाहती थीं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Patrizia Toro Ribbeck

फिलीपीनी कलाकारों का कक्ष

प्रदर्शनी में एक कक्ष में बहुत सारे फिलीपीनी कलाकारों की कलाकृतियाँ थीं। मुझे उनमें से कई कलाकृतियाँ अच्छी लगीं लेकिन उदाहरण के लिए मैंने उनमें से दो कलाकृतियाँ चुनी हैं। पहली चित्रकला डेमी पाडुवा की है और दूसरी चित्रकला सेड्रिक डेला पाज़ की है, दोनों कलाकृतियाँ केनवास पर एक्रेलिक रंगों से बनाई गई हैं।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Demi Padua
 
European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Cedric dela Paz

प्रिन्सटन विश्वविद्यालय के फ़िल्म-शोध स्टूडियो की तस्वीरें

यह वाला कक्ष अमरीकी श्याम वर्ण के लोगों के संघर्ष के बारे में बना है। इसमें एक और हज़ारों छोटी-छोटी तस्वीरों को मिला कर कम्प्यूटर से चित्र बनाये थे जिनमें दूर से देखो तो उनमें जाने-पहचाने व्यक्तियों के चेहरे दिखतॆ थे। जैसे कि नीचे वाली तस्वीर अमरीकी अभिनेता जोर्डन पील की है, जिसे ध्यान से देखेंगे तो यह बहुत सी छोटी तस्वीरों को जोड़ कर बनाई गई है। इस तस्वीर पर क्लिक करके उसे बड़ा करके देखिये कि पील का चेहरा कैसे बनाया गया है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Princeton Uni Research film studio

सेशैल के रायन शैट्टी (Ryan Shetty) की तैरते हुए घर

रायन ने इस कक्ष में विभिन्न इस्टालेशन बनाई थीं। उनमें से मुझे यह तैरते घरों वाला हिस्सा अच्छा लगा। सफेद, चकोर, डिब्बे जैसे कमरों में खिड़कियाँ, सीढ़ियाँ और खम्बे बने हैं। नीचे से रोशनी से पीछे की दीवार पर प्रतिबिम्ब थे और साथ में एक वीडियो इंस्टालेशन भी था (यह सब इस तस्वीर में नहीं दिखते)।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Ryan Shetty

भारत की सोनल अम्बानी (Sonal Ambani) का घायल बैल

सोनल के धातुओं के टुकड़ों को जोड़ कर बना यह बैल देख कर मुझे दिल्ली के चर्खा संग्रहालय में बने शेर की शिल्पकला याद आई जिसे भारत सरकार ने "भारत में बनाईये" कम्पेन के लिए लगाया था। बैल देख कर फाईनेन्शियल और शेयर बाज़ार मार्किट का ध्यान आता है, शायद इसलिए लाल तीरों से घायल यह बैल नहीं है, प्रतीमात्मक गाय है। यह शिल्प स्टील, पीतल और लकड़ी से बना है और उनके अनुसार, यह पुरुष तथा नारी को काम के लिए मिलने वाली पगार की विषमताओं को दर्शाता है। सोनल जी ने इस कलाकृति का नाम दिया है, "बड़े सौभाग्य के तीर और गुलेलें"।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Sonal Ambani

दक्षिण कोरिया के याओ जुई छुंग (Yao Jui Chung) का झंडा

छुंग की इस कलाकृति के रंग यूक्रेन के झंडे के रंगों की याद दिलाते हैं और इस पर बनी दो आकृतियाँ ध्यान खींचती हैं। एक आकृती कुत्ते या सियार जैसी लगती है और दूसरी का चेहरा मानव सा है लेकिन उसके सींग हैं, यानि शैतान है। इसका अर्थ मुझे समझ नहीं आया लेकिन देख कर अच्छा लगा।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures- Yao Jui Chung

चीन के शांग मिंग शेंग (Chang Ming Sheng) की क्वान्टम भौतिकी कला

बाद में पता चला कि कलाकृति का नाम यी जिंग है और कलाकार का नाम शांग मिंग शेंग है। यह वैज्ञानिक तरीके से बालू के कणों को क्वांटम भौतिकी के माध्यम से घुमा कर अपनी कला बनाते हैं जो द्वीरूप और त्रीरूप के बीच में घूमती है। मुझे उनकी कोई बात समझ नहीं आई कि वह क्या करते हैं और क्यों करते हैं, इसलिए उनकी चित्रकला का एक नमूना यहाँ प्रस्तुत है ताकि आप में से बुद्धिमान व्यक्ति इसे समझ कर मुझे भी समझायें। 

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Chang Ming Sheng

चेक गणतंत्र के डानिएल पेस्टा (Daniel Pesta) की चोटियाँ

मेरी इस लघु-प्रदर्शनी के अंत में वह कलाकृति प्रस्तुत है जिसने मेरे दिल को गहराई से छुआ। इसे देख कर मुझे बहुत धक्का लगा, मैं वहाँ खड़ा रह गया।

कलाकृति में युवतियों की तीन कटी हुई, खून से सनी हुई चोटियाँ हैं, जिनके नीचे लिखा है, "मेरा खून जंगली था", "मेरा खून गर्म था", और "मेरा खून स्वतंत्र था"। जब लड़की जंगली हो, काबू में न आये, स्वतंत्र जीना चाहे तो अक्सर समाज उन्हें दीवारों और पर्दों के पीछे छुपा देते हैं और फ़िर भी न माने, तो परिवार और धर्म की इज़्ज़त के नाम पर जान से मार देते हैं।

दुनिया भर में लड़कियों और औरतों पर धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के नाम पर होने वाले अत्याचारों और बंधनों को दिखाती यह कलाकृति मेरे मन को छू गई। नीचे वाली तस्वीर में मैंने तीनो कलाकृतियों को एक तस्वीर में जोड़ दिया है। इस तस्वीर को क्लिक करके इसे बड़ा करके अवश्य देखें।

इसे देख कर पंजाबी गीत, "काली तेरी गुत ते परांदा तेरा लाल नी" का नया ही अर्थ दिखता है।

European Cultural Centre Venice - art exhibition - Personal structures - Daniel Pesta

अंत में 

पिछले दशक से कॉनसैप्ट आर्ट यानि किसी विचार पर आधारित कला का महत्व बढ़ता जा रहा है, जिसमें कलाकार अपनी कला का कौशल नहीं दिखाता बल्कि कला के माध्यम से एक विचार को अभिव्यक्ति देता है। डानियल पेस्टा की कला में लड़कियों की चोटियाँ बनाने का कौशल प्रभावित नहीं करता बल्कि उसके पीछे उनका विचार है कि जो लड़कियाँ हमारे समाज की बात नहीं मानती उनकी चोटियाँ काट कर उनके सिरों को लहु-लुहान कर दो।

कुछ कलाकार वैचारिक-कला के नाम पर आलसपन दिखाते हैं जैसे कि कोई कुछ टूटी ईंटों को रख कर, उसे "टूटे सपने" नाम की कलाकृति बताईये। लेकिन चेक कलाकार डानियल की इस कलाकृति को देख कर मुझे लगा कि वैचारिक कला भी बहुत सशक्त हो सकती है।

कहिये आप का क्या विचार है और मेरी इस लघु कला प्रदर्शनी में आप को कौन सी कलाकृति सबसे अधिक अच्छी लगी।

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शुक्रवार, जून 28, 2024

आयुर्वेद और वैज्ञानिक शोध

आयुर्वेद में सदियों के अनुभवों से निर्मित भारतीय मानव-चिकित्सा का ज्ञान और समझ संचित है। इस ज्ञान में एक ओर से जड़ी-बूटियों से ले कर हर तरह के प्राकृतिक पदार्थों से जुड़ी जानकारी है। आयुर्वेद में मानव शरीर कैसे बना है, उसके अंगों, क्रियाओं और रोगोत्पत्ति व रोग-उपचार की प्राचीन सोच-समझ भी है। कुछ बातों में आयुर्वेद के विचार आज के वैज्ञानिक विचारों से भिन्न है, इसलिए आधुनिक अनुसंधानों से इस समझ के प्रमाण खोजने की आवश्यकता है।

अगर वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद आयुर्वेद की कुछ बातों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते तो उन्हें बदलना चाहिये या नहीं, और कैसे बदलना चाहिए, यह बहस व निर्णय आयुर्वेद के विशेषज्ञ ही ले सकते हैं।

पिछली कुछ सदियों में आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की सोच तथा पद्धति विकसित हुई है जिसमें चिकित्सा के विषय पर वैज्ञानिक शोध व अनुसंधान कैसे किया जाना चाहिए की बात भी है। आज दुनिया में कोई भी चिकित्सा परम्परा हो, उसे इसी वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर जाँचा जाता है।

यह आलेख आयुर्वेद और वैज्ञानिक अनुसंधान के विषय पर है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

मैं, आयुर्वेद और शोध

मैं एलोपैथी का डॉक्टर हूँ और मुझे वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में अनुभव है। करीब बीस साल पहले, मैंने "एशिया की पाराम्परिक चिकित्सा पद्धितियों" के विषय पर बंगलौर में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सभा में हिस्सा लिया था, जिसमें मेरा आयुर्वेद से परिचय हुआ। उस समय मुझे बंगलौर में एक आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज जाने का मौका भी मिला था। इस आलेख की सभी तस्वीरें  २००६ की उसी सभा तथा वहाँ के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज से हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मुझे केरल में आयुर्वेदिक चिकित्सा करवाने का सकारात्मक अनुभव हुए थे। इसके साथ मुझे कुछ अन्य आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में जाने और वहाँ के शिक्षकों से बातचीत का मौका भी मिला। उससे मुझे लगा कि बहुत से आयुर्वेदिक चिकित्सकों तथा प्रोफैसरों में चिकित्सा से जुड़े वैज्ञानिक शोध-पद्धितियों की समझ कुछ सीमित है। मेरे विचार में वैज्ञानिक शोध एक महत्वपूर्ण विषय है और आयुर्वेद के मेडिकल कॉलिजों को इस विषय में पढ़ने व सीखने की बहुत आवश्यकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

जब हमें किसी उपचार से अच्छा अनुभव है, तो वैज्ञानिक शोध क्यों?

मेरे विचार में आयुर्वेदिक उपचारों पर वैज्ञानिक शोध करने के तीन प्रमुख कारण हैं -

(१) जब कोई दवा या उपचार रोगियों को राहत देते हैं, तब शोध से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि वे उपचार कितने प्रतिशत मरीजों को राहत देते हैं? वह राहत कितने समय तक रहती है? वे उपचार किस तरह से या क्यों सफल होते हैं? क्या उस उपचार के रोगियों पर कुछ अवांछनीय या नकारात्मक प्रभाव भी हैं? इस तरह के प्रश्नों के उत्तर खोजने से उन उपचारों को बेहतर किया जा सकता है।

(२) चिकित्सा-शोध ने दिखाया है कि जब रोगियों को डॉक्टर पर और उसके इलाज पर भरोसा होता है तो केवल यह विश्वास ही कुछ प्रतिशत मरीज़ों को ठीक कर देता है, इसे प्लेसेबो प्रभाव (placebo) कहते हैं। प्लेसबो प्रभाव को दवा या उपचार के प्रभाव से अलग समझना आवश्यक है। वैज्ञानिक शोध से हम यह समझ सकते हैं कि कितने लोग आयुर्वेद उपचार से इस तरह के विश्वास-प्रभाव की वजह से ठीक होते हैं, और कितने लोग सचमुच आयुर्वेद की दवाओं या उपचार से।

(३) एलोपैथी वाले कुछ चिकित्सक सोचते हैं कि आयुर्वेद सचमुच का ज्ञान नहीं है, यह जादू-टोना या अंधविश्वास है। आयुर्वेद पर वैज्ञानिक शोध से इस तरह के आरोपों से लड़ा जा सकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

आयुर्वेद चिकित्सा का विकास कई सौ या हजारों वर्षों के अनुभव का नतीजा है, लेकिन विज्ञान कभी रुकता नहीं है, आगे बढ़ता रहता है, इसलिए आयुर्वेद को भविष्य में किस ओर जाना चाहिये, इसे समझने के लिए शोधकार्य चलता रहना चाहिये। आयुर्वेद में प्राचीन ज्ञान को बहुत महत्व दिया जाता है, लेकिन मेरे विचार में प्राचीन ज्ञान के साथ नया ज्ञान जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। 

पश्चिमी वैज्ञानिक, चिकित्सक एवं शोधकर्ता स्वीकारते हैं कि आयुर्वेद जैसी प्राचीन परम्पराओं में वनस्पति जगत से जुड़ा गहरा ज्ञान है। जैसे कि किस पत्ते या जड़ आदि से किस रोग का उपचार हो सकता है। इसलिए वे लोग अक्सर इस जानकारी से उन पौधों से दवा खोजने और उसके रसायन पदार्थों को अलग करने के शोध करते हैं, लेकिन इन्हें आयुर्वेद-शोध नहीं कह सकते, क्योंकि वह लोग आयुर्वेद की सोच के अनुसार कुछ नहीं करना चाहते, बल्कि वह केवल अपनी पश्चिमी वैज्ञानिक सोच से नई दवाओं की खोज में लगे हैं।

वैज्ञानिक शोध कैसे करते हैं?

अनुसंधान करने का अर्थ है वैज्ञानिक मापदंडों के साथ निष्पक्ष प्रयोग या परीक्षण करना। इसे वैज्ञानिक शोध तभी माना जा सकता है अगर निम्नलिखित तीनों बातों को पूरा किया जाये - 

(१) शोध-प्रयोगों का लिखित प्रोटोकॉल होना चाहिए, जिसे अनुसंधान से पहले तैयार किया जाना चाहिए, और इसे एक वैज्ञानिक शोध कमेटी से मंजूरी मिलनी चाहिए। वैज्ञानिक शोध कमेटी के सदस्यों तथा शोध करने वाले के बीच में कोई व्यक्तिगत सम्बंध नहीं होना चाहिए, ताकि वह निष्पक्ष निर्णय लें। प्रोटोकॉल की मंजूरी के बाद, पूरे अनुसंधान को उस प्रोटोकॉल के अनुसार किया जाना चाहिए जिसमें उसके हर कदम को निष्पक्ष तरीके से देख कर जाँचा और मापा जाना चाहिये, और इसकी लिखित रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए।

(२) उस अनुसंधान के सभी सकारात्मक व नकारात्मक नतीजों को सांख्यकी (statistics) के मानदंडों से परखना चाहिए।

(३) उस अनुसंधान के हर चरण के प्रमाणों को सही तरीके से संजो कर रखना चाहिए, ताकि कोई भी वैज्ञानिक उस सारी प्रक्रिया और उसके हर कदम की स्वतंत्र जाँच कर सके।

इन तीनों बातों में से एक भी बात अधूरी हो, तो उस वैज्ञानिक शोध को विश्वास्नीय नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिक शोधों की रिपोर्टों को ऐसी पत्रिकाओं में छापते हैं जिनमें छापने से पहले अन्य वैज्ञानिक आप के शोध को जाँच-परख सकते हैं। इन्हें पियर रिव्यू (Peer reviewed) यानि अन्य वैज्ञानिकों द्वारा जाँचे आलेखों की पत्रिकाएँ कहते हैं।

आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ 

अगर हम आयुर्वेद से जुड़े विषयों पर शोध करना चाहते हैं तो सबसे पहला प्रश्न है कि क्या भारत में ऐसी पियर-रिव्यू वाली आयुर्वेद चिकित्सा की पत्रिकाएँ हैं और अगर हैं तो किस तरह की वैज्ञानिक क्षमता वाले लोग उसके साथ जुड़े हैं जो उसमें छपने वाले आलेखों की जाँच करते हैं?

इस विषय पर इंटरनेट पर खोज करने से मुझे निम्नलिखित आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ मिलीं:

हिंदी में आयुर्वेदीक-अनुसंधान की भी शायद कुछ पत्रिकाएँ छपती हैं, लेकिन इनके पीडीएफ अंक इंटरनेट पर कठिनाई से मिलते हैं और इनके बारे में जानकारी सुलभ नहीं है। जैसे कि "आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान पत्रिका", जिसकी वेबसाईट पुरानी शैली की है और जिसके कुछ आलेख मुझे अंग्रेजी में दिखे।

आयुर्वेद-अनुसंधान के विषय पर कुछ कार्यशाला आयोजित करने की भी छिटपुट खबरें मिलती हैं लेकिन जिस स्तर पर यह काम होना चाहिये, उससे मुझे यह बहुत कम लगता है।

अगर उपरोक्त जानकारी के अतिरिक्त अगर आयुर्वेद-शोध-अनुसंधान के विषय पर अन्य वैज्ञानिक पत्रिकाएँ छपती हैं हैं तो कृपया नीचे टिप्पणी करके उनकी सूचना दीजिये। इन विषयों पर अगर भारतीय भाषाओं में छपने वाली अन्य पत्रिकाएँ हैं तो उनकी जानकारी भी नीचे टिप्पणियों में दीजिये।

आयुर्वेदिक-शोधों में कमियाँ

मैंने उपरोक्त पत्रिकाओं में छपने वाले शोधों के कुछ आलेख पढ़े। मुझे उनमें कुछ कमियाँ दिखीं, जैसे कि:

  • अक्सर लेखक ऐसे शब्द या परिभाषाएँ उपयोग में लाते हैं जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं हैं। जैसे कि एक आलेख में आयुर्वेद के मूलभूत मूल्यों की बात थी लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि वह मूलभूत मूल्य कौन से थे और कैसे निर्धारित किये गये थे? आयुर्वेद में वात, कफ, पित्त आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है लेकिन उनके अर्थ भी मुझे स्पष्ट नहीं लगे। जब इस तरह के शब्द या परिभाषाएँ उपयोग करते हैं तो यह समझना आवश्यक है कि आयुर्वेद से जुड़े कितने प्रतिशत लोग उन मूल्यों या अर्थों से सहमत हैं? मुझे यह कमी आयुर्वेद से सम्बंधित बहुत से विचारों, शब्दों, अर्थों और मूल्यों के बारे में महसूस होती है। जब तक हर एक शब्द या विचार की सर्वसम्मत या बहुमत-स्वीकृत स्पष्ट परिभाषा नहीं होगी, तब तक उन पर वैज्ञानिक शोध करना कठिन ही नहीं, असम्भव होगा। आयुर्वेद-विशेषज्ञों को इस दिशा में सबसे पहले निर्णय लेने चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों का डेल्फी सर्वे करके परिभाषाओं को स्पष्ट करना चाहिये।   
  • आयुर्वेद की नींव संस्कृत के ग्रंथों पर टिकी है, अक्सर भाषा बदलने से अंग्रेज़ी में उन संस्कृत शब्दों के सही अर्थ खोजना कठिन काम हो जाता है, इसलिए आयुर्वेद की संस्कृत या भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक पत्रिकाएँ उपलब्ध होना बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक है। बहुत खोजने पर इंटरनेट पर संस्कृत, हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में आयुर्वेदी-शोध की वैज्ञानिक पत्रिका नहीं मिली, यह मुझे बहुत गम्भीर कमी लगती है। मेरे विचार में असली शोध भारतीय भाषाओं में होना चाहिये, उसके बाद उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद करना चाहिये ताकि शोध से जुड़े शब्दों को  उनकी सही परिभाषा में समझा जा सके।
  • मैंने ऊपर दी गई पत्रिकाओं में छपे कुछ आलेख देखे, जिन्हें पूर्ण रुप से वैज्ञानिक शोध नहीं कह सकते। जैसा मैंने ऊपर लिखा, चिकित्सा सम्बंधी शोध-प्रोटोकॉल कैसे तैयार किये जाते हैं, लगता है कि इसकी जानकारी कम है और अधिक लोगों तक पहुँचनी चाहिये। इस विषय पर आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलिजों द्वारा प्रोफैसरों, स्नातकों तथा विद्यार्थियों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन होना चाहिये।

चीन में उनकी परम्परागत चिकित्सा (एकपंक्चर, आदि) पर बहुत शोध हुआ है। यह सब शोध और वैज्ञानिक शोध वे लोग चीनी भाषा में करते हैं और चीनी भाषा में वैज्ञानिक शोध की बहुत सी पत्रिकाएँ हैं। लेकिन यह बात नहीं है कि वह बाकी दुनिया में होने वाले शोधों से अनभिज्ञय हैं। वहाँ पर अंग्रेजी, फ्राँसिसी, स्पेनी आदि भाषाओ में छपने वाले महत्वपूर्ण शोधों के चीनी अनुवाद किये हुए सार या पूरे आलेख छापने वाली चीनी पत्रिकाएँ भी हैं, ताकि स्थानीय शोधकर्ताओं को खबर रहे कि दुनिया में क्या हो रहा है। आयुर्वेद से जुड़े शोध के लिए भारतीय भाषाओ में ऐसी पत्रिकाओं की आवश्यकता है क्योंकि इस चिकित्सा पद्धिति के मूल विचार संस्कृत में हैं और उन्हें अंग्रेजी में अनुवाद करने से उनकी सही परिभाषाएँ निश्चित करना कठिन हो जाता है।

नये कदम

भारत सरकार ने आयुर्वेदिक विज्ञान-शोध की राष्ट्रीय परिषद (Central Council for Research in Ayurvedic Sciences, CCRAS) स्थापित की है। इनकी सन २००० की अनुसंधान पोलिसी भी है। इनकी सूची भी है कि किस राज्य में कौन से शोध किये जा रहे हैं (लेकिन इसमें यह नहीं लिखा कि यह सूची किस साल की है)। इनका एक अंग्रेजी में शोध-पोर्टल है जिसे बहुत जटिल बनाया गया है और जिसमें कोई आलेख खोजना मुझे आसान नहीं लगा, शायद यह शोध विशेषज्ञों के लिए बना है।

विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने भी, भारत सरकार के सहयोग से एक अंतर्राष्ट्रीय पारम्परिक चिकित्सा केन्द्र (Global Traditional Medicine Centre - GTMC) की जामनगर-गुजरात (भारत) में स्थापना की है।

आशा करता हूँ कि इन नये संस्थाओं से आने वाले समय में आयुर्वेद से जुड़े शोध करना पहले से अधिक आसान होगा। 

अंत में

आयुर्वेद की मेरी समझ सतही है। लेकिन मेरे विचार में आयुर्वेद के विषयों पर वैज्ञानिक शोध और उस शोध के परिणामों को वैज्ञानिक पत्रिकाओं में लोगों को लोगों को उपलब्ध कराने में बहुत सा काम बाकी है।
 
अगर आप आयुर्वेद से जुड़े किसी क्षेत्र में अनुसंधान करने की सोच रहे हैं और आप के मन में उसके प्रोटोकॉल से सम्बंधित कुछ प्रश्न हैं तो मुझसे सम्पर्क करें, मैं आयुर्वेद के बारे में नहीं जानता लेकिन चिकित्सा के शोध-प्रोटोकॉल कैसे बनाये इसमें मदद कर सकता हूँ।  आप मेरे शोध-आलेखों की लिन्क इस ब्लाग के दायें हाशिये पर खोज सकते हैं, मेरे शोध क्षेत्र कुष्ठ रोग और विकलांगता से जुड़े हैं।
 
International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006
 
टिप्पणी: इस आलेख के साथ लगी सभी तस्वीरें २००६ की परम्परागत चिकित्सा की बंगलौर कौन्फ्रैंस से हैं।
 
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शुक्रवार, मार्च 22, 2024

ऋग्वेद कथा

गृत्समद आश्रम के प्रमुख ऋषि विद्यार्थियों को पढ़ा रहे थे, जब उन्हें समाचार मिला कि उनसे मिलने उनके बचपन के मित्र विश्वामित्र आश्रम के ऋषि गाथिन आये थे। गृत्समद ऋषि अपने मित्र की आवभगत करने गये, उनसे गले मिले और उन्हें आदर से अपने शिक्षाकक्ष में ले आये, विद्यार्थियों से उनका परिचय कराया, उन्हें बैठने का स्थान दिया, जल और भोजन दिया।

"प्रिय भाई गाथिन, तुम कितने समय के बाद आये, आशा है कि तुम्हारे समुदाय में सब कुशल है", उन्होंने मेहमान से कहा। कुशल-मंगल पूछने और औपचारिकता की बातों के बाद उन्होंने मित्र से पूछा, "इतनी लम्बी यात्रा करके यहाँ आने का क्या कोई विषेश कारण है?"

गाथिन बोले, "पिछली सदियों में आर्यावर्त बहुत बढ़ गया है और बदल गया है। वह समय जब सब राजन मिल कर एक मनु, एक इन्द्र और सप्तऋषियों का चुनाव करते थे, लोग उस समय के बारे में भूलते जा रहे हैं। आर्यावर्त इतना फैल गया है कि इसके बाहर वाले हिस्सों के जनपदों के आश्रमों में कौन से ऋषि हैं और वह कौन से मंत्र पढ़ा रहे हैं, यह सब हमें पता ही नहीं हैं। जब प्रथम मनु का मनवन्तर था और पहले सप्तऋषि मण्डल में वाशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वानदेव तथा शौनक जैसे ऋषि थे, तब ऐसा नहीं था। लेकिन उसके बाद, पिछली सदियों में मनु बदले, मनवन्तर बदले और उनके सप्तऋषि भी बदलते रहे, तो उनका इतिहास कहीं पर संजोया नहीं गया।"

गृत्समद ऋषि बोले, "इतिहास की इन सब बातों से तुम क्यों परेशान हो रहे हो?"

विश्वामित्र बोले, "कुछ समय पहले मेरे कुछ शिष्य दूर देश की यात्रा से लौटे, उन्होंने बताया कि आर्यावर्त के सुदूर राज्यों में ऐसे नये ऋषि हैं जो अपने शिष्यों को नया पढ़ा रहे हैं, उनके कुछ ऐसे मंत्र और ऋचाएँ भी हैं, जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी थीं। तबसे मैं इसके बारे में सोच रहा हूँ और तुम्हारी राय जानना चाहता था।"

गृत्समद ऋषि बोले, "यह तो प्रकृति का नियम है, इस जगत में कुछ भी शाश्वत नहीं, फ़िर बदलाव से कैसा भय?"

विश्वामित्र ऋषि बोले, "लेकिन अगर भविष्य के हमारे ऋषि भूल जायेंगे कि हमारी संस्कृति और सभ्यता की नींव किस मूल दर्शन तथा किन विचारों पर खड़ी हुई थी, क्या वह भय की बात नहीं?"

गृत्समद ऋषि मुस्कराये बोले, "कैसे भूल जायेंगे? हमारे शिष्य, हमारे मंत्रों और ऋचाओं के केवल शब्द कंठस्थ नहीं करते, उनके हर सुर के नियम हैं, हर ध्वनि को याद किया जाता है। हमारे शिष्य और हमारी व्यवस्था इतनी सक्षम हैं कि हम अपने मंत्रों को सदियों के बाद भी इस तरह से दोहरा सकते हैं कि उनकी लाखों ध्वनियों में से एक ध्वनि भी नहीं बदलती। हमने पूर्वैतिहासिक आदिकाल के अपने पूर्वजों की उन ऋचाओं को भी सम्भाल कर संजोया है, जिनकी ध्वनियों के अर्थ भी आज कोई नहीं जानता या समझता। अगर हमने उस परम्परा को भी लुप्त नहीं होने दिया, तो फ़िर कैसा भय?"

विश्वामित्र ऋषि भी मुस्कराये, बोले, "मुझे हमारे शिष्यों की क्षमता कम होने का भय नहीं है, बल्कि आर्यावर्त के फैलने का और उस परिधी पर नये की उत्पत्ति की चिंता है, कि कल यही आर्यावर्त इतना बड़ा हो जायेगा कि उसके एक छोर के व्यक्ति, उसके दूसरी छोर के व्यक्ति को नहीं पहचानेंगे और उन्हें नये-पुराने का भेद नहीं मालूम होगा।"

गृत्समद ऋषि के माथे पर बल पड़ गये, बोले, "इसका क्या उपाय है?"

"मेरे विचार में इसका उपाय है कि हम लोग अपने प्रमुख ऋषियों को और आश्रमों के प्रतिनिधियों को एक जगह पर एकत्रित करें", विश्वामित्र ऋषि ने कहा, "और सर्वसम्मत राय से उन मंत्रों तथा ऋचाओं की सूची बनायें जो हमारे पूर्वजों की निधि हैं और भविष्य के लिए जिनकी रक्षा करना महत्वपृ्र्ण है। आजकल हमारे आश्रमों में शब्दों को लिपीबद्ध करने की नयी तकनीक बनी है, कुछ लोग इसे ब्राह्मी लिपी कहते हैं। हमारे जिन मंत्रों तथा ऋचाओं को सर्वसम्मति से स्वीकारा जायेगा, हम उन्हें लिपीबद्ध कर देंगे ताकि भविष्य में उनका निशान रहे। कालांतर में जब नये ऋषि, अपने ध्यान और अंतर्दृष्टि से अगर नये मंत्र और ऋचाओं का ज्ञान जोड़ेंगे, तो भविष्य में उनके लिए नये ग्रंथ बन सकते हैं लेकिन उससे पहले हम अपने पित्रों के पूर्व-ज्ञान को भी सम्भाल कर रखें।"

गृृत्समद ऋषि सोच कर बोले, "बात तो तुम ठीक कह रहे हो। मैंने कृष्णद्वैपायन नाम के एक ऋषि के बारे में सुना है जिन्होंने ब्राह्मी लिपि में कुछ मंत्र लिपिबद्ध किये हैं, हमारे प्राचीन मंत्रों को लिपीबद्ध करने का काम उनके आश्रम को सौंपा जा सकता है।"

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गृत्समद और विश्वामित्र आश्रम के ऋषियों की इस बातचीत के सात माह के बाद वह सभा आयोजित हुई जिसमें दूर-करीब के सभी आश्रमों के ऋषियों को आमंत्रित किया गया।

सभा में सबसे पहले उन मंत्रों और ऋचाओं पर विचार किया गया जो कि पित्रों की परम्परा से चले आ रहे थे। इन सभी १,९७६ मंत्रों को जो १९१ सूक्तों में विभाजित थे, इन्हें प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया। फ़िर सात प्राचीन आश्रमों के ऋषियों को अपनी-अपनी परम्परा के अन्य महत्वपूर्ण मंत्र और सूक्त बताने के लिए कहा गया। उन सबके योगदानों को विभिन्न मण्डलों में जोड़ा गया। गृत्समद ने दूसरे, गाथिन विश्वामित्र ने तीसरे, वामदेव गौतम ने चौथे, अत्रि ने पाँचवें, वासर्पत्य भारद्वाज ने छठे, वशिष्ठ ने सातवें, एवं अंगीरस व कण्व ने आठवें मण्डल के मंत्र दिये।

अंत में बाकी के ऋषियों से योगदान माँगा गया ताकि तब तक हुए विमर्श में अगर कोई महत्वपूर्ण मंत्र छूट गये थे तो उन्हें भी जोड़ा जा सके। 

सभा के अंत तक, ऋग्वेद तैयार था, जिसमें कुल १०,५७९ मंत्र जोड़े गये, जो १०२८ सूक्तों में विभाजित थे, पूरा ऋग्वेद दस मण्डलों में विभाजित था।

इस सारे विचार-विमर्श से जो मंत्र, सूक्त तथा ऋचाएँ चुनी गयीं थीं, कृष्णद्वैपायन ने अपने शिष्यों की सहायता से उन्हें लिपिबद्ध किया। इस तरह से ऋषियों के पहले ग्रंथ का संकलन पूरा हुआ जिसे ऋग्वेद संहिता का नाम दिया गया। इस महत्वपूर्ण कार्य में योगदान देने वाले ऋषि कृष्णद्वैपायन को वेद-व्यास का नाम मिला।

एक बार प्राचीन ज्ञान, कथाओं और परम्पराओं को लिपिबद्ध करने का काम शुरु हुआ तो वह फ़िर नहीं रुका।

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टिप्पणियाँ

१. यह काल्पनिक कहानी है, हमारे किसी ग्रंथ में ऐसा वर्णन नहीं है। मैंने बहुत वर्षों तक अंतर्राष्ट्रीय सभाओं की रिपोर्टें तैयार की हैं, ऋग्वेद के ढांचे को देख कर मुझे लगा कि वह भी किसी ऐसी ही सभा में हुए विमर्श का नतीजा लगता है। यह कथा इसी विचार का स्वरूप है।

२. इस कहानी को लिखने के लिए मैंने ऋग्वेद से जुड़े कुछ ग्रंथों को पढ़ा और उनसे जानकारी ली, जिनमें प्रमुख था "ऋग्वेद संहिता भाषाभाष्य", जिसके भाष्यकार पंडित जयदेवशर्मा थे, संशोधनकर्ता आचार्य भद्रसेन थे, प्रकाशक आर्य साहित्य मण्डल, अजमेर, २००८ विक्रम संवत (१९५२ ई.) द्वारा छपा ग्रंथ का तीसरा संस्करण था। इसके अनुसार "वेदों को अनादि काल का ईश्वरीय ज्ञान मानने वालों ऋषियों को वेदमंत्रों के कर्ता नहीं माना, प्रत्युत मंत्रों का दृष्टा स्वीकार किया है ... अग्नि, वायु और आदित्य, तपस्यायुक्त इन तीनों से ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद, यह तीनों प्रकट हुए, इसी का मनु ने अनुवाद किया है ... शांखायन स्रोत सूत्र में ऋग्वेद के प्रथम प्रवक्ता के रूप में अग्नि को स्वीकारा गया है ... इस संकल्प में अग्नि को उपदेष्टा, वायु को उपश्रोता और आदित्य को अनुख्याता स्वीकार किया है ... वैदिक साहित्य में 'ऋषि' शब्द का प्रयोग 'आचार्य' के अर्थ में किया जाता है, यानि इसका अर्थ 'विद्वान-गुरु' है"।

३. हिंदी लेखक और संस्कृत विद्वान डॉ. रांगेय राघव की पुस्तक "प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ" (सन् १९५९ में "किताब महल" द्वारा प्रकाशित) में दी गयी जानकारी के अनुसार - 

"मानव समूहों के अधिनायकों को मनु कहते थे और हर मनु के कार्यकाल को मन्वंतर कहते थे। प्रथम मनु, यानि स्वयंभू मनु का जन्म ब्रह्मा से हुआ। स्वयंभू से पहले ब्रह्मा ने नौ अन्य मानस पुत्रों को जन्म दिया, जो नौ-ब्रह्मा बने, उनके नाम थे - भृगु, पुलस्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वशिष्ठ। राजा उत्तम के पुत्र औतम तीसरे मनु बने थे, स्वरोचिष आठवें मनु थे, सावर्णि नवें मनु थे, ब्रह्मसावर्णि दसें मनु थे, आदि।

हर मन्वंतर में मनु के साथ एक इन्द्र और कुछ देवगण-गुट भी नियुक्त होते थे। इन्द्र की पदवी पाने के लिए यज्ञ और तपस्या आवश्यक होती थी। हर देवगण गुट में १०-१५ व्यक्ति होते थे, जोकि यज्ञयोगी होते थे। जैसे कि औतम मनु के समय सुशान्ति नाम के इन्द्र हुए और उनके साथ पाँच देवगण-गुट थे - स्वधामा, सत्य, शिव, पतर्दन, और वशवर्ती। जबकि रैवत मनु के मन्वंतर में चार देवगण-गुट थे - सुमेधा, भूपति, वेकुंठ और अमिताभ, और हर गुट में चौदह व्यक्ति थे।

हर मन्वंतर में सात ऋषि भी होते थे, जैसे कि औतम मनु के समय गुरु वष्शिठ के सात पुत्रों को सप्तऋषि की पदवी मिली थी।

समाज से दूर वन में रहने वालों में मुनि भी होते थे। यह विवाह नहीं करते थे और तपस्या, पूजा जैसे कामों में जीवन बिताते थे।"

उपरोक्त विवरण से लगता है कि प्राचीन काल में यज्ञों यानि अग्नि पूजा को बहुत महत्व दिया जाता था, और यज्ञ करने वाले को इन्द्र तथा देवगण जैसी पदवी मिलती थी। यानि इन्द्र व देवगण पुजारी होते थे, उनका काम यज्ञ करना था। जबकि ऋषि ज्ञानी व्यक्ति होते थे, वनों में रहते थे, उनका काम आश्रम में शिक्षा देने से जुड़ा था।

मनु, इन्द्र, देवगण, ऋषि, आदि की नियुक्ति एक मन्वंतर के अंतर्गत होती थी, यानि जब मनु बदलते थे तो उनके साथ इन सब अन्य पदों पर नये व्यक्ति नियुक्त होते थे।

जबकि मुनि ऋषियों से भिन्न थे, उनका काम अकेले रहना, तपस्या तथा यज्ञ करना आदि थे (शायद मुनि शब्द मौन से बना है?)। लेकिन नये मनु के साथ नये मुनियों की नियुक्ति नहीं होती थी, मुनि बनने का निर्णय व्यक्तिगत स्तर लिया जाता था।

दूसरी बाद समझ में आती है कि राजा और मनु के पद में अंतर था, और मनु का पद राजा से ऊँचा था। शायद मनु के आधीन बहुत से राजा आते थे, जैसे कि केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार? मनु की क्या ज़िम्मेदारी होती थी, यह बात इस किताब में दिये हुए विवरण से समझ नहीं आती।

तीसरी बात जो इससे समझ आती है, वह है कि मनु, इन्द्र, देवगण और ऋषि, इसी धरती के व्यक्ति होते थे, जिन्हें चुना जाता था या नियुक्त किया जाता था। इस किताब के विवरण में मनु बनने के लिए या इन्द्र बनने के लिए युद्ध करने या जीतने की कोई बात नहीं लिखी है। 

इसमें जिस तरह के प्रशासनिक आयोजन की बातें की गई हैं उनसे यह यायावर समूह का वर्णन नहीं लगता, बल्कि एक जगह पर स्थायी रहने वाला शहरी जनसमूह लगता है। यानि अगर आर्य लोग मध्य एशिया से यात्रा करके भारत में आये थे, तो जब ऋग्वेद लिपिवद्ध किया गया, तब तक यह लोग उनके वंशज थे जो पीढ़ियों से एक स्थान पर रहते थॆे, जहाँ इन्होंने राज्य और शहर बनाये थे।

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सोमवार, मार्च 18, 2024

हमारी भाषा कैसे बनी

कुछ दिन पहले मैंने भारत के जाने-माने डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा की १८५७ के लोक-गीतों पर बनी फ़िल्म के बारे में लिखा था। आज उन्हीं की एक अन्य फ़िल्म, "जिस तरह हम बोलते हैं" पर लिख रहा हूँ।

इस फ़िल्म को बनाने में उन्होंने हिंदी भाषा के विकास के प्रख्यात जानकार लोगों का सहयोग लिया, जिनमें प्रो. नामवर सिंह का नाम सबसे पहले आता है, वह इस फ़िल्म के सूत्रधार थे। अन्य विद्वान जिन्होंने फ़िल्म में सहयोग दिया उनमें प्रमुख नाम हैं वाराणसी के प्रो. जुगल किशोर मिश्र तथा प्रो. शुकदेव सिंह, उज्जैन के डॉ. कमलदत्त त्रिपाठी और दिल्ली विश्वविद्यलय के प्रो. अजय तिवारी

नीचे फ़िल्म के पहले वीडियो क्लिप में प्रो. नामवर सिंह

फ़िल्म में संस्कृत से पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के रास्ते से हो कर आज की भाषाओं और बोलियों के विकास की गाथा चित्रित की गई थी। यह फ़िल्म २००४-०५ के आसपास दूरदर्शन इंटरनेशनल चैनल पर तथा अमरीका में विश्व हिंदी दिवस समारोह में दिखायी गई थी।

जब मैंने यह फ़िल्म पहली बार देखी थी तो मुझे लगा था कि इसमें हमारी भाषाओं और बोलियों के बारे में बहुत सी दिलचस्प जानकारी है, और इस फ़िल्म को जितना महत्व मिलना चाहिये था, वह नहीं मिला था। इसलिए नवम्बर २०२२ में मैंने इसे अरुण के साथ दोबारा देखा और उससे फ़िल्म में दिखायी बातों पर लम्बी बातचीत को रिकॉर्ड किया। कई महीनों से इसके बारे में लिखने की सोच रहा था, आखिरकार यह काम कर ही दिया।

फ़िल्म में दी गई कुछ जानकारी मुझे गूढ़ तथा कठिन लगी। चूँकि फ़िल्म में सबटाईटल नहीं हैं, हो सकता है कि कुछ बातें मुझे ठीक से समझ नहीं आयी हों, इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा मांगता हूँ। मेरे विचार में दूरदर्शन को इस फ़िल्म को इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध कराना चाहिये।

"जिस तरह हम बोलते हैं" - फ़िल्म के बारे में निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा से बातचीत

अरुण चढ़्ढ़ा: "हम लोग स्कूल में पढ़ते थे कि भारत की बहुत सी भाषाएँ हैं, हर प्रदेश की अपनी भाषा है, और हर भाषा की बहुत सी बोलियाँ हैं। कहते हैं कि यात्रा करो तो हर दो कोस पर बोली बदल जाती है। इसी बात से मैं सोच रहा था कि हिंदी कैसे विकसित हुई, और हिंदी से जुड़ी कौन सी प्रमुख बोलियाँ हैं, उनके आपस में क्या सम्बंध हैं, उनके संस्कृत से क्या सम्बंध हैं। एक बार इसके बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि जिसे हम एक भाषा कहते हैं, उसमें कई तरह के भेद हैं। जैसे कि संस्कृत भी दो प्रमुख तरह की है, वैदिक संस्कृत तथा लौकिक संस्कृत। तो मेरे मन में आया कि हमारी भाषाओं के विकास में यह सब अंतर कैसे आये और क्यों आये? (नीचे तस्वीर में फ़िल्म-निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा)

हमारी हिंदी की जड़े कम से कम चार हज़ार वर्ष पुरानी हैं और आज की भाषा उस प्राचीन भाषा से बहुत भिन्न है, उनमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। अगर कोई भाषा जीवित है तो वह समय के साथ बदलेगी। लोग कहते हैं कि हमारी भाषा में मिलावट हो रही है, भाषा की शुचिता को बचा कर रखना चाहिये, लेकिन अगर भाषा जीवित है तो उसका बदलते रहना ही उसका जीवन है। जयशंकर प्रसाद, मैथिलीचरण गुप्त और निराला जैसे साहित्यकारों ने, हर एक ने अपने साहित्य में अपने समय की भाषा का उपयोग किया है। 

यही सब सोच कर मुझे लगा कि इस विषय पर फ़िल्म बनानी चाहिये कि प्राचीन समय से ले कर हमारी भाषा कैसे विकसित हुई, कैसे कालांतर में उससे अन्य भाषाएँ और बोलियाँ बनी। सबसे पहले मैंने इसके बारे में नेहरु संग्रहालय के एक लायब्रेरियन से बात की, फ़िर उनके सुझाव पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में बात की, वहाँ प्रोफेसर सब्यसांची ने सलाह दी, इस तरह से इस विषय पर सामग्री एकत्रित करनी शुरु की। तब प्रो. नामवर सिंह से बात हुई, जानकारी देने के साथ-साथ उन्होंने इस फ़िल्म का सूत्रधार बनना स्वीकार कर लिया। फ़िर, उज्जैन की संस्कृत एकादमी के निदेशक के. एम. त्रिपाठी साहब मिले, वाराणसी संस्कृत विद्यापीठ के प्रो. जुगल किशोर मिश्रा और अन्य बहुत से लोग इस काम में साथ चले, उन सबके सहयोग के बिना इस फ़िल्म को नहीं बना सकता था। (नीचे फ़िल्म के वीडियो-क्लिप में प्रो. युगलकिशोर मिश्रा लौकिक संस्कृत से प्राकृत के बारे में बताते हैं)

चूँकि भाषा लिखने, पढ़ने और बोलने का माध्यम है, यह दुविधा थी कि उस पर फ़िल्म कैसे बनाई जाये। मुझे लगा कि फ़िल्म के माध्यम से हम यह दिखा सकते हैं कि बोली हुई भाषा के उच्चारण कैसे होते हैं। जैसे कि उज्जैन में त्रिपाठी साहब को प्राकृत भाषा के उच्चारण की जो जानकारी थी वह अपने आप में अनूठी थी। वाराणसी में प्रो. मिश्र थे जिनके विद्यार्थयों का संस्कृत थियेटर का दल था, उन लोगों ने संस्कृत नाटकों के मंचन से फ़िल्म में सहयोग दिया था।

इस फ़िल्म की सारी रिकॉर्डिन्ग लोकेशन पर ही की गई, मैं इसकी डबिन्ग नहीं चाहता था। खुली जगहों में, भीड़ में, कैसे लाइव रिकॉर्डिन्ग की जाये, यह हमारी चुनौती थी। यह फ़िल्म बीस-बीस मिनट के पाँच भागों में प्रसारित की गई थी, बाद में उन्हें जोड़ कर मैंने एक घंटे की फ़िल्म भी बनाई थी। (टिप्पणी सुनील - इस आलेख के लिए मैंने वह एक घंटे वाली फ़िल्म देखी थी)

वैदिक तथा लौकिक संस्कृत और उसकी व्याकरण

फ़िल्म का प्रारम्भ जयशंकर प्रसाद की "कामायनी" की एक कविता से होता है। फ़िर नामवर सिंह बताते हैं कि "ऋग्वेद की पहली ऋचा वाक-सूक्त है, जिसमें वाक् यानि भाषा की महिमा गाई गई है। हडप्पा में मूर्तियाँ, चित्र, भवन, सब कुछ मिलते हैं लेकिन अभी तक उनकी लिपी नहीं पढ़ी जा सकी। इस तरह से हम उनकी सभ्यता के बारे में बहुत कुछ जानते हैं लेकिन उनके साहित्य के बारे में कुछ नहीं जानते। किसी भी समाज, संस्कृति, सभ्यता की, बिना उसकी भाषा जाने, उसकी पहचान पूरी नहीं होती।"

वैदिक संस्कृत दो हज़ार वर्ष पहले जैसी बोली जाती थी, आज भी वैसी ही बोली और लिखी जाती है, इसके शब्दों को आगे-पीछे नहीं कर सकते। फ़िल्म में वैदिक संस्कृत के मंत्रो के उच्चारण को छाऊ नृत्य के साथ दिखाया गया है।

लेकिन विभिन्न वेदों में मंत्रों के उच्चारण और ताल में अंतर आ जाता है। जैसे कि हिरण्यगर्भ समवर्ताग्रह ऋचा है जो तीन वेद ग्रंथों (ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद) में मिलती है, इसके शब्द नहीं बदल सकते, लेकिन हर वेद के साथ उसका उच्चारण और ताल बदल जाते हैं। यह इस लिए होता है क्योंकि यह स्वाराघात-युक्त भाषा है, इसमें सात स्वरों का समावेश है, इसलिए उनका उच्चारण भी सप्त स्वर-नियमों के अनुसार होता है। यह सप्त सुर सामवेद में स्फटित रूप में मिलते हैं, जबकि ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद में यह सात सुर तीन स्वरों (उदात्त, अनुदात्त और छड़िज) में समाहित हो जाते हैं। उदात्त में निशाद और गंधार मिल जाते हैं, अनुदात्त में ऋषभ और भैवत, और छड़िज में षड़ज, मध्यम और पंचम मिल जाते हैं। इस वजह से हर वेद की उच्चारण शैली में अंतर होता है।

वेद ग्रंथ वैदिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जबकि रामायण और भगवद्गीता जैसे ग्रंथ लौकिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जिनकी भाषा में समय के साथ बदलाव हो सकता है। पाणिनी व कात्यायन जैसे आचार्यों ने व्याकरण के नियमों की व्याख्या करके संस्कृत को व्यवस्था दी, उन्हीं नियमों का प्रयोग हिंदी जैसी भाषाएँ भी करती हैं।

फ़िल्म में बताया गया है कि, "पाणिनी की व्याकरण संस्कृत ही नहीं, किसी भी भाषा की पहली व्याकरण थी, जिसे उन्होंने १४०० सूत्रों में लिखा था। कहते हैं कि शिव जी ने चौदह बार डमरू बजाया, उस डमरू पर १४ स्वरों वाले "अइउड़ सूत्र" से संस्कृत की उत्पत्ति हुई, उन्हीं सूत्रों पर ही पाणिनी ने अष्टाध्यायी व्याकरण लिखी। उन्होंने संस्कृत की मुख्य धातुओं को निश्चित किया, जिनमें उत्सर्ग, प्रत्येय आदि जोड़ कर भाषा के शब्द बनाते हैं।"

फ़िल्म में लौकिक संस्कृत के उदाहरण कालीदास के नाटक के माध्यम से दिखाये गये हैं। उज्जैन के त्रिपाठी जी बताते हैं कि महाकवि कालीदास के समय में लौकिक संस्कृत संचार की भाषा थी और उसकी प्रवृति धीरे-धीरे प्राकृत भाषा में मुखरित हो रही थी, क्योंकि आम व्यक्ति जब उसे बोलते थे तो उनकी बोली में उच्चारण और व्याकरण का सरलीकरण हो जाता था। (नीचे फ़िल्म से वीडियो-क्लिप में डॉ. कमलेश दत्त त्रिवेदी)


 संस्कृत की परम्परा दक्षिण भारत में भी रही है। जैसे कि केरल के मन्दिरों में संरक्षित संगीत तथा नाट्य पद्धिति कुड़ीयट्टम का इतिहास दो हज़ार वर्ष पुराना है। करीब तीन सौ साल पहले इसका कथ्थकली स्वरूप विकसित हुआ है। इन पद्धतियों में वैदिक गान को तीन स्वरों (उदात्त, अनुदत्त और छड़िज) में ही गाते हैं, लेकिन कुड़ीयट्टम शैली में उनमें भावों को भी जोड़ देते हैं।

प्राकृत भाषा

ईसा से करीब छह सौ साल पहले, प्राकृत भाषाएँ लौकिक संस्कृत के सरलीकरण से बनने लगीं। समय के साथ प्राकृत के कई रुप बदले, इसलिए प्राकृत कई भाषाएँ थीं। सरलीकरण से संस्कृत के तीन वचन से दो वचन हो गये, कुछ स्वर जैसे ऋ, क्ष, आदि प्राकृत में नहीं मिलते थे। भगवान बुद्ध ने जिस प्राकृत भाषा में अपनी बात कही उसे "पालि" कहते हैं। जैन तीर्थांकर महावीर और सम्राट अशोक ने भी प्राकृत में ही अपने संदेश दिये। समय के साथ इनसे अपभ्रंश तथा आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ।

भारत के नाट्यशास्त्र में ४२ तरह की भाषाओं की बात की गई है, जबकि कोवल्य वाक्यमाला ग्रंथ में १८ तरह की प्राकृत की बात की गई है, जिनमें तीन प्रमुख मानी जाती थीं - मगधी, महाराष्ट्री और शौरसैनी। महाकवि कालीदास ने तीनों प्राकृत भाषाओं का अपने नाटकों में सुन्दर उपयोग किया था। जैसे कि उनके रचे एक नाटक में एक पात्र लौकिक संस्कृत बोलता है, गद्य में बोलने वाले पात्र शौरसैनी बोलते हैं और इसके गीत महाराष्ट्री में हैं। 

अपभ्रंश, औघड़ी, अवधी, ब्रज, हिन्दवी, खड़ी बोली ...

संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से औघड़, इस तरह से शताब्दियों के साथ भाषाएँ बदलती रहीं। महाकवि कालीदास ने विक्रमवेशी में अपभ्रंश का उपयोग भी किया और पतांजलि ने अपना महाभाष्य अपभ्रंश में लिखा।

अपभ्रंश से पश्चिम में गुजरात तथा राजस्थान में पुरानी हिंदी और ब्रज भाषाएँ निकलीं जिनका वीर रस की रचनाओं के सृजन में प्रयोग किया गया। दलपत राय ने खुमान रासो, चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो, आदि ने अपनी रचनाओ के लिए इन्हीं भाषाओं का उपयोग किया। राजस्थान में इन रचनाओं को डिन्गल तथा पिन्गल भाषाओं में गाने की परम्पराएँ बनी। डिन्गल भाषा में शक्ति, ओज, और उत्साह अधिक होता है, जबकि पिन्गल में अधिक कोमलता है, वह ब्रज भाषा के अधिक करीब है। डिन्गल भाषा में युद्ध से पहले राजा और योद्धाओ को उत्साहित करने के लिए गाते थे। (नीचे वीडियो में श्री शक्तिदान कवि डिन्गल और पिन्गल के बेद के बारे में बताते हैं)

मैथिल कवि विद्यापति ने अवहट भाषा में लिखा, जैसे कि - "कुसमित कानन कुंज वसि, नयनक काजर घोरि मसि। नखसौ लिखल नलिनि दल पात, लिखि पठाओल आखर सात।" (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. शुकदेव सिंह विद्यापति की अवहट के बारे में)



बाहरवीं-तेहरवीं शताब्दी में हिंदी का स्वरूप सामने आने लगा। निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो ने बहुत सी रचनाएँ इसी हिन्दवी भाषा में लिखीं, जैसे कि उनका यह गीत, "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके, प्रेम भटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके। गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ, बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके", बहुत प्रसिद्ध हुआ। खुसरो ने एक नया प्रयोग भी किया जिसे "दो सुखने" कहते हैं, कविताएँ जिनका एक हिस्सा फारसी में था और दूसरा हिंदी में।

मौलाना दाउद ने अवधी भाषा में "चांदायन" महाकाव्य की रचना की जिसमें उन्होंने चौपाई और दोहों को लिखा, यह ग्रंथ तुलसीदास के मानस से करीब दो-ढाई सौ साल पहले था। उन्होंने जिस तरह से चांदायन में रूप और प्रेम की पीड़ा का वर्णन किया, वह अनोखा था। इस तरह से हिंदी में सूफी काव्यधारा की परम्परा का प्रारम्भ हुआ।

अवधी लेखन की परम्परा में आगे चल कर मालिक मुहम्मद जायसी ने "पद्मावत" को रचा। अवधी भाषा का क्षेत्र बहुत बड़ा था और उसमें एक जगह से दूसरी जगह में कुछ अंतर थे। जायसी की अवधी, जौनपुर और सुल्तानपुर की अवधी थी, वह बहुत लोकप्रिय हुई लेकिन सबसे समझी नहीं गई।

तुलसीदास जी बहुत घूमे थे, उन्होंने अपनी अवधी को अखिल भारतीय रूप दिया, अपनी बात को सरल भाषा में कहा जिसे आम लोग, हलवाई, हज्जाम भी बोलते-समझते थे। उनके काव्य में इतनी उक्तियाँ हैं जिन्हें गाँव के अनपढ़ लोग भी याद रखते हैं और आम जीवन में बोलते हैं। (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. अजय तिवारी जायसी और तुलसीदास की अवधी के बारे में बताते हैं)




१४वीं - १७वीं शताब्दियों में "खड़ी बोली" सामने आई। कबीर जैसे संत-कवियों ने खड़ी बोली में अंधविश्वास, कर्मकाँड, छूआ-छूत के विरुद्ध कविताएँ गाईं, जो आज तक लोकप्रिय हैं।
 
हिंदी का सारा साहित्य ब्रज भाषा और अवधी में लिखा गया। जो मिठास ब्रज भाषा में मिलती है, वह अवधी में नहीं है। इस मिठास का सारा श्रेय महाकवि सूरदास को जाता है जिन्होंने ब्रज भाषा में लिखा, उसे विकसित किया और लोकप्रिय बनाया।
 
अठाहरवीं शताब्दी में हैदराबाद में ख्वाज़ा बंदानवाज़ ने मिली-जुली भाषा की बुनियाद रखी जिसमें हिंदी, उर्दू और फारसी मिली-जुली थीं। इसकी लिपी हिंदी थी और यह दखिनी हिंदी या दखिनी उर्दू कहलाती है।
 
१८७३ में भारतेन्दू हरीशचन्द्र ने ऐसी कविताएँ लिखीं जिनसे हिंदी नयी चाल में ढली। उनकी कविताएँ ब्रज भाषा में थीं, लेकिन उन्होंने अपना सारा गद्य-लेखन और नाटक खड़ी-बोली में लिखे। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में देवकीनन्दन खत्री, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, यशवंत, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा जैसे लेखकों ने भारत के विभिन्न वर्गों, स्तरों, क्षेत्रों, समाजों से, स्थानीय शब्दों को ले कर अपनी लेखनी से जोड़ा जिससे खड़ी-बोली समृद्ध हुई और हिंदी का विकास व विस्तार हुआ।

निराला ने एक ओर जटिल विचारों की अभिव्यक्ति, "नव गति, नव लय, ताल छंद नव, नवल कंठ नव जलद मंद्र रव। नव नभ के नव विहग वृंद को नव पर नव स्वर दे" जैसे शब्दों में की, जबकि "जीवन संग्राम" जैसी कविता में उसी निराला ने सामान्य बोलचाल की भाषा का उपयोग किया। 

पिछले पचास वर्षों में हिंदी तेज़ी से बदली है। सामाजिक गतिशीलता, आर्थिक बदलावों, बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों तथा प्रवासी संस्कृति का प्रभाव हमारी भाषा पर दिखता है। मीडिया ने इसे फैलाने में मदद की है। यह वह हिंदी है जिसमें अंग्रेज़ी, उर्दू आदि के साथ, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के शब्द भी मिल रहे हैं।

अंत में

इस आलेख में हिंदी और उत्तर भारत की भाषाओं के बारे में जो जानकारी है, वह भाषा और इतिहास पढ़ने वालों के लिए नयी नहीं होगी, लेकिन मेरे लिए नयी थी। आज एक ओर भाषा की शुद्धता को बचाने और उसे संस्कृत से जोड़ने की कोशिशें हैं, और दूसरी ओर, उसके सरलीकरण तथा उसमें अन्य भाषाओ से शब्दों को जोड़ने का क्रम भी है।
 
सौ साल बाद हिंदी होगी या नहीं, और होगी तो कैसी होगी? कत्रिम बुद्धि का जिस तरह से विकास हो रहा है उससे भाषाओं की विविधता बनी रहेगी या लुप्त हो जायेगी? इन प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं हैं, लेकिन पिछले दो-तीन हज़ार वर्षों का इतिहास यही सिखाता है कि समय के साथ बदले बिना भाषा जीवित नहीं रह पाती।

***

मंगलवार, मार्च 05, 2024

१८५७ एवं भारत के लोकगीत

अगर लोकगीतों की बात करें तो अक्सर लोग सोचते हैं कि हम मनोरंजन तथा संस्कृति की बात कर रहे हैं। लेकिन भारतीय समाज में लोकगीतों का ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जब तक भारत के अधिकांश लोग अनपढ़ थे, तब तक लोकगीतों के माध्यम से ही धर्म और इतिहास की बातें जनसाधारण तक पहुँचती थीं। पिछले कुछ दशकों में, नई तकनीकी व नये संचार माध्यमों के साथ-साथ साक्षरता भी बढ़ी है, इसलिए लोकगीतों के महत्व में बदलाव आया है।

इस आलेख में उत्तरी भारत की लुप्त होती हुई लोक-गीत परम्परा की कुछ चर्चा है, विषेशकर १८५७ के अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध हुए विद्रोह-युद्ध से जुड़े हुए लोकगीतों की बातें हैं।

यह आलेख राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध फिल्मकार अरुण चढ़्ढ़ा की सन् १९९७ की फिल्म "१८५७ के लोकगीत" पर आधारित है। अरुण ने इस फिल्म को भारत की स्वतंत्रता की पच्चासवीं वर्षगांठ के संदर्भ में बनाया था। इस फिल्म की अधिकतर शूटिन्ग राजस्थान, उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश के बुंदेलखंडी क्षेत्रों तथा बिहार में की गई थी और इसे दूरदर्शन पर दिखाया गया था। 

इस फिल्म को बनाने में बुंदेलखंडी लोक संस्कृति के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त (१९३१-२००३) और राजस्थानी लोगसंगीत के विशेषज्ञ पद्मश्री कोमल कोठारी (१९२९-२००४) ने विषेश योगदान दिया था - नीचे के इस पहले वीडियो में कोमल कोठारी जी फिल्म के महत्व के बारे में बताते हैं:

यह लोकगीत खड़ी बोली, राजस्थानी, बुंदेलखंडी, मगही, भोजपुरी, उर्दू तथा अन्य स्थानीय भाषाओं में गाये जाते थे। इस तरह की कुछ कविताएँ और १८५७ के लोकगीतों से सम्बंधित अन्य जानकारी, आप को डॉ. सुरेन्द्र सिंह पोखरण की वैबसाईट "क्रांति १८५७", सुनील कुमार यादव का आलेख,  समालोचन पर मैनेजर पाण्डेय का आलेख, डॉ. महिपाल सिंह राठौड़ का आलेख, आदि में भी मिल सकती है।

मेरा यह आलेख उपरोक्त आलेखों से थोड़ा सा भिन्न है क्योंकि इसमें आप अरुण चढ़्ढ़ा की फिल्म से ऐसे ही कुछ गीतों के अंशों को सुन भी सकते हैं और पुराने लोकगीतों की भाषा का अनुभव कर सकते हैं। (इसके अतिरिक्त अरुण की एक अन्य फ़िल्म है जिसमें उन्होंने संस्कृत, प्राकृत, हिंदी और अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं की बात की थी, आप उसके बारे में भी पढ़ सकते हैं )

फिल्मकार अरुण चढ़्ढ़ा से बातचीत

नवम्बर २०२२ में मैंने यह फिल्म देखी और अरुण से इसके बारे में जानकारी पूछी थी (नीचे तस्वीर में २०१२ में भारत के उपराष्ट्रपति से फिल्मकार श्री अरुण चढ़्ढ़ा को राष्ट्र पुरस्कार)।

अरुण चढ़्ढ़ा: "उत्तरी भारत में लोकगीत गाने की विभिन्न परम्पराएँ हैं, जिनमें १८५७ के समय पर गाये जाने वाले कुछ गीत आज से कुछ दशक पहले तक सुनने को मिल जाते थे। लेकिन तब भी गाँवों में रेडियो-टीवी-सिनेमा के आने से धीरे-धीरे लोकगायकी के मौके कम होने लगे थे और इनके गायक दूसरे काम खोजने लगे थे। मुझे लगा कि उनकी विभिन्न गायन शैलियों की जानकारी को सिनेमा के माध्यम से बचा कर रखना महत्वपूर्ण है। 

हमने एक बार खोज करनी शुरु की तो बहुत सी जानकारी मिली। जैसे कि बिहार में जगदीशपुर नाम की जगह पर राजा कुँवर सिंह थे, उनकी अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बहुत से गीत सुनने को मिले थे। हम लोग उनके गाँव में उनके परिवार के घर पर गये, वहाँ उनके पड़पोते ने अपने पूर्वज कुँवर सिंह की गाथा से जुड़े बहुत से गीतों को एक किताब में जमा किया था।

जैसा कि लोकगीतों में अक्सर होता है, यह कहना कठिन है कि इन लोकगीतों को कब लिखा गया और इन्हें किसने लिखा। अंग्रेज़ों को यह समझ नहीं आये कि इन गीतों में स्वतंत्रता तथा क्रांति की बाते हैं, उसके लिए भी तरीके खोजे गये, जैसे कि इन्हें फाग शैली में होली के समय गाना या बीच में "हर हर बम" जैसी पंक्ति जोड़ देना ताकि सुनने वाले को लगे कि यह शिव जी का भजन है।

मेरी फिल्म में पाराम्परिक लोकगायकों तथा उनके पाराम्परिक वाद्यों को देखा जा सकता है, जोकि धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं, क्योंकि अब वाद्य बनाने वाले और बजाने वाले, दोनों के पास आजकल टीवी और सिनेमा आदि की वजह से काम कम है। दिल्ली हाट और सूरजकुंड मेला जैसी जगहों से उन्हें कुछ काम मिल जाता है लेकिन जब उनके लोक संगीत का आज के जीवित लोक-जीवन से सम्पर्क टूट जाता है, तब उनके पुराने गीतों के शब्द भी खोने लगते हैं, क्योंकि यह गीत मौखिक याद किये जाते हैं, किसी कॉपी-किताब में नहीं लिखे जाते।"

फिल्म में राजस्थान के लोकगीत

फिल्म का पहला भाग राजस्थान के लोकगीतों पर केन्द्रित है। इस भाग में राजस्थान के प्रसिद्ध लोकसंगीत विशेषज्ञ पद्मभूषण-सम्मानित, श्री कोमल कोठारी (१९२९-२००४) ने सूत्रधार के रूप में इन लोकगीतों का परिचय दिया था। शास्त्रीय संगीत की तरह लोकगीतों की गायकी के भी विशिष्ठ शैलियाँ होती हैं और हर शैली के लिए सही लोक-गायक खोजना कठिन था, इस काम में श्री कमल कोठारी का योगदान बहुत महत्वपूर्ण था।

१८५७ में अंग्रेज़ों से विद्रोह करने वालों में राजस्थान के पाली जिले के आउवा गाँव के शासक ठाकुर कुशाल सिंह भी थे। उन्होंने सितम्बर १८५७ में दो बार अंग्रेज़ी फौज को हराया। जनवरी १८५८ में जब अंग्रेज़ों ने तीसरा हमला किया तब अपनी पराजय होती देख कर कुशाल सिंह अपने राज्य को अपने छोटे भाई को दे कर आउवा से चले गये। आउवा गाँव भिलवाड़ा और जोधपुर के बीच में पड़ता है।  फिल्म में दिखाये गये आउवा के गीत की कुछ शूटिन्ग आउवा गाँव में ठाकुर कुशाल सिंह की हवेली में की गई थी।

इस आउवा विद्रोह से जुड़े कई गीत अरुण की फिल्म के पहले भाग में मिलते हैं। इसी क्षेत्र में १८०८ में अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक ठाकुर का एक अन्य विद्रोह हो चुका था, कुछ गीतों में उस पहले विद्रोह का ज़िक्र भी है।

फिल्म में आउवा के बारे में एक फाग-गीत है जिसे लंगा घुम्मकड़ जाति के लोकगायकों ने लंगा शैली में गाया है (फाग केवल पुरुष गाते हैं लेकिन घुम्मकड़ जातियों में इन्हें औरतें भी गाती हैं।) यह गीत फरवरी-मार्च यानि फल्गुन के महीने में गाते हैं। नीचे के वीडियो में इस फिल्म से लंगा गायकी का छोटा सा नमूना प्रस्तुत है।


राजस्थान की पड़-गायकी में दो गायक बारी-बारी से प्रश्नोत्तर के अंदाज़ में गाते हैं और इनके पराम्परिक वाद्य को रावणहत्था कहते हैं (यानि उनके अनुसार यह वाद्य रावण के कटे हुए हाथ से बना है और रामायण काल से चला आ रहा है)। आजकल इस तरह के पाराम्परिक वाद्यों को बनाने तथा बजाने वाले दोनों कठिनाई से मिलते है। नीचे के वीडियो में पड़-गायकी का छोटा सा नमूना जिसे घुम्मकड़ जाति के गायक गा रहे हैं, इस गीत में किसी अंग्रेज़ छावनी पर हमले की बात है। इस वीडियो में आप रावणहत्था वाद्य को भी सुन सकते हैं।

१८५७ से जुड़े  कुछ लोकगीत राजस्थान की पाराम्परिक डिन्गल तथा पिन्गल शैली में थे, जिन्हें बाँकेदास जी और सूर्य बनवाले जैसे चारण कवियों ने लिखा था और इस फिल्म में डॉ. शक्तिदान कविया ने गाया था। डिन्गल भाषा व गायन शैली पश्चिमी राजस्थान में प्रचलित थी जबकि पिन्गल शैली पूर्वी राजस्थान में थी। नीचे वीडियो में शक्तिदान कविया की डिन्गल गायकी का छोटा सा नमूना है।

ऐसी ही एक अन्य शैली भरतपुर क्षेत्र में भी प्रचलित थी जिसमें चारण कवियों द्वारा लिखे फगुवा गीत होली के मौके पर गाये जाते थे। इन सभी गीतों और गाथाओं में कविताएँ और दोहों का प्रयोग होता है।

बुंदेलखंड और बिहार के लोकगीत

अरुण की फिल्म का दूसरा भाग अधिकतर बुंदेलखंड तथा बिहार में केन्द्रित है। इन गीतों में एक प्रमुख नाम था कुँवर सिंह का। इस फिल्म का कुँवर सिंह से जुड़ा एक हिस्सा बिहार में उनके गाँव जगदीशपुर में उनके घर में भी शूट किया गया था, जहाँ आज उनके वंशज रहते हैं।

बुंदेलखंड वाला हिस्सा झाँसी, टीकमगढ़, छत्तरपुर, बाँदा आदि क्षेत्रों में था लेकिन कानपुर तक जाता था। टीकमगढ़ में इस फिल्म में प्रसिद्ध ध्रुपद गायिका पद्मश्री असगरी बाई (१९१८-२००६), जो अपने समय में ओरछा की राजगायिका रह चुकी थीं, ने भी हिस्सा लिया था। फिल्म में वह लेद शैली में गाती हैं, लेद शैली की खासियत थी कि इसे शास्त्रीय तथा लोकगीत दोनों तरीकों से गा सकते हैं, जिसे वह जानती थीं। नीचे वाले वीडियो में इस फिल्म से सुश्री असगरी बाई की गायकी का छोटा सा नमूना।

इन लोकगीतों में १९४२ के बुंदेला विद्रोह से ले कर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की कहानियाँ थीं।

मराठा राज्य के बाद जब बुंदेलखंड पर अंग्रेज़ों का राज हुआ तो उन्होंने राजस्व कर को बढ़ा दिया। १९३६ के बुढ़वा मंगल मेले में विद्रोह की बात शुरु हुई जिसमें जैतपुर के राजा परिछत (पारिछित या परीक्षित) द्वारा सागर की अंग्रेज़ छावनी पर हमला करने का निर्णय लिया गया था, जिसे बुंदेला विद्रोह के नाम से जाना जाता है। इन लोकगीतों में उसी छावनी पर हमले की बात की गई है।

इन गीतों में हरबोलों द्वारा गाया राजा परिछित द्वारा छावनी पर हमले के गीत भी हैं जिनमें हर पंक्ति के बाद "हर हर बम" जोड दिया जाता है। बुंदेलखंड में लोकगीत गायकों ने यह "हर हर बम" जोड़ने का तरीका अपनाया था जिसकी वजह से लोग उन्हें "बुंदेली हरबोले" के नाम से जानने लगे थे। सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता "बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी", इन्हीं लोकगायकों की बात करती थी।

राजा परिछित की कहानी पर अरुण की फिल्म में एक गीत राजस्थानी पड़-गायकी से मिलती-जुलती बुंदेलखंड की सैर-गायकी शैली में भी है जिसमें दो लोग मिल कर गाते हैं। इस लोकगीत के लिए गायकों की खोज बहुत कठिन थी क्योंकि काम न होने से वे गायक अन्य कामों में लग गये थे। आखिरकार, एक गाँव से एक रंगरेज मिले थे, जिनके परिवार में यह गायकी होती थी जिसे वह भूले नहीं थे और वह इसे गाने के लिए तैयार हो गये थे। आज सैर-गायकी के गायक खोजना और भी कठिन होगा।

फिल्म में मूंज, लेघ, आदि शैलियों में भी लोकगीत हैं, शायद स्थानीय लोग इनकी बारीकियों को समझ सकते हैं। जैसे कि एक गीत में मसोबा की आल्हा शैली में रानी लक्ष्मीबाई के बारे में गाया गया है। 

अंत में

अरुण की इस फिल्म के दोनों भागों में उत्तर भारत की लोकगीत-शैलियों के इतने सारे नमूने मिलते हैं कि उनकी विविधता पर अचरज होता है, लेकिन सोचूँ तो लगता है कि यह फिल्म भारत के कुछ छोटे से हिस्सों की परम्पराओं को ही दिखाती हैं, बाकी भारत में जाने कितनी अन्य शैलियाँ थीं, जो लुप्त हो गईं या लुप्त हो रहीं होंगी। शायद सहपीडिया जैसी कोई संस्थाएँ हमारी इस सांस्कृतिक धरोहर को भविष्य के लिए संभाल कर रख रही हों, लेकिन वह संभाल भी संग्रहालय जैसी होगी, वे जीते-जागते लोक-जीवन और लोक-संस्कृति का हिस्सा नहीं होगीं।

नीचे के आखिरी वीडियो में कुँवर सिंह के बारे में एक भोजपुरी गीत का छोटा सा अंश है, जो मुझे बहुत अच्छा लगता है।


आज इंटरनेट पर नर्मदा प्रसाद गुप्त, कोमल कोठारी, शक्तिदान कविया, असगरी बाई जैसे लोगों की कोई रिकोर्डिन्ग नहीं उपलब्ध, कम से कम उस दृष्टि से अरुण की फिल्म में उनका कुछ परिचय मिलता है। मेरे विचार में ऐसी फिल्मों में भारत की सांस्कृतिक धरोहर का इतिहास है इसलिए दूरदर्शन को ऐसी फिल्मों को इंटरनेट पर उपलब्ध करना चाहिये।

इसके अतिरिक्त अरुण की एक अन्य फ़िल्म है जिसमें संस्कृत, पालि, पाकृत, हिंदी, और उत्तर भारतीय भाषओ-बोलियों के जन्म की बात की गई है, आप उसके बारे में भी इसी ब्लॉग में एक अन्य आलेख में पढ़ सकते हैं - जिस तरह हम बोलते हैं (इसमें भी फ़िल्म के कुछ वीडियो-क्लिप देख भी सकते हैं)।

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गुरुवार, सितंबर 21, 2023

रहस्यमयी एत्रुस्की सभ्यता

ईसा से करीब आठ सौ वर्ष पहले, इटली के मध्य भाग में, रोम के उत्तर-पश्चिम में, बाहर कहीं से आ कर एक भिन्न सभ्यता के लोग वहाँ बस गये जिन्हें एत्रुस्की (Etruscans) के नाम से जाना जाता है। इनकी सभ्यता से जुड़ी बहुत सी बातें, जैसे कि इनकी भाषा, अभी तक पूरी नहीं समझीं गयी हैं। 

उस समय दक्षिण इटली में ग्रीस से आये यवनों का राज था। एत्रुस्की भी लिखने के लिए यवनी वर्णमाला का प्रयोग करते थे, लेकिन उनकी भाषा, धर्म, आदि बाकी यवनों तथा इटली वालों से भिन्न थे। ईसा से करीब सौ/डेढ़ सौ साल पहले जब रोमन सम्राज्य का उदय हुआ तो एत्रुस्की उनसे युद्ध हार गये और धीरे-धीरे उनकी सभ्यता रोमन सभ्यता में घुलमिल कर लुप्त हो गयी।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

एत्रुस्कियों के इटली में बारह राज्य थे, हर एक का अपना शासक था, लेकिन वह सारे एक ही धर्मगुरु के अधिपत्य को स्वीकारते थे। ईसा से चार-पाँच सौ वर्ष पूर्व उनका एक राज्य बोलोनिया शहर के पास भी था, जहाँ एक बार मुझे उनके शहर के पुरातत्व अवषेशों को देखने का मौका मिला। इस आलेख में उन्हीं प्राचीन भग्नावशेषों का परिचय है।

पुरातत्व में रुचि

मुझे इतिहास और पुरातत्व के विषयों में बहुत रुचि है। मेरे विचार में जन सामान्य में इतिहास तथा पुरातत्व के बारे में चेतना जगाने में संग्रहालयों का विषेश योगदान होता है। जितना मैंने देखा है, भारत में कुछ संग्रहालयों को छोड़ कर, अधिकांश में हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरौहर का न तो सही तरीके से संरक्षण व प्रदर्शन होता है और न ही उनके बारे में अच्छी जानकारी आसानी से मिलती है। अक्सर, धूल वाले शीशों के पीछे वस्तुएँ बिना विषेश जानकारी के रखी रहती हैं और वहाँ पर तस्वीर नहीं खींचने देते। शायद इसीलिए जन समान्य को इस विषय में कम रुचि लगती है।

सेवा-निवृत होने के बाद, पिछले कुछ वर्षों में, मैं इतिहास और पुरातत्व के बारे में पढ़ता रहता हूँ। मुझे लगता है कि भारतीय इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्रों में अभी तक बहुत कम काम किया गया है और बहुत कुछ खोजना तथा समझना बाकी हैं।

खैर, अब चलते हैं उत्तरी-मध्य इटली के बोलोनिया (Bologna - इतालवी भाषा में g और n मिलने से 'इ' की ध्वनि बनती है) शहर के पास मार्ज़ाबोत्तो (Marzabotto) में मिले आज से करीब २६०० साल पुराने एत्रुस्की शहर के भग्नावषेशों की ओर। 

मार्ज़ाबोत्तो के एत्रुस्की भग्नावषेश

युरोप की बहुत सी प्राचीन सभ्यताओं में शहर तीन स्तरों पर बंटे होते हैं - (१) एक ऊँचा शहर, जो किसी पहाड़ी या ऊँचे स्थल पर बना होता है, इन्हें एक्रोपोली (ग्रीक भाषा में 'एक्रो' यानि ऊँचा और 'पोलिस' यानि शहर) जहाँ पर बड़े मन्दिर या राजभवन या किले या अमीर लोगों के घर होते हैं; (२) पोली यानि एक मध्य शहर, जो एक्रोपोली के पास में लेकिन थोड़ा सा नीचे होता है, जहाँ आम जनता रहती है; और (३) एक निचला शहर होता है जो सबसे नीचे होता है और जिसे नेक्रोपोली ('नेक्रो' यानि मृत) कहते हैं जहाँ पर कब्रें होती हैं।

मार्ज़ाबोत्तो के एत्रुस्की शहर के भग्नावषेशों में यह तीनों स्तर दिखते हैं। नीचे की तस्वीर में वहाँ के लोगों के घरों और भवनों की दीवारों और उनके बीच बनी गलियों या सड़कों के अवशेष देख सकते हैं जिनसे उनके जीवन के बारे में जानकारी मिलती है। यह सभी भवन छोटे पत्थरों से बने थे जिन्हें माल्टे से जोड़ते थे। उनकी सबसे चौड़ी सड़क पंद्रह मीटर चौड़ी थी, उसे देख कर मुझे लगा कि उस पर घोड़े या बैल के रथ और गाड़ियाँ आराम से चल सकती थीं।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

यहाँ के भग्नवशेषों में पुरात्तवविद्यों ने तिनिआ (Tinia) नाम के एक देवता के मन्दिर को खोजा है, यह प्राचीन ग्रीक के देवताओं की कहानियों के राजा ज़ेउस (Zeus) जैसे थे। "तिनिआ" शब्द का अर्थ 'दिन' या 'सूर्य' भी था, इसलिए शायद इसे सूर्य पूजा की तरह भी देखा जा सकता है। यहाँ एक मन्दिर वाले हिस्से की खुदाई अभी चल रही है, जहाँ पर बीच में एक तालाब या कूँआ जैसा दिखता है।

इस क्षेत्र के दक्षिणी-पूर्व के हिस्से में कुछ नीचे जा कर वहाँ पर एत्रुस्की नेक्रोपोलिस यानि कब्रिस्तान के कुछ हिस्से दिखते हैं। इन भग्नावशेषों में सोने के गहने, कमर में बाँधने वाली पेटियाँ, कानों की बालियाँ, आदि मिली हैं जो कि बोलोनिया शहर के पुरातत्व संग्रहालय में रखी हैं। यहाँ पर पत्थरों की बनी चकौराकार छोटी कब्रें मिलती हैं जिनमें से कुछ के ऊपर बूँद या अंडे जैसे आकार के तराशे हुए  पत्थर टिके हुए दिखते हैं। शायद यह तराशे पत्थर सभी कब्रों पर लगाये जाते थे और समय के साथ कुछ कब्रों से नष्ट हो गये या शायद, उन्हें किन्हीं विषेश व्यक्तियों की कब्रों के लिए बनाया जाता था, जैसा कि आप नीचे की तस्वीर में देख सकते हैं।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

एत्रुस्कों की भाषा

एत्रुस्कों की वर्णमाला यवनी/ग्रीक वर्णमाला जैसी थी लेकिन उनकी भाषा यवनी नहीं थी। इनकी भाषा को यवनी से पुराना माना जाता है, और उसे प्रोटो-इंडोयुरोपी भाषा भी कहा गया है। पुरातत्वविद्य कहते हैं कि यह लोग यवनभूमि के आसपास के किसी द्वीप के निवासी थे।

मुझे एत्रुस्कों के कुछ शब्दों में संस्कृत का प्रभाव लगा। जैसे कि 'ईश' को वह लोग 'एइसना' कहते थे, 'यहाँ' को 'इका', 'वहाँ' को 'इता', आदि। उनकी भाषा में 'सूर्य' का एक नाम 'उशिल' भी था, जिसमें मुझे 'उषा' की प्रतिध्वनि सुनाई दी। लेकिन उनके अधिकांश शब्दों में संस्कृत का प्रभाव नहीं है।

एत्रुस्की संग्रहालय

भग्नावशेषों के पास में ही मार्ज़ाबोत्तो में मिली एत्रिस्की वस्तुओं का संग्रहालय भी है। वहाँ उनके मिट्टी के बने तोलने वाले छोटे बट्टे दिखे (नीचे तस्वीर में).

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

उनकी एक पूजा की थाली लिये हुए स्त्री की मूर्ति मुझे सुन्दर लगी।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

नीचेवाली, संग्रहालय की तीसरी तस्वीर में एत्रुस्की स्त्रियों के वस्त्रों को दिखाया गया है।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

अंत में

जब तक भाप के जहाज़, रेलगाड़ियाँ, मोटरगाड़ियाँ आदि नहीं थीं, एक जगह से दूसरी जगह जाना कठिन होता था। जिस रास्ते को आज हम साईकल से एक-दो घंटों में पूरा कर लेते हैं, कभी उसे पैदल चलने में पाँच-छह घंटे लग जाते थे। पहाड़ी घाटियों और द्वीपों में यह रास्ते पार करना और भी कठिन होता था। तब हर दस किलोमीटर पर, हर शहर, हर घाटी, हर द्वीप में, लोगों की भाषा, उनके खानपान का तरीका, आदि बदल जाते थे। एत्रुस्की सभ्यता ऐसे ही समय का नतीजा थी, यह एक द्वीप के लोगों की सभ्यता थी, जिसे ले कर वहाँ के निवासी दूर देश की यात्रा पर निकले और उन्हें उत्तरी-मध्य इटली में नया घर मिला।

घोड़े से मानव को इतिहास का पहला तेज़ वाहन मिला और दुनिया सिकुड़ने लगी। आज की दुनिया में तकनीकी विकास के सामने दूरियाँ और भी कम हो रहीं हैं और फिल्म-टीवी-इंटरनेट-मोबाइल आदि के असर से हमारी भाषाएँ, संस्कृतियों की भिन्नताएँ आदि धीरे-धीरे लुप्त हो रहीं हैं।

मानव समाजों का इतिहास क्या था, कैसे दुनिया के विभिन्न भागों में अलग-अलग सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ विकसित हुईं, भविष्य के लिए इसकी याद को सम्भाल कर रखने के लिए, हम सभी को प्रयत्न करना चाहिये। आप चाहे जहाँ भी रहते हो, चाहे वह छोटा शहर हो या कोई गाँव, यह बदलाव का तूफान एक दिन आप की दुनिया को भी बदल देगा। आप कोशिश करो कि बदलाव से पहले वाली दुनिया की जानकारी को, उसकी सांस्कृतिक धरौहर की यादों को सम्भाल कर संजो रखो।

Etruscan archeological ruins, Marzabotto, Italy - Image by S. Deepak

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