अब तक की कहानी: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के लिए, मजूली पहुँच कर, उनके आश्रम आते हैं। समाधी के दर्शन करके वह बाहर आ रहे हैं जब त्री को जगदीश बाबू दिख जाते हैं। इसके आगे पढ़िये ...
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अध्याय 18
मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, शाम
गार्गी जगदीश बाबू को बुलाने गयी, बोली, “बाबू जी, हमारे बापू की तबियत ठीक नहीं है …”, और त्री की ओर इशारा किया।
जगदीश बाबू ने रास्ते के किनारे पर सिर झुका कर बैठे हुए त्री को देखा, लेकिन पहचान नहीं पाये। वह उसके पास आये, पूछा, “क्या हुआ भाई?”
त्री ने सिर ऊपर नहीं उठाया पर उनके साथ खड़ी गार्गी ने उन्हें धीरे से कहा, “जगदीश बाबू हमें आप से अकेले में ज़रूरी बात करनी है, हमें अपने दफ्तर में ले चलिये।"
उन्हें उसकी बात समझने में थोड़ी देर लगी पर शायद वह त्री को पहचान गये, आवाज़ ऊँची करके बोले, “हाँ, मैं तुम्हें दवाई देता हूँ, तुम लोग मेरे साथ चलो, तुम्हारे बापू की तबियत ठीक नहीं है।"त्री और गार्गी जगदीश बाबू के साथ चले, त्री सिर झुका कर और लँगड़ा कर चल रहा था। रंगनाथ उनके पीछे कुछ दूर पर था और देख रहा था कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा। जब उसे विश्वास हो गया कि किसी ने उनकी बातचीत पर ध्यान नहीं दिया है, तो वह भी उनके पीछे जगदीश बाबू के दफ्तर की ओर आया। वहाँ उसने बाहर बैठे हुए सोमचाई को देखा, तो उसके पास जा कर बैठ गया और जेब से रंग-बिरंगे कँचे निकाल कर उन्हें हाथों में उछालने लगा।
वह कँचों को उछालने के खेल में माहिर है, जब वह उनसे खेलता है तो ऐसा लगता है मानो वह कँचे धीरे-धीरे हवा में तैर रहे हैं और नीचे नहीं गिरते। जब उसने एक साथ हवा में चार कँचे घुमाये तो सोमचाई का ध्यान उसके खेल पर लग गया। तब उसने कँचे सोमचाई की ओर बढ़ाये और उसे उन्हें उछालने के लिए कहा। सोमचाई को समझ नहीं आया कि वह क्या कह रहा है, तो उसने मुस्करा कर, हाथ से उन्हें उछालने का इशारा किया। सोमचाई ने उसे सिर हिला कर मना किया, लेकिन इतनी देर में जगदीश बाबू, त्री और गार्गी को आश्रम के भीतर के किसी कमरे में ले जा चुके थे।
भीतर जा कर जगदीश बाबू रोने लगे, त्री से बोले, “त्रिनेत्र बेटा, तुम्हें क्या बताऊँ। बाबा ने समाधी ले ली, हमें अनाथ कर दिया। लेकिन हमारे लिए यही दुख कम नहीं था, एक और आफत सिर पर आ पड़ी है। कल ताकानोरी और उसके गुँडे यहाँ आ धमके, उन्होंने हमारे एक बच्चे की गर्दन काटने की धमकी दी और बाबा ने तुम्हारे लिए जो चिट्ठी छोड़ी थी, उसे ले लिया। कल रात को उन्होंने बाबा की समाधी को तोड़ने की कोशिश की। इसमें उनके एक आदमी की आँख फूट गयी और दूसरे के पैर में गोली लगी है। वह कहता है कि वह किसी मूर्ति को खोज रहा है और जब तक उसे वह नहीं मिलेगी, वह हमें छोड़ेगा नहीं। अब हम क्या करें, हमें इन पापियों से कैसे मुक्ति मिलेगी?"
त्री ने उन्हें ढाढ़स बँधाया, “काका आप चिंता नहीं कीजिये, हमारे गुरु जी इतने कमज़ोर नहीं हैं कि एक गुँडे से हार जायेंगे। आप धीरज रखिये, सब ठीक हो जायेगा। गुरु जी ने जो चिट्ठी मेरे लिए छोड़ी थी, आप को मालूम है कि उसमें क्या लिखा है?”
“उसमें एक कविता जैसी लिखी है, जिसका अर्थ उन्हें समझ नहीं आ रहा है। तब उन्होंने मुझे उसका अंग्रेज़ी अनुवाद करने के लिए कहा। मैंने अनुवाद तो कर दिया है, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आया कि बाबा क्या कहना चाहते थे", उन्होंने उसकी ओर एक कागज़ बढ़ाया, “जब अनुवाद कर रहा था तो मैंने उनकी चिट्ठी की बातों को यहाँ लिख लिया है। शायद यह कोई पहेली है? ताकानोरी कह रहा था कि जब तुम आओगे तो तुमसे इसका अर्थ पूछेगा।"
त्री ने उस कागज़ पर जल्दी से नज़र घुमायी और उसे तह करके जेब में रख लिया, बोला, “मैं समझ गया कि गुरु जी मुझे क्या कहना चाहते हैं। आप इस कविता की बिल्कुल चिंता नहीं कीजिये। जाने से पहले मैं आप से एक बात कहना चाहता हूँ। अगले दिनों में अगर आप मुझे ताकानोरी के साथ देखें तो उस समय मैं चाहे कुछ भी कहूँ या करूँ, आप ऐसा दिखाईये कि मुझे नहीं पहचानते और उनके सामने मुझसे बात करने की कोशिश भी नहीं कीजिये, समझे?”
जगदीश बाबू ने हामी भरी तो वह दोनों उठ कर पीछे के रास्ते से वृद्धाश्रम के गेट की ओर निकल गये। रंगनाथ ने उन्हें जाते देखा तो उसने मुस्करा कर सोमचाई से विदा ली और गेट की ओर आया।
वहाँ से वे सीधा फुलानीबाड़ी घाट की ओर गये, और घाट से श्री भोला मन्दिर के लिए मोटर-बोट ली, और फ़िर वहाँ से पैदल चल कर सुबह वाले रास्ते से लौटे। तब तक अँधेरा होने लगा था। जब वह सुरंग द्वार वाले पीपल के पेड़ के पास पहुँचे तो अचानक गार्गी रुक गयी, बोली, “माधव की शक्ति-लहर महसूस हो रही है, वह यहाँ आसपास कहीं छिपा हुआ है।" उसने आवाज़ लगाई, “माधव, हम हैं, बाहर आ जाओ।"
तब माधव झाड़ियों के नीचे से बाहर निकला। उसके कपड़ों और चेहरे पर धूल लगी थी और उस धूल में आँसू बहने के निशान दिख रहे थे।
त्री ने आगे बढ़ कर उसे बाहों में जकड़ लिया, पूछा, “क्या हुआ?”
माधव की आँखें फ़िर से भर आयीं, बोला, “एक आदमी आया था, मोटा, लम्बा-चौड़ा, पहलवान जैसा, वह आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को जबरदस्ती अपनी जीप में बिठा कर ले गया।"
पता चला कि दोपहर को ज़रीना ने उनके लिए खाना बनाया था। खाने के बाद उन्होंने कुछ देर आराम किया था, फ़िर वे सुरंग से होते हुए जँगल में घूमने आये थे।
त्री ने पूछा, “जब तुम लोग सुरंग से बाहर निकले तो किसी खुली जगह पर तो नहीं गये?”
“पहले तो हम जँगल में ही घूम रहे थे। लेकिन फ़िर पता नहीं कैसे, तीन सफेद बगुले जैसे पक्षी थे, वह आभा दीदी के एकदम पास आ गये। वह बहुत सुंदर पक्षी थे, उनकी पीली चोंच और सिर पर पीली कलगी थी और उन्हें हमसे बिल्कुल डर नहीं लग रहा था। हम उनके साथ खेलने लगे और उनके पीछे-पीछे चलते गये। उनके साथ हम एक मैदान में पहुँचे, वहाँ और भी बहुत सारे पक्षी जमा हो गये, वह सभी आभा दीदी के आसपास घूम रहे थे। हमें बहुत मज़ा आ रहा था। तब मुझे सू-सू आया था, तो मैं एक झाड़ी के पीछे सू-सू करने चला गया। तभी मैदान में एक जीप आयी, तो मैं छुप गया। जीप से तीन आदमी उतरे और उन्होंने आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को पकड़ लिया। फ़िर वह पहलवान आदमी जीप से उतरा, उसने आभा दीदी से कुछ पूछा और जब दीदी ने उत्तर नहीं दिया तो उसने उन्हें चाँटा मारा। फ़िर वह लोग उन्हें जीप में बिठा कर कहीं ले गये", माधव ने बताया।
त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “इसीलिए आज हमें वृद्धाश्रम के आसपास ताकानोरी की शक्ति महसूस नहीं हो रही थी, क्योंकि वह मुझे खोजने कमलाबाड़ी घाट की ओर आया था और उसने आभा और बच्चों की शक्ति-लहरों को देख लिया। यह कितनी देर पहले की बात है?”
“करीब आधा घंटा पहले की।"
त्री ने कहा, “शायद वह लोग अभी यहाँ से बहुत दूर नहीं गये, गार्गी, तुम उनकी शक्ति-लहर को खोजने की कोशिश करो।"
गार्गी ने आँखें बंद कीं और कुछ क्षणों के बाद बोली, “वह लोग किसी नाव या फैरी बोट में बैठे हैं, वह नाव नदी पार करके मरियानी की ओर जा रही है।"
त्री ने रंगनाथ को इशारा किया तो उसने भी नदी की दिशा में ध्यान लगाया, बोला, “ताकानोरी सोमचाई से टेलीफोन पर बात कर रहा है, कहता है कि उसे तीन लोग मिले हैं जो त्रिनेत्र के साथी लगते हैं और वह उन्हें घर ले कर जा रहा है।"
“कौन से घर?”
“यह तो उसने नहीं कहा।"
त्री ने कुछ देर तक सोचा, फ़िर गार्गी से कहा, “ताकानोरी के पास अन्वेषण-शक्ति है, तुम हमारी शक्ति-लहरों को ढक दो ताकि वह हमें नहीं देख पाये।"
गार्गी बोली, “दादा, मुझे बच्ची नहीं समझो, मैंने यहाँ आते ही हम सब की शक्ति-लहरों को ढक दिया था।"
त्री बोला, “अब हमें सोचना है कि हम उन तीनों तक संदेश कैसे पहुँचायें कि वह चिंता नहीं करें, हम उन्हें छुड़वाने का कोई रास्ता खोज निकलेंगे।"
गार्गी बोली, “दादा, मैं वसंत से बात कर सकती हूँ।"
"नहीं गार्गी, मैं नहीं चाहता कि हम ऐसा कुछ करें जिससे ताकानोरी को हमारा पता चल जाये।"
सोच कर रंगनाथ बोला, “दादा, वह सब लोग हमेशा तो एक साथ नहीं रहेंगे और वह उन्हें जहाँ भी ले कर जायेगा, चौबिस घंटे उनके पास नहीं रहेगा। जब वह उन्हें अकेला छोड़ेगा, तब हम उनसे बात कर सकते हैं, तब तक गार्गी उन पर नज़र रखेगी।"
अचानक माधव बोला, “उस केले के पेड़ को देखो, कैसे हिल रहा है, इसका मतलब है कि वसंत हमें कुछ कह रहा है।" सब ने उधर देखा, उस पेड़ के लम्बे हरे पत्ते, हाथी के कानों की तरह आगे-पीछे हिल रहे थे।
त्री बोला, “शायद वह पेड़ों के माध्यम से हमारी बातें सुन रहा है। वसंत अगर तुम मेरी आवाज़ सुन सकते हो, तो केले के साथ वाले पेड़ की पत्तियाँ हिलाओ।"
तुरंत केले के साथ वाले पेड़ की शाखाएँ भी ऊपर-नीचे हिलने लगीं।
त्री मुस्कराया, बोला, “बहुत बढ़िया वसंत। तुम लोग कोई चिंता नहीं करो, समय आने पर हम तुम्हें वहाँ से छुड़ा लेंगे। तुम हमें संदेश भिजवा देना कि तुम कहाँ हो और सब ठीक हो या नहीं। जब तुम लोग अकेले होगे, तब गार्गी भी तुमसे बात करेगी। अगर ताकानोरी तुमसे कुछ पूछे तो उसे मेरे मोबाइल का नम्बर दे देना, कहना कि मैं उससे बात करना चाहता हूँ।"
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