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गुरुवार, जून 11, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 04

अब तक: त्रिनेत्र को उसके गुरु जी जामुन बाबा (कोरिया से आये बौद्ध भिक्षुक जून मिन) ने एक अनाथाश्रम खोल कर उसमें शक्ति वाले बच्चों को तैयार करने के लिए कहा था। दूसरी ओर, जापान में यामागुची गैंग ने अपने याकूज़ा खूनी ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लाने भारत भेजा है। एक दिन बाबा एक काम से नारायणपुर जाते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि किसी ने उनके भीतर छुआ है, वह समझ जाते हैं कि उनका पीछा करने वाला कोई वहाँ आया है। आगे पढ़िये:

 प्रारम्भ से पढ़िये  -  पिछला भाग पढ़िये

अध्याय 04

नारायणपुर, असम, 2 मार्च 2026 

जैसे ही ताकानोरी ने अन्वेषण-किरण से बाबा की शक्ति को महसूस किया, उसे भी झटका सा लगा। लेकिन वह नहीं समझ पाया कि शक्ति-लहर की वह अनुभूति एक क्षण के बाद ही लुप्त कैसे हो गई?

सोच कर वह इस नतीजे पर पहुँचा कि शायद उस भिक्षुक को अपनी शक्ति-लहर को छुपाना आता है। उसने तुरंत नक्शे से यह अन्दाज़ लगाने की कोशिश की कि वह भिक्षुक उस समय किस दिशा में, किस जगह पर है।

ओरी को भारत आये कई महीने हो चुके थे। जापान में हरूकी ने उसे कहा था कि उसने जून मिन को जोरहाट नाम के शहर में देखा था। भारत आ कर ओरी सबसे पहले जोरहाट ही गया। वह सोचता था कि अन्वेषण किरण की सहायता से वह जून मिन को आसानी से खोज लेगा लेकिन वह अन्वेषण-किरण को घुमाते-घुमाते परेशान हो गया था, पर जून मिन का पता नहीं चला था।

अन्वेषण किरण चलाने के लिए उसे ध्यान लगाना पड़ता है और उसे आधा घंटा भी चलाये तो इतना थक जाता है कि पाँच-छह घंटे तक सोता है। जोरहाट के आसपास वह बहुत घूमा लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ। उसकी अन्वेषण-किरण छह-सात किलोमीटर की परिधि में काम करती है, उसके बाहर नहीं। इसलिए उसने बहुत शहर बदले, बहुत घूमा, पर बात नहीं बनी।

उसने रिकू यामागुची से टेलीफोन पर बात की और अपनी असफलता के बारे में बताया, तो रिकू बोला, “इतनी जल्दी उस बूढ़े से हार मान गये? ठीक है, यह तुम्हारे बस की बात नहीं, तुम जापान लौट आओ। जून मिन को खोजने मैं किसी और को भेजूँगा।"

लेकिन ओरी वापस नहीं लौटा। बल्कि उसने यामागुची से कहा कि वह थाईलैंड से सोमचाई नाम के एक कम्प्यूटर एक्सपर्ट को बुलायेगा और उसे कुछ हिन्दुस्तानी आदमी भी चाहिये जो उसके साथ काम कर सकें।

ओरी ने पहले भी कई बार सोमचाई के साथ काम किया था। वह जोरहाट आया तो ओरी ने उसे जून मिन की तलाश करने के लिए कहा। कुछ ही दिनों में सोमचाई ने, चेहरे पहचानने वाली एप्प और आर्टिफिशयल इन्टैलीजैंस की सहायता से जून मिन का पता लगा लिया और ओरी को बताया, “ब्रह्मपुत्र नदी की दूसरी ओर एक शहर है नारायणपुर, वहाँ की कुछ वेबकैम-फीड में मुझे जून मिन दिखा है। मेरे विचार में जून मिन नारायणपुर में नहीं रहता लेकिन महीने में दो-तीन बार वह वहाँ जाता है। वह शायद किसी गाँव में या ऐसी जगह रहता है जहाँ पर वेबकैम नहीं लगे। उसे खोजने के लिए हमें नारायणपुर जाना चाहिये।"

पंद्रह दिन पहले ओरी ने नारायणपुर में, उस क्षेत्र में किराये पर घर लिया है, जहाँ पर सोमचाई को वह दिखा था। तब से वह दिन में तीन-चार बार, थोड़ी देर के लिए अन्वेषण-किरण घुमा कर उसे खोजता है। आज सुबह भी उसने वैसे ही अन्वेषण किरण घुमाई थी और इस बार वह जून मिन को खोजने में सफल हुआ था।

वह तुरंत उठ कर सोमचाई के पास गया, और उसे नारायणपुर का नक्शा दिखा कर बोला, “जिस भिक्षुक को मैं खोज रहा हूँ, इस समय वह शहर में डकरोंग क्षेत्र में आया है। तुम उस क्षेत्र में जितने वीडियो-कैमरे लगे हैं, उनमें उसे खोजो। तब तक मैं आदमियों को ले कर वहाँ जाता हूँ, शायद वह हमें मिल जाये। अगर वह तुम्हें किसी वीडियो में दिखे तो मुझे फोन करके बताओ कि कहाँ है, किस दिशा में जा रहा है।"

उनके साथ मदद के लिए तीन हिन्दुस्तानी हैं, जिन्हें यामागुची के जानकार एक हिन्दुस्तानी गैंग ने वहाँ भेजा है - बटेर, लक्की और मटरू।

ओरी ने बटेर से कह कर अपनी जीप निकलवायी और उसे डकरोंग पोस्ट आफिस की ओर जाने के लिए कहा। उनका घर वहाँ से दूर नहीं था, वहाँ पहुँचने में उन्हें दस मिनट भी नहीं लगे। वहाँ पहुँच कर वह जीप से उतर कर इधर-उधर घूमा तो उसे बोरा साहब की दुकान के आसपास, एक शक्ति-लहर की हलकी सी प्रतिध्वनि महसूस हुई, वह समझ गया कि वह सही जगह आया है। उसने बटेर, लक्की और मटरू को गली में आसपास के लोगों से पूछताछ करने के लिए कहा कि शायद किसी ने उस दिन सुबह वहाँ पर एक बूढ़े कोरियाई बौद्ध भिक्षुक को देखा हो।

उसने जीप में बैठ कर आँखें बंद की और ध्यान लगा कर अपनी अन्वेषण-शक्ति को भी आसपास घुमाया, लेकिन बाबा ने अपनी शक्ति-लहर को पूरा ढका हुआ था, वह उन्हें नहीं खोज पाया। चारपाई पर लेटे हुए बाबा वहीं से उन सब को ध्यान से देख रहे थे। ताकानोरी उनमें अकेला जापानी था, उसे देखते ही वह पहचान गये कि वही उनका सरदार है।

बाबा जब छोटे थे तब कोरिया में उनके गुरु जी ने उन्हें अपनी गुप्त-शक्ति पर नियंत्रण करना और उनकी शक्ति-लहरों को छिपाना सिखाया था।

उनके गुरु जी कहते थे, “हर मानव शरीर में विद्युत और चुम्बकीय शक्तियाँ होती हैं, इन शक्तियों से मस्तिष्क सोचता है और नसों का तंत्र-जाल काम करता है। गुप्त-शक्तिवान लोगों में यह विद्युत और चुम्बकीय शक्ति अधिक तीव्र होती है, इसलिए अन्वेषण-किरण से उनकी शक्ति-लहरों को खोज सकते हैं। लेकिन अन्वेषण-किरण की शक्ति थोड़ी कठिन होती है, इसका सही उपयोग करने के लिए बहुत अभ्यास की आवश्यकता होती है। उसका ठीक से उपयोग नहीं करो तो जिसके मस्तिष्क को वह किरण छूती है, उसे पीड़ा होती है और वह तुरंत जान जाता है कि कोई उसे खोज रहा है।"

इसलिए बाबा समझ गये थे कि उस जापानी को अपनी अन्वेषण-किरण का ठीक से उपयोग करना नहीं आता। लेकिन वह नहीं जानते थे कि उस जापानी की अन्य कौन सी गुप्त शक्तियाँ हैं?

लोगों से पूछते-पूछते, मटरू कपड़े प्रैस करने वाली महिला के पास आया और उससे भी भिक्षुक बाबा के बारे में पूछा। वह बोली, “कोरिया का बौद्ध भिक्षुक? ऐसे किसी आदमी को मैंने नहीं देखा। मैं सुबह से यहाँ हूँ, ऐसा कोई विदेशी आदमी यहाँ से नहीं गुज़रा।"

मटरू ने पीछे चारपाई पर लेटे बाबा को देखा तो उनकी ओर जाने लगा, तब उस महिला ने उसे रोका, बोली, “उनकी तबियत ठीक नहीं है, बेचारे सो रहे हैं, उन्हें मत जगाओ, उन्होंने भी किसी को नहीं देखा।"

बटेर, लक्की और मटरू ने आसपास, आगे-पीछे, हर ओर चक्कर लगाये लेकिन उन्हें बाबा का कुछ पता नहीं चला। ओरी को समझ नहीं आया कि जिसकी शक्ति-लहर उसने महसूस की थी, वह उसे कैसे खोजे। शायद जून मिन उसकी अन्वेषण किरण को महसूस करते ही वहाँ से भाग कर कहीं पर छिप गया है? लेकिन वह अपनी शक्ति-लहर को कब तक छिपायेगा, शक्ति-लहर को छिपाना बहुत मेहनत का काम है, और वह बूढ़ा है। आखिर में तो उसे बाहर निकलना ही पड़ेगा, वह एक बार उसे मिला है, वह उसे दोबारा भी खोज निकालेगा।

यह सोच कर उसने बटेर, लक्की और मटरू को जीप में बिठाया और वह लोग अपने घर वापस लौट गये।

घर जा कर ओरी ने सोमचाई से दोबारा बात की, बोला, “वह भिक्षुक आज सुबह डकरोंग पोस्ट आफिस वाली गली में आया था। शायद वह भाँप गया कि मैं उसके पीछे हूँ, इसलिए वह वहाँ से भाग गया। तुम उस जगह के आसपास के सभी वीडियो-कैमरे खोजो, और उनकी जाँच करो। अगर वहाँ कोई वीडियो-कैमरे नहीं हों, तो सैटेलाइटों से जाँच करो, उस समय की तस्वीरें किसी न किसी सैटेलाइट में अवश्य मिलेंगी। किसी भी हालत में हमें पता लगाना है कि वह कैसा दिखता है, यहाँ पर किससे मिलने आया था और कहाँ गया? सुबह आठ बजे वह उस गली में था, तुम्हें उसे खोजना है।"

तीन घंटे की मेहनत के बाद सोमचाई ने बाबा का पता लगा लिया।

उसने ओरी को अपने लैपटॉप पर दिखाया, बोला, “यह वीडियो देखो, उस गली के पास की एक दुकान के वैबकैम से लिया है। आज सुबह साढ़े सात बजे के करीब, वहाँ पर एक आटो शिव-मन्दिर की ओर से आया और वह डकरोंग गली के पास रुका था। उसमें से यह आदमी उतर कर, उस गली में गया था। इस वीडियो में उसका चेहरा ठीक से नहीं दिखता, उसने सिर और मुँह पर गमछा लपेटा है, लेकिन चाल-ढाल से वह आदमी बूढ़ा लगता है। इसका मतलब है कि उसने बौद्ध भिक्षुक के वस्त्र नहीं पहने थे।"

फ़िर उसने एक दूसरी फाईल खोली, बोला, “यहाँ देखिये, इसमें मैंने उसी समय की सैटेलाइट-फीड से मैंने डकरोंग गली की तस्वीरें ली हैं। पहले वह आदमी गली में आ कर, इस दुकान के साथ वाले दरवाज़े से भीतर गया और आधे घंटे बाद वहाँ से दो लोग बाहर आते हैं। एक तो वही सुबह वाला आदमी है, दूसरा आदमी भी बूढ़ा लगता है। वह दोनों आदमी, दुकान के सामने थोड़ी देर तक बातें करते हैं। फ़िर दूसरा वाला आदमी उसी दरवाज़े में वापस लौट जाता है और पहले वाला आदमी, गली में थोड़ा सा आगे जा कर, एक औरत के पास चारपाई पर लेट जाता है। इस अगली तस्वीर में यह देखिये, आप की जीप उस गली में घुसती है, आप और तीनों आदमी नीचे उतरते हैं। यहाँ देखिये, इसमें मटरू उस चारपाई पर लेटे हुए आदमी के पास भी गया था लेकिन उससे बात नहीं की थी। जब आप लोग वहाँ से जीप में बैठ कर चले गये, तब वह बूढ़ा चारपाई से उठ कर, गली में आगे जा कर, उधर पेड़ों के नीचे चला गया। लेकिन उसके बाद वह कहाँ गया, यह मुझे दिखायी नहीं दिया। आप वहाँ जा कर पता कीजिये, उस औरत से पूछिये, और उन पेड़ों में देखिये, शायद उसके सुराग मिल जायेंगे।"

ताकानोरी ने वीडियो और तस्वीरों को ध्यान से देखा, बोला, “इसका मतलब है कि आज सुबह जब मैं वहाँ गया था, जून मिन उस गली में ही था, वह चारपाई से लेट कर मुझे देख रहा था, और मटरू उसके पास भी गया लेकिन उसे पहचान नहीं पाया।”

उसने तुरंत बटेर, लक्की और मटरू को बुलाया, उन्हें पूरी बात समझायी और डकरोंग गली में पूछताछ करने वापस भेजा।

उन्होंने लौट कर बताया कि उस दुकान पर और उसके ऊपर वाले घर के दरवाज़े पर ताला लगा है। उन्होंने पड़ोसियों से पूछा तो पता चला कि वह पूरा परिवार आज सुबह ही किसी काम से एक महीने के लिए दिल्ली गया है।

उन्होंने प्रैस करने वाली औरत से भी पूछा तो पता चला कि वह चारपाई वाले आदमी को नहीं जानती थी, वह कोई गरीब बूढ़ा था जिसकी तबियत ठीक नहीं थी, वहाँ पर कुछ देर तक आराम करने के लिए लेटा था, और फ़िर वह चुटियागाँव की ओर चला गया था।

पेड़ों के बीच में उन्हें तह किये हुए कपड़े और कँबल मिले लेकिन किसी ने उस बूढ़े को वहाँ से जाते हुए नहीं देखा था। ओरी को उन कपड़ों में भी शक्ति की हलकी सी प्रतिध्वनि महसूस हुई लेकिन यह नहीं समझ पाया कि उनसे वह जून मिन को कैसे खोज सकता है।

ओरी देर तक सोचता रहा कि क्या करे। वह इतना समझ गया है कि उस बूढ़े भिक्षुक में अपनी शक्ति-लहर को छिपाने की क्षमता तो है ही, वह बहुत चालाक भी है, उसे पकड़ना आसान नहीं होगा।

*****

अगला अध्याय सोमवार 15 जून को पढ़ सकते हैं। 

सोमवार, जून 08, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 03

अब तक: त्रिनेत्र को उसके गुरु जी जामुन बाबा (कोरिया से आये बौद्ध भिक्षुक जून मिन) ने पाला था। जब वह अठारह वर्ष का हुआ तो गुरु जी ने उसे एक अनाथाश्रम खोल कर उसमें शक्ति वाले बच्चों को तैयार करने के लिए कहा था। दूसरी ओर, जापान में यामागुची गैंग ने अपने याकूज़ा खूनी ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली मूर्ति को लाने भारत भेजा है। इससे आगे पढ़िये इस तीसरे भाग में।

प्रारम्भ से पढ़िये - पिछला अध्याय पढ़िये

अध्याय 03

मजूली, असम, 2 मार्च 2026

सुबह मुँह-अँधेरे जब बाबा अपने आश्रम से निकले, तो उन्हें पहचानना कठिन था। उन्होंने भिक्षुक के केसरी वस्त्र को उतार कर, गंदे मटमैले सा कुर्ता-पजामा पहने थे, उनका सिर और चेहरा गमछे से ढका था और कँधों पर एक पुराना कम्बल लिपटा था। वह कोई गरीब गाँववाला लगते थे। अँधेरे में वह वृक्षों और झाड़ियों के बीच में से छाया की तरह जा रहे थे।

उनकी छोटी सी नाव, नदी के तट के पास पुराने चिथड़ों और सूखे पत्तों से ढ़की थी, जो आसानी से नहीं दिखती थी। वह उसे धकेल कर नदी में ले गये और उसमें बैठे। उनका चप्पू इस कोण से नदी के जल में घुसता है, जैसे मक्खन में गर्म चाकू, ज़रा सी भी आवाज़ नहीं होती। उस दिन भी उनकी नाव पानी को तीर की तरह चीरती हुई जा रही थी।

जब त्री उनसे पूछता है, "गुरु जी, आप का कभी अपने कोरिया देश लौटने का मन नहीं करता?"

तो वह कहते हैं, "मेरे लिए तो तुम ही मेरा परिवार हो, वहाँ लौट कर मैं क्या करूँगा? वहाँ मुझे जानने वाला अब कोई नहीं है।"  

नदी पार करके, चंगेली-सूती द्वीप पर उन्होंने नाव को झाड़ियों के बीच में छुपा दिया। इस द्वीप के चप्पे-चप्पे को वह अच्छी तरह पहचानते हैं। तब तक क्षितिज पर अँधेरा कम गहरा होने लगा था। यहाँ भी वह पेड़ों और झाड़ियों के बीच से छाया की तरह निकले। द्वीप पर इक्का-दुक्का घर ही हैं, लेकिन वहाँ कुत्ते हैं, इसलिए वह उन घरों से दूर से, लम्बा चक्कर लगा कर गये।

द्वीप के दूसरे किनारे पर, उन्होंने एक झोपड़ी के बाहर चारपाई पर सोये एक आदमी के कँधे पर हाथ रख कर जगाया, फुसफुसा कर बोले,  “जागो शिबेन, सुबह हो गयी, अभी तक सो रहे हो?”

शिबेन उन्हें कई सालों से जानता है। हर बार वह ऐसे ही आते हैं, सुबह मुँह-अँधेरे, और उसे इसी तरह जगाते हैं। वह आँखे मलते हुए, उबासी लेते हुए उठा। पहले उनके पैर छूए, बोला, “कैसे हो बाबा? इस बार इधर बहुत दिनों के बाद आये?”

उसे पता है कि अक्सर वह भिक्षुक-वस्त्र उतार कर, भेस बदल कर आते हैं। कभी वह गँजे सिर वाला बूढ़ा बनते हैं, तो कभी लम्बी मूछों वाला पहलवान। बाबा ने उसे बताया था, “कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं, वह मुझे मारने की धमकी देते हैं, इसलिए आश्रम से बाहर निकलूँ तो मुझे भेस बदलना पड़ता है। कोई तुमसे मेरे बारे में पूछे तो कहना कि मुझे नहीं जानते, कि मैं तुम्हारे यहाँ कभी नहीं आया।"

आज शिबेन ने जब उनका भेस देखा तो हँसने लगा, “आज क्या बने हैं? गाँव वाले या मछुआरा? जो भी है, आप ने अच्छा भेस बनाया है, बिल्कुल पहचान में नहीं आते। कहिये, आज किधर जाना है?”

“जल्दी चलो, मुझे चापोड़ी में किसी से मिलने जाना है।"

“एक चाय भी नहीं पीयेंगे?”, शिबेन ने पूछा। सुबह-सुबह बिना चाय पीये उसका काम करने का मन नहीं करता।

बाबा बोले, "आज नहीं, मुझे जल्दी है।"

तब उसने एक बाल्टी से पानी ले कर अपना मुँह धोया। उसकी नाव नदी के तट पर एक खूँटे से बँधी थी। उन्हें नाव में बिठाया और तेज़ी से उसे मिस्सामोरा-चापोड़ी के घाट की ओर ले गया। वहाँ पहुँचने में उन्हें करीब बीस मिनट लगे।

जब वह नाव से उतरे तब तक पूर्व में पेड़ों के पीछे से आकाश में हलकी सी लालिमा झलकने लगी थी। उसे पैसे दे कर वह आगे बढ़े।

चापोड़ी से उन्हें नारायणपुर जाना है, लेकिन वहाँ जाने वाले आटो इतनी सुबह नहीं मिलते। घाट के पास दो-तीन ढाबे हैं, बाबा उनमें से एक ढाबे पर गये और चाय के लिए कहा। वहाँ उन्हें किसी ने नहीं पहचाना। चाय का कुल्हड़ ले कर, वह वहाँ चुपचाप अलग हो कर बैठे, कम्बल सिर पर लपेट लिया, किसी से बात नहीं की। 

जब सूरज आकाश में ऊपर चढ़ा और सड़क पर लोग आने-जाने लगे तो आटो वाले भी आ गये। तब वह भी उठे और नारायणपुर के लिए आटो खोजने निकले।

इस यात्रा का निर्णय उन्होंने आज सुबह-सुबह ही किया था। पता नहीं क्यों उनकी नींद समय से पहले खुल गयी थी और उनके भीतर से विचार उठा था कि आज उन्हें नारायणपुर जाना चाहिये। वह अपने अंतरमन को जानते हैं, इसलिए जब उन्हें ऐसे संकेत मिलते हैं तो वह सोचते नहीं हैं, उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे संकेतों ने पहले कई बार उनकी जान बचायी है।

वह डकरोंग पोस्ट आफिस वाली सड़क के कोने पर आटो से उतरे और सीधा ब्राइट बुक स्टोर की ओर बढ़े। दुकान अभी बंद थी, लेकिन उसके साथ जो सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं, उनका दरवाज़ा खुला था। वह सीढ़ियाँ चढ़े और ऊपर जा कर घर का दरवाज़ा खटखटाया।

एक लड़के ने दरवाज़ा खोला, वह उन्हें पहचान नहीं पाया, पूछा, “कौन हो तुम? क्या चाहिये?”

बाबा ने धीरे से कहा, “बेटा, अपने दादू से कहो कि जामुन बाबा आये हैं।"

उनका नाम सुन कर वह लड़का उन्हें पहचान गया, बोला, “बाबा, आज आप ने यह कैसा भेस बनाया हैं? आईये, भीतर आ जाईये।”

उन्हें बिठा कर वह भीतर अपने दादा जी को जगाने गया और दो मिनट बाद लौटा, बोला, “दादू अभी आते हैं।"

थोड़ी देर के बाद ब्राइट बुक स्टोर के मालिक बोरा साहब, हाथ-मुँह धो कर बाहर आये, हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया और बोले, “बाबा, नीचे चलते हैं, आप की एक चिट्ठी आयी थी, वह वहीं रखी है।" फ़िर उन्होंने अपने पोते को आवाज़ लगायी, “छोटू, माँ से कहो कि चाय बना दे और उसे नीचे ले आओ।"

बोरा साहब भी उनकी भेस बदलने की आदत को जानते हैं, बोले, "आज भेस बदलने के लिए आप को साफ़ कपड़े नहीं मिले थे क्या?”

नीचे सीढ़ियों के पीछे से दुकान में जाने का भीतरी दरवाज़ा है, उन्होंने उसका ताला खोला, बत्ती जलायी और बाबा को भीतर बिठाया। फ़िर दराज़ से एक चिट्ठी निकाल कर उन्हें दी, कहा, “यह आप की यह चिट्ठी है, पिछले हफ्ते आई थी।"

बाबा ने चिट्ठी ली, देखा कि त्री की है और उसे अपने झोले में रख लिया। फ़िर उस झोले से एक प्लास्टिक का डिब्बा निकाला, बोले, “आप की दीदी ने आप के लिए यह गोंद के लड्डू बना कर भेजे हैं।"

बोरा साहब की बड़ी बहन विधवा हैं। वह मुश्किल में थीं, क्योंकि उनके बेटे की बहू उनसे बुरा व्यवहार करती थी। बोरा साहब बहन के लिए बहुत चिंतित थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उसकी कैसे मदद करें। तब बाबा ने उनकी बहन को अपने वृद्धाश्रम में जगह दी थी। इस तरह से उनकी जान-पहचान बनी थी।

डिब्बे को ले कर बोरा साहब की बाछें खिल गयीं, बोले, “ऐसे लड्डू मेरी माँ बनाती थी, इन्हें खाता हूँ तो बचपन के दिन याद आ जाते हैं। माँ कहती थीं कि इनसे जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है, इसलिए सर्दियों में इन्हें बनाती थी। वही परम्परा अब दीदी चला रही हैं।"

तब तक ऊपर से उनका पोता चाय ले कर आ गया। उसे पीते हुए उन्होंने कुछ देर तक वृद्धाश्रम की बातें कीं। 

बोरा साहब बोले, “पहले घरों के बड़े-बूढ़े, हमारे परिवारों का हिस्सा होते थे, यहाँ पूरे क्षेत्र में कोई वृद्धाश्रम नहीं था क्योंकि उसकी आवश्यकता ही नहीं थी। लेकिन आजकल हमारे बच्चे शहरों में रहने चले जाते हैं, और उनके बूढ़े माता-पिता घर में अकेले रह जाते हैं। कई बार, पैसे न होने से, बेचारे सड़कों पर रहने और भीख माँग कर जीने के लिए बाध्य होते हैं। गुवाहाटी में मैंने देखा, कि बहुत से बूढ़े लोग पुलों के नीचे रहते हैं।"

बाबा बोले, "इसीलिए हर महीने हमारे यहाँ एक-दो नये लोग आ रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि हमारा वृद्धाश्रम आत्मनिर्भर होना चाहिये, ताकि मेरे बाद भी वह चलता रहे।"

बोरा साहब बोले, “लेकिन आप का स्वास्थ्य तो ठीक चल रहा है न?”

बाबा हँसे, बोले, “स्वास्थ्य तो ठीक है लेकिन उम्र हो रही है। पतझड़ का पत्ता, पता नहीं कब वृक्ष से गिर जाये? इसलिए वृद्धाश्रम की सारी ज़िम्मेदारी उनके सहकारी संघ को सौंपी है।"

थोड़ी देर तक बातें करने के बाद बाबा उठ खड़े हुए, "अच्छा बोरा साहब, अब मैं चलता हूँ, मुझे आश्रम के लिए बाज़ार से कुछ सामान खरीदना है। ईश्वर चाहेंगे तो अगली बार मुलाकात होगी।" यह कह कर वह उन्हें हाथ जोड़ कर दुकान से बाहर निकल आये।

बोरा साहब भी उनके साथ बाहर आये, बोले, “दीदी को मेरा प्रणाम कहियेगा, मुझे जैसे ही मौका मिलेगा, मैं उनसे मिलने आऊँगा।"

अचानक बाबा को करंट सा लगा। ऐसा लगा मानो किसी ने उनके दिमाग के भीतर उन्हें बिजली से छुआ हो। जैसे ही वह अनुभूति महसूस हुई, उनका आत्म-संयम और प्रशिक्षण ऐसे थे कि उन्हें सोचना नहीं पड़ा, उन्होंने तुरंत अपने मस्तिष्क की शक्ति-लहर को ढक लिया। वह समझ गये कि किसी ने अन्वेषण-किरण की शक्ति से उनके मस्तिष्क को छुआ है।

बोरा साहब ने बाबा के चेहरे पर पीड़ा का भाव देखा, बोले, “क्या हुआ बाबा? तबियत ठीक नहीं है?”

जामुन बाबा समझ गये थे कि कोई उन्हें खोजते हुए नारायणपुर आया है। कुछ ही देर में वह यहाँ भी आयेगा और बोरा साहब से उनके बारे में पूछताछ करेगा। इसलिए उन्हें और उनके परिवार को इस खतरे से बचाने के लिए यहाँ से कहीं दूर भेजना चाहिये।

वह बोले, “देव-कृपा से मुझे आने वाले खतरों के संकेत मिल जाते हैं। मुझे लगता है कि एक जानलेवा खतरा आप के परिवार की ओर आ रहा है। आप घर लौटिये और जल्दी से अपना सामान तैयार कीजिये, मैं तुरंत आप के लिए गाड़ी का प्रबंध करता हूँ। आप सब लोग आज सुबह ही एक सप्ताह के लिए गुवाहाटी चले जाईये, मैं आप के लिए वहाँ रहने का प्रबंध भी कर दूँगा। जाने से पहले अड़ोस-पड़ोस में सबसे झूठमूठ कह दीजिये कि आप लोग एक महीने के लिए दिल्ली जा रहे हैं। मेरी बात समझ गये? जैसा मैंने कहा है, वैसा करिये। मैं आप सब के लिए प्रार्थना करूँगा कि आप का अमँगल न हो।"

“कैसा खतरा?”, बोरा साहब घबरा गये, “क्या होने वाला है?”

“अभी बात करने का समय नहीं है, जब विपदा टल जायेगी तब आप को बताऊँगा। अभी आप तुरंत घर जाईये और एक सप्ताह के लिए सामान तैयार कर लीजिये।"

बोरा साहब सीढ़ियों की ओर भागे और बाबा ने अपनी जान-पहचान वाले ट्रैवल-एजैंट को फोन करके बोरा साहब के लिए कार और गुवाहाटी में रहने का प्रबंध करने के लिए कहा, फ़िर तेज़ चल कर उसी सड़क पर थोड़ा आगे गये।

सड़क की बायीं ओर एक झोपड़ी थी, जिसके बाहर एक महिला एक चबूतरे पर कपड़े प्रेस कर रही थी, पास में एक चारपाई बिछी थी। बाबा ने स्वर को कातर बना कर उसे कहा, “बेटी, मुझे चक्कर आ रहे हैं, मेरी तबियत ठीक नहीं है। मैं उधर नाली के पास थोड़ी देर बैठ कर आराम कर लूँ?"

“उधर गन्दगी में मत बैठो, यहाँ चारपाई पर लेट जाओ", वह महिला बोली और झोपड़ी से उनके लिए एक लोटे में पानी ले आयी।

बाबा चारपाई पर लेट गये, शरीर को कँबल से ढक लिया, बोले, "बस थोड़ी देर आराम कर लूँ, फ़िर चला जाऊँगा।" उनकी दृष्टि गली के दूसरे सिरे पर, बोरा साहब की दुकान पर लगी थी। वह महिला वापस अपने कपड़े प्रैस करने के काम में लग गयी।

अभी तक बाबा को यामागुचि के भेजे आदमियों से बच कर भागने में दिक्कत नहीं हुई थी। लेकिन वह समझ गये कि इस बार उनका पीछा करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। इस बार यामागुचि ने जिस आदमी को उन्हें खोजने भेजा है, उसके पास अन्वेषण-किरण की गुप्त-शक्ति है, इस बार उन्हें बहुत सावधान रहना पड़ेगा।

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अगला अध्याय पढ़िये

गुरुवार, जून 04, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 02

अध्याय 02 

टोकियो, जापान, 1 जनवरी 2026

नये वर्ष के पहले दिन, रिकू यामागुची ने ताकानोरी को टेलीफोन करके अपने घर बुलाया, “ओरी सान, तुम्हारे लिए एक काम है।"

ओरी ने रात को देर तक जश्न मनाया था और सुबह तीन बजे थक कर, दो युवतियों के साथ सोने गया था। फ़िर भी, हर रोज़ की तरह वह सुबह सात बजे उठ कर तैयार हो कर दोजो में व्यायाम करने गया था। 'दोजो' एक पाराम्परिक व्यायामशाला है, जहाँ वह प्रतिदिन सशस्त्र और शस्त्रहीन लड़ाई के अभ्यास करता है।

वहाँ जाते हुए वह सोच रहा था कि वह तीस साल का हो चुका है, अब यह मारा-मारी और लड़ाई के काम वह अधिक दिनों तक नहीं कर पायेगा। लेकिन अगर वह यह नहीं करेगा तो क्या करेगा? उसने बचपन से केवल यही सीखा है। सब जानते हैं कि उसके जैसा काबिल खूनी पूरे टोकियो में, या शायद पूरे जापान में और कोई नहीं है।

जिस काम को कोई और नहीं कर पाता, वह कर लेता है। उसके शिकार कितनी भी कोशिश कर लें, वह उनकी छिपी हुई कमज़ोरियों में से, उन्हें मारने का कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। जापानी भाषा में उसके जैसे लोगों को याकूज़ा कहते हैं लेकिन वह अपने आप को समुराई-योद्धा मानता है। किसी में हिम्मत नहीं है कि उसके मुँह पर उसे याकूज़ा कह सके।

दोजो में उसके गुरु जी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, उसने झुक कर उनका अभिवादन किया। उसके गुरु जी उसे बचपन से जानते हैं, उन्हें वह पिता समान मानता है। उस दिन जब उसने अभ्यास पूरा किया और वहाँ से जाने लगा तो गुरु जी ने उसे रुकने का इशारा किया, झुक कर बोले, “ओरी सान, आज मेरा यहाँ आखिरी दिन है, मैं तुमसे विदा लेता हँ।"

ओरी को उनकी बात समझ में नहीं आयी, पूछा, “आखिरी दिन? इसका क्या मतलब?”

“यामागुचि सान का आदेश है। वह कहते हैं कि मेरे रिटायर होने का समय आ गया है।"

यामागुचि सान, यानि रिकू यामागुचि। रिकू जानता है कि गुरु जी उसके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, उसने यह जानबूझ कर किया है। ताकानोरी के मन में आग सी लग गयी, एक क्षण के लिए उसने सोचा कि वह जा कर उसे मार डाले।

गुरु जी उसके मन की बात बिना कहे ही समझ गये, उसकी बाजू पर हाथ रखा, धीरे से बोले, “क्रोध में दिमाग काम नहीं करता, कुछ करने से पहले ठँडे दिमाग से सोचो। यह सच है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ और इस दोजो को नये और जवान शिक्षकों की आवश्यकता है। आज नहीं तो कल मुझे रिटायर होना ही है। लेकिन तुम इतने सालों से उनके लिए वफ़ादारी से काम करते हो, यामागुचि सान को मुझे यह बात कहने से पहले तुमसे बात करनी चाहिये थी।"

“मैं अब उसके लिए काम नहीं करूँगा।"

गुरु जी ने सिर हिला कर मना किया, बोले, “समझदार व्यक्ति जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लेता। शायद वह चाहते हैं कि तुम गुस्से में ऐसा कोई निर्णय लो? तुम उसका उल्टा करो, उन्हें ऐसे दिखाओ कि तुम्हें मेरी कुछ परवाह नहीं है, और यह समझने की कोशिश करो कि वह तुम्हें रास्ते से क्यों हटाना चाहते हैं?”

चौबिस सालों से वह गुरु जी का शिष्य रहा है। उनके बिना उसे यह दोजो ही नहीं, अपना जीवन भी अधूरा सा लगेगा। वह सोच में पड़ गया।

गुरु जी बोले, “ओरी सान, मुझे वचन दो कि तुम जल्दबाजी में कुछ नहीं करोगे।"

ताकानोरी ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी।

अंत में जाते हुए वह बोले, "मैं आज-कल में अपने गाँव लौट जाऊँगा। जब तुम्हें समय मिले, तब मुझसे मिलने घर आना। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।"

कुछ घंटे बाद, ताकानोरी घर में बैठा था जब रिकू का टेलीफोन आया। तब तक उसका गुस्सा ठँडा हो गया था। उसने फैसला किया कि जैसी सलाह गुरु जी ने दी है, वह रिकू से गुरु जी के बारे में कुछ नहीं कहेगा।

उसने जल्दी से कपड़े पहने और यामागुचि सान के घर आया। उनका घर ऊँची चारदीवारी से घिरा है, और चारों ओर पहरेदार हैं। भीतर अलग-अलग घर बने हैं। यामागुचि दादा जी करीब नब्बे साल के हैं, और कोने वाले छोटे से घर में रहते हैं। उनकी यादाश्त कमज़ोर हो गयी है, इसलिए उनके साथ हमेशा एक नर्स रहती है। वह पहले उनसे मिलने गया।

दादा जी की सभी नर्सें उसे पहचानती हैं। रिकू की तरह वह भी उन्हें ओजीसान यानि दादा जी बुलाता है। जब वह वहाँ पहुँचा तो वह नाश्ता कर रहे थे। उसे देख कर मुस्कराये तो वह बोला, “ओजीसान, कैसे हैं आप?”

दादा जी, सब को देख कर मुस्कराते हैं लेकिन किसी को पहचानते नहीं हैं। वह कुछ नहीं बोले, चुपचाप नाश्ता करते रहे।

ताकानोरी अपने पिता की मृत्यु के बाद पैदा हुआ था और अक्को शहर में अपनी माँ के साथ रहता था। उसके पिता भी यामागुचि परिवार के लिए काम करते थे। उस समय यामागुचि दादा जी सारा काम देखते थे। उनके कई धँधे थे - जूएघर चलाना, वैश्याघर और एस्कोर्ट का धँधा, नशीले पदार्थों की तस्करी और बेचना, और लोगों के खून करवाना। दादा जी उसकी माँ को घर चलाने के लिए पैसे देते थे। उनका पोता रिकू जिस स्कूल में पढ़ता था, उन्होंने ताकानोरी को उसी स्कूल में पढ़ने भेजा था।

जब वह सात साल का था, जब दादा जी ने उसकी गुप्त-शक्ति को पहचान लिया था और कहा था कि वह उनके लिए काम करेगा। उसे मार्शियल आर्ट और विभिन्न शस्त्रों की ट्रेनिन्ग दी गयी थी। लेकिन गुप्त-शक्ति के बारे में दादा जी की जानकारी सीमित थी और उनकी अपनी शक्ति विशेष प्रबल नहीं थी, इसलिए वह उसकी शक्ति को पूरा विकसित नहीं करा पाये थे।

ताकानोरी की दो गुप्त-शक्तियाँ हैं, लोगों के मन की बात को पढ़ना और दूर से गुप्त-शक्ति वाले व्यक्तियों की शक्ति-लहरों को खोजना। लेकिन उसकी इन शक्तियों के बारे में दादा जी भी पूरी तरह से नहीं जानते थे।

जब उसकी स्कूल की पढ़ाई पूरी हुई थी, तब तक दादा जी रिटायर हो गये थे और उनका बेटा बिज़नेस चलाता था। एक साल पहले, एक दर्घटना में उनके बेटे के सिर में चोट आयी थी। उसके बाद से बिज़नेस की ज़िम्मेदारी रिकू ने सम्भाल ली है। वह ओरी से करीब दस साल बड़ा है।

ओरी को लगता है कि रिकू उससे जलता है। उनके धँधे में उसका बहुत नाम है, जिसे कोई नहीं मार पाता, उसे वह मार सकता है। शायद रिकू को यह बात अच्छी नहीं लगती?

दादा जी के पास कुछ देर बैठ कर, वह रिकू से मिलने आया। वह भीतर घुसा तो देखा कि रिकू चटाई पर पालथी मार कर बैठा चाय पी रहा है।

“कोन्नीछिवा बॉस", कह कर उसने हलका सा झुक कर, मुस्कराते हुए उसका अभिवादन किया।

शायद रिकू सोच रहा था कि वह गुस्से में होगा और उसे मुस्कराता देख कर उसे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ। वह बोला, “ओजीसान से मिल आये? आओ, यहाँ बैठो", और उसके लिए चाय लाने का इशारा किया, “तुम्हारे लिए एक विषेश काम है, तुम्हें तुरंत इंडिया जाना है और वहाँ से हमारे लिए एक प्रतिमा खोज कर लानी है।"

एक प्रतिमा? उसने सोचा कि वह याकूज़ा है, इस तरह के छोटे-मोटे काम के लिए क्या उनके पास अन्य व्यक्ति नहीं हैं? लेकिन गुरु जी की बात को याद करके, वह कुछ नहीं बोला, चुपचाप रिकू की ओर देखता रहा।

“पिता जी कहते हैं कि यह काम तुम्हें सौंपना चाहिये, वह सोचते हैं कि तुम उस मूर्ति को पहचान लोगे क्योंकि उसमें कुछ विशेष शक्ति है। हम उसे बहुत सालों से खोजने की कोशिश कर रहे हैं। कई बार हमें उसकी खबर मिली, लेकिन हर बार वह भिक्षुक हमसे बच कर भाग गया। अब यह काम तुम्हें करना है।"

"इतने सालों के बाद, हमें उस भिक्षुक का पता कैसे चला?” ओरी ने पूछा।

“तुम हरूकी को जानते हो? उसने उस भिक्षुक को एक वीडियो में देख कर पहचान लिया और हमें खबर की। बहुत साल पहले, एक बार हरूकी उस भिक्षुक को पकड़ने थाईलैंड गया था, पर वह उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही भाग गया था। यह वीडियो हिन्दुस्तान के उत्तर-पूर्व में जोरहाट नाम के शहर से है। तुम्हें वहाँ जा कर उस भिक्षुक को खोजना है और उस प्रतिमा को लाना है। किसी भी कीमत पर हमें वह मूर्ति चाहिये। कहते हैं कि उस भिक्षुक के पास कोई गुप्त शक्ति है, इसीलिए वह किसी की पकड़ में नहीं आता।"

“गुप्त शक्ति?”

“इस बात में कितना सच है, मैं नहीं जानता।"

ओरी ने अपना चेहरा निर्विकार रखा लेकिन यह बात सुन कर उसके मन में खलबली सी मच गयी। उसने अपनी शक्तियों को सबसे छुपाया है। अगर भिक्षुक में उसके जैसी कोई शक्ति है, तो उससे इस बारे में बात करना बहुत दिलचस्प हो सकता है।

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सोमवार, जून 01, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 01

 बिष्णुपुर, बांकुरा, पश्चिम बंगाल, 2014

उस मंदिर की दीवारों पर राधा और कृष्ण की कहानियाँ लाल पक्की मिट्टी की शिल्पकला से सजी हुईं थीं। मंदिर के सामने, सड़क के पार, दो बड़े तालाब थे, जिनके किनारों पर ऊँचे-घने पेड़ों की कतारें थीं। उनके पीछे तीन गोलाकार छोटे तालाब और थे, जिनमें काई की वजह से उनके जल का रंग हरे पन्ने जैसा चमकता था। उन तालाबों के पीछे घरों की कतारें थीं, लेकिन उनके बीच में भी बहुत से छोटे-बड़े ताल-तलैया थे।

ऐसे ही एक छोटे से तालाब के किनारे वह झोपड़ी थी, जहाँ पर त्री अपने पिता समान गुरु जी के साथ बड़ा हुआ था।

विष्णुपुर के पक्की मिट्टी की शिल्प कला से सजे वैष्णव मंदिर, बंगाल ही में नहीं, सारे भारत में प्रसिद्ध हैं। शायद उन्हीं से प्रेरणा पा कर त्री शिल्पकार बना है। उसकी लाल रंग की पक्की मिट्टी की  घोड़ों की मूर्तियाँ, मंदिर में आने वाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों में खूब बिकती हैं और उनसे उसकी अच्छी कमाई होती है।

वह गुरु जी से कहता है, “अब मैं अच्छा कमा लेता हूँ, फ़िर जब आप के घटनों में दर्द हो रहा है, तो आप हर रोज़ भिक्षा माँगने के लिए यहाँ-वहाँ क्यों भटकते हैं? आप को आराम करना चाहिये।”

लोग उसके गुरु जी को जामुन बाबा बुलाते हैं, हालाँकि उनका असली नाम जून-मिन है। वह कोरिया देश से आये हैं। वह कहते हैं, "बेटा तुम कमाते हो तो अपने पैसे जोड कर रखना सीखो, एक दिन तुम्हारे काम आयेंगे। मैं तो भिक्षुक हूँ, भिक्षा माँगना मेरा धर्म है।"

सुबह उठ कर गुरु जी अपना कटोरा ले कर भिक्षा माँगने निकल जाते हैं और शाम को घर लौटते हैं। त्री सुबह शिल्प बनाता है और फ़िर सारा दिन मंदिर के बाहर ग्राहक ढूँढ़ता है। सालों से उनका जीवन ऐसे ही चल रहा था, लेकिन एक दिन उनकी यह दिनचर्या बदल गयी।

उस दिन वह सुबह मुँह-अँधेरे, ईंट वाली भट्टी पर अपनी मूर्तियों को पकाने गया था। पक्की मिट्टी के शिल्प को पकाने के लिए बड़ा कौशल चाहिये। पहली बात है कि मूर्तियाँ पूरी तरह से सूखी होनी चाहिये। दूसरी बात, भट्टी का तापमान सही होना चाहिये। और तीसरी, पकने के बाद उन्हें धीरे-धीरे ठंडा करना चाहिये। अगर इन बातों का ध्यान न रखो, तो मूर्तियाँ टूट जाती हैं और सारी मेहनत बेकार हो जाती है।

वह ठेले से मूर्तियाँ उतार कर झोपड़ी में रख रहा था जब गुरु जी ने उसे बुलाया।

“क्या हुआ गुरु जी, आज आप की तबियत ठीक नहीं है?” इस समय तक वह अपनी भिक्षा का कटोरा ले कर निकल गये होते हैं, लेकिन उस दिन वह घर पर थे।

“भीतर से माँ की प्रतिमा उठा लो और मेरे साथ चलो", गुरु जी ने कहा, वह गम्भीर लग रहे थे।

उनके यहाँ एक हरे रंग की माँ तारा की देवी मूर्ति है। गुरु जी कहते हैं कि बौद्धिसत्व अवलोकितेश्वर की करुणामयी आँखों से जब आँसू निकले तो दाहिनी आँख के आँसू से हरित तारा बनी। वह मूर्ति करीब बारह इँच की है, लेकिन भारी नहीं है।

त्री ने अपने ठेले को प्लास्टिक की तिरपाल से ढका और उस मूर्ति को ले आया। तालाबों के बीच से होते हुए, वह मंदिर की ओर आये और उसके प्रांगण के दक्षिण में बनी कीर्तनशाला के चबूतरे पर बैठ गये।

उस समय वहाँ मंदिर देखने वाले इक्का-दुक्का पर्यटक थे, और कीर्तनशाला वाला हिस्सा खाली था। त्री ने माँ तारा की मूर्ति को ध्यान से पास में रख दिया। वह समझ गया था कि आज गुरु जी को कोई विशेष बात करनी है, क्योंकि उससे पहले वह कभी उस मूर्ति को उसके पूजा-स्थान से उठा कर बाहर नहीं लाये थे।

“बताओ गुरु जी, क्या हो गया?” उसने चिंता के साथ पूछा।

गुरु जी कुछ देर तक उसकी ओर देखते रहे, उनकी करुणामय आँखों में नमी चमक रही थी। फ़िर धीरे से बोले, “तुम्हारे यहाँ से जाने का समय आ गया है।"

त्री स्तब्ध रह गया, कुछ बोल नहीं पाया। बचपन से गुरु जी ने उसे कई बार कहा था कि एक दिन उनके जीवन की राहें अलग हो जायेंगी और तब उसे उन्हें छोड कर कहीं दूर जाना पड़ेगा, लेकिन उसे विश्वास नहीं होता था कि ऐसा कभी होगा।

वह बोले, “भिक्षुक सब कुछ त्याग देता है, घर, परिवार, रिश्ते, नाते, उसके लिए कुछ नहीं होते। मैंने भी बहुत कोशिश की, कि तुमसे स्नेह और लगाव न बने, लेकिन मैं उसमें असफल रहा। तुम्हें अपने से दूर भेजना, मेरे लिए आसान नहीं है, लेकिन करना ही होगा।"

“क्यों?”

“क्योंकि अब तुम्हें अपने जीवन की नयी राह बनानी है। मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपने से दूर नहीं भेज रहा, हम लोग मिलते रहेंगे। लेकिन मैं चाहता हूँ कि जितना मैंने तुम्हें सिखाया है, तुम उसके लिए एक नया भविष्य बनाओ ताकि वह हमारे साथ समाप्त नहीं हो, आगे चलता रहे।"

त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी।

"तुमने अपने माता-पिता के बारे में मुझसे कई बार पूछा है, आज मैं तुम्हें वह सारी बात बताऊँगा। तुम मुझे गुवाहाटी में मिले थे। जहाँ गुवाहाटी का हवाई अड्डा है, उसके पास एक झील है, दीपोर बील। झील के बीच में एक पुल है जहाँ से रेल गुज़रती है। पुल के दूसरी ओर झील का एक छोटा सा कटा हुआ हिस्सा है, जहाँ मैं रहता था। झील के पास, एक कूड़े की पहाड़ी थी। दिन भर शहर से ट्रक आते थे और उस पहाड़ी पर कूड़ा गिराते थे। वहाँ पास में कुछ गरीब लोग रहते थे, जो उस कूड़े में काम की चीज़ें खोजते और बेचते थे। एक दिन शाम को मैं वहाँ से गुज़र रहा था, अँधेरा होने लगा था और कूड़े में खोजने वाले सब लोग चले गये थे। वहाँ मैंने तुम्हें देखा, तुम सड़क के किनारे बैठे थे, तीन-चार साल के थे।"

“वहाँ पास में रशीद नाम का कबाड़ी वाला रहता था, जिसे मैं जानता था। मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा और रशीद के पास गया, पता चला कि तुम्हारी माँ की मृत्यु हो गयी थी और तुम्हारा और कोई नहीं था। वह बोला कि पुलिस थाने में खबर दे दी है, तुम्हें अनाथाश्रम ले जाने के लिए वह किसी को भेजेंगे। मैं तुम्हें वहाँ अकेला नहीं छोड़ना चाहता था, तुम्हारे पास बैठ गया, सोचा कि जब पुलिसवाला तुम्हें लेने आयेगा, तब मैं अपनी कुटिया में लौट जाऊँगा। लेकिन रात हो गयी, कोई नहीं आया। तब मैंने सोचा कि उस रात को तुम मेरी कुटिया में रह सकते हो, तुम्हें अपने साथ ले आया। मैं चकित था कि तुम एक बार भी नहीं रोये, न ही कुछ कहा। चुपचाप उठ कर मेरे साथ कुटिया में आ गये। मेरे पास एक ही दरी थी जिस पर मैं सोता था, तुम मेरे साथ ही सोये।"

त्री मूक गुरु जी को देख रहा था, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“उस रात मेरे सपने में माँ तारा आयीं, वैसा सपना मैंने पहले कभी नहीं देखा था। माँ मेरे सिरहाने खड़ी थीं, चारों ओर उनका प्रकाश फ़ैला था। माँ ने मेरे माथे पर हाथ रखा और मुस्करायीं, तब मैंने देखा कि सपने में तुम भी हो। उस सपने में और क्या हुआ, मुझे याद नहीं, लेकिन जब सुबह हुई तो माँ की वह स्मृति मेरे मन में जीवित थी। उसी दिन मैंने अपनी दरी, भिक्षा की कटोरी और माँ की प्रतिमा समेट लीं, तुम्हें साथ लिया और यात्रा पर निकल पड़ा। घूमते-घूमते, डेढ़-दो साल के बाद हम यहाँ विष्णुपुर आये और रुक गये। जिस दिन तुम मुझे मिले थे, वह आज का ही दिन था, अठारह फरवरी, और इस बात को आज चौदह साल हो गये हैं।"

कुछ देर तक त्री रोता रहा, फ़िर आँसू पोंछ कर बोला, “मेरा नाम, त्रिनेत्र, मुझे आप ने ही दिया?”

गुरु जी ने एक थैली से एक काला धागा निकाला जिस पर एक छोटा सा त्रिशूल लटक रहा था, उसकी ओर बढ़ाते हुए बोले, “जब तुम मिले तब यह धागा तुम्हारे गले में था, शायद तुम्हारी माँ शिव-भक्त थीं? त्रिनेत्र माने शिव जी का तीसरा नेत्र, उसे आत्म-ज्ञान और दिव्य दृष्टि का प्रतीक मानते हैं। तुम्हारी गुप्त शक्ति की वजह से मैंने तुम्हारे लिए यह नाम चुना।"

“मेरी गुप्त शक्ति के बारे में आप को कब पता चला?”

गुरु जी मुस्कराये, बोले, “जब मैंने कूड़े की पहाड़ी के पास तुम्हें बैठे देखा था, तभी मुझे तुम्हारे भीतर छिपी शक्ति की अनुभूति हो गयी थी।"

त्री की गुप्त शक्ति है कि वह जब चाहे तब गुम हो सकता है। एक क्षण पहले वह सामने बैठा है और दूसरे क्षण, वह चाहे तो दिखाई नहीं देता। लगता है जैसे उसकी शक्ति से उसके शरीर के अणु-परमाणु बेरंग या पारदर्शी हो जाते हैं। बचपन से उसने गुरु जी से ध्यान लगाना, मन को एकाग्र करना और उस शक्ति पर नियंत्रण करना सीखा है। अब वह उस शक्ति के संचालन में इतना दक्ष है कि उसे न दिखाई देने के लिए सोचना नहीं पड़ता।

गुरु जी फ़िर मुस्कराये, बोले, “लेकिन मैंने तुम्हें कभी अपनी गुप्त शक्ति के बारे में नहीं बताया।"

त्री भौचक्का हो गया, बोला, “आप भी लुप्त हो सकते हैं?”

“नहीं", गुरु जी ने सिर हिला कर मना किया, बोले, “मेरी गुप्त शक्ति तुमसे भिन्न है। दुनिया में दस हज़ार में से एक बच्चे में गुप्त शक्ति की छिपी हुई सम्भावना होती है। अगर उसे बचपन में जागृत और विकसित न किया जाये तो वह शक्ति मुरझा कर मर जाती है। किसी की श्रवण शक्ति होती है, किसी की दृष्टि शक्ति और किसी की मानस-शक्ति। हमारी यह माँ तारा की प्रतिमा", उन्होंने पास रखी मूर्ति की ओर इशारा किया, “यह सामान्य मूर्ति नहीं है, जब यह पास हो तो इससे बच्चों की गुप्त शक्ति जागृत, विकसित और प्रबल हो जाती है।"

“माँ की इस मूर्ति से शक्ति जागृत होती है?”

“हाँ, और इस प्रतिमा की रक्षा के लिए सालों से मैं अपना देश त्याग कर भटक रहा हूँ। कुछ बुरे लोग हैं जो इसे छीनना चाहते हैं। वह शक्ति का प्रयोग गलत कामों के लिए करना चाहते हैं, बच्चों को चोर, डाकू और खूनी बनाना चाहते हैं। उन्होंने इसके लिए मेरे गुरु जी को मार दिया। मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रतिमा को ले कर कहीं दूर चले जाओ, वहाँ एक अनाथाश्रम खोलो और गुप्त-शक्ति वाले बच्चे खोज कर, उनकी शक्तियाँ विकसित करके, उन्हें अच्छे कामों के लिए तैयार करो।"


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शुक्रवार, मार्च 20, 2026

मेरा फैंतासी उपन्यास

बहुत सालों से मैं एक हल्का-फुल्का सा जासूसी उपन्यास, जेम्स बॉन्ड जैसा कुछ, लिखना चाहता था। बचपन में ऐसी किताबें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

साठ के दशक में, घर पर पापा की अलमारी में बहुत सी गम्भीर साहित्य वाली किताबें थीं, जिन्हें मैंने बहुत छोटी उम्र में पढ़ना शुरु कर दिया था - नानक सिंह, रांगेय राघव, किशन चंदर, चतुरसेन, जैसे बहुत से लेखक मुझे अच्छे लगते थे। घर में सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएँ भी आती थीं जिनमें मुझे शिवानी, शंकर, बिमल मित्र जैसे लेखकों को पढ़ना भी अच्छा लगता था।

लेकिन गम्भीर साहित्य के साथ हल्का-फुल्का साहित्य भी मुझे प्रिय था। मेरी मौसी की सहेली जो हमारी पड़ोसी थी, उनके यहाँ जासूसी उपन्यास पढ़ने को मिलते थे। मौसी के अपने सबसे प्रिय लेखक थे गुलशन नन्दा, जिनकी बहुत सी किताबें मैंने गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ी थीं। छुट्टियों में हम कई बार बड़ी मौसी के यहाँ पश्चिमी बंगाल में अलीपुर द्वार जाते थे, जहाँ जाने की यात्रा में तीन दिन लगते थे, तब रास्ते भर मैं स्टेशन से खरीदी जासूसी और गुलशन नन्दा किस्म की किताबें पढ़ता था।

नया उपन्यास - देवी प्रतिमा के रक्षक 

आखिर में मैं अपना सपना पूरा करने में सफल हुआ। असल में इसे लघु उपन्यास कहना चाहिये, और इसे लिखने में मुझे बहुत मज़ा आया। मैं इसके प्रकाशन के बारे में सोच रहा हूँ, नये लेखकों के लिए हिंदी किताबों के प्रकाशक मिलना कठिन लगता है, और चूँकि मैं विदेश में रहता हूँ, प्रकाशित करवाने में और भी दिक्कते हैं। वैसे तो सुना है कि हिंदी किताबों के लेखन की कमाई से जीवन-यापन कठिन है, लेकिन मेरे पास मेरी पैंशन है, मुझे पैसे की आवश्यकता भी नहीं है, इसलिए मैंने सोचा है कि इसे अपने इस ब्लाग पर ही प्रकाशित कर चाहिये। आप की क्या राय है?

उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" का कवर चित्र

यह उपन्यास लिखने की यात्रा

मेरे पहले दो उपन्यास साहित्यिक विषयों पर थे। एक उपन्यास लिखने में मुझे दो-तीन साल लगते थे, लेकिन मन कभी संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए मैं उन्हें बार-बार लिखता, दस-पंद्रह बार भी। जबकि इस फैंतासी उपन्यास लिखने में सिर्फ दो महीने लगे।

शुरु में सोचा था कि उपन्यास एक रहमदिल खूनी पर होगा, जिसे अपने खून-खराबे पर पछतावा है और जो अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अब केवल बुरे लोगों को मारता है, यानि कि वह एक तरह का रोबिनहुड-खूनी है। लेकिन जब उसे लिखने लगा तो वह कहानी उस खूनी के हृदय परिवर्तन की बात पर केन्द्रित हो गयी, यानि कि उस खूनी का दिल क्यों और कैसे बदलता है।

मेरे उपन्यास का खूनी, ताकानोरी ओकामो, एक जापानी याकूज़ा है, जिसे दक्षिण कोरिया के एक बुद्ध भिक्षुक की विशेष शक्ति वाली मूर्ति की खोज है। वह भिक्षुक जी उस मूर्ति के साथ कई सालों से भारत में एक वृद्धाश्रम में छिपे हुए रहते हैं।

उपन्यास लिखते हुए कथानक में एक और परिवर्तन हुआ, कि उस खूनी की कहानी के साथ, यह एक अनाथाश्रम में रहने वाले कुछ गुप्त-शक्तियों वाले बच्चों की कहानी भी बन गयी। उपन्यास पूरा करने के बाद मुझे लगा कि शायद मेरी कहानी के नायक त्रिनेत्र और उनके साथी बच्चे "मिस्टर इंडिया" फ़िल्म से कुछ हद तक प्रभावित हैं।

शायद यह उपन्यास बड़े बच्चों, किशोरों और नवजवानों के लिए अधिक उपयुक्त है, पर यह निर्णय तो पाठक ही कर सकते हैं। यह उपन्यास भारत के उत्तर-पूर्व की पृष्ठभूमि पर है, इसका एक बड़ा हिस्सा, असम के मजूली द्वीप पर केन्द्रित है, उसके अलावा इसमें विष्णुपुर, गंगटोक और मणिपुर भी हैं।  

उपन्यास का कवर

मेरे बेटे ने कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) यानि आर्टिफीशियल इन्टैलिजैंस से इसके लिए बहुत से कवर बना कर दिये, जिनके कुछ नमूने आप नीचे देख सकते हैं।

ए.आई. से बने मूल चित्र

अंत में मैंने जो कवर चुना, मुझे लगा कि उसके रंग अच्छे नहीं हैं, वह स्पष्ट रूप से दिखता है कि ए.आई. से बना है। मैंने उसके रंग हटा कर उन्हें कम्प्यूटर पर हाथ से रंगा और कुछ फिल्टर लगा कर देखे। जब उपन्यास निकलेगा, तब आप को इस पर राय देने का मौका मिलेगा। 

अंत में

पाठकों को यह उपन्यास कैसा लगेगा, पता नहीं, लेकिन मुझे इसे लिखने में बहुत आनन्द आया। यह लिखा भी फटाफट ही गया। जून में मेरा जन्मदिन होता है, सोचा है कि इस अवसर पर, "देवी प्रतिमा के रक्षक" को इसी ब्लॉग पर पाठकों के लिए किश्तों में प्रकाशित किया जाये।

मेरे मन में एक और ख्वाहिश भी है, साईन्स फिक्शन का उपन्यास लिखने की। फैंतासी लिखने में इतना मज़ा आया, मुझे आशा है कि साईन्स फिक्शन लिखने में भी उतना ही आनन्द आयेगा। अभी उसकी पलैनिन्ग शुरु की है।

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बुधवार, जून 11, 2025

लेखक की दुविधाएँ

बारह ड्राफ्ट के बाद, मेरा दूसरा उपन्यास लगभग तैयार है। इसे आज से इक्कीस साल पहले अंग्रेज़ी में लिखना शुरु किया था और तब इसमें कहानी थी एक नवयुवक की जो दिल्ली में अपनी नानी के पास बड़ा हुआ है और जिसने बचपन से सुना है कि उसके माता-पिता की विदेश में मृत्यु हो गई थी। 

समय के साथ, बार-बार लिखने से इसके कथानक में कुछ बदलाव आये हैं। जैसे कि नवयुवक के बदले, यह बीसवीं सदी के प्रारम्भ की उसकी नानी की कहानी बन गई है, जिसकी पृष्ठभूमि में आसाम के चाय बागान में काम करने वाली एक गिरमिटिया युवती की कहानी भी है। इस उपन्यास की कहानी सुन कर नीचे वाला कवर मेरी मित्र विमला दीपक ने बना कर दिया है।

इस आलेख के माध्यम से मैं आप से सलाह माँगना चाहता हूँ कि अगर मुझे लेखन से पैसा कमाने की आवश्यकता न हो, तो क्या उपन्यास को किसी प्रकाशक से छपवाना महत्वपूर्ण है या उसे अमेज़न जैसे आनलाईन पोर्टल से छपवाना भी चल सकता है?

मेरे फेसबुक मित्रों में बहुत से अनुभवी लेखक हैं, मैंने पहले सोचा कि उन्हें सीधा लिख कर सलाह माँगनी चाहिये, फ़िर मुझे लगा कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि कोई जब मेरे साथ ऐसा करता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता, जबरदस्ती सी लगती है।  इसलिए सोचा कि इसके बारे में ब्लाग पर लिखूँ।

उपन्यास लिखने की यात्रा

इक्कीस साल पहले लिखा उपन्यास अधूरा था। उसके बाद, कई बार इस उपन्यास को लिखने की कोशिशें कीं लेकिन हर बार यह अधूरा ही रह जाता था।

तब मैं अपने आप से कहता था कि जब रिटायर होऊँगा, तब इसे लिखूँगा। रिटायर हुए भी सात-आठ साल बीत गये, लेकिन मेरा काम और यात्राएँ समाप्त नहीं हुईं। दो-ढाई साल पहले दो ऐसी बातें हुईं जिनसे मुझे लगा कि अगर सचमुच मैं अपने उपन्यास को लिखना चाहता हूँ तो मुझे बाकी के सब काम छोड़ने पड़ेंगे।

पहली बात काम से जुड़ी थी। मुझे एक देश में विकलांगों के लिए नई स्वास्थ्य सेवाओं को लागू करने का बड़ा काँट्रेक्ट मिला था, जिसके लिए तीन साल तक मैंने बहुत मेहनत की। मेरा काम पूरा हुआ लेकिन उस देश में चुनावों के बाद नयी सरकार आयी, तो उन्होंने हमारे सारे काम को रोक दिया क्योंकि उनकी दृष्टि में वह काम महत्वपूर्ण नहीं था। मुझे लगा कि मैंने जीवन के तीन साल बेकार कर दिये, मैंने पैसा कमाया पर मेहनत का कुछ फायदा नहीं हुआ।

दूसरी बात मेरे अपने स्वास्थ्य से जुड़ी थी। मेरी आँखों में रेटिना में घाव हो गये जिनसे दिखना कम हो गया और डर था कि वह घाव बढ़ेंगे तो लिखना-पढ़ना पूरा बन्द हो जायेगा। सौभाग्य से अभी तक वह घाव जैसे थे वैसे ही हैं, बढ़े नहीं हैं, इसलिए दिखता कुछ कम है लेकिन मेरा लिखना-पढ़ना जारी है।

इसलिए मैंने फैसला किया कि अब उपन्यास पूरे करने पर ही ध्यान दूँगा और हिन्दी में लिखूँगा। इस तरह से मैंने २०२३ में अपना पहला उपन्यास पूरा किया था। मित्र अरविंद मोहन जी की सहायता से दिल्ली के एक प्रकाशक ने दो साल पहले उसे छापने के लिए स्वीकार भी किया था, लेकिन पता नहीं कब छपेगा। अब मेरा दूसरा उपन्यास भी लगभग तैयार है।

मन की दुविधाएँ

मैं चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग मेरे लिखे को पढ़ें, लेकिन मैं इन किताबों से कुछ कमाना नहीं चाहता। तो क्या मुझे अपने उपन्यास को प्रकाशकों के पास भेजना चाहिए? मुझे चिंता है कि प्रकाशक निर्णय लेने में कई महीने लगायेंगे और फ़िर छापने में न जाने कितने साल निकाल देंगे।

क्या इसे सीधा अमेज़न या उसके जैसे किसे भारतीय पोर्टल पर मुफ्त देना बेहतर नहीं होगा, ताकि जो इसे ईबुक रूप में पढ़ना चाहते हैं वह इसे मुफ्त डाउनलोड करें और अगर कोई छपी हुई किताब पढ़ना चाहे तो वह इसकी छपाई की कीमत दे कर छपवा ले? जिन्हें अनुभव है वह बतायें कि किस पोर्टल पर डालना बेहतर होगा?

उपन्यास पढ़ना चाहने वाले

अगर आप मेरे उपन्यास को ई-बुक या पीडीएफ रूप में पढ़ना चाहते हैं तो मुझे ईमेल भेजिये, मेरा पता है sunil(at)kalpana.it (ईमेल भेजते समय '(at)' के बदले में '@' लगा दीजिये)। अगर आप उसे पढ़ कर उसके बारे में अपनी आलोचना या सुझाव देंगे तो मुझे और भी अच्छा लगेगा। 

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बुधवार, फ़रवरी 26, 2025

इतिहास और मानव समाज के बदलते मूल्य

इअन मौरिस (Ian Morris) इंग्लैंड में जन्में लेखक, इतिहासकार तथा पुरातत्व विशेषज्ञ हैं जो आजकल अमरीका में स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं। मेरा यह आलेख उनकी २०१५ में लिखी एक पुस्तक (Forager, farmers and Fossil Fuels) से प्रेरित है जिसमें वह आदि मानव से ले कर आज के बदलते समाजों की सरंचना और उनके बदलते मूल्यों की बात करते हैं।

भीमबेटका, भोपाल, भारत क हाथी पर शिकार करने का पाषाणचित्र, तस्वीरकार सुनील दीपक

मैंने यह पुस्तक कुछ दिन पहले पढ़ी और मुझे इसके मूलभूत विचार दिलचस्प लगे। इसे पढ़ते हुए, मेरे मन में भारतीय पौराणिक कथाओं से जुड़ी कुछ बातें भी मन में उठीं, इसलिए इस आलेख को लिखने की सोची। ऊपर के चित्र में मध्यप्रदेश में भीमबेटका से हाथी पर चढ़ कर शिकार करने का पाषाणचित्र है (चित्र पर क्लिक करके बड़ा करके देख सकते हैं)।

इअन मौरिस की किताब का सार

मौरिस का मूलभूत विचार है कि जैसे-जैसे मानव समाज विकसित हुए, उनके ऊर्जा खोजने के साधन और उस ऊर्जा का उपयोग करने की शक्ति बदली, इस बदलाव से उनके समाजों की सरंचना और उनके मूल्य भी बदले।

इसमें ऊर्जा का अर्थ बहुमुखी है, यानि वह शारीरिक ऊर्जा (भोजन) से ले कर मानव के सब कामों में खर्च होने वाली ऊर्जा (यात्रा, तरह-तरह की मशीनें, संचार, रोशनी, इत्यादि) सबकी बात कर रहे हैं।

इस दृष्टि से वह आदि मानव से ले कर आज तक के समाजों को तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटते हैं:

(१) आदिमानव के प्रारम्भिक हज़ारों सालों का समय जब मानव की ऊर्जा का स्रोत प्रकृति से भोजन इकट्ठा करना था, जैसे की जंगलों में होने वाले फ़ल, कंद, मूल, बीज, तथा पशु-पक्षियों के शिकार से मिला माँस-मछली आदि। इस समय में ऊर्जा का स्तर बहुत कम था, मानव छोटे गुटों में रहते थे और हर गुट को भोजन खोजने के लिए विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती थी, इसलिए दूसरों गुटों का आप के क्षेत्र में अतिक्रमण स्वीकार नहीं किया जा सकता था, जिसकी वजह से गुटों के बीच में हिँसा आम थी।

छिनहम्पेरे, मोज़ाम्बीक में शिकार करने का पाषाणचित्र, तस्वीरकार सुनील दीपक

चूँकि ज़मीन-जँगल किसी एक की निजि जयदाद नहीं होते थे, सामाजिक व आर्थिक स्तर पर गुटों के बीच समानता अधिक थी और विषमताएँ कम। चूँकि गुट एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे, इसलिए अधिक सामान को ले कर घूमना कठिन था, और निजि सम्पत्ति नहीं होती थी। छोटे बच्चों को खिलाना-पिलाना और उन्हें साथ ले कर घूमना भी कठिन होता था इसलिए बच्चे कम होते थे। अधिकांश लोग लम्बा नहीं जीते थे और चूँकि पुरुष अपने वारिस बच्चों के लिए कुछ विषेश नहीं छोड सकते थे, अपने बच्चे होना उतना महत्वपूर्ण नहीं था, इसलिए स्त्री-पुरुष दोनों में एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान होना ज़रूरी नहीं था, दोनों अपने साथी बदल सकते थे। ऊपर के चित्र में मोज़ाम्बीक में छिनहम्पेरे से शिकारियों का आदिकाल का पाषाणचित्र है (चित्र पर क्लिक करके बड़ा करके देख सकते हैं)।

(२) दस से सात हज़ार पहले का समय जब कृषि का विकास हुआ, तो समाज में बदलाव आये। एक ओर मानव ने पौधों को उगाना और उनके बीज चुन कर विषेश तरह के पौधों को बढ़ावा देना सीखा और दूसरी ओर, पशुओं को पालतू बनाना और विभिन्न कामों के लिए विषेश तरह के पशुओं को चुन कर उन्हें बढ़ावा देना सीखा। इससे दो तरह के समाज निकले - एक कृषि-प्रधान और दूसरे पशु-पालन प्रधान। कृषि प्रधान को ज़मीन की सीमाएँ निर्धारित करनी थीं ताकि उसकी उपज को कोई नष्ट न करे, और पशु-पालन प्रधान लोगों को खुली जमीन चाहिये थी ताकि पशु जहाँ चाहें वहाँ चर सकें, इसलिए दोनों गुटों में संघर्ष भी हुए। बहुत जगहों पर, समय के साथ अक्सर यह दोनों गुट मिल कर एक ही हो गये, जो कृषि करते थे, वही सीमित मात्रा में पशु भी पालते थे।

इस बदलाव के साथ समाज में ऊर्जा का स्तर बढ़ा, लोग एक जगह पर रहने लगे और समाज बदले। मानव गुटों के लिए भोजन की मात्रा बढ़ी, जनसंख्या बढ़ी, नये कार्यक्षेत्र बने जैसे पशुओं को चराने वाले, खुरों में नाल लगाने वाले, अनाज बेचने वाले, आदि। समय के साथ, नये शहर बने, राज्य बने, उनके राजा, अधिकारी बने।

खेतों में काम करने के लिए अधिक लोग चाहिये थे, इसलिए औरतों से घर में रहने, बच्चे पैदा करने और घर के काम करने के लिए कहा गया। ज़मीन और सम्पत्ति हुई, तो वारिस छोड़ना और अपने खून वाले वारिस होने का महत्व बढ़ा तो स्त्री-पुरुष के विवाह होना, एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान होने का महत्व बढ़ा। समाज में विषमताएँ बढ़ीं और हिंसा के नई मौके बने। सैना रखना, युद्ध करना, साम्राज्य बनाना जैसी बातें होने लगीं। 

(३) पिछले कुछ सौ सालों में ज़मीन में दबे ऊर्जा स्रोतों को निकालने और मशीनी युग के साथ मानवता का ऊर्जा स्तर बहुत अधिक बढ़ गया है और बढ़ता ही जा रहा है। आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धि, अतिसूक्ष्म नैनो-तकनीकी, रोबोट-तकनीकी, स्वचलित वाहन, हाइड्रोजन शक्ति, परमाणू शक्ति, सूर्य-शक्ति, पवन शक्ति, आदि से ऊर्जा के स्तर जब इतने बढ़ जायेंगे तो उनका मानव समाजों पर क्या असर होगा?

इस वजह से अमरीका, यूरोप आदि के विकसित देशों में कई दशकों से सामाजिक बदलाव आये हैं, जैसे कि पुरुषों और औरतों दोनों का नौकरी करना, शादी देर से करना या नहीं करना, बच्चे नहीं पैदा करना, युद्ध और हिंसा में कमी, भुखमरी और बीमारियों में कमी, मानव-अधिकारों के साथ जीव-अधिकारों की बातें, आदि। वैसे ही बदलाव अब चीन, भारत, वियतनाम, कोरिया आदि में भी आ रहे हैं, विषेशकर बड़े और मध्यम स्तर के शहरों में। इन बदलावों की वजह से विषमताएँ कम हो रही हैं, स्त्री-पुरुष के बीच भी विषमताएँ कम हो रहीं हैं, युद्ध से जुड़ी हिँसा कम हो रही है। साथ ही आज व्यक्ति अधिक अकेले रह रहे हैं लेकिन साईबर जगत के माध्यम से उनकी वरच्यूअल बातचीत-सम्पर्क भी बढ़ रहे हैं।

यह बदलाव अभी चल रहा है, पूरा नहीं हुआ है। कृषि-प्रधान जीवन से आधुनिक जीवन का बदलाव भिन्न परिस्थितों में पारम्परिक तथा आधुनिक के बीच में टैन्शन बना रहा है।  यह बदलाव भविष्य में हमें किन नयी दिशाओं की ओर ले कर जायेंगे?

भारत की पौराणिक कहानियों में यह बदलाव

कुछ दिन पहले मनु पिल्लाई (Manu Pillai) की नयी किताब (Gods, Guns and Missionaries) के बारे में एक पॉडकास्ट सुन रहा था। उन्होंने कहा कि हमारे पौराणों में वेदों-उपनिषदों के विचारों का सारे भारत में फ़ैलने का दो हज़ार साल पहले  का इतिहास लिखा है। यानि, भारत के विभिन्न स्थानों पर वेदों-उपनिषदों के विचार, किस तरह से लोगों के स्थानीय विचारों से मिले और उनमें समन्वित हो कर वह धर्म बना जिसे आज लोग हिंदु धर्म कहते हैं।

यह सुन कर मेरे मन में प्रश्न उठा कि वेद-उपनिषद के ज्ञान को सबसे पहले सोचने वाले लोग कौन थे? क्या हमारे ऋषी-मुनि, वह जंगलों में फ़ल-कंद-मूल-बीज खोजने और शिकार करने वाले छोटे गुट में रहने वाले लोग थे? या वह पशु-पालक प्रधान लोगों का हिस्सा थे? या वे कृषि प्रधान लोगों से जुड़े थे? इन ग्रंथों को लिखा बाद में गया, क्योंकि लिखाई का आविष्कार बहुत बाद में हुआ लेकिन इनकी सोच बनाने के समय किस तरह का समाज था? आप की क्या राय है?

फ़िर मन में देवदत्त पटनायक का एक आलेख याद आया जिसमें उन्होंने परशुराम की कहानी लिखी थी। इस कथानुसार, परशुराम ने सभी क्षत्रियों को मार दिया, केवल माँओं के गर्भों में बचे क्षत्रिय बालक बच गये। बाद में इन बचे हुए क्षत्रियों की विभिन्न जातियों ने शस्त्र त्याग कर दूसरे काम अपनाये। खत्री वाणिज्य में चले गये, जाट गौ पालन और पशु पालन में, कायस्थ लेखन में, आदि।

इसे पढ़ कर मुझे लगा कि शायद कहानी प्राचीन जंगलों में रहने वाले लोगों से, जिनमें अधिकतर पुरुष शिकारी और कुछ पुरोहित होते थे जब पशु-पालन और कृषि विकास के बाद शहर बने, उन पहले शहरों के जीवन के बदलाव की बात कर रही है, जहाँ जीवन यापन के नये-नये व्यवसाय निकलने लगे थे, और पहले जो शिकारी थे, उन्हें नये काम सीखने पड़े।    

अंत में

अधिकतर इतिहासकार पिछले हज़ार-दो हज़ार सालों के साम्राज्यों, युद्धों के इतिहास लिखते हैं और पुरातत्व विशेषज्ञ इतिहास पूर्व के आदिमानव की बात करते हैं।

लेकिन कुछ इतिहासकार मानवता के प्रारम्भ से आज तक की विहंगम स्थिति को समझने की कोशिश करते हैं, उन्हें पढ़ना मुझे अच्छा लगता है। इअन मौरिस की तरह मुझे जारेड डायमण्ड (Jared Diamond) और युवाल नोह हरारी (Yuval Noah Harari) जैसे इतिहासकारों की किताबें भी अच्छी लगती हैं।

उनकी हर बात से सहमत होना आवश्यक नहीं, लेकिन उनसे सोचने की नयी दिशाएँ खुल जाती हैं। 

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सोमवार, दिसंबर 30, 2024

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा

कभी-कभी जीवन आप को बरसों पुरानी, एक पुरानी भूली-बिसरी याद के सामने ला कर खड़ा देता है, और आप चकित रह जाते हैं। मुझे कुछ ऐसा ही लगा जब अचानक एक दिन, एक पुरानी पत्रिका में कुछ खोजते हुए मेरी हिन्दी लेखिका सोमा वीरा से मुलाकात हो गई।

नीचे की इस तस्वीर में उन्नीस सौ पचास और नब्बे के दशकों की सोमा वीरा जी की तस्वीरें हैं (तस्वीरों को बड़ा करके देखने के लिए, उन पर क्लिक करें)।

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा

सोमा जी की हिन्दी कहानियों का संग्रह, "धरती की बेटी", आत्माराम एण्ड सन्स ने १९६२ में प्रकाशित की थी। यह किताब मुझे बहुत प्रिय थी और मैंने इसे बचपन में पढ़ा था।

आज से करीब बीस साल पहले, २००६ में, मैंने अपने मन-पसंद हिन्दी लेखकों की बात करते हुए सोमा वीरा जी की इस किताब के बारे में लिखा था। उस आलेख के कुछ साल बाद, हिन्दी पत्रिका अभिव्यक्ति निकालने वाली लेखिका पूर्णिमा वर्मन जी ने मुझे ईमेल भेजा कि क्या उस किताब के कवर पर सोमा वीरा की कोई तस्वीर है? उन्होंने ही मुझे बताया था कि सोमा वीरा अमरीका चली गईं थीं, जहाँ उनकी २००४ में मृत्यु हुई थी, लेकिन उनकी कोई तस्वीर नहीं मिल रही थी। इस किताब के पीछे भी सोमा वीरा जी की तस्वीर नहीं थी, मैंने पूर्णिमा जी को लिखा था। लेकिन इतने वर्षों पहले की यह बात मैं भूला नहीं था, जब भी मेरी दृष्टि मेरी अलमारी में रखी "धरती की बेटी" की ओर जाती थी तो यह बात मुझे याद आ जाती थी।

फ़िर अचानक कुछ दिन पहले जब एक पुरानी पत्रिका में उनकी एक कहानी दिखी और साथ में उनकी तस्वीर भी दिखी, तो लगा कि कोई दुर्लभ वस्तु मिल गई हो। आज के मेरे इस आलेख में उसी पुरानी सोमा वीरा की कुछ बातें हैं। लेकिन सबसे पहले देखते हैं कि इंटरनेट पर उनके बारे में क्या जानकारी मिलती है।

सोमा वीरा का परिचय

इंटरनेट पर खोजें तो अभिव्यक्ति की वेबसाईट पर उनके बारे में एक पृष्ठ मिलता है, जिसके अनुसार उन्होंने अमरीका में विश्वविद्यालय स्तर पर कार्य किया, उन्हें अमरीकी लेखक के रूप में भी जाना और सम्मानित किया गया था।
 
ई-पुस्तकालय पर उनकी एक किताब "साथी हाथ बढ़ाना" पीडीएफ में पढ़ सकते हैं। लेकिन उनकी कहानियों की किताब "धरती की बेेटी" कहीं नहीं दिखी। (यह किताब मेरे पास है, मेरे विचार में अब इसका कॉपीराईट नहीं होगा। अगर इसे पीडीएफ में इंटरनेट पर डालना चाहें तो क्या करना चाहिये, इसके लिए सुझाव दीजिये)।
इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा / अंग्रेज़ी किताब का कवर

अमरीका के साईन्स फिक्शन डाटाबेस के अनुसार उनका जन्म २० नवम्बर १९३२ को लखनऊ में हुआ था। इस डाटाबेस में उनके कुछ अंग्रेज़ी उपन्यासों के नाम भी हैं और वहीं से, एक किताब के पीछे लगी, मुझे उनकी नब्बे की दशक वाली तस्वीर भी मिली (साथ में बायें)।
 
नब्बे के दशक में उन्होंने साईन्स फिक्शन विधा पर अंग्रेज़ी के बहुत से उपन्यास लिखे जो अमेज़न पर उपलब्ध हैं। अमेज़न पर ही उनके एक उपन्यास के पीछे उनके परिचय में लिखा है कि उन्होंने अमरीका में कोलोराडो विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिग्री ली और उसके बाद न्यू योर्क विश्वविद्यालय से अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध तथा आर्थिक विकास विषय में पी.एच.डी. की। वह न्यू योर्क में रहती थीं और वहीं पर, संयुक्त राष्ट्र संस्थान के साथ लेकचर्र का काम करती थीं। वह अमरीका के प्रवासी भारतीय एसोसिएशन से भी जुड़ी थीं। (नीचे उनकी एक अंग्रेज़ी किताब का कवर, अमेजोन की वेबसाईट से)

इंदो-अमरीकी लेखिका सोमा वीरा/ अंग्रेज़ी किताब का कवर
 

पचास के दशक की सोमा वीरा से मेरी मुलाकात

मैं अपनी वेबसाईट कल्पना पर हर साल अपने पिता ओमप्रकाश दीपक के कुछ पुराने लेख व कहानियाँ टाईप करके जोड़ता रहता हूँ। गुड़गाँव में मेरी छोटी बहन ने एक अलमारी में उनके कुछ कागज़ सम्भाल कर रखे हैं। कुछ सप्ताह पहले कुछ दिनों के लिए गुड़गाँव गया था तो उसी अलमारी में पापा के कागज़ देख रहा था कि अब किस आलेख को इंटरनेट पर डालना चाहिये।

तब हाथ में हिन्दी पत्रिका "सरिता" का एक अंक आया जिसमें पापा की एक कहानी छपी थी। उसके पन्ने पलट रहा था कि देखा कि उस अंक में सोमा वीरा की एक कहानी भी छपी थी, "ढहती कगारें" जो उनके कथा-संग्रह "धरती की बेटी" में भी थी। जुलाई १९५८ की सरिता के उस अंक के शुरु में "सरिता के लेखक" पृष्ठ पर सोमा वीरा जी की तस्वीर और उनका परिचय भी था। उस परिचय में लिखा था:

"पच्चीस वर्षीय सोमा वीर शाहजहांपुर में अपने परिवार के कामधंधों के बीच भी कहानियाँ लिखने के लिए भी कैसे समय निकाल लेती हैं इसके पीछे एक मनोरंजक घटना छिपी है। सातवीं क्लास में एक प्रसिद्ध लेखक की कहानी पढ़ने के बाद जब आप ने कहा कि ऐसी कहानी तो मैं भी लिख सकती हूँ तो आप के भाई ने व्यंग किया था: "पुस्तकें पढ़-पढ़ कर यदि दो-चार विचार मस्तिष्क में उभर भी आयें तो क्या! तुम्हें कहानी लिखने का सिर-पैर भी नहीं आता।"

तभी से सोमा वीर ने उच्चतम शिक्षा प्राप्त करने की ठान ली और प्रेमचंद व शरत जैसे महान लेखकों की कृतियों का अध्ययन करने लगीं। शिक्षा तो दसवीं से ज़्यादा न प्राप्त कर सकीं - विवाह हो गया - पर उच्चतम हिंदी साहित्य का अध्ययन चलता रहा। कुछ कहानियाँ लिखीं जो प्रकाशित न हुईं। उन्हें फाड़ कर फैंक दिया। निराशा हुई पर साहस नहीं छोड़ा। सरिता के नये अंकुर स्तम्भ में जब पहली बार कहानी छपी तो साहस बढ़ा। एक-दो कहानियाँ और भी छपीं, पाठकों ने उनका स्वागत किया। भाषा मंजती गई, विचार परिपक्व होते गये। आगे भी लिखते रहने का साहस बढ़ गया। इसी अंक में एक कहानी "ढहती कगारें" प्रकाशित हुई है। शीघ्र ही एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित होने वाला है।"

सोमा वीरा की जीवन यात्रा

आत्माराम एण्ड संस द्वारा १९६२ में प्रकाशित "धरती की बेटी" की भूमिका प्रसिद्ध हिंदी लेखक विष्णु प्रभाकर ने लिखी थी और यह किताब वीरा जी ने अपने पिता को समर्पित करते हुए लिखा था - "महामना पिता श्री श्यामलाल को, जिनके युगान्तकारी विचारों ने मेरे व्यक्तित्व के 'अहम्' को जन्म दिया"।

अपनी भूमिका में प्रभाकर जी ने लिखा था, "सोमा बहन हार मानने में विश्वास नहीं करतीं। वह चुनौती को स्वीकार करती हैं। उनकी लेखनी में जीने की तीव्र आकांक्षा है। इसलिए वह प्रहार करती हैं ... वह कई वर्षों से अमरीका में अध्ययन कर रही हैं। उनका जीवन संघर्षों के बीच से गुज़रा है। अपने पैरों पर खड़े हो कर उन्होंने अंधकार के बीच से राह बनाई है।"

उनकी जीवन-यात्रा क्या थी, मुझे नहीं मालूम, मैं अटकलें ही लगा सकता हूँ। जुलाई १९५८ में जब सरिता में उनकी कहानी छपी थी, तब वह शाहजहांपुर में रहती थीं और १९६२ में जब उनका कहानी-संग्रह छपा तब वह "कुछ वर्षों से" अमरीका में पढ़ रही थीं। १९५८ में वह "दसवीं पास" ग्रहणी थीं तो अमरीका में पढ़ने कैसे गईं?

शायद उनके पति अमरीका में पढ़ने गये थे और वहाँ जा कर उन्होंने हाई स्कूल पूरा किया, फ़िर विश्वविद्यालय में पढ़ीं? और साईन्स फिक्शन के विषय पर लेखन की ओर वह कब व कैसे गईं?

अंत में

अपने प्रिय लेखकों के बारे में जानना-समझना सभी को अच्छा लगता है। जब खोई हुई जानकारी मिल जाये तो और भी खुशी होती है। बहुत साल पहले पूर्णिमा जी की ईमेल ने मेरे मन में जो जिज्ञासा जगाई थी, संयोगवश अब उसके कुछ उत्तर मिल गये। क्या जाने कि उनके परिवार का कोई सदस्य इस आलेख को पढ़ कर उनके बारे में और जानकारी साझा करे!


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बुधवार, अप्रैल 24, 2024

देवों और असुरों का इतिहास

पुरात्तवविज्ञ मानते हैं कि आज से करीब ३-४ हज़ार साल पहले मध्य-एशिया से इन्दो-यूरोपी भाषी लोग भारतीय उपमहाद्वीप में आ कर बसे। उस समय भारत के इस हिस्से में सिंधु घाटी की सभ्यता के लोग रहते थे, लेकिन वह सभ्यता उस समय अपने उतार पर थी। यह लोग कैस्पियन सागर के आसपास से, विषेशकर अनातोलिया (Anatolia) क्षेत्र से आये थे, जो अब तुर्की का हिस्सा है।

भारत में आने वाले समूह के अतिरिक्त, दो अन्य इन्दो-यूरोपी भाषा बोलने वालों के समूहों के भी इतिहास में वर्णन मिले हैं - दक्षिण-पूर्वी सीरिया में मित्तानी या मितन्नी (Mitanni) साम्राज्य और आधुनिक ईरान के क्षेत्र में प्राचीन फारसी (Persian) साम्राज्य। यह तीनों जनसमूह एक जैसी भाषा बोलते थे, और उनका मूल स्थान एक ही था या आसपास था।

मैंने हाल में इतिहास की दो दिलचस्प किताबें पढ़ीं - प्राचीन ईरान के इतिहास पर लायड लेवेल्लिन (Lloyd Llewellyn) की किताब, "Persians - The Age of the Great Kings"  और पश्चिम एशिया के इतिहास पर एरिक क्लाइन (Eric H. Cline) की किताब, "1177 BC - The Year Civilization Collapsed".

एरिक क्लाइन और लायड लेवेल्लिन की इतिहास की किताबें
 

इस आलेख में इन दोनों किताबों से मिली जानकारी और इनसे जुड़ी भारतीय पुराणों की कहानियों की चर्चा है। 

लायड लेवेल्लिन का फारसी इतिहास

यह किताब, ईसा से  करीब ६०० वर्ष पहले के फारसी राजाओं के बारे में है। उस समय के फारसी राजाओं ने यवन-देश (Greece) पर कई हमले किये थे, जिन पर कुछ साल पहले हॉलीवुड की कुछ प्रसिद्ध फ़िल्में भी बनी थीं, विषेशकर "३००" और "३०० - डॉन ओफ द एम्पायर"। इन फ़िल्मों में और पुराने फारसी इतिहास की किताबों में उन राजाओं के नाम डारियस, ज़ेरेक्सिस, आदि दिये जाते हैं। 

लेवेल्लिन अपनी किताब में लिखते हैं कि फारसी राजाओं के यह नाम उन्हें यवनों ने दिये थे और वह स्वयं अपने आप को दूसरे नामों से बुलाते थे, और उनकी भाषा में वहाँ के राजाओं के नाम कुरुष, अर्तसुर, दार्यवौश (Darius), ज़्यश्यार्षा (Xerexes), विदर्न आदि थे। यानि, इतनी सदियों के बाद भी फारस देश राजाओं के नामों में संस्कृत के शब्दों की कुछ प्रतिध्वनि थी।

(क्योंकि यह सब किताबें अंग्रेज़ी में हैं, अक्सर शब्दों के उच्चारण समझना कठिन होता है, जैसे कि समझ नहीं आता कि शब्द में "त" स्वर था या "ट"।)

क्लाइन के इतिहास में मित्तानी साम्राज्य और असुर

क्लाइन की किताब में ईसा से करीब १५०० वर्ष पहले असीरी देश के दक्षिण-पूर्वी में आ कर बसने वाले मित्तानी लोगों के वर्णन हैं। उस समय असीरी लोग अक्केडियन भाषा बोलते थे और, आधुनिक मिस्र, ईराक, लेबनान, साईप्रस तथा सीरिया देशों के क्षेत्रों में विभिन्न साम्राज्य थे, जिनके आपस में सम्बंध समय के साथ बदलते रहते थे। कभी दो राजा मिल कर तीसरे पर हमला करते थे, कभी पुराने दुश्मन, दोस्त बन जाते थे, कभी वह अपने बेटे-बेटियों के विवाह करवा कर रिश्तेदार बन जाते थे। उस समय का यह इतिहास मिस्र, इराक, सीरिया आदि देशों में मिले विभिन्न दस्तावेज़ों की जानकारी से सामने आया है।

मित्तानी जब असीरी देश में आये उस समय मिस्र में थुटमोज़ तृतीय फरोहा थे। मित्तानियों ने अपने देश को हर्री या हुर्री देश बुलाया और उनकी राजधानी का नाम वाशुकर्नी या वाशुकर्णी था। वे अपने रथों पर लड़ने वाले योद्धाओं को मरियान्नु बुलाते थे। तब मिस्र के फरोहा थुटमोज़ तृतीय ने उन पर हमला करके उन्हें हरा दिया था।

थुटमोज़ से हारने के करीब बीस साल बाद, मित्तानियों के राजा सौषतत्र ने असीरी देश पर हमला किया और उन्हें हराया और उनका सोना-चांदी उठा कर अपनी राजधानी वाशुकर्नी में ले आये।

इस बात के करीब चालिस-पैंतालिस साल के बाद, ईसा से १४८५ साल पहले, मित्तानी राजा तुशरथ ने मिस्र के फरोहा अमनेहोटेप तृतीय के लिए भेंटें भेजीं थीं, और उन्होंने अपने पत्र में मिस्री फरोहा को "निम्मूरेया" कह कर सम्बोधित किया था।

तशरथ राजा के बेटे का नाम शत्तीवज़ा था, और उनके प्रधान मंत्री का नाम केलिआ था। उस समय के अन्य मित्तानी लोगों के नाम थे - अर्तात्मा, अर्तशुम्रा, नीयू, मसीबदली, तुलुब्री, और हमशशि। मिस्र के फरोहा अमनेहोटेप तृतीय ने दो मित्तानी राजकुमारियों से विवाह भी किया था।

राजा तुशरथ के समय से करीब सौ-एक सौ बीस साल बाद, मित्तानी राजा शुर्तर्न-द्वितीय और असीरी राजा असुरउबलित में युद्ध हुआ और मित्तानी हार गये। इस युद्ध में हारने के बाद मित्तानियों का राज्य कमज़ोर होता गया। करीब बीस-पच्चीस साल बाद, मित्तानियों पर अनातोलिया से हित्ती राज्य ने भी हमला किया, और उनकी राजधानी वाशुकर्नी को नष्ट कर दिया। मित्तानी वहाँ पर शायद पचास साल तक और रुके, लेकिन असीरी राजा असुरशेलमनेसेर, जिन्होंने ईसा से १२७५ - १२४५ साल पहले तक शासन किया, के समय उनके राज्य का अंत हुआ। इस समय के बाद वहाँ के किसी इतिहासिक दस्तावेज़ में मित्तानी साम्राज्य का कोई निशान नहीं मिलता।

भारत के पुराणों में

अगर तीनों इन्दो-यूरोपी भाषा बोलने वाले जन समूह एक सोत्र से निकले थे, एक जैसी भाषा बोलते थे, तो यह हो सकता है कि उनके बीच में प्रारम्भ की सदियों में कुछ सम्पर्क रहे हों। चूँकि हमारे ग्रंथों में असुरों की बात होती है, हो सकता है असीरियों से हार कर बचे हुए मित्तानी भारत आ गये और अपने साथ वह लोग वहाँ की कहानियाँ अपने साथ ले कर आये।

देवों और असुरों के युद्ध की कहानियों में अमृत-मंथन और उसमें से कीमती पदार्थों के मिलने की बात है, जिन्हें देव धोखे से चुरा लेते हैं - शायद यह कहानी भी किसी मित्तानी और असीरी युद्ध को संकेतात्मक ढंग से बताती है। इस कहानी में मित्तानी लोग चालाकी से जीत जाते हैं, शायद इस तरह से उन्होंने अपनेआप को ऊँचा दिखाने की कोशिश की हो।

डॉ. रांगेय राघव ने पुराणों पर आधारित अपनी किताब "प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ" (१९५९, किताब महल, इलाहाबाद) में विभिन्न जन समूहों से सम्बंधों के बारे में लिखा है -

नहुष के द्वितीय पुत्र ययाति ने दो विवाह किये - एक विवाह किया दैत्यगुरु व योगाचार्य शुक्राचार्य की पुत्री देवयानि से, और उनके दो पुत्र हुए, यदु और पुर्वसु; दूसरा विवाह किया असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से, और उनके तीन पुत्र हुए, द्रुह्यु, अनु और पुरु। देवयानि और शर्मिष्ठा सहेलियाँ थीं। ययाति पूरी पृथ्वी पर शासन करते थे और उन्होंने अपने राज्य को पाँच हिस्सों में बाँट कर अपने पाँचों बेटो में बाँट दिया था।

राजा दम ने दैत्यराज वृषपर्वा से धनुष चलाने की शिक्षा ली थी, दैत्यराज दुन्दुभि से अस्त्र प्राप्त किये थे, महार्षि शांति से वेदों का ज्ञान सीखा था और राजर्षि अष्टिर्षेण से योग विद्या ली थी।

वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु के वंश के राजा बाहु का दैत्यो से युद्ध हुआ। दैत्यों की ओर से शकों, यवन, पारद, काम्बोज आदि गणों ने युद्ध में भाग लिया और बाहु हार कर वन में रहने चले गये।

देवों तथा असुरों के युद्ध में दैत्य-योद्धाओं ने असुरों की ओर से भाग लिया था और वे अपने पराक्रम से देवों को हरा रहे थे। जब देवों को राजा रजि का सहारा मिला तब वे जीते। उस समय दैत्यराज प्रह्लाद इन्द्र के पद पर थे।
 
आज यह कहना कठिन है कि दैत्य और दानव कौन से देश के लोग थे, लेकिन इन कहानियों के कुछ लोग, जैसे कि यवन और शक, ऊपर वर्णित इतिहास की बातों में भी मिलते हैं। इन कहानियों में एक ही व्यक्ति के लिए कहीं पर दैत्यराज और कहीं पर असुरराज  शब्द का प्रयोग किया गया है, इसलिए हो सकता है कि उनका अर्थ एक ही हो। चूंकि इस इतिहास को उस समय संस्कृत में नहीं, बल्कि अक्काडियन या आरामाइक जैसी भाषाओं में लिखा गया इसलिए आज हम इन्हें ग्रीक या अंग्रेज़ी में अनुवादित नामों से ही जानते हैं और उनका पुराणों की कहानियों से तालमेल बैठाना कठिन हो। 
 
फ़िर भी, मित्तानी राजा तुशरथ का नाम देख कर मुझे अचरज हुआ और यह जान कर भी कि मिस्र के फरोहा ने मित्तानी राजकुमारियों से विवाह किया था। मैं सोच रहा था कि क्या उनके बाद के फरोहा, जैसे कि रामसेस आदि के नामों पर भी क्या मित्तानी भाषा का प्रभाव पड़ा?

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शुक्रवार, मार्च 22, 2024

ऋग्वेद कथा

गृत्समद आश्रम के प्रमुख ऋषि विद्यार्थियों को पढ़ा रहे थे, जब उन्हें समाचार मिला कि उनसे मिलने उनके बचपन के मित्र विश्वामित्र आश्रम के ऋषि गाथिन आये थे। गृत्समद ऋषि अपने मित्र की आवभगत करने गये, उनसे गले मिले और उन्हें आदर से अपने शिक्षाकक्ष में ले आये, विद्यार्थियों से उनका परिचय कराया, उन्हें बैठने का स्थान दिया, जल और भोजन दिया।

"प्रिय भाई गाथिन, तुम कितने समय के बाद आये, आशा है कि तुम्हारे समुदाय में सब कुशल है", उन्होंने मेहमान से कहा। कुशल-मंगल पूछने और औपचारिकता की बातों के बाद उन्होंने मित्र से पूछा, "इतनी लम्बी यात्रा करके यहाँ आने का क्या कोई विषेश कारण है?"

गाथिन बोले, "पिछली सदियों में आर्यावर्त बहुत बढ़ गया है और बदल गया है। वह समय जब सब राजन मिल कर एक मनु, एक इन्द्र और सप्तऋषियों का चुनाव करते थे, लोग उस समय के बारे में भूलते जा रहे हैं। आर्यावर्त इतना फैल गया है कि इसके बाहर वाले हिस्सों के जनपदों के आश्रमों में कौन से ऋषि हैं और वह कौन से मंत्र पढ़ा रहे हैं, यह सब हमें पता ही नहीं हैं। जब प्रथम मनु का मनवन्तर था और पहले सप्तऋषि मण्डल में वाशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वानदेव तथा शौनक जैसे ऋषि थे, तब ऐसा नहीं था। लेकिन उसके बाद, पिछली सदियों में मनु बदले, मनवन्तर बदले और उनके सप्तऋषि भी बदलते रहे, तो उनका इतिहास कहीं पर संजोया नहीं गया।"

गृत्समद ऋषि बोले, "इतिहास की इन सब बातों से तुम क्यों परेशान हो रहे हो?"

विश्वामित्र बोले, "कुछ समय पहले मेरे कुछ शिष्य दूर देश की यात्रा से लौटे, उन्होंने बताया कि आर्यावर्त के सुदूर राज्यों में ऐसे नये ऋषि हैं जो अपने शिष्यों को नया पढ़ा रहे हैं, उनके कुछ ऐसे मंत्र और ऋचाएँ भी हैं, जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी थीं। तबसे मैं इसके बारे में सोच रहा हूँ और तुम्हारी राय जानना चाहता था।"

गृत्समद ऋषि बोले, "यह तो प्रकृति का नियम है, इस जगत में कुछ भी शाश्वत नहीं, फ़िर बदलाव से कैसा भय?"

विश्वामित्र ऋषि बोले, "लेकिन अगर भविष्य के हमारे ऋषि भूल जायेंगे कि हमारी संस्कृति और सभ्यता की नींव किस मूल दर्शन तथा किन विचारों पर खड़ी हुई थी, क्या वह भय की बात नहीं?"

गृत्समद ऋषि मुस्कराये बोले, "कैसे भूल जायेंगे? हमारे शिष्य, हमारे मंत्रों और ऋचाओं के केवल शब्द कंठस्थ नहीं करते, उनके हर सुर के नियम हैं, हर ध्वनि को याद किया जाता है। हमारे शिष्य और हमारी व्यवस्था इतनी सक्षम हैं कि हम अपने मंत्रों को सदियों के बाद भी इस तरह से दोहरा सकते हैं कि उनकी लाखों ध्वनियों में से एक ध्वनि भी नहीं बदलती। हमने पूर्वैतिहासिक आदिकाल के अपने पूर्वजों की उन ऋचाओं को भी सम्भाल कर संजोया है, जिनकी ध्वनियों के अर्थ भी आज कोई नहीं जानता या समझता। अगर हमने उस परम्परा को भी लुप्त नहीं होने दिया, तो फ़िर कैसा भय?"

विश्वामित्र ऋषि भी मुस्कराये, बोले, "मुझे हमारे शिष्यों की क्षमता कम होने का भय नहीं है, बल्कि आर्यावर्त के फैलने का और उस परिधी पर नये की उत्पत्ति की चिंता है, कि कल यही आर्यावर्त इतना बड़ा हो जायेगा कि उसके एक छोर के व्यक्ति, उसके दूसरी छोर के व्यक्ति को नहीं पहचानेंगे और उन्हें नये-पुराने का भेद नहीं मालूम होगा।"

गृत्समद ऋषि के माथे पर बल पड़ गये, बोले, "इसका क्या उपाय है?"

"मेरे विचार में इसका उपाय है कि हम लोग अपने प्रमुख ऋषियों को और आश्रमों के प्रतिनिधियों को एक जगह पर एकत्रित करें", विश्वामित्र ऋषि ने कहा, "और सर्वसम्मत राय से उन मंत्रों तथा ऋचाओं की सूची बनायें जो हमारे पूर्वजों की निधि हैं और भविष्य के लिए जिनकी रक्षा करना महत्वपृ्र्ण है। आजकल हमारे आश्रमों में शब्दों को लिपीबद्ध करने की नयी तकनीक बनी है, कुछ लोग इसे ब्राह्मी लिपी कहते हैं। हमारे जिन मंत्रों तथा ऋचाओं को सर्वसम्मति से स्वीकारा जायेगा, हम उन्हें लिपीबद्ध कर देंगे ताकि भविष्य में उनका निशान रहे। कालांतर में जब नये ऋषि, अपने ध्यान और अंतर्दृष्टि से अगर नये मंत्र और ऋचाओं का ज्ञान जोड़ेंगे, तो भविष्य में उनके लिए नये ग्रंथ बन सकते हैं लेकिन उससे पहले हम अपने पित्रों के पूर्व-ज्ञान को भी सम्भाल कर रखें।"

गृृत्समद ऋषि सोच कर बोले, "बात तो तुम ठीक कह रहे हो। मैंने कृष्णद्वैपायन नाम के एक ऋषि के बारे में सुना है जिन्होंने ब्राह्मी लिपि में कुछ मंत्र लिपिबद्ध किये हैं, हमारे प्राचीन मंत्रों को लिपीबद्ध करने का काम उनके आश्रम को सौंपा जा सकता है।"

***

गृत्समद और विश्वामित्र आश्रम के ऋषियों की इस बातचीत के सात माह के बाद वह सभा आयोजित हुई जिसमें दूर-करीब के सभी आश्रमों के ऋषियों को आमंत्रित किया गया।

सभा में सबसे पहले उन मंत्रों और ऋचाओं पर विचार किया गया जो कि पित्रों की परम्परा से चले आ रहे थे। इन सभी १,९७६ मंत्रों को जो १९१ सूक्तों में विभाजित थे, इन्हें प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया। फ़िर सात प्राचीन आश्रमों के ऋषियों को अपनी-अपनी परम्परा के अन्य महत्वपूर्ण मंत्र और सूक्त बताने के लिए कहा गया। उन सबके योगदानों को विभिन्न मण्डलों में जोड़ा गया। गृत्समद ने दूसरे, गाथिन विश्वामित्र ने तीसरे, वामदेव गौतम ने चौथे, अत्रि ने पाँचवें, वासर्पत्य भारद्वाज ने छठे, वशिष्ठ ने सातवें, एवं अंगीरस व कण्व ने आठवें मण्डल के मंत्र दिये।

अंत में बाकी के ऋषियों से योगदान माँगा गया ताकि तब तक हुए विमर्श में अगर कोई महत्वपूर्ण मंत्र छूट गये थे तो उन्हें भी जोड़ा जा सके। 

सभा के अंत तक, ऋग्वेद तैयार था, जिसमें कुल १०,५७९ मंत्र जोड़े गये, जो १०२८ सूक्तों में विभाजित थे, पूरा ऋग्वेद दस मण्डलों में विभाजित था।

इस सारे विचार-विमर्श से जो मंत्र, सूक्त तथा ऋचाएँ चुनी गयीं थीं, कृष्णद्वैपायन ने अपने शिष्यों की सहायता से उन्हें लिपिबद्ध किया। इस तरह से ऋषियों के पहले ग्रंथ का संकलन पूरा हुआ जिसे ऋग्वेद संहिता का नाम दिया गया। इस महत्वपूर्ण कार्य में योगदान देने वाले ऋषि कृष्णद्वैपायन को वेद-व्यास का नाम मिला।

एक बार प्राचीन ज्ञान, कथाओं और परम्पराओं को लिपिबद्ध करने का काम शुरु हुआ तो वह फ़िर नहीं रुका।

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टिप्पणियाँ

१. यह काल्पनिक कहानी है, हमारे किसी ग्रंथ में ऐसा वर्णन नहीं है। मैंने बहुत वर्षों तक अंतर्राष्ट्रीय सभाओं की रिपोर्टें तैयार की हैं, ऋग्वेद के ढांचे को देख कर मुझे लगा कि वह भी किसी ऐसी ही सभा में हुए विमर्श का नतीजा लगता है। यह कथा इसी विचार का स्वरूप है।

२. इस कहानी को लिखने के लिए मैंने ऋग्वेद से जुड़े कुछ ग्रंथों को पढ़ा और उनसे जानकारी ली, जिनमें प्रमुख था "ऋग्वेद संहिता भाषाभाष्य", जिसके भाष्यकार पंडित जयदेवशर्मा थे, संशोधनकर्ता आचार्य भद्रसेन थे, प्रकाशक आर्य साहित्य मण्डल, अजमेर, २००८ विक्रम संवत (१९५२ ई.) द्वारा छपा ग्रंथ का तीसरा संस्करण था। इसके अनुसार "वेदों को अनादि काल का ईश्वरीय ज्ञान मानने वालों ऋषियों को वेदमंत्रों के कर्ता नहीं माना, प्रत्युत मंत्रों का दृष्टा स्वीकार किया है ... अग्नि, वायु और आदित्य, तपस्यायुक्त इन तीनों से ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद, यह तीनों प्रकट हुए, इसी का मनु ने अनुवाद किया है ... शांखायन स्रोत सूत्र में ऋग्वेद के प्रथम प्रवक्ता के रूप में अग्नि को स्वीकारा गया है ... इस संकल्प में अग्नि को उपदेष्टा, वायु को उपश्रोता और आदित्य को अनुख्याता स्वीकार किया है ... वैदिक साहित्य में 'ऋषि' शब्द का प्रयोग 'आचार्य' के अर्थ में किया जाता है, यानि इसका अर्थ 'विद्वान-गुरु' है"।

३. हिंदी लेखक और संस्कृत विद्वान डॉ. रांगेय राघव की पुस्तक "प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ" (सन् १९५९ में "किताब महल" द्वारा प्रकाशित) में दी गयी जानकारी के अनुसार - 

"मानव समूहों के अधिनायकों को मनु कहते थे और हर मनु के कार्यकाल को मन्वंतर कहते थे। प्रथम मनु, यानि स्वयंभू मनु का जन्म ब्रह्मा से हुआ। स्वयंभू से पहले ब्रह्मा ने नौ अन्य मानस पुत्रों को जन्म दिया, जो नौ-ब्रह्मा बने, उनके नाम थे - भृगु, पुलस्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वशिष्ठ। राजा उत्तम के पुत्र औतम तीसरे मनु बने थे, स्वरोचिष आठवें मनु थे, सावर्णि नवें मनु थे, ब्रह्मसावर्णि दसें मनु थे, आदि।

हर मन्वंतर में मनु के साथ एक इन्द्र और कुछ देवगण-गुट भी नियुक्त होते थे। इन्द्र की पदवी पाने के लिए यज्ञ और तपस्या आवश्यक होती थी। हर देवगण गुट में १०-१५ व्यक्ति होते थे, जोकि यज्ञयोगी होते थे। जैसे कि औतम मनु के समय सुशान्ति नाम के इन्द्र हुए और उनके साथ पाँच देवगण-गुट थे - स्वधामा, सत्य, शिव, पतर्दन, और वशवर्ती। जबकि रैवत मनु के मन्वंतर में चार देवगण-गुट थे - सुमेधा, भूपति, वेकुंठ और अमिताभ, और हर गुट में चौदह व्यक्ति थे।

हर मन्वंतर में सात ऋषि भी होते थे, जैसे कि औतम मनु के समय गुरु वष्शिठ के सात पुत्रों को सप्तऋषि की पदवी मिली थी।

समाज से दूर वन में रहने वालों में मुनि भी होते थे। यह विवाह नहीं करते थे और तपस्या, पूजा जैसे कामों में जीवन बिताते थे।"

उपरोक्त विवरण से लगता है कि प्राचीन काल में यज्ञों यानि अग्नि पूजा को बहुत महत्व दिया जाता था, और यज्ञ करने वाले को इन्द्र तथा देवगण जैसी पदवी मिलती थी। यानि इन्द्र व देवगण पुजारी होते थे, उनका काम यज्ञ करना था। जबकि ऋषि ज्ञानी व्यक्ति होते थे, वनों में रहते थे, उनका काम आश्रम में शिक्षा देने से जुड़ा था।

मनु, इन्द्र, देवगण, ऋषि, आदि की नियुक्ति एक मन्वंतर के अंतर्गत होती थी, यानि जब मनु बदलते थे तो उनके साथ इन सब अन्य पदों पर नये व्यक्ति नियुक्त होते थे।

जबकि मुनि ऋषियों से भिन्न थे, उनका काम अकेले रहना, तपस्या तथा यज्ञ करना आदि थे (शायद मुनि शब्द मौन से बना है?)। लेकिन नये मनु के साथ नये मुनियों की नियुक्ति नहीं होती थी, मुनि बनने का निर्णय व्यक्तिगत स्तर लिया जाता था।

दूसरी बाद समझ में आती है कि राजा और मनु के पद में अंतर था, और मनु का पद राजा से ऊँचा था। शायद मनु के आधीन बहुत से राजा आते थे, जैसे कि केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार? मनु की क्या ज़िम्मेदारी होती थी, यह बात इस किताब में दिये हुए विवरण से समझ नहीं आती।

तीसरी बात जो इससे समझ आती है, वह है कि मनु, इन्द्र, देवगण और ऋषि, इसी धरती के व्यक्ति होते थे, जिन्हें चुना जाता था या नियुक्त किया जाता था। इस किताब के विवरण में मनु बनने के लिए या इन्द्र बनने के लिए युद्ध करने या जीतने की कोई बात नहीं लिखी है। 

इसमें जिस तरह के प्रशासनिक आयोजन की बातें की गई हैं उनसे यह यायावर समूह का वर्णन नहीं लगता, बल्कि एक जगह पर स्थायी रहने वाला शहरी जनसमूह लगता है। यानि अगर आर्य लोग मध्य एशिया से यात्रा करके भारत में आये थे, तो जब ऋग्वेद लिपिवद्ध किया गया, तब तक यह लोग उनके वंशज थे जो पीढ़ियों से एक स्थान पर रहते थॆे, जहाँ इन्होंने राज्य और शहर बनाये थे।

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सोमवार, मार्च 18, 2024

हमारी भाषा कैसे बनी

कुछ दिन पहले मैंने भारत के जाने-माने डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा की १८५७ के लोक-गीतों पर बनी फ़िल्म के बारे में लिखा था। आज उन्हीं की एक अन्य फ़िल्म, "जिस तरह हम बोलते हैं" पर लिख रहा हूँ।

इस फ़िल्म को बनाने में उन्होंने हिंदी भाषा के विकास के प्रख्यात जानकार लोगों का सहयोग लिया, जिनमें प्रो. नामवर सिंह का नाम सबसे पहले आता है, वह इस फ़िल्म के सूत्रधार थे। अन्य विद्वान जिन्होंने फ़िल्म में सहयोग दिया उनमें प्रमुख नाम हैं वाराणसी के प्रो. जुगल किशोर मिश्र तथा प्रो. शुकदेव सिंह, उज्जैन के डॉ. कमलदत्त त्रिपाठी और दिल्ली विश्वविद्यलय के प्रो. अजय तिवारी

नीचे फ़िल्म के पहले वीडियो क्लिप में प्रो. नामवर सिंह

फ़िल्म में संस्कृत से पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के रास्ते से हो कर आज की भाषाओं और बोलियों के विकास की गाथा चित्रित की गई थी। यह फ़िल्म २००४-०५ के आसपास दूरदर्शन इंटरनेशनल चैनल पर तथा अमरीका में विश्व हिंदी दिवस समारोह में दिखायी गई थी।

जब मैंने यह फ़िल्म पहली बार देखी थी तो मुझे लगा था कि इसमें हमारी भाषाओं और बोलियों के बारे में बहुत सी दिलचस्प जानकारी है, और इस फ़िल्म को जितना महत्व मिलना चाहिये था, वह नहीं मिला था। इसलिए नवम्बर २०२२ में मैंने इसे अरुण के साथ दोबारा देखा और उससे फ़िल्म में दिखायी बातों पर लम्बी बातचीत को रिकॉर्ड किया। कई महीनों से इसके बारे में लिखने की सोच रहा था, आखिरकार यह काम कर ही दिया।

फ़िल्म में दी गई कुछ जानकारी मुझे गूढ़ तथा कठिन लगी। चूँकि फ़िल्म में सबटाईटल नहीं हैं, हो सकता है कि कुछ बातें मुझे ठीक से समझ नहीं आयी हों, इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा मांगता हूँ। मेरे विचार में दूरदर्शन को इस फ़िल्म को इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध कराना चाहिये।

"जिस तरह हम बोलते हैं" - फ़िल्म के बारे में निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा से बातचीत

अरुण चढ़्ढ़ा: "हम लोग स्कूल में पढ़ते थे कि भारत की बहुत सी भाषाएँ हैं, हर प्रदेश की अपनी भाषा है, और हर भाषा की बहुत सी बोलियाँ हैं। कहते हैं कि यात्रा करो तो हर दो कोस पर बोली बदल जाती है। इसी बात से मैं सोच रहा था कि हिंदी कैसे विकसित हुई, और हिंदी से जुड़ी कौन सी प्रमुख बोलियाँ हैं, उनके आपस में क्या सम्बंध हैं, उनके संस्कृत से क्या सम्बंध हैं। एक बार इसके बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि जिसे हम एक भाषा कहते हैं, उसमें कई तरह के भेद हैं। जैसे कि संस्कृत भी दो प्रमुख तरह की है, वैदिक संस्कृत तथा लौकिक संस्कृत। तो मेरे मन में आया कि हमारी भाषाओं के विकास में यह सब अंतर कैसे आये और क्यों आये? (नीचे तस्वीर में फ़िल्म-निर्देशक अरुण चढ़्ढ़ा)

हमारी हिंदी की जड़े कम से कम चार हज़ार वर्ष पुरानी हैं और आज की भाषा उस प्राचीन भाषा से बहुत भिन्न है, उनमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। अगर कोई भाषा जीवित है तो वह समय के साथ बदलेगी। लोग कहते हैं कि हमारी भाषा में मिलावट हो रही है, भाषा की शुचिता को बचा कर रखना चाहिये, लेकिन अगर भाषा जीवित है तो उसका बदलते रहना ही उसका जीवन है। जयशंकर प्रसाद, मैथिलीचरण गुप्त और निराला जैसे साहित्यकारों ने, हर एक ने अपने साहित्य में अपने समय की भाषा का उपयोग किया है। 

यही सब सोच कर मुझे लगा कि इस विषय पर फ़िल्म बनानी चाहिये कि प्राचीन समय से ले कर हमारी भाषा कैसे विकसित हुई, कैसे कालांतर में उससे अन्य भाषाएँ और बोलियाँ बनी। सबसे पहले मैंने इसके बारे में नेहरु संग्रहालय के एक लायब्रेरियन से बात की, फ़िर उनके सुझाव पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में बात की, वहाँ प्रोफेसर सब्यसांची ने सलाह दी, इस तरह से इस विषय पर सामग्री एकत्रित करनी शुरु की। तब प्रो. नामवर सिंह से बात हुई, जानकारी देने के साथ-साथ उन्होंने इस फ़िल्म का सूत्रधार बनना स्वीकार कर लिया। फ़िर, उज्जैन की संस्कृत एकादमी के निदेशक के. एम. त्रिपाठी साहब मिले, वाराणसी संस्कृत विद्यापीठ के प्रो. जुगल किशोर मिश्रा और अन्य बहुत से लोग इस काम में साथ चले, उन सबके सहयोग के बिना इस फ़िल्म को नहीं बना सकता था। (नीचे फ़िल्म के वीडियो-क्लिप में प्रो. युगलकिशोर मिश्रा लौकिक संस्कृत से प्राकृत के बारे में बताते हैं)

चूँकि भाषा लिखने, पढ़ने और बोलने का माध्यम है, यह दुविधा थी कि उस पर फ़िल्म कैसे बनाई जाये। मुझे लगा कि फ़िल्म के माध्यम से हम यह दिखा सकते हैं कि बोली हुई भाषा के उच्चारण कैसे होते हैं। जैसे कि उज्जैन में त्रिपाठी साहब को प्राकृत भाषा के उच्चारण की जो जानकारी थी वह अपने आप में अनूठी थी। वाराणसी में प्रो. मिश्र थे जिनके विद्यार्थयों का संस्कृत थियेटर का दल था, उन लोगों ने संस्कृत नाटकों के मंचन से फ़िल्म में सहयोग दिया था।

इस फ़िल्म की सारी रिकॉर्डिन्ग लोकेशन पर ही की गई, मैं इसकी डबिन्ग नहीं चाहता था। खुली जगहों में, भीड़ में, कैसे लाइव रिकॉर्डिन्ग की जाये, यह हमारी चुनौती थी। यह फ़िल्म बीस-बीस मिनट के पाँच भागों में प्रसारित की गई थी, बाद में उन्हें जोड़ कर मैंने एक घंटे की फ़िल्म भी बनाई थी। (टिप्पणी सुनील - इस आलेख के लिए मैंने वह एक घंटे वाली फ़िल्म देखी थी)

वैदिक तथा लौकिक संस्कृत और उसकी व्याकरण

फ़िल्म का प्रारम्भ जयशंकर प्रसाद की "कामायनी" की एक कविता से होता है। फ़िर नामवर सिंह बताते हैं कि "ऋग्वेद की पहली ऋचा वाक-सूक्त है, जिसमें वाक् यानि भाषा की महिमा गाई गई है। हडप्पा में मूर्तियाँ, चित्र, भवन, सब कुछ मिलते हैं लेकिन अभी तक उनकी लिपी नहीं पढ़ी जा सकी। इस तरह से हम उनकी सभ्यता के बारे में बहुत कुछ जानते हैं लेकिन उनके साहित्य के बारे में कुछ नहीं जानते। किसी भी समाज, संस्कृति, सभ्यता की, बिना उसकी भाषा जाने, उसकी पहचान पूरी नहीं होती।"

वैदिक संस्कृत दो हज़ार वर्ष पहले जैसी बोली जाती थी, आज भी वैसी ही बोली और लिखी जाती है, इसके शब्दों को आगे-पीछे नहीं कर सकते। फ़िल्म में वैदिक संस्कृत के मंत्रो के उच्चारण को छाऊ नृत्य के साथ दिखाया गया है।

लेकिन विभिन्न वेदों में मंत्रों के उच्चारण और ताल में अंतर आ जाता है। जैसे कि हिरण्यगर्भ समवर्ताग्रह ऋचा है जो तीन वेद ग्रंथों (ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद) में मिलती है, इसके शब्द नहीं बदल सकते, लेकिन हर वेद के साथ उसका उच्चारण और ताल बदल जाते हैं। यह इस लिए होता है क्योंकि यह स्वाराघात-युक्त भाषा है, इसमें सात स्वरों का समावेश है, इसलिए उनका उच्चारण भी सप्त स्वर-नियमों के अनुसार होता है। यह सप्त सुर सामवेद में स्फटित रूप में मिलते हैं, जबकि ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद में यह सात सुर तीन स्वरों (उदात्त, अनुदात्त और छड़िज) में समाहित हो जाते हैं। उदात्त में निशाद और गंधार मिल जाते हैं, अनुदात्त में ऋषभ और भैवत, और छड़िज में षड़ज, मध्यम और पंचम मिल जाते हैं। इस वजह से हर वेद की उच्चारण शैली में अंतर होता है।

वेद ग्रंथ वैदिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जबकि रामायण और भगवद्गीता जैसे ग्रंथ लौकिक संस्कृत में लिखे गये हैं, जिनकी भाषा में समय के साथ बदलाव हो सकता है। पाणिनी व कात्यायन जैसे आचार्यों ने व्याकरण के नियमों की व्याख्या करके संस्कृत को व्यवस्था दी, उन्हीं नियमों का प्रयोग हिंदी जैसी भाषाएँ भी करती हैं।

फ़िल्म में बताया गया है कि, "पाणिनी की व्याकरण संस्कृत ही नहीं, किसी भी भाषा की पहली व्याकरण थी, जिसे उन्होंने १४०० सूत्रों में लिखा था। कहते हैं कि शिव जी ने चौदह बार डमरू बजाया, उस डमरू पर १४ स्वरों वाले "अइउड़ सूत्र" से संस्कृत की उत्पत्ति हुई, उन्हीं सूत्रों पर ही पाणिनी ने अष्टाध्यायी व्याकरण लिखी। उन्होंने संस्कृत की मुख्य धातुओं को निश्चित किया, जिनमें उत्सर्ग, प्रत्येय आदि जोड़ कर भाषा के शब्द बनाते हैं।"

फ़िल्म में लौकिक संस्कृत के उदाहरण कालीदास के नाटक के माध्यम से दिखाये गये हैं। उज्जैन के त्रिपाठी जी बताते हैं कि महाकवि कालीदास के समय में लौकिक संस्कृत संचार की भाषा थी और उसकी प्रवृति धीरे-धीरे प्राकृत भाषा में मुखरित हो रही थी, क्योंकि आम व्यक्ति जब उसे बोलते थे तो उनकी बोली में उच्चारण और व्याकरण का सरलीकरण हो जाता था। (नीचे फ़िल्म से वीडियो-क्लिप में डॉ. कमलेश दत्त त्रिवेदी)


 संस्कृत की परम्परा दक्षिण भारत में भी रही है। जैसे कि केरल के मन्दिरों में संरक्षित संगीत तथा नाट्य पद्धिति कुड़ीयट्टम का इतिहास दो हज़ार वर्ष पुराना है। करीब तीन सौ साल पहले इसका कथ्थकली स्वरूप विकसित हुआ है। इन पद्धतियों में वैदिक गान को तीन स्वरों (उदात्त, अनुदत्त और छड़िज) में ही गाते हैं, लेकिन कुड़ीयट्टम शैली में उनमें भावों को भी जोड़ देते हैं।

प्राकृत भाषा

ईसा से करीब छह सौ साल पहले, प्राकृत भाषाएँ लौकिक संस्कृत के सरलीकरण से बनने लगीं। समय के साथ प्राकृत के कई रुप बदले, इसलिए प्राकृत कई भाषाएँ थीं। सरलीकरण से संस्कृत के तीन वचन से दो वचन हो गये, कुछ स्वर जैसे ऋ, क्ष, आदि प्राकृत में नहीं मिलते थे। भगवान बुद्ध ने जिस प्राकृत भाषा में अपनी बात कही उसे "पालि" कहते हैं। जैन तीर्थांकर महावीर और सम्राट अशोक ने भी प्राकृत में ही अपने संदेश दिये। समय के साथ इनसे अपभ्रंश तथा आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ।

भारत के नाट्यशास्त्र में ४२ तरह की भाषाओं की बात की गई है, जबकि कोवल्य वाक्यमाला ग्रंथ में १८ तरह की प्राकृत की बात की गई है, जिनमें तीन प्रमुख मानी जाती थीं - मगधी, महाराष्ट्री और शौरसैनी। महाकवि कालीदास ने तीनों प्राकृत भाषाओं का अपने नाटकों में सुन्दर उपयोग किया था। जैसे कि उनके रचे एक नाटक में एक पात्र लौकिक संस्कृत बोलता है, गद्य में बोलने वाले पात्र शौरसैनी बोलते हैं और इसके गीत महाराष्ट्री में हैं। 

अपभ्रंश, औघड़ी, अवधी, ब्रज, हिन्दवी, खड़ी बोली ...

संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से औघड़, इस तरह से शताब्दियों के साथ भाषाएँ बदलती रहीं। महाकवि कालीदास ने विक्रमवेशी में अपभ्रंश का उपयोग भी किया और पतांजलि ने अपना महाभाष्य अपभ्रंश में लिखा।

अपभ्रंश से पश्चिम में गुजरात तथा राजस्थान में पुरानी हिंदी और ब्रज भाषाएँ निकलीं जिनका वीर रस की रचनाओं के सृजन में प्रयोग किया गया। दलपत राय ने खुमान रासो, चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो, आदि ने अपनी रचनाओ के लिए इन्हीं भाषाओं का उपयोग किया। राजस्थान में इन रचनाओं को डिन्गल तथा पिन्गल भाषाओं में गाने की परम्पराएँ बनी। डिन्गल भाषा में शक्ति, ओज, और उत्साह अधिक होता है, जबकि पिन्गल में अधिक कोमलता है, वह ब्रज भाषा के अधिक करीब है। डिन्गल भाषा में युद्ध से पहले राजा और योद्धाओ को उत्साहित करने के लिए गाते थे। (नीचे वीडियो में श्री शक्तिदान कवि डिन्गल और पिन्गल के बेद के बारे में बताते हैं)

मैथिल कवि विद्यापति ने अवहट भाषा में लिखा, जैसे कि - "कुसमित कानन कुंज वसि, नयनक काजर घोरि मसि। नखसौ लिखल नलिनि दल पात, लिखि पठाओल आखर सात।" (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. शुकदेव सिंह विद्यापति की अवहट के बारे में)



बाहरवीं-तेहरवीं शताब्दी में हिंदी का स्वरूप सामने आने लगा। निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो ने बहुत सी रचनाएँ इसी हिन्दवी भाषा में लिखीं, जैसे कि उनका यह गीत, "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके, प्रेम भटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके। गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ, बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके", बहुत प्रसिद्ध हुआ। खुसरो ने एक नया प्रयोग भी किया जिसे "दो सुखने" कहते हैं, कविताएँ जिनका एक हिस्सा फारसी में था और दूसरा हिंदी में।

मौलाना दाउद ने अवधी भाषा में "चांदायन" महाकाव्य की रचना की जिसमें उन्होंने चौपाई और दोहों को लिखा, यह ग्रंथ तुलसीदास के मानस से करीब दो-ढाई सौ साल पहले था। उन्होंने जिस तरह से चांदायन में रूप और प्रेम की पीड़ा का वर्णन किया, वह अनोखा था। इस तरह से हिंदी में सूफी काव्यधारा की परम्परा का प्रारम्भ हुआ।

अवधी लेखन की परम्परा में आगे चल कर मालिक मुहम्मद जायसी ने "पद्मावत" को रचा। अवधी भाषा का क्षेत्र बहुत बड़ा था और उसमें एक जगह से दूसरी जगह में कुछ अंतर थे। जायसी की अवधी, जौनपुर और सुल्तानपुर की अवधी थी, वह बहुत लोकप्रिय हुई लेकिन सबसे समझी नहीं गई।

तुलसीदास जी बहुत घूमे थे, उन्होंने अपनी अवधी को अखिल भारतीय रूप दिया, अपनी बात को सरल भाषा में कहा जिसे आम लोग, हलवाई, हज्जाम भी बोलते-समझते थे। उनके काव्य में इतनी उक्तियाँ हैं जिन्हें गाँव के अनपढ़ लोग भी याद रखते हैं और आम जीवन में बोलते हैं। (नीचे के वीडियो-क्लिप में फ़िल्म से प्रो. अजय तिवारी जायसी और तुलसीदास की अवधी के बारे में बताते हैं)




१४वीं - १७वीं शताब्दियों में "खड़ी बोली" सामने आई। कबीर जैसे संत-कवियों ने खड़ी बोली में अंधविश्वास, कर्मकाँड, छूआ-छूत के विरुद्ध कविताएँ गाईं, जो आज तक लोकप्रिय हैं।
 
हिंदी का सारा साहित्य ब्रज भाषा और अवधी में लिखा गया। जो मिठास ब्रज भाषा में मिलती है, वह अवधी में नहीं है। इस मिठास का सारा श्रेय महाकवि सूरदास को जाता है जिन्होंने ब्रज भाषा में लिखा, उसे विकसित किया और लोकप्रिय बनाया।
 
अठाहरवीं शताब्दी में हैदराबाद में ख्वाज़ा बंदानवाज़ ने मिली-जुली भाषा की बुनियाद रखी जिसमें हिंदी, उर्दू और फारसी मिली-जुली थीं। इसकी लिपी हिंदी थी और यह दखिनी हिंदी या दखिनी उर्दू कहलाती है।
 
१८७३ में भारतेन्दू हरीशचन्द्र ने ऐसी कविताएँ लिखीं जिनसे हिंदी नयी चाल में ढली। उनकी कविताएँ ब्रज भाषा में थीं, लेकिन उन्होंने अपना सारा गद्य-लेखन और नाटक खड़ी-बोली में लिखे। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में देवकीनन्दन खत्री, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, यशवंत, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा जैसे लेखकों ने भारत के विभिन्न वर्गों, स्तरों, क्षेत्रों, समाजों से, स्थानीय शब्दों को ले कर अपनी लेखनी से जोड़ा जिससे खड़ी-बोली समृद्ध हुई और हिंदी का विकास व विस्तार हुआ।

निराला ने एक ओर जटिल विचारों की अभिव्यक्ति, "नव गति, नव लय, ताल छंद नव, नवल कंठ नव जलद मंद्र रव। नव नभ के नव विहग वृंद को नव पर नव स्वर दे" जैसे शब्दों में की, जबकि "जीवन संग्राम" जैसी कविता में उसी निराला ने सामान्य बोलचाल की भाषा का उपयोग किया। 

पिछले पचास वर्षों में हिंदी तेज़ी से बदली है। सामाजिक गतिशीलता, आर्थिक बदलावों, बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों तथा प्रवासी संस्कृति का प्रभाव हमारी भाषा पर दिखता है। मीडिया ने इसे फैलाने में मदद की है। यह वह हिंदी है जिसमें अंग्रेज़ी, उर्दू आदि के साथ, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के शब्द भी मिल रहे हैं।

अंत में

इस आलेख में हिंदी और उत्तर भारत की भाषाओं के बारे में जो जानकारी है, वह भाषा और इतिहास पढ़ने वालों के लिए नयी नहीं होगी, लेकिन मेरे लिए नयी थी। आज एक ओर भाषा की शुद्धता को बचाने और उसे संस्कृत से जोड़ने की कोशिशें हैं, और दूसरी ओर, उसके सरलीकरण तथा उसमें अन्य भाषाओ से शब्दों को जोड़ने का क्रम भी है।
 
सौ साल बाद हिंदी होगी या नहीं, और होगी तो कैसी होगी? कत्रिम बुद्धि का जिस तरह से विकास हो रहा है उससे भाषाओं की विविधता बनी रहेगी या लुप्त हो जायेगी? इन प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं हैं, लेकिन पिछले दो-तीन हज़ार वर्षों का इतिहास यही सिखाता है कि समय के साथ बदले बिना भाषा जीवित नहीं रह पाती।

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