शनिवार, जून 27, 2026

अजेय की कविता में खड़ा आदमी

अजेय की एक प्रसिद्ध कविता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब भी मैं उसे याद करता हूँ तो हर बार उसके एक शब्द पर अटक जाता हूँ। वह शब्द एक क्रिया है, जो मुझे अधूरी लगती है। और उसके अधूरेपन में कुछ ऐसा है जो मुझे बार-बार उस कविता की ओर खींचता है।


वह कविता है:

पहले एक गोरैया होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतना ऊँचा उड़ा
कि गोरैया खो गई।
 
पहले एक पहाड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे तन कर खड़ा
कि पहाड़ ढह गया।
 
पहले एक नदी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे वेग से बहा
कि नदी सो गयी
 
पहले एक पेड़ होता था
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी ऐसे जोर से झूमा
कि पेड़ सूख गया।
 
पहले एक पृथ्वी होती थी
एक आदमी होता था
लेकिन आदमी इतनी जोर से घूमा
कि पृथ्वी रो पड़ी।
रो पड़ी ...
कि पहले एक आदमी होता था।

इसे पढ़ते हुए जिस क्रिया पर मैं अटक जाता हूँ, वह 'खड़ा' है, पहाड़ वाले अंतरे में। उड़ा, खड़ा, बहा, झूमा और घूमा में मुझे केवल 'खड़ा' वाली बात क्यों अधूरी लगती है? कवि को गिन कर शब्द लिखने होते हैं ताकि कविता की लय बनी रहे और 'खड़ा' को देख कर मैं अपने मन में उसे 'खड़ा हुआ' कर देता हूँ, लेकिन कहीं पर कुछ फँसा रह जाता है।

मैंने हिंदी आठवीं कक्षा तक ही पढ़ी थी, मुझे उसकी व्याकरण और साहित्य का विधिवत पढ़ने-समझने का मौका नहीं मिला था। खड़ा क्यों बाकी क्रियाओं से भिन्न है, शायद आप में से कोई हिन्दी व्याकरण के ज्ञानी मुझे समझा सकते हैं?

***** 

टिप्पणी: पहले मैंने अजेय की जगह इसे अज्ञेय की कविता समझा था, एक सुधी पाठक, अनूप सेठी जी, जो स्वयं जाने माने हिंदी कवि हैं, ने इस गलती के बारे में मुझे बताया। उन्हें इसके लिए दिल से धन्यवाद। 

अजय कुमार "अजेय" की यह कविता (एक आदमी होता था) और अन्य कविताएँ आप कविता-कोष पर भी पढ़ सकते हैं।

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9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी बात सही लगती है। खड़ा के साथ हुआ भी होना चाहिए।

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  2. खड़े होने को भी क्रिया मान लिया जाये तो आपका संशय समाप्त हो जाये...वजन घटाने के लिये कुछ लोग खड़े खड़े यात्रा कर लेते हैं...आपने कविता की आत्मा तक जाने का प्रयास किया जो अद्भुत है...किन्तु जवाब सिर्फ़ एक के पास है...मूल कवि अज्ञेय के पास...🙏🙏🙏

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    1. "खड़े होने को क्रिया मान लिया जाये", यानि कि उसके क्रिया होने में कोई संशय है? सराहना के लिए धन्यवाद

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  3. आपकी 'खड़ा' वाली शंका वाजिब लगती है। इसके अलावा मेरी दो शंकाएं हैं। पहले तो यह कि पेड़ वाले बंद में अंतिम पंक्ति में पहाड़ आ गया है वहां पेड़ ही होगा। दूसरी शंका और भी बड़ी है कि यह कविता शायद अज्ञेय की नहीं अजेय की है। हिंदवी भी में यह कविता अजय के नाम से है।

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    1. पेड़ वाली त्रुटि ठीक की है, वह लिखते हुए मुझसे हुई थी। अजय और अज्ञेय की गलती मेरी स्मृति की है, ऐसी गलतियाँ भी आजकल अक्सर मुझसे होती रहती हैं! आप को दिल से धन्यवाद

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    2. अजेय की जगह उनका नाम अजय लिख दिया!

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  4. कृपया ब्लाग शीर्षक मे भी नाम ठीक कर दीजिये

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  5. फिर भी कवि अपने संदेश को प्रसारित करने में कामयाब है | आपका प्रश्न अपनी जगह पर सही है |

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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.

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